(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘तुम्हारे एहसास ने…‘।)
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘बिल्ली और छींका’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२९ ☆
☆ व्यंग्य ☆ बिल्ली और छींका ☆
रौनक भाई को खुशी के मारे रात भर नींद नहीं आयी। रात भर भगवान को धन्यवाद देते रहे। रात को ग्यारह बजे तक बधाई के फोन आते रहे। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा है।
सवेरे छः बजे से ही फोन फिर बजने लगा। बधाइयों का तांता लग गया। फिर आठ बजे से पार्टी के लोग बधाई देने के लिए आने लगे। देखते देखते रौनक भाई का लॉन लोगों से भर गया। कुछ लोग मिठाई का डिब्बा लेकर आये थे।
दरअसल पिछली शाम रौनक भाई के विरोधी दल की एक चुनाव सभा हुई थी, जिसमें एक छुटभइये ने अपनी पार्टी के प्रति ख़ैरख्वाही दिखाने के चक्कर में रौनक भाई का नाम लेकर उन्हें ‘सुअर’ कह दिया था। तभी से राजनीतिक वातावरण गर्म हो गया था और रौनक भाई की पार्टी के लोग विरोधियों को नाना प्रकार के विशेषणों से नवाज़ने में लग गये थे।
रौनक भाई आपदा को अवसर में बदलने के पुराने खिलाड़ी थे। उन्होंने मौके को लपक लिया। तत्काल गालीबाज़ के सैकड़ों वीडियो वायरल हो गये। रौनक भाई का वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें वे सन्त की मुद्रा में कह रहे थे कि यह अपमान उनका नहीं, देश के एक सौ चालीस करोड़ लोगों का है। जनता विरोधियों की इस बदज़बानी को कभी माफ नहीं करेगी और उसका जवाब वोट के मार्फत देगी।
पिछली शाम से रौनक भाई गद्गद थे। विरोधियों ने अचानक ही ‘सेल्फ गोल’ कर लिया था। रौनक भाई को पक्का भरोसा हो गया था कि इस गाली की बदौलत अगले चुनाव में उनके वोटों में कम से कम लाख डेढ़-लाख का इज़ाफा हो जाएगा। यह गाली विरोधियों को बहुत मंहगी पड़ेगी। उन्हें पता चला था कि विरोधियों में से कई अब पछता रहे थे, लेकिन अब पछताए होत का? तीर कमान से निकल चुका था।
रौनक भाई ने कई बार लॉन में इकट्ठी भीड़ को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘कल भगवान ने हमें वरदान दिया है। यह गाली हमारे लिए वरदान ही साबित होने वाली है। गाली का हम कोई जवाब नहीं देंगे। जवाब जनता देगी। हम तो ‘जो तोकू कांटा बुवै, ताहि बोउ तू फूल’ वाले सिद्धांत पर चलेंगे। गाली का जवाब गाली में देने से सब गड़बड़ हो सकता है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। हम तो कल से आन्दोलन करेंगे और जनता के दिमाग में ठोक ठोक कर भरेंगे कि हमें गाली दी गयी है, जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता।
‘दूसरी बात यह कि भगवान का एक अवतार वराह अवतार है। इस तरह विरोधियों ने सुअर कह कर मुझे भगवान का अवतार बना दिया है। इसलिए मैं तो अपमानित से ज़्यादा सम्मानित महसूस कर रहा हूं। लेकिन मौके की नज़ाकत को देखते हुए आप लोग कल से सड़कों पर उतरें और जनता को बताएं कि हमारे विरोधी कितनी घटिया मानसिकता के लोग हैं। राजनीति में मौके का फायदा उठाने से चूकना बेवकूफी होती है। तो उठिए और काम पर लग जाइए। अब एक मिनट भी ज़ाया करना गुनाह होगा।’
पार्टी के एक सयाने बोले, ‘गाली दी है तो मानहानि का दावा होना चाहिए।’
