हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५६ – आलेख – सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५६ ☆

☆ आलेख ☆ ~ सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सूर्य की किरणे शरीर को छुकर लौट पड़ी, लगा कि किसी ने जलते लाल तप्त लौह को बदन पर ही रख दिया हो। गनीमत बस इतनी थी कि किरणे छु कर ही निकल गयीं थीं। असंख्य – अनगिनत विषाणु -कीटाणु बिलबिला कर रह गये और यह कहते सुने गये कि हे भगवन् ! जान बची तो लाखों पाए।

हालांकि आधुनिक घोर शीतक यन्त्र से निकली बर्फ़ीली हवाओं से चिल्ड हो रहे कमरे से निकल कर बाहर आने की जुर्रत उसने मज़बूरी में ही कि थी। मन का सुकून शबाश पर था  लेकिन उसे यह पता नही था कि असंख्य दुश्मन भी सुकून से उसे चूस रहे थे। घुटनों और जोड़ों के दर्द से कराहते शरीर के पास बेचारा नींद आने से डर रहा था। एक गिलास दूध में घोल कर पिए गये सेसेस का इतना असर जरूर हुआ कि अगले कुछ दिनों- हफ्तों वह बिना दर्द के सो पाया।

पच्चास वर्ष पहले बचपन में अलगू चाचा को खुली पीठ को घंटों हल जोतते लेखक ने देखा था, जिनके नंगे बदन को सूर्य की यहीं घनघोर किरणे घंटो चूमती रहती थीं और वे ची करना तो दूर की बाद, पूर्बी की धुन में खो गये होते थे। उन असंख्य बिषाणुओं – किटाणुओं का दूर दूर तक पता नही लगता था, यूँ कहे सूर्य की तप्त किरणों में उनका अस्तित्व ही नही बचा था। अलगू चाचा का शरीर बिना बिस्तर बिछे बसखट पर जब एक बार गिरा तो उसके बाद वे चैन की वाली  दुनियां में जाकर भूल गये कि कोई दर्द वाली दुनियां भी होती है।

बैलो के गर्दन में बधे घुघुरुओ की आवाज ने उन्हें हौले से जगाया, तो ठंडी ठंडी भोर ने उनका आलिंगन करते हुए पूछा, अलगू चाचा पक्षियों का कलरव आपको कैसा लगा ?

♥♥♥♥

नोट : तब दादा की पीठ पर सूर्य की किरणे कहर बरसाती थी, लेकिन जिन्दगी रोग रहित चैन की थी, आज पोते के पीठ पर जब ए. सी  बर्फ जमाती है, लेकिन जिंदगी दर्द भरी, पीड़ा में है.

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

भड़पुरा से झाँसीघाट: 17 अक्टूबर 2018

रात्रि विश्राम हमने भडपुरा स्थित कुटी में किया। कुटी की देखभाल एक बूढ़ी माँ माँग-ताँग कर करती है। वह आश्रम किसी बड़े किसान ने इस शर्त पर बनवा दिया था कि परिक्रमा करने वालों को भोजन मिलना चाहिए। बूढ़ी माँ वैरागी हैं, उसका बेटा नवरात्रि में दुर्गा जी की मूर्ति का पंडा बना था। झाँकी के पंडाल में रहता था। सुबह नहाने धोने भर को घर आता था। उसे ख़बर लगी तो वह देखने आया। बातचीत करके संतुष्ट हो कर चला गया। उसकी बीबी को छः लोगों के लिए रोटी सब्ज़ी बनाना था तो उसका मूड ख़राब होने से वातावरण ठीक नहीं रहा। हमने खाना बनाने में मदद की पेशकश की, जिसे निष्ठुरता से ठुकरा दिया गया। उसका 12 साल का लड़का बहुत बातूनी था। उसी के मार्फ़त बातचीत चलती रही। अंत में अपनी घरेलू चार रोटियों के बराबर एक टिक्कड नमक मिर्च में बनी आलू की सब्ज़ी के साथ एक गोल थाली में आए जैसे भीम अपनी गदा के साथ रथ में डोलता चला आ रहा हो। किसी ने दो किसी ने तीन और किसी ने चार खाए। सच हैं स्वाद भोजन में नहीं भूख में होता है। नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात। यहाँ तो न खाट थी और न भात परंतु नर्मदा  किनारा था। बाहर निकल कर नर्मदा की ओर देखा वह शांत होकर हँसिया आकार चाँद की रोशनी में निंद्रामग्न थी। लहरों की झिलमिल जो दिन में नज़र आती है वह नदारत थी।

वर्षो बाद जमीन पर और कुछ लोगों ने शायद जीवन में पहली बार गद्दे के बिना सोने का प्रयास शुरू हुआ। बिस्तर तीन तरफ़ से खुली दलहान में लगाए गए। सबसे पहले तो मच्छरों का हमला हुआ लड़के ने कचरा जलाकर धुआँ करके उनसे छुटकारा दिलाया। उसके बाद मुंशीलाल जी के पास एक कुतिया आकर सो गई। उसे डंडे से भगाया। सोने की कोशिश की तो बरगद के पेड़ पर तेज़ हलचल होने लगी। जैसे भूतों का डेरा हो। उठकर देखा तो निशाचार चमगादड़ का एक झुंड बरगद के फलों को खा रहा था। फलों के टुकड़े पट-पट नीचे गिर रहे थे। एकाध घंटा चमगादड़ देखते रहे। फिर सोने की कोशिश की तो सिर के पास कुछ आवाज़ आई। हाथ फेरा तो एक मेंढक पकड़ में आया उसे दूर फेंक दिया। सब डर गए कि मेंढक की खोज में साँप वहाँ आ सकता है। हमने सोचा छोड़ो यार शंकर भगवान गले में डाले रहते हैं। अब आएगा सो आएगा। 90% सांप ज़हरीले नहीं होते हैं और फिर जैसे हम सांप से डरते हैं उसी प्रकार वे भी आदमी से डरते हैं। अरुण दनायक जी अपनी डायरी लिखने बैठ गए। लोग पहले पानी पीते फिर पेशाब जाते रात गुज़रने की राह देखते रहे। देर रात एक झपकी लगी और सवेरा हो गया। कहीं कोई पाखाना नहीं था। खुले में हल्के हुए। कुटी की गाय का एक-एक गिलास कच्चा दूध पिया। उनको तीन सौ रुपए दान स्वरूप दिए और चल पड़े।

