(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘हमें तेरा ही सहारा…‘।)
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘फ्रांस में भारत का डंका (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४७ ☆
☆ आलेख ☆ फ्रांस में भारत का डंका (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
इस समय फ्रांस के पेरिस नगर में भारत का डंका गूंज रहा है। प्रसिद्ध ऐफ़िल टावर के कर्मचारी हड़ताल पर चले गये हैं। पेरिस के पास हिंदुओं के स्वामीनारायण संप्रदाय के एक विशाल मंदिर का उद्घाटन हुआ और उसके बाद संप्रदाय के बड़े गुरु जी ने एफ़िल टावर देखने की इच्छा प्रकट की, साथ ही यह निर्देश कि उनकी उपस्थिति के समय टावर पर से महिला कर्मचारियों को हटा दिया जाए। टावर के प्रबंधक भी ऐसे आज्ञाकारी निकले कि उन्होंने इस निर्देश का पालन किया। फ्रांस जैसे लिंग-भेद से मुक्त देश में यह कदम अभूतपूर्व था।इसी पर बाद में पूरे देश और पूरी दुनिया में जो हल्ला मचा वह अभी तक चल रहा है। सारी दुनिया में हमारे महान देश की जो छवि बन रही है वह बताने की ज़रूरत नहीं है।
स्वामीनारायण संप्रदाय के विश्व में हज़ारों मंदिर है जो अपनी भव्यता और स्थापत्य के लिए जाने जाते हैं। यह बताना ज़रूरी है कि भारत में जो हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण मंदिर हैं उनका स्थापत्य बहुत साधारण है।
वर्तमान घटना के संदर्भ में यह समझना मुश्किल है कि धार्मिक लोगों को नारी से इतना परहेज़ क्यों है। हमारे देश में नारी सभी रूपों में पूज्य है— चाहे वह मां हो, बहन हो या बेटी। पत्नी के रूप में सीता, पार्वती हमारी आदर्श हैं तो देवी के रूप में हम दुर्गा, काली, लक्ष्मी या सरस्वती के आराधक हैं। वस्तुत: संसार में रौनक स्त्री से ही है। स्त्री का मधुर कंठ, उसके वस्त्रो का रंग, अपने घर को सजाने संवारने की उसकी उत्कंठा, सभी प्राणियों के प्रति उसका स्नेह इसे प्रमाणित करते हैं। जो आज स्त्रियों से दूर रहने का ढोंग करते हैं वे कहां होते अगर स्त्री उन्हें नौ महीने अपनी कोख में आश्रय नहीं देती और अपने पैरों पर खड़े होने तक हर वक्त उनकी देखभाल नहीं करती। हर युग में स्त्रियां संतानों के लिए अपने जीवन को होम करती रही हैं।
अभी एक भावुक कर देने वाला वीडियो देखा जिसमें बेटा मां से पूछता है, ‘यदि तुम्हें एक घंटे बाद मृत्यु होने की सूचना मिले तो कौन सा काम पूरा करना पसंद करोगी?’ और मां का जवाब है, ‘तेरे लिए चार रोटियां सेंक जाऊंगी ताकि तू भूखा न सोये।’
लगे हाथ हम एक और देवी को याद कर लें जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को सुख और सुकून से भर दिया। ये देवी लता मंगेशकर थीं जो आज भी करोड़ों लोगों के कानों में अमृत टपकाती रहती हैं। सदियां गुज़र जाएंगीं लेकिन लता हमारे बीच में रहेंगीं। वे हमेशा हमारे दुःख-सुख में हमारे बगल में खड़ी रहेंगीं। हमारी देवियों की तरह लता जी भी अमर हो गयीं।
