हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३४ – मुक्तक ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३४ – प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

दर्द, अड़ियल सा मुसाफिर आया

पूछ बस्ती से मेरा घर आया

*

उसकी आँखों में हादसे पढ़कर

याद फिर खौफ़ का सफर आया

*

इम्तिहां छोड़, पुस्तिका में वह

प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया

*

ले के शुभकामना गया था मैं

चोट खाकर मिरा जिग़र आया

*

दोस्त के जिस्म की महक लेकर

तीर तरकस में लौटकर अया

*

शांति का जो कपोत भेजा था

खून से हो के तर-बतर आया

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९७ ☆ न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९७ ☆

? न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर” ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री कैलाशचंद्र पंत हिंदी पत्रकारिता, भाषा सेवा और सांस्कृतिक चेतना के ऐसे वरिष्ठ पुरोधा हैं, जिन्होंने भोपाल को न सिर्फ राजनीतिक राजधानी, बल्कि साहित्यिक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पहचान दिलाने में निरंतर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। महू (जिला इंदौर) में 26 अप्रैल 1936 को जन्मे पंत जी ने एमए, साहित्याचार्य तथा साहित्य रत्न जैसे उच्च साहित्यिक उपाधियों के माध्यम से अपने अध्ययन को सुदृढ़ आधार दिया और आगे चलकर उसी विवेकपूर्ण दृष्टि को उन्होंने लेखन, संपादन तथा संस्थागत विकास से जोड़ा।वे मूलतः ऐसे रचनाशील पत्रकार और साहित्यसेवी हैं, जिन्होंने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज, शिक्षा, संस्कृति और जनजागरण की धारदार शक्ति में रूपांतरित किया है।

भोपाल में रहते हुए कैलाशचंद्र पंत ने यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों, गोष्ठियों और वैचारिक विमर्श को नई दिशा दी।वे भोपाल से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका “अक्षरा” के संपादक के रूप में लंबे समय तक सक्रिय रहे, जहाँ उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों को मंच दिया और समकालीन मुद्दों पर सार्थक बहसों को प्रोत्साहित किया।

उनकी संवाद शैली सरल, स्पष्ट और लोकाभिमुख रही, जिसके कारण वे आम पाठक, रचनाकार और श्रोता सभी के बीच प्रिय बने।

कैलाशचंद्र पंत का एक बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भाषा सेवा को संस्थागत स्वरूप दिया। वे मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में मंत्री संचालक की भूमिका निभाते हुए हिंदी के प्रचार प्रसार के अनेक कार्यक्रमों से जुड़े रहे और नए लेखकों, विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए सतत प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।भोपाल स्थित हिंदी भवन न्यास और कृषि भवन जैसे सांस्कृतिक–बौद्धिक केंद्रों के विकास में उनकी भागीदारी उल्लेखनीय रही, जिससे साहित्यिक कार्यक्रमों, विमर्शों और सांस्कृतिक आयोजनों को स्थायी मंच प्राप्त हुआ। महू में स्थापित स्वध्याय विद्यापीठ के माध्यम से उन्होंने शिक्षा, भारतीय संस्कृति और जीवन–मूल्यों के प्रसार की जो पहल की, उससे असंख्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने लाभ उठाया और एक वैचारिक अनुशासन की परंपरा विकसित हुई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कैलाशचंद्र पंत ने हिंदी और भारतीय संस्कृति की गरिमा को सुदृढ़ किया। भारत सरकार और मध्यप्रदेश शासन के प्रतिनिधि के रूप में वे विभिन्न देशों की साहित्यिक यात्राओं पर गए और विश्व हिंदी सम्मेलनों सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। इससे उन्हें वैश्विक साहित्यिक पहचान तो मिली ही, साथ ही प्रवासी भारतीय समुदाय में हिंदी के प्रति आत्मविश्वास भी जागृत हुआ।उनकी इस बहुआयामी साधना को देखते हुए उन्हें पूर्व में अनेकों  सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है, जबकि हाल में भारत सरकार द्वारा वर्ष 2026 के लिए पद्मश्री अलंकरण हेतु उनके चयन ने मध्यप्रदेश और हिंदी जगत – दोनों का मान बढ़ाया है।

