हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३८ ☆ प्यार है, हम कहा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “प्यार है हम कहा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३८ ☆

✍ प्यार है हम कहा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

शिकवे दिल में रखा नहीं करते

खातमा रब्त का नहीं करते

 *

प्यार है हम कहा नहीं करते

तुम ही चहरा पढा नहीं करते

कोई रस्मन वफ़ा नहीं करते

दिल लगाकर दग़ा नही करते

 *

जो नसीहत पे ध्यान  देते हैं

ठोकरों से गिरा नहीं करते

 *

हम गुमां पाल के न चुप बैठे

दिल मिले बिन खुला नहीं करते

 *

मौत जब आना होगी आएगी

उसके डर से भरा नहीं करते

 *

शमअ सा इश्क़ कर पिघलना क्यों

हम कभी रतजगा नहीं करते

 *

पाप ही बस गिनाते रहते हो

छू के तुम पारसा नहीं करते

 *

घाव भरता नहीं दिया उनका

हम ही इसकी दवा नहीं करते

 *

मसअलों को मज़ाक समझें जो

उनसे हम मशविरा नहीं करते

 *

पढ़के वन्नास वसवसों का बशर

जाने क्यूँ ख़ात्मा नहीं करते

 *

हमने अब तक ख़ुशी नहीं देखी

ज़िन्दगी से गिला नहीं करते

 *

अर्श को चूम गुमाँ जिनको अरुण

मुस्तकिल वो रहा नहीं करते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५२ ☆ कविता – रक्षा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी एक विचारणीय कविता – “रक्षा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५२ ☆

✍ कविता – रक्षा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

*

मत घबराना साथी

जब तक साँस चले,

अपना साथ बना रहे

चाहे कोई न साथ चले।

*

सत्य राह पर डटकर रहना

संकल्प लिए चलते रहना,

दिल में प्यार बसाए साथी

सदा प्यार ही बाँटते चलना।

*

जिस धरती ने जन्म दिया

 उसे न कभी गंदा करना,

तन मन को खुश रखने वाले

आकाश को तुम साफ रखना।

*

जल और वायु को शुद्ध रख

उनकी पूजा कराना व करना।

स्वच्छ रहना स्वच्छ रखना

अपने जीवन की रक्षा करना

सच्ची राह चलते रहना

खुश रहना खुशी बाँटना,

सबको बनाकर अपना

सबके जीवन की रक्षा करना।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०१ – मौन… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मौन।)

☆ लघुकथा # १०१ – मौन श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“माँ जल्दी करो अभी तक चाय नहीं बनाई है और न टिफिन दिया है कॉलेज जाने में देर हो रही है।”

रवि ने अपनी माँ कमला से कहा।

“बेटा आज बहुत ठंड है 8:00 बज गया अभी तक मेरा हाथ पैर सीधा नहीं हो रहा है?”

“कोई बात नहीं माँ मैं चाय बना ले रहा हूं और ब्रेड सेंक के तुम्हें देता हूं” मुस्कुराते हुए रवि ने कहा “माँ ब्रश कर लो।”

“माँ पता नहीं क्यों बाहर बहुत हल्ला हो रहा है?”

कमला जी ने कहा – “बेटा सड़क के किनारे घर हैं। आते जाते बहुत सारी आवाज़ सुनाई देती रहती है। “

रवि ने कहा – “मैं देखता हूँ क्यों बाहर भीड़ लगी है।”

“मां आप चिंता मत करो ऑनलाइन मैंने खाना ऑर्डर कर दिया है थोड़ी देर बाद आ जाएगा और मैं कॉलेज कैंटीन में खाना खा लूंगा।”

वह बाइक लेकर कॉलेज के लिए चला गया।

जब वह पहुंचा तो देखा कि एक वृद्ध ठंड के मारे कांप रहा था और एक फटा कंबल ओढ़ कर बैठा था,

लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे।

रवि ने एक चाय की दुकान से चाय और एक बिस्कुट का पैकेट लिया और उस बुजुर्ग आदमी को दिया।

तभी वहां पास खड़े एक व्यक्ति ने उसे डांटा- “क्या हम इसे भगा रहे हैं जानते हो कौन है और तुम इसे चाय पिला रहे हो?”

