हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – छोटे ही बने रहना…!
☆ ॥ कविता॥ – छोटे ही बने रहना…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “मूंछें, पुलिस और रौब”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १९ ☆
☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूंछें, पुलिस और रौब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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यदि कोई पुलिस वाला किसी गुंडे, बदमाश अथवा शरीफ आदमी के साथ गाली – गलौच या मारपीट करके उसकी इज्जत रूपी नाक काट लेता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि यह तो रोजमर्रा की बात है, किंतु यदि कोई व्यक्ति किसी हवलदार को चेलेंज करके उसकी मूंछें काट कर उसे मुछमुंडा बना दे तो यह न केवल मूंछों की हानि उठाने वाले उस पुलिसिया के लिए वरन पूरे विभाग के लिये शर्म से डूब मरने वाली घोर आश्चर्य की बात होगी।
एक बार ऐसी ही एक घटना किसी थाने के प्रधान आरक्षक के साथ घटी। बताया गया कि आरक्षक को वहीं के एक व्यक्ति ने चेलेंज किया कि वह आरक्षक की मूंछें काट लेगा और आखिर रात के दो बजे उस व्यक्ति ने हवलदार साहब को “क्लीनशेव” कर दिया। यह पता नहीं चला कि इतना सब होने के बाद भी पुलिस ने उस दुस्साहसी का क्या किया ?
पुलिस विभाग का गहराई से निरीक्षण करने पर ऐसा समझ में आता है कि इस विभाग के लोगों को मूंछों से बड़ा लगाव है। 95 प्रतिशत पुलिसिया मूंछधारी होते हैं। जितने आकार प्रकार की मूंछें दुनिया में हो सकती हैं सभी इस विभाग के लोगों में पाई जाती हैं। तलवार से भाला कट तक और मक्खी से तितली के आकार तक की मूंछों को आप विभिन्न पुलिसियों के चेहरों पर शान से जमे देख सकते हैं।
लोगों का ऐसा सोचना है कि मूंछों से चेहरे पर कठोरता आती है, रौब मैं वृद्धि होती है, चेहरा मर्दाना मालूम होने लगता है। पुलिस को इन सभी की आवश्यकता होती है जो वे मूंछ उगाकर ग्रहण करते हैं। बड़ी – बड़ी मूंछें रख कर बहुत से कमजोर, डरपोक और पिद्दी टाइप के पुलिसिया भी लोगों पर रौब जमाने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी मूंछें देखकर ही लोग समझ जाते हैं कि यह पुलिस वाला है इससे दूर ही रहो। अब आप ही अंदाज लगाएं कि पुलिस की नौकरी और मूंछों का कैसा सम्बंध है। मूंछें पुलिस वालों की पहचान बन गई हैं, जिस पुलिस वाले की जितनी बड़ी मूंछें वह उतना ही दबंग, जांबाज माना जाता है। चावल में कंकड़ों की भांति पुलिस विभाग में भी कुछ मुछमुंडे पाए जाते हैं, किंतु उनके चेहरों में वो बात नहीं होती जो मूंछ वालों के चेहरों पर होती है।
पुलिस विभाग में मूंछों की लोकप्रियता और महत्व देखते हुए मेरे हिसाब से तो इसे पुलिस वालों के लिए आवश्यक करार दे दिया जाना चाहिए। बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिस तरह इस विभाग में प्रवेश के लिए लम्बाई, सीना और वजन की न्यूनतम माप निर्धारित है उसी तरह मूंछों की भी न्यूनतम लम्बाई – चौड़ाई निर्धारित कर दी जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि इस कदम से अवश्य ही अपराधों की संख्या में कमी आएगी। जब मूंछें पुलिस का खौफ बढ़ाएंगी तो अपराधियों के हौसलों का पस्त होना स्वाभाविक ही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले तो पुलिस विभाग में मूंछ मेंटेनेंस भत्ता भी मिला करता था।
हां, एक परेशानी उस समय अवश्य पैदा हो सकती है जब मूंछ धारी पुलिस वालों के रौब से बचने अथवा उन पर अपना रौब कायम करने के लिए गुंडा तत्व भी उसी टक्कर की अथवा उनसे बड़ी मूंछें रखने लगें, फिर मूंछों में “कॉम्पटीशन” पैदा हो जाएगा। अस्तु, इस स्थिति में ऐसा कोई नियम भी बनाया जाना आवश्यक हो जाएगा जिससे आम आदमी की मूंछें पुलिस वालों की मूंछों से टक्कर न ले सकें। कहने का अर्थ यह कि आम जनता की मूंछों का आकर प्रकार भी निर्धारित करना होगा।
