हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७८ ⇒ अंतिम चौराहा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम चौराहा।)

?अभी अभी # ९७८ ⇒ आलेख –  अंतिम चौराहा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चार दिल चार राहें जहां मिले उसे चौराहा कहते हैं।

मैं तो चला, जिधर चले रस्ता! मैं चलूं, वहां तक तो ठीक, लेकिन क्या कहीं रास्ता भी चलता है। कबीर के अनुसार, अगर चलती को गाड़ी कहा जा सकता है, तो रास्ता भी चल सकता है और जब रास्ता चलेगा तो वह भी घिस घिसकर रास्ते से, रस्ता हो जाएगा।

चौराहे को चौरस्ता भी कहते हैं। कहीं कहीं तो इसे चौमुहानी भी कहते हैं। रास्तों की तरह, गलियां भी होती हैं, ठाकुर शिवप्रसाद सिंह की गली, आगे मुड़ती है, और वहीं कहीं बंद गली का आखरी मकान धर्मवीर भारती का है।।

इंसान का क्या है, जिंदगी में कभी दोराहे पर खड़ा है तो कभी चौराहे पर। होने को तो खैर तिराहा भी होता है, लेकिन न जाने मेरे शहर के गांधी स्टेच्यू को लोग रीगल चौराहा क्यूं कहते हैं, जब कि यहां तो तीन ही रास्ते हैं। हां, यह भी सही है कि एक रास्ता स्वयं रीगल थिएटर भी था, लेकिन समय ने वह रास्ता भी बंद कर दिया।

थिएटर तो सारे बंद हुए, मैं अब फिल्म देखने कहां जाऊं।

जिस चौराहे से चार राहें निकलती हैं, उन्हें आप चौराहे की भुजा भी कह सकते हैं। हम तो जब भी श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए नाथद्वारा जाते हैं, काकरौली, चारभुजा जी और एकलिंग जी होते हुए झीलों की नगरी उदयपुर अवश्य जाते हैं। जहां सहेलियों की बाड़ी हो, वहां तो भूल भुलैया होगी ही।

यह अंक चार हमें एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है जहां हमें जयपुर की बड़ी चौपड़ और छोटी चौपड़ याद आ जाती है। बही खाते वाले चोपड़ा जी कब फिल्मों में आ गए, और यश कमा गए कुछ पता ही नहीं चला।।

अगर आपसे पूछा जाए, आपके शहर में कितने चौराहे हैं, तो शायद आप गिन नहीं पाएं। इसीलिए इन चौराहों का नाम दे दिया जाता है। कहीं चौक तो कहीं चौराहा। हमने अगर एक चौराहे का नाम जेलरोड रख दिया तो दूसरे का चिमनबाग चौराहा। चिमनबाग तो आज चमन हो गया, लेकिन हमारे भाइयों ने उस चौराहे का नाम ही बदलकर चिकमंगलूर चौराहा कर दिया। वैसे भी किसी विकलांग को दिव्यांग बनने में कहां ज्यादा वक्त लगता है।

हमारे शहर के प्रमुख चौराहों में अगर पलासिया चौराहा है तो गिटार चौराहा भी। जहां रोबोट लगा है, वह रोबोट चौराहा और जहां आज लेंटर्न होटल नहीं है, वहां भी लैंटर्न चौराहा है। सांवेर रोड पर अगर मरी माता चौराहा है तो रेडिसन होटल पर रेडिसन चौराहा। कुछ चौराहों पर भुजाएं जरा जरूरत से ज्यादा ही फड़फड़ाती हैं, रीजनल पार्क के आसपास तो इतनी राहें हैं कि राही, राह भी भटक जाए।।