आज कैलाशचंद्र पंत केवल एक वरिष्ठ पत्रकार या हिंदी सेवी नहीं, बल्कि एक लोकसंग्रही, अध्ययनशील और विनम्र व्यक्तित्व के रूप में हमारे सामने हैं, जिनके जीवन–कर्म पर “संघर्ष से विजयपथ की ओर” जैसी पुस्तकों के माध्यम से विस्तार से प्रकाश डाला गया है।उनकी साधना यह संदेश देती है कि यदि भाषा को समाज, शिक्षा और संस्कृति से जोड़ा जाए तो वह मात्र विषय न रहकर जनचेतना की धारा बन जाती है। भोपाल के साहित्यिक परिदृश्य में पंत जी की उपस्थिति एक ऐसा स्थायी स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ाती रहेगी।

उन्हें पद्मश्री सम्मान भोपाल के हिंदी जगत का सम्मान है। उनसे जुड़े हम साहित्य प्रेमियों के लिए गर्व का पल है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “धर्म वही होता बड़ा। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆

धर्म वही होता बड़ा, जिसमें हो सद्भाव।

प्रेम दया ममता क्षमा, उपकारी हों भाव।।

 *

मानवता से कब बड़ा, जग ने समझा मर्म।

आदम युग के बाद ही, उपजे हैं सब धर्म।।

 *

बैर बुराई तामसी, नहीं धर्म के अंग।

मारकाट हिंसा सभी, हैं अधर्म के रंग।।

 *

कट्टरता जब धर्म में, घुस जाती है घोर।

मूल भाव खोते सभी, कभी न होती भोर।।

 *

शून्य भाव जबसे हुये, चुभे दिलों में शूल।

प्रेम और सद्भाव ही, सब धर्मों का मूल।।

 *

धर्म सभी हैं खो गये, अब कट्टरता साथ।

राम रहीम ईसा-मसि, पीट रहे हैं माथ।।

*

मानवता ही धर्म है, मुख्य धुरी है एक।

भारत की संस्कृति में, यही बात है नेक।।

 *

हम उदारवादी रहे, लेकर सबको साथ।

सदियों से हैं चल रहे, पकड़े सबका हाथ।।

 *

स्वागत करना जानते, और झुकाना माथ।

पर यह कभी न सोचिए, बंधे हुये हैं हाथ।।

शिक्षा मिली सनातनी, वेदों से यह ज्ञान।

सारा जग है जानता, भारत देश महान।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६३ – देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६३ ☆ देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी तक तो लोग कुर्सी ना मिलने पर परेशान रहते थे, अब तो किसी को टूटी कुर्सी मिल जाने से ही बेहद परेशानियां होने लगी हैं। मीडिया कुछ दिन से लेकर चर्चा कर रहा है। हमने भी घर की सब कुर्सियां बढ़ई से चेक करवा ली हैं। यदि गलती से कोई मेहमान आ गए और कुर्सी कुछ गड़बड़ हो तो नाहक बेज़्ज़ती हो जाएगी।

अब तो घर के बाहर कहीं भी किसी कार्यालय आदि में जाते है, तो कुर्सियों पर ही नज़र रहती हैं। कल एक राज्य सरकार के कार्यालय में जाना हुआ, तो वहां आगंतुकों के लिए रखी हुई उपरोक्त कुर्सियों का चित्र खींच लिया।

हमारी सरकारी पाठशाला में भी कुर्सियों की कील निकल जाती थी। अनेकों बार पेंट में अल ( L) आकर का चीरा लग जाता था। उस जमाने में रफ़ूगर से उसे दुरस्त कर उपयोग लिया जाता था। आजकल तो तुरंत नई पेंट ऑनलाइन दस मिनिट में उपलब्ध हो जाती हैं।

आज के युग में तो अधिकतर प्लास्टिक की कुर्सियों का चलन हो गया हैं। उसमें कील लगने का खतरा भी नहीं रहता हैं। हमने भी बैंक की नौकरी में आरंभ लकड़ी की कुर्सियों से ही किया था। कैशियर की कुर्सी सामान्य से अधिक ऊंची होती थी। समय के साथ गोदरेज की केन वाली कुर्सियां चलन में आ गई। बिना हैंडल वाली बैठने की “यू” आकर की कुर्सी बड़ी आरामदायक होती थी। पीठ और बैठने के स्थान पर केन  होने से शरीर को हवा भी मिलती रहती थी।