खैर यह तो एक ऐसी बात है कि जिस पर तरह – तरह से विचार किया जा सकता है। अब बात उठ गई है तो लोग इस पर सोचेंगे भी, सुधार भी करेंगे। समस्या उन बेचारे पुलिस वालों की होगी जिनकी मूंछें ऊगती ही न हों अथवा बिरली हों। ऐसी दशा में एक मात्र सहारा नकली मूंछें लगाने का ही बचेगा, किन्तु नकली मूंछें लगाना भी आज की स्थिति में कहां तक उचित होगा विचारणीय है। जब एक पुलिस वाला एक साधारण से आदमी से अपनी असली मूंछें कटवा चुका हो तब नकली मूंछों से बनी इज्जत का कहां तक भरोसा किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि अब पुलिस विभाग में पर्याप्त संख्या में महिलाएं भी आ गई हैं और आती जा रही हैं। महिलाओं के मूंछें नहीं होतीं और न ही उगाई जा सकती हैं अतः महिला पुलिस कर्मियों को लेकर मूंछों के प्रसंग पर बात करना व्यर्थ है। हां, बात खतम करते – करते इतना अवश्य कह दूं कि बिन मूंछों की महिलाओं के सामने बड़ी – बड़ी मूंछों वाले भी झुकते देखे गए हैं। चाहे वे गुंडे – बदमाश हों या मंत्री – संतरी। अतः विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि महिलाएं पुलिस विभाग में मूंछें न होने के बाद भी उतनी ही सफल होंगी जितना सफल कोई मर्द बड़ी – बड़ी मूंछों के सहारे भी नहीं हो सकता।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मुश्किल है…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना…‘।)
☆ कविता – मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘बहती गंगा में हाथ धोने वाले‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१२ ☆
☆ व्यंग्य ☆ बहती गंगा में हाथ धोने वाले ☆
देशभक्त कई किसिम के होते हैं। पहली किस्म के देशभक्त वे होते हैं जिनके दिल में देशभक्ति स्वाभाविक रूप से पैवस्त रहती है। उन्हें उसे याद नहीं करना पड़ता, न ही उसे बार-बार जगाना पड़ता है। वे अंग्रेज़ी कहावत के अनुसार अपनी देशभक्ति अपनी आस्तीन पर टांग कर प्रदर्शित नहीं करते।
दूसरी तरह के लोग वे होते हैं जिनकी देशभक्ति तभी जागती है जब देशभक्ति दिखाने से कुछ प्राप्ति की संभावना होती है। सूखी देशभक्ति से क्या फायदा? ऐसे ही लोग देशभक्ति के प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरते हैं, देशभक्ति के नाम पर बवाल काटने को तैयार रहते हैं। ऐसे देशभक्त असली देशभक्तों का जीना मुहाल किये रहते हैं।
एक किस्म की देशभक्ति राजनीतिज्ञों की होती है। ये देश की सेवा के नाम पर बार-बार दल बदलते हैं। याद रखना मुश्किल होता है कि वे कौन-कौन से घाट का पानी पीकर आये हैं। कइयों को खुद भी याद नहीं होगा कि उन्होंने कितनी पार्टियां बदली हैं। सब कुछ देश की सेवा की दुहाई देकर होता है। देश की सेवा के लिए ये बेचारे अपने उसूल तृणवत त्याग देते हैं, ज़बान बदल देते हैं, अंतरात्मा का गला घोंट देते हैं।
बहुत से लोगों की देशभक्ति मौसम के हिसाब से बदलती है। सत्ता बदलने के साथ सत्ता की नीतियां बदलती हैं। बहुत से होशियार लोग इन्हें पढ़ते और गुनते हैं, और फिर उनको दुहने के लिए देशभक्ति का झंडा लेकर मैदान में उतर आते हैं। बहुत से लेखक और फिल्मकार यही करते हैं। इनकी देशभक्ति लाभ की संभावना के हिसाब से बढ़ती घटती है। ये मौके पर चौका लगाने वाले चतुर लोग होते हैं। जब अटल जी प्रधानमंत्री थे तब उनकी कविताओं के बहुत से गायक और प्रशंसक पैदा हो गये थे। उनके पद से हटते ही ये गायक भी ग़ायब हो गये थे। लालू यादव के एक प्रशंसक ने उन पर ‘लालू चालीसा’ लिखी थी। पुरस्कार- स्वरूप कवि जी राज्यसभा में सीट पा गये थे।
