मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१७ ☆ झाड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१७ ?

☆ झाड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

माणूस

धर्तीवर जन्मला आला

अंगा पिंडाने वाढता वाढता

रांगू लागला

आई-वडीलांचे बोट धरून

चालू लागला

पराक्रमाने

आकाशाला भिडला

चंद्रावर गेला

पाण्यात उतरला

समुद्राचा तळ गाठला

पण त्याला

झाड होता आलं नाही

 

झाड

माती खाली

जन्म घेतं

वर येतं

वाढू लागतं

पण मातीला

विसरत नाही

जेवढं वर वाढतं

तेवढंच ते

मातीच्या

पोटात घुसतं

झाडं

मातीला सोडत नाहीत

ग्रीष्मात,

शिशिरात

आणि पावसात देखील

माणूस मात्र

माती, घर, नाती

सारं सोडायला तयार होतो

माणसाला

वाढता येतं

पण

त्याची ओढ

मूळाकडे कधीच नसते…

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७१ – रिश्ता ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – रिश्ता।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७१ – रिश्ता ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

 

मेरा और तुम्हारा

यानि हमारा

रिश्ता

न तो खून का रिश्ता है

न कोई सम्बन्ध

फिर क्यों लगता है कि हम

जन्मान्तरों के संगी हैं

शायद

भावों के इसी सम्बन्ध ने हमें

ऐसा रिश्ता दिया है

जो अनाम अपरिभाषित और अव्यक्त है

गूँगे के गुड़ की तरह ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७० – “सौख्य के समंदर में…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत सौख्य के समंदर में...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “सौख्य के समंदर में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

स्कूटी पर सवार

लड़कियाँ ।

घर छोड़ आयी हैं

प्रतीक्षारत

खुली हुई खिड़कियाँ ॥

 

पर्स में निमंत्रित हैं

चाट के इरादे कुछ।

स्टेटस फोन का

सम्हाले है वादे कुछ ।

 

बचके निकलती हैं

चलते बाजार से –

बनी ठनी सुविधा की

छुटकियाँ बड़कियाँ ॥

 

उत्फुलित चेहरों संग

स्लीब लैस बाँहें हैं ।

जितनी इच्छा लम्बी

उतनी ही राहें हैं ।

 

पहने स्वतंत्रता

क्षीणकाय वस्त्र विधा –

ऊँची हील पर उड़ती

गरमी की छुट्टियाँ ॥

 

मौसम की सीमा में

सिमटी उज्ज्वल आँखें ।

खोज रहीं मुक्त मुक्त

उड़ने वाली पाँखें ।

 

सौख्य के समंदर में

तैरता लगा कुछ कुछ –

वक्त का परिन्दा जो

लेता है डुबकियाँ ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५१ ☆ # “तुम जो मिली…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता तुम जो मिली…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५१ ☆

☆ # “तुम जो मिली…” # ☆

चलते चलते एक राह मिल गई

जीने की एक चाह मिल गई

हाथ थामने एक बांह मिल गई

तुम जो मिली संसार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

मैं आकाश में उड़ने लगा

चांद तारों से जुड़ने लगा

नए सपनों की तरफ मुड़ने लगा

तुम जो मिली प्यार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

मन की वाटिका में फूल खिलने लगे

तितलियों के संग तन मिलने लगे

देख देख आवारा भंवरें जलने लगे

तुम जो  मिली उपहार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

नई कोपलें फूटने लगी

नई उमंगे जुटने लगी

नई तरंगे उठने लगी

तुम जो  मिली घर बार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

नदी सागर सा प्यार है

उठती लहरों सा ज्वार है

टूटती रूढ़ियों की कगार है

तुम जो  मिली एतबार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

हृदय में मधुर मधुर सा स्पंदन है

पलकों में सागर सागर सा अभिनंदन है

निराकार को कोटि-कोटि वंदन है

तुम जो मिली पुरस्कार मिल गया

जीने का आधार मिल गया /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ९४ – तुम्हारे साथ ही हूँ मैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता त्यौहार।)