इन सब चौराहों के बीच, पंचकुइया रोड पर एक अंतिम चौराहा भी है, क्योंकि वहां से आखरी रास्ता मुक्ति धाम की ओर ही जाता है। लेकिन यह जीव माया में नहीं उलझता ! वह जानता है, कोई ना संग मरे। बस थोड़ा श्मशान वैराग्य, शोक सभा और उठावने के बाद शाम को छप्पन दुकान।

क्या भरोसा कब जिंदगी की शाम आ जाए, कौन सा चौराहा हमारा अंतिम चौराहा हो जाए ! लेकिन हमने तो चौराहों को पार करना सीख लिया है। ट्रैफिक का सिपाही भले ही सीटी बजाता रहे, सिग्नल लाल लाल आंखें दिखलाता रहे, कोई मार्ग अवरोधक हमारी जिंदगी की गाड़ी को इतनी आसानी से नहीं रोक सकता।।

ऊपर भले ही चित्रगुप्त गणेश चोपड़ा भंडार खोले हमारे खाते बही की जांच करते रहें, हम स्वयंसेवक अपनी लाठी स्वयं साथ लेकर आएंगे। चित्रगुप्त के खातों की भी सरकार जांच करवा रही है। सब डिजिटल, ऑनलाइन और पारदर्शी हो रहा है। ईश्वर की मर्जी जैसा डायलॉग अब नहीं चलेगा।

जिसकी लाठी उसकी भैंस। यमराज को दूसरा वाहन तलाशना पड़ेगा। चित्रगुप्त को आईटी सेक्टर के लिए शिक्षित लोगों को ऊपर भी जॉब देने होंगे, और वह भी फाइव डे वीक और आकर्षक पैकेज के साथ। उसके बाद ही हमारी अंतिम चौराहे से रवानगी होगी। स्वर्ग में बर्थ नहीं, एक नया जॉब, एक नया चैलेंज।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – अक्षय मिलन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अक्षय मिलन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻अक्षय मिलन🛕

मोहनी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चली जा रही थी। हाथों में पूजन की थाली, जिसमें गुड़ चना, सत्तू, मेवा, मौसमी फल पूजन का सामान।

मन में वही दृढ विश्वास मेरा अक्षय मिलन अटूट अमर है। सुंदर सादगी से भरा परिधान परन्तु चेहरे पर अब मासूमियत की जगह बेबसी ने ले लिया है। आँखे आज निहार रही है—सुना था अक्षय तृतीया को जो दान पुण्य किया जाता है वह अमर हो जाता है। मोहनी ने तो अपने अक्षय का ही दान कर दिया था।

जानती थी वह अक्षय के बिना नही रह पायेगी। परन्तु अक्षय किसी और का है ये वह कैसे निभा कर जी सकती थी।

नमः पार्वती पतये हर – हर महादेव के उच्चारण से निर्मल जल की धार अर्पण कर रही थी।

लाल चुनरी उसके सिर पर पीछे से सिर ढकते गिरा – – –

अक्षय सुहाग वर शुभ वर पीछे पलट कर देखी कोई और नही अक्षय ही तो थे। जल का लोटा पति चरणों पर अर्पित कर अक्षय मिलन का आनंद लेने लगी।

किसी ने ऊपर लगे घंटे को लगातार बजा कर अक्षय तृतीया की बधाइयाँ दी।

विवाह वर्षगांठ की हार्दिक बधाई से मंदिर परिसर गूँज उठा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७४ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७४ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

मित्र के गैस संबंधित कार्य  के लिए सब बाधाएं पार कर डीलर के हॉल में प्रवेश कर राहत की सांस ली। संबंधित व्यक्ति तक पहुंचने की लिए ज़िग जैग व्यवस्था थी। इसको “क्राउड मैनेजमेंट” भी कहा जाता है।

समय बहुत लग जाएगा, ये विचार आते ही दिमाग के घोड़े चलाए। कहीं पढ़ा था, पानी अपना रास्ता स्वयं बनाता है। उसी तर्ज पर हम भी चल पड़े, अधिकतर लोग मोबाइल में वीडियो देख रहे थे, उनकी नजरों के सामने से उनसे आगे निकल गए।