अभी चतुर लेखक सत्ता के ताकतवर लोगों पर पुस्तकें लिख रहे हैं और पर्याप्त प्रचार के साथ उनका विमोचन करा रहे हैं ताकि संदेश सही जगह पहुंच जाए और कृपा के द्वार खुल जाएं। राजाओं के ज़माने में यह काम भाट और चारण करते थे। कुछ फिल्मकार हैं जिन्हें सोते-सोते अचानक याद आता है कि देश में बहुत ज़ुल्म हुए हैं और उन पर किसी ज़िम्मेदार फिल्मकार ने फिल्म नहीं बनायी। सत्तर अस्सी साल पीछे तक दौड़ लगती है, पुराने कागज़-पत्र खंगाले जाते हैं, और साबित किया जाता है कि एक समुदाय ने दूसरे पर कितनी क्रूरता की है। नमक-मिर्च का भरपूर उपयोग होता है। भावनाओं की नदियां बहती हैं। कोशिश होती है कि उत्पीड़ित बताया गया समुदाय भीड़ों की शक्ल में सिनेमाघरों पर टूटे और सिनेमा- खिड़की पर चांदी बरसे। ऐसी फिल्मों को सत्ता का आशीर्वाद मिलता है, उन्हें मनोरंजन-कर से मुक्त किया जाता है। इसलिए खोज-खोज कर ऐसी घटनाओं पर फिल्में बनायी जा रही हैं।
यह मायने नहीं रखता कि इससे कितना आपसी सौहार्द्र बिगड़ता है, कितनी उत्तेजना फैलती है, कितना वैमनस्य होता है, आम आदमी की कितनी फजीहत होती है। फिल्मकार के लिए ये बातें निरर्थक होती हैं। वह ‘मिशन मोड’ में होता है। सच्चाई पर से पर्दा उठाना है, चाहे जो परिणाम हो। इस क्रम में गुज़रे वक्त के नेताओं को कठघरे में खड़ा किया जाता है, उनका मान-मर्दन होता है। नेताओं के लिए ये फिल्में लाभदायक होती हैं क्योंकि इनसे समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है और वे गोलबंद होते हैं।
इन फिल्मकारों से पूछा जाता है कि वे दूसरे समुदाय के द्वारा किये गए ज़ुल्म और अन्याय पर फिल्म क्यों नहीं बनाते। जवाब मिलता है कि हर घटना पर फिल्म बनाने का ठेका हमीं ने नहीं ले रखा है। अन्य घटनाओं पर फिल्म अन्य फिल्मकारों को बनाना चाहिए। संदेश साफ है कि समझदार लोग वहीं हाथ डालेंगे जहां कुछ शहद मिलने की संभावना हो।
गनीमत यही है कि इस देश का आम आदमी शांतिप्रिय और धर्मनिरपेक्ष है और इसीलिए वह प्रोपेगंडा फिल्मों से प्रभावित नहीं होता। इन फिल्मों की कमाई के आंकड़ों से यह सिद्ध होता है। आम जनता को अच्छे कथानक और अच्छे अभिनय वाली फिल्में ही लुभाती हैं।
सत्ता के मिजाज़ के अनुसार रंग बदलने वाले और ‘जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी दीजे’ के सिद्धांत पर चलने वाले होशियार लोग हर युग में रहे हैं और हमेशा फलते-फूलते रहते हैं। डार्विन के सिद्धांत के अनुसार इनका ‘सर्वाइवल’ निश्चित है क्योंकि ये हर युग में ‘फ़िटेस्ट’ साबित होते हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– आत्म कथ्य…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८४ — आत्म कथ्य —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मैं अपनी इस उम्र तक विद्वानों की अपेक्षा ग्रामीण अशिक्षितों के बीच अधिक रहा हूँ। उनसे मिली हुई भाषा मेरे लेखन की आत्मा है। मैं जानता हूँ उनके मुहावरे मैं आधे ही समेट पाया हूँ। उनका रोदन हो, हँसी हो मैंने तो उनसे पूछ पूछ कर लिया है। मेरा एक अनपढ़ मित्र कहता था सब ले कर अचार बनाओगे क्या? वह न जानता अपने इस प्रश्न से उसने मुझे तो एक मुहावरा दे दिया। मैंने यह बड़े चाव से लिखा है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३१२ ☆ साक्षात्कार…
शाम का धुँधलका घिर रहा है। बालकनी में खड़ा सड़क की दूसरी ओर का दृश्य निहार रहा हूँ। यह क्षेत्र पेड़ों से भरा हुआ है। घर लौटते पंछियों की चहचहाट से वातावरण गुंजायमान है।
देखता हूँ कि सुदूर आकाश में दो पंछी काफी ऊँचाई पर पंख फैलाये, धीमी गति से उड़ रहे हैं। उनमें से एक धीरे-धीरे नीचे की ओर आ रहा है। नीचे आने की प्रक्रिया में पेड़ के पीछे की ओर जाकर विलुप्त हो गया। संभवत: कोई घोंसला उसकी प्रतीक्षा में है। दूसरा दूर और दूर जा रहा है, निरंतर आकाश की ओर। थोड़े समय बाद आँखों को केवल आकाश दिख रहा है।