रौनक भाई ने जवाब दिया, ‘ज़रूर होगा, लेकिन पहले अच्छी तरह से ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना ज़रूरी है। जनता के मन में हमारी ‘इंसल्ट’ की बात पैठनी चाहिए।’
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “– खून का रिश्ता…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०० — खून का रिश्ता —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
(विशेष — कुछ शब्दों में एक महत्वपूर्ण कहानी)
विश्व प्रसिद्ध भूगोल वेत्ता अपने काम से अमरीका गया। एक अमरीकी ने उससे कहा, आपके हस्ताक्षर से एक जिज्ञासा हो रही है। आपके देश में इसी हस्ताक्षर के एक लेखक हैं। क्या वे आप के रिश्तेदार हैं? यह सुनने पर वह चौंक गया। वह लेखक तो उसका पिता था। पर उसने कहा, उन्हें जानता तो हूँ, लेकिन वे मेरे रिश्तेदार नहीं हैं। इस पलायन का उसका अपना कारण था। उससे उसके पिता की कृतियों के बारे में पूछ लिया जाता तो उसकी कोई कृति न पढ़ने के कारण वह उत्तर न कर पाता। पर उसका यह पलायन अंतिम नहीं था। वह घर लौटने पर अपने पिता के गले लग कर कहता, “मेरे पिता, मैंने विदेश में तुम्हारी चर्चा तो खूब सुनी।”
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२९ ☆ युद्ध के विरुद्ध…
मनुष्य कंदराओं में रहता था। सभ्यता के विकास के साथ उसने सामुदायिक उन्नति को आधार बनाया। परिणामस्वरूप नगर बसे, मनुष्य में अनेकानेक कलाओं का विकास हुआ। सारी विकास-यात्रा में तथापि भीतर का आदिम न्यूनाधिक बना रहा।
इसी आदिम का एक पर्यायवाची है युद्ध। वस्तुत: युद्ध मनुष्य को ज्ञात और मनुष्य द्वारा विकसित एक ऐसी विद्रूप कला है जो मनुष्यता को ही विनाश के मुहाने पर ले आई। केवल विगत सौ वर्ष का इतिहास उठाकर देखें तो पाएँगे कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में तीन दशक से भी कम का अंतराल रहा। उसके बाद भी दुनिया निरंतर छोटे-बड़े युद्धों से जूझती रही है।
युद्ध की विभीषिका का दुष्परिणाम मनुष्य और मनुष्यता पर किस तरह से और कितना हुआ, इसका आँखें खोलने वाला एक प्रमाण 31 मार्च 2015 को एक फोटो के रूप में सामने आया था।
यह फोटो युद्धग्रस्त सीरिया के शरणार्थी शिविर में रहने वाली 4 वर्षीय बच्ची हुडिया का था। फोटो जर्नलिस्ट ने जब फोटो खींचने के लिए अपना कैमरा इस बच्ची की ओर घुमाया तो युद्धग्रस्त क्षेत्र की बिटिया ने कैमरे को बंदूक समझा और क्षण भर भी समय लगाए बिना भय से आत्मसमर्पण की मुद्रा में अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। ‘सरेंडर्ड’ शीर्षक का यह मर्मस्पर्शी चित्र शेष बची मनुष्यता के हृदय पटल पर गहराई से अंकित हो गया।
साथ ही यह चित्र अनेक प्रश्नों को विस्तृत कैनवास पर खड़ा कर गया। मनुष्य शनै:-शनै: युद्ध का आदी होता जा रहा है। युद्ध का आदी होने का अर्थ है कि मृत्यु और विनाश, बर्बरता और विद्रूपता अब हमारी संवेदना पर तुलनात्मक रूप से काफ़ी कम प्रभाव डालते हैं। यह प्रक्रिया आगे चलकर मनुष्य को पूरी तरह से संवेदनहीन कर देती है।