अधिकतर लोग तो झगड़ा कर रहे थे, पेट खाली हो तो गुस्सा भी बहुत आता है। यहां तो घर के चूल्हे ही नहीं जल पा रहें हैं। हम जैसे ही बुकिंग कर्मचारी के सामने पहुंचे और अपना काम बताया, वो बोला आप गलत जगह में आए हैं। आपको तो एजेंसी के कंप्यूटर विभाग में जाना पड़ेगा। हम तो भेड़ चाल के कारण भीड़ के साथ चले आए थे।

कंप्यूटर विभाग वाले सज्जन फुर्सत में थे। उन्होंने मित्र के आधार कार्ड को सिस्टम से हटा दिया। मित्र को इस बावत सूचित कर राहत की सांस ली। हमें डर लग रहा था, कहीं मित्र परिवार सहित हमारे यहां ना आ जाए, कुकिंग गैस की किल्लत का समय जो चल रहा हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२४ ☆ काठी सावर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२४ ?

☆ काठी सावर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

कसरत करते तारेवरची

खाण्यासाठी भाकर मिरची

*

बाप वाजवी ढोल चामडी

पोरे जमली पारावरची

*

सावकारही आला होता

डोक्यावरती टोपी फरची

*

कुणी न आले वाचवायला

फुले वाळली वेलीवरची

*

मनात आहे काय चालले

रेघ सांगते भाळावरची

*

या कष्टाची भीक तोकडी

कळी खुलेना गालावरची

*

तोल म्हणाला नको घाबरू

काठी सावर हातावरची

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “पिंकीचं इंग्लिश…” – कवी : श्री. मंगेश पाडगावकर ☆ प्रस्तुती – डॉ ज्योती गोडबोले ☆

डॉ ज्योती गोडबोले 

? वाचताना वेचलेले ?

☆ “पिंकीचं इंग्लिश…” – कवी : श्री. मंगेश पाडगावकर ☆ प्रस्तुती – डॉ ज्योती गोडबोले ☆

पिंकी इंग्लिश शाळेत जाते,

मी तिला फार भितो…

ती वॉटर ड्रिंक करते,

मी आपला पाणी पितो…

जाडे- जाडे इंग्लिश शब्द,

तिच्या तोंडात उठ- सूट,

माझ्या पायात साधी चप्पल,

तिच्या पायात छान बूट…

 *

ती म्हणाली, केक या शब्दाला,

मराठी शब्द कुठला..?

आता गप्प बसलास ना,

बघ तुला घाम फुटला…

 *

मराठीच्या प्रेमामुळे,

मला गप्प बसवे ना…

इंग्रजीची तिची ऐट,

मला मुळीच ऐकवेना…

 *

मी तिला ताडकन म्हणालो,

वरण- भात आणि पिठले,

यांना तुझ्या इंग्रजीत,

सांग बरं शब्द कुठले..?

 *

हे ऐकून, पिंकी गप्प,

तिला काही सुचेना…

इंग्रजीत पिठले खाईल,

असा शब्द मिळेना…

 *

आता पिंकी घरी गुपचूप,

मराठीत पिठले खाते…

आणि वरण- भातावर,

मराठीतच लिंबू पिळते..!

कवी : श्री मंगेश पाडगावकर

प्रस्तुती : डॉ ज्योती गोडबोले

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो – १ ✍

दोस्तो!

मैं महापुरुष नहीं साधारण व्यक्ति हूँ।

मेरे मन में भी उपजते हैं। हर्ष और विषाद

मुझे भी घेरती है निराशा

मैं भी बोलता हूँ/ दिग्भ्रमित अर्जुन की भाषा

पीड़ित होता हूँ अन्याय और अत्याचार से

विह्वल हो उठता हूँ। द्रौपदी जैसी पुकार से।

फिर होता है एहसास

कि मुझे जकड़े है- विवशता का पाश!

