हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९६ ☆ बाल गीत – ओम-ओम की जय हो भैया… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९६ ☆ 

☆ बाल गीत – ओम-ओम की जय हो भैया ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

ओम-ओम की जय हो भैया,

जय-जय-जय बलिदानी है।

भारत माता की भी जय हो,

जय वेदों की वाणी है।

ऋषियों को भी भूल न जाना,

जिनने जीवन दान दिया।

अमर हो गए जो सेनानी ,

उनने अपना प्राण दिया।

 *

जय-जय बोलो राम-कृष्ण की,

प्रेरक सदा कहानी है।

 **

भूल न जाना पंच-तत्व को,

जिनसे हमें शरीर मिला।

स्वच्छ सदा इनको है रखना,

वायु आदि सब नीर मिला।

 *

ईश्वर की सृष्टि निराली है,

वह ही राजा दानी है।

 **

सूर्य-चंद्र-सा मिलकर दमको,

परहित में भी जी लेना।

मानव जीवन यह अमूल्य है,

प्रेम-सु़धा  भी पी लेना।

 *

जय- जय – जय – जय  दयानंद की,

ना ही कोई सानी है।

 **

जिए देश के हित में जो भी,

उनका भी गुणगान करें।

सत्य मार्ग पर चलें सभी जो,

उनका भी सम्मान करें।

 *

श्रद्धानंद संत की जय-जय,

वेद पताका तानी है।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश की कविता # १४४ ☆ गर्मी के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके भावप्रवण एवं विचारणीय “गर्मी के दोहे” ।)

✍ जय प्रकाश की कविता # १४४ ☆ गर्मी के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

दिन जलता है आग से,भरती रात उसाँस

पानी पी पी प्यास भी,बनी गले की फाँस।

पत्ता पत्ता मौन है,मौन हवा के बोल

सूरज तपती आग की,बैठा गठरी खोल।

 *

चिड़िया खोजे रेत में,गुमी नदी की धार

घाट बँधी हर नाव का,डूब गया व्यापार।

 *

लू लपटों की बाढ़ में,बहे पसीना खूब

हरियाली के गाँव में,रही सूखती दूब।

 *

धरती का आँचल फटा,फटी बिवाई पाँव

तरुवर तरुवर खोजती,धूप तनिक सी छाँव।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५१ ☆ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५१ ☆

✍ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

धूप औ छाँव क्या नहीं पाता

कर्म का फल बता नहीं पाता

 *

तेज कितना भी सूर्य तपता हो

फिर भी सागर सुखा नहीं पाता

 *

इश्क़ कैसा है बेवफ़ा को भी

चाहकर मैं भुला नहीं पाता

 *

साथ बरसों का है मेरा उससे

क्या है दिल में हवा नहीं पाता

 *

इंतिहां इंतज़ार की है अब

सब्र का फल पका नहीं पाता

 *

डर  हो क़ानून का भला कैसे

सच्चा मुज़रिम सज़ा नहीं पाता

 *

रौनकें रह की देख जो बहके

वो सही रासता नहीं पता

 *

दीन दुखियों के जो न काम आए

रब का वो आसरा नहीं पाता

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५५ – अदृश्य शक्ति… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अदृश्य शक्ति।)

☆ हेमंत साहित्य # ५५ ☆

✍ अदृश्य शक्ति… ☆ श्री हेमंत तारे  

नभ के वितान पर

शुभ्र- श्वेत जलधर का डेरा

खो जाता है जिस में सबकुछ

हाँ सबकुछ

विमान भी, जो उड़ रहा हो ऊंचाई पर ।

 

जानता है व्योम

अपरिमित है विस्तार उस का

पर,  है कोई शक्ति कहीं

जो रच रही, लीलाएं  सभी

उसके

चाहे- अनचाहे,  जाने- अनजाने ।

 

होता है बहुत कुछ हूबहू वैसा

चाहते हैं हम जैसा

लेकिन

होता है कुछ ऐसा भी

चाहता है वो जैसा

जो बसता है,  शायद बादलों के परे भी

या फिर,

यहीं कहीं,  मेरे आपके आसपास ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६४ ☆ लघुकथा – सीख… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “सीख“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६४ ☆