आदि शंकराचार्य ने कभी नारी को ‘नरक का द्वार’ कहा था। भाष्यकारों ने समझाया कि उनका आशय यह था कि स्त्री का संसर्ग साधकों में वासना को जागृत करता है, उसे मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग से विचलित करता है। यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि संन्यासी को इंद्रयजित कहा जाता है, यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों पर विजय पा ली हो। फिर साधक के विचलन की गुंजाइश कहां रह जाती है? अर्थ यह निकलता है कि साधक को अपने ऊपर भरोसा नहीं होता, इसीलिए वह स्त्री से दूर भागता है। यानी रोग कहीं और है और दवा कहीं और लगायी जाती है। नारी सृष्टि में पुरुष की पूरक है, उसके बिना सृष्टि की कल्पना असंभव है। सृष्टि के परिचालन का जितना बोझ स्त्री के हिस्से में आता है उसका सौवां अंश भी पुरुष के हिस्से में नहीं आता। इसके बावजूद भी पुरुष स्त्री को अपमानित करने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता।
इस प्रसंग में परसाई जी की एक बहुत दिलचस्प रचना ‘राग विराग’ याद आती है। बस यात्रा का वर्णन है। बस में दो-दो की सीटें हैं। एक पर एक सन्यासी विराजते हैं, 40-50 की उम्र। थोड़ी देर में उनके बगल वाली सीट पर एक महिला बैठ जाती है। सन्यासी परेशान हो जाते हैं। स्त्री से कहीं अन्यत्र बैठने का अनुरोध करते हैं, लेकिन कोई सीट खाली नहीं है। सन्यासी कहते हैं, ‘मैं स्त्री के साथ नहीं बैठ सकता। स्त्री का संग मुझे वर्जित है।’ यह भी कहते हैं, ‘माता और पुत्री का संग भी हमारे लिए निषिद्ध है। धर्म का आदेश है।’ लेखक सन्यासी से कहता है, ‘बैठ जाने दीजिए। आप तो वीतराग हैं।’
बस चल पड़ती है और थोड़ी देर बाद स्त्री परेशान होने लगती है। सन्यासी जी जो श्लोक पढ़ रहे थे वे गड़बड़ाने लगते हैं। स्त्री बार-बार सन्यासी से ठीक से बैठने को कहती है। अंत में वह उठकर सन्यासी जी को एक थप्पड़ मारती है, कहती है, ‘लुच्चा बदमाश कहीं का’। सिद्ध हुआ कि जो संयम मन से न होकर कृत्रिम उपायों से होता है, उसका यही हाल होता है। गांधी जी ने स्त्रियों के संसर्ग में अपने संयम की बाकायदा परीक्षा ली थी और उसमें सफल हुए थे, यद्यपि उनका यह प्रयोग विवाद का कारण भी बना था।
कई वर्ष पहले मुझे एक धार्मिक भोज में एक युवा साधु मिले थे। वे मेरे ही नगर के थे, वहीं शिक्षा प्राप्त की थी। भोजन के लिए दूर से पैदल चलकर आये थे। बात बात में उन्होंने बताया कि उन्हें स्त्रियों के साथ एक ही आसन पर बैठने से परहेज़ है। मुझे लगा उनकी दृष्टि में स्त्रियों के शरीर में कोई ‘करंट’ होता है जो आसन के मार्फ़त उन तक पहुंच कर उनकी साधना को खंडित कर देता है।
पता चला है कि स्वामी नारायण संप्रदाय के बड़े गुरु जी की उम्र 93 साल है। इस उम्र में तो वैसे ही आदमी के लिए स्त्री-पुरुष का भेद ख़त्म हो जाता है। फिर ऐसे स्त्री-विरोधी विचार क्यों?
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– माध्यम…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ११८ — माध्यम —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
किसी एक देश के राजकुमार की कथा मुझे याद आ गयी। पर वह कथा मेरी अपनी बनायी हुई है। वह लिखित कथा अब तो खो गयी है। बस वह मुझे जुबानी याद है। मैं वह फिर से लिख दूँगा। लोग पढ़ कर मानेंगे वह राजकुमार तो था। लिखित शब्दों ने तो भगवान को भी साकार और बोलता सा बना दिया है। शायद शब्दों ने भगवान की साधना से ही यह गुण अर्जित किया हो। लिखने वाले तो माध्यम होते हैं।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३५२ ☆ जीव, वन, जीवन…
एक पाठशाला के परिसर की दीवार खड़ी करने का काम चल रहा है। इस प्रक्रिया में उसकी सीमा पर उगे छोटे-बड़े पौधे उखाड़ दिए गए हैं। वर्षों से खड़े कुछ वृक्ष भी काट दिए गए हैं। यद्यपि इन वृक्षों को सुरक्षित रखते हुए भी दीवार बनाई जा सकती थी। वृक्षों को काटने का कारण पूछने पर उत्तर मिला “जंगली थे, इसलिए हटा दिए। यहाँ आर्नामेंटल ट्री लगाएँगे। सुंदर दिखेंगे।”