हम गाँव वालों से बैलों के बारे में पूछते रहे कि एक ज़माने में खेतों में, सड़कों पर और गौधुलि बेला में चर कर लौटते हुई रेहड में गायों के साथ मस्ती करते बैल और उछलते बछड़े दिखते थे, वे अब नदारत हैं। जो जानकारी मिली वह भयावह है। जब से ट्रैक्टर ट्रॉली, कल्टिवेटर, रोटावेटा, आए हैं तब से हल-बखर और बैलगाड़ी के साथ बैलों की भी विदाई हो गई लगती है। यहाँ तक तो ठीक था कि यंत्रीकरण ने मानवीय श्रम की जगह मशीनीकरण से कृषि काम आसान और उसकी गति तेज़ हो गई।

ग्रामीण लोगों से जब पूछा कि बैलों की ग़ैर-मौजूदगी में गायों के ग्यावन की क्या व्यवस्था है। ख़ुलासे चौंकाने वाले थे। गाय बैल का नैसर्गिक संसर्ग समाप्त हो गया है। भिटौनी में पशु चिकित्सालय में ख़बर देने पर वहाँ से कृत्रिम गर्भधारण करने कर्मचारी आते हैं। कृत्रिम गर्भाधान से गाय की देशी नस्ल ख़त्म हो रही है क्योंकि नर्मदा किनारे के गाँवों में बैल बूचडखानों की भेंट चढ़ चुके हैं। सरकार हरियाणा से विदेशी नस्ल का बीज लाकर गर्भाधान करवाती है। इस व्यवस्था से गाय के दूध की प्राकृतिक गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। उनके और भैंस के दूध में कोई अंतर नहीं रहा है। गाय का दूध अब हल्का पीला नहीं होता। हमने जब भडपुरा में गाय का ताज़ा दूध पिया था वह पूरी तरह सफ़ेद था। सबसे पहले तो गाय से प्राकृतिक चारा छीनकर  उन्हें खली-भूसा खिलाने लगे। उनसे खुली हवा में विचरण के साथ अब बैलों से प्राकृतिक मिलन भी छुड़ा लिया। एक मशीनी क्रिया से अनुत्तेजित अवस्था में लम्बी सीरिंज से गर्भाधान ने पशुओं से उत्साह उमंग उछलना कूदना भी छुड़ा लिया है। ऊपर से इंजेक्शन लगाकर दूध दुहने लगे। इस पूरी यात्रा में नर्मदा किनारे सिर्फ़ एक जगह गायों को बैल दिखा उनके चेहरे चमक उठे वे चारा चरना छोड़कर एकटक बैल को देखे जा रहीं थीं। भूख, नींद, आराम और प्रजनन पशुओं और मनुष्य की एकसी अनिवार्यता हैं इसीलिए मनुष्य को सामाजिक पशु माना जाता है। वह अद्भुत दृश्य तुरंत मोबाइल में क़ैद कर लिया।

हम पाँचों फिर चले और बीहड डांगर, नाले पार करते भीकमपुर पहुँचे। ऊँची घास से रास्ता नहीं सूझता था। एक भी गलत कदम कम से कम बीस फुट नींचे गिरा सकता था। और हुआ भी यही एक जगह रास्ते की खोज में दनायक जी गिरते गिरते बचे वापिस मुड उपर से मुंशीलाल पाटकार ने आवाज लगाई इधर आईये रास्ता यहाँ से है। अरुण दनायक ने सुरेश पटवा को मन ही मन कुढ़ते हुए ख़ूब गालियों से नवाज़ा कि यार इनके कहने में कहाँ फँस गए। अब कभी नहीं आएँगे। थोड़ा आराम करने के बाद बोले यार अगली यात्रा फ़रवरी में ही करेंगे।

भडपुरा के हनुमान आश्रम का तोता हमारे पहुँचते ही अपने सिर पर आकर बैठ गया। उतरने से साफ़ इंकार करता रहा। चिकनी चाँद उसे भा गई। तोता महाराज वीडियो के शौक़ीन थे। जिस देश में गंगा बहती है का “है आग हमारे सीने मे हम आग से खेला करते हैं “ गीत पर ख़ूब नाचा ससुरा। विडियो बंद करो तो चोंच मारता था। फिर लगाया “चल उड़ जा रे पंछी ये देश हुआ बेगाना” सुनकर मस्त हो गए तोता राम। काफ़ी मान-मनुअ्अल के बाद अरूण दनायक भाई के सिर को भी उपकृत किया। एक और साथी जगमोहन भाई की ज़िद पर महाराज वहाँ पहुँचे लेकिन टैक्स के रूप में चोंच मारकर ख़ून निकाल दिया। उसे काजू दिए तो उसने कुतर कर छोड़ दिए। तोता खुले में रहता था उड़ता नहीं था। पता चला कि उसे गाँजा पीसकर खिलाया गया है इसलिए उसे तलफ की आदत हो है इसलिए वह बाबाओं के पास रहता है।

धरती कछार गाँव पड़ा, वहाँ के स्कूल में दनायक जी ने बच्चों से मुलाकात में गांधी चर्चा की जिसने हमें आन्नदित किया कि गांधी जी की पहुँच समय और भौगोलिक स्थितियों की ग़ुलाम नहीं है। आंगनवाडी केन्द्र की ममता चढार की कर्तव्य परायणता से प्रफुल्लित हुए। धरती कछार से गोपाल बर्मन को कोलिता दादा का बैग रखने को साथ ले लिया। उसने बातों-बातों में बताया कि लोग भाजपा से नाराज़ हैं। ग्रामीण समाज में भी लड़कियाँ खुल कर बिना झिझक सामने आने लगीं हैं और शादियों के लिए लड़कों को निरस्त भी करने लगीं हैं। वहीं दूसरी ओर उनका यौन व्यवहार भी तेज़ी से बदल रहा है। बाय फ़्रेंड-गर्ल फ़्रेंड का कल्चर खेतों में या मेड पर विडीओ, वट्सएप, फ़ेस्बुक के माध्यम से फैल रहा है। ये मोबाइल क्रांति का असर है। अब लड़कियाँ को सेनेटरी पैड और विटामिन की गोलियाँ आंगनवाड़ी से प्रदान की जाती हैं।

