हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१७ ☆ भावना के मुक्तक – मन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – मन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – मन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

तुम आए हो यहाँ  पर तो बड़ा मौसम सुहाना है।

मुझे तो आज लगता है पुरवाई तो बहाना है।

तेरी बातों को मैं तो तेरे नयनों से पढ़ती हूँ।

मुझे तो लगता है अब तो तुझे बस बातें घुमाना हैं।

 *

तेरी बातों से समझा है तेरा आना बहाना है।

मुझे तुम प्यार से देखो यही तेरा बहलाना है।

तू आया है मनाने मुझको चाहत में मेरी तो

नहीं समझी तेरी बातें ये तो मन को लुभाना है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९९ ☆ कविता – बाबाओं से बचकर रहिए… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता –  बाबाओं से बचकर रहिए आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९९ ☆

बाबाओं से बचकर रहिए☆ श्री संतोष नेमा ☆

बाबाओं   से    बचकर    रहिए |

मन  की  बात न  सबसे  कहिए ||

ओढ़  धर्म  का   चोला   निकलें |

इनकी   नीयत  खुद  ही  पढ़िए ||

*

बन    जाते    हैं    ये    अवतारी |

रहे    ढोंगपन     इनका     भारी ||

करें   कभी    मत   अंधी   श्रद्धा  |

बहुधा   तन   के   हुए   शिकारी ||

बहिन   बेटियों    सावधान    हो |

स्वयं   ज्ञान   से   निर्णय  करिए ||

बाबाओं    से    बचकर    रहिए |

*

रोज    मीडिया    हमें    दिखाता |

नाम    नवीन    रोज     बतलाता ||

पाखंडों   की    कमी   नहीं    है |

इनका  नहीं   धर्म     से    नाता ||

आज      चेतना     हुई     जरूरी |

बहुरुपियों   से  खुद   ही  बचिए ||

बाबाओं    से     बचकर    रहिए |

*

वाणी    में    है    ज्ञान   धर्म   का |

मन   रखते   पर   बुरे   कर्म   का ||

इनके     अन्तस    को    पहचानो |

हो   न   सामना  कभी   शर्म  का ||

खूब   चढ़ा   कर   इन्हें    चढ़ावा |

नहीं   मुफ्त    में   झोली   भरिए ||

बाबाओं    से     बचकर     रहिए |

*

ईश्वर    पर    हम   रखें    आस्था |

एक    लक्ष्य    बस   एक   रास्ता ||

हर मुश्किल  का  हल  करता  वह |

रखें    न    कोई    अन्य    वास्ता ||

डग – डग   पर  मिलता  है  धोखा |

अब  “संतोष”   धर्म  पथ   गहिए |

बाबाओं    से     बचकर     रहिए ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ फॅमिली डे ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  फॅमिली डे।)

 

? आलेख – फॅमिली डे ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

वर्तमान समय में समाज जिस गति से आगे बढ़ रहा है, बदल रहा है, सभी जब भी आपस में मिलते हैं एक ही बात करते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता थाl अब आपको नहीं लगता बहुत कुछ बहुत जल्दी बदल गया है? आखिर क्या बदला? पानी का रंग, फूलों की सुगंध, पक्षियों की आवाज, भवरों का गुनगुन या पत्तों का रंग? चलिए इन सब को छोड़ते हैंl कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा देखने का नजरिया ही बदल गया हो? कहते हैं ना जैसी जाकि दृष्टि वैसी दिखे सृष्टिl जैसी नजर वैसा दिखे नजाराl हम इंसान एक दूसरे में बुराइयाँ ही खोज रहे हैंl यही हमारी दृष्टि का दोष हैl

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि खिड़की की सलाखों से बाहर झाँक कर देखा तो नीचे कीचड़ और ऊपर चाँद पायाl

ये हमारा नजरिया ही तो है कि हम क्या ढूंढ़ रहे हैं हमें ज्ञात ही नहींl हम यहीं बातें अपने ड्राइंग रूम से लेकर ऑफिस के गलियारे तक, प्लेटफॉर्म से लेकर शादी के शामियाने तक सिर्फ और सिर्फ बुराइयाँ ही ढूंढ़ रहे हैं, बुराइयाँ ही देख रहे हैं और उन्हें ही बढ़ाचढ़ा कर एक दूसरे को बयां करते आ रहे हैंl हम समाज का एक ऐसा आइना बच्चों के सामने पेश कर रहे हैं जो उनकी परवरिश के दौरान सही नहींl इस तरह हम हमारे स्वयं के परिवार में भी पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट नहीं कर पा रहे हैंl जब भी हम अपने परिवार के साथ बैठते हैं तो आस पडोस की, सगे संबंधियों की बुराइयाँ ही तो करते रहते हैंl

परिवार में बच्चों के साथ अच्छी बातें, अच्छी आदतें एवं अच्छे अनुभवों को साझा करेंl और एक पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट करेंl

कुछ दिनों पहले हम फॅमिली डे मना रहे थेl सारा व्हाट्सप्प का इनबॉक्स भर गया थाl और बिना पढ़े ही डिलीट कर दिया गयाl

मैं सोच रही थी कि हम आज के दिन भी अपने परिवार में महज एक दिखावे की जिंदगी जी रहे हैंl हम कुछ बेशकीमती उपहारों के जरिये रिश्ते खरीद रहे हैंl क्या हम इतना भूल गये कि रिश्ते बिकाऊ नहीं होते?