रवि ने मुस्कुराते हुए कहा -“अंकल जी कहिए तो आपको भी मैं चाय पिला दूं बेचारे ठंड से कांप रहे हैं पहले उनमे थोड़ा हिम्मत आये फिर हम पूछते हैं उन्हें कहाँ जाना है। “

वह वृद्ध आदमी बहुत खुश हुआ मुस्कुरा के उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया और बोला कि “मेरा सब कुछ कुछ महीने पहले ही बेटे-बहु सबने छीन लिया था बस यूं ही भटकता रहता हूं गली-गली, आज यहां आग तापते हुए सो गया और मेरी नींद लग गई थी तभी सुबह यह सब लोग मुझे परेशान करने लग गए और मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ ?”

“कोई बात नहीं अंकल जी आप यह बताइए मैं आपको कहां छोड़ दूं? “

“बेटा मुझे तो कुछ पता नहीं है” उसे वृद्ध ने कहा।

“मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल सर भी बुजुर्गों की सेवा करते हैं।”

रवि ने कहा- “बाबा आप बाइक में बैठो।”

वृद्ध की आंखों में एक चमक आ गई और उसके शरीर में अचानक एक ऊर्जा भर गई।

वह उसकी बाइक में तन कर बैठ गया।

प्रिंसिपल सर बोले “अरे यह किसको ले आए कॉलेज!”

“सर बाबा के रहने का इंतजाम करना है इनके बच्चों ने इन्हें घर से निकाल दिया है”

“ठीक है अपने कॉलेज के थोड़ा सा दूरी पर जो वृद्ध आश्रम है उसका नाम है ‘अपना घर’ इन्हें वहां छोड़ आओ।”

वृद्ध की ऑंखों से ऑंसू निकल रहे थे मौन होकर भी ऑंखे आभार व्यक्त कर रही थी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०१ ☆ मी आणि माझं अंतर्मन… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०१ ?

☆ मी आणि माझं अंतर्मन… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

आयुष्य असतं एक उपवन,

जेव्हा करतो आपण,

 स्वतःचं अवलोकन,

 तेव्हा जाणवतं ,

स्वतःमधलं कमीपण!!

 

करावा व्यक्त होण्यासाठी

कुणाला फोन  —

सारेच जण अनभिज्ञ,

तुमच्या सुख दुःखाशी,

 

कुणालाच नसतं  घ्यायचं ऐकून,

फक्त ऐकवायचंच असतं !

 

 खूप एकटं वाटतं आपल्याला,

पण नसतं कुठेच—

सहसंवेदन !!!

 

 मग वाटायला लागतं,

आपलंच अंतर्मन,

एक स्वच्छ, बिलोरी दर्पण!

याहून काय वेगळं असतं,

जगण्यातलं जीवंतपण

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३६ – ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३६ – ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

छूते ही हो गयी देह कंचन, पाषाणों की,

हैं कृतज्ञ धड़कनें, हमारे

पुलकित प्राणों की!

खंजन नयनों के नूपुर जब तुमने खनकाये,

तभी मदन के सुप्त पखेरू ने पर फैलाये।

कामनाओं में होड़ लगी

फिर उच्च उड़ानों की।

यौवन की फिर उमड़-घुमड़कर बरसी घनी घटा,

संकोचों के सभी आवरण हमने दिये हटा।

स्वतः सरकने लगी यवनिका

मदन-मचानों की।

अधरों से, अंगों पर, तुमने अगणित छन्द लिखे,

गीत, एक-दो नहीं, केलि के कई प्रबन्ध लिखे।

हुई निनादित मूक ऋचाएँ,

प्रणय-पुराणों की।

कभी मत्स्यगंधा ने पायी थी सुरभित काया,

रोमांचक अध्याय वही फिर तुमने दुहराया।

परिमलवती हुई कलियाँ

उजड़े उद्यानों की।

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९६ ☆ “इत्र में भीगी हथेलियाँ…” – लेखिका… सुश्री विनीता राहुरीकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री विनीता राहुरीकर जी द्वारा लिखित  “इत्र में भीगी हथेलियाँ’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९६ ☆

☆ “इत्र में भीगी हथेलियाँ…” – लेखिका… सुश्री विनीता राहुरीकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’

