हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०३ ☆ आलेख – “भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०३ ☆

?  आलेख – भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का ‘ललित’ पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में ‘मैं’ का अहंकार नहीं, बल्कि ‘मैं’ की आत्मीयता घुली होती है। जब वे ‘कदम की फूली डाल’ या ‘आम्र-मंजरी’ की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द ‘अर्थ’ ही नहीं देते, बल्कि ‘ध्वनि’ और ‘दृश्य’ भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की ‘तरलता’ है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह ‘तुम चंदन हम पानी’ भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार ‘आँगन का पंछी और बनजारा मन’ में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में ‘बनजारा’ बनकर भटकना चाहता है।

उनका सबसे चर्चित निबंध ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में ‘मुकुट के भीगने’ अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।

कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान

पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे ‘सांस्कृतिक यात्री’ बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८९ ☆ गीत – तुझको चलना होगा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८९ ☆ 

☆ गीत – तुझको चलना होगा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

धीरे – धीरे बढ़ो मुसाफिर

जीवन है अनमोल।

दुख चाहे जितने भी आएं

मुख में मिश्री घोल।।

 

चलना ही जीवन की नियति

तुझको चलना होगा।

जागो ! उठो दूर है मंजिल

देख स्थिति ढलना होगा।

 

सत, असत की बल्लरियों में

देख कहाँ है झोल।।

 

लक्ष्य बनाकर बढ़ना पथ पर

औ’ स्वयं विश्वास करो।

मृत्यु तो जीवन का गहना

मत रोना कुछ हास करो।

 

पंछीगण को देख निकट से

भोर में भरें किलोल।।

 

जो सोया है, उसने खोया

आँख खोल मत डर प्यारे।

अपनी मदद स्वयं जो करते

उस पर ही ईश्वर वारे।

 

परिभाषा जीवन की अद्भुत

सदैव तराजू तोल।।

 

संशय, भ्रम में नहीं भटकना

यह जीवन नरक बनाते।

द्वेष – ईर्ष्या वैर भाव भी

सदा अँधेरा यह लाते।

 

सच्चाई की जीत लिखी है

आगे होगा गोल।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३ – लघुकथा- प्रेरणा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “प्रेरणा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३

☆ लघुकथा – प्रेरणा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

खुद कमा कर पढ़ाई करने वाले एक छात्र की सिफारिश करते हुए कमलेश ने कहा, “यार योगेश! तू उस छात्र की मदद कर दें. वह पढ़ने में बहुत होशियार है. डॉक्टर बन कर लोगों की सेवा करना चाहता है.”

“ठीक है मैं उस की मदद कर दूंगा.  उस से कहना कि मेरी नई नियुक्त संस्था से शिक्षाऋण का फार्म भर कर ऋण प्राप्त कर लें.” योगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “मगर, मैं चाहता हूं कि तू उस की निस्वार्थ सेवा करें. उसे सीधे अपने नाम से पैसा दान दें.”

“नहीं यार! मैं ऐसा नहीं करना चाहता हूं ?”  यौगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “इस से तेरा नाम होगा ! लोग तूझे जिंदगी भर याद रखेंगे.”

“हाँ यार. तू बात तो ठीक कहता है. मगर,  मैं नहीं चाहता हूं कि उस छात्र की मेहनत कर के पढ़ने की जो प्रेरणा है वह खत्म हो जाए.”

“मैं उसे जानता हूं, वह बहुत मेहनती है. वह ऐसा नहीं करेगा”, कमलेश ने कुछ ओर कहना चाहा मगर, यौगेश ने हाथ ऊंचा कर के उसे रोक दिया.

“भाई कमलेश ! यह उस के हित में है कि वह मेहनत कर के पढाई करें”, कह कर यौगेश ने अपनी आंख में आए आंसू को पौंछ लिए, “तुम्हें तो पता है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंक कर पीता है.”

यह सच्चाई सुन कर कमलेश चुप हो गया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९५ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९५ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- वखरे साहेबांनी माझ्या डोक्यावरचं ओझं किती अलगद उतरवून घेतलं होतं! त्यांचे आभार मानून मी जायला वळणार एवढ्यांत त्यांनी मला थांबवलं.

“लिमये, माझ्या घरच्या जबाबदाऱ्या अजून पूर्ण व्हायच्यात. त्या तशा झाल्या असत्या तर मीही तुम्ही घेतलाय तसाच निर्णय घेतला असता. सोs यू आर आॅन राईट ट्रॅक. गो अहेड. ऑल द बेस्ट. एन्जॉय अॅंड बी हॅप्पी! ” ते म्हणाले होते.