☆ अभिव्यक्ति # ९४ ☆ तुम्हारे साथ ही हूँ मैं☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मुझे महसूस करना तुम,

तुम्हारे साथ ही हूँ मैं

 

मेरा ही अक्स तुममें है,

तुम्हारे पास ही हूँ मैं,

पुष्प तुम, गंध ही हूँ मैं,

तन तुम, साँस ही हूँ मैं,

मन की आस में तुम हो,

मन की आस में हूं मैं,

मुझे महसूस करना तुम,

तुम्हारे साथ ही हूँ मैं

 

वसुधा के जैसी तुम,

अम्बर सा ही हूँ मैं,

क्षितिज में एक हों हम,

तेरा एहसास ही हूँ मैं,

मुझे महसूस करना तुम,

तुम्हारे साथ ही हूँ मैं

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२२ ☆ व्यंग्य – ये इश्क़ नहीं आसां ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘ये इश्क़ नहीं आसां‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ये इश्क़ नहीं आसां

कुछ समय पहले मैंने महाराष्ट्र के एक स्कूल के प्राचार्य के बारे में लिखा था, जिन्होंने छात्राओं को शपथ दिलायी थी कि वे प्रेम-विवाह नहीं करेंगीं। अभी टीवी पर देखा कि मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के एक गांव में गांववालों ने लड़कियों के भाग कर शादी कर लेने से त्रस्त होकर ऐसे लड़कों-लड़कियों और उनके परिवार वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।

गांव के एक प्रवक्ता ने घोषणा की है कि भाग कर शादी करने वाले लड़के लड़कियों का सामाजिक बहिष्कार होगा। उनके परिवार को कोई मज़दूरी नहीं देगा, दूध और किराने का सामान, पंडित-नाई उन्हें मुहैया नहीं होंगे। इसके अलावा कोई ऐसे परिवारों की ज़मीन को लीज़ पर नहीं लेगा। गनीमत है कि प्रेमियों को सबक सिखाने के लिए गांव वालों ने कोई और बड़ा नुस्खा नहीं निकाला। गांव के एक पिताजी ने बताया कि उन्होंने अपनी दो बेटियों की पढ़ाई छुड़ा कर उन्हें घर में बैठा लिया है ताकि वे प्रेम के प्रदूषण से बची रहें। सुनकर बेगम अख़्तर की ग़ज़ल याद आ गयी— ‘अय मुहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया।’

चचा ‘ग़ालिब’ ने नाहक ही लिखा— ‘इश्क पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाये न लगे और बुझाये न बने।’ अब इंतज़ाम हो रहा है कि यह मनहूस आग लग ही न पाये और अगर लग ही जाए तो तुरन्त ‘फ़ायर एक्सटिंग्विशर’ का इस्तेमाल किया जाए। कबीर भी फालतू ही लिख गये कि ‘जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान; जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।’ उधर मरहूम मेंहदी हसन व्यर्थ  की टेर लगाये हैं— ‘दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं।’ बुल्ले शाह भी अरण्य रॊदन कर रहे हैं— ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो।’

हमारे देश के कानून के हिसाब से लड़का लड़की 18 की उम्र पर पहुंचने पर ख़ुद मुख़्तार हो जाते हैं, यानी वे खुद निर्णय लेने और अपने निर्णय की जवाबदारी लेने में सक्षम हो जाते हैं। पश्चिमी देशों में युवा अपनी शादी होने पर अपना अलग घर बसा लेते हैं। वे अपनी ज़िन्दगी के निर्णय स्वयं लेते हैं। लेकिन हमारे यहां नाक का सवाल ज़िन्दगी भर बना रहता है। लड़का-लड़की को वही काम करना पड़ता है जिसमें ख़ानदान की नाक सलामत रहे। नाक की रक्षा में ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं होती रहती हैं। परिवार के साथ-साथ समाज की नाक का भी ख़याल रखना पड़ता है। इसीलिए कई प्रेमी शादी के बाद अपनी जान बचाते फिरते हैं।