इससे भी अधिक घातक और दुखदाई है कि मानुष से अमानुष होने की इस यात्रा पर कोई चिंतित नहीं दिखाई देता। पिछले कुछ वर्षों से विश्व अनेक बड़े युद्ध देख रहा है। प्रकृति का निरंतर विनाश हो रहा है। मनुष्य के उन्माद ने अंतरिक्ष को प्रक्षेपास्रों का अड्डा बना दिया है तो सागर की गहराइयों में संहारक क्षमता वाली पनडुब्बियाँ उतार दी हैं। धरती, सागर, आकाश सब बारूद के ढेर पर बैठे हैं। शांति के लिए युद्ध को अनिवार्य बता कर नोबल प्राप्त कर सकने का हास्यास्पद अभियान भी देखने को मिला। सचमुच यह मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करने का समय है।
विचार करने पर खुली आँखों से दिखता तथ्य है कि महा शक्तियों के लिए युद्ध व्यापार हो चला है। हर कोई अपने तरीके से युद्ध बेच रहा है। जो युद्ध की परिधि में हैं, वे तिल-तिल कर जी रहे हैं, उनका मरना भी तिल- तिल कर ही है। जो प्रत्यक्ष युद्ध की परिधि से बाहर हैं उनके लिए युद्ध मनोरंजन भर है। बमों के धमाकों की, मिसाइल की, युद्ध के अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की चर्चा करते समय प्राय: मारे जा रहे लोग, पीड़ित स्त्रियाँ, आतंकित बच्चे मनुष्य की आंखों में नहीं तैरते। कुछ देर युद्ध की ख़बरें देखना लोगों के लिए असंख्य चैनलों में एक और विकल्प भर रह गया है।
अपनी कविता ‘युद्ध के विरुद्ध’ स्मरण हो आई है-
कल्पना कीजिए,
आपकी निवासी इमारत
के सामने वाले मैदान में,
आसमान से एकाएक
टूटा और फिर फूटा हो
बम का कोई गोला,
भीषण आवाज़ से
फटने की हद तक
दहल गये हों
कान के परदे,
मैदान में खड़ा
बरगद का
विशाल पेड़
अकस्मात
लुप्त हो गया हो
डालियों पर बसे
घरौंदों के साथ,
नथुनों में हवा की जगह
घुस रही हो बारूदी गंध,
काली पड़ चुकी
मटियाली धरती
भय से समा रही हो
अपनी ही कोख में,
एकाध काले ठूँठ
दिख रहे हों अब भी
किसी योद्धा की
ख़ाक हो चुकी लाश की तरह,
अफरा-तफरी का माहौल हो,
घर, संपत्ति, ज़मीन के
सारे झगड़े भूलकर
बेतहाशा भाग रहा हो आदमी
अपने परिवार के साथ
किसी सुरक्षित
शरणस्थली की तलाश में,
आदमी की
फैल चुकी आँखों में
उतर आई हो
अपनी जान और
अपने घर की औरतों की
देह बचाने की चिंता,
बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष
सबके नाम की
एक-एक गोली लिए
अट्टहास करता विनाश
सामने खड़ा हो,
भविष्य मर चुका हो,
वर्तमान बचाने का
संघर्ष चल रहा हो,
ऐसे समय में
चैनलों पर युद्ध के
विद्रूप दृश्य
देखना बंद कीजिए,
खुद को झिंझोड़िए,
संघर्ष के रक्तहीन
विकल्पों पर
अनुसंधान कीजिए,
स्वयं को पात्र बनाकर
युद्ध की विभीषिका को
समझने-समझाने का यह
मनोवैज्ञानिक अभ्यास है,
मनुष्यता को बचाए
रखने का यह यथासंभव प्रयास है!
अलबत्ता यह भी सच है की कभी-कभी युद्ध अपरिहार्य होता है। ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ के सूत्र से सहमत होते हुए भी यथासंभव युद्ध रोकने के सारे प्रयास किए जाने चाहिएँ। अठारह अक्षौहिणी सेना को निगल जाने वाले महाभारत युद्ध को रुकवाने के लिए योगेश्वर भी दुर्योधन के पास गए थे। युद्ध तब भी अंतिम विकल्प था, अब भी अंतिम विकल्प ही होना चाहिए।
नौनिहालों का आत्मसमर्पण, मनुष्यता के आत्मसमर्पण की घंटी है। यदि हम सच्चे मनुष्य हैं तो बचपन के चेहरे से आत्मसमर्पण के भाव को हटवा कर फोटो खिंचवाने की प्रसन्नता में बदलने की मुहिम में जुटना होगा। मानवता कराह रही है, मानवता बुला रही है। क्या हम सुन पा रहे हैं इस स्वर को?