त्यांचे शब्द माझ्यासाठी सदिच्छाच नव्हते फक्त तर त्यांच्या तोंडून ‘तो’ च देत असावा असे आशीर्वादही होते!)

मनाला स्पर्शून गेलेला हाच विचार सोबत घेऊन मी माझ्या केबिनमधे आलो. आता इथला आपला अन्नाचा शेर अल्पकाळाचाच. जाण्यापूर्वी सगळी कामं पूर्ण करायला हवीत. असा विचार करीत मी बसायला माझी खुर्ची ओढली एवढ्यांत माझ्या लक्षात आलं की आजच्या

इनवर्ड मेलमधे आलेलं माझ्या नावाचं एक बंद एन्व्हलप शिपायाने आधीच तिथं माझ्या टेबलवर पेपरवेटखाली ठेवलेलं होतं. पाहिलं तर ते आमच्या नागपूर रिजनल आॅफिसकडून आलेलं होतं. मी ते न फोडता तसंच बाजूला सरकवून पुन्हा त्यावर पेपरवेट ठेवून दिला. आणि माझ्या समोरची इतर महत्त्वाची कामं हातावेगळी करायला सुरुवात केली. कारण त्या पत्रात बाकी दुसरं कांही नसणार हे गृहितच होतं. याआधीही नागपूर रिजनल ऑफिसकडून मला साधारण दोन महिन्यांपूर्वी एक पत्र आलं होतंच. आमची अकोला ब्रॅंच नागपूर रिजनच्या अखत्यारीत होती आणि अकोल्याला माझी ट्रान्स्फर व्हायला निमित्त ठरलेल्या अनियमित कर्ज खात्यांबद्दल जे गंभीर प्रश्न निर्माण झालेले होते त्यामुळे होणाऱ्या बॅंकेच्या आर्थिक नुकसानीला कोण जबाबदार हे ठरवण्याचे प्रोसेस पूर्वीच सुरू झालेले होते. त्या कार्यप्रणालीचाच एक भाग म्हणून आधी आलेले ते पत्र! त्या पत्रात ‘तुम्ही तेथे मॅनेजर म्हणून कार्यरत असताना या बुडीत होऊ पहाणाऱ्या कर्जांची वसुली करण्यासाठी आवश्यक पावले उचलली गेली नव्हती असे निदर्शनास आले आहे. याबद्दलचे आपले म्हणणे आठ दिवसांच्या आत लेखी कळवावे’ असे सूचित केलेले होते. ते पत्र वाचून भीति वाटण्याऐवजी तेव्हा मला हसूच आले होते. कारण मला तो कागदी घोडे नाचवण्याचा हास्यास्पद प्रकारच वाटला होता. खरंतर या गंभीर त्रुटी मी तिथे चार्ज घ्यायच्या आधीच आॅडिटमधेच रिपोर्ट झाल्या होत्या. त्याला जबाबदार असलेल्या आधीच्या मॅनेजरची तेथून उचलबांगडीही झाली होती. आणि ती घाण उपसण्यासाठीच माझी तिथे बदली झाली होती. सेन्ट्रल ऑफिसच्या सूचनेप्रमाणे सहा कर्जखातेदारांविरूध्द क्रिमिनल केसेस् दाखल करून इतर थकीत खातेदारांविरूध्दही वसुलीच्या नोटिसा पाठवून मी पाठपुरावा सुरूही केलेला होता. त्या ब्रँचमधल्या पाच महिन्यांच्या अल्पवास्तव्यात एक जबाबदार ब्रॅंच मॅनेजर म्हणून जे करायचे ते वेळोवेळी रिजनल ऑफिस आणि सेंट्रल ऑफिस या दोघांचेही मार्गदर्शन घेऊन मी तत्परतेने केलेले होते आणि प्रत्येक खात्याबद्दलची रिपोर्टिंग्जही त्या त्या वेळी सर्व वरिष्ठ कार्यालयांना पाठवत आलो होतो. या सगळ्याची मुद्देसूद सविस्तर माहिती देऊन ‘मी माझ्या कर्तव्यात कोणतीही कसूर केलेली नसल्याने होणाऱ्या आर्थिक नुकसानीला मला जबाबदार ठरवता येणार नाही’ असे त्या पत्राला उत्तर दिले होते त्यालाही दोन महिने होऊन् गेले होते. त्यामुळेच आज मला आलेलं ते समोरच्या इन्व्हलपमधलं पत्र हे मी पूर्वी पाठवलेल्या त्या लेखी उत्तराची पोच आणि त्या प्रश्नाला रिजनल आॅफिसने दिलेली क्लिनचीट असणार याबद्दल मला शंका नव्हतीच. पण…?