मुश्किल यह है कि प्रकृति ने सिर्फ नर- मादा पैदा किये, परिवार और विवाह संस्थाएं आदमी ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनायीं। अब संस्थाएं आदमी के ऊपर हावी हैं। प्रकृति का संदेश स्पष्ट है कि नर-मादा मिलें और अपनी प्रजाति को जीवित रखें। इसीलिए प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच में आकर्षण पैदा किया है।

हम लैला-मजनूं, शीरीं-फ़रहाद, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट के प्रेम की गाथाओं पर झूमने वाले लोग हैं। राजस्थान में श्रीगंगानगर के पास लैला मजनूं के मज़ार हैं जहां हर साल जून में मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर मन्नत मानते हैं। लेकिन जब अपने घर में कोई लैला,शीरीं या सोहनी पैदा हो जाती है तो संकट खड़ा हो जाता है।

प्रेम आदमी को कैसा मजबूर और बेबस करता है इसके संबंध में मुझे दीवान जर्मनी दास द्वारा लिखित ‘महाराजा’ पुस्तक का एक प्रसंग याद आता है। पंजाब की एक रियासत की राजकुमारी अपने राज्य के एक अधिकारी के प्रेम में पड़ गयी थी। राजकुमारी के महल के पीछे की चारदीवारी से सटा एक कुआं था। राजकुमारी के प्रेमी ने दीवार में एक सूराख बना लिया था जिसके द्वारा वह कुएं में उतरता था और फिर दूसरी ओर से राजकुमारी की परिचारिकाएं उसे ऊपर खींच लेती थींं। यह प्रेम प्रसंग बहुत दिनों तक चला, फिर प्रेमी के एक शत्रु ने भांडा फोड़ दिया और प्रेमियों की पकड़-धकड़ की कार्यवाही होने लगी। राजकुमारी प्रेमी के साथ कुएं में उतरकर महल से बाहर निकल गयी और वे राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल गये। अंत में इन प्रेमियों की ज़िन्दगी बहुत अभावों और कष्टों में गुज़री।

इन प्रेमियों की कथा पढ़कर सोहनी- महिवाल की कथा याद आती है। फ़र्क यही है कि राजकुमारी की कथा में प्रेमी कुएं में उतरता था जबकि सोहनी अपने प्रेमी से मिलने के लिए घड़े के सहारे चिनाब नदी पार करती थी। मशहूर शायर ‘जिगर’ ने इश्क़ के बारे में लिखा, ‘ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इन दोनों  कथाओं में आग की जगह पानी ने ले ली है।

इसी सिलसिले में इंग्लैंड के सम्राट एडवर्ड अष्टम याद आते हैं जिन्होंने अपनी तलाकशुदा प्रेमिका वालिस सिंपसन से शादी करने के लिए इंग्लैंड की गद्दी छोड़ दी थी।

प्रेमियों से हमदर्दी रखने वाले भी बहुत से लोग होते हैं। मेरे एक मित्र शादी से पहले अपनी पत्नी के बॉयफ्रेंड हुआ करते थे। पत्नी तब एक स्कूल में अध्यापिका थीं और प्रेमी जी रोज़ सड़क के किनारे धूप में खड़े होकर उनका इंतज़ार करते थे। जिस मकान के सामने वे खड़े रहते थे उसके मालिक ने द्रवित होकर एक दिन उनके लिए कुर्सी भेज दी थी।

परसाई जी ने ‘सुशीला’ उस लड़की को कहा था जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पी.एफ. का पैसा उनके  बुढ़ापे के लिए बचा लेती है। लेकिन ज़ाहिर है बहुत से बापों को परसाई जी यह परिभाषा रास नहीं आती। अभी तो लगता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति बनेगी जहां बिना वालदैन के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के शादी मुकम्मल नहीं मानी जाएगी। शादी कराने वाले पंडित जी को भी दोनों पक्ष के मां-बाप की सहमति के बिना शादी कराने की मुमानियत होगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु कथा # ९३ – मेला… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघु कथा “– मेला …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ लघुकथा # ९३ — मेला — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