आश्रम से चले तो आधा घण्टे में एक बड़े नाले से साबका पड़ा। सौ फ़ुट चढ़ाई चढ़ कर फिर नीचे उतर नाला पार किया, फिर चढ़ाई चढ़कर ऊपर पहुँचे तो पहाड़ी के सामने एक और नाला दिखा। भूगोल का दिमाग़ लगाया तो देखा कि एक ही नाला सांप की कुंडली की तरह चारों तरफ़ घुमा हुआ है। चार-पाँच बार पहाड़ियाँ चढ़-उतर कर नाला पार करना होगा लोगों का दम निकल जाएगा। निर्णय लिया कि दाहिनी तरफ़ नर्मदा में उतर जाएँ वहाँ से किनारे-किनारे झाँसीघाट की तरफ़ बढ़ेंगे। आगे बढ़े तो एक सौ फ़ुट ऊँची खाई का मुँह नाले में खुल रहा था। वह नाला नर्मदा में मिल रहा था। उतरने को कहीं कोई रास्ता नहीं था। हम (सुरेश पटवा) और कोलिता दादा आगे थे बाक़ी तीन पीछे भटक गए। कोलिता दादा को पीछे करके हम बैठ कर सौ फ़ुट खाई में स्कीइंग करके नाले के किनारे से नर्मदा की गोद में पहुँच गए। उन्होंने कोलिता दादा को भी इसी तरह स्कीइंग करके उतारा। तब तक बाक़ी लोग ऊपर आ गए थे वे चिल्ला रहे थे कि रास्ता कहाँ है। उनको तरीक़ा बताया तो वे आगे बढ़ने को तैयार न थे। लेकिन कोई रास्ता था भी नहीं। आधे घंटे की मशक़्क़त के बाद सब लोग नीचे आ गए। वहाँ से विक्रमपुर का रेल पुल अब स्पस्ट दिख रहा था और झाँसीघाट का सड़क पुल धुंधला सा नज़र आ रहा था।

ग्वारीघाट से लगभग पचास किमी दूर जबलपुर और नरसिंघपुर की सीमा पर स्थित भीकमपुर गाँव है। नर्मदा दाहिनी तट की ओर शान्त सी बहती है उधर बाँए तट से सनेर नदी अथाह जलराशि लिये आगे बढती है। ऐसा लगता है नर्मदा बडी विनम्रता से सनेर की भेंट की हुई जलराशि वैसे ही स्वीकारती है जैसे भिषुणी भिक्षा ग्रहण करती है और फिर अगले घाट की ओर चली जाती है। सनेर सदानीरा है,इसका जल स्वच्छ है और इसे लोग सनीर भी कहते हैं। सनेर नदी का उदगम सतपुडा के पहाड से होता है। इसका उदगम स्थल लखनादौन जिला सिवनी स्थित नागटोरिया रय्यत है। यह बारहमासी नदी धनककडी, नागन देवरी, दरगडा, सूखाभारत आदि गावों से गुजरते हुये संगम स्थल भीकमपुर पहुँचती है। कोलूघाट तट पर सिवनी जिले के आदिवासियों का मेला भरता है तो संगम तट भीकमपुर में जबलपुर व नरसिंहपुर जिले के लोग शिवरात्रि आदि पर्वो पर एकत्रित होते हैं।

नर्मदा परिक्रमा का पहला खंड योजना अनुसार पूरा होने को आ रहा था। सुबह से खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के भरोसे चले आ रहे थे। मंज़िल सामने देखकर भूखी देहों में अजीब सा शक्ति संचार होने लगा। नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लिया फिर दो घंटे में विक्रमपुर के रेल्वे पुलों के नीचे से निकल झाँसीघाट पहुँच गए। नहाया धोया नर्मदा जी को प्रणाम करके झोतेश्वर धर्मशाला पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ – कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भयानक“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ ?

? कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

द्वेष  ईर्ष्या  कपट  भयानक

गर्म-गर्म  लू-लपट भयानक

=2=

शेर    मारने,    चूहे  निकले

मिल रई ऐसी रपट भयानक

=3=

शिष्य  गुरु  पर  हावी  हैं उफ़

अब वो डाँट न डपट भयानक

=4=

बाहर    ख़ामोशी   है   किन्तु

भीतर शोर है विकट भयानक

=5=

दंगे-तिकड़म-हुड़दंग   ‘राजेश’

करवाती यह  टिकट भयानक

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ – मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मानव अब तो जाग. )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ ☆

☆ मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

नभ से हर पल गिर रही, लपटें बनकर आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

दिनकर निकले भोर में, मोहक लगता रूप।

भरी दुपहरी में लगे, लपट बनी यह धूप।।

शहर सकल वीरान यह, मनुज रहे सब भाग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

सघन वनों को काट कर, बनते खूब मकान।

बढ़ता पारा देख अब, विकल हुए इंसान।।

सब जन मिलकर गा रहे, गहन तपन का राग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

बचना है यदि ताप से, जन-जन करे प्रयास।

तरुवर हर इक द्वार हो, हरी-भरी सी घास।।

रिम-झिम प्रभु बरसात कर, मिट जाए यह आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०८ ☆ दोहा छंद – ।। बाल काल बचपन नटखटपन ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०८ ☆

☆ दोहा छंद ।। बाल काल बचपन नटखटपन ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

1

कभी बाल्यकाल गुम नहीं हो,   बचपन की   उम्र में।

नटखटपन कभी गुम नहीं, हो छोटे चंचल मन में।।

2

चाचा नेहरू जयंती मनाई जाती, ले बाल दिवस रूप।

बच्चों को मोबाइल से दूर, खेलने दो वर्षा और धूप।।

3

बालपन मासूमपन बना रहे, हमेशा मुन्ना-मुनिया में।

बचपन को सुरक्षित रखोहमेशा   ही दुनिया में।।

4

बचपन कच्ची मिट्टी    सा ,जैसा बनाएं बन जाएगा।

परिवार पहली पाठशाला ,जैसा बनाएंगे बन आएगा।।

5

बच्चों को खाने को दें ,पौष्टिक आहार ही   सदा।

फास्ट फूड की लत न हो, खाएं केवल यदा-कदा।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७१ ☆ कविता – महाराणा प्रताप… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – महाराणा प्रताप। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७१ ☆  