✍ लघुकथा – सीख… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

बनवारी लाल जी सरकारी स्कूल में एकाउंटेंट के पद से रिटायर हुए थे।  जितना वेतन मिलता था उससे कम  पेंशन मिलती थी।    दवाइयों और छोटे मोटे खर्च का निर्वहन हो जाता। उनका बेटा राहुल एक छोटी-सी कंपनी में नौकरी करता था। वेतन बहुत कम था। उसके वेतन और बनवारीलाल जी की पैंशन से  घर की जरूरतें  पूरी तो हो जातीं पर कोई अचानक जरूरत सामने आ जाए तो बहुत परेशानी होती।  ऐसे समय राहुल की पत्नी सीता कई बार बच्चों की फीस, कपड़े और राशन के खर्च को लेकर परेशान हो जाती। बच्चे बड़े हो रहे थे तो खर्च बढ़ रहा था परंतु आमदनी नहीं बढ़ रही थी। इसको लेकर राहुल और सीता अक्सर चर्चा किया करते कि समझ नहीं आता आगे कैसे चलेगा। राहुल की चिंता यह भी थी कि  वह अपने पिता को यथेष्ट सुख नहीं दे पा रहा था।

बनवारी लाल जी यह सब सुनते देखते और दुखी भी होते। कहीं नौकरी कर सकते थे पर बेटा पसंद नहीं करेगा यह सोचकर रुक जाते। सोचते सोचते उन्हें एक युक्ति सूझी। टीचर नहीं रहे तो क्या छोटे बच्चों को पढा तो सकते हैं। अपने छोटे पोते का ट्यूशन बच जाएगा। उन्होंने अपने  बक्स से कुछ किताबें और कॉपियाँ निकालीं और मोहल्ले के बच्चों को शाम को मुफ्त पढ़ाना शुरू कर दिया। उनका पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि बच्चे बहुत रुचि लेने लगे। बच्चों की संख्या बढ़ने लगी।  मोहल्ले के लोगों को भी अच्छा लगने लगा। कुछ लोगों ने बनवारी लाल जी से आग्रह किया कि वे नियमित ट्यूशन लें और फीस भी देने लगे।

घर में थोड़ी अतिरिक्त आमदनी होने से खुशी की एक लहर दौड़ गई  घर का माहौल बदल गया था।

बनवारी लाल जी ने स्वयं कुछ करके सबको ऐसी सीख दी कि लोगों ने समय व्यर्थ करना बंद कर दिया और कुछ न कुछ अतिरिक्त काम करने लगे। बनवारी लाल जी  कहते कि  कमाई छोटी-बड़ी नहीं होती, मन छोटा नहीं होना चाहिए। अब रात में सोने से पहले हर घर से हँसी की आवाज सुनाई देने लगीं हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११३ – नौतपा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नौतपा…।)

☆ लघुकथा # ११३ – नौतपा… श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“बहुत अधिक गर्मी है मोना और तरुण तुम लोग कहाँ जा रहें हो?” सुनीता जी ने कहा।

मोना ने कहा – “मम्मी जी हम जब भी कही घूमने जाते हैं तो आप अवश्य रोक टोक करती हो?”

तरुण ने कहा – “माँ बच्चों की स्कूल की छुट्टी है इसलिए पास की  पार्क में जा रही है। वहां  पर वाटर पार्क और चिड़ियाघर घूम कर आएगे।”

मोना ने गुस्से से कहा – “आप की माँ तो हमें कहीं घूमने नहीं जाने देती हैं?”

तरुण की माँ सुनीता ने कहा-

“बेटा तुम लोग घूमने जाओ मुझे कोई एतराज नहीं है पर नौतपा लगा है इसलिए मना कर रही हूँ।”

मोना ने कहा -“क्या नया नाटक है नौतपा क्या है?”

सुनीता जी ने कहा- “मोना बच्चों को भी बुला लो मैं बताती हूँ कि यह नौतपा क्या है यह जानकारी सभी को रहनी चाहिये।”

तरुण ने बच्चों को बुला लिया और बोला “माँ बोलो हम सभी सुनेंगे।”

सुनीता जी ने कहा-ज्येष्ठ मास में जब सूर्य, रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण में होता है, तो पहले 9 दिनों तक सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं। बहुत अधिक गर्मी पड़ती है उसी को नौतपा कहते हैं 9 दिन अधिक तकनीक से वर्षा अच्छी होती है यदि इस बीच पानी गिर गया तो वर्षा कम होती है।”

मोना ने कहा – “हमारे घूमने जाने पर आप क्यों रोक लगा रही हैं?”