लेखिका – विनीता राहुरीकर

चर्चा – विवेक रंजन श्रीवास्तव

संवेदना की सुगंध और यथार्थ का अन्वेषण – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहानी-संग्रह ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट ‘तथ्य-केंद्रित’ दृष्टि और मानवीय ऊष्मा के कारण एक अनिवार्य हस्तक्षेप है। जहाँ एक ओर स्थापित कहानीकार जैसे प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के चितेरे थे और जैनेंद्र मनोवैज्ञानिक परतों के पारखी, वहीं विनीता जी इन दोनों धाराओं को आधुनिक जीवन की जटिलताओं के साथ जोड़ती अनुभव जन्य कहानी रचती हैं। उनकी कहानियाँ केवल कल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि सूक्ष्म पर्यवेक्षण और जीवन के ठोस तथ्यों पर आधारित जीवंत दस्तावेज हैं।

रिश्तों में संवेदना और उत्तरदायित्व उनके कथानकों की विशेषता है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ पुरुष के जीवन में स्त्री (माँ, पत्नी, बेटी) की अपरिहार्यता को रेखांकित करती है। प्रभास का अकेलापन और अंततः अपनी बेटी की हथेलियों में अपनी माँ की उसी ‘नमी’ और ‘सुगंध’ को पाना, कहानी को  दार्शनिक ऊंचाई देता है। यहाँ मूल्य यह उभरता है कि परिवार में कोई भी रिश्ता ‘स्वतः’ नहीं चलता, वह निरंतर संवेदना और उत्तरदायित्व की मांग करता है।

इसी मूल्य को ‘लव यू विभू’ एक अलग धरातल पर ले जाती है। एक जांबाज कमांडो की शहादत और उसकी मंगेतर का देशप्रेम के प्रति समर्पण यह दिखाता है कि प्रेम केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक-दूसरे के कर्तव्यों का साझा बोझ उठाना है।

स्त्री की आंतरिक शक्ति और रचनात्मक पहचान करती कहानियों में

विनीता जी के नारी पात्र पितृसत्तात्मक ढाँचों के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान तलाशते हैं।

‘नीम की निबौरी’ की निमकी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। माँ की उपेक्षा और अभावों के बावजूद उसके भीतर का ‘सृजन’ और लोकगीतों के प्रति अनुराग उसे  आत्मिक शक्ति प्रदान करता है। ये शब्द यहाँ सटीक बैठते हैं कि “इस लड़की के भीतर जो सृजन है, उसका शब्दों में पूरा नक्शा संभव नहीं।”

वहीं, ‘माधुरी’ और अन्य कहानियों में वे सास-बहू के पारंपरिक रिश्तों को एक नई दृष्टि से देखती हैं। जहाँ बहू महसूस करती है कि उसकी सास को केवल एक ‘घरेलू संसाधन’ माना जाता है।  लेखिका यह मूल्य स्थापित करती हैं कि बदलती बहू के साथ-साथ एक ‘बदलती सास’ की भी जरूरत है जो अपनी जरूरतों और आत्म-सम्मान को पहचान सके।

बुजुर्ग, स्मृति और बदलता समाज

संग्रह की एक बड़ी विशेषता के रूप में मुखरित हुआ है। ‘साउथ टीटी नगर का सरकारी क्वार्टर’ और ‘चबूतरा’ जैसी कहानियाँ केवल ईंट-पत्थर के मकानों की कहानी नहीं हैं। जब ७० वर्षीय सरकारी क्वार्टर को तोड़ने का आदेश आता है, तो लेखिका मार्मिक टिप्पणी करती हैं “आज सिर्फ ईंटों की दीवारें नहीं गिरेंगी, बल्कि उन दीवारों पर टिके रिश्तों और संघर्षों की पूरी सभ्यता का अंत होगा।” कहानियों में इस तरह  परिदृश्य वर्णन, में लेखिका के अपने मंतव्य  मूल्यवान  हैं।

 भौतिक स्थान सिर्फ जगह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति-कोष भी हो सकते हैं। ग्रामीण गरिमा और अर्थ-व्यवस्था के अंतर्विरोध भी कहानियों में कहे गए हैं।