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
आपदां अपहर्तारं साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सॉनेट – जल दिवस।)
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (30 मार्च से 5 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
परम पावन पर्व नवरात्रि समाप्त हो गया है। परंतु श्री हनुमान जी की हमारी और आपकी आराधना लगातार चलेंगी। इस बार के चौपाई इस प्रकार हैं।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते,
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से यश कीर्ति की वृद्धि होती है, मान सम्मान बढ़ता है। “नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में हनुमान चालीसा की चौपाइयों के संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
इसके उपरांत में अब आपको इस सप्ताह के ग्रहों के गोचर के बारे में बताऊंगा। सप्ताह इस सप्ताह सूर्य और शनि मीन राशि में, मंगल और बुध कुंभ राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र मेष राशि में और राहु कुंभ राशि में मंगल और बुध के साथ में गोचर करेंगे।
आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। साथ ही प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ेगी। अगर आप सावधानी से कार्य करेंगे तो कचहरी के कार्यों में विजय प्राप्त हो सकती है। गलत रास्ते से धन आने का योग है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। विद्यार्थियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य ही रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने कर्म पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। भाग्य से भी थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच अप्रैल कार्यों को करने हेतु उपयुक्त हैं। एक और दो अप्रैल को आपको कोई भी कार्य बड़े सावधानी के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। अच्छे और बुरे दोनों रास्तों से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष मदद प्राप्त नहीं हो पाएगी। कचहरी के कार्यों में रिक्स ना लें। आपका स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। डायबिटीज और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने वाणी पर इस सप्ताह कंट्रोल करना चाहिए। किसी से फालतू लड़ाई नहीं करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। विद्यार्थियों के लिए यह सप्ताह कम ठीक है। उनको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह 30 और 31 मार्च आपके लिए परिणाम दायक हैं। तीन चार और पांच तारीख को आपको सतर्क होकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
मिथुन राशि
कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह अत्यंत अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। विद्यार्थियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह सामान्य गति से चलेगा। भाग्य से इस सप्ताह आप सभी को कम मदद प्राप्त होगी। आपको अपने परिश्रम पर ज्यादा विश्वास करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक नहीं रह पाएंगे। कर्मचारियों को अपने कार्यालय में अच्छा सम्मान प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो अप्रैल कार्यों को करने हेतु फलदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए की आप प्रतिदिन गरीबों के बीच में चावल का दान दें तथा शुक्रवार को मंदिर पर जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपको भाग्य का अच्छा साथ मिलेगा। भाग्य के सहारे आपके कार्य हो सकते हैं। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। आप सभी को इस सप्ताह दुर्घटनाओं के प्रति सचेत रहना चाहिए। व्यय की मात्रा में बढ़ोतरी होगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। पेट में थोड़ा कष्ट भी हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच तारीख सफलता दायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह ठीक-ठाक चलेगा। कर्मचारियों अधिकारियों का भी यह सप्ताह सामान्य रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य होगा। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य के स्थान पर आपको अपने पुरुषार्थ पर यकीन करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 मार्च सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अत्यंत उत्तम है। उनका स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहेगा। आपके माताजी और आपका स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। पिताजी के स्वास्थ्य में थोड़ी परेशानी हो सकती है। शत्रुओं से सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। दुर्घटनाओं से भी आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक और 2 अप्रैल विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। 30 और 31 मार्च को आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह अविवाहित जातकों के विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। भाग्य के प्रति आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। आपको अपने संतान से सहयोग कम मिलेगा। इस सप्ताह आप आसानी से अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं, परंतु इसके लिए भी थोड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच अप्रैल लाभदायक है। एक और दो अप्रैल को अगर आप सावधानी बस कार्य नहीं करेंगे तो कार्यों में आपको नुकसान हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