इस खरीद फरोख्त कि दुनिया से बाहर आएंl अपने बच्चों को जीवन के अर्थ की सही पहचान कराएंl हमने तो नर्सरी के बच्चे को भी इस वैश्विक दौड़ का हिस्सा बना दियाl बच्चों की विशेषताओं एवं खूबियों को किनारे कर दियाl उनकी भावनाओं को कुचल कर रख दिया और बड़ी ही सहजता से ख दिया कि हमने यह तो नहीं कहा थाl

हम क्यों ऊँचे पद और प्रतिष्ठा के लालच में अपने बच्चों से उनका बचपना और साथ में उनकी मासूमियत जाने अंजाने में छीन रहे हैं ? अंत में मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि – प्यार, विश्वास और उम्मीद की जिंदगी अपने बच्चों को दीजिएl साथ ही उन्हें पहचानिए और महसूस कीजिएl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १९ – कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता युद्ध अहंकार का…।)

☆ शशि साहित्य # १९ ☆

? कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बादलों के नरम आगोश में पलकें मूंदे,

चांद मुस्कुरा रहा था,

तेज रोशनी निगल गई,

उसकी इस खुशगवारी को,

हड़बड़ा कर आंखें खोले,

देख रहा जलती धरती को

धरती कांप रही है डर से,

कैसे रक्षित करे,

लाखों जिंदगानी को,

खून के आंसू बहा रही है,

धधकता, देख अपने आंचल को,

कोई तो, कैसे तो, खत्म करे,

भीषण युद्ध की विभीषिका को,

चांद भी रोने लगा, चित्कारता देख पृथ्वी को..

विचलित हो गया, भविष्य अपना देख कर..

धिक्कार रहा है मानवता को,

कैसे रोके मनुष्य की इस आवाजाही को..

हश्र उसका भी निश्चित है,

खा जाएगा, खत्म कर देगा मानव अहंकार,

उसकी शीतल सुंदरता को..

सब दुआ करो….

इंसानियत खत्म करे, इस कलंकित कृत्य को..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८९ – सुखी संसाराची छाया…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८९ – विजय साहित्य ?

☆ सुखी संसाराची छाया…!

(काव्यप्रकार : अष्टाक्षरी)

परंपरा संस्कृतीत,

नारीशक्ती आहे वसा.

कर्तृत्वाची पराकाष्ठा,

संयमाचा दैवी ठसा…! १

*

गाते भुपाळी अंगाई,

नारी दळते दळण.

घर स्वच्छता पहाटे,

जमा करी सरपण…!२

*

लागे जीवनाचा कस,

होई सासुरासी जाच.

कसे जगावे जीवन,

सांगे आठवांना वाच…!३

*

पिढ्या पिढ्या राबतसे,

घर संसारात नारी.

पती मानुनी ईश्वर,

घेई कर्तृत्व भरारी…!४

*

कष्ट,त्याग, समर्पण

नाते संबंधांचा सेतू.

नारीशक्ती कर्मफल,

घरे जोडण्याचा हेतू…!५

*

माती आणि आभाळाशी,

नारी राखते इमान.

संगोपन छत्रछाया,

नारीशक्ती अभिमान…!६

*

नारी कालची आजची,

जपे स्वाभिमानी कणा.

कष्ट साध्य जीवनाची,

नारी चैतन्य चेतना…! ७

*

बदलले जरी रूप,

नाही  बदलली नारी.

अधिकार कर्तव्याची,

करे विश्वासाने वारी…!८

*

नारी आजची साक्षर,

करी कुटुंब‌ विचार.

सुख ,शांती, समाधान,

करी ऐश्वर्य साकार…!९

*

नर आणि नारी यांचा,

नारीशक्ती आहे बंध.

जाणिवांचा नेणिवांशी,

दरवळे भावगंध…!१०

*

देई कुटुंबास स्थैर्य,

नारीशक्ती प्रतिबिंब.

रवि तेज जागृतीचे,

जणू एक रविबिंब..! ११

*

नारी संसार सारथी,

नारी निजधामी पाया.