‘शहर के भीतर गाँव, गाँव के भीतर शहर’ कहानी ग्रामीण जीवन की गरिमा और आत्मनिर्भरता का प्रभावी चित्रण है। सुमित्रा जैसा पात्र, जो शहर में घरेलू कर्मचारी बनकर भी अपनी जड़ों और मिट्टी से जुड़ी रहती है, यह सिद्ध करता है कि शहर और गाँव एक-दूसरे के भीतर प्रवाहित होते हैं।

वहीं, किसान आत्महत्या की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानियों में लेखिका मीडिया की ‘कैमरा संस्कृति’ पर कड़ा प्रहार करती हैं। वे दिखाती हैं कि जहाँ दुनिया के लिए यह एक ‘न्यूज़ फ्रेम’ है, वहीं घर की औरतें बिना किसी शोर के रोजमर्रा की अर्थ-व्यवस्था और जीवन की जद्दोजहद सँभालती हैं।इन कहानियों में प्रेम, करुणा और क्षमा-बोध दृष्टव्य है।

लगभग हर कहानी का अंत  एक सकारात्मक उजाले की ओर ले जाता है। ‘कच्ची अमिया-सी लड़की और मीठे गुड़-सा प्रेम’ जैसी कहानियों में प्रेम रूमानी आदर्श के बजाय एक मेहनत-भरा और जिम्मेदार अनुभव बनकर आता है। क्षमा-बोध और अपनी सीमाओं को स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है, जो इस संग्रह की कहानियों के माध्यम से पाठकों के मन में उतरती है।

कुल मिलाकर, ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ मूल्य-बोध का एक ऐसा संग्रह है जो यह स्थापित करता है कि संवेदनशील और साझेदार रिश्ते ही आधुनिक समाज की असली शक्ति हैं।

स्त्री का रचनात्मक व्यक्तित्व कठिन परिस्थितियों में और अधिक निखरता है।

बुजुर्गों और स्मृतियों की रक्षा, दरअसल मनुष्य की आत्मा की रक्षा है।

विनीता राहुरीकर की यह कृति अपनी भाषा की सहजता और तथ्यों की प्रामाणिकता के कारण लंबे समय तक याद रखी जाएगी। यह संग्रह सिद्ध करता है कि संवेदना की महक कभी फीकी नहीं पड़ती।

किताब पढ़ने, गुनने, योग्य भावना प्रधान कहानियों का गुलदस्ता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०९ – माँ की ममता है बड़ी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माँ की ममता है बड़ी। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०९ – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆

माँ की ममता है बड़ी, जिसका ओर न छोर।

नव जीवन देकर यही, दिखलाती है भोर।।

*

संस्कार की वह घुटी, रोज पिलाती घोंट।

मानव बनकर ही रहे, कहीं न आये खोट।।

*

बचपन में देती रही, भले बुरे का ज्ञान ।

मन में जिसने गुन लिया, दूर हटा अज्ञान।।

*

बेटा कितना भी बड़ा, नजरों में नादान।

माँ तो नजर उतारती, वह चाहे कल्यान।।

*

ममता करुणा प्रेम की, शीतल भरी फुहार।

जीवन भर देती सदा, कुशल क्षेम उपहार।।

*

उसके आर्शीवाद से, बनते जग में भूप।

प्यार मिले माँ का जिसे, कभी चुभे ना धूप।।

*

किस्मत के होते धनी, जिसको मिलती छाँव।

कभी भटकते हैं नहीं, मिल जाती है ठाँव।।

*

उसका सँग जब तक रहा, सुख का था अंबार।

उसके जाते ही लगा, सूना सा घर द्वार।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “नश्तूर” (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी) – कवि – श्री अनिल खयाल अत्री ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री अनिल खयाल अत्री जी के काव्य संग्रह नश्तूर पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “नश्तूर” (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी) – कवि – श्री अनिल खयाल अत्री ☆  श्री जयपाल ☆

श्री अनिल खयाल अत्री

☆ “जीवन संघर्षों से उपजी हैं अनिल ख्याल अत्री की कविताएं” ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक का नाम – नश्तूर (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी)