“बेटा उन दिनों बहुत अधिक धूप सीधी पड़ती है गर्मी अधिक रहती है लू चलती है लू लग जाने के कारण तुम और बच्चे बीमार हो जाओगे तुम्हारी चिंता है इसलिए कह रही हूँ, यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन ना हो तो गूगल में देख लो क्योंकि आजकल सारी बातें तो तुम गूगल की ही मानती हो न”

सुनीता जी ने धीमी स्वर  में कहा वह गंभीर हो गई।

मोना तुरंत गूगल में देखने लग गई और उसने कहा कि- “माँ आप सही कह रही हैं, गूगल बता रहा है कि इन दोनों मांगलिक कार्य भी नहीं होते इसीलिए मेरी बड़ी बहन अपनी बेटी की शादी बाद में कर रही है।”

इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे वातावरण में भीषण तपिश बढ़ जाती है।

तरुण ने कहा- “माँ की बात में मानता हूँ तो तुम्हें गुस्सा आता है माँ सही कहती है चलो मौसम अच्छा होगा बारिश में तो हम सब मिलकर घूमने चलेंगे।”

बच्चों ने कहा “हमने देखा दादी की बात कितनी सही है तुम्हारे चक्कर में हम घूमने जाते और बीमार पड़ जाते घर में आराम से हम सब खाएंगे और नौतपा के विषय में भी हमने कितनी अच्छी जानकारी ली लिख लिख कर स्कूल में सबको बताऍंगे।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २४ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २४ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

मागच्या भागात आपण रविंद्रनाथांचे वडील देवेंद्रनाथांविषयी थोडी माहिती घेतली. रविंद्रनाथांच्या जीवनावर प्रभाव टाकणाऱ्या प्रमुख व्यक्तींपैकी एक म्हणजे देवेंद्रनाथ! त्यांनी बंगालचं सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विश्व समृद्ध केलं. त्यांच्याविषयी आणखी माहिती आज घेऊया.

ब्राह्मोसमाजाचे अनुयायी देवेंद्रनाथांचा उल्लेख महर्षी देवेंद्रनाथ असा करीत. तत्त्वबोधिनी पत्रिका ह्या ब्राह्मो समाजाचे मुखपत्र असलेल्या मासिकाद्वारे बंगाली गद्याच्या वाटचालीस गती देऊन त्यांनी मोठाच हातभार लावला. भारदस्त वैचारिक गद्यलेखनाची परंपरा बंगालीत ह्या पत्रिकेने सुरू झाली. ऋग्वेदाच्या बंगाली अनुवादास प्रथम देवेंद्रनाथांनीच हात घातला. संस्कृत व्याकरणही बंगाली भाषेत प्रथम त्यांनीच लिहिले. ‘स्वरचित जीवनचरित’ हे त्यांचे आत्मचरित्र फारच मनोरंजक आहे. त्यांच्या ह्या आत्मचरित्राचे पुढे त्यांची मुले, सत्येंद्रनाथ आणि इंदिरा देवी ह्या दोघांनी ‘देवेंद्रनाथ ठाकूरेर स्वरचित जीवनचरित’ नावाने इंग्रजीत भाषांतरही केले.

देवेंद्रनाथांच्या मुलांनी देखिल विविध विषयात आंतरराष्ट्रीय किर्ती मिळवली. द्विजेंद्रनाथ कवि, दार्शनिक और गणितज्ञ म्हणून प्रसिद्ध झाले. सत्येंद्रनाथ पहले भारतीय ICS अधिकारी बनले. ज्योतिरिंद्रनाथ नाटककार, संगीतकार व संपादक झाले. रवींद्रनाथांनी नोबेल पुरस्कार मिळवून जागतिक किर्ती प्राप्त केली. त्यांची कन्या स्वर्णकुमारी देवी देखिल प्रसिद्ध कवयित्री, कादंबरीकार व संपादक होत्या.

देवेंद्रनाथांच्या नातवंडांपैकी अनेकजण लेखक, चित्रकार, संगीतकार, संपादक, राजकारणी वा समाजकारणी आहेत.

देवेंद्रनाथांच्या अंतःकरणात वास्तव्य करणारा साहित्यिकच द्विजेंद्रनाथ व रवींद्रनाथ यांचा साहित्यगुरू होय. देवेद्रनाथांमधील खरा साहित्यिक त्यांच्या स्वतःच्या आनुषंगिक लेखनात व्यक्त झालेला नसून, तो त्यांनी आप्तेष्टांना व स्नेह्यासोबत्यांना अनौपचारिकपणे लिहिलेल्या पत्रांमधून आणि त्यांच्या आत्मचरित्रातून व्यक्त झाला आहे. अक्षयकुमार दत्त, ईश्वरचंद्र विद्यासागर यांच्या बरोबरीने देवेंद्रनाथही, स्वतःच्या नकळत नव्या बंगाली गद्याची जडणघडण करीत होते. त्यांची ही गद्यशैली त्यांच्या मुलांनी, विशेषतः द्विजेंद्रनाथ व रवींद्रनाथ यांनी उचलली व खूपच विकसित केली.