पण साधारण तासाभराने मला इतर कामांमधूनच थोडा निवांतपणा मिळताच मी ते एन्व्हलप फोडून आतलं पत्र वाचलं आणि मला हादराच बसला. ते मला वाटलं होतं तसं साधं पत्र नव्हतं. ती मला आलेली एक नोटीस होती. क्षणभर कां होईना कांहीतरी अभद्र घडत असल्याच्या आशंकेने मी अस्वस्थ झालो.

‘तुम्ही सदर कर्ज खात्यांबाबतचा पाठपुरावा समाधानकारक केलेला नसल्यामुळे तुम्ही मांडलेली कैफियत स्वीकारता येणार नाही. ‘ असे नमूद करून ‘ सदर खात्यांमधील अनियमितता आणि आर्थिक नुकसानीस तुम्हाला कां जबाबदार धरू नये? ‘ अशी मला बजावलेली ती ‘शो काॅज नोटीस’ च होती.

माझी भूमिका स्वच्छ होती. त्यामुळे ते पत्र वाचल्यानंतर उमटलेली माझी पहिली नकारात्मक प्रतिक्रिया क्षणकाळच टिकली. शांतपणे विचार केल्यानंतर एक गोष्ट मला स्पष्टपणे जाणवली. माझ्या अकोला ब्रॅंचमधील वास्तव्यादरम्यान नागपूरचे तेव्हाचे रिजनल मॅनेजर आणि मी या कर्जखात्यांच्या संदर्भात सतत संपर्कात असायचो. किंबहुना सेन्ट्रल आॅफिस आणि म्हणून झोनल आॅफिस या दोन्हीकडून माझ्या इतकाच त्यांच्यामागेही या गंभीर प्रकरणांबाबतचा ससेमिरा असायचाच. मी आणि ते दोघांच्या जवळजवळ एकाचवेळी प्रमोशन मिळून ट्रान्स्फर्स झालेल्या. आज ते तिथेच असते तर हा प्रश्नच निर्माण झाला नसता. पण आता तिथे आलेले नवीन रिजनल मॅनेजर आम्हा कुणालाच ओळखत नव्हते. त्यामुळे त्यांनी चुकीच्या पध्दतीने धसाला लावलेल्या या प्रश्नात ते मलाही गुंतवू पहात होते. त्यामागे त्यांचा नेमका काय उद्देश होता ते मला समजत नव्हतं. मी कितीही निर्दोष असलो तरी ते सिद्ध करून यातून बाहेर पडणं अवघड नसलं तरी मनस्ताप देणारं आणि वेळखाऊ ठरणारंही होतं. जे करायचं ते अतिशय विचारपूर्वक आणि शांतपणे करायला हवं आणि तेही ताबडतोब हे माझ्या लक्षात आलं!

स्वेच्छानिवृत्तीसाठीची ती आकर्षक योजना, सर्वांशी मोकळेपणाने चर्चा करून त्यासाठी अर्ज करायचा मी घेतलेला निर्णय, त्यामधे सेंट्रल आॅफिसच्या नुकतेच प्रमोशन मिळालेल्या आम्हा सर्वांच्या संदर्भातल्या धोरणामुळे निर्माण झालेली अनिश्चितता हे सगळे अडसर वखरेसाहेबांशी मोकळेपणाने चर्चा केल्यानंतर दूर झालेत असं वाटलं होतं पण तो असा एक चकवाच ठरला होता तर! दु:ख माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीत आता पुन्हा अडसर निर्माण होणार याचं नव्हतंच. आपल्यावर होणाऱ्या अन्यायाविरुद्ध आपण कांहीही करू शकत नाही याचं दु:ख होतं!

आज जवळजवळ पंचवीस वर्षांनंतर या सगळ्याच घटनांकडे वळून पहाताना मला माझ्या बाबांचे शब्द आठवतात.

‘कर्ता करवता ‘तो’च. आपण फक्त निमित्तमात्र’ असं ते म्हणायचे. त्याचा नेमका अर्थ या सर्व घटनाच मला समजावून सांगू पहातायत असंच वाटू लागलं!

