( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “दिन में तारे…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १९
कविता – दिन में तारे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
चाँद समझकर लाया जिसको, वो दिन में तारे दिखलाये
शीतल झील सी थीं जो आँखें, अब वो अंगारे बरसाये
=2=
तू-तू मैं-मैं खिट-पिट ताने, जब देखो लड़ने की ठाने
नख़रे एटीट्यूड खौफ़ से, मायके की नित धौंस दिखाए
=3=
फ़रमाइश उसकी बहुतेरी, शब्द-बाण उफ़ ज्यों रण-भेरी
ब्याह का लड्डू यारा हमने, खाये और बहुत पछताए
=4=
जो थी पहले आज्ञाकारी, नारी वही अब मुझ पर भारी
इस बेलनधारी की दहशत, से मुझको कोई बेल दिलाये
=5=
शाम को जाऊँ भटका-भूला, मिले सदा मुँह उसका फूला
फ़ौरन यह फ़रमान कि तुमने, धनिया-मिर्ची क्यों न लाए
=6=
सुकूँ भरी अब रैन नहीं है, घर-दफ़्तर में चैन नहीं है
मार्केट मॉल सिनेमा शॉपिंग, चलूँ संग थैला लटकाए
=7=
एक तो अपनी तनख़ा छोटी, ऊपर से ये इतनी मोटी
बोझ तले ‘राजेश’ बेचारा, दिन-ब-दिन क्यों न मुरझाये??
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – सबके भगवान तो एक ही हैं…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५५ ☆
☆ सबके भगवान तो एक ही हैं… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆
दुनियाँ है बड़ी बिखरी सी कड़ी, पर सबकी बनावट एक सी है
हर रोज छटा नई होती है पर धरती की सजावट एक सी है।।
जलथल नभ ताप पवन मौसम सारी दुनियाँ में एक से हैं
रोना गाना खुशियाँ औ गम, हर देश में सबके एक से हैं ।।
*
पूरब पश्चिम हो देश कोई इन्सान की सूरत एक सी है
गति मति रति चाल चलन जीवन की जरूरत एक सी है।।
दिन रात सुबह और शाम कहीं भी हों, सब होते एक से हैं
सब सूरज, चाँद सितारों के संग जगते और सोते एक से हैं।।
*
संसार में हर एक प्राणी की अपनी सक्रियता एक सी है
है साफ इसी से इस सारी दुनियाँ का रचियता एक ही है ।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अपेक्षा व उपेक्षा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०५ ☆
☆ अपेक्षा व उपेक्षा… ☆
‘अत्यधिक अपेक्षा मानव के जीवन को वास्तविक लक्ष्य से भ्रमित कर मानसिक रूप से दरिद्र बना देती है।’ महात्मा बुद्ध मन में पलने वाली अत्यधिक अपेक्षा की कामना को इच्छा की परिभाषा देते हैं। विलियम शेक्सपीयर के मतानुसार ‘अधिकतर लोगों के दु:ख एवं मानसिक अवसाद का कारण दूसरों से अत्यधिक अपेक्षा करना है। यह पारस्परिक रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।’ वास्तव में हमारे दु:ख व मानसिक तनाव हमारी ग़लत अपेक्षाओं के परिणाम होते हैं। सो! दूसरों से अपेक्षा करना हमारे दु:खों का मूल कारण होता है, जब हम दूसरों की सोच को अपने अनुसार बदलना चाहते हैं। यदि वे उससे सहमत नहीं होते, तो हम तनाव में आ जाते हैं और हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है; जो हमारे विघटन का मूल कारण बनता है। इससे पारिवारिक संबंधों में खटास आ जाती है और हमारे जीवन से शांति व आनंद सदा के लिए नदारद हो जाते हैं। सो! मानव को अपेक्षा दूसरों से नहीं; ख़ुद से रखनी चाहिए।