जीवन भी कुछ ऐसा ही है। घोंसला मिलना, जगत मिलना। जगत मिलना, जन्म पाना। आकाश में ओझल होना, प्रयाण पर निकलना। प्रयाण पर निकलना, काल के गाल में समाना।
प्रकृति को निहारो, हर क्षण जन्म है। प्रकृति को निहारो, हर क्षण मरण है। प्रकृति है सो पंचमहाभूत हैं। पंचमहाभूत हैं सो जन्म है।
प्रकृति है सो पंचतत्वों में विलीन होना है, पंचतत्वों में विलीन होना है सो मरण है। प्रकृति है सो पंचेंद्रियों के माध्यम से जीवनरस का पान है। जीवनरस का पान है सो जीवन का वरदान है। जन्म का पथ है प्रकृति, जीवन का रथ है प्रकृति, मृत्यु का सत्य है प्रकृति।
प्रकृति जन्म, परण, मरण है। जन्म, परण, मरण, जीव की गति के अलग-अलग भेष हैं। जन्म, परण, मरण ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश,त्रिदेव हैं। प्रकृति त्रिदेव है। सहजता से त्रिदेव के साक्षात दर्शन कर सकते हो।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सामयिक गीत – पुरुष दिवस।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५७ ☆
☆ सामयिक गीत – पुरुष दिवस☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆ लघुकथा ☆ 🇮🇳 जय हिंद की सेना 🇮🇳 ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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( लघुकथा )
बिटिया बिलख बिलख कर रोये जा रही थी। जबसे शहीद पिता के शव के गांव पहुंचने की खबर मिली, उसके आंसू थमने के नाम ही नही ले रहे थे।
मां का तो और भी बुरा हाल था। वह दहाड़े मारकर जमीन पर लोटलोट कर रो रही थी। उसके जीवन की गाड़ी थम गई थी। चूड़ियों के खनक गुम हो गयी थी।
पिछले महीने हवलदार जगदेव जब छुट्टी में गाँव आये थे तो अपनी घरइतीन सुखमणि से अपनी एकलौती बिटिया के हाथ पीले करने की चिंता, और उसके लिए एक सुयोग्य वर ढूंढने की बात करते-करते उनकी पूरी रात गुजर गई थी। अपने माई और बाबूजी के बीच हुई चर्चा को, सुमन ने जब से सुना न जाने क्यों उसके दिल में उसके सपनो के राजकुमार के आने की धमक सुनाई देने लगी थी।
लेकिन आज सब कुछ शांत था। न किसी पति-पत्नी के मध्य कोई चर्चा थी न किसी बेटी के दिल में किसी के आने की धमक थी। बस था तो सिर्फ सिर्फ एक कारूणिक मंजर, जहां एक शहीद का शव एक तख़्त पर लिटाया गया था। गांव के हर एक व्यक्ति की आंखों में उस शहीद का चेहरा चमक रहा था लेकिन खुली आंखों से देखने के शव के साथ उसका चेहरा मौजूद नहीं था।
सेना की टुकड़ी के द्वारा मातमी धुन बजायी जा रही थी। बंदूको से सलामी दिए जाने की रस्म पूरी हुई तो सुमन ने रोते रोते अंजुली भर फूल पिता के चरणों में रख दिए।
शव को अपने साथ ले आने वाले कैप्टन राघवेंद्र यह सब कुछ देख रहे थे। भीड़ में खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने जब रोते -रोते यह कहा कि अब जगदेव की बिटिया के लिए वर कौन ढूढ़ेगा। उसके हाथ पीले कब होंगे, बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र के मन में करुणा और मानवता के बादल उमड़ने लगे। सुमन अपने पिता के शव को देखकर दहाड़े मारकर रो रही थी और बेहोश हुए जा रही थी। एक बार तो ऐसा लगा कि सुमन पूरी तरह से बेहोश होकर जमीन पर गिर जाएगी लेकिन बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र ने उसका हाथ थाम लिया। बेहोश सुमन को कैप्टन के मजबूत बाहों ने जमीन पर गिरने से रोक लिया।
कैप्टन राघवेंद्र के दिल में उमड रहे मानवता और करुणा के बादल शांत नदी के नीर के रूप में बदल गए थे। यहां से उनके मन में चिंतन प्रारंभ हो गया था।
इस दर्दनाक घटना के बीते कई महीने गुजर गए। आज बहुत दिनों बाद शहीद हवलदार जगदेव के घर पर मातमी धुन की जगह शुभ मंगल शहनाई की धुन बज रही थी। बरात शहीद के घर की तरफ पहुंची, तो भीड़ में खड़ा हर कोई व्यक्ति दूल्हे के चेहरे को देखना चाहता था।