आठों पहर वहाँ एक स्थायी मेला बना रहता था। लोग अपनी व्यस्तता से थक जाएँ तो एक वही मेला होता था जहाँ जाने पर उनका मन बहलता था। धारणा इस तरह से बनी होती थी कि अपना कोई घर में खो जाए तो वहाँ मेले में ढूँढने पर उसे पा लेंगे। पर एक प्रेमी के साथ कुछ और हुआ। उसने खोने को तो अपनी प्रेमिका को इस मेले में ही खोया, लेकिन उसे पाया नहीं। बात होती थी सब का कहीं खोया मेले में मिल जाता है तो उसका क्यों नहीं मिलता? रही प्रेमी की बात, वर्षों प्रेमिका को ढूँढते थका – हारा हो जाने से वह खत्म हो गया। अब वह कब्रस्तान में होता। प्रेमिका वहीं थी।

© श्री रामदेव धुरंधर
06 — 02 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२३ – आलेख – दरवाज़े – ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२३ दरवाज़े… ?

एक समय था जब लोगों के घरों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते थे। समय के साथ विचार बदले, स्थितियाँ बदलीं और अब अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद रहने लगे हैं।

सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़ा बंद रखना समकालीन आवश्यकता हो सकता है। तथापि स्थूल का प्रभाव, सूक्ष्म पर भी होता है।

एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक धनी व्यक्ति एक महात्मा के पास आया। धनी का महल आलीशान था। उसके मन में इच्छा हुई कि अपना महल महात्मा को दिखाए। बहुत ना-नुकर के बाद महात्मा उसका महल देखने के लिए राजी हो गए। धनी ने जब अपना महल महात्मा को दिखाया तो वे हँस पड़े। धनी आश्चर्यचकित हुआ। फिर तनिक नाराज़गी के साथ बोला, ” महात्मन! यह दुनिया का सबसे सुरक्षित महल है।” महात्मा ने पूछा, “कैसे?” धनी बोला,” मैंने इसके सारे दरवाज़े चुनवा दिये हैं। इसमें केवल एक ही दरवाज़ा रखा है जिसके चलते शत्रु का भीतर प्रवेश करना असंभव-सा हो चला है।” इस बार महात्मा ठहाका लगाकर हँसे। फिर बोले, ” यह एक दरवाज़ा भी क्यों छोड़ दिया? यदि इसे भी बंद कर दो तो शत्रु का तुम तक पहुँचना असंभव-सा नहीं अपितु असंभव ही होगा।”  धनी ने महात्मा के ज्ञान के कई प्रसंग लोगों से सुने थे। उसे लगा, सारे प्रसंग झूठे हैं। महात्मा तो सामान्य बात भी समझ नहीं पाते। सो चिढ़कर बोला, “महात्मन, यदि यह एकमात्र दरवाज़ा भी बंद कर दिया तब तो मेरे प्राण जाना निश्चित है। ऐसी सूरत में यह महल, महल न रहकर कब्र में बदल जाएगा।”  इस बार  गंभीर स्वर में महात्मा बोले, ” जब तुझे बात का भान है कि एक दरवाज़ा बंद करने से तेरी मृत्यु हो जाएगी तो इतने सारे दरवाज़े बंद करके कितनी बार मर चुका है तू?”