अपेक्षा व उपेक्षा एक सिक्के के दो पहलू हैं। यह दोनों हमें अवसाद के गहरे सागर में भटकने को छोड़ देते हैं और मानव उसमें डूबता-उतराता व हिचकोले खाता रहता है। उपेक्षा अर्थात् प्रतिपक्ष की भावनाओं की अवहेलना करना; उसकी ओर तवज्जो व अपेक्षित ध्यान न देना दिलों में दरार पैदा करने के लिए काफी है। यह सभी दु:खों का कारण है। अहंनिष्ठ मानव को अपने सम्मुख सब हेय नज़र आते हैं और इसीलिए पूरा समाज विखंडित हो जाता है।
मनुष्य इच्छाओं, अपेक्षाओं व कामनाओं का दास है तथा इनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता रहता है। अक्सर हम दूसरों से अधिक अपेक्षा व उम्मीद रखकर अपने मन की शांति व सुक़ून उनके आधीन कर देते हैं। अपेक्षा भिक्षाटन का दूसरा रूप है। हम उसके लिए कुछ करने के बदले में प्रतिदान की अपेक्षा रखते हैं और बदले में अपेक्षित उपहार न मिलने पर उसके चक्रव्यूह में फंस कर रह जाते हैं। वास्तव में यह एक सौदा है, जो हम भगवान से करने में भी संकोच नहीं करते। यदि मेरा अमुक कार्य सम्पन्न हो गया, तो मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा या तीर्थ-यात्रा कर उनके दर्शन करने जाऊंगा। उस स्थिति में हम भूल जाते हैं कि वह सृष्टि-नियंता सबका पालनहार है; उसे हमसे किसी वस्तु की दरक़ार नहीं। हम पारिवारिक संबंधों से अपेक्षा कर उनकी बलि चढ़ा देते हैं, जिसका प्रमाण हम अलगाव अथवा तलाक़ों की बढ़ती संख्या को देखकर लगा सकते हैं। पति-पत्नी की एक-दूसरे से अपेक्षाओं की पूर्ति ना होने के कारण उनमें अजनबीपन का एहसास इस क़दर हावी हो जाता है कि वे एक-दूसरे का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते और तलाक़ ले लेते हैं। परिणामत: बच्चों को एकांत की त्रासदी को झेलना पड़ता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हुए अपने-अपने हिस्से का दर्द महसूसते हैं, जो धीरे-धीरे लाइलाज हो जाता है। इसका मूल कारण अपेक्षा के साथ-साथ हमारा अहं है, जो हमें झुकने नहीं देता। एक अंतराल के पश्चात् हमारी मानसिक शांति समाप्त हो जाती है और हम अवसाद के शिकार हो जाते हैं।
मानव को अपेक्षा अथवा उम्मीद ख़ुद से करनी चाहिए, दूसरों से नहीं। यदि हम उम्मीद ख़ुद से रखते हैं, तो हम निरंतर प्रयासरत रहते हैं और स्वयं को लक्ष्य की पूर्ति हेतू झोंक देते हैं। हम असफलता प्राप्त होने पर भी निराश नहीं होते, बल्कि उसे सफलता की सीढ़ी स्वीकारते हैं। विवेकशील पुरुष अपेक्षा की उपेक्षा करके अपना जीवन जीता है। अपेक्षाओं का गुलाम होकर दूसरों से उम्मीद ना रखकर आत्मविश्वास से अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहता है। वास्तव में आत्मविश्वास आत्मनिर्भरता का सोपान है।
क्षमा से बढ़ कर और किसी बात में पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात्’ अर्थात् क्षमा सबसे बड़ा धन है, जो पाप को पुण्य में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। क्षमा अपेक्षा और उपेक्षा दोनों से बहुत ऊपर होती है। यह जीने का सर्वोत्तम अंदाज़ है। हमारे संतजन व सद्ग्रंथ इच्छाओं पर अंकुश लगाने की बात कहते हैं। जब हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेंगे, तो हमें किसी से अपेक्षा भी नहीं