कंप्यूटर युग में पहिए लगी हुई कुर्सियां आ गई हैं। एक सीट से दूसरी सीट तक जाने के लिए उठने की आवश्यकता भी नहीं हैं। शरीर को और आलसी बनाने में सहायक भी हैं। अधिकारियों की श्रेणी के अनुसार कुर्सी का बजट भी होता हैं। जितना बड़ा अधिकारी होगा, उतनी ही महंगी कुर्सी पर बैठेगा।

अब लेखनी को विराम देता हूं, कुर्सी पर बैठ कर मोबाइल में लिखते लिखते थक जो गया हूं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१५ ☆ कार्यशाळा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१५ ?

☆ कार्यशाळा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

वेदनेने कार्यशाळा घेतली

अन् तरीही खूप होती गाजली

खोल जखमांचीच जागा ही तरी

दुर्बलांनी चाळ तेथे बांधली

जाहलेले तेजही नाही कमी

कुंदनाने खूप ज्वाळा सोसली

खंजिराचा दोष नव्हता फारसा

रक्तरंजित योजना तू आखली

वस्त्र नव्हते अंगभर त्यांच्याकडे

जीर्ण कपडा लाज त्याने झाकली

पेटला शेजार आहे अन् तरी

झोप आम्हाला कशी ही लागली

केस साधा कापतो आहे गळा

क्रूरतेने आज सीमा गाठली

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… – थरारक पर्यटन – भाग – ७५ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… – थरारक पर्यटन – भाग – ७४  ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

थरारक पर्यटन

मला नेहमी असं वाटतं की एखादा प्रवासी किंवा एखादा खेळाडू यांच्या मानसिकतेत साम्य आहे. दोघेही खिलाडू वृत्तीचे असतात, परिस्थितीशी जुळवून घेणारे असतात, कठीण परिस्थितीचं दोघांनाही भान असतं, अडचणींवर मात करण्याची क्षमता त्यांच्यात आपोआपच बळावते, माघार घेण्याची वृत्ती त्यांच्यात अभावाने जाणवते.

ग्रुप बरोबर केलेल्या अनेक टूर्समधून मी हा अनुभव घेतला आहे. सत्तरी उलटून गेलेली, ऐंशीच्या उंबरठ्यावर असलेली माणसे अगदी हौसेने उंच चढणी चढतात, कितीतरी किलोमीटर चालण्याची त्यांची तयारी असते. नव्या प्रदेशातील अनोळखी खाद्य संस्कृतीही अगदी आनंदी वृत्तीने, खिलाडू वृत्तीने स्वीकारतात, उगीच”खाण्याचे हाल होत आहेत” वगैरे कुरकुर करत बसत नाहीत. या संदर्भात मला एका हास्यास्पद प्रसंगाची आठवण येते.

तेव्हा आम्ही इटलीत फिरत होतो. इटालियन पिझ्झा हा जगप्रसिद्ध. मूळात “पिझ्झा” हे इटालियन लोकांचेच खाणं. तेव्हा इटलीत आलोय तर इटालियन क्यूझीनची चव का घेऊ नये? आमच्या ग्रुप कंडक्टरने आम्हाला इटालियन रेस्टॉरंट मध्ये नेलं आणि सगळ्यांसाठी “पिझ्झा” ची ऑर्डर दिली. आमच्याबरोबर एक वृद्ध गुजराती महिला होती. मुख्य म्हणजे ती एकटीच या टूर बरोबर आली होती. तिच्याबरोबर घरचे, अथवा स्नेही कुणीच नव्हते आणि तिच्याशी गप्पा करतानाच समजले की, ” ती नेहमीच एकटीच प्रवास करते. ” सिंगल ट्रॅव्हलर. तिचं म्हणणं, “टूर मध्ये सोबत मिळतेच आता नाही का तू भेटलीस मला. ” त्या संवादानंतर मी हळूच स्वतःलाही जरा तपासून पाहिलं, “आपल्याला जमेल का असे एकटीनेच फिरायला. मूळात आवडेल का? ” उत्तर अर्थातच “कोण जाणे! ” असंच आलं.