☆ महाराणा प्रताप…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अपनी त्याग तपस्या प्रण का स्मारक जो आप है

वह इतिहास पुरुष भारत का अनुपम वीर प्रताप है।।

*

गीत लिखे है बलिदानों के उसने हल्दी घाटी में

खुशबू है उसके विश्वासों की चित्तौड़ी माटी में।।

*

आती है ध्वनि अब भी चेतक के विश्वासी टापों की

सुन पड़ती आवाजें दम्भी अकबर के संतापों की ।।

*

भामाशाह की भावनाओं के चित्र नजर जो आते हैं

हर पढ़ने वाले की आंखों में आंसू भर आते हैं।।

*

पढ़ते जब भी पृष्ठ युद्ध के पुस्तक में इतिहासों की

रुक सी जाती गति पढ़ने वाले भावुक की सांसों की ।।

*

कैसा था प्रताप वह जिसकी वन में कटी जवानी थी।

और संग में जिसके भूखी बिटिया थी औ’ रानी थी।।

*

कैसी सुदृढ़ भावना थी गहरी मन में उस राणा की

सभी सुखों को लात मार जिसने चिन्ता की बाना की।।

*

अकबर भी भौंचक था उसकी सोच समझ कुर्बानी पर

थी जिसकी दुनियां न्यौछावर मातृभूमि के पानी पर।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक श्लोक ५९ आणि ६० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५९ आणि ६० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ५९ – – – 

मना कल्पना कल्पिता कल्पकोटी |

नव्हे रे नव्हे सर्वथा रामभेटी |

मनी कामना राम नाही जयाला |

अति आदरे प्रीति नाही तयाला ||५९||

अर्थ : हे मना, नाना प्रकारच्या अनंत कल्पना तू करीत राहिलास तर भगवंताचे दर्शन कदापिही शक्य नाही. ज्याच्या अंतरात वासना असतील, त्याच्या मनामध्ये भगवंताविषयीची कामना निर्माण होणे शक्य नाही आणि भगवंताविषयी कामना नसेल तर त्याच्यावर आदरयुक्त प्रेम कसे राहील?

(कल्पिता – कल्पना करणे, कल्पकोटी – अनंत/ नाना प्रकारच्या)

विवेचन : आपल्या जीवनात कल्पनेचे देखील काही एक विशिष्ट स्थान आहे. आपल्या मनातील कल्पना चांगल्या आणि विधायक असतील तर व्यवहारात त्या प्रत्यक्षात येऊ शकतात, त्यांचा उपयोग होतो. परंतु त्या कल्पनांना जर योग्य दिशा नसेल आणि त्या विधायक नसतील तर त्या जीवनाचा नाश करू शकतात. सदैव कल्पनेच्या राज्यात रमणारा माणूस व्यवहारात अयशस्वी होतो. त्याला धड प्रपंचही जमत नाही आणि धड परमार्थही तो करू शकत नाही. अशी अनेक उदाहरणे आपण आपल्या अवतीभवती नेहमी पाहतो.

समर्थांनी दासबोधात सांगितले आहे की आधी प्रपंच करावा नेटका मग घ्यावे परमार्थ विवेका. ज्याला प्रपंच नीट करता आला नाही त्याला परमार्थ कसा जमणार? म्हणून आपल्याला यशस्वी प्रपंच करून परमार्थाकडे वाटचाल करायची आहे. अस्थिर मनाने प्रपंच आणि परमार्थ ही साधणार नाही.

कल्पना करीत राहणे हा मानवी स्वभाव आहे. या कल्पनाच आपल्याला विषयांच्या राज्यात घेऊन जातात आणि त्यांच्या तीव्र ओढीने विषयांचे सेवन आपल्याकडून घडते. साहजिकच भगवंतापासून आपण दूर जात असतो. ज्याप्रमाणे एका म्यानात दोन तलवारी राहू शकत नाहीत, त्याप्रमाणे मनामध्ये विषय चिंतन आणि भगवंत या दोन्ही गोष्टी एकाच वेळी राहू शकत नाहीत. मन एकाच गोष्टीला पूर्णपणे वाहिले पाहिजे.

परमार्थाकडे वाटचाल करताना मनामध्ये वासना असता कामा नये. वासना असतील तर आपल्याला भगवंत हवा, अगदी मनापासून हवा असे वाटणारच नाही. जोपर्यंत आपल्याला भगवंत हवाच आहे असे मनापासून वाटत नाही तोपर्यंत त्याच्याबद्दल प्रेम निर्माण होणार नाही.

भगवंत हवा आहे असे मनापासून वाटत असेल तर विषयाकडे धावणारी वृत्ती सवयीने हळूहळू कमी करायला हवी. त्यासाठीच नामस्मरण, पूजा, सत्संग, साधना इ. गोष्टी सांगितल्या आहेत.

पण विषयाकडे धावणारे मन नाना प्रकारच्या कल्पना करीत राहते. मनाची शक्ती अपार आहे. परंतु आपण या शक्तीचा योग्य वापर करण्यापेक्षा गैरवापरच जास्त करीत असतो. दिशाहीन आणि निरुपयोगी कल्पना मनाला थकवा आणतात. म्हणूनच मनाला प्रयत्नपूर्वक योग्य मार्गावर आणायला हवे आणि त्याला योग्य दिशा द्यायला हवी. मला भगवंत हवा आहे अशी निव्वळ इच्छा करून तो प्राप्त होणार नाही. तर त्यासाठी प्रयत्न करावे लागतील. विवेक आणि वैराग्य धारण करावे लागेल. भगवंत हवा असेल तर अन्य सर्व इच्छांचा त्याग करून त्याच्या प्राप्तीसाठी प्रयत्न केले पाहिजेत. एखाद्या गोष्टीचा नित्य सहवास लाभला की त्याबद्दल आपल्याला प्रेम निर्माण होते. त्याप्रमाणेच सतत भगवंताचे नाम घेत गेल्याने त्याच्याबद्दल आदरयुक्त प्रेम निर्माण होईल.

