(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उम्मीद की भैंस…“।)
अभी अभी # ९५४ ⇒ आलेख – उम्मीद की भैंस श्री प्रदीप शर्मा
मुझे भैंस से विशेष लगाव है, और अधिकतर मैं इसी का दूध पीता चला आया हूं क्योंकि इसका दूध गाढ़ा और मलाईदार होता है। गाय का दूध अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है, यह जानते हुए भी शायद मेरी अक्ल घास चरने चली जाती है, जो मैं अधिक मलाई और स्वाद के चक्कर में भैंस के दूध को ही अधिक पसंद करता हूं।
बचपन में मैंने भी बहुत गाय का दूध पीया है। सुबह स्विमिंग पूल में तैरने जाना और वापसी में एक ग्वाले के यहां पीतल के बड़े ग्लास में शुद्ध गाय के इंस्टंट यानी ताजे कच्चे दूध का सेवन करना और अपनी सेहत बनाना।।
आज भी केवल दो ही दूध तो आम है, गाय का और भैंस का। होता है बकरी का दूध भी, जिसे गांधीजी पीते थे। जो लोग बकरी पालते हैं, वे बकरी का तो दूध पी जाते हैं और बकरा बेच खाते हैं। बकरा खाने से बकरा बेच खाना उनके लिए अधिक आय का साधन भी हो सकता है।
भैंस की तरह बकरी भी उम्मीद से होती है। वह भी खैर मनाती होगी कि बकरी ही जने। अगर बकरी हुई तो दूध देगी और अगर बकरा हुआ तो वह बलि का बकरा ही कहलाएगा। अगर बकरी का भी उम्मीद के वक्त भ्रूण परीक्षण हो, तो वह भी मेमना गिरा देना ही पसंद करेगी। मुर्गी दूध नहीं अंडे देती है और अगर उम्मीद से हुई तो मुर्गा भी दे सकती है। आज तक किसी उम्मीद की मुर्गी ने सोने के अंडे नहीं दिए, खाने के ही दिए हैं।।
उम्मीद पर दुनिया जीती है। भैंस ही उम्मीद से नहीं होती, गाय भी उम्मीद से होती है। वह भी या तो बछिया जनेगी अथवा बछड़ा। दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, यानी यहां भी बछड़े का दान नहीं होता, बछिया देख किसकी बांछें नहीं खिलेंगी। रोज जब भी शिव जी को जल चढ़ाएं तो नंदी महाराज को नहीं भूलें, लेकिन अगर उम्मीद की भैंस पाड़ा जन दे, तो नाउम्मीद ना हों, समझें एक और नंदी ने अवतार लिया है।
प्राणी मात्र की सेवा से पुण्य मिलता है, लेकिन ईश्वर गवाह है, गौ सेवा की तो बात ही निराली है। गाय भैंस पालने के लिए तो आपको डेयरी खोलनी होगी, स्टार्ट अप में इसका भी प्रावधान है। आप चाहें तो देश में फिर से घी दूध की नदियां बहा सकते हैं। उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। कुक्कुट पालन भी एनिमल हस्बेंड्री का ही एक प्रकार है। सेवा की सेवा, और मेवा ही मेवा।।
भैंस में भले ही अक्ल ना हो, वह चारा खाती हो, लेकिन जिनकी अक्ल भैंस चरने नहीं जाती, वे ही भैंस का चारा खा सकते हैं। आम के आम और गुठलियों के दाम। चारा बेचने से चारा खाने में अधिक समझदारी है। यानी भैंस का दूध भी डकारा और चारा भी खा गए। मेरे भाई, फिर गोबर को क्यूं छोड़ दिया।
अन्य पशुओं की तुलना में भैंस अधिक शांत प्राणी है, क्योंकि मन की शांति के लिए ये कहीं हिमालय नहीं जाती, बस चुपके से पानी में चली जाती है। आप भी पानी में पड़े रहो, देखिए कितनी शांति मिलती है। हर भैंस पालक की भी यही उम्मीद होती है कि उसकी भैंस अधिक दूध दे, और जब भी जने, तो बस पाड़ी ही जने, पाड़ा ना जने।।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
– हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह सम्पन्न – ☆ साभार – श्री संजय भारद्वाज –
हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह शनि. दि.21 मार्च 2026 को सम्पन्न हुआ। विश्व कविता दिवस के परिप्रेक्ष्य में इसी समारोह में संस्था की 314वीं साहित्यिक गोष्ठी भी हुई। यह संस्था की होली विशेष गोष्ठी थी। संस्था के सदस्य विगत तीन दशकों से होली गोष्ठी में फूलों से होली खेलते हैं।
इस आयोजन में दूरदर्शन के भूतपूर्व कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अश्विनी कुमार को भाषा एवं संगीत के क्षेत्र में उनके महती योगदान के लिए ‘हिंदीभूषण’ सम्मान से अलंकृत किया गया।
श्रीमती अमीता शाह को समाजसेवा एवं डॉ पुष्पा गुजराथी को साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘हिंदीश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया।
श्री संजय भारद्वाज