सोचता हूँ

जाने अनजाने इसी नागपाश में बँधे हैं

सब लोग

सब में व्याप गया है

निर्बलता का राजरोग,

शायद

निर्बलता शब्द न हो बिल्कुल ठीक

निर्बलता की जगह शायद

निर्वीयता होगा सही सटीक,

यह निर्वीयता नहीं तो क्या है

कि फटी आँखें देखती हैं

जलती बस्तियाँ।

देखती हैं- सद्भाव की डूबती कश्तियाँ।

प्रेम को मूर्खता

और करुणा को समझा जाता है

लिजलिजा विचार

अखबारों में रोज छपते हैं समाचार

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८० “बाहर हाँफ रही गौरैया…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बाहर हाँफ रही गौरैया...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

चित्र – श्री राघवेंद्र तिवारी (2004)

☆ “बाहर हाँफ रही गौरैया...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

एक सकोरा पानी-दाना

रक्खा करती माँ ।

औरों की खातिर चिड़ियों सी

 उड़ती रहती माँ ॥

 

छाती में दुनिया-जहान की

लेकर पीड़ायें ।

आँचल भर उसको सारी

जैसे हों क्रीड़ायें ।

 

आगे खिडकी में आँखों के

चित्र कई टाँगे ।

पीड़ा को कितनी आँखों से

देखा करती माँ ॥

 

बाहर हाँफ रही गौरैया

उस मुँडेर तोती ।

जहाँ उभरती   दिखे

सभी को आशा की जोती ।

 

गर्मी गले-गले तक आकर

जैसे सूख गई ।

इंतजार में हरी-भरी सी

दिखती रहती माँ ॥

 

लम्बे-चौड़े टीम-टाम है

बस अनुशासन के ।

जहाँ टैंकर खाली दिखते

नगर प्रशासन के ।

 

वहीं दिखाई देती सबकी

सजल खुली आँखें ।

इन्हीं सभी में भरे कलश

सी छलका करती माँ ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

17-04-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समानांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समानांतर ? ?

…….???

…..???

…???

पढ़ सके?

फिर पढ़ो..!

नहीं…?

सुनो मित्र,

साथ न सही

मेरे समानांतर चलो,

फिर मेरा लिखो पढ़ो..!

?

© संजय भारद्वाज  

(दोपहर 3:10 बजे, 15.6.2016)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य  – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

हवा में घुटन थी, जैसे किसी पुरानी हवेली के तहखाने में सदियों से बंद सन्नाटा। अलख निरंजन जी अपनी मेज पर वैसे ही विराजमान थे, जैसे कोई क्रूर तानाशाह अंतिम डिक्री जारी करने वाला हो। उनके सामने बैठी सुधा के हाथ कांप रहे थे, मानो वह रसोई से कोई पकवान नहीं, बल्कि अपनी किस्मत का फैसला लेकर आई हो। अलख जी की नजरें पहली थाली पर गिरी। उन्होंने नाक सिकोड़ी, जैसे किसी ने उनके सामने कोई सड़ा हुआ तर्क रख दिया हो। “भिंडी? यह लेडी फिंगर नहीं, किसी बूढ़ी सभ्यता की सड़ी हुई उंगलियां हैं, दांतों में फंसकर मेरी हालत खराब कर देंगी।” सुधा ने चुपचाप थाली बदली। दूसरी आई तो उन्होंने उसे अपराधी की तरह घूरा। “बैंगन? यह तो बे-गुन है, शरीर में वायु का ऐसा तांडव मचाएगा कि घर भूकंप की चपेट में आ जाएगा।” उनके चेहरे पर छाई वह कुटिल गंभीरता किसी कसाई की मुस्कान जैसी थी, जो छुरी चलाने से पहले मंत्र पढ़ता है।