स्वसंवाद ::

१) माझ्या मनात दिवसभर कोणत्या प्रकारच्या कल्पना सर्वाधिक येतात – विधायक की विषयप्रधान?

२) मी वास्तवात जगतो का, की कल्पनांच्या जगात जास्त वेळ घालवतो?

३) मला खरोखर भगवंताची ओढ आहे का, की ती केवळ एक वरवरची इच्छा आहे?

४) मी माझ्या मनाला जाणीवपूर्वक योग्य दिशेला वळवण्यासाठी काही प्रयत्न करतो का (नामस्मरण, वाचन, सत्संग)?

– – – – – 

श्लोक क्र. ६० – – – 

मना राम कल्पतरू कामधेनू |

निधी सार चिंतामणी काय वानू|

जयाचेनि योगे घडे सर्व सत्ता|

तया साम्यता कायसी कोण आता |६०|

अर्थ : हे मना राम म्हणजे भगवंत कल्पतरू, कामधेनू आहेत. ते निधी, सार, चिंतामणी… सारे सारे काही आहेत. हे सगळे शब्द त्यांचे वर्णन करण्यासाठी कमी पडतात म्हणून समर्थ म्हणतात की त्यांचे कसे आणि काय वर्णन करू? त्यांच्याच योगाने आणि सत्तेने सर्व काही घडत आहे. त्यांची तुलना किंवा साम्य कशाशी दाखवता येईल?

(चिंतामणी – इच्छिलेली वस्तू देणारा, वानू – वर्णन करू)

विवेचन : या श्लोकात समर्थ श्रीरामांच्या भक्तीची महती आपल्याला सांगतात. श्रीरामांबद्दल बोलताना त्यांनी वेगवेगळी विशेषणे वापरली आहेत. श्रीराम कामधेनू, कल्पतरू, निधी सार, चिंतामणी सारे सारे काही आहेत असे समर्थ म्हणतात. या एकेक शब्दाचा अर्थ आपण लक्षात घेऊया.

कल्पतरू म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारा एक वृक्ष. त्याच्या छायेत बसून जी कल्पना करावी ते सर्व आपल्याला प्राप्त होते. कामधेनू म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारी दिव्य गोमाता. निधी म्हणजे कुबेराचे भांडार किंवा खजिना, चिंतामणी म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारा काल्पनिक मणी.

प्रभू रामचंद्र भक्तांचे सर्व मनोरथ पुरवणारे आहेत. ते कल्पतरू, कामधेनू आहेत. आपल्या भक्तांना काहीही कमी पडणार नाही याची काळजी ते घेतात. इच्छिलेले सर्व काही देणारे ते आहेत. ते निधी म्हणजे कुबेराचे भांडार आहेत. कुबेराचे भांडार म्हणजे समृद्ध खजिना! कशाचीही कमी नाही. म्हणजेच श्रीरामाच्या भक्तांना कसलीही कमी पडणार नाही. त्यानंतर समर्थ म्हणतात की ते सार आहेत. सार म्हणजे महत्त्वाचे तत्व! या विश्वामध्ये सार म्हणजे फक्त एक श्रीराम. बाकी सर्व काही असार. एका वाक्यात सांगायचे झाले तर रामनाम ही सर्व कुलुपांची अशी एक किल्ली आहे की ज्यामुळे सर्व कुलुपे विनासायास उघडतात.

संत ज्ञानेश्वरांनी आपल्या पसायदानात परमेश्वराला प्रार्थना करताना म्हटले आहे, “जो जे वांछील, तो ते लाहो. ” म्हणजे ज्याला ज्याला जी जी इच्छा होईल ती ती गोष्ट प्राप्त होवो. अर्थात या ठिकाणी इच्छा म्हणजे सदिच्छा किंवा चांगली इच्छा हे गृहीत आहे. भक्ताच्या चांगल्या इच्छाच भगवंत पुरवेल. आणि श्रीरामांच्या भक्तांना वाईट इच्छा कशी होईल? म्हणून आपल्या भक्तांच्या मोक्षाच्या, दर्शनाच्या सर्व कामना तो दयानिधी पुरविल.

वर निधी म्हणजे कुबेराचा खजिना असे आपण म्हटले आहे. परंतु निधी या शब्दाचा अर्थ या ठिकाणी आणखी वेगळा आणि थोड्या व्यापक अर्थाने घेता येईल. निधी म्हणजे साठा. निधी म्हणजे समुद्र. श्रीराम म्हणजे गुणांचा साठा, दयेचा आणि करुणेचा समुद्र. आपल्या भक्तांची कधीही उपेक्षा न करणारा असा तो आहे. त्याच्या गुणांचे काय वर्णन करावे? त्यासाठी शब्द कमी आहेत. तो कोणासारखा बरं आहे? तर त्याच्यासारखा तोच!

अनंत हस्ते कमलावराने, देता किती घेशील दो कराने? असा तो आहे. तो द्यायला बसला की आपली झोळी अपुरी पडेल. म्हणून काही मागायचे तर त्याच्या जवळच मागावे. जो सगळे काही आहे जो, सारसर्वस्व आहे, त्याच्याजवळ मागण्याचे सोडून इतरांजवळ मागण्यात काय हशील?

व्यवहारामध्ये आपली इच्छापूर्ती किंवा वासनापूर्ती करणारी सारी साधने गौण आहेत. त्या इच्छा, त्या वासना कधी संपतच नाहीत. भगवंत जेव्हा आपली इच्छापूर्ती करतो, तेव्हा काही मागायचे राहतच नाही. संत तुकाराम महाराज म्हणतात, ” काय उणे आम्हा विठोबाचे पायी? ” अशी भक्ताची अवस्था होते. मन शांत, तृप्त होते आणि अत्यंत सामर्थ्यशाली बनते. कोणतीही आणि कशीही विपरीत परिस्थिती आली तरी ज्याची भगवंतावर श्रद्धा आहे, असा भक्त डगमगत नाही. असे समाधान देणारा भगवंत हा एकमेवाद्वितीय आहे. त्याची बरोबरी कशानेही होणार नाही.