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद एवं लोकसाहित्य मर्मज्ञ प्रा. महेंद्र ठाकुरदास ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि विश्व की रचना ही कविता से हुई है। जिस दिन पहली कविता जन्मी, उसी दिन विश्व भी जन्मा। अपने भीतर के रूप को देखने और प्रकट करने के लिए मनुष्य साहित्य और कला की प्रस्तुति करता है। जब तलवारें टूट जाती हैं, तब साहित्य सीमाओं की रक्षा करता है।
डॉ अश्विनी कुमार ने कहा कि मैंने आज तक जो भी किया, कभी उसका आकलन नहीं किया किंतु ललक बहुत है कि अपना श्रेष्ठतम दे सकूंँ। हिंदी आंदोलन परिवार से अपने वर्षों पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस परिवार से जो जुड़ता है, कभी विलग नहीं होता है।
श्रीमती अमीता शाह ने कहा कि समाज के प्रति कुछ सकारात्मक करने के विचार ने मुझे सामाजिक कार्यों से जोड़ा। प्रकृति में आप जो देते हैं, वही पाते हैं, समाज से सम्मान पाना संभवतः ऐसी ही क्रिया- प्रतिक्रिया का उदाहरण है।
डॉ. पुष्पा गुजराथी ने कहा कि जब वह कैंसर से जूझ रही थीं, भारद्वाज युगल संजीवनी बनकर उनके साथ खड़ा रहा, उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता रहा। यह आत्महंता के क्षणों में मेरे हाथों में कलम थमाकर एक सूरज को प्रशस्त करने जैसा था।
अपनी प्रस्तावना में हिंआंप के अध्यक्ष संजय भारद्वाज ने संस्था की अब तक की यात्रा की संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्था को सांसद डॉ. मेधा कुलकर्णी, डॉ. विजय भटकर, डॉ. विश्वनाथ कराड, डॉ. दामोदर खडसे जैसी विभूतियों को सम्मानित करने का अवसर मिला है।
आयोजन में उपस्थित प्रमुख रचनाकारों एवं अतिथियों में मेजर सरजूप्रसाद, वीनु जमुआर, आराधना कुमार, डॉ. अनिता जठार , दीप्ति सिंह, नेहा म्हस्के, डॉ ज्योति कृष्ण,श्री कृष्ण चंद्र मिश्रा, डॉ मंजु चोपड़ा, मनमोहन चड्ढा, आदर्शिनी श्रीवास्तव, अभय श्रीवास्तव,अवनीश कुमार, रीतिका कुमार, नरेंद्र कौर छाबड़ा,वेदस्मृति ‘कृती’, अभिषेक पाण्डेय, जिज्ञासा ठाकुरदास, मिश्रा परिवार आदि सम्मिलित थे।
समारोह का संचालन श्रीमती गौतमी चतुर्वेदी पांडेय ने किया। श्री सुधीर कुमार मिश्रा ने गोष्ठी का प्रायोजन किया।
उल्लेखनीय है कि हिंदी आंदोलन परिवार विगत 31 वर्षों से भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में अखंड कार्यरत है।
साभार – श्री संजय भारद्वाज, अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी,भोपाल का आयोजन ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
बाल साहित्य की बहुरंगी धारा: 20+ नई कृतियों का भव्य विमोचन
राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026 का आयोजन मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल द्वारा एन.आई.टी.टी.टी.आर. (श्यामला हिल्स), भोपाल में 13-14 मार्च 2026 को दो दिवसीय भव्य रूप में संपन्न हुआ। यह संगोष्ठी भारत के प्रथम बाल साहित्य सृजन पीठ के निदेशक, ‘देवपुत्र’ बाल मासिक के पूर्व संपादक तथा बाल साहित्य के पुरोधा कीर्तिशेष श्रद्धेय कृष्ण कुमार अष्ठाना जी की स्मृति को समर्पित थी।
आदरणीय डॉ. विकास दवे (मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक) के आदेशानुसार और मार्गदर्शन में आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर से बाल साहित्यकार, शोधार्थी, शिक्षक और बाल-साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए। संगोष्ठी के दौरान कुल 10 सत्रों में क्रमवार पुस्तक विमोचन का विशेष आयोजन किया गया, जिसमें 11 रचनाकारों की 20 से अधिक नई कृतियाँ बच्चों के समक्ष प्रस्तुत की गईं।
ये कृतियाँ बाल साहित्य की विविध विधाओं—कविता, कहानी, बालगीत, पत्र-लेखन, व्यंग्य, संस्कृति-आधारित गद्य—को समेटती हैं। ये पुस्तकें बच्चों के मनोरंजन, ज्ञानवर्धन, मूल्य-शिक्षा, राष्ट्रप्रेम, पर्यावरण चेतना तथा सांस्कृतिक जड़ों से गहरा जुड़ाव पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। विमोचन समारोह ने बाल साहित्य की समृद्धि को नई ऊर्जा प्रदान की तथा रचनाकारों को पाठकों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना।
विमोचित प्रमुख कृतियाँ का विवरण निम्न अनुसार है –