पर यह क्या !! आज गाँव का हर कोई यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित और खुशी से झूम रहा था जब कैप्टन राघवेंद्र फौजी वर्दी में नहीं बल्कि दूल्हे के वेश में सुमन का हाथ था में जयमाल मंडप की तरफ बढ़ रहे थे।
लोगो ने जब अपनी स्मृतियों को खंघाला तो उन्हें बीते दिनों का वह दृश्य दिखाई दे रहा था, जब दूल्हे के वेश में खड़े इस नौजवान ने फौजी के वेश में बेहोश होकर जमीन पर गिर रही सुमन का हाथ थामा था।
बटालियन की वही टुकड़ी आज एक बार फिर शहीद हवलदार जगदेव के दरवाजे पर बाराती के भेषभूषा में खड़ी थी। लाल जोड़े में सजी सुमन ने कैप्टन राघवेंद्र के गले में वरमाला डाला तो कैप्टन राघवेंद्र ने एक जयमाला सुमन को भी पहना दिया। हवलदार जगदेव के दरवाजे पर खड़ी भीड़ ने भारत माता की जय के उद्घोष के साथ फूलों की वर्षा की तो कैप्टन राघवेंद्र और सुमन ने भी शहीद हवलदार जगदेव के चित्र पर पुष्पांजलि की। शहनाई की धुन बज रही थी। प्रत्येक दिशाओं में मंगल मंगल हो रहा था और एक अनोखा दृश्य उभर कर आ रहा था।
भारतीय सेना के एक जवान ने आज सीमा पर नहीं बल्कि समाज के बीच एक अलग मिसाल पेश करते हुए, सबका दिल जीत लिया था। सबकी नज़रें नम थी और सभी कैप्टन राघवेंद्र को हृदय से बधाई दे रहे थे।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१३ ☆ श्री सुरेश पटवा
लेह के आसपास
02 जुलाई 2022 को नाश्ता करने के बाद लेह के आसपास भ्रमण को निकले। होटल में पता चला कि जयपुर से आये पर्यटकों को आक्सीजन की कमी के कारण साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है। लेह समुद्र तल से तक़रीबन 12,000 फुट ऊँचाई पर है। अब हमें 13,000 फुट पर जाना था। हमने पेपर नैप्किन में कपूर की एक-एक गोली रखकर सभी साथियों को इस निर्देश के साथ पकड़ा दी कि वे इसे थोड़ी-थोड़ी देर में सूंघते रहें। इससे उन्हें घुमावदार चढ़ाई वाले रास्तों पर मितली की परेशानी नहीं होगी और आक्सीजन की कमी भी न होगी। जब भी किसी स्थान के विभिन्न पर्यटन केंद्रों पर घूमने जाना हो तो टैक्सी वाले एक तरीक़ा अपनाते हैं कि सबसे नज़दीक के स्थलों पर पर्यटकों का अधिक समय खर्च कराने की जुगत में रहते हैं। लंच तक उसी स्थान के आसपास तीन बज जाएँ और इतने थक जाएँ कि लम्बी दूरी के स्थान पर जाने लायक़ न रहें या जाने को अनिछुक हो जायें। हमने टैक्सी चालक को लेह से सत्तर किलोमीटर दूरी पर स्थित अलची गोम्पा स्थल पर सबसे पहले चलने को कहा। थोड़ी आनाकानी के बाद वह सहमत हो गया। उसने गाड़ी में डीज़ल भरवा लिया।
लिकिर गोंपा
वाहन तेज गति से लेह-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 01 पर चल पड़ा। सबसे पहले 52 किलोमीटर पर हमारा पड़ाव लिकिर गोंपा था। यह लेह के पश्चिम में 3700 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी पहाड़ी पर सुरम्य रूप से स्थित है। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग्पा संप्रदाय द्वारा लद्दाख के पांचवें राजा, ल्हाचेन ग्यालपो (ल्हा-चेन-रग्याल-पो) की कमान के तहत 1065 में लामा दुवांग चोसजे ने स्थापित किया गया था। वर्तमान में लगभग 120 बौद्ध भिक्षु इस मठ में रहकर साधना करते और धर्म चक्र प्रवर्तित करते हैं। यहाँ लगभग तीस छात्रों वाला एक स्कूल है। जिसमें बौद्ध धर्म सम्बन्धी शिक्षा तीन भाषाओं, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी में प्रदान की जाती है। इसे केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान चलाता है।
मठ में दो सभा मंडप हैं, जिन्हें दुखांग के नाम से जाना जाता है। जीवन सतत दुख का अंग है। उससे मुक्त होने के लिए निर्वाण सुखांग है। दुखांग में बोधिसत्व (जिसने सत्य जान लिया है), अमिताभ (जिसकी अमिट आभा है) शाक्यमुनि ( शाक्यों में जो मुनि है), मैत्रेय (भविष्य के बौद्ध) और पीली टोपी संप्रदाय के संस्थापक त्सोंग खापा की बड़ी मूर्तियाँ हैं। एक केंद्रीय प्रांगण के दाईं ओर ध्यान केंद्र स्थित है जिसमें सात-सात लामाओं के बैठने की छह पंक्तियाँ और लिकिर के प्रमुख लामा के लिए एक सिंहासन है।