तर सांगत होते सगळ्यांच्या टेबलवर छान रंगीबेरंगी टोमॅटो, बेल पेपर्स, आॉलीव्ह्ज, भरपूर चीज वगैरेंनी सजवलेले पिझ्झा आले. “वा! वा! साक्षात इटालियन पिझ्झा! ”

त्या वृद्ध महिलेनेही तो खाण्यासाठी कापायला सुरुवात केली. तो इतका चिवट होता की तिने थोडासा सुरीवर जोर लावल्याबरोबर एखाद्या विटी सारखा टणकन् उडून दुसऱ्या टेबलवर जाऊन पडला. मला हे आठववून लिहिताना आताही खूपच हसू येत आहे.

“जो मारो पिझ्झा क्याथी गयो! ”

ती मजेत बोलत होती. थोड्याफार प्रकाराने सगळ्यांच्याच बाबतीत हा चिवट पिझ्झा खायचा कसा हा प्रश्नच होता. काहीजण ग्रुप कंडक्टरकडे तक्रारही करू लागले पण ही वृद्ध गुजराती महिला मात्र अगदी शांत होती.

“एटलो सु थयो. बद्धानी सामळो. मारे पास खाकरो छेना! ” आणि खरोखरच तिने तिच्या हॅन्डबॅगमधून खाकरे काढले आणि सर्वांना वाटले. इटलीत इटालियन पिझ्झा रेस्टॉरंट मध्ये आम्ही सर्वांनी ते भारतीय गुजराती कुरकुरीत खाकरे मस्त एन्जॉय केले.

प्रवासात असे अनेक अनुभव येतात. मजेचे, अडचणीचे, त्रासाचे अनेक प्रकारचे.

ओहायो स्टेटमध्ये कोलंबस या गावात राहत असताना तिथून दोनतीन तासावर असलेल्या एरी लेकवरच्या बेटावर जायचा ज्योतिका- साकेतने बेत केला. त्या दिवसाचं हवामान, वादळ वाऱ्यांविषयीचे सावध इशारे वगैरे दोघांनी काटेकोरपणे चेक केल्यानंतरच आम्ही चौघं ‘पुटीन बे’ला जायला निघालो. तिथे एक दिवस आम्ही मुक्कामही करणार होतो. तसं बुकिंगही साकेतने केलेलं होतं. समुद्रच वाटावा इतका विस्तीर्ण आणि अथांग असा तो तलाव होता. दूरवर अनेक उंच इमारती होत्या. तलावात प्रवासी, व्यापारी जहाजंही होती. प्रत्यक्ष बेटावर जाण्यासाठी आम्हाला एक क्रूज करावी लागली. गाडी किनार्‍यावरच्या कारपार्कमध्ये ठेवली आणि रात्री बेटावरच मुक्काम करणार असल्यामुळे लागणारे सामान तेवढं बरोबर घेतलं.

बेटावर पोहोचलो. चारी बाजूला असलेलं निळंशार पाणी बघून तर आमचा जीव अपार सुखावला. बेटावर फिरण्यासाठी आम्ही एक गोल्फ कार्टही घेतली. त्या उघड्या कार्ट मधून बेटावर फिरण्याची मजा वर्णनातीत होती. आम्ही मस्त गप्पा करत, गाणी गात, आजूबाजूची झाडं, घरं पाहत होतो आणि काय आश्चर्य! निसर्ग किती लहरी असतो! मानवी अंदाजावर छुपेपणाने तो कधी हल्ला करेल हे कोणी सांगायचं? एकाएकी जोरदार वादळ वारे सुरू झाले. आकाश काळोखलं आणि अक्षरश: चेंडू एवढ्या गारा आम्हाला झोडपू लागल्या. आमच्या अंगावर ‘हुडी’ होत्या तरीही गारांचा मारा आणि पावसामुळे निर्माण झालेली थंडी असह्यच होती. त्यातच आमची कार्टही बंद पडली. साकेतची अत्यंत लाडकी स्पोर्ट कॅप वाऱ्याबरोबर उडून गेली म्हणून तो अधिकच वैतागला होता. त्यातून आम्हा ज्येष्ठांची जबाबदारी! प्रसंग बाका होता. पुटीन बेवर सगळ्याच प्रवाशांची प्रचंड धावपळ चाललेली होती पण आम्हा चौघांचे हाल दारुण होते. आम्ही या वादळी पावसात भिजत रस्त्यावर होतो. तिथे जवळच एक टुमदार बंगला होता पण बंगल्याची दारं खिडक्या बंद होत्या. मनुष्यवावर तिथे जाणवतच नव्हता. क्षणभर माझ्या मनात आलं या क्षणी आपण भारतात असतो तर अशाच बंगल्याचे दार नक्की आपल्यासाठी उघडलं गेलं असतं. भिजणाऱ्या आम्हाला आत घेतलं असतं. पुसायला त्यांनी पंचे दिले असते. गरम चहाही मिळाला असता. उगीच नाही भारताला “अतिथ्यशील देश” म्हणतात. मी कोणत्या विचारात गुंग झाले हे ज्योतिकाने ओळखले असावे. ती लगेच म्हणाली, ” मम्मी त्या घराकडे अशी एकटक नजर लावून बघू नकोस. अमेरिकेत कुठल्याही कारणाने कुणालाही अरेस्ट करतात बरं का? ”