सर्वप्रथम डॉ. मीनाक्षी दुबे, भोपाल की पाती लेखन विद्या की पुस्तक— नौनिहालों के: पाती वीर सपूतों की, का विमोचन किया गया। इस पाती संग्रह की पुस्तक की प्रत्येक रचना बच्चों को संबोधित करते हुए काल्पनिक पत्र के रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे बच्चे महान विभूतियों जैसे भगत सिंह के साहस, रानी लक्ष्मीबाई की निर्भयता आदि को व्यक्तिगत रूप से निकट महसूस करें। पुस्तक में राष्ट्रप्रेम, साहस, सत्य, त्याग और अनुशासन के मूल्यों को हृदयंगम करने का उद्देश्य है, ताकि प्रत्येक बच्चा बेहतर नागरिक बनने की प्रेरणा प्राप्त करे।
दूसरे सत्र में किशोर श्रीवास्तव, ग्रेटर नोएडा, उ.प्र. की पुस्तकों का विमोचन किया गया। लेखक की अब तक लगभग 15 बाल पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये बाल कलाकारों पर लघु फिल्में बनाते हैं। इस सत्र में इनकी तीन पुस्तकें का विमोचन किया गया। पहली – विश्वास की रक्षा (चित्रमय 7 कहानियाँ, 48 पृष्ठ), घर, परिवार और रिश्तों की प्रेरक बाल कहानियाँ और दूसरी – मेहनत का फल (चित्रमय 4 कहानियाँ, 32 पृष्ठ)— पारिवारिक एवं सामाजिक प्रेरक कहानियाँ संकलित की गई हैं। सभी कहानियाँ पूर्व में लोटपोट, नंदन, बाल किलकारी, बच्चों का देश, दैनिक जागरण, दैनिक सन्मार्ग, बालवाणी आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक तीसरी पुस्तक- खुशियों की वापसी, जिसमें चित्रमय 5 कहानियाँ, 32 पृष्ठ हैं जिसमें राजा-महाराजा युग की शिक्षाप्रद कहानियाँ सम्मिलित की गई है का विमोचन हुआ।
तीसरे सत्र में डॉ. भैरूँलाल गर्ग, भीलवाड़ा, राजस्थान; संपादक- बालवाटिका की पुस्तक — चलो चलें नानी के गाँव (बालकाव्य संग्रह) का विमोचन किया गया। यह बहुरंगी पुस्तक (40 पृष्ठ) में 20 कविताएँ हैं, जो बालक एवं किशोरों के परिवेश, ऋतु, पर्व, पर्यावरण, प्रकृति और मनोरंजन से जुड़ी हैं। चयन-संपादन एवं भूमिका डॉ. प्रकाश मनु जी की है, जो कविताओं की गुणवत्ता को और निखारती है।
चौथा विमोचन श्रीमती समीक्षा तैलंग, ग्वालियर/पुणे, की पुस्तक, जो व्यंग्य विधा पर आधारित है जिसका नाम — बेड़ा गर्क है, का विमोचन किया गया। इस व्यंग्य निबंध में समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य व प्रहार किया गया है। वरिष्ठ समालोचक सुभाष चंदर जी के अनुसार, नये विषय, ट्रीटमेंट और शिल्प से यह पुस्तक अंदर तक झकझोर देगी।
अगले सत्र में पांचवा विमोचन शिवम सिंह, कानपुर देहात के गीतकार की बाल गीत पुस्तक — नन्हे मुन्ने गीत का विमोचन किया गया। यह उनकी पहली प्रकाशित कृति है जो 2023 में प्रकाशित हुई थीं। जिसका विमोचन अब हुआ। इसमें संगृहीत शिशुगीत की सहजता से सरल भावनाओं, जिज्ञासा और कल्पना को छूते हैं, जो छोटे बच्चों के लिए आदर्श है।
अगला विमोचन, सत्र के समापन में डॉ. सुधा गुप्ता ‘अमृता’, कटनी, म.प्र. की दो पुस्तकें का किया गया। इसमें उनकी पहली पुस्तक – बुंदेली संस्कृति के रंग, जिसकी विधा: गद्य है। यह मध्यप्रदेश की आंचलिक बोलियों में बाल गीत एवं खेल गीत, लोक संस्कृति से परिचय करती है। मध्य प्रदेश आदिवासी लोक भाषा विभाग, भोपाल द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक आंचलिकता से भरपूर है, जो साहित्य को समृद्ध करती है। उनकी दूसरी पुस्तक जो कल विधा पर आधारित है- छई छपाक छपर छपर, जिसमें 22 बाल कविताएं संग्रहित है। जो बच्चों को छह ऋतुओं से रूबरू करवाती हैं ।
अगली पुस्तक सुषमा सिंह, दिल्ली की पहली पुस्तक— नन्हा पाखी और दूसरी पुस्तक – कच्चा पापड़ हैं। इसमें छन्द मुक्त बाल कविताएँ सम्मिलित की गई है। ये कविताएँ बच्चों की कल्पना, भावनाओं और दैनिक जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को पंख लगा कर कल्पना को उड़ान देती हैं। यह सरल भाषा में गहन संदेश देती हैं। वही माधुरी व्यास “नवपमा”, इंदौर के कविता संग्रह— अनुभति, का विमोचन किया गया। इसमें 64 नई कविताओं का संकलन किया गया है। जिसमें आत्मानुभूति से उपजी प्रबल भावपक्ष की रचनाएँ सम्मिलित हैं। मानवीय संवेदना, वेदना, रिश्तों में प्रेम, यादें, प्रकृति, मौसम और पर्यावरण जैसे विषय सम्मिलित हैं, जो पाठक को गहराई से छूते हैं।
प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. मंजरी शुक्ला के कहानी संग्रह — उड़ चले जादुई बर्तन, का विमोचन किया गया है। इसमें जादुई और मनोरंजक कहानी, जिसमें उड़ने वाले जादुई बर्तन, अन्न के सम्मान की शिक्षा देते हैं। भोजन बर्बादी रोकने और अन्न की महत्ता समझाने का संदेश—बच्चे पढ़ने के बाद अन्न के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार नीलम राकेश, लखनऊ, के बाल कहानी संग्रह की पुस्तक – सतरंगी दुनिया, जिसमें नौ प्रेरक कहानियाँ, जो बच्चों के लिए चुनिंदा विषयों पर आधारित हैं, का विमोचन किया गया। इनकी दूसरी पुस्तक – The Rainbow World — जिसका अंग्रेजी अनुवाद डॉ. राकेश चंद्रा द्वारा किया गया है, का विमोचन किया गया।