आज आलेलं हे पत्र वाचण्यापूर्वी फक्त तासभरच आधी मी माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीच्या निर्णयाला वखरेसाहेबांची संमती घेऊन बाहेर पडलो होतो ते जग जिंकून आल्याच्या आनंदातच! वखरेसाहेबांना मी माझ्या या निर्णयामागची माझी भूमिका

मोकळेपणाने समजावून सांगितल्यानेच त्यांनी मनापासून आपल्याला पाठिंबा दिला असंच मला वाटलं होतं. इथं समोर हाकेच्या अंतरावर असणाऱ्या अपेक्षित अशा वळणावर वळायचं कीं आहे त्या सरळ रस्त्यानेच पुढे जात रहायचं याचा निर्णय घेणारा आता मीच आहे असंच मला वाटलं होतं! माझ्या मनात आलेल्या या ‘मी’ मधे कणभर कां होईना ‘अहं’ होताच! पण नंतर अगदी

अल्पकाळातच तो ‘अहं’ पूर्णतः नाहीसा झाला तो हे पत्र आल्यानंतर! आता मी करतो म्हणून कांहीही होणार नाहीय यांची स्पष्ट जाणीव मला झाली. मी निमित्तमात्र आहे आणि करता करवता ‘तो’च आहे हेच खरे! आता या क्षणी ‘तो’ बुध्दी देईल तसं करत जायचं आणि जे घडेल तेच ‘त्या’चा प्रसाद म्हणून स्वीकारायचं. तो अन्याय असो वा अन्यायाचं निराकरण. असं ठरवलं आणि मन शांत झालं. त्याचवेळी अचानक इंटरकाॅमवर वखरेसाहेब…!

“लिमये, तुमचा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड करायला आत्ताच स्टाफ डिपार्टमेंटला पाठवलाय. आता लगेचच तुम्ही व्ही. आर. एस. घेताय ही बातमी आपल्या ऑफिसमधे षटकर्णी होईल बघा… ‘ असं म्हणून ते गंमतीने हसत होते. पण.. ते ऐकून मनाला स्पर्शू पहाणारा आनंद मात्र माझ्या हातातल्या ‘त्या’ पत्राकडे लक्ष जाताच मलूल होऊन गेला..!

या पत्राबद्दल वखरे साहेबांना आत्ताच कल्पना द्यायला हवी. माझा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड होण्यापूर्वी त्यांना हे समजायलाच हवं.. ‘ मी भानावर आलो. झरकन् उठून बाहेर आलो. ‘ते’ पत्र हातात घेऊन वखरेसाहेबांच्या केबिनकडे धाव घेतली…! माझी पावलं या क्षणी प्रकाशवाटेकडे धाव घेतायत कीं मिट्ट काळोख्या अंधारवाटेकडे हे मात्र फक्त ‘त्या’लाच,… त्या कर्त्या-करवत्यालाच माहित होतं!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९ आणि १० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९ आणि १० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक ९ वा – – – 

नको रे मना द्रव्य ते पुढीलांचे |

अति स्वार्थबुद्धी न रे पाप साचे|

घडे भोगणे पाप ते कर्म खोटे |

न होता मनासारिखे दुःख मोठे |९|

अर्थ : 

समर्थ मनाला उपदेश करताना म्हणतात की पुढीलांचे म्हणजे दुसऱ्याचे द्रव्य किंवा पैसा त्याज्य समजावा. पैशाची हाव सुटली की माणूस फक्त स्वार्थाचा विचार करतो आणि त्यातून पापाचाच संचय होतो. आणि ज्यामुळे पापकर्माची फळे भोगावे लागतात असे कर्म खोटे म्हणजे त्याज्य आहे. स्वार्थाची इच्छा धरणारा माणूस त्याच्या मनासारखे झाले नाही की दुःखी होतो.