तिची कार्यशक्ती आहे,

सुखी संसाराची छाया…!१२

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १५ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १५ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

गाथेतून दिसणारे संत तुकाराम

 भक्ती (३)

तुकारामांचे मन प्रपंचात, संसारात मुळीच रमत नाही. पांडुरंगाच्या भेटीची त्यांना तळमळ लागून राहिली आहे, म्हणूनच ते एकसारखे म्हणतात,

भेटी लागी जीवा लागलीसे आस

पाही रात्रंदिस वाट तुझी

परमेश्वर प्राप्तीच्या वेडाने

कन्या सासुरासी जाये। मागे परतुनी पाहे।

तैसे झाले माझ्या जीवा ।केव्हा भेटसी केशवा।।

 

जीवना वेगळी मासोळी तैसा तुका तळमळी. ।

तुकारामांची अवस्था पाण्याबाहेर तडफडणाऱ्या मासोळी सारखी झाली आहे. पांडुरंगाची कृपादृष्टी मिळवण्यासाठी आता काय करावे

हा एकच विचार त्यांच्या मनात रात्रंदिवस घोळत आहे.

ते पांडुरंगाला साद घालतात आणि म्हणतात,

तान्हेल्याची धनी फिटे गंगा नव्हे उणी।

माझे मनोरथसिद्धी पाव भावे कृपानिधी।।

तू तो उदारांचा राणा माझी अल्पशी ।

कृपादृष्टी पाहे तुका म्हणे होई साहे ।

एखाद्या तहानलेल्या माणसाने गंगेतले पाणी पिऊन त्याचे समाधान झाले, तरी गंगेचे पाणी काही कमी होत नाही. माणूस मात्र तृप्त होतो. त्याचप्रमाणे हे कृपेच्या सागरा माझ्या मनातल्या इच्छा, माझे सर्व मनोरथ तूच पूर्ण करू शकतोस.

तुम्ही माझ्याकडे कृपादृष्टीने पहावे एवढीच माझी अल्पशी इच्छा आहे. माझ्या साधनेत मला मदत करा.

भक्ती मार्ग हा परमेश्वरा प्रती जाण्याचा सर्वात सोपा मार्ग आहे. बहुतेक सर्व साधुसंत याच मार्गाने गेले आहेत, कारण या मार्गात कुठेही आड वळणे नाहीत. भक्ती मार्गाची ही वाट अगदी स्वच्छ आहे.

संत तुकारामही याच मार्गाने जात आहेत.

ते साधकांना सांगतात,

नव्हतो सावचित्त तेणे अंतरले हित।

पडिला नामाचा विसर वाढविला संसार।।

लटक्याचे पुरी गेलो वाहूनिया दूरी।

तुका म्हणे नाव आम्हा सापडला भाव।।

ते स्वतः विषयी सांगतात की हरी चिंतनाविषयी सावध नव्हतो, म्हणून विघ्ने आली. हरी नामाचा विसर पडला आणि संसार वाढवत बसलो. मायेच्या पुरात पुरता अडकलो. परंतु आता जागा झालो आहे. हरिभक्तीची नौका सापडली आहे.

तेव्हा आता काय उणे आम्हा विठोबाचे पायी

नाही ऐसे काही तेथे एक

तुका म्हणे मोक्ष विठोबाचे गावी

फुकाची लुटावी भांडारे ती

पांडुरंगाच्या गावाला मोक्षाची भांडारे भरलेली आहेत आणि भक्तांना ती अगदी मोफत आता लुटता येतात.

तुकाराम महाराज या मायामोहातून, प्रपंचातून मुक्त होऊन पांडुरंगाशी एकरूप होण्यासाठी पंढरीच्या पांडुरंगाच्या चरणावर माथा ठेवण्यासाठी आतुर झाले आहेत. अतिशय व्याकुळ झाले आहेत. ते म्हणतात, ” पांडुरंगा तू मला फक्त भेट दे”. त्यासाठी…

नलगे हे तुझे ब्रह्मज्ञान। गोजिरे सगुण रूप पुरे।।

लागला उशिर।पतित पावन ।विसरूनी वचन। गेलास या।।

जाळूनी संसार। बसला अंगणी ।तुझे नाही मनी ।मानसी हे।।

तुका म्हणे नको राग रागेजू विठ्ठला। उठी पावतात देई मला भेटी आता।।

या अभंगातूनही विठ्ठलाच्या भेटीची तुकाराम महाराजांना लागलेली तळमळच दिसून येते. या अभंगात वापरलेला रागेजू हा शब्द मला विशेष लक्षणीय वाटला. लहान मूल जसे लडिवाळपणे त्याच्या मातेकडे काही हट्ट करते, त्याचप्रमाणे तुकाराम महाराज या माऊलीला रागावू नकोस असे मोठ्या लडिवाळपणे सांगत आहेत.

संसारातून तुकाराम महाराजांना पूर्ण विरक्ती आलेली आहे. पंचेंद्रियांवर ताबा मिळवलेला आहे, आणि ते पांडुरंगाला म्हणतात,

संसार हा तीही केला पाठमोरा

नाही द्रव्यदारा जया चित्ती

शुभाशुभ नाही हर्षामर्श अंगी

जनार्दन जगी होऊनी ठेला

तुका म्हणे दिला देह एकसरे

जयासी दुसरे नाही मग

त्यांना आता मान मरातब काही नको. त्यात त्यांना थोडेही सुख वाटत नाही. गोड अन्न सुद्धा त्यांना विष समान वाटत आहे. कोणी त्यांची स्तुती केली तर त्यांचा जीव कासावीस होतो.