कवि – अनिल खयाल अत्री

प्रकाशक  – जौहरा प्रकाशन पटियाला

0175-2210686

‘नश्तूर’ अनिल ख्याल अत्री का दो भाषाओं- हिंदी और पंजाबी  में 2025 में प्रकाशित कविता संग्रह है। ये अपने आप में एक अलग प्रयोग है। पहले भाग में पंजाबी की 45 कवितायें है और दूसरे भाग में हिंदी की 28 कविताएँ है । कविता संग्रह को हिंदी के विद्वान लेखक डॉ. स्वर्गीय डॉक्टर रवींद्र गासो को समर्पित किया गया है। इससे कवि की वैचारिक प्राथमिकता का पता चलता  है। अनिल ख्याल अत्री एक सूफियाना अंदाज़ के कवि हैं । वे जीवन के रंग में गहरे डूबते हैं और वहां जो हीरे मोती मिलते हैं उन्हें अपने पाठकों में बांट देते हैं। उनकी कविता मनुष्य जीवन-संदर्भों को मार्मिकता के साथ स्पर्श करती है । इन कविताओं में जीवन के दर्द अधिक है और सुख के पल बहुत कम । आज के मनुष्य का जीवन भी तो कुछ ऐसी ही सामाजिक स्थितियों से घिरा हुआ है।  जीवन की आपा-धापी और भाग दौड़ में ही सारी उम्र निकल जाती है। कुछ भी हाथ नहीं लगता। क्या खोया क्या पाया..कुछ पता नहीं..कभी ढंग से बैठ कर कभी सोचा ही नहीं।  कवि ,जीवन की इस अस्थिरता पर चिंतन करता है । शायद कवि ने जीवन में  संघर्षों से अधिक सामना किया  है और प्राप्ति बहुत कम । कवि अपनी जीवन-यात्रा को याद करते हुए अपने सहयोगियों को भी याद करते हैं । कुछ ने उनका साथ दिया और कुछ मूकदर्शक बने रहे।

हिन्दी और पंजाबी में रचित इन कविताओं का स्वर और तेवर एक जैसे हैं। इनकी रचना प्रक्रिया भी लगभग एक जैसी है। जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर लिखी गई इन कविताओं के अर्थ व्यापक और गंभीर हैं । पंजाबी की कविता ‘मासूम- सवाल’ और हिंदी की कविता  ‘नया साल’ में एक प्रश्न के माध्यम से उत्तर खोजने का प्रयास है। इसी प्रकार–कलम की कसम  में लेखक को कलम के साथ ईमानदारी बरतने का सुझाव है और सत्ता की चाटुकारिता से आगाह किया गया है। वचन- प्रवचन और अभिषेक कविता में नेता और देवता की तुलना करते हुए पत्थर के देवता से नेता के पत्थर-पन को अधिक खतरनाक बताया  है ।

“डुब्बदा तारा” पंजाबी कविता में रोशनी बांटते तारे को श्रेष्ठ बताने के पीछे समाज की भलाई में लगे व्यक्तियों को प्रेरित करना है l “की भरोसा” पंजाबी कविता में जीवन में  होने वाली घटनाओं के बारे मे बात करते हुए कवि जीवन को अनिश्चित मानता है।

कुछ हिन्दी- पंजाबी कविताओं के अंश तो जीवन के गहरे सूत्र वाक्यों की तरह याद रखने योग्य हैं जैसे—

*नजाकत और हलीमी में ही

होती है जीतने की जिद्द

 

*दर्द है तो जीवन है

 

*निष्प्राण है तुम्हारी कविता

रौशनी के नाम पर  सिर्फ

 रौशनी की एक तस्वीर

 

*एक ऐसी आवाज जो

 दबाए न दबे

 और एक ऐसी छाप

जो मिटाये न मिटे

 

*जैसे रोज़-रोज़ एक ही

दर्जे का तापमान लिए

उदय हो रहा हो सूरज

 

*जणा खणा जदौं देंदाए सानूं

धरती ते भार दा खिताब

 

*पर देण वालेआं  ने तूहानू फुॅल

अते सानू क॔डेआं दा नां दित्ता है

 

प्रूफ की त्रुटियां खलती हैं। कहीं कहीं कविता की पंक्तियों के असंगत संयोजन के कारण वाक्य प्रवाह तो टूटता ही है , गद्यात्मकता भी आ जाती है। कुछ कविताओं में उपदेशात्मकता भी है । द्विभाषी होने के कारण यह हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं के पाठकों के लिये रुचिकर और पठनीय है। जीवन को गंभीरता, निश्छलता, धैर्य के साथ जीने का सलीका देता है। कवि अनिल ख्याल अत्री को बहुत बहुत बधाई !!