मी “भारतीय” असल्याचा अभिमान मात्र मला त्या क्षणी नक्कीच जाणवला.

पण तेवढ्यात एक अमेरिकन यंग कपल आमच्या जवळ येऊन थांबलं आणि ते त्यांच्या कार्ट मधून उतरले आणि त्यांनी त्यांची कार्ट आम्हाला देऊ केली आणि “आम्ही तुमची बंद पडलेली कार्ट रेंटल शॉप मध्ये घेऊन येऊ, डोन्ट वरी फोक्स, बी रिलॅक्स्ड” असं म्हणत आम्हाला अगदी गोड हसत त्यांनी ‘बाय’ केलं. आमच्या ‘थँक्स’ ला अगदी शालीनतेने “यु आर वेलकम मेन. ” असंही म्हटलं.

बेधुंद पावसात, गारांच्या तडाख्यात भिजण्यातला त्यांचा रोमान्स बघून कुठेतरी मनाला खरोखरच गुदगुल्या झाल्या.

एक क्षण तक्रारीचा तर दुसरा क्षण असा आपुलकीचा. त्या दुसऱ्या क्षणांनी अमेरिकन, भारतीय वगैरे लेबलं तोडून टाकली. उगीच दुभाजक असलेल्या भींती मनातल्या मनातच कोसळल्या. शेवटी निसर्गाच्या या महान पटांगणात माणूस हा फक्त माणूसच असतो. कुठल्याही राष्ट्रीयत्त्वाचा, धर्माचा शिक्का नसलेला. हा थरारक, नाट्यमय आणि नंतरचा मनुष्यपणाचा अविस्मरणीय अनुभव प्रवासात नेहमीच घेतला.

– क्रमशः भाग ७४..

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६९ – अर्थहीन संख्याएँ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अर्थहीन संख्याएँ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६९ – अर्थहीन संख्याएँ ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

2 मरे 10 घायल

10 मरे 100 घायल

100 मरे 1000 घायल

बस यूँ ही बढ़ती जायेगी

शून्यों की संख्या बनते जायेंगे आँकड़े

और छपते रहेंगे अखबारों में।

पढ़ते रहें लोग

 बिना किसी उत्तेजना के।

होता है

 ऐसा होता है तब

जब आदमी संख्या में बदल जाता है,

भला, आदमी और संख्या का नाता है?

हम सब संख्यातीत

अब बन कर रह गये हैं

अर्थहीन संख्याएँ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६८ – “जो विमर्श में जुटीं…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “जो विमर्श में जुटीं...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “जो विमर्श में जुटीं...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

कोहरे में ठिठुरन से

ऐसे, सूरज भी हारा।

दिनके चढ़ते चढ़ते

कैसे लुढ़क गया पारा ॥

 

जमे दिखे गांडीव,

सिकुड़ते सव्यसाचियों के ।

धुंध , लपेटे शाल, उलहने

सहें चाचियों के ।

 

चौराहे जलते अलाव भी

लगते बुझे बुझे –

और घरों की खपरैलें तक

लगीं सर्वहारा ॥

 

जो विमर्श में जुटीं

लिये गम्भीर समस्यायें ।

हाथ सेंकने जुटीं गाँव की

बंकिम प्रतिभायें ।

 

बृद्धायें , दरवाजे पर ले

बरोसियाँ बैठीं –

शांति पाठ के बाद पढ़

रहीं ज्यों अमृत धारा ॥

 