ते म्हणतात,

नको मृगजळा होऊ मज

तुका म्हणे आता करी माझे हित

काढावे जळत्या आगीतून.

हा संसार म्हणजे त्यांना जळती आग वाटत आहे.

तुकाराम महाराजांच्या प्रत्येक शब्दातून त्यांची विठ्ठल भक्तीची आणि विठ्ठलाच्या भेटीची तळमळ दिसून येते

विठ्ठला रे तू उदाराचा राशी

विठ्ठला तुझं पाशी सकळसिद्धी

विठ्ठला रे तुझे नाम बहु गोड

विठ्ठला तू पुरविशी सर्व कोड

विठ्ठला रे तुझे श्रीमुख चांगले

विठ्ठला रे सोस घेतला जीवे

विठ्ठला रे शोक करीत असे तुका

विठ्ठला तू एका झडकरी

संत तुकाराम हे पूर्णपणे विठ्ठलमय झालेले आहेत.

क्रमशः… १५ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ६४ आणि ६५ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ६४ आणि ६५ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले 

।। श्री नारद उवाच ।। 

भक्ति सूत्र – ६४

अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम् ||६४||

अर्थ : अभिमान म्हणजे गर्व, ढोंग, कपट, यांसारख्या दुर्गुणांचा त्याग करावा.

विवेचन: अभिमान हा भल्याभल्या साधकांना पथभ्रष्ट करतो असे म्हटले तर चुकीचे होणार नाही. याची अनेक उदाहरणे आपल्या सर्वांना ठाऊक आहेत. अभिमान आणि स्वाभिमान हे जोडशब्द आहेत. त्यातील सीमारेषा अत्यंत सूक्ष्म आहे. ती नीट समजून घेतली तर मनुष्यात आमूलाग्र बदल घडेल. अभिमान कोणाला नसतो ? , जसा तो श्रीमंताला असतो तसा तो भिकाऱ्याला देखील असतो. समजा एखाद्या भिकाऱ्याला एका घरात भीक मिळाली नाही तर तो लगेच सांगतो, तुमचं शेवटचं घर नाहीए, मी इतरत्रही भीक मागेन. असा अभिमान काय कामाचा ? हिरण्यकश्यपूला मारायला भगवंत नरसिंह अवतारात प्रगट झाले. साक्षात भगवंत समोर असतानाही हिरण्यकश्यपूचे हात नमस्कारासाठी जोडले न जाता ते देवाला मारण्यासाठी शस्त्राकडे गेले. यावरून आपल्याला अभिमान काय ‘चीज’ आहे हे लक्षात येऊ शकते. आपल्या घरात दुधाचे पातेले असते, त्याला आतील बाजूने दुधातील तुपाचा तवंग चिकटलेला असतो. घरातील माताभगिनी त्यात गरम पाणी ओतून ठेवतात म्हणजे तूप पाण्यात विरघळून जाते आणि नंतर ते पातेले घासून स्वच्छ करण्यात येते. इतके करूनही जर ते पातेले नीट घासले गेले नाही आणि त्यात पुन्हा दूध घेतले गेले तर तेही नासतें. मानवी मनाचे असेच आहे. अभिमान मनुष्याच्या मनाला असाच चिकटून असतो. सर्व सद्गुरू मातृहृदयी असतात. ते आपल्या मनाचे पातेले लख्ख व्हावे, आपली देहबुद्धी, आपला अभिमान नष्ट व्हावा म्हणून प्रयत्न करीत असतात. मनुष्याने ह्या नश्वर जगात अलिप्त व्हावे असे त्यांना वाटत असते म्हणून ते अभिमानाचा समूळ नाश करण्याचा प्रेमळ सल्ला साधकाला देतात.