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६५ – देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सोने के भाव दिन दोगुने और रात चौगुने बढ़ते आ रहे हैं। इस प्रकार की चर्चा सुनते सुनते कई दशक बीत गए। बचपन से आरंभ सफर से बुढ़ापे की दहलीज तक पहुंचते सोने के लिए ये ही सब सुनते आ रहे हैं।

विगत कुछ समय से लोग कह रहे है, सोने के तो अब पंख लग गए हैं। पंख लगे पक्षियों के लिए ऊंचाई मायने नहीं रखती हैं। असमान से भी ऊपर पहुंचने की दम रखते हैं।

तिजोरियों में बंद सुरक्षित सोना भी क्या सोचता होगा, कि वो तो सौ तालों में बंद रहता है, दुनिया झूठी है, और कहती है, कि सोने के तो अब पंख लग गए हैं।

राजस्थान के छोटे से कस्बे डेगाना जिला नागौर में एक सुनार की दुकान से एक कबूतर ने सोने की एक चेन लेकर उड़ान भर ली थी। फिर क्या था ? पूरे कस्बे के लोग कबूतरों के पीछे पीछे दौड़ने लग गए, क्या पता कौन सा कबूतर उड़ा कर ले गया हो। जब कोई व्यक्ति कीमती वस्तु को उठा कर भागता है, तो भी तो सब उसके पीछे भागने लग जाते हैं।

कस्बे के बुजुर्ग कहने लगे, किसी ने कबूतरों को ट्रेनिंग करवा कर ये काम करवाया होगा। इतिहास में भी ये जानकारी है, कि राजकुमारियों के प्रेम पत्र का आदान प्रदान कबूतर ही करते थे।

हमारे समय में तो गली मोहल्ले के आशिकों को भी कबूतर का दर्जा मिला हुआ था। वो तो पंजाबी के प्रसिद्ध गायक दलेर मेहंदी ने “कबूतरबाजी” में गैर कानूनी कमाई करी तब से कबूतर शब्द से ही लोग गुरेज करने लग गए हैं।

डेगाना कस्बे के भोले भाले कबूतर ने सोने की चेन उसके मालिक को जल्दी लौटा कर, पक्षियों की ईमानदारी प्रमाणित कर दी है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५४ – आम के बीच राम ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “आम के बीच राम”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५४ ☆

🌻लघु कथा🌻आम के बीच राम🌻

वार्षिकोत्सव कार्यक्रम चल रहा था। सभी अपनी-अपनी कार्य कुशलता मंच के मध्य रखना चाह रहे थे। चमचमाता मंच, सजावट, तिलक रोली चंदन वंदन अभिनंदन, मन आनंदित और उमंगों से भरा ।

सभी की निगाहें तो बस वहाँ क्या हो रहा? क्या होने वाला है? इसकी जानकारी लेते नजर आए।

किसी ने मन की बात,  कोई व्यंग, कोई परियंत, कोई प्रियवर, कोई हँसी ठिठोली, कोई ज्ञान की बात, संत ध्यान की बात, न चाहते भी तालियाँ बजाते रहिए। कुल मिलाकर गीत संगीत भरपूर मनोरंजन।

अंग्रेजी परवरिश में पलते आज के बच्चों को ये सब नही भाता।अथर्व अपनी दादी के साथ आया था। बीच-बीच में तंग करने लगा – – घर चलो यहाँ तो आम लोग बैठे है।

दादी प्यार से सिर पर हाथ फेरते बच्चे से बोली — जहाँ आम लोग होते है। वहीं राम होते है। तुम्हें भी श्री राम बनना है न??

बच्चे ने धीरे से कहा — तो फिर ठीक है। थोड़ी देर बैठ जाता हूँ।

राम ही केवल राम पियारा।
जान लेही जो जान निहारा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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