मठ में एक संग्रहालय है जिसमें पुरानी पांडुलिपियों का भंडार है। उल्लेखनीय थंका पेंटिंग संग्रह और पुरानी वेशभूषा और मिट्टी के बर्तन हैं। छत पर बैठे मैत्रेय की 75 फीट ऊंची सुनहरे रंग की मूर्ति है। यह बुद्ध मूर्ति 1999 में बनकर तैयार हुई है। बाईं दीवार में 35 इकबालिया बुद्धों के चित्र हैं, जबकि दाहिनी दीवार में शाक्यमुनि की एक छवि है। एक सीढ़ी हॉल से बाहर निकलती है, जो प्रमुख लामा का कमरा ज़िनचुन की ओर जाती है। जिसमें मुख्य रूप से थंका और लामाओं की छवियां और अवलोकितेश्वर की पत्नी तारा की अभिव्यक्तियाँ हैं।
हमारा समूह दो भागों में बँट गया। इस कारण से ज़रूरत से अधिक समय इस मठ में व्यतीत हुआ। हमें आज दस पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना था इसलिए सभी को समूह में साथ रहने और प्रत्येक स्थल पर समय निर्धारण करने की हिदायत दी गई।
अलची गोम्पा
अगला पड़ाव सिंधु नदी के दक्षिण तट पर 3,100 मीटर (10,200 फीट) की ऊंचाई पर लेह से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अलची मठ है। सिंधु नदी की सहायक नदियों के किनारे बीस किलोमीटर चलकर अलची गोम्पा पहुँचे। गोम्पा या गोम्बा या गोन्पा तिब्बती शैली में बने एक प्रकार के बौद्ध-मठ के भवन या भवनों के समूह को कहते हैं। तिब्बत, भूटान, नेपाल और लद्दाख़, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश क्षेत्रों में कई स्थानों पर गोम्पा बने हैं।
अलची गोम्पा को लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के तहत संचालित लेह जिले के अलची गांव में मंदिरों के मठ परिसर (चोस-खोर) के रूप में जाना जाता है। इस परिसर में निचले लद्दाख क्षेत्र के अलची गांव में चार अलग-अलग बस्तियां हैं। जिनमें विभिन्न अवधियों के स्मारक हैं। इन चार बस्तियों में लिकिर मठ द्वारा प्रशासित अलची गोम्पा सबसे पुराना और सबसे प्रसिद्ध कहा जाता है।
अलची परिसर के निर्माण का श्रेय 10 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध विद्वान-अनुवादक रिनचेन ज़ंगपो (958-1055) को दिया जाता है, साथ ही लामायुरु मठ, वानला, मांग-ग्यू और सुमदा का नाम भी उनके नाम के साथ जुड़ा है। दसवीं शताब्दी के दौरान, गुगे के तिब्बती लामा-राजा येशे- Ö ने ट्रांस हिमालय क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए 21 विद्वानों को क्षेत्र आवंटित करके मठ निर्माण की पहल की थी। हालांकि, कठोर जलवायु और विषम स्थलाकृतिक परिस्थितियों के कारण, केवल दो ही जीवित रहे, उनमें से एक सम्मानित विद्वान और अनुवादक रिनचेन जांगपो थे। जिन्होंने लद्दाख क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश और सिक्किम सहित भारत के अन्य क्षेत्रों में बौद्ध मठों की स्थापना की थी। अपने प्रवास के दौरान, वे नेपाल, भूटान और तिब्बत के पड़ोसी देशों में भी गए। जांगपो को “लोहत्सावा” या “महान अनुवादक” के नाम से जाना जाने लगा। उन्हें बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में 108 मठों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म को संस्थागत रूप दिया। इन मठों को तिब्बती बौद्ध धर्म के वज्रयान का मुख्य आधार माना जाता है। जांगपो ने पौराणिक 108 मठों में दीवार पेंटिंग और मूर्तियां बनाने के लिए कश्मीरी कलाकारों को लगाया। इनमें से केवल कुछ ही मठ बचे हैं, लद्दाख में अलची मठ परिसर को उनके द्वारा बनाए गए सभी मठों में प्रथम स्थान का गौरव प्राप्त है।