मनुष्याची वाटचाल तीन प्रकारे होत असते. देहाकडून देहाकडे, देहाकडून मनुष्यत्त्वाकडे आणि देहाकडून देवत्वाकडे. यापैकी पहिली वाटचाल आपसूक होत असते. दुसरीसाठी काही प्रयत्न करावे लागतात तर तिसरी स्थिती प्राप्त होण्यासाठी मात्र अनेक आणि अथक प्रयत्नांची गरज असते. श्री सद्गुरू गोंदवलेकर महाराज यांचे एक वचन आहे, *”मनुष्य म्हणून जन्माला आलेला माणूस, माणूस म्हणून मेला तरी बरा! “* साधक, मुमुक्षु, सिद्ध या तर खूप पुढच्या गोष्टी राहिल्या. श्री महाराज असे का म्हणाले असतील ? यावर चिंतन करताना असे लक्षात आले की दैनंदिन व्यवहार करताना मी दिवसभरात मनुष्य असल्याचे दाखवून देतो, थोडक्यात मी दिवसभर माणसा सारखा वागतो का ? थोडा सूक्ष्म विचार केला तर असे लक्षात येईल, मनुष्य अनेक प्राण्यांसारखा वागत असतो. उदा. स्वार्थासाठी तो मांजरीसारखा लोचट होतो, कुत्र्यासारखा तो लोकांवर भुंकत असतो (डाफरतो! ), कधी तो गरीब गाय, वासरू असतो तर कधी गोगलगाय, तर कधीकधी तो गाढवासारखा सुखदुःखांची ओझी वाहत असतो. थोडक्यात दिवसभरात मनुष्य आपल्या कृतीतून स्वतःमधील ‘अनेक’ प्राण्यांची ओळख स्वतःच स्वत:ला आणि जगाला करून देत असतो. दिवसभरात तो फार कमी वेळ ‘मनुष्य’ म्हणून वागत असतो. श्रीदासबोधातील ‘पढतमूर्ख समास’ सुद्धा अशा लोकांसाठीच लिहिला गेला असावा, असे म्हणायला हा उत्तम आधार आहे. श्रीसमर्थ आपल्याला सांगत आहेत की ‘मनुष्य ते मनुष्य’ प्रवास होण्यासाठी मनुष्याच्या अंगी अतिलीनता असणे अनिवार्य आहे. अतिलीन होणे म्हणजे ‘मी’ चा पूर्णपणे ऱ्हास होणे. आंब्याचे झाड फळांनी डवरले की नकळत झुकते तशी महान मंडळी कायम अतिलीन असतात. स्वतः ‘सद्गुरू’ असूनही श्री गोंदवलेकर महाराज स्वतःला रामाचा ‘दीनदास’ म्हणायचे. समर्थ तर स्वतःला रामदास म्हणायचे. विश्वमाऊली झालेले श्री ज्ञानेश्वर महाराज स्वतःला *”येऱ्हवी तरी मी मुर्खु”* (ज्ञाने. १. ७६) असे संबोधतात.

संत ज्ञानेश्वर म्हणतात, “म्हणौनि थोरपण पर्‍हां सांडिजे । एथ व्युत्पत्ति आघवी विसरिजे । जैं जगा धाकुटें होईजे । तैं जवळीक माझी ॥”

शरणागती खूप महत्वाची आणि अत्यावश्यक आहे. कार्यालयात अधिकाऱ्यांपुढे स्वार्थासाठी लीन (खरेतर हाजीहाजी करणे) आणि भगवंता पुढे लीन होणे यात मूलभूत फरक आहे, तो वाचकांनी नीट समजून घ्यावा. संत जरी असे अतीलीन होऊन वागत असले, सामान्य मनुष्य मात्र तसा नसतो. त्याला जात्याच अहंकार असतो आणि वाढत्या वयागणिक आणि इतर गोष्टींमुळे तो कमी न होता, त्यात सतत वाढ होत असते. म्हणून अहंकार ते लीनता हा प्रवास कठीणच असतो. हा प्रवास करणे म्हणजे मनाला बांध घालणे, मनावर नियंत्रण मिळविणे. मनुष्याकडे व्युत्पत्ती, विद्वता जरूर असावी, पण ती विसरता आली पाहिजे, नव्हे विसरता आलीच पाहिजे. मी म्हणजे कोणी विशेष आहे असे न वाटता आपण जगातील सर्व वस्तुमात्रांसारखेच एक आहोत असे वाटून खऱ्या अर्थाने नम्र होता आले पाहिजे. सद्गुरुंना शरण गेल्याने अंगी लीनता येऊ शकते. साधना करताना आपली सर्व कर्मे जर भगवंतांस किंवा आपल्या सद्गुरूंना अर्पण करता आली तर अंगी लीनता बाणायला अधिक गती येते. समर्थ म्हणतात त्याप्रमाणे लिनतेकडील प्रवास साधकाला जमू लागला याचा अर्थ साधकाची प्रगती योग्य गतीने चालू आहे. समर्थांना अपेक्षित असलेली लीनता ही दिखाऊ, नाटकी नक्कीच नसावी. ती सर्वभावें आणि स्वभावतः असावी. सर्वभावें (कोणत्याही भावात) म्हणजे मनापासून स्वीकारलेली लीनता आणि स्वभावे म्हणणे सहजभावाने कोणताही अभिनिवेश न बाळगता. समर्थ काही दुर्गुणांच्या अति नको असे म्हणतात पण लीनतेच्या बाबतीत मात्र अति हवे असे आग्रहाने सांगतात. लीनतेचे वागणे सर्वांना आवडते.

आज ‘चार’ पुस्तके शिकलेला मनुष्य स्वतःला ‘शहाणा’ समजू लागतो आणि स्वतःच्या (काही कारणांमुळे) कमी शिकलेल्या आईबाबांना अडाणी’ समजतो. इतकेच नव्हे तर हाच मनुष्य स्वार्थासाठी अनेक ठिकाणी लाचारी करताना दिसत असतो. म्हणून समर्थ सांगतात की अतिलीनता ही दिखाऊ असू नये तर ती पोटातून असावी, फक्त ओठातून असू नये. कारण दिखाऊपण फार काळ टिकत नाही. एक वचन आहे, *’आपण सर्वांना सर्वकाळी मूर्ख बनवू शकत नाही’*, काही जणांना काही वेळा मूर्ख बनवू शकतो. एकदा का दिखाऊपणाचा मुखवटा उतरला की मग त्या मनुष्याचे आयुष्य विराण बनते. साधन करता करता मनुष्य आपले सर्व कर्म परमेश्वराच्या चरणी अर्पण करतो, तेव्हा लीनता त्याच्या अंगी मुरू लागते. मनुष्याच्या अंगी खरी लीनता असेल तर ती संत-सज्जनांना आनंद देते.