सिलसिला थमा नहीं, वह तो एक लंबी शवयात्रा की तरह आगे बढ़ता गया। गोभी को उन्होंने “फूलों का कब्रिस्तान” कहकर ठुकरा दिया और मटर को “हरे रंग की गोलियां” बताया जो पेट में धमाका कर सकती हैं। लौकी को देखकर वे ऐसे बिदके जैसे सामने नागिन फन फैलाए खड़ी हो—”यह तो पानी का छल है, इसमें आत्मा कहाँ है?” करेले पर तो उन्होंने अपनी पूरी दार्शनिक क्षमता झोंक दी, बोले, “इतनी कड़वाहट तो समाज में भी नहीं, जितनी इस अधम फल में है।” आलू को उन्होंने “अहंकार का प्रतीक” माना और पनीर को “धोखेबाज रईस।” कटहल उन्हें मांस का स्वांग लगा, तो टमाटर रक्त के धब्बों जैसा। अरबी को उन्होंने फिसलन भरी राजनीति का नाम दिया और मूली को सामाजिक मर्यादा का दुश्मन। सुधा की आँखों से आंसू नहीं, मानो पिघला हुआ धैर्य बह रहा था। वह बीसवीं बार रसोई की ओर गई, एक ऐसी सब्जी लेकर जिसे ठुकराने का मतलब था अस्तित्व का अंत।

सुधा ने अगली सब्जी सामने रखी—तोरई। अलख जी ने उसे छुआ और पीछे हट गए जैसे करंट लग गया हो। “यह? यह तो किसी बीमार की अंतिम वसीयत जैसी पीली और मरी हुई है। इसे खाकर तो यमराज भी रास्ता भूल जाए।”  पत्नी की सहनशीलता अब अपने चरम पर थी। कमरे का तापमान गिर रहा था। अलख जी ने मेज को धक्का दिया और चीख पड़े, “सुधा, इस घर में इतनी सारी सब्जी हैं, पर एक भी ऐसी नहीं जो मेरी अंतरात्मा को तृप्त कर सके। क्या तुम चाहती हो कि मैं भूखा मर जाऊं?” दुखी होते हुए बोले। सुधा स्थिर खड़ी थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और अलख जी के बहुत करीब जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में इतना गुस्सा था कि शब्दों में बयान करना मुश्किल है। अलख जी डरकर कुर्सी से चिपक गए।

अचानक सुधा ने अलख जी के सामने एक खाली प्लेट रखी। बिल्कुल कोरी, चांदी जैसी चमकती हुई। अलख जी ने हकलाते हुए पूछा, “इसमें… इसमें क्या है?” सुधा ने एक अदृश्य निवाला तोड़ा और अलख जी के मुँह के पास ले गई। “खाओ,” उसने आदेश दिया। अलख जी ने मुँह खोला, कुछ महसूस नहीं हुआ। “स्वाद कैसा है?” सुधा ने पूछा। अलख जी की आँखें फटी की फटी रह गईं, “अरे! यह तो अद्भुत है! ऐसा स्वाद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा! क्या है यह?” सुधा धीरे से मुस्कुराई। उसने कहा, “यह आपका अपना ‘अहंकार’ है। पिछले चालीस मिनट से आप वही तो उगल रहे थे। मैंने बस उसे ही फ्राई करके परोस दिया है। इतनी सारी सब्जियां तो केवल बहाना थीं, असली व्यंजन तो आपका वह कुतर्क था जिसे दुनिया ‘नखरा’ कहती है।” अलख जी ने प्लेट देखी, वह अभी भी खाली थी, पर उनके पेट से डकार आई। वे हतप्रभ थे कि उन्होंने बिना कुछ खाए अपना पूरा अस्तित्व ही डकार लिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ – हास्य-व्यंग्य – “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य – व्यंग्य “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ ☆