रहेगी और ना ही नकारात्मकता का हमारे जीवन में कोई स्थान होगा। नकारात्मकता का भाव हमारे मन में निराशा व दु:ख का सबब जगाता है और सकारात्मक दृष्टिकोण हमारे जीवन को सुख-शांति व आनंद से आप्लावित करता है। सो! हमें इन दोनों मन:स्थितियों से ऊपर उठना होगा, क्योंकि हम अपना सारा जीवन लगा कर भी आशाओं का पेट नहीं भर सकते। इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण व नज़रिए को बदलना होगा; चिंतन-मनन ही नहीं, मंथन करना होगा। वर्तमान स्थिति पर विभिन्न आयामों से दृष्टिपात करना होगा, ताकि हम अपनी संकीर्ण मनोवृत्तियों से ऊपर उठ सकें तथा अपेक्षा उपेक्षा के जंजाल से मुक्ति प्राप्त कर सकें। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहें तथा निराशा को अपने हृदय मंदिर में प्रवेश ने पाने दें तथा प्रभु कृपा की प्रतीक्षा नहीं, समीक्षा करें, क्योंकि परमात्मा हमें वह देता है, जो हमारे लिए हितकर होता है। सो! हमें उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला देनी चाहिए और सदा उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हमें हर घटना को एक नई सीख के रूप में लेना चाहिए, तभी हम मुक्तावस्था में रहते हुए जीते जी मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे। इस स्थिति में हम केवल अपने ही नहीं, दूसरों के जीवन को भी सुख-शांति व अलौकिक आनंद से भर सकेंगे। ‘संत पुरुष दूसरों को दु:खों से बचाने के लिए दु:ख सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने का हर उपक्रम करते हैं।’ बाल्मीकि जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। सो! अपेक्षा व उपेक्षा का त्याग कर जीवन जीएं। आपके जीवन में दु:ख भूले से भी दस्तक नहीं देगा। आपका मन सदा प्रभु नाम की मस्ती में खोया रहेगा–मैं और तुम का भेद समाप्त हो जाएगा और जीवन उत्सव बन जाएगा।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू…” ।)
☆ शेष कुशल # ५९ ☆
☆ व्यंग्य – “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू…”– शांतिलाल जैन ☆
यकीन मानिए भाईसाहब, अठारह लाख रूपए प्लस तीन साल के ब्याज का नुकसान हो गया अपन की फेमेली को. रीसेंटली भागीरथपुरे का पानी पी के मरे हैं अपन, मुआवज़ा मिला दो लाख. जो लोग तीन साल पहले मोरबी के पुल से गुजरते हुए मरे उनको मिला था बीस लाख. अठारह लाख का सीधासट्ट लॉस. पहले पता होता तो अपन भी यमराज को रिक्वेस्ट करके वहीं जा के मर लेते. वैसे भी तीन साल ज्यादा जी के कर क्या लिया अपन ने? घरवालों की जान खाते रहे, खाना खर्चा बढ़ाया सो अलग. यमदूत ने भाँप लिया कि मेरे मन में क्या चल रहा है. वह बोला – ‘जीवन की अवधि तय है शांतिबाबू. रिक्वेस्ट करके कुछ हफ़्तों-महीनों का एडजस्टमेंट हो भी जाता, मगर तीन साल पहले कैसे ले जाते हम तुम्हें?’
मैंने कहा – ‘तो फिर गुजरात के गंभीरा पुल के गिरने में ले जाना था. अभी जुलाई, 2025 में ही गिरा है. उधर मरनेवाले को छह लाख मिले. भले मोरबी से सत्तर परसेंट कम मिलता मगर वह भी इंदौर के से तो तीन सौ परसेंट ज्यादा ही होता. मिलने को तो एक करोड़ भी मिल सकते थे जो अपन एयर इंडिया के हादसे में अहमदाबाद में मरते.’