मागील श्लोकात समर्थांनी आपला देह चंदनाप्रमाणे झिजवून सज्जनांना संतुष्ट करावे असे सांगितले आहे. या श्लोकात समर्थ आपल्याला दुसऱ्याच्या पैशाचा किंवा संपत्तीचा लोभ ठेवू नये असे सांगत आहेत. पुढीलांचे या शब्दाचे अनेक अर्थ होतात. पुढीलांचे म्हणजे पूर्वजांचे असाही अर्थ घेता येतो आणि दुसऱ्यांचे हाही अर्थ या ठिकाणी लागू होतो. त्याचप्रमाणे दुसरा अर्थ म्हणजे पुढच्या पिढीसाठीचे. आपल्या पूर्वजांनी कमावलेले धन आयतेच आपल्याला मिळावे असे प्रत्येकाला वाटते. परंतु अशा प्रकारची अभिलाषा धरली तर आपल्या कर्तृत्वाला फारसा वाव मिळत नाही. माणूस आळशी बनतो आणि अनेक दुर्गुण त्याच्या अंगात प्रवेश करतात. पूर्वजांच्या संपत्तीसाठी (वारसा हक्कासाठी)होणारी भांडणे आणि त्यातून निर्माण होणाऱ्या भानगडी, कोर्टकचेऱ्या आपणा सर्वांना परिचित आहेत.

स्वार्थ कोणाला चुकला आहे? लहान मुलाला सुद्धा आपला स्वार्थ कळतो. त्यामुळे आपली गरज भागेल एवढे जरूर मिळवावे. परंतु गोंधळ होतो तो अती स्वार्थ बुद्धीमुळे. आपल्या चरितार्थासाठी आवश्यक तेवढा पैसा जरूर मिळवावा. पण पुढील पिढ्यांसाठी त्याचा संचय करू नये असेही समर्थ आपल्याला सुचवत आहेत. गोंदवलेकर महाराज म्हणत, “घरात तीन दिवसांचे अन्न असले म्हणजे चौथ्या दिवसाची चिंता करू नये. ” परंतु प्रत्यक्षामध्ये आपण असे पाहतो की साधारणतः तीन पिढ्यांना पुरून उरेल एवढी संपत्ती असतानाही लोकांना अधिकाधिक संपत्तीची हाव असते.

पुढीलांचे म्हणजे दुसऱ्याचे द्रव्य किंवा पैसा नको. ते कोणत्याही प्रकारे घेणे म्हणजे एक प्रकारची चोरीच आहे. मग पैसा मिळवायचाच नाही का? प्रापंचिक माणसाला तर पैसा आवश्यकच असतो. अगदी साधू संन्यासी यांना देखील अन्न, वस्त्र, निवारा यांची आवश्यकता असतेच. मग पैसा कसा मिळवावा? याचे उत्तर संत तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे ‘ जोडोनिया धन उत्तम व्यवहारे हे आहे. अशा पद्धतीने पैसा मिळवला तर तो धर्माला मान्य आहे. सरळमार्गी राहून पैसा मिळवता येत नाही अशा प्रकारची साधारण समजूत आहे. परंतु कष्टाने आणि सरळ मार्गाने पैसा मिळवून श्रीमंत झालेल्यांची अनेक उदाहरणे समाजात आहेत. परंतु त्याकडे आपले फारसे लक्ष जात नाही. पण अशी उदाहरणे आदर्श म्हणून समाजासमोर ठेवली गेली पाहिजेत.

असे म्हणतात की माणसाच्या गरजा पूर्ण करता येतात परंतु हाव पूर्ण करता येत नाही. म्हणून गरजेपुरते असले की माणसाने समाधानी असावे. परंतु तसे होत नाही. म्हणून आपल्यापेक्षा खालच्या स्तरावर असलेल्या व्यक्तीकडे पहावे असे म्हटले जाते. कारमध्ये फिरणाऱ्या माणसाने मोटरसायकलवर फिरणाऱ्या माणसाकडे पाहून आपण त्यापेक्षा भाग्यवान आहोत असे समजून समाधान मानावे. मोटरसायकलवाल्याने सायकल चालवणाऱ्याकडे, सायकलवर असणाऱ्याने पायी चालणाऱ्याकडे लक्ष द्यावे म्हणजे आपण किती भाग्यवान आहोत हे लक्षात येईल. परंतु असे होत नाही. आपण नेहमी उलटच करत असतो. श्रीमंत अतिश्रीमंताकडे पाहत असतो आणि स्वतःला दुःखी करून घेत असतो.