वृश्चिक राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए काफी अच्छा रहेगा। संतान को उन्नति मिल सकती है। आपको भी संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी परीक्षा में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव हो सकता है। आपके पेट में कष्ट हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति आपको सचेत रहना चाहिए। आपको अपने शत्रुओं से भी सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 मार्च अनुकूल है। तीन चार और पांच अप्रैल को आपको कार्यों को पूर्ण सतर्कता के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
धनु राशि
जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक है। भाई बहनों के साथ संबंध कम ठीक रहेंगे। भाग्य से मदद मिलेगी। यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो अप्रैल कार्यों के लिए परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गरीब बच्चों के बीच में पुस्तकों का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
मकर राशि
इस सप्ताह आपके पास सामान्य रूप से धन आ सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध उत्तम रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। भाग्य आपका साथ दे सकता है। छात्रों को इस सप्ताह पढ़ाई में परेशानी आ सकती है। गलत रास्ते से भी धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच तारीख शुभ है। 30 और 31 मार्च के दिन कार्यों को करने के पहले पूरी प्लानिंग कर लेना चाहिए तथा सतर्कता पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। धन अच्छे और बुरे दोनों रास्तों से आ सकता है। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा बहुत तनाव हो सकता है। माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके अंदर क्रोध की मात्रा बढ़ सकती है। आपको खून संबंधी रोग जैसे डायबिटीज ब्लड प्रेशर से सावधान रहना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। छात्रों की पढ़ाई में बाधा आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 मार्च कार्यों को करने के लिए आनंददायक हैं। एक और दो अप्रैल को आपको कोई भी कार्य पूरी सजगता के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उच्च कोटि का रहेगा। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधानी बरतना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। दुश्मनों को आप आसानी से इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। आपके जीवन साथी को शारीरिक कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो अप्रैल कार्यों को करने के लिए उचित हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १७ आणि १८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक – १७ – –
मनी मानव व्यर्थ चिंता वाहाते ।
अकस्मात होणार होऊनि जाते ।
घडे भोगणे सर्वही कर्मयोगे ।
मतीमंद ते खेद मानी वियोगे ॥१७॥
अर्थ:
संसारात माणूस अनेक व्यर्थ चिंता करत बसतो. परंतु जे घडायचे असते ते अकस्मात घडूनच जाते. कारण प्रत्येकाला आपल्या कर्मानुसार सुखदुःख भोगावे लागते. हे सत्य काही लोकांच्या लक्षात येत नाही आणि ते मात्र त्याबद्दल सतत दुःख करत राहतात.
आधीच्या श्लोकात आपण गेलेल्या व्यक्तीचा जो शोक करतो, तो शोक मोह किंवा लोभातून निर्माण होतो असे समर्थ सांगतात. या श्लोकात ते पुढे एक वेगळाच पैलू उलगडतात. माणूस आपल्या आयुष्यात अनेक प्रकारच्या चिंतांनी त्रस्त असतो. परंतु चिंता करून फारसा उपयोग नसतो, कारण जे घडायचे आहे ते कर्मानुसार घडणारच असते.
माणसाचे आयुष्य चिंतांनी भरलेले असते. चिंता नाही असा दिवस फार क्वचितच येतो. विद्यार्थ्याला परीक्षेत उत्तीर्ण होऊ की नाही याची चिंता असते. परीक्षा उत्तीर्ण झाल्यावर नोकरी मिळेल की नाही याची काळजी वाटते. पुढे लग्न होईल की नाही, संसार कसा होईल, मुलं चांगली निघतील का, म्हातारपणी आपली काळजी कोण घेईल? अशा अनेक चिंता माणसाला जन्मापासून मृत्यूपर्यंत सतावत असतात. या चिंतेच्या ओझ्याखाली तो आयुष्य जगत राहतो.
परंतु समर्थ सांगतात की अशा प्रकारची व्यर्थ चिंता करण्याचा काही उपयोग नाही. कारण आपल्या आयुष्यात जे काही घडते ते आपल्या कर्मानुसारच घडत असते. आपले कर्म चांगले असेल तर त्याचे चांगले फळ मिळते, आणि दुष्कर्म केले असेल तर त्याचे दुष्परिणाम भोगावे लागतात. बाभळीचे झाड लावून आंब्यांची अपेक्षा करणे जसे अशक्य आहे, तसेच दुष्कर्म करून चांगल्या परिणामांची अपेक्षा करणेही व्यर्थ आहे.
महाभारतातील दुर्योधन आणि दुःशासन यांनी नीतीने वागणाऱ्या पांडवांविरुद्ध अनेक कटकारस्थाने रचली. त्या दुष्कृत्यांचे परिणाम त्यांना भोगावे लागले आणि अखेर महाभारताच्या युद्धात संपूर्ण कौरववंश नष्ट झाला. कर्माच्या नियमानुसार फळ मिळते याचे हे ठळक उदाहरण आहे.