‘ये मुँह और मसूर की दाल!! मुंसीपाल्टी के बम्बे का पानी पीने वालों को मुआवज़े करोड़ों में नहीं मिला करते.’
‘अच्छा एक बात तो बताओ. जो लोग एयर इंडिया के हादसे में मरे उनको भी तुम इस पैसेंजर भैंसे पर ले कर गए थे!! उनके लिए वन्दे-भारत भैंसा एक्सप्रेस जैसी अलग से कोई वीआईपी फेसेलिटी नहीं है तुम्हारे पास, पीठ पर एसी फस्ट-क्लास कूपे टाइप लगा हुआ हो कुछ?’ – मैंने पूछा.
‘तुम्हारे निज़ाम की तरह हम जान जान की कीमत में अंतर नहीं किया करते, शांतिबाबू. इहलोक से आत्मा निकाल लेने के बाद हर जान का मोल एक बराबर है. आत्माएँ तो हम मुंबई की लोकल ट्रेन में लटककर मरने वालों की भी ले जाते हैं, कुपोषण से मरनेवालों की भी, बिहार की बाढ़ में बहकर मरनेवालों की भी, पूस की रात फुटपाथ पर ठण्ड से या जेठ कि दुपहरी में मजदूरी करते करते लू से मरनोंवालों की भी ले जाते हैं. कभी एक धेला मुआवज़ा भी मिला है इनमें से किसी को? तुम्हारे निज़ाम में ख़ामोश हादसों में मरनेवालों को मुआवज़े नहीं मिला करते. वे उन्हीं मामलों में मिला करते हैं जिनमें मिडिया में हो-हल्ला मच जाता है. जितना हल्ला ज्यादा उतना मुआवज़ा ज्यादा.’
कमाल का यमदूत था वो. आया परलोक से था मगर हमारे सिस्टम के बारे में हम से ज्यादा जानता था. उसी ने रेखांकित किया – ‘आर्यावर्त में मनुष्य की जिंदगी का मोल बस कुछेक लाख रुपए रह गया है. हर बड़ी आपदा के बाद अनुग्रह राशि पर घोषित कर के गंगा नहा लेता है शासन प्रशासन. जवाबदेही किसी की नहीं. निज़ाम है कि अपने मरे हुए नागरिकों की गिनती रुपयों में करता है.’
मैं क्या कहता!! बस इतना और पूछ लिया – ‘जो मुझे नरक अलॉट हुआ तो खाने पीने की बैवस्था कैसी रहेगी?’
‘बेफिक्र रहो. एक बार मर लिए हो, अब वहाँ कुपोषण से तो नहीं ही मरोगे और पानी भागीरथपुरे से ज्यादा साफ़ आएगा. कढ़ाई में, जिस तेल में तुम तले जाओगे शांतिबाबू, वो मिलावटी नहीं होगा. कभी सुने हो नरक के किसी स्कूल में मिड-डे मील खाकर पचास शिशु आत्माएँ अवधि पूरी होने से पहले ही गुजर गईं. नरक है तो क्या! हर मुलाज़िम की एक की जवाबदेही तय है. यमलोक का लॉ ऑफ़ टॉर्ट्स अर्यावार्त के क़ानून जितना लचर नहीं है. तुम्हारे देश में ऐसे हादसों के किसी जिम्मेदार ओहदेदार को सज़ा हुई है कभी?’
वह मुझे निरुत्तर करके अंतरिक्ष में प्रवेश कर गया.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – कैसे कहूं?)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – माँ के चरणों में भगवान… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८८ ☆
☆ कविता – माँ के चरणों में भगवान… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘अधीरता…‘।)
☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ३ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆
तुकारामांचे मन प्रपंचात, संसारात मुळीच रमत नाही. पांडुरंगाच्या भेटीची त्यांना तळमळ लागून राहिली आहे, म्हणूनच ते एकसारखे म्हणतात,
भेटी लागी जीवा लागलीसे आस
पाही रात्रंदिस वाट तुझी
परमेश्वर प्राप्तीच्या वेडाने
कन्या सासुरासी जाये। मागे परतुनी पाहे।
तैसे झाले माझ्या जीवा ।केव्हा भेटसी केशवा।।
जीवना वेगळी मासोळी तैसा तुका तळमळी. ।
तुकारामांची अवस्था पाण्याबाहेर तडफडणाऱ्या मासोळी सारखी झाली आहे. पांडुरंगाची कृपादृष्टी मिळवण्यासाठी आता काय करावे हा एकच विचार त्यांच्या मनात रात्रंदिवस घोळत आहे.