या सूत्राचे सार एक ओळीत सांगायचे झाल्यास पुढील प्रमाणे सांगता येईल.

जनीं निंद्य ते सर्व सोडोनि द्यावे।

(मनाचे श्लोक 2)

जय जय रघुवीर समर्थ

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भक्ति सूत्र – ६५

तदर्पिताखिलाचार: सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणियम् ||६५||”

अर्थ आपले सर्व आचार, व्यवहार भगवंताला अर्पण करूनही काम, क्रोध, अभिमान इत्यादि विकार उद्भवले तर तेही भगवतांच्या ठिकाणी समर्पित करावे.

विवेचनआपण सध्या नारद भक्ति सूत्रे अभ्यासत आहोत. पारमार्थिक मार्गाने जाताना चूक झाली तर पुन्हा पहिल्यापासून सुरुवात करावी लागते. तिथे काठावर उत्तीर्ण, गुणाची जोड देऊन उत्तीर्ण, अमक्याचा मुलगा, तमक्याचा मुलगा असे तिथे चालत नाही. हजारो वर्षे तपश्चर्या करणारे ऋषी छोट्याश्या कामनेचे बळी ठरून साधनाभ्रष्ट झाल्याची उदाहरणे इतिहासात आढळतात. हे सर्व सांगण्याचे कारण असे की जप करायला सुरुवात केली, नाम घ्यायला सुरुवात केली, एखाद्या सत्संगात अमुक एक साधना ऐकली आणि ती करण्यास सुरुवात केली की मनुष्याला आज आता ताबडतोप अनुभूती हवी असते. अहो, जिथे पदवीधर होण्यासाठी आयुष्याची पंधरा वर्षे खर्च करावी लागतात, तिथे भगवतांची प्राप्ती साधना करून होईल असे म्हणणे किती सयुक्तिक आहे याचा प्रत्येक साधकाने विचार करायला हवा.

मनुष्याची वाटचाल सामान्यपणे तीन प्रकारे होत असते. देहाकडून देहाकडे, देहाकडून मनुष्यत्त्वाकडे आणि देहाकडून देवत्वाकडे. यापैकी पहिली वाटचाल आपसूक होत असते. दुसरीसाठी काही प्रयत्न करावे लागतात तर तिसरी स्थिती प्राप्त होण्यासाठी मात्र अनेक आणि अथक प्रयत्नांची गरज असते. श्री सद्गुरू गोंदवलेकर महाराज यांचे एक वचन आहे, “मनुष्य म्हणून जन्माला आलेला मनुष्य मनुष्य म्हणून मेला तरी बरा! “

मनुष्याला मनुष्य म्हणून घडण्याच्या मागे अनेक विकार विघ्न आणीत असतात. विकारांचा विचार आपण विस्तृतपणे मागील लेखांत पाहिला आहे. या विकारांवर विजय मिळवणे निव्वळ अवघड आहे. एकतर सध्या विकारांची संख्या हनुमानाच्या शेपटीसारखी वाढत आहे आणि मनुष्याची निश्चयशक्ती मात्र कमकुवत होत आहे, त्यामुळे मनुष्याला खूप कष्ट करण्याची गरज आहे.

यावर एक उपाय नारद महाशय सांगतात, की हे सर्व विकार भगवंताच्या चरणी अर्पण करावेत. त्यासाठी सर्वात सोपा उपाय म्हणजे प्रत्येक गोष्ट भगवंताला सांगून करावी. प्रत्येक इच्छा देवाला सांगावी, प्राप्ती झाली तर त्याचा प्रसाद म्हणून स्वीकारावी आणि प्राप्ती झाली नाही तर त्याची इच्छा नाही असे म्हणून ती इच्छा आपल्या मनातून काढून टाकावी. थोडक्यात आपले विकार देवाला अर्पण करावेत. अशी स्थिती अनेक साधकांना अनुभवावी लागते. यातून संतांची देखील सुटका नाही. संत तुकाराम महाराज म्हणतात,

“काम क्रोध आम्ही वाहिले विठ्ठलीं । आवडी धरिली पायांसवें ॥१॥ आतां कोण पाहे मागें परतोनि । गेले हारपोनि देहभाव ॥ध्रु. ॥”

जय जय रघुवीर समर्थ

नारद महाराज की जय!!!