‘जंगली’ शब्द सुनकर मैं हँस पड़ा। संस्कृत में ‘अरण्य’ या ‘वन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसी के चलते ‘नैमिषारण्य’ शब्द का उल्लेख हमारे ग्रंथों में मिलता है।
जीवन पर विचार करें। जीव और वन के अतर्संबंध को प्रतिपादित करने के लिए यह शब्द पर्याप्त है। वन है तो जीव है। जीव के लिए वन अनिवार्य है। दोनों का सम्मिलन ही जीवन है। विज्ञान इसे कुछ इस तरह से कहता है कि ऑक्सीजन है तो जीवन है। ऑक्सीजन के लिए वृक्ष महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र या इकोसिस्टम के लिए वृक्ष अनिवार्य हैं। वृक्ष, जिन पर पक्षी घोंसले बना सकें। वृक्ष, जो वर्षा को आकर्षित कर सकें। वृक्ष जिनके तनों पर जाने कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े जीव अपना निवास बनाते हैं। वृक्ष जिनके फल खाकर कितने ही पंछी अपना पेट भरते हैं। वृक्ष जिनकी छाया के नीचे पथिक विश्राम करते हैं। वृक्ष जिनसे जंगल बनते और बसते हैं।
वस्तुत: ‘जंगली’ शब्द का उपयोग ऑक्सीजन से घिरे वातावरण में रहने वाले के लिए किया जाना चाहिए था, प्रकृति के सानिध्य में निवास करने वालों के लिए किया जाना चाहिए था। बाज़ारवाद ने जंगली शब्द को अनुपयोगी, क्रूर, हिंसक और असभ्य के संदर्भ में परिवर्तित कर दिया।
यूँ देखें तो न्यूनाधिक जंगली तो हम सब हैं। जिन्हें ‘जंगली’ शब्द अपशब्द लगता है, उन्हें ज्ञात हो कि हम सब के पूर्वज भी कथित जंगली ही थे। हम सब ने विद्यालयीन जीवन में ‘रेफरेंस टू कॉन्टेक्स्ट’ अर्थात संदर्भ के अनुसार आकलन करने को समझा है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत देखें हमारे लिए अंडमान-निकोबार के वनों में निर्वस्त्र रहने वाली जारवा जाति के लोग जंगली हैं। सिक्के का दूसरा पहलू है कि बहुत हद तक संभव है कि उनके लिए हम वस्त्रधारी जंगली हों। अपनी छोटी-सी त्रिज्या से एक वृत्त खींचकर उसे अंतरिक्ष मान लेना हास्यास्पद है। प्रकृति ने देह के कर्म सबके लिए समान रखे हैं। आहार, निद्रा, मैथुन, आभिजात्य और कथित आदिम दोनों के लिए समान हैं। प्रकृतिगत समानता को अपनी सुविधा के आधार पर वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता।
‘जंगली’ कहकर हम आज ऑक्सीजन के स्रोतों का नाश कर रहे हैं। कल जब हमारे गले प्राणवायु के अभाव में सूखेंगे तो जंगली बहुत याद आएँगे।
अपनी एक कविता स्मरण हो आ रही है-
काट दिये गए हैं
पेड़ों के मुंड,
छील दी गई है
पूरी की पूरी छाल,
धरती को
पच्चीस-पचास मीटर तक
घनी छाँव से ढकनेवाले,
अब स्वयं खड़े हैं
निर्वस्त्र और विवश,
इनकी असहाय देह पर
घातक रंगों से
पोती जा रही हैं
रंग- बिरंगी पत्तियाँ,
उकेरे जा रहे हैं
कई तरह के फूल,
एल.ई.डी.की रोशनी में
प्रदर्शन के लिए रखी
अनावृत लाज पर
चस्पां हो रहे हैं
कई स्लोगन,
और इनके इर्द-गिर्द
फल-फूल रही है
बेख़ौफ़ ब्यूरोक्रेटिक घास,
सारा माज़रा
आशंका मिश्रित भय से
निहार रहे हैं
जवानी की दहलीज़ पर खड़े
आसपास के कच्चे पेड़,
मैं लिखता हूँ ख़त
आयोजकों को-
माफ कीजियेगा
हरित शहर अभियान के
उद्घाटन के लिए
नहीं आ पाऊँगा।
मतभिन्नता हो सकती है तथापि मनुष्य जाति की अब तक की यात्रा के अनुभव से स्थूल रूप से यह देखने में आया है कि आभिजात्य के प्रदर्शन के विरुद्ध जंगली का दर्शन, जीवन से अधिक जोड़े रखता है। इति।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