सर्व प्रकारच्या ऐहिक सुखसंपत्तीची अनुकूलता असूनही उपनिषदांतील तत्त्वज्ञानाच्या गाढ व्यासंगामुळे आणि जन्मजात ईशप्रेमामुळे देवेंद्रनाथांच्या अंगी विरक्ती बाणलेली होती. शिक्षणप्रसार व लोककल्याणकारी कार्यात देवेंद्रनाथांनी आपले सर्व जीवन वेचले. सर्वतत्त्वदीपिका सभा, तत्त्वबोधिनी सभा, हिंदू हितार्थी विद्यालय, समाजोन्नतिविधायिनी सुहृदसमिती इ. संस्था त्यांनी स्थापन केल्या आणि त्यांद्वारे धार्मिक, सामाजिक, राजकीय व शैक्षणिक जागृती केली. हिंदू महाविद्यालयाच्या कार्यकारी समितीवर असताना त्यांनी अनेक समाजोपयोगी कामे केली.

बोलपूर येथील ब्रह्मचर्याश्रम देवेंद्रनाथांनीच स्थापन केला होता. रवींद्रनाथांनी पुढे त्याचे रूपांतर जगप्रसिद्ध ‘शांतिनिकेतन’मध्ये व नंतर ‘विश्वभारती’मध्ये केले.

देवेंद्रनाथांचा मृत्यू वयाच्या ८८ व्या वर्षी १९ जानेवारी १९०५ रोजी त्यांच्या राहत्या घरी झाला.

—–

☆ गीत : ७० ☆

IS it beyond thee to be glad with the gladness of this rhythm? To be tossed and lost and broken in the whirl of this fearful joy? 

All things rush on, they stop not, they look not behind, no power can hold them back, they rush on.

Keeping steps with that restless, rapid music, seasons come dancing and pass away ⎯colours, tunes, and perfumes pour in endless cascades in the abounding joy that scatters and gives up and dies every moment.

——

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ७० ☆

किती चंचल अन् द्रुत ते संगीत

तरी, पदन्यास करीत त्या लयीत 

येती अन् जाती ऋतु सारे

*

रंग, गंध, अन् संगीत, सुरांचा

वर्षाव निरंतर करी तू सुखाचा

आनंदाचे भय परी मनी दाटते रे

*

क्षणात सारे विखरून जाते 

क्षणात सारे निसटून जाते

क्षणात सारे भंगून जाते

*

येथे तर सारे सतत धावती

मागे वळूनही कधी न पाहती

या रोखणे कुणा हाती असे का ?

*

घे तू ही आनंद, हा क्षणभराचा

घे तसा भावगंध, तरल संगीताचा

त्यात हरवून, विरून जाशील का?

*

असेल फक्त तुझाच हा क्षण

करून घे श्वासांचे औक्षण

तुज कुवत एवढी नसेच का?

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆ गीत : ७१ ☆

THAT I should make much of myself and turn it on all sides, thus casting coloured shadows on thy radiance ⎯ such is thy maya.

Thou settest a barrier in thine own being and then callest thy severed self in myriad notes. This thy self-separation has taken body in me

The poignant song is echoed through all the sky in many-coloured tears and smiles, alarms and hopes; waves rise up and sink again, dreams break and form. In me is thy own defeat of self.

This screen that thou hast raised is painted with innumerable figures with the brush of the night and the day. Behind it thy seat is woven in wondrous mysteries of curves,

casting away all barren lines of straightness.

The great pageant of thee and me has overspread the sky. With the tune of thee and me all the air is vibrant, and all ages pass with the hiding and seeking of thee and me.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ७१ ☆