लोग रजाई – कम्बल

चेहरे तक लपेट निकले ।

लगे, फूस से ढके, फूल के

हो सुंदर गमले ।

 

आसमान से नीचे तक है

सुरमई अँधियारा –

धुँधला सूरज दिखता नभ

में लगे एक तारा ॥

 

कोहरे में ठिठुरन से ऐसे

सूरज भी हारा ।

दिनके चढ़ते चढ़ते कैसे

लुढक गया पारा ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-02-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “जंगल में जनतंत्र…” (लघुकथा संग्रह)– आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी की कृति जंगल में जनतंत्र… “ की समीक्षा)

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

☆ “जंगल में जनतंत्र…” (लघुकथा संग्रह)– आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆ 

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक ‏: जंगल में जनतंत्र 

कथाकार  : आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ 

सलिल की सहज, अर्थ पूर्ण लघु कथाएं – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

वरिष्ठ कवि – साहित्यकार इंजी. संजीव वर्मा “सलिल” का लघु कथा संग्रह “जंगल में जनतंत्र” पढ़ने मिला। इस संग्रह पर विचार प्रस्तुत करने से पूर्व कथा – कहानियों से संबंधित कुछ बिंदुओं पर चर्चा आवश्यक है तभी हम लघु कथा जगत में “सलिल” का स्थान निर्धारत कर पाएंगे।

दादी, नानी और मां के माध्यम से बच्चे 2/3 वर्ष की आयु में ही कहानियों से जुड़ जाते हैं। … एक था कौआ, …एक थी गलगल मौसी और …दूर के चंदा मामा जैसी कहानियां उनकी समझ, उनकी कल्पना शक्ति बढ़ाने लगते हैं। …फिर एक था राजा और एक था साधु, किसान, व्यापारी आदि की कहानियां उनके दृष्टि – फलक और ज्ञान को बढ़ाती हैं। मैं समझता हूं कि हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में सर्वाधिक कही – सुनी, पढ़ी – लिखी जाने वाली विधा कहानी ही है। कहानी का अस्तित्व भी उतना ही पुराना है जितना मनुष्य के विचारवान होने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का। हो सकता है उस काल में कहन का तरीका अलग रहा हो, किंतु कथा के अस्तित्व पर आशंका नहीं की जा सकती। मनुष्य के ज्ञान, लिपि और संस्कार यात्रा से कदमताल करते हुए ही कथा ने भी लघु कथा, कहानी, उपन्यास जैसे विविध नाम और परिभाषाएं पाईं हैं।

किसी समय अत्यंत रुचि से पढ़े जाने वाले वृहत उपन्यास लोगों की बढ़ती व्यस्तता के कारण उनसे दूर हो गए, किंतु कहानियों और लघु कथाओं के पाठक व कथाकार दोनों ही निरंतर बढ़ रहे हैं। लघु कथाएं न सिर्फ हिंदी वरन सभी भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही हैं, विदेशों में भी रची – पढ़ी जा रही हैं। अमेरिका के एडगर एलन पो., ओ. हेनरी, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, रेमंड कार्वर, रूस के एटोन चेखव, फ्रांस के गाई डे. मौपासां, अर्जेंटीना के जार्ज लुइस बोर्गेस तथा कनाडा के एलिस मुनरो की लघु कथाएं दुनिया भर में पढ़ी जा रही हैं। जिन भारतीय साहित्यकारों का नाम हम बड़े सम्मान से लेते हैं उन्होंने भी लघु कथाएं लिखी हैं। इनमें मुंशी प्रेमचन्द, उपेंद्रनाथ “अश्क”, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, महाश्वेता देवी, चंद्रधर शर्मा “गुलेरी”, विमल मित्र, महादेवी वर्मा, हरिशंकर परसाई, मेहरुन्निशा परवेज, विष्णु प्रभाकर, शिवानी, खुशवंत सिंह, मृदुला सिंह आदि शामिल हैं।