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सुबह डोरवेल बजी, मैं समझ गया कि अवश्य ही किसी समस्या के साथ वर्मा जी आए होंगे। दरवाजा खोला, मेरा अनुमान सही था। वर्मा जी अंदर आकर चुपचाप पालथी मारकर सोफे पर बैठ गए। मैं अखबार पढ़ने लगा।

वर्मा जी का मौन टूट ही नहीं रहा था। कुछ देर बाद मैंने पूछा – क्या बात है वर्मा जी ? वे बोले – बहुत बुरा हुआ भाई साहब और फिर मौन हो गए ! इतने में मेरी पत्नी चाय लेकर आ गई। वर्मा जी की मुद्रा देख कर उसने भी प्रश्न किया – क्या बात है वर्मा जी आज इतनी उदासी के साथ मौन ? वे चाय की चुस्की लेते हुए बोले – भाभी जी बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा – भाई जी, बुरा कहां हुआ ? कल आपके घर गैस का सिलेंडर आ गया है, डीजल, पेट्रोल भी मिल रहा है। ट्रंप का दिमाग दुरुस्त चलते ईरान – अमेरिका युद्ध भी समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है और आप कह रहे हैं कि बहुत बुरा हुआ ? वे बोले – भाई साहब आज गैस, पेट्रोल, ईरान – अमेरिका की बात नहीं, मैं तो संसद में महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने के संदर्भ में कह रहा हूं कि बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा भाई जी इस बिल के पीछे सरकार और विपक्ष का जो भी नजरिया या राजनीति हो वह अलग बात है, लेकिन यहां मुझे फिल्म “बाजीगर” का एक डायलॉग याद आ रहा है जिसे शाहरुख खान ने हीरोइन के पिता से जानबूझ कर कार रेस हारने के बाद बोला था – “जीतने के लिए हारने वाले को बाजीगर कहते हैं”। सब जानते हैं कि मोदी जी “बाजीगर” हैं, उनकी हार के पीछे कोई राज हो सकता है ! वैसे महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने से देश के स्वार्थी पुरुष अवश्य ही खुश हो रहे होंगे। मेरी बात सुनकर वर्मा जी का दर्द छलक पड़ा, आँखें डबडबाई आईं। वे बोले – भाई साहब, मेरे सपने तो चकनाचूर हो गए। सोचा था अपनी पत्नी को लोकसभा का चुनाव लड़ाउंगा और सरपंच पति, पार्षद पति, विधायक पति की तरह सांसद पति कहलाऊंगा, पर हाय री किस्मत। मैंने कहा – वर्मा जी, दुखी न हों 29 में न सही 34 के चुनाव तक तो महिला आरक्षण लागू हो ही जाएगा। 34 के चुनाव के लिए अभी पर्याप्त समय है आप भाभी जी के नाम से समाज सेवा और चुनाव प्रचार तो चालू कर ही दें ताकि जीत पक्की हो जाए। जब भाभी जी समाज सेविका और लोकसभा की भावी प्रत्याशी कहलाएंगी तब भी आपकी ही इज्जत बढ़ेगी। वे राहत की सांस लेते हुए बोले – भाई साहब आपने सही कहा, लेकिन 34 के चुनाव के लिए अभी लगभग 9 साल हैं इतना लंबा समय कटेगा कैसे ? मैंने कहा- भाई जी आप तो भाभी जी की समाज सेवी और भावी लोकसभा प्रत्याशी की छवि बनाने में जुट जाइए समय तो चुटकियों में बीत जाएगा, बल्कि कहीं ऐसा न हो कि समय कम पड़ जाए और आपको पछताना पड़े।

मेरी बात सुनकर वर्मा जी उठ खड़े हुए। मैंने पूछा क्या हुआ, कहां जा रहे हैं ? वे बोले – भाई साहब, देर नहीं करना चाहता, पत्नी की छवि बनाने का कार्य शुरू कर ही दूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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