स्वसंवाद :: 

१) मी माझ्या इच्छा पूर्ण करण्यासाठी बाह्य साधनांवर जास्त अवलंबून आहे का, की परमेश्वरावर विश्वास ठेवतो?

२) “मला अजून काही हवे आहे” ही भावना माझ्यात कितपत आहे? की “काय उणे आहे? ” अशी तृप्ती आहे?

३) मी जे मागतो, ते खरोखर माझ्या कल्याणासाठी आहे का, की केवळ वासनापूर्ती आहे?

४) माझ्या जीवनात “सार” आणि “असार” यातील फरक मला स्पष्टपणे कळतो का?

५) मला भगवंत “सर्वस्व” वाटतो का, की अजूनही इतर गोष्टींमध्येच माझा जास्त विश्वास आहे? (क्रमशः)

– क्रमशः श्लोक श्लोक ५९ आणि ६०.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२६ ☆ बालश्रम निषेध के संदर्भ में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख बालश्रम निषेध के संदर्भ में। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन चढ़ी नाम खुमारी / स्वर- विभा जी योगाश्रम प्रस्तुति, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२६ ☆

☆ बालश्रम निषेध के संदर्भ में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

मज़दूरी इनकी मजबूरी

‘मज़दूरी इनकी मजबूरी’ एक विवादास्पद विषय है, जो अनेक प्रश्नों व समस्याओं को जन्म देता है। अनगिनत पात्र मनोमस्तिष्क में ग़ाहे-बेग़ाहे दस्तक देते हैं, क्योंकि लम्बे समय तक मुझे इनके अंग-संग रहने का अवसर प्राप्त हुआ है। यह पात्र कभी लुकाछिपी का खेल खेलते हैं; कभी करुणामय नेत्रों से निहारते हैं; कभी व्यंग्य करते भासते हैं– मानो विधाता के न्याय पर अंगुली उठा रहे हों।

—कैसा न्याय है यह? जब सृष्टि-नियंता ने सबको समान बनाया है— सब में एक-सा रक्त प्रवाहित हो रहा…तो हमसे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों? एक ओर बड़ी-बड़ी अट्टालिकायों में रहने वाले लब्ध- प्रतिष्ठित धनी लोग और दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले, खुले आकाश के नीचे ज़िन्दगी बसर करने वाले लोगों में इतनी असमानता क्यों? हमारे देश में इंडिया और भारत में वैषम्य क्यों… ये प्रश्न अंतर्मन को निरंतर कचोटते हैं तथा अत्यंत चिंतनीय, व विचारणीय हैं। जब हम मासूम बच्चों को मज़दूरी करते देखते हैं; तो आत्मग्लानि होती है। ढाबे पर बर्तन धोते; चाय व खाना परोसते, रैड लाइट पर गाड़ियां साफ करते; फल-फूल, खिलौने आदि खरीदने का अनुरोध करते; सड़क किनारे अपने छोटे भाई-बहिन का ख्याल रखते; जूठन को देख अधिक पाने के निमित्त एक-दूसरे पर झपटते-झगड़ते, मरने -मारने पर उतारू नंग-धड़ंग बच्चों को देख हृदय में उथल-पुथल ही नहीं होती, एक आक्रोश फूट निकलता। इतना ही नहीं, रेलवे स्टेशन पर बूट- पालिश करते; ट्रेन में अपनी कमीज़ से कंपार्टमेंट की सफाई करते व कंधे पर अखबार व मैगज़ीन का भारी-भरकम बोझ लादे बच्चों को देख, उनकी ओर ध्यान स्वतः आकर्षित हो जाता और हृदय उनकी मजबूरी के बारे में जानने को आतुर-आकुल हो, प्रश्नों की बौछार लगा देता है। बालपन में इन दुश्वारियों से जूझते मासूम बच्चों की अंतहीन पीड़ा व अवसाद के बारे में जानकर हृदय द्रवित हो जाता…कलेजा मुंह को आता। परंतु हम उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने के अतिरिक्त कुछ कर पाने में, स्वयं को विवश, असमर्थ व असहाय पाते हैं।

मुझे स्मरण हो रही है– एक ऐसी ही घटना, जब मैं गुवाहाटी की ओर जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में दिल्ली रेलवे-स्टेशन पर बैठी थी। सहसा बच्चों के एक हुजूम को वेश-भूषा बदलते; स्वयं को मिट्टी से लथपथ करते; घाव दर्शाने हेतु रंगीन दवा व मरहम लगाते; एक जैसी टोपियां ओढ़ते देख… मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पायी और एक बच्चे से संवाद कर बैठी। परंतु वह मौन रहा और थोड़ी देर के पश्चात् एक व्यक्ति उन सब के लिए भोजन लेकर आया। भोजन करने के पश्चात् वे अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए तथा उस बच्चे ने मेरी जिज्ञासा के बारे में अपने मालिक को जानकारी दी। वह मुझे देर तक घूरता रहा… मानो देख लेने की अर्थात् अंजाम भुगतने को तैयार रहने की चेतावनी अथवा धमकी दे रहा हो…और चंद मिनट बाद ही मुझे उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा।

बच्चे ट्रेन के अलग-अलग डिब्बों में सवार हो गए। परंतु उस गैंग के बाशिंदों ने मुझे ट्रेन में नहीं चढ़ने से बहुत समय तक रोके रखा। चार-पांच लोग, जिनमें एक युवती भी थी… वे सब ए•सी• कंपार्टमेंट के दरवाज़े के बीच रास्ता रोक कर खड़े हो गए और बड़ी ज़द्दोज़हद के पश्चात् मैं उनके व्यूह को तोड़, भीतर प्रवेश पाने में सफल हो पायी। मुझे सीट पर पहुंचने में भी उतनी ही कठिनाई का सामना करना पड़ा। टी•टी• के आने के पश्चात् मैंने टिकट निकालने के लिए जैसे ही पर्स में हाथ डाला, मैं सन्न रह गयी। मेरा मोबाइल व पैसे पर्स से ग़ायब हो चुके थे। ट्रेन  चलने के कारण मैं कोई कार्यवाही भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि जहां घटना घटित होती है; शिकायत भी वहीं दर्ज कराई जा सकती है। इस बीच  वे लोग अपने मिशन को अंजाम देकर उस डिब्बे से रफू-चक्कर हो चुके थे।