आपले जीवन म्हणजे परमेश्वराने दिलेली एक सुंदर आणि अनमोल भेट आहे. या भेटीचा आपण सदुपयोग करायचा की दुरुपयोग करायचा हे आपल्यावर अवलंबून आहे. अंधाराकडून प्रकाशाकडे, वाईटकडून चांगल्याकडे अशी आपली वाटचाल व्हायला हवी.
जीवनाला अनेकदा रंगमंचाची उपमा दिली जाते. त्या रंगमंचावर प्रत्येकाला एक भूमिका मिळालेली असते. त्या भूमिकेचे प्रामाणिकपणे आणि उत्तम प्रकारे सादरीकरण करणे हेच आपले कर्तव्य आहे. एखादा शिक्षक असेल तर त्याने आदर्श शिक्षक होण्याचा प्रयत्न करावा. डॉक्टर, इंजिनियर किंवा इतर कोणत्याही क्षेत्रात असलेली व्यक्ती आपल्या कर्तव्याचे प्रामाणिकपणे पालन करत असेल तर तेच तिचे खरे साधन आहे.
आपल्या वाट्याला आलेले कर्म म्हणजेच आपला स्वधर्म आहे. संत ज्ञानेश्वर म्हणतात —
“स्वये आचरिता स्वकर्म ।
ते स्वकर्म स्वयं होई ब्रह्म ॥”
म्हणूनच माणसाने आपले कर्म उत्तम करणे आवश्यक आहे. जीवनात येणारी सुखदुःखे ही आपल्या प्रारब्धानुसारच येतात हे ज्यांच्या लक्षात येते, ते शहाणे लोक त्यांचा शांतपणे स्वीकार करतात. ते व्यर्थ चिंता करत बसत नाहीत.
परंतु जे या तत्त्वाला समजून घेत नाहीत, ते मात्र दुःख आणि खेद यांच्या गर्तेत अडकून पडतात. स्वधर्म विसरला की माणूस विकारांच्या आहारी जातो, आसक्ती वाढते आणि त्यातून निर्माण होणारी कर्मे त्याला अधिकाधिक बंधनात अडकवतात. परिणामी तो जन्ममृत्यूच्या चक्रात गुरफटत राहतो.
जर आपण खरोखरच हे मानत असू की जीवन ही परमेश्वराने दिलेली अनमोल भेट आहे, तर आपल्या आयुष्यातील प्रत्येक क्षणाचा आपण सुंदर उपयोग करायला हवा. आपल्या कर्तृत्वाने जीवनपथ उजळून टाकायला हवा. कर्तव्य करताना फळाची अपेक्षा न ठेवता निरपेक्ष भावनेने कर्म करणे आणि ते परमेश्वराला अर्पण करणे हीच जगण्याची खरी रीत आहे. अन्यथा तेच कर्म बंधनकारक ठरून दुःखाला कारणीभूत होते.
स्वसंवाद :
मी माझ्या आयुष्यातील घडणाऱ्या घटनांबद्दल खूप चिंता करतो का?
जे काही घडते ते माझ्या संचिताचे फळ आहे हे मी मान्य करतो का?
माझ्या हातातील वर्तमानकाळ मी चांगल्या कर्मासाठी वापरतो आहे का?
स्वधर्माचे पालन करण्याचा प्रामाणिक प्रयत्न मी करतो का?
कर्तव्य करताना मी फळाची अपेक्षा ठेवतो का, की निरपेक्ष भावनेने कर्म करण्याचा प्रयत्न करतो?
– – –
श्लोक क्र. १८ – – –
मना राघवेंवीण आशा नको रे |
मना मानवाची नको कीर्ति तू रे|
जया वर्णिती वेद शास्त्रे पुराणे |
तया वर्णिता सर्वही श्लाघ्यवाणे|१८|
अर्थ: हे मना एका रामाशिवाय (परमेश्वराशिवाय) तू कशाचीच आशा ठेवू नकोस. माणसाच्या ठिकाणी वासना ठेवून तू त्याची स्तुती (कीर्ति गाऊ नकोस) करू नकोस. वेद, शास्त्रे आणि पुराणे ज्या ईश्वराचे वर्णन करतात, त्याचेच वर्णन करणे (स्तुती करणे) योग्य (म्हणजे श्लाघ्यवाणे)आहे. कारण या जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यातून तोच तुला तारू शकेल.