ध्यान देनेवाली बात है कि  दरवाज़े सर्वदा बंद रखने के लिए होते तो बनाये ही क्यों जाते? उनके स्थान पर भी दीवारें ही खड़ी की जातीं।

दरवाज़े बार-बार खुलते रहने चाहिएँ, ताज़ा हवा का झोंका भीतर आते रहना चाहिए। खुले दरवाज़ों से नयापन और ताज़गी भीतर आते रहते हैं, प्रफुल्लता बनी रहती है।

…अंतिम बात,  घर के हों या मन के, यह सूत्र दोनों प्रकार के दरवाज़ों पर लागू होता है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६६ – प्रात-गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – प्रात-गीत)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६६ ☆

☆ प्रात-गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

सपने देखे सुंदर सुंदर

अब जग जाएँ रे!

भोर भई उठ जग को

मंगल गान सुनाएँ रे!

.

करतल बसते हैं विधि-हरि-हर

सुमिर प्रणाम करो रे सादर।

शारद-उमा-रमा में रमकर

नमन करो भू-नभ को, पगधर

सुख दे-पाएँ रे!

.

चित्रगुप्त प्रभु का मन-मंदिर

कर्म देव का यह तन है घर

काम करें हर प्रभु-अर्पण कर

फल जो-जितना उचित मानकर

प्रभु-यश गाएँ रे।

.

पंछी नाचें फुदक-चहककर

फूल खिल रहे नित्य महककर

हम क्यों दुर्बल व्यर्थ फिक्रकर

जीवन जैसा जिएँ हर्षकर

खुशी मनाएँ रे!

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१.२.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ऋषिकेश-हरिद्वार

सामान्यत: ऋषिकेश जाने के लिए लोग हरिद्वार से होकर जाते हैं। देहरादून से एक सीधा रास्ता भी हरिद्वार जाता है। मसूरी से भी ऋषिकेश जाना चाहें तो पहाड़ों से गुज़रते आप ऋषिकेश पहुँच सकते हैं। मसूरी से आप सीधे यमनोत्री भी जा सकते हैं। वापसी लौटते समय पौंथी से रास्ता बदल कर टेहरी गढ़वाल से गंगोत्री भी जा सकते हैं। वहाँ से वापस ऋषिकेश आकर रुद्रप्रयाग पहुँचिए। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा की जा सकती है। इस तरह ऋषिकेश छोटे चार धाम का प्रवेश द्वार है। ऋषिकेश (संस्कृत : हृषीकेश) उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का एक हिन्दू तीर्थस्थल है। यह गढ़वाल हिमालय का प्रवेश्द्वार है। ऋषिकेश, हरिद्वार से 25 किमी उत्तर में तथा देहरादून से 43 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है।

 ऋषिकेश

28 जुलाई 2021 को हम ग्यारह बजे के लगभग देहरादून से निकले। दाहिनी तरफ़ मैदान और बाईं तरफ़ हिमालय के पहाड़ बहुत सुंदर चित्रमय झांकी प्रस्तुत कर रहे थे। देहरादून से ऋषिकेश के रास्ते में एक स्थान थानो और भोगपुर गाँव के बीच एक पहाड़ी बड़ा झरना बरसाती पानी से बह रहा था। सामने से एक कार आती दिखी वह इस पार निकल आई। उसे निकलती देख हमारी टेक्सी के ड्रायवर मुबारक खान ने हमारी गाड़ी भी झरना पार करने को आगे बढ़ा दी। लेकिन हमारी तरफ़ पानी का बहाव तेज था। गाड़ी के आगे पानी का सैलाब बढ़ता गया और गाड़ी निकलने के पहले गाड़ी के चकों ने ज़मीन छोड़ दी और चके रेत में फ़्री घूमने लगे। गाड़ी में पानी भरने लगा। ड्राईवर को गाड़ी का एंजिन चालू रखने बोलकर तुरंत कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरना मुनासिब समझा क्योंकि कार के भीतर तेज़ी से पानी भरने लगा था। यदि आटोमेटिक लॉक बंद हो जाए और गाड़ी में पानी भरता रहे तो जान के लाले पड़ सकते थे। इसलिए कार का गेट खोलकर जैसे ही बाहर निकले कार के अंदर तेज़ी से पानी भर गया। सभी को बाहर निकालना पड़ा। सबने मिलकर खूब धक्के लगा कर गाड़ी निकालने की कोशिश की। राहगीरों की भीड़ लगने लगी। दो लड़के मोटर साईकिल से भोगपुर की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने आकर गाड़ी को धक्का देकर निकालने में मदद की। लेकिन गाड़ी हिली तक नहीं।