मैं हैरान-परेशान-सी पूरा रास्ता यही सोचती रही… कितने शातिर हैं वे लोग…जो इन बच्चों से भीख मांगने का धंधा करवाते हैं और यह बच्चे भी डर के मारे उनके इशारों पर नाचते रहते हैं। यह भी हो सकता है कि इनके माता-पिता इन कारिंदों से, रात को बच्चों की एवज़ में पैसा वसूलते हों। वैसे भी आजकल छोटे बच्चों को तो शातिर महिलाएं किराए पर ले जाती हैं …अपना धंधा चलाने के निमित्त और रात को उनके माता-पिता को लौटा जाती हैं… दिहाड़ी के साथ। जहां तक दिहाड़ी का संबंध है, बच्चों व महिलाओं को कम पैसे देने का प्रचलन तो आज भी बदस्तूर जारी हैं। वैसे भी बाल मज़दूरी तो दण्डनीय कानूनी अपराध है। परंतु इन बच्चों के सक्रिय योगदान के बिना तो बहुत से लोगों का धंधा चल ही नहीं सकता।

सुबह जब बच्चे, कंधे पर बैग लटकाए, स्कूल बस या कार में यूनीफ़ॉर्म पहनकर जाते हैं, तो इन मासूमों के हृदय का आक्रोश सहसा फूट निकलता है और वे अपने माता-पिता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर देते हैं। वे उन्हें स्कूल भेजने की अपेक्षा; उनके हाथ में कटोरा थमाकर भीख मांगने को क्यों भेज देते हैं? उनके साथ यह दोग़ला व्यवहार क्यों?

माता-पिता भाग्य व नियति का वास्ता देकर उन्हें समझाते हैं कि यह उनके पूर्व-जन्मों का फल है, सो! यह सब तो उन्हें सहर्ष भुगतना ही पड़ेगा। परंतु बच्चों को उनके उत्तर से संतोष नहीं होता। उनके कोमल मन में समानाधिकारों व व्यवस्था के प्रति आक्रोश उत्पन्न होता है और वे उन्हें आग़ाह करते हैं कि वे भविष्य में कूड़ा बीनने व भीख मांगने नहीं जायेंगे और न ही मेहनत-मज़दूरी करेंगे। वे भी शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं; उन जैसा जीवन जीना चाहते हैं। जब भगवान ने सबको समान बनाया है, तो हमसे यह भेदभाव क्यों? इस स्थिति में उनके माता-पिता मासूम बच्चों के प्रश्नों के सम्मुख निरुत्तर हो जाते हैं।

चलिए! रुख करते हैं–घरों में काम करने वाली बाईयों की ओर…जिन्हें उनके परिचित सब्ज़बाग दिखा कर दूसरे प्रदेशों से ले आते हैं और उन्हें बंधक बना कर रखा जाता है। चंद दिनों देह-व्यापार के धंधे में धकेल दिया जाता है; जहां उनका भरपूर शोषण होता है और वे नारकीय जीवन ढोने को विवश होती हैं। हां! कुछ नाबालिग़ लड़कियों को वे दूसरों के घरों में काम पर लगा देते हैं; जिसकी एवज़ में वे मोटी रकम वसूलते हैं। ग्यारह महीने तक वे उस घर में दिन-रात काम करती हैं। परन्तु जब वे घर छोड़ कर, चंद दिनों के लिए अपने गांव लौटती हैं, तो बहुत उदास होती हैं…भले ही काम करना इनकी मजबूरी होता है। परंतु धीरे-धीरे वे मालकिन की भांति व्यवहार करने लगती हैं, जिसका ख़ामियाज़ा घर के बुज़ुर्गों को ग़ाहे-बेग़ाहे अपने आत्म-सम्मान को दांव पर लगा कर चुकाना पड़ता है, क्योंकि वे तो अनुपयोगी अर्थात् बोझ होते हैं। सारे घर का दारोमदार तो उन काम वाली बाईयों के कंधों पर होता है और वे तो घर-परिवार के लिए प्राण-वायु सम होती हैं। सो! आजकल तो इनकी मांग ज़ोरों पर है। इसलिए वे बहुत  अधिक भाव खाने लगी हैं।

परंतु कई घरों में तो उनका शोषण किया जाता है। दिन-रात काम करने के पश्चात् उन्हें पेट-भर भोजन भी नहीं दिया जाता। साथ ही उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है; मारा-पीटा जाता है और शारीरिक- शोषण तक भी किया जाता है। अक्सर उनकी तनख्वाह भी वे कारिंदे वसूलते रहते हैं। सो! वे मासूम तो अपनी मनोव्यथा किसी से कह भी नहीं सकतीं। जुल्म सहते-सहते, तंग आकर वे भाग निकलती हैं और आत्महत्या तक कर लेती हैं। सो! आजकल तो एजेंटों का यह धंधा भी खूब पनप रहा है। वे लड़की को किसी के घर छोड़ कर साल-भर का एडवांस ले जाते हैं और चंद घंटों बाद, अवसर पाकर वह लड़की अपने साथ कीमती सामान व नकदी लेकर भाग निकलती है। मालिक बेचारे पुलिस-स्टेशन के चक्कर लगाते रह जाते हैं, क्योंकि उनके पास तो उनका पहचान-पत्र तक भी नहीं होता। वहां जाकर उन्हें आभास होता है कि वे ठगी के शिकार हो चुके हैं। सो! उस स्थिति वे प्रायश्चित्त करने के अतिरिक्त कर ही क्या सकते हैं।