ते पांडुरंगाला साद घालतात आणि म्हणतात,
तान्हेल्याची धनी फिटे गंगा नव्हे उणी।
माझे मनोरथसिद्धी पाव भावे कृपानिधी।।
तू तो उदारांचा राणा माझी अल्पशी ।
कृपादृष्टी पाहे तुका म्हणे होई साहे ।
एखाद्या तहानलेल्या माणसाने गंगेतले पाणी पिऊन त्याचे समाधान झाले, तरी गंगेचे पाणी काही कमी होत नाही. माणूस मात्र तृप्त होतो. त्याचप्रमाणे हे कृपेच्या सागरा माझ्या मनातल्या इच्छा, माझे सर्व मनोरथ तूच पूर्ण करू शकतोस.
तुम्ही माझ्याकडे कृपादृष्टीने पहावे एवढीच माझी अल्पशी इच्छा आहे. माझ्या साधनेत मला मदत करा.
भक्ती मार्ग हा परमेश्वरा प्रती जाण्याचा सर्वात सोपा मार्ग आहे. बहुतेक सर्व साधुसंत याच मार्गाने गेले आहेत, कारण या मार्गात कुठेही आड वळणे नाहीत. भक्ती मार्गाची ही वाट अगदी स्वच्छ आहे.
संत तुकारामही याच मार्गाने जात आहेत.
ते साधकांना सांगतात,
नव्हतो सावचित्त तेणे अंतरले हित।
पडिला नामाचा विसर वाढविला संसार।।
लटक्याचे पुरी गेलो वाहूनिया दूरी।
तुका म्हणे नाव आम्हा सापडला भाव।।
ते स्वतः विषयी सांगतात की हरी चिंतनाविषयी सावध नव्हतो, म्हणून विघ्ने आली. हरी नामाचा विसर पडला आणि संसार वाढवत बसलो. मायेच्या पुरात पुरता अडकलो. परंतु आता जागा झालो आहे. हरिभक्तीची नौका सापडली आहे.
तेव्हा आता काय उणे आम्हा विठोबाचे पायी
नाही ऐसे काही तेथे एक
तुका म्हणे मोक्ष विठोबाचे गावी
फुकाची लुटावी भांडारे ती
पांडुरंगाच्या गावाला मोक्षाची भांडारे भरलेली आहेत आणि भक्तांना ती अगदी मोफत आता लुटता येतात.
तुकाराम महाराज या मायामोहातून, प्रपंचातून मुक्त होऊन पांडुरंगाशी एकरूप होण्यासाठी पंढरीच्या पांडुरंगाच्या चरणावर माथा ठेवण्यासाठी आतुर झाले आहेत. अतिशय व्याकुळ झाले आहेत. ते म्हणतात, ” पांडुरंगा तू मला फक्त भेट दे”. त्यासाठी…
*नलगे हे तुझे ब्रह्मज्ञान। गोजिरे सगुण रूप पुरे।।
लागला उशिर।पतित पावन ।विसरूनी वचन। गेलास या।।*
जाळूनी संसार। बसला अंगणी ।तुझे नाही मनी ।मानसी हे।।
तुका म्हणे नको राग रागेजू विठ्ठला। उठी पावतात देई मला भेटी आता।।
या अभंगातूनही विठ्ठलाच्या भेटीची तुकाराम महाराजांना लागलेली तळमळच दिसून येते. या अभंगात वापरलेला रागेजू हा शब्द मला विशेष लक्षणीय वाटला. लहान मूल जसे लडिवाळपणे त्याच्या मातेकडे काही हट्ट करते, त्याचप्रमाणे तुकाराम महाराज या माऊलीला रागावू नकोस असे मोठ्या लडिवाळपणे सांगत आहेत.