निचले लद्दाख क्षेत्र में अलची तीन गांवों में एक हिस्सा है जो ‘स्मारकों के अलची समूह’ का गठन करते हैं; अलची से सटे अन्य दो गाँव मंग्यू और सुमदा चुन हैं। इन तीन गांवों में स्मारकों को “अद्वितीय शैली और कारीगरी” कहा जाता है, लेकिन अलची मठ परिसर सबसे प्रसिद्ध है। यह एक मात्र मठ है जो पहाड़ी पर स्थित न होकर निचले धरातल पर है। मठ में उस समय के बौद्ध और हिंदू दोनों राजाओं के कलात्मक और आध्यात्मिक विवरण चित्रों में परिलक्षित होते हैं। ये लद्दाख की कुछ सबसे पुरानी पेंटिंग हैं। परिसर में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और विस्तृत लकड़ी की नक्काशी और बारोक शैली में कला-कार्य भी हैं।
मठ परिसर में तीन प्रमुख मंदिर हैं: दुखांग (असेंबली हॉल), सुमत्सेक और मंजुश्री का मंदिर , सभी 12 वीं और 13 वीं शताब्दी की शुरुआत के बीच के हैं। चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके अलावा, अलची परिसर में दो अन्य महत्वपूर्ण मंदिर हैं, अनुवादक का मंदिर जिसे ‘लॉटसभा लखंग’ कहा जाता है और एक नया मंदिर जिसे ‘लखंग सोमा’ कहा जाता है। दुखंग या असेंबली हॉल और एक तीन मंजिला मुख्य मंदिर (gTsug-lag-khang), है, जिसे सुमत्सेग (gSum-brtsegs) कहा जाता है। कश्मीरी शैली में बनाया गया एक चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तीसरे मंदिर को मंजुश्री मंदिर (‘जाम-दपाल ल्हा-खांग) कहा जाता है। यहाँ दो सौ रुपए प्रवेश शुल्क जमा कराया जाता है। प्रवेश टिकट लेकर तीनों मंदिरों के दर्शन किये।
निम्मू गाँव
लद्दाख़ की मुख्य नदी सिंधु की मुख्य धारा का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के पास है। ज़ांस्कर पर्वत श्रृंखला से इसकी एक सहायक ज़ांस्कर नदी निकलती है। यह लद्दाख के पूर्वोत्तर भाग से होकर बहती है। इस क्षेत्र में ठंड के कारण सर्दियों जम जाती हैं। ज़ांस्कर नदी निम्मू (निमो) गांव में सिंधु नदी में मिलती है। हम निम्मू गाँव पहुँचे। निम्मू चाय-समोसा और चोल-पूरी के लिए बहुत प्रसिद्ध है। निम्मू में रुककर दोपहर का खाना निपटाया और चाय पी।
निम्मू गांव के पास कई पर्यटन स्थल हैं, जिनमें बाजगो, लिकिर और अलची मठ शामिल हैं। यहां का तापमान गर्मियों में 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर सर्दियों में -29 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इतनी कठोर जलवायु और चरम मौसम की स्थिति के कारण बहुत कम वनस्पति आच्छादन है। यहाँ एक जलविद्युत ऊर्जा संयंत्र है जिसे निमु-बाजगो बांध के नाम से जाना जाता है। बाजगो मठ नदी किनारे देखते निकले।
सिंधु नदी भारतीय उपमहाद्वीप को जीवनदायिनी वरदान है। हिमालय महापर्वत उत्तर दिशा से ब्रह्मपुत्र महानद को तिब्बत से बंगलादेश तक पहुँचाता है। वहीं दक्षिण में तिब्बत और पामीर के पठार से अनेकों नदियों को मिलाकर सिंधु महानद को अरब सागर तक पहुँचाता है। मानो हिमालय भारतीय महाद्वीप को दोनों हाथों से सहेज रहा हो।
सिंधु नदी का कुल जल ग्रहण क्षेत्र 11,65,000 वर्ग किमी से अधिक है। लद्दाख में इसकी बायीं ओर की सहायक नदी ज़ांस्कर है, और मैदानी इलाकों में इसकी बाएँ किनारे की सहायक नदी पंजनाद हैं, जो पंजाब की पाँच नदियों, अर्थात् ब्यास, सतलुज, झेलम, रावी, और चिनाब, के क्रमिक संगम से बनती है। सिंधु उत्तरी भाग में एक पहाड़ी झरने से शुरू होकर हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश पर्वतमाला में ग्लेशियरों और नदियों से पोषित होकर समशीतोष्ण जंगलों, मैदानों और शुष्क ग्रामीण इलाकों के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करती है। इसकी दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ श्योक, गिलगित, काबुल, कुर्रम और गोमल नदियाँ हैं। सिंधु नदी लद्दाख की रीढ़ है; सभी प्रमुख स्थान शे, लेह, बासगो और टिंगमोसगैंग नदी के करीब स्थित हैं।