आधीच्या श्लोकात समर्थ आपल्याला आपण व्यर्थ चिंता करीत बसतो असे सांगतात. कारण होणारी गोष्ट पूर्वसंचितानुसार घडणारच असते. पण मग चिंता करायची नाही तर काय करायचे त्याचे उत्तर या श्लोकात आपल्याला मिळते. आपल्याला कोण मदत करेल? कोणाची आशा ठेवायची? कोणाची स्तुती गायची? या प्रश्नांची उत्तरे आपल्याला या श्लोकात मिळतात.
मनुष्याचा जन्मच वासनेच्या पोटी होतो. त्यामुळे वासना पूर्णपणे सोडणे सोपे नाही. परंतु ईश्वरप्राप्ती शिवाय ठेवलेल्या इतर वासना किंवा कामना दुःखाला कारणीभूत होतात. म्हणून समर्थ सांगतात की हे मना (मानवा)एका भगवंतावाचून तू दुसऱ्या कशाचीही वासना किंवा अपेक्षा ठेवू नकोस.
आपली भारतीय संस्कृती ही मुलत: अध्यात्मप्रधान आहे. ईश्वरप्राप्ती हे मानवी जीवनाचे अंतिम ध्येय आहे असे अध्यात्मात मानले जाते. सारी वेद, शास्त्रे आणि पुराणे परमेश्वराचे वर्णन करतात आणि परमेश्वराचा महिमा गातात.
परंतु माणसाच्या ठायी असलेल्या देहबुद्धीमुळे त्याला मानवी जीवनातच धन्यता वाटते. इतर श्रेष्ठ व्यक्तींकडे पाहून आपले जीवनही तसेच असावे असे त्याला वाटल्यास नवल नाही. समाजामध्ये लोक थोर व्यक्तींची प्रशंसा करतात. पूर्वीच्या काळी राजे लोक तर आपल्या दरबारात आपली कीर्ती गाण्यासाठी भाट ठेवत असत. आजही वरिष्ठांची खुशामत करण्याची मानसिकता समाजामध्ये रूढ झाली आहे. आपला फायदा करून घेण्यासाठी किंवा स्वार्थ साधण्यासाठी लोक वरिष्ठांची स्तुती करताना दिसतात. अशा प्रकारच्या स्तुतीने ऐहिक जीवनात थोडाफार फायदा होतही असेल. पण त्याला स्वाभिमानाने जगणे म्हणता येणार नाही. ही एक प्रकारची लाचारीच आहे. दुसऱ्याची स्तुती जरूर करावी. गुणग्राहकता आपल्याजवळ असावी परंतु ती स्वार्थापोटी नसावी. लोकांची मानसिकता अशी असते की ते स्वार्थापोटी आज आपली स्तुती करतील परंतु उद्या त्यांचा स्वार्थ साधत नाही असे दिसले की ते निंदा करायलाही मागेपुढे पाहत नाहीत.
परंतु संकटकाळी किंवा अंतिम प्रसंगी श्रीमंत माणसे, वरिष्ठ लोक किंवा नातेवाईक यापैकी कोणीही उपयोगी पडत नाही. मोक्षमार्गावर वाटचाल करणे, आत्मदर्शन किंवा परमेश्वराची प्राप्ती करून घेणे हे जे मानवी जीवनाचे अंतिम ध्येय आहे, अशा प्रसंगी केवळ परमेश्वराचेच सहाय्य आपल्याला होत असते. त्याच्याच कृपेने जीवनातील संकटांना आपण धैर्याने तोंड देऊ शकतो.
महाभारतातील द्रौपदी वस्त्रहरणाचा प्रसंग आपल्या सगळ्यांना परिचित आहे. या कठीण प्रसंगातून आपल्याला सोडवतील म्हणून द्रौपदीने सुरुवातीला दरबारातील ज्येष्ठ आणि श्रेष्ठ अशा पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य आदींना विनंती केली. तिचे पती असलेल्या पांडवांची देखील तिला आशा होती. परंतु यापैकी तिच्या मदतीला कोणीच धावून आले नाही. तेव्हा तिने आर्ततेने श्रीकृष्णाचा धावा केला आणि तोच तिच्या मदतीला धावून आला. म्हणून आशा करायची ती परमेश्वराची.