गाड़ी को धक्का लगाने के प्रयास में हमारा एक मोबाईल पानी में गिर गया। बहुत ढूँढा पर नहीं मिला। सब घबरा गए। बहुत कोशिश की गाड़ी नहीं निकली। दूसरे मोबाईल से उत्तराखंड राज्य के रेस्कू टीम को 112 पर खबर दी। इसके पहले उनकी टीम आए। आठ दस लोग आ गए। उनमें एक बड़ी बोलेरो लोडिंग गाड़ी भी थी। पास में ही जुगाड़ का तार मिल गया। कार को तार से बांध कर गाड़ी खींच कर बाहर निकाली। जान में जान आयी।

धक्का लगाने वालों में एक लड़के का नाम न्यूटन आस्टिन था। वह ईसाई प्रचारक था। उसे पानी में गिरे मोबाईल मिलने पर सूचना देने हेतु अपना नम्बर देकर हम ऋषिकेश की तरफ़ बढ़ गए। ऋषिकेश पहुँचने पर उसका संदेश आया कि हमारा मोबाईल मिल गया है। उसे लेने बीस किलोमीटर दूर उनके घर पहुँचना होगा। हम ऋषिकेश भ्रमण करके उनके घर पहुँचे। उन्होंने चाय नाश्ता कराया और हमारा मोबाईल हमें दिया। हमने उन्हें मिठाई के लिए पाँच सौ रुपए देकर उनसे बिदा ली। गाड़ी में पानी भरने से लग़ेज में रखे हमारे सारे कपड़े गीले हो गए। एक भी कपड़ा सूखा नहीं बचा। 

ऋषिकेश हिमालय का प्रवेश द्वार है। जहाँ गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ तेज़ी से आगे बढ़ती जाती है। ऋषिकेश का शान्त वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से प्रवाहित गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। हर साल यहाँ के आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।

ऋषिकेश से सम्बन्धित अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकण्ठ के नाम से जाना गया। शिव ने केदार में गंगा को जटा में इसी स्थान पर ऋषि स्वरुप धारण कर केश से गंगा को हरिद्वार में अवतरित किया था। जहाँ गंगा ने विष्णु की चरण वंदना कर मैदान में प्रवेश किया था। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहाँ के जंगलों में कुछ समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है। विक्रमसंवत 1996 में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि रैभ्य ने यहाँ ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

गंगा नदी के एक किनारे को दूसरे किनारे से जोड़ता लक्ष्मण झूला नगर की विशिष्ट पहचान है। इसे विक्रम सम्वत् 1996 में वर्तमान रूप दिया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था। झूले के बीच में पहुँचने पर वह हिलता हुआ प्रतीत होता है। 450 फीट लम्बे इस झूले के समीप ही लक्ष्मण और रघुनाथ मन्दिर हैं। झूले पर खड़े होकर आसपास के खूबसूरत नजारों का आनन्द लिया जा सकता है। लक्ष्मण झूला के समान राम झूला भी नजदीक ही स्थित है। यह झूला शिवानन्द और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे शिवानन्द झूला के नाम से भी जाना जाता है। ऋषिकेश मैं गंगाजी के किनारे की रेत बड़ी ही नर्म और मुलायम है, इस पर बैठने से यह माँ की गोद जैसी स्नेहमयी और ममतापूर्ण लगती है, यहाँ बैठकर दर्शन करने मात्र से असीम शान्ति और रामत्व का उदय होने लगता है। ऋषिकेश में स्नान करने का प्रमुख घाट है जहाँ प्रात: काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है। गोधूलि वेला में यहाँ की नियमित पवित्र आरती का दृश्य अत्यन्त आकर्षक होता है।