तुझ्या तेजावर राया

माझी रंगीत छाया 

अशी तुझी माया 

देवा, अशी तुझी माया॥

*

स्वरलहरीतून अनंत

तुझी रूपे दिगंत

दाविसी मला पामरा

देवा, दाविसी मला पामरा॥

 *

गीते तुझी रसभरीत

निनादती गगनात 

भारती या विश्वाला

देवा, भारती या विश्वाला॥

 *

रंग अनेक शोकाचे

गंध अनेक हर्षाचे

तुझीच ही किमया 

देवा, तुझीच ही किमया॥

*

आशेच्या किरणांची

भीतीच्या डोहांची

भूल तूच पाडसी

देवा, भूल तूच पाडसी॥

*

ओहोटी अन् भरती

स्वप्ने काचेची फुटती

पुन्हा स्वप्ने तूच दाविसी

देवा, तूच स्वप्ने दाविसी॥

*

तुझ्या या चकव्यात

जरी मी नच फसत

हार तुझीच होते

देवा, तुझी हार होते॥

*

दिनरातीच्या कुंचल्याने

नाट्याचा पडदा बहु रंगांने

चितारसि, तूच रंगविसी 

देवा, तूच रे रंगविसी॥

*

त्या पडद्याच्या पार विराजे

आसन अगम्य रेषांचे तुझे

तसेच जीवन गुंतागुंतीचे

देवा, जीवन गुंतागुंतीचे॥

*

तू मला यात गुंतवावे

मी परंतु नच फसावे

मम सुरांनी गगन भेदावे

देवा, गगन सुरांनी भेदावे॥

*

खेळ चाले युगे युगे तरी

डाव मजवरी येता परी

नच सापडसी मला

देवा, नच सापडसी मला॥

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

——

☆ गीत ७२ ☆

HE it is, the innermost one, who awakens my being with his deep hidden touches.

He it is who puts his enchantment upon these eyes and joyfully plays on the chords of my heart in varied cadence of pleasure and pain.

He it is who weaves the web of this maya in evanescent hues of gold and silver, blue and green, and lets peep out through the folds his feet, at whose touch I forget myself.

Days come and ages pass, and it is ever he who moves my heart in many a name, in many a guise, in many a rapture of joy and of sorrow.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ७२ ☆

हाच तो !

जो अंतर्यामी वसतो

दिव्य स्पर्शाने जागृत करतो

 

हाच तो !

मम नयनां मोहवितो

मम हृदीची तार छेडितो

सुख दुःखाची लय साधतो

 

हाच तो !

जो मायाजाल विणतो

सतत बदलत्या रंगी रंगवितो

सोनेरी, चंदेरी अन् कितीतरी तो

 

हाच तो !

युगायुगांची वाट दावितो

अनंत रूपे मम हृदयी भेटतो

ब्रम्हानंदी सुखदुःखाच्या असतो

 

हाच तो!

ज्याचे चरण पाहतो

अन् मी मजला हरवून बसतो

हाच तो अन् हाच तो!! 

*

– क्रमशः भाग २४..

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५० ☆ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५० ☆

✍ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

धूप औ छाँव क्या नहीं पाता

कर्म का फल बता नहीं पाता

तेज कितना भी सूर्य तपता हो

फिर भी सागर सुखा नहीं पाता

 *

इश्क़ कैसा है बेवफ़ा को भी

चाहकर मैं भुला नहीं पाता

 *

साथ बरसों का है मेरा उससे

क्या है दिल में हवा नहीं पाता

 *

इंतिहां इंतज़ार की है अब

सब्र का फल पका नहीं पाता

 *

डर  हो क़ानून का भला कैसे

सच्चा मुज़रिम सज़ा नहीं पाता

 *

रौनकें रह की देख जो बहके

वो सही रासता नहीं पता

 *

दीन दुखियों के जो न काम आए

रब का वो आसरा नहीं पाता

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४८ – बुन्देली कविता – ”सजनइ होन लगी गुड़ियों की” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४८ ☆

☆  बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सजनइ होन लगी गुड़ियों की

गुँथन लगी माला गुरियों की

 *

जे नन्हे नटखट कम नइयाँ

नकल करत बुढ़वा-बुढ़ियों की

 *

साहुन में सज गईं दुकानें

छला – फूँदरा उर चुरियों की

 *

होत बाम्हनों में कइ पातें

दुबे, तिवारी, चनपुरियों की

 *

ऐंसी भइ बरसात हनक कै

धार न टूटन दइ उरियों की

 *

रंग-बिरंगे फूल झरे हैं

जेजम बिछ गइ पंखुरियों की

 *

भगवतचुगली सें घर फोरत

कमी नोंइ विष की पुड़ियों की

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

मैं कागज़ की श्वेत धरा बनूँ,

तुम स्याही की धार बन जाना,

मैं सपनों की रेखा खींचूँ,

तुम उनका विस्तार बन जाना।

 *

मैं मन के भाव सजाऊँ जब,

तुम अक्षर-अक्षर खिल जाना,

मेरी हर मौन पुकारों में,

तुम स्वर बनकर मिल जाना।

 *

मैं शब्दों का सागर बनूँ,

तुम लहरों की तान बन जाना,

मैं रचना की राह दिखाऊँ,

तुम उसका सम्मान बन जाना।

 *

जब थक जाए ये कलम मेरी,

तुम ऊर्जा बन बह जाना,

मैं कागज़ का रूप धारण करूँ,

तुम मुझमें जीवन भर जाना।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद एवं पाठयपुस्तक लेखिका 

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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