हे मानवा, स्तुती करायचीच असेल तर संत, सद्गुरु किंवा परमेश्वराची कर. त्यांचेच गुणगान गा असे समर्थ आपल्याला सांगत आहेत. वेदांनी, शास्त्रांनी आणि पुराणांनी त्या परमेश्वराची स्तुती गुणांचे वर्णन केले आहेत. समर्थ ज्या राघवाची स्तुती करायला आपल्याला सांगतात, तो राघव म्हणजे परमेश्वर सर्व सृष्टीत विराजमान आहे. राघव हा शब्दच किती सुंदर आहे! राघव म्हणजे चैतन्य! हे चैतन्य सर्व चराचरात भरलेले आहे. चैतन्याची अनेक रूपे असतात. त्याला नावेही वेगवेगळी असतात. पण मूळ चैतन्य एकच असते. ते आपल्याला पाहता आले पाहिजे. आपण त्याचेच गुणगान करावे. तोच आपली जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यातून सुटका करील.
स्वसंवाद :
माझ्या आयुष्यात मी खरोखर कोणावर आशा ठेवतो — माणसांवर की परमेश्वरावर?
स्वार्थ साधण्यासाठी मी कधी कोणाची खुशामत तर करत नाही ना?
दुसऱ्याच्या गुणांची प्रशंसा करताना माझ्या मनात स्वार्थ तर नसतो ना?
माझ्या दैनंदिन जीवनात परमेश्वराचे स्मरण किंवा स्तवन याला किती स्थान आहे?
ऐहिक यशापेक्षा आत्मिक प्रगती अधिक महत्त्वाची आहे हे मला खरोखर पटते का? (क्रमशः)
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख महाभारत नहीं रामायण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१५ ☆
☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆
‘जब तक सहने की चरम सीमा रहेगी, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़, जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी।’ जी हाँ! यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर व चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ठ को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने की शक्ति व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवारजन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बेदखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यह शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है, कहना नहीं’ और वह धीरे-धीरे उसे जीने का मूलमंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रहकर अपना जीवन बसर करती है।
वास्तव में नारी धरा की भांति क्षमाशील व सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पापियों के पाप धोती है; पर्वत की भांति अटल है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी भी अपना पक्ष रखने का साहस नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी-प्रदत्त हैं ही नहीं। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है– एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त होता है; जिसे वह कभी अपना कह ही नहीं सकती। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बाँझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों को सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बाँझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसकी मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे विवाहिता के रूप में उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर- आँगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को अखरने लगी और वह उस घर छोड़ने को विवश हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह उसके प्रति अन्याय…. परंतु उस पीड़िता को सब मूर्ख समझते हैं, जिसने घर फूंक कर तमाशा देखा है। इसलिए उसके पक्ष में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।
सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत होना निश्चित है। वैसे भी अधिकारों की मांग करना–संघर्ष का आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं रहता। राजनीति हो या धर्म; घर-परिवार हो या समाज; हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं।
घर-परिवार में भी अब इसका पूर्ण हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई व पति-पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोंसले से माँस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं; जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण वे आजकल एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते; जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार- व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं कर पाते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण ‘लिव-इन व प्रेम विवाह’ है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियाँ-ख़ामियाँ उजागर होने लगती हैं; जिन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़–जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वह सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं।
ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दाँव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम- स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहाँ विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य-विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार की जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके उससे प्राप्त सबक़ को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुँचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करें, क्योंकि आपदाएं आपके धैर्य की परीक्षा लेती हैं और मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो; न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ें, क्योंकि गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करें। जीवन में सहन करना व त्याग करना सीखें, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करें। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से लौट जाना है। सो! सदाशयता को अपनाएं और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव रखें, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार-स्थापत्य अशांति- प्रदाता है, जो हृदय का सुक़ून छीन लेता है। इसलिए उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दें, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दें, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर कर लें।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – राम अवतार…।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – श्रीराम ।)