स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा स्थापित आश्रम ऋषिकेश का सबसे प्राचीन आश्रम है। स्वामी जी को ‘काली कमली वाले’ नाम से भी जाना जाता था। इस स्थान पर बहुत से सुन्दर मन्दिर बने हुए हैं। यहाँ खाने पीने के अनेक होटल हैं जहाँ केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है। आश्रम के आसपास हस्तशिल्प के सामान की बहुत सी दुकानें हैं।

लगभग 5,500 फीट की ऊँचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर नीलकण्ठ महादेव मन्दिर स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मन्थन से निकला विष ग्रहण किया था। विषपान के बाद विष के प्रभाव  से उनका गला नीला पड़ गया था और उन्हें नीलकण्ठ नाम से जाना गया था। मन्दिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।

भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मन्दिर है जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। भगवान राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मन्दिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। मन्दिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। हालाँकि मन्दिर की बहुत सी महत्वपूर्ण चीजों को उस हमले के बाद आज तक संरक्षित रखा गया है। मन्दिर के अन्दरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालीग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्रीयन्त्र भी यहाँ देखा जा सकता है।

लक्ष्मण झूले को पार करते ही कैलाश निकेतन मन्दिर है। 12 खण्डों में बना यह विशाल मंदिर ऋषिकेश के अन्य मन्दिरों से भिन्न है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं।

ऋषिकेश से 22 किलोमीटर की दूरी पर 3,000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है। यह जगह पर्यटन के लिये बहुत मशहूर है।

राम झूला पार करते ही गीता भवन है जिसे 2007 में श्री जयदयाल गोयन्दकाजी ने बनवाया था। यहां रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहां एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है। प्रवचन और कीर्तन मन्दिर की नियमित क्रियाएँ हैं। शाम को यहां भक्ति संगीत का आनन्द लिया जा सकता है। तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए यहाँ सैकड़ों कमरे हैं।

ऋषिकेश से नीलकण्ठ मार्ग के बीच मोहनचट्टी स्थान आता है जिसका नाम है फूलचट्टी, यह स्थान बहुत ही शान्त वातावरण का है यहाँ चारो और सुन्दर वादियाँ है। नीलकण्ठ मार्ग पर मोहनचट्टी आकर्षण का केंद्र बनता है |

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का अस्पताल परिसर 400 मीटर के दायरे में फैला है देखने योग्य भव्य ईमारत है, इसके कई भाग हैं-ट्रॉमा सेण्टर, Emergency आदि।

ऋषिकेश घूमकर आठ बजे रात को हरिद्वार लेवल होटल में रुके। होटल के चारों तरफ़ खाने-पीने की दुकानों का अम्बार लगा था लेकिन बाहर निकलने को कपड़े ही नहीं थे इसलिए होटल के ज़रूरत से ज़्यादा महँगे मीनू कार्ड से भिंडी मसाला और चपाती का सेवन कमरे में किया।

जब सामान खोल कर देखा तो सभी कपड़े और अन्य सामान पानी से तरबितर मिले। यह तय किया कि सभी कपड़ों की गीज़र के गर्म पानी में निथार कर सुखाए जाएँ। दस-बारह हैंगर मंगा कर उनमें कपड़े फँसाकर पंखे की हवा में सूखने डाले। कपड़ों से टपकता पानी देख श्रीमती जी ने एक लम्बी रस्सी ढूँढ निकाली उसे कमरे में आरपार बांधने की कोशिश दो घंटे होती रही लेकिन कपड़ों के वज़न से रस्सी टूट जाती थी। हारकर कपड़ों को यहाँ वहाँ फैलाया। सौम्या ने एक प्रेस करने वाली स्त्री मंगा ली। दूसरे दिन पहनने के लिए एक जींस और दो टॉप प्रेस से सुखा लिए। दो बजे रात तक यही सब चलता रहा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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