संसारातून तुकाराम महाराजांना पूर्ण विरक्ती आलेली आहे. पंचेंद्रियांवर ताबा मिळवलेला आहे, आणि ते पांडुरंगाला म्हणतात,
संसार हा तीही केला पाठमोरा
नाही द्रव्यदारा जया चित्ती
शुभाशुभ नाही हर्षामर्श अंगी
जनार्दन जगी होऊनी ठेला
तुका म्हणे दिला देह एकसरे
जयासी दुसरे नाही मग
त्यांना आता मान मरातब काही नको. त्यात त्यांना थोडेही सुख वाटत नाही. गोड अन्न सुद्धा त्यांना विष समान वाटत आहे. कोणी त्यांची स्तुती केली तर त्यांचा जीव कासावीस होतो.
ते म्हणतात,
नको मृगजळा होऊ मज
तुका म्हणे आता करी माझे हित
काढावे जळत्या आगीतून.
हा संसार म्हणजे त्यांना जळती आग वाटत आहे.
तुकाराम महाराजांच्या प्रत्येक शब्दातून त्यांची विठ्ठल भक्तीची आणि विठ्ठलाच्या भेटीची तळमळ दिसून येते
☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ३६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले☆
।। श्री नारद उवाच ।।
नारद भक्ती सूत्र क्र. ३६
अव्यावृत भजनात् ॥ ३६ ॥
अर्थ :(ते भक्तिसाधन) अव्यावृत्त – अखंड भजनाने (सिद्ध होते.)
विवरण : मागील सूत्रात विषयत्याग व संगत्याग हे साधन सांगितले. आता या सूत्रात ती भक्ती सिद्ध होण्याचे ‘अव्यावृत भजन’ हे साधन सांगतात. भजन हे प्रसिद्ध साधन आहे. सर्वच भाविक कोणत्या ना कोणत्या प्रकारे भजन करीतच असतात. पण ते भजन अनन्यभक्ती निर्माण करीलच असे नाही.
भजन हे भक्तीचे महत्त्वाचे अंग आहे पण ते अव्यावृत-अखंड-झाले पाहिजे. भजनात खंड पडण्याची देहभोगप्रवृत्ती, विषयवासना, विकाराधीनता, अश्रद्धा इत्यादी अनेक कारणे असतात, ती दूर करून पूर्ण भावनेने ते भजन झाले पाहिजे.
आपल्याकडे खास करून भक्तिमार्गात अखंड अनुसंधानाचे महत्त्व सांगितले आहे. अखंडित नामस्मरण हा त्यातल्या त्यात सोपा मार्ग.
समर्थ आपल्या दासबोधाच्या चौथ्या दशकातील तिसऱ्या समासात याचे पुढील प्रमाणे वर्णन करतात.