प्रोफेसर प्रभा पंत, हल्द्वानी, उत्तराखण्ड किसी परिचय की मोहताज नहीं है कि बाल साहित्य की 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी तीन पुस्तकें , जिसमें पहली – मुझको सूरज बनना है, (कविता संग्रह) जिसमें प्रेरणा और ऊर्जा से भरपूर कविताएँ सम्मिलित हैं। दूसरी पुस्तक – डिबिया में बंद चींटी (कहानी संग्रह) — जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं से बड़े सबक सिखाती कहानियाँ संकलित है। तीसरी पुस्तक – मेरी प्रिय बाल कहानियाँ— जिसमें उनकी चयनित प्रिय कहानियों का संग्रह है। का विमोचन किया गया।
डॉ अशोक व्यास जी के निबंध, जिसका नाम, “स्वप्न भंग का अनवरत सिलसिला”, का लोकार्पण किया गया। इसी के अंत में नीमच से प्रकाशित- राष्ट्र समर्पण, मासिक पत्रिका विमोचन किया गया जो पिछले 21 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहा है। जिसके संपादक शारदा संजय शर्मा है।
यह विमोचन बाल साहित्य की बहुरंगी विविधता को दर्शाता है तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा। डॉ. विकास दवे जी के मार्गदर्शन में यह आयोजन बाल साहित्य के उत्थान का एक ऐतिहासिक पड़ाव सिद्ध हुआ।
सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं उनके भावी सृजन के लिए शुभकामनाएँ!
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साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
25/03/2026
संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226
(पूर्वसूत्र- “नेमक्या कोणत्या थकीत कर्ज खात्यांमध्ये मी वसुलीसाठी आवश्यक तो पाठपुरावा योग्य पध्दतीने केलेला नाही हे त्यांनी निदर्शनास आणून द्यायला नको कां? सरसकट आरोप करून ते समाधानकारक स्पष्टीकरणाची अपेक्षाच कशी करू शकतात सर? ‘अकोला ब्रँचचा मी चार्ज घेण्यापूर्वीची तिथल्या गलथान कारभाराची नेमकी पार्श्वभूमी मी तुम्हाला सांगू कां? ‘ असं तेव्हा मी विचारलं होतं ना सर, ते यासाठीच.. ” मी म्हंटलं.
“तुम्ही जे कांही सांगणार होतात ते मला जरूर सांगा. पण या सगळ्याचं विनाकारण दडपण नका घेऊ. होईल सगळं व्यवस्थित. मी आहे ना? ” वखरेसाहेब म्हणाले.
वखरेसाहेबांच्या या शब्दांमधून जणू ‘तो’च मला आश्वस्त करतो आहे असंच वाटत राहिलं…!
पण पुढे घटनाच अशा घडत गेल्या की कांहीतरी विपरीत होणार असल्याच्या आशंकेने माझं मन सैरभैर होऊ लागलं..! )
इथून स्वेच्छानिवृत्ती योजनेसाठीचे अर्ज फाॅरवर्ड झाले त्याला चारसहा दिवस उलटून गेले होते. त्या अर्जांची छाननी करून अर्ज स्वीकृती, अस्वीकृती किंवा त्यांचे प्रलंबन याबाबतचे निर्णय सेंट्रल आॅफिसमधील संबंधित डिपार्टमेंटने तात्काळ म्हणजे ३१ डिसेंबर अखेर कोणत्याही परिस्थितीत घ्यायचे होते. तसे सख्त आदेश एम. डी. आॅफीस कडून त्यांना देण्यात आले होतेच. त्यानुसार तिथे युध्दपातळीवर सर्व कामे सुरूही झाली होती. त्यामुळे रोजच्या इनवर्ड मेलमधे पुणे रिजनमधील स्वेच्छानिवृत्तीसाठी अर्ज केलेल्यांची मंजूरीपत्रे रोज टप्प्याटप्याने येऊही लागली होती. अर्थात नाॅर्मल रूटीनमधे मलाही अर्ज स्वीकारल्याचं पत्र अपेक्षित होतंच. तरीही अकोला ब्रॅंचमधील थकीत कर्ज खात्यामुळे निर्माण झालेल्या प्रश्नामुळे जो अडसर निर्माण व्हायची शक्यता होती त्यामुळे फार तर चार दोन दिवस उशीरा मंजुरीपत्र येऊ शकेल असं मला वाटलं होतं. पण झालं भलतंच. मी नागपूर रिजनल आॅफीसला पाठवलेल्या सविस्तर उत्तरानंतर मला त्यांच्याकडून खरंतर पुढे कसलीही विचारणा किंवा अधिक स्पष्टीकरणाची मागणी आलेली नव्हती. तरीही एकेक दिवस उलटत चालला पण या बाबतीतली माझी प्रतीक्षा मात्र संपली नाहीच. वखरेसाहेब गेले चार दिवस ब्रॅंचेस् व्हिजीटच्या पूर्वनियोजित टूरवर होते त्यामुळे नेमकं काय करावं मला सुचेना. वाट पहाण्याशिवाय पर्यायच नव्हता. तो टूर प्रोग्राम संपवून साहेब आॅफिसला आले ते ३० डिसेंबरला. त्यांच्या अनुपस्थितीतल्या महत्त्वाच्या पेंडिंग मॅटर्सचा निपटारा करण्यात दिवसभर ते पूर्णत: व्यस्तच होते त्यामुळे त्यांना श्वास घ्यायलाही फुरसत नव्हती.