अतिस्वार्थ बुद्धीमुळे आपल्याला अधिक हवे असे वाटत असते आणि मग ते कोणत्याही मार्गाने मिळवण्यात काही गैर वाटत नाही. परंतु असे करत असताना आपण पापकर्मांचाच संचय करत जातो. गैरमार्गाने पैसा कमावणारे लोक समाजात सुखाने जगताना दिसतात. ते पाहून आपणही तसे करावे असे वाटणे साहजिक असते. परंतु कर्माच्या सिद्धांतानुसार अशा लोकांना देखील आपल्या पापाचा हिशेब द्यावाच लागतो. ज्यांच्यावर अनेक घोटाळ्यांचे आरोप आहेत असे भ्रष्ट नेते एखाद्यावेळी न्यायालयातून निर्दोष सुटतीलाही परंतु नियती हे असे न्यायालय आहे की जिथे आपल्या कर्मांचा योग्य तो हिशेब होतोच. तिथे कोणाचीही सुटका नाही. अधिकाधिक पैसा कमावण्याचा हव्यास लागतो तेव्हा अनेक प्रकारच्या चिंता, दडपण, स्पर्धा यासारख्या गोष्टींना सामोरे जावे लागते. त्यातूनच मग दडपण, निद्रानाश, अपचन, रक्तदाब, हृदयविकार यासारख्या अनेक विकारांना निमंत्रण मिळते. त्यामानाने सरळ मार्गाने वागणारा माणूस खाऊन पिऊन सुखी आणि समाधानी असतो. पैशाची, संपत्तीची आणि सत्तेची हाव सुटलेल्या माणसाला जेव्हा त्याच्या मनासारखे होत नाही तेव्हा मोठ्या दुःखाला सामोरे जावे लागते. धनवृद्धीसोबत जर चिंतावृद्धी होत असेल तर काय उपयोग? समर्थांचा इशारा स्पष्ट आहे —

– – द्रव्य मिळव, पण द्रव्याचा दास होऊ नकोस.

– – संपत्ती कमव, पण स्वार्थाचा संचय करू नकोस.

स्वसंवाद : 

  • माझ्या मनात दुसऱ्याच्या संपत्तीबद्दल आकर्षण किंवा हेवा आहे का?
  • मी गरज आणि हाव यातील फरक ओळखतो का?
  • पैसा कमावताना माझा मार्ग प्रामाणिक आणि नीतिमान आहे का?
  • अधिकाधिक मिळवण्याच्या धडपडीत माझे समाधान हरवत तर नाही ना?
  • धनवृद्धीबरोबर माझी चिंताही वाढते आहे का?

– – – 

श्लोक १० वा – – – 

सदा सर्वदा प्रीती रामी धरावी|

दुःखाची स्वये सांडी जीवी करावी|

देहेदुःख ते सुख मानीत जावे| 

विवेके सदा सस्वरूपी भरावे |१०|

अर्थ:

या श्लोकात समर्थ आपल्याला भगवंतावर प्रेम करायला सांगतात. प्रारब्धामुळे जे दुःख आपल्याला प्राप्त झाले आहे त्याचे वाईट वाटून न घेता त्या जाणिवेचा त्याग करायला शिकावे. देहाच्या दुःखाला सुख मानण्याचा अभ्यास करावा. योग्य आणि अयोग्याचा विवेक करून आपले मन सस्वरुपी स्थिर करावे.

प्रेम करणे हा मनुष्यस्वभाव आहे. प्रत्येकाचे कोणावर तरी किंवा कोणत्यातरी वस्तूवर प्रेम असते. कंजूष माणसाचे धनावर प्रेम, विषयलंपट माणसाचे विषयावर प्रेम, कोणाला सत्ता प्रिय असते. असे प्रेमाचे विविध विषय असतात. प्रेमातून आनंद मिळतो परंतु हा आनंद चिरकाल टिकणारा नसतो. प्रेमाचा विषय चुकला तर दुःख पदरी पडणारच! मदिरेच्या प्रेमात धुंद होऊन (चित्रपटात दाखवल्याप्रमाणे)देवदास बनण्यापेक्षा भगवंताचे प्रेम लागून त्याचे म्हणजे देवाचे दास होणे कधीही चांगले. या प्रेमातून जो आनंद मिळेल तो चिरंतन असेल. म्हणूनच समर्थ म्हणतात ‘सदा सर्वदा प्रीती रामी धरावी. ‘

आपण मनुष्य जन्मात आलो आहोत तेव्हा सुखदुःख हे असणारच. परमेश्वराने जेव्हा मानवी अवतार धारण केला तेव्हा त्याला किंवा संतांना देखील सुखदुःखे चुकली नाहीत. मग आपल्यासारख्या सामान्य माणसाची काय कथा! आपण सुखाने आनंदतो आणि दुःखाने दुःखी होतो. परंतु या ठिकाणी दुःखाचा त्याग करायला शिका असे समर्थ आपल्याला सांगतात. थोडक्यात असे म्हणता येईल की दुःखाची जाणीवेला आपल्या मनात स्थान देण्यापेक्षा परमेश्वराच्या चिंतनाकडे जर लक्ष दिले तर दुःख हलके होईल.