*स्मरण देवाचें करावें । अखंड नाम जपत जावें । नामस्मरणें पावावें । समाधान ॥ २॥ नित्य नेम प्रातःकाळीं । माध्यानकाळीं सायंकाळीं । नामस्मरण सर्वकाळीं । करीत जावें ॥ ३॥ सुख दुःख उद्वेग चिंता । अथवा आनंदरूप असतां । नामस्मरणेंविण सर्वथा । राहोंच नये ॥ ४॥ हरुषकाळीं विषमकाळीं । पर्वकाळीं प्रस्तावकाळीं । विश्रांतिकाळीं निद्राकाळीं |नामस्मरण करावें ॥ ५॥ कोडें सांकडें संकट । नाना संसारखटपट । आवस्ता लागतां चटपट । नामस्मरण करावें ॥ ६॥ चालतां बोलतां धंदा करितां । खातां जेवितां सुखी होतां । नाना उपभोग भोगितां । नाम विसरों नये ॥ ७|| संपत्ती अथवा विपत्ती । जैसी पडेल काळगती । नामस्मरणाची स्थिती । सांडूंच नये ॥ ८॥ वैभव सामर्थ्य आणी सत्ता । नाना पदार्थ चालतां ।उत्कट भाग्यश्री भोगितां । नामस्मरण सांडूं नये ॥ ९॥ आधीं आवदसा मग दसा । अथवा दसेउपरी आवदसा । प्रसंग असो भलतैसा । परंतु नाम सोडूं नये ॥ १०॥”*
*इथे भजन याचा व्यापक अर्थ अभिप्रेत असावा. टाळ, मृदुंग घेऊन २४ तास कीर्तन करणे इतका प्राथमिक अर्थ इथे नक्कीच नसावा. अंतर्मनात सतत सद्गुरूंनी दिलेल्या नामाचे स्मरण होणे, आणि त्याची एक धून, एक नाद सतत मनात गुंजत रहाणे, बाहेरून कर्म करीत असताना जसा मनुष्य श्वासोश्वास करीतच असतो, त्याप्रमाणे हा नामाचा नाद गुंजत रहाणे म्हणजे अखंड भजन. *
अशा अखंड भजनानेच खरी प्रेमभक्ती उत्पन्न होते. ध्रुव-प्रल्हादादिकानी अव्यावृत भजनच केले. ‘भजनं-भक्ति. ‘ भजन म्हणजेच भक्ती असा भजन शब्दाचा अर्थ आहे. पण ‘तुका म्हणे नाम । मागे मागे धावे प्रेम ।’ असे श्रीतुकाराममहाराज म्हणतात. अंतःकरणात गुणकामनारहित परमप्रेम एकदम सहजासहजी उत्पन्न होणे कठीण आहे. ती भक्ती या अखंड भजनाने उत्पन्न होते ‘आई आई’ या नावाने हाका मारतामारताच बालकाच्या ठिकाणी मातृप्रेम वृद्धिंगत होत असते.
श्रीकृष्ण म्हणतात, हे पार्था, जे भक्त विषयांना तिलांजली देऊन म्हणजे विषयांवर पाणी सोडून, सवासना विषयत्याग करून, यावत् प्रवृत्ती म्हणजे व्यवहाराचा निरोध करून मला अंतःकरणात साठवून माझ्या स्वरूपाचा भोग घेतात, त्यांचे माझ्या स्वरूपाचा कितीही भोग घेतला तरी समाधान होत नाही, ‘ जास्त काय, ‘भूक, तहान याचा त्यांना पत्ता नसतो. तेथे डोळे इत्यादी इंद्रियाकडे कोण पाहील? ‘ असा वरील ओव्याचा आशय आहे. व्यावृत म्हणजे तेथून परतणे. भजन करता करता कोणत्याही अन्य कारणाने भजनापासून परत न फिरणे.
श्रीभानुदासमहाराज सांगतात –
*”जैं आकाश वर पडों पाहे । ब्रह्मागोळ भंगा जाये । वडवानळ त्रिभुवन खाये । तरी तुझीच वाट पाहें गा विठोबा ॥०१॥ न करी आणिकांचा पांगिला । नामधारक तुझाचि अंकिला ॥०२॥ सप्त सागर एकवट होती । जैं हे विरुनी जाय क्षिती । पंचमहाभुतें प्रलय पावती । परि मी तुझाचि सांगातीं गा विठोबा ॥०३॥ भलतैसें वरपडों भारी । नाम न संडों टळों निर्धारी । जैसी पतिव्रता प्राणेश्वरी । विनवी भानुदास म्हणे अवधारी गा विठोबा ॥०४॥”*
(अभंग क्रमांक ५७)
अशी असिधारा भक्ति करता आली तर भगवंत दूर नाही. माउली आपल्या हरिपाठात सांगतात,