एकदा वाटलं त्याना भेटावं आणि सांगावं सगळं. निदान मनातली चलबिचल तरी कमी होईल. पण मलाच ते योग्य वाटेना. ते टूरवरून दमून आले होते. पुन्हा दिवसभर कामांचं दडपण. ते चिडले नक्कीच नसते पण तरीही..? माझ्या समोरचा प्रश्न माझ्या जीवनमरणाचा नाहीये हे मी स्वत:ला समजावलं आणि मनातले ते उलटसुलट विचार झटकून टाकले. ३० डिसेंबरचा दिवस असाच कोरडेपणाने उलटूनही गेला!
३१ डिसेंबर २००० चा दिवस उजाडला. त्यादिवशीही इनवर्ड मेलमधे माझ्यासाठी कांहीच नव्हतं!
अखेर परतीचे दोर असे पूर्णत: कापलेच गेले होते. आता यापुढे अधांतरी लटकत नाही रहायचं. जे समोर आलंय ते आहे तसं स्वीकारून पुढं जायचं आणि तेच आपल्या हिताचं असणाराय असा विचार केला आणि मन एकदम शांत झालं. आता माझा अर्ज प्रलंबित तरी रहाणार किंवा थेट नाकारला तरी जाणार हे जवळजवळ ठरल्यातच जमा होतं. यापैकी कांहीही झालं तरी ते माझ्यावर अन्याय करणारंच होतं. तरीही त्यानंतर नेमकं जे कांही होईल त्यानुसार तेव्हा काय करायचं करायचं ते वखरेसाहेबांशी बोलून ठरवता येईल असा विचार केला. वखरेसाहेबांची अशी आठवण झाली आणि सकाळपासून आपण त्यांना भेटलोच नव्हतो हेही लक्षात आलं. आज अर्जमंजूरीचा अखेरचा दिवस. त्यांना माझ्याबाबतीतल्या या अडचणीची पूर्वकल्पना असूनही त्यांनी गेल्या पंधरा दिवसांत त्याबाबत कांहीच केलं नाहीय यामागेही कांहीतरी कारण असणारच ना? त्यांच्यामागेही इतर अनेक व्यवधानं होती त्यात ते हा विषय विसरलेही असतील कदाचित. कांहीही असो पण जे व्हायचं ते आता होऊन गेलंय. आमचा लंचब्रेक झाला. मी सोबत आणलेला माझा डबा उघडला. तोंडात घास घेताना हात अडखळला. आपला इथला अन्नाचा शेर अद्याप संपलेला नाहीय असा विचार मनात आला न् मग माझं मलाच हसू आलं. आपण किती वरवरचा विचार करत असतो असंच वाटत राहीलं. जे कांही घडणार आहे ते तोच घडवणार आहे, मग आपला अन्नाचा शेर कुठं आणि किती दिवस हे ठरवणारे आपण कोण?
माझं खाणं आवरलं. शिपायाने सर्व्ह केलेला चहा घेऊन मी माझ्या टेबलावरची पुढची फाईल समोर ओढली तेव्हाच इंटरकाॅमची रिंग वाजली. फोन रिसेप्शनिस्टचा होता. ‘जस्ट अ मिनिट’ म्हणत तिने तो बंद केला. कदाचित वखरेसाहेबांनी आपल्याला बोलावलं तर नसेल? असंही वाटून गेलं पण ते तेवढंच. कारण माझी स्वेच्छानिवृत्ती आणि त्याचे मंजूरीपत्र हे विषय माझ्यापुरते मी पुसूनच तर टाकले होते! पण.. ते खोटं ठरवणारं, अचंबित करणारं वास्तव वखरेसाहेबांच्या केबिनमधे माझी वाट पहातंय याची मला पुसटशीही कल्पना नव्हती!
आज इतक्या वर्षांनंतरही त्यातला थरार मी विसरू शकलेलो नाहीय.
मी केबिनमधे जाताच वखरेसाहेबांनी माझं हसतमुखाने स्वागत केलं.
“काॅंग्रच्युलेशन्स अॅण्ड आॅल द व्हेरी बेस्ट.. ” ते म्हणाले.