यहां एक बात कहना चाहता हूं कि इन सभी ख्यातिलब्ध भारतीय साहित्यकारों ने जो भी लघु कथाएं लिखीं वे स्वाभाविक रूप से लघु हैं। इन्होंने प्रयास पूर्वक कथाओं को लघु नहीं बनाया, इसलिए इनकी लघु कथाएं रोचक हैं, पाठकों के स्मृति पटल पर अंकित हैं। वरिष्ठ कवि, साहित्यकार भाई संजीव वर्मा “सलिल” के लघु कथा संग्रह “जंगल में जनतंत्र” को पढ़ने के उपरांत मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वे भी इन्हीं श्रेष्ठ भारतीय कथाकारों की श्रेणी में आते हैं जो प्रयास पूर्वक कहानी को सिकोड़ कर छोटा करने का प्रयत्न नहीं करते वरन अपने अर्थ पूर्ण शब्द भंडार और संयोजन कला से अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कम शब्दों में व्यक्त करने में सक्षम हैं। उनकी कथाओं में जीवन के विविध रंग हैं, भाव हैं, दर्शन है, सबक है। मैं समझता हूं की यदि अन्य लघुकथाकार भी “सलिल” जी की भांति लघु लिखने की प्रतियोगिता में न पड़ते हुए सहजता से लघु कथा लेखन करेंगे तो उनकी कथाएं सलिल जी की कथाओं की तरह ही अधिक प्रभावशाली होंगी।

अनेक लोग “एक था राजा, एक थी रानी। दोनों मर गए, खतम कहानी। ” को सबसे छोटी कथा मानते हैं।

गुड़गांव निवासी अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर रवींद्र शर्मा की लघु कथा भी सबसे छोटी कथा मानी जाती है –

“अपनी मांद से बाहर निकलते हुए अपने बच्चे को बिल्ली ने कहा – “रुक जाओ, एक इंसान तुम्हारा रास्ता काट गया है। “

ठीक है, कथा लघु है, पर रवींद्र शर्मा जी को कौन समझाए कि बिल्ली की नहीं शेर के रहने की जगह को मांद कहते हैं।

सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर की लघु कथा “लक्ष्मी” को पढ़ें – “दीवाली की रात के पहले वाला दिन। एक करोड़पति मित्र ने अपने लेखक मित्र से कहा – दोस्त ! घर के दरवाजे खुले रखना,,,, आज रात लक्ष्मी आयेगी।

तो लेखक ने कहा – दोस्त अपने घर के दरवाजे भी खोल देना नहीं तो लक्ष्मी निकलेगी कैसे ?

यह एक अच्छी पूर्ण लघु कथा है।

बानगी के रूप में यहां प्रस्तुत है सलिल जी रचित इस कथा संग्रह की एक कथा – “नाम का प्यार”।

“आया ! बेबी को सम्हालो। ध्यान रखना समय पर खा – पी ले, मैं किटी पार्टी में जा रही हूं। गंदे हाथों से छू लेगी तो मेकअप खराब हो जायेगा। ” कहते हुए वे बच्ची को झिड़कते हुए कार में जा बैठीं और मैं देखता रह गया, उनका नाम का प्यार।

संग्रह में प्रस्तुत सलिल जी की सभी लघु कथाएं “कहानी” की परिभाषा पर खरी व उद्देश्य पूर्ण हैं, सहज संक्षिप्त विस्तार पाकर ही वे अपनी बात स्पष्ट कर देती हैं। ये पाठकों के मन – मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ेंगी। संजीव वर्मा “सलिल” जी को बहुत बहुत बधाई, मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर, मध्यप्रदेश – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९ ☆ # “उदास बसंत…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “उदास बसंत…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९  ☆

☆ # “उदास बसंत…” # ☆

यह कैसी बसंती पवन चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

डाली से फूल झरने लगे हैं

भ्रमर भी आह भरने लगे हैं

वीरान हो गई है वाटिका

पतझड़ से सब डरने लगे हैं

मौसम ने यह कैसी चाल चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

आकाश में उड़ती हुई पतंग है

मांझे और धागे में मची हुई जंग है

मांझे पर चढ़ा कट्टरता का रंग है

मांझे से कट रहे वंचितों के अंग है

लहुलूहान अंगो से भरा हर चौराहा हर गली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

पीली पीली सरसों पीले पीले वस्त्र है

बसंती नैनों में कटार से अस्त्र है

पीले को रक्तिम करने पढ रहे वह मंत्र है

उनकी इच्छापूर्ति में लगे सारे तंत्र है

बसंत की मादकता धूमिल हो चली हैं

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

यह कैसी बसंती पवन चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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