 भक्तीसूत्रे – ६४ व ६५ 

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१० ☆ आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता?☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१० ☆

?  आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लघुकथा हिंदी साहित्य की एक संक्षिप्त विधा है, जो क्षणिक घटना पर आधारित प्रभावशाली कथन प्रस्तुत करती है। इसके मूल नियमों में ‘एक ही समय काल की घटना’ प्रमुख है, यानी कथा पूर्णतः एक ही क्षण या संकीर्ण समयावधि में समाहित हो। यह नियम प्रेमचंद काल के बाद के लघुकथाकारों शिवप्रसाद सिंह आदि के द्वारा प्रतिपादित हुआ, जो लघुकथा को उपकथा या लघु कहानी से अलग करने का प्रयास था।

लेकिन क्या यह नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति क्षमता को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करता? यह प्रश्न आज प्रासंगिक है, क्योंकि यह विधा की गतिशीलता को बाँध देता है।

नियम की जड़ें और औचित्य ..

लघुकथा को ‘क्षण-कथा’ कहा जाता है, जहाँ उद्देश्य पाठक पर तत्काल प्रभाव छोड़ना है। एक ही समय काल का नियम अनावश्यक विस्तार रोकता है, पात्रों की संख्या सीमित रखता है और अंत को तीक्ष्ण बनाता है।

संक्षिप्तता ही लघुकथा को शक्तिशाली बनाती है। तात्कालिकता के नियम का औचित्य यही है, लघुकथा लंबी कहानी का संक्षिप्त संस्करण न हो, बल्कि स्वतंत्र विधा बने।

अभिव्यक्ति क्षमता पर समय सीमाबद्धता का नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति को कृत्रिम रूप से बाँधता है। वास्तविक जीवन में कोई घटना शून्य काल में नहीं घटती । कारण-परिणाम की श्रृंखला घटना के समय को  फैलाती है। एक ही समय काल थोपने से जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिक मुद्दे इस विधा में व्यक्त नहीं हो पाते। अंतिम रूप से व्यंग्य, जो लघुकथा का मूल ट्विस्ट है, अक्सर ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ माँगता है, जो एक क्षण में समेटना संभव नहीं होता है।

एक काल्पनिक लघुकथा  की चर्चा करें।

मान लीजिए, एक आल्हा गायक गांव में आता है। यदि नियम पालन करें, तो “गायक ने तार छेड़ा। श्रोता चुप। एक सांड, भीड़ में घुस आया, अचानक भगदड़ मच गई। गायक भागा।”

लेकिन यदि हल्का समय विस्तार अनुमत हो, गायक का आगमन, गायन और सांड वाली घटना का संदर्भ, थोड़ी चर्चा परिदृश्य पर, तो प्रभाव गहरा हो सकता है।

एक और उदाहरण लें,

समकालीन मुद्दा, जैसे भोपाल गैस त्रासदी पर लिखें  तो, एक ही समय में ‘पीड़ित का दर्द’ दिखाना संभव नहीं, वह लंबी श्रृंखला रही है।

है से थी का सफर ।

कुछ आधुनिक लघुकथाकार इस समय सीमा का उल्लंघन करते हुए लघुकथा लिख भी  रहे हैं।

यह नियम तोड़ने से विधा ‘फ्लैश फिक्शन’ की वैश्विक धारा से जुड़ सकती है, जहाँ समय काल का लचीलापन स्वीकार्य है।

संतुलन की आवश्यकता..

निश्चित ही यह नियम लघुकथा को ‘चुटकुला’ बनने से बचाता है, लेकिन मेरी समझ में यह रचनात्मकता को कुंठित करता है। आलोचक विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि लघुकथा ‘संक्षिप्तता’ है, न कि ‘काल-सीमा’। यदि नियम कठोर रहे, तो विधा अप्रासंगिक हो जाएगी, जैसे ताजा समाचारों पर आधारित कथाएँ जो शीघ्र पुरानी पड़ जाती हैं।

समाधान यह है कि ‘प्रमुख घटना एक काल में’ का लचीलापन स्वीकार किया जाए । इससे अभिव्यक्ति विस्तृत होगी, व्यंग्य गहरा होगा, और यह बिना कथा विस्तार के जाल में फँसे, संभव है।