त्यांचे प्रसन्नचित्ताने मला अशा शुभेच्छा देणं माझ्यासाठी त्याक्षणी वास्तव नव्हे तर स्वप्नवतच वाटत राहिलं.
“मिस्टर श्रीवास्तव, अवर नागपूर रिजनल मॅनेजर वाॅज नाॅट रेडी टू गीव्ह क्लीनचीट टू यू. तुमच्या Voluntary retirement साठी it was a big obstacle.. ” ते म्हणाले.
पण मग हा तिढा असा अचानक सुटला कसा हेच मला समजेना.
” तुम्ही नका दडपण घेऊ. होईल सगळं व्यवस्थित. मी आहे ना..? ” कांही दिवसांपूर्वीचे मला आश्वस्त करणारे वखरे साहेबांचे शब्द मला आठवले. ते केवळ माझी समजूत घालण्यासाठी बोललेले वरवरचे शब्द नव्हते याची ग्वाही आज दिवसभरात काय घडलं ते त्यांच्याकडून ऐकताना मला प्रत्येक क्षणी जाणवत होतं!
लहानपणापासून ती स्वतंत्र विचारांची होती. चाळीत शेजारी शेजारी लागून खोल्या. मनूचे वडील अगदी सामान्य नोकरीत आणि आई शिक्षिका.
मनू दिसायला काही सुंदर नाही पण अतिशय स्मार्ट आणि आरोग्याचं तेज होतं तिच्या सर्वांगावर. सुंदर तजेलदार वर्ण आणि मोठे डोळे.
मनू अभ्यासात हुशार तर होतीच पण उत्तम स्पोर्ट्स् पर्सनही होती. मनूच्या मैत्रिणीसुद्धा खूप. सतत घोळका तिच्या घरी यायचा आणि मनूच्या आई प्रेमाने त्यांना खायला करायच्या.
मनूच्या चाळीत खालच्या मजल्यावर नवीन बिऱ्हाड आलं. मनू तेव्हा असेल तेरा चौदा वर्षाची.
मनूच्या आई आणि मनू त्यांना भेटायला गेल्या. काही लागलं तर सांगा, बाई हवी तर पाठवू का असं विचारायला.
मनूला त्यांचा मुलगा भास्कर तिथे दिसला. तिच्यातून दोन तीन वर्षांनी मोठा असेल. किती देखणा होता तो दिसायला. उंच, लख्ख गोरा निळे घारे डोळे. मनू बघताक्षणी त्याच्या जणू प्रेमातच पडली.
भास्करला आणखी एक बहीण होती. ती नव्हती भास्कर सारखी देखणी. पण स्वभावाने खूप गोड आणि अभ्यासात हुशार. रेवतीची आणि मनूचीही छान दोस्ती झाली.
मनूला भास्कर फार आवडायचा. या ना त्या निमित्ताने मनू त्यांच्या घरी जायची. घरी काही छान केलेलं असलं तर आवर्जून भास्करच्या घरी द्यायची. चाळीतल्या बायका हसायच्या.
“मनू, प्रेमात पडलीस काय गो भास्करच्या? बघ हो. तू एवढी हुशार आणि तो आपला बेताबेताचा. रूप काय चाटायचं असतं का? ”
मनू काही बोलायची नाही. पण आपलं वागणं सोडायची नाही.
भास्कर तर तिच्याकडे सरळ सरळ दुर्लक्ष करायचा. तो बरा त्याचा अभ्यास बरा.
मनू उत्तम मार्क्स मिळवून अकरावी झाली आणि कॉलेजला गेली. मनू एमकॉम् झाली आणि तिला बँकेत नोकरी मिळाली. फार आनंद झाला तिला.
भास्करला मात्र कमी मार्क्स मिळाले. तो कॉलेजला गेला पण फार मोठं ध्येय काही नव्हतं त्याच्या डोळ्यासमोर. डिग्री घ्यायची आणि मिळेल ती नोकरी करायची असं माफक ध्येय होतं त्याचं.
त्या दिवशी मनू भास्करच्या घरी गेली. , तो एकटाच होता घरी.
“भास्कर, सरळच विचारते, मला फार आवडतोस तू. लग्न करशील माझ्याशी? मी छान संसार करीन बघ तुझा. माझ्या मनात फक्त तूच असतोस नवरा म्हणून कायम. करशील लग्न माझ्याशी? ”
भास्कर शांतपणे म्हणाला, ”मनू माझ्या मनात तुझ्याबद्दल अशा भावना मुळीच नाहीत. तू हुशार आहेस देखणीही आहेस. मी तुझ्याइतका मुळीच हुशार नाही.
आपलं लग्न झालं तर कायम माझ्या मनात ही तुलना राहील, की आपण मनूपुढे सामान्य आहोत. नकोच हे व्हायला
“अरे हे काय बोलतोस तू? मला जर तू आवडतोस तर या गोष्टींचा विचारच कसा येईल माझ्या मनात?
अजून विचार कर भास्कर. आपला संसार सुंदर होईल. मीही नोकरी करते आहेच. आपण मोठं घर घेऊ. ”
“हेच नकोय मला. तुझ्या जिवावर मला मोठं व्हायचं नाहीये. मला नाकापेक्षा मोती जड नकोय. आई पण हेच म्हणते माझी. ”,
मनूला आता राग आला. ”हो का? म्हणजे काकूंचं मत आहे हो हे? तुला स्वतःला नाही का काही समजत? ठीक आहे मग. ”
मनू तिथून निघून गेली. तिला रेवती भेटली.