हा दुःखाचा त्याग करणे म्हणजे मनाला एक प्रकारचे वळण लावणे आहे. ही गोष्ट सहजासहजी होणारी नाही. त्यासाठी समर्थ सांगतात की देहाला जे दुःख होते त्यालाच सुख मानून पुढे चालावे. याचा अर्थ प्रारब्धाने जे दुःख आपल्याला प्राप्त झाले आहे त्याचे वाईट वाटून न घेता त्याचा स्वीकार करावा आणि आपले कर्म करावे. बऱ्याच लोकांना आपल्या आजाराचा आणि दुःखाचा बाऊ करण्याची सवय असते. दुसऱ्यासमोर आपल्या दुःखाचे वारंवार प्रदर्शन करून ते सहानुभूती मिळवण्याचा प्रयत्न करतात परंतु त्यामुळे फारसे काही साध्य होत नाही. सतत अशी तक्रार करणारी माणसे इतरांना नकोशी होतात. प्रारब्धाने जे दुःख आपल्या वाट्याला आले आहे ते स्वीकारण्याची आणि त्यालाच सुख मानण्याची वृत्ती जेव्हा आपली होईल तेव्हा सुखाचा वेगळा शोध घेण्याची आवश्यकता राहणार नाही. असेल त्या परिस्थितीतही आपण आनंदी, सुखी आणि समाधानी राहू.

आपल्या अवतीभवती जर नजर टाकली तर आपल्याला ज्यांना अनेक प्रकारचे शारीरिक त्रास किंवा व्याधी आहेत असे लोक आपल्या दृष्टीस पडतात. परंतु त्यातील बरेच लोक त्यांचा स्वीकार करून आपले जीवन ध्येय जे आहे त्या मार्गावर वाटचाल करताना दिसतात. प्रसिद्ध शास्त्रज्ञ स्टीफन हॉकिंग यांना मज्जासंस्थेचा गंभीर आजार झाला तरी देखील त्यांनी आपले संशोधन कार्य सुरूच ठेवले. प्रसिद्ध नृत्यांगना असलेल्या सुधा चंद्रन यांना आपला एक पाय अपघातात गमवावा लागला. परंतु त्यांनी जिद्दीने त्यावर मात केली. अशी कितीतरी उदाहरणे आहेत. थोडक्यात सांगायचे तर: या व्यक्तींनी आपल्या शारीरिक मर्यादांना आपली कमकुवत बाजू न बनवता, त्यांना आपली ताकद बनवले. “शरीराला अपंगत्व असू शकते, पण मनाला नाही, ” हेच त्यांनी जगाला दाखवून दिले.

म्हणून समर्थ म्हणतात की माणसाने विवेकाची कास धरून स्वस्वरूपाचे चिंतन करावे. मी म्हणजे देह नाही. त्यामुळे देहाला होणाऱ्या दुःखाशी माझा खऱ्या अर्थाने संबंध नसून मी म्हणजे एक आनंदस्वरूप आत्मा आहे अशी भावना मनाशी दृढ करावी. त्यासाठी भोवतालच्या परिस्थितीकडे साक्षी भावाने पाहता यायला हवे. साधकाने आत्मस्वरूपाच्या चिंतनातच (म्हणजेच भगवंताच्या नामस्मरणात)इतके रंगून जावे की त्याला त्यामुळे दुःखाची जाणीव सुद्धा होणार नाही.

स्वसंवाद : 

  • माझे प्रेम नेमके कशावर आहे — नश्वर गोष्टींवर की चिरंतन तत्त्वावर?
  • एखादे दुःख आले की मी त्याचा बाऊ करतो, की शांतपणे स्वीकारून पुढे चालतो?
  • माझ्या देहाच्या त्रासाशी मी पूर्णपणे एकरूप होतो का, की मी त्याचा साक्षी राहू शकतो?
  • विवेकबुद्धी वापरून मी परिस्थिती आणि प्रतिक्रिया यांमध्ये फरक करू शकतो का?
  • माझे मन नामस्मरणात किंवा आत्मचिंतनात किती वेळ रमते? (क्रमशः)