यह ज़ांस्कर घाटी का क्षेत्र है। सुरू नदी ज़ांस्कर श्रेणी की पश्चिमी और उत्तरी सीमा बनाती है। सुरु कारगिल के उत्तर में थोड़ी दूरी पर द्रास और शिंगो नदियों के संयुक्त जल को प्राप्त करने के बाद बाल्टिस्तान के मरोल में सिंधु में शामिल हो जाता है, जो अब नियंत्रण रेखा के पाकिस्तान की ओर है। रंगदम मठ और जूलिडोक का परिचर गांव सुरु घाटी में अंतिम बसा हुआ क्षेत्र है; यह बकरवाल नामक खानाबदोश चरवाहों का भी गंतव्य है, जो हर गर्मियों में जम्मू क्षेत्र में ट्रेकिंग करते हैं। रंगदम, हालांकि पेन्सी-ला के उत्तरी किनारे पर, सुरू के बजाय सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ज़ांस्कर का हिस्सा माना जाता है।
ज़ांस्कर घाटी रंगदम से पेन्सी-ला में 4400 मीटर तक ऊँची हो जाती है। कारगिल सुरू घाटी का एकमात्र शहर, 1947 से पहले व्यापार कारवां के मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जो श्रीनगर, लेह, स्कर्दु और पदुम से लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर कमोबेश समान दूरी पर था।
हिमालय के उत्तरी भाग में भारी हिमाच्छादित फ्लैंक के तल पर ज़ांस्कर और सुरु घाटियाँ एक बड़ा ट्रफ़ बनाती हैं। ज़रा देखें ज़ांस्कर नदी कैसे आकार लेती है। ज़ांस्कर घाटी में दो नदियाँ, स्टोड (डोडा) और लुंगनाक (ज़ाराप लिंगती) के कुंड हैं। लुंगनाक की मुख्य सहायक नदियों में से एक ज़ाराप है, जो उत्तरपूर्वी हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों और घाटियों को त्सो मोरीरी (झील) के उत्तर-पश्चिम में सिर्फ 20 किलोमीटर दूर से आती है। बारा-लाचा-ला के उत्तर में थोड़ा दूर यह लिंगटी और एक अन्य सहायक नदी से जुड़ती है; इसके बाद यह उत्तर-पश्चिम की ओर बहती है और अचानक एक दर्रे से होकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और फुगताल गोम्पा से होते हुए शिंगो-ला से उतरती कारग्याक नदी में मिल जाती है, जो हिमाचल प्रदेश से आती है। स्टोड पेन्सी-ला के नीचे द्रांग-ड्रंग ग्लेशियर पिघला हुआ पानी ले जाता है, और लुंगनाक के पास एक विस्तृत खुली घाटी में बहता है। ज़ांस्कर में भारी हिमपात होता है, पेन्सी-ला केवल जून में खुलता है और अक्टूबर के मध्य में फिर से अवरुद्ध हो जाता है। पूरी घाटी वस्तुतः वृक्षविहीन है। ज़ांस्कर नदी के रूप में इन सबका संयुक्त जल ज़ांस्कर रेंज में एक दर्रे के माध्यम से उत्तर की ओर बहता है, मध्य लद्दाख में निम्मू के नज़दीक में सिंधु नदी में शामिल होता है। उसी संगम के सामने आधा घंटा गुज़ारा।
ग्रीष्मकाल के दौरान, ज़ांस्कर नदी और भी प्रफुल्लित होती है और सर्दियों के दौरान यह हरे रंग में बदल जाती है जबकि सिंधु नीला हो जाता है। सिंधु नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 1) और ज़ांस्कर नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 2) लोकप्रिय आउटडोर खेल हैं। ज़ांस्कर और सिंधु नदियों का संगम इसके करीब स्थित है। निम्मू सभी रिवर राफ्टिंग समूहों के लिए एक पड़ाव है और सिंधु नदी में सालाना अखिल भारतीय रिवर राफ्टिंग अभियान के लिए मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।
हमने सिंधु नदी और ज़ांस्कर नदियों के संगम पर हिमाच्छादित शिखरों का अवलोकन किया। दो पहाड़ों के बीच बहती नीली-हरी सिंधु नदी का मटमैली ज़ांस्कर नदी के साथ संगम हम देख रहे हैं। रंगों के इस जादुई संगम के चारों ओर अनगढ़ सूखे पहाड़ों ने इसकी जीवंतता को और बढ़ा दिया है। सूर्य की आभा में जुड़ा नीले आसमान से उतरती पहाड़ियाँ – सचमुच भूमि की चुप्पी कितनी प्यारी है। फड़फड़ाते झंडे के साथ उभरते प्रार्थना के स्वरों ने सहूलियत बिंदु के साथ एक शांति जोड़ दी। पूरे वातावरण ने सम्मोहन से आगाह किया कि आप सब कुछ भूलकर मंत्रमुग्ध कर देने वाले परिदृश्य को हृदय में बसा लें।