“मनू आमचा दादा अगदी मूर्ख आहे बघ. मी पण स्वप्न बघितलं होतं की मनूच माझी वहिनी होईल. ,
सोड तू. त्याला अक्कल नाहीये. तुला खरंच याच्याहून चांगला हुशार जोडीदार मिळेल. हिरा टाकून घेईल काच हातात. मूर्ख आहे दादा. ”रेवती म्हणाली.
भास्करने एका फर्ममध्ये अकाउंटंटची नोकरी घेतली.
मनूला तिचे आईबाबा म्हणाले,
मनू, आता लग्नाचं वय झालं तुझं. बघायला लागू या ना मुलगे? बघ. ते घैसास विचारत होते त्यांच्या पुतण्या बद्दल. छान मुलगा आहे बघ अगदी. ”
“आई मला फक्त भास्करशीच लग्न करायचं आहे. पण तो नाही म्हणतो. ”
”मनू हा काय वेडेपणा? मूर्ख आहे असं म्हण तो मुलगा. अग हातात आलेला हिरा टाकतोय तो. असं समज की तोच तुझ्या योग्यतेचा नाहीये. असं नको करू मनू. ”
आई बाबांनी खूप समजूत घातली. मनू घैसासांचा जय बघायला तयार झाली. संध्याकाळी घैसास मनूच्या घरी आले. जय आणि आईबाबा आणि जयची बहीण.
जयला बघताक्षणीच मनू आवडली.
तिथेच त्याने सांगून टाकलं, “मनू मला आवडलीस तू. तुमचा होकार असेल तर अगदी साधे लग्न करायला मला आवडेल. मला डामडौल आणि उधळपट्टी आवडत नाही. ”
घैसास गेल्यावर बाबा म्हणाले, मनू, काय मग? आवडला का जय? किती स्मार्ट हुशार आणि पुन्हा खूप शिकलेला मुलगा आहे ग. काय कळवू त्यांना?
“बाबा हो सांगा त्यांना.
मला आवडला हा मुलगा.
आता भास्कर इतका सुंदर नाहीये पण हुशार आहे. ”
बाबा हसले. अजून ते भास्करचं खूळ आहेच का डोक्यात? मनू, संसार रूपावर होत नाही. पुरुषाची बुद्धिमत्ता महत्वाची. ”मनूला हे पटलं.
त्या रात्री ती भास्करला भेटली.
“भास्कर असं असं माझं लग्न ठरतंय.
तू हो म्हणालास तर अजूनही मी त्यांना नकार कळवू शकते”.
भास्कर म्हणाला, छे छे.. तू जरूर लग्न कर त्याच्याशी. माझ्या शुभेच्छा. ”
मनू घरी आली. साखरपुड्याची तारीख ठरली. मनूची आई हौसेने तयारीला लागली.
इतक्यात घैसासांचा निरोप आला. येऊन भेटा. मनूचे आईबाबा
घैसासांना भेटायला गेले.
जयच्या आईनी त्यांचे स्वागत केलं आणि म्हणाल्या,
“तुम्ही आमच्यावर अवलंबून राहू नका. लग्न ठरलं आणि माझी आई गेली अचानक काहीही हासभास नसताना, कोणताही आजार नसताना..
मनूचा पायगुण बरा नाही. कशाला विषाची परीक्षा बघायची? नकोच ते. आपण साखरपुडा रद्द करूया. ”
अहो पण.. जयचं काय म्हणणं आहे? या युगात कसले हो पायगुण आणि अशा गोष्टी? ”
जय माझ्या शब्दा बाहेर नाही. तर हे लग्न आता होणार नाही हे निश्चित. ”
आईबाबा हताश होऊन घरी आले.
मनू बँकेतून आल्यावर त्यांनी हे तिला सांगितलं. ,
”जाऊ दे ना आई. काही नका वाईट वाटून घेऊ. , आता मलाच लग्न करायचं नाहीये. माझ्यासाठी आता स्थळं बघू नका. ”मनू तिथून निघून गेली.
दरम्यान बऱ्याच गोष्टी घडल्या.
भास्करचे आईवडीलआणिभास्कर कोकणात जाऊन भास्करचं लग्न गुपचूप उरकून आले. कोणालाही पत्ता न लागता.
दुसऱ्या दिवशी घरात सत्यनारायणाला मात्र सगळ्या लोकांना बोलावलं. भास्करची बायको सगळ्याना प्रसाद देत होती. काकूंनी ओळख करून दिली.
ही अपर्णा. आमची नवी सून हो.
अगदी गडबडीत ठरलं सगळं. ”
कोणी काही बोललं नाही. मनू, तिचे आईवडील सगळे सत्यनारायणाला जाऊन आले.