लघुकथा को मुक्त करने का समय आ चुका है, आखिर यह कोई अंतिम कानूनी नियम नहीं, केवल साहित्यिक मान्यता ही है। लघुकथाकारो का दायित्व है कि विधा को व्यापक बनाया जाए ताकि यह साहित्य को समृद्ध और जीवंत करे। अन्यथा, यह नियम बाध्यता लघुकथा को हमारी ही बनाई बेड़ियों में सीमित बना कर व्यर्थ ही बांध रहा है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८९ – व्यंग्य – पुनर्जन्म का आधार कार्ड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाक्टरेट ऑन डिस्काउंट)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८९ – व्यंग्य  – पुनर्जन्म का आधार कार्ड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बेलतारा गांव के राजनीति विशारद ‘लल्लन बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘मुफ्त बिजली’ के घिसे-पिटे वादों को ठेंगा दिखा दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’पितृ-पेंशन और पुरखा-कनेक्ट योजना’। लल्लन बाबू का तर्क था कि नेता जीवितों की सेवा तो सब करते हैं, लेकिन जो पूर्वज स्वर्ग में बैठकर अपनी संतानों की दुर्दशा देख रहे हैं, उनके लिए कोई कुछ नहीं करता। उन्होंने घोषणा की कि यदि वे चुनाव जीते, तो गांव के श्मशान में ‘वाई-फाई युक्त प्रेत-कॉलिंग सेंटर’ बनवाएंगे, जहाँ से ग्रामीण सीधे अपने परलोकवासी दादा-परदादाओं से सलाह ले सकेंगे कि इस बार कौन सी भैंस खरीदनी है या किस लड़के की शादी कहाँ करनी है। गांव के भोले-भाले लोग, जो पितृ पक्ष में कौवों को रोटी खिलाकर थक चुके थे, अचानक ‘टेक्नो-अध्यात्म’ के इस जादुई जाल में ऐसे फंसे कि उन्हें अपनी वर्तमान गरीबी से ज्यादा पूर्वजों की ‘नेटवर्क कनेक्टिविटी’ की चिंता होने लगी।

प्रचार के अंतिम पड़ाव पर लल्लन बाबू ने गांव के पुराने कुएं के पास एक ‘आत्मा-स्कैनर’ मशीन स्थापित की, जो असल में एक कबाड़ हो चुका एक्सरे मशीन का ढांचा था जिस पर ढेर सारी चमकीली झिलमिलियां चिपकी थीं। उन्होंने दावा किया कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने की कसम खाकर इस मशीन के नीचे खड़ा होगा, उसे अपने अगले सात जन्मों का ‘आधार कार्ड’ और ‘प्रोफेशनल बायोडाटा’ तुरंत मिल जाएगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘घसीटा राम’ बदहवास थे; वे स्कूल की मरम्मत और खाद की बात कर रहे थे, जबकि जनता को यह जानने की उत्सुकता थी कि अगले जन्म में वे राजा बनेंगे या पड़ोसी के घर के पालतू कुत्ते। लल्लन बाबू ने एक लाउडस्पीकर पर डरावनी और रहस्यमयी आवाज़ें रिकॉर्ड करके चला दीं, जिसे सुनकर ग्रामीणों को साक्षात ‘गरुड़ पुराण’ का लाइव टेलीकास्ट महसूस होने लगा। लोग अपनी मेहनत की कमाई चंदे के रूप में लल्लन बाबू के चरणों में अर्पित करने लगे ताकि उनका ‘अगला जन्म’ कम से कम सुरक्षित हो सके।

मतदान के अगले दिन जब लल्लन बाबू की प्रचंड जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘पुनर्जन्म का आधार कार्ड’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। लल्लन बाबू ने एक बड़ा सा बक्सा खोला और उसमें से छोटे-छोटे खाली शीशे के टुकड़े (आईने) सबको बांटना शुरू कर दिया। जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, इसमें तो कुछ लिखा ही नहीं है, बस हमारा अपना चेहरा दिख रहा है!” लल्लन बाबू ने एक लंबी डकार ली और गंभीर स्वर में बोले— “मूर्खों! पुनर्जन्म का आधार कार्ड यही आईना है। इसमें गौर से अपना चेहरा देखो; जिस इंसान ने एक कोरे वादे और कबाड़ की मशीन के चक्कर में अपना भविष्य और वर्तमान मुझे बेच दिया, वह अगले जन्म में ‘गदहा’ बनने की पूरी योग्यता अभी से हासिल कर चुका है! पूर्वज तो स्वर्ग में आराम कर रहे हैं, पर तुम लोगों ने मेरा अगला जन्म जरूर सुधार दिया।” जनता स्तब्ध खड़ी अपनी ही परछाईं को देख रही थी और लल्लन बाबू अपनी नई पजेरो में बैठकर ‘परलोक कल्याण विभाग’ का बजट डकारने शहर की ओर कूच कर गए।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९३ ☆ गीत – वेदमय जीवन बनाओ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९३ ☆ 

☆ गीत – वेदमय जीवन बनाओ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

वेद का हो गान हर-दिशि,

प्रभु हमें वरदान  दे  दो।

हर  बुराई  दूर   करके,

चेतनामय प्राण दे  दो।

 **

सत्य-पथ से मैं न भटकूँ,

वेदमय जीवन बनाओ।

छल, कपट से दूर रख कर,

प्रेम की  गंगा  बहाओ।

 *

धैर्य  का  अवलंब  देकर,

शांति का तुम दान दे दो।

 **

आज मानव है भटकता ,

खो रहा अब चैन है।

भागता-फिरता निरंतर,

जागता दिन-रैन है।

 *

बन सके इंसान प्रभु ये,

माधुरी मुस्कान दे दो।

 **

पंचतत्वों को बचा दो,

आज दूषित हो रहे हैं।

शिष्टता का ओढ़ चोला,

लोग भूषित हो रहे हैं।

 *

देश की गरिमा बढ़ाकर,

तुम नई पहचान दे दो।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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