 – क्रमशः श्लोक ९ आणि १०.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१६ – कविता – ☆ बिना हँसे रोये क्या पाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता टेम पब्लिसिटी का भैये” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१६ 

☆ बिना हँसे रोये क्या पाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

जिनमें संवेदना नहीं,

वे कैसे रोयेगे

ओढ लबादे, ‘व्यर्थ सोच’ के

कैसे सोएंगे।

 

चेहरों पर जिनके

मुस्कान नहीं

सहज सरलता से

पहचान नहीं

जो गंभीर मुखौटे

ओछे बैठे हैं

प्रमुदित रहने का

है ज्ञान नहीं

शंकित मन जीवन में

कैसे खुशियाँ बोयेंगे…

 

जो न प्रकृति से

हँसना सीखे हैं

जो, जो भर

रोने से रोते हैं

हंसी-रुदन तो

जीवन के वरदान है

सुख-दुख बिन

जग के रस फीके हैं

बिना हँसे-रोए

क्या पाया है

जो खोएंगे…

 

है बसंत तो,

पतझड़ भी आएगा

दिवस बाद

अँधियारा भी छाएगा

मोर और संध्या में

जैसी समरसता है

हर्ष-शोक भी जीवन में

क्षमता लाएगा

सहज बनेंगे तब आंसू

तन मन को धोएंगे।….

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३७ ☆ मज़दूर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “क्यों?” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३७ ☆ मज़दूर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शहर के हर चौराहे पर

आज भी इकट्ठे होते हैं लोग

काम की तलाश में

कहीं भटकते नहीं है

बस खड़े रहते है

इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद

आकर उन्हें ले जाएगा

अपने साथ लेकर चलते हैं

दिन भर का भोजन पानी

जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है

उनकी आस उसी तरह

कम होती जाती है

सर्वहारा वर्ग आज भी

आशाओं और व्यवस्था के बीच

झूलता लटकता अपना और

अपने परिवार का बोझ ढोता

ज़िंदा है इस कायनात में

इन असंगठित लोगों के लिए

सरकारों की प्रतिबद्धता

सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में

जो शायद ही कोई

साकार रूप ले पाती है

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४२ ☆ मुहब्बत का असर तो देखिए… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुहब्बत का असर तो देखिए “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४२ ☆

✍ मुहब्बत का असर तो देखिए… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जरा सी हैसियत बढ़ते ही माज़ी भूलने लगते

मगर हरकत से ये ज़रदार फौरी है बने लगते

 *

जो अपनी हैसियत से उठाते वज़्न हैं बढ़चढ़

उन्हीं के पाँव चादर से निकलकर झाँकने लगते

 *

मुहब्बत का असर तो देखिए वो दूर है मुझसे

मगर हर वक़्त आँखों के मुझे है सामने लगते

 *

जिन्होंने ज़िन्दगी की धूप में देखा नहीं तपके

यही वो लोग है जो मुश्किलों से भागने लगते

 *

बुजुर्गों की  करो इज्ज़त  तज़ुर्बों का खजाना है

मगर बूढ़ा समझ कर  लोग रुख को मोड़ने लगते

 *

उधारी प्रेम की कैची है जिसने भी कहा सच है

बिगड़ता रब्त है जब भी उधारी माँगने लगते

 *

नए इस दौर के मुंसिफ अना का पास भूले है

नहीं दोगे जो नज़राना ये पेशी टालने लगते

 *

भले दुश्मन है ऐसे दोस्त से जो घात में रहकर

गले मिलते ही  देखा है की गर्दन नापने लगते

 *

भलाई का अरुण अंजाम दुनिया में यही देखा

मसीहा जो बना उसमें ही कीलें ठोकने लगते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४७ – प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – प्रारब्ध।)

✍ प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे  

कभी-कभी,

जीत कर भी,

विजेता,

होता नहीं, बहुत खुश,

क्यों कि,

पता है उसे

जीता नहीं है वो,

जीता है, प्रारब्ध उसका,

कमतर थी कूबत उसकी

अपने ही प्रतिद्वंदी से,

जो,

पराजित, कुंठित और अपमानित बैठा है

किसी ठौर ।

 

कुरूक्षेत्र में

पराजित हुआ कर्ण,

विजित हुआ अर्जुन,

प्रारब्ध था दोनो का, अपना – अपना,

अपनी – अपनी

योग्यता और कौशल्य से परे ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रश्नविहीन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆

✍ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ। भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।

सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं।

एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।

प्रतीक की बोलती बंद। जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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