दुसऱ्या दिवशी अपर्णा आपण होऊन मनू कडे आली. “मनू, काल नीटसं बोलणं झालं नाही आपलं. मला तुझ्याशी मैत्री करायला खूप आवडेल. इथे माझ्याएवढं कोणीच नाही. आणि तू नोकरी करतेस ना? मी फार शिकलेली नाही पण मला संसाराची खूप आवड आहे. मला स्वयंपाक करायला खूप आवडतो. ”
ही साधी सरळ मुलगी मनूला फार आवडली. चहा घेऊन ती निघाली आणि म्हणाली
” येत जा ग मनू. मीही येत जाईन तुमच्याकडे. चालेल ना काकू? ”
हसत हसत ती निघून गेली.
किती सरळ साधी आहे पोरगी ही.
भास्करपुढे दिसायला थिटीच आहे हो. ”मनूच्या आई म्हणाल्या.
अपर्णाने आपल्या गोड वागण्याने सगळ्याना आपलंसं करून टाकलं.
मनू तर तिची घट्ट मैत्रीण झाली. आपली सगळी गुपितं सांगायला हक्काची मैत्रीण मिळालीअपर्णाला.
“काय ग मनू. करून टाक की ग लग्न. मला बघू दे ना माझी मैत्रीण सुखात असलेली. ”
अपर्णा, आत्ता कुठे मी दुःखात आहे ग? नको वाटतं आता ते लग्न. तू तुझ्या नवरा आणि ही तुझी दोन गोड पोरं मस्त आहेत की. मी नाही ग बाई त्या फंदात पडणार.
मस्त पगार आहे, बँक फ्लॅट देतेय पण आईबाबा तयार नाहीत ना तिकडे यायला. ”मनू हसून म्हणे.
अपर्णाची जुळी मुलं मनूला फार फार आवडत आणि लाघवी अपर्णा अति माया करी मनूवर.
दिवस कसे पळत होते नुसते. अपर्णाचे मोहित रोहित आता आठ वर्षांचे झाले. अपर्णा संसारात बुडून गेली.
☆ ताण फार घेतो हल्ली आपण सगळे…. लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – स्नेहलता गाडगीळ ☆
वेळेवर उठण्यापासून वेळेवर झोपायचंय ह्याचाही ताण घेतो आणि एवढं करुन शेवटी झोप यायची तेव्हाच येते..
बहुतांश पब्लिक सोशल मिडिया मास्टर झाल्याने सगळ्यांना अति ज्ञान प्राप्त होतंय… त्यामुळे कुठलीही व्यक्ती गल्ली पासुन दिल्ली पर्यंत सगळ्या विषयावर खाडखाड बोलु शकतो…
त्यामुळे कधीकधी हे ज्ञान आपलं आपल्यालाच झेपत नाही आणि आपला ताण अजुनच वाढतो.
बारकाईने विचार करा…
साधं जेवणाचंच उदाहरण घ्या.. दहा वर्षांपूर्वी आपण सगळे मन लावुन वरण भात भाजी पोळी असं आनंदाने जेवायचो… कधी त्या अन्ना बद्दल आपण साशंक नव्हतो… पण आता…
या भाजीत हे व्हिटामीन..
पोळीत एवढ्या कॅलरी..
सॅलड पाहीजेच..
गोड नको रे बाबा…
हे तेल असं ते तेल तसं…
१०००० पावलं चाललंच पाहिजे..
फलाणं आणि बिस्तानं…
अरे दोन घास ताटात आलेत ते खायचे नाही नीट आणि शंभर नाटकं…
शिस्तीत रहा… शिस्तीत खा.. आणि आनंदाने जगा… हे सुत्रं नाहीच हल्ली…
प्रत्येकाला प्रत्येक गोष्टीत टॉपवरच जायचय… तरुणच रहायचय… तरुणच दिसायचय… कशासाठी…???
तरुण मुलांना दिसु द्या कि तरुण.. तुमचं तरुणपण झालय ना जगुन… आपण काय अश्वत्थामा आहोत का??? पृथ्वीवरच कायम रहायला..
Accept the reality… and live your life happily.
मी एक अति छोटी व्यक्ती आहे
जिला काहीही येत नाही.. काहीही दाखवायचंही नाही आणि सिद्ध तर मुळीच करायचं नाही..
असं रोज स्वतःला सांगितलं तर आनंदी आयुष्य जगणं सोपं आहे.
फार ताण नका घेऊ… आपल्या असण्या नसण्याने कुणाचं काहीही बिघडणार नाहीये…
काही दिवसांपूर्वी मी असंच खुप ज्ञानाचा विस्तार केला होता… माझ्या… पण मग माझ्या लक्षात आलं कि या ज्ञानाचा मला खुप जास्त ताण येतोय
मग सगळं बंद केलं… बातम्या बघणं बंद केलं… सिनेमा आणि मालिका बघणं बंद केल्या आणि आता खुssss प बरं वाटतय..
आता सध्या आला दिवस शांततेत घालवायचा प्रयत्न करतो… जुने सिनेमा बघणे… गाणी ऐकणे… आणि आवडेल ते काम करणे… हेच सुत्रं आहे सध्या…
तुम्हाला एक गंमत सांगतो…
नविन वर्ष सुरू झालं तेव्हा.. भविष्य सांगणारे अनेक व्हिडिओ यायला लागले…
राहु खराब… केतु खराब… देशाचं भविष्य खराब… हे खराब ते खराब… ताण यायला लागला हो…
म्हटलं हे ऐकुन वर्षभर सोडा आपला आत्ताच निकाल लागायचा…