परंतु बहुत से बच्चों के लिए मज़दूरी करना, उनकी मजबूरी बन जाती है… विषम पारिवारिक परिस्थितियों व आकस्मिक आपदाओं व किसी अनहोनी के घटित हो जाने के कारण; उन मासूमों के कंधों पर परिवार का बोझ आन पड़ता है और वे उम्र से पहले बड़े हो जाते हैं। यदि उन्हें मज़दूरी न मिले, तो असामान्य परिस्थितियों में परिवार-जन ख़ुदकुशी तक करने को विवश हो जाते हैं। इसलिए भीख मांगने के अतिरिक्त उनके सम्मुख दूसरा विकल्प शेष नहीं रहता। परन्तु कुछ बच्चों में आत्म-सम्मान का भाव अत्यंत प्रबल होता है। वे मेहनत-मज़दूरी करना चाहते हैं, क्योंकि भीख मांगना उनकी फ़ितरत नहीं होती और उनके संस्कार उन्हें झुकने नहीं देते।

चंद लोग क्षणिक सुख के निमित्त अपनी संतान को जन्म देकर सड़कों पर भीख मांगने को छोड़ देते हैं। अक्सर वे बच्चे नशे के आदी होने के कारण अपराध जगत् की अंधी गलियों में अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। वे समाज में अव्यवस्था व दहशत फैलाने का उपक्रम करते हैं तथा वे बाल-अपराधी रिश्तों को दरकिनार कर, अपने माता-पिता व परिवारजनों के प्राण तक लेने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। लूटपाट, फ़िरौती, हत्या, बलात्कार, अपहरण आदि को अंजाम देना इनकी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। मुझे ऐसे बहुत से बच्चों के संपर्क में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। लाख प्रयास करने पर भी मैं उन्हें बुरी आदतों से सदैव के लिए मुक्त नहीं करवा पाई। ऐसे लोग वादा करके अक्सर भूल जाते हैं और फिर उसी दल-दल में लौट जाते हैं। उनके चाहने वाले दबंग लोग उन्हें सत्मार्ग पर चलने नहीं देते, क्योंकि इससे उनका धंधा चौपट हो जाता है।

‘मज़दूरी इनकी मजबूरी’ अर्थात् ऐसे सत्पात्रों पर विश्वास करना कठिन हो गया है, क्योंकि आजकल तो सब मुखौटा धारण किए हुए हैं। अपनी मजबूरी का प्रदर्शन कर लोगों की सहानुभूति अर्जित कर, उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर उन्हें लूटना… उनका पेशा बन गया है। वे बच्चे; जिन्हें मजबूरी  के कारण मज़दूरी करनी है– सचमुच वे करुणा के पात्र हैं। समाज के लोगों व सरकार के नुमाइंदों को उनकी सहायता-सुरक्षा हेतु हाथ बढ़ाने चाहिएं, ताकि स्वस्थ समाज की संरचना संभव हो सके और हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हो सके… मानव- मूल्यों का संरक्षण हो सके तथा संबंधों की गरिमा बनी रहे। स्नेह, प्रेम, सौहार्द, सहयोग,परोपकार, सहनशीलता, सहानुभूति आदि दैवीय गुणों का समाज में अस्तित्व कायम रह सके। इंसान के मन में दूसरे की मजबूरी का लाभ उठाने का भाव कभी भी जाग्रत न हो और समाज में समन्वय, सामंजस्य व समरसता का साम्राज्य हो। मानव स्व-पर और राग-द्वेष से ऊपर उठकर एक अच्छा इंसान बन सके।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगी, यदि हम सब मिलकर प्रयासरत रहें और एक बच्चे की शिक्षा का दायित्व- निर्वहन कर लें, तो हम दस में से एक बच्चे को अच्छा प्रशासक, अच्छा इंसान व अच्छा नागरिक बना पाने में सफलता प्राप्त कर सकेंगे और शेष बच्चे भले ही जीवन की सुख-सुविधाएं जुटाने में सक्षम न हों;  शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् आत्म- सम्मान से जीना सीख जाएंगे और अपराध-जगत् की अंधी गलियों में भटकने से बच पायेंगे। निरंतर अभ्यास, अथक परिश्रम व निरंतर प्रयास के द्वारा, हमारा  मंज़िल पर पहुंचना निश्चित है। सो! हमें इस मुहिम को आगे बढ़ाना होगा, जैसा कि हमारी सरकार इन मासूम बच्चों के उत्थान के लिये नवीन योजनाएं प्रारम्भ कर रही है; जिसके अच्छे परिणाम हमारे समक्ष हैं। परंतु सकारात्मक परिणामों की प्राप्ति के लिए संविधान में संशोधन करना अपेक्षित व अनिवार्य है। हमें जाति-विशेष को प्रदत्त आरक्षण सुविधा को समाप्त करना होगा; जिसे संविधान के अनुसार केवल दस वर्ष के लिए दिया जाना सुनिश्चित किया गया था। परंतु हम आज तक वैयक्तिक स्वार्थ व लोभ-संवरण के विशेष आकर्षण व मोह के कारण उससे निज़ात नहीं पा सके हैं। सो! हमें अच्छी शिक्षा-प्राप्ति व जीवन-स्तर उन्नत करने के निमित्त, उन्हें आर्थिक-सुविधाएं प्रदान करनी होंगी, ताकि उनमें हीन-भावना घर न कर सके। देश की अन्य प्रतिभाओं को भी प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर समान अवसर प्रदत्त हों और प्रतिस्पर्द्धा में निर्धारित अहर्ताओं के मापदंडों पर सब खरे उतर सकें तथा जाति-पाति के भेदभाव को नकार, वे भी  सिर उठा कर कह सकें…’हम भी किसी से कम नही।’

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२६ ☆ पानी की आस ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण रचना  पानी की आस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ पानी की आस ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

गगरी बाला भर रही, बीच नदी की धार।

देख उसे मन डर रहा, गिरे नहीं वो  पार।।

सूख स्रोत सारे गए, हमको होती  पीर।

चट्टानों से जल दिखा, बहता नदिया नीर।

 *

लड़की प्यासी हो रही, कूप नीर की आस।

मटके में पानी भरे, उसे लगी जब प्यास।।

 *

संकट के इस दौर में, आई तेरे पास।

जोखिम कितना है बड़ा, बस पानी की आस।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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