(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना एक काव्य संसार है । साप्ताहिक स्तम्भ अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है अप्रतिम मराठी गीत गझल गीत गाण्यासाठी जिसे प्रख्यात गायक एवं संगीतकार श्री राजेश दातार जी ने स्वरबद्ध किया है। इसके साथ ही प्रस्तुत है स्थिर-चित्र आडियो /वीडियो यूट्यूब लिंक । )
☆ अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 3 ☆
गझल गीत गाण्यासाठी
(Please Click ⇑⇑⇑⇑ to hear song or click on YouTube Link >> गझल गीत गाण्यासाठी )
पाखरात कोकिळ गातो तसे गाऊ दे रे गजल गीत गाण्यासाठी सूर लावू दे रे
शब्दफुलांच्या या बागा नकोना पहारे तिच्या मोरपंखी ओळी आणती शहारे
अभिषेक कानावरती रोज होऊ दे रे
गोटीबंद आहे गजला परि जीव घेण्या एक एक शब्दांच्या या शेकडो कहाण्या दु:ख असे भळभळणारे मला पाहू दे रे
दु:ख सुखाच्या रे येथे किती येरझारा कधी शब्द घुसमटणारे कधी थंड वारा ब्रीद जीवनाचे सारे मला मांडू दे रे
शब्द कोण घेऊन आले पहाट पहाटे कोवळीच सुमने येथे नसे तिथे काटे
If you remain busy during the day, and feel fatigued any time, this, very short, guided relaxation is especially designed for you.
Sit comfortably for a while and just follow the instructions. You will feel relaxed and recharged in less than ten minutes. Give it a try!
YOGA NIDRA IN A SITTING POSTURE
If you remain busy during the day, and feel fatigued any time, this, very short, guided relaxation is especially designed for you.
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Yoga Nidra is a systematic method of inducing complete physical, mental and emotional relaxation. Fifteen minutes of the practice gives you the same comfort as one of sleep.
Usually the practice is done while lying down. This short version is especially designed for those who want to relax and recharge in a sitting posture at their workplace, airport or park in the quickest possible time during the course of their busy day.
Yoga nidra, in it’s present form, is a beautiful gift to humanity by Swami Satyananda Saraswati who founded the Bihar School of Yoga.
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति कोम. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज तीसरी कड़ी में प्रस्तुत है “जीवन भी क्रिकेट ही है” इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)
२० .. २० क्रिकेट की तेजी ही उसकी रोचक रोमांचकता है, जिसके कारण वह लोकप्रिय हुआ है. आज के व्यस्त युग में हमारा जीवन भी बहुत तेज हो चुका है, लोगो के पास सब कुछ है, बस समय नही है, बहुत कुछ साम्य है जीवन और २० ..२० क्रिकेट में. सीमित गेंदो में अधिकतम रन बनाने हैं और जब फील्डिंग का मौका आये तो क्रीज के खिलाड़ी को अपनी स्पिन गेंद से या बेहतरीन मैदानी पकड़ से जल्दी से जल्दी आउट करना होता है. जिस तरह बल्लेबाज नही जानता कि कौन सी गेंद उसके लिये अंतिम गेंद हो सकती है, ठीक उसी तरह हम नही जानते कि कौन सा पल हमारे लिये अंतिम पल हो सकता है. धरती की विराट पिच पर परिस्थितियां व समय बॉलिंग कर रहे है, शरीर बल्लेबाज है, परमात्मा के इस आयोजन में धर्मराज अम्पायर की भूमिका निभा रहे हैं, विषम परिस्थितियां, बीमारियाँ फील्डिंग कर रही हैं, विकेट कीपर यमराज हैं, ये सब हर क्षण हमें हरा देने के लिये तत्पर हैं. प्राण हमारा विकेट है. प्राण पखेरू उड़े तो हमारी बल्लेबाजी समाप्त हुई. जीवन एक २० .. २० क्रिकेट ही तो है, हमें निश्चित समय और निर्धारित गेंदो में अधिकाधिक रन बटोरने हैं. धनार्जन के रन सिंगल्स हो सकते हैं, यश अर्जन के चौके, समाज व परिवार के प्रति हमारी जिम्मेदारियो के निर्वहन के रूप में दो दो रन बटोरना हमारी विवशता है. अचानक सफलता के छक्के कम ही लगते हैं. कभी-कभी कुछ आक्रामक खिलाड़ी जल्दी ही पैवेलियन लौट जाते हैं, लेकिन पारी ऐसी खेलते हैं कि कीर्तिमान बना जाते हैं, सबका अपना-अपना रन बनाने का तरीका है.
जीवन के क्रिकेट में हम ही कभी क्रीज पर रन बटोर रहे होते हैं तो कभी फील्डिंग करते नजर आते हैं, कभी हम किसी और के लिये गेंदबाजी करते हैं तो कभी विकेट कीपिंग, कभी किसी का कैच ले लेते हैं तो कभी हमसे कोई गेंद छूट जाती है और सारा स्टेडियम हम पर हंसता है. हम अपने आप पर झल्ला उठते हैं. जब हम इस जीवन क्रिकेट के मैदान पर कुछ अद्भुत कर गुजरते हैं तो खेलते हुये और खेल के बाद भी हमारी वाहवाही होती है, रिकार्ड बुक में हमारा नाम स्थापित हो जाता है. सफल खिलाड़ी के आटोग्राफ लेने के लिये हर कोई लालायित रहता है. जो खिलाड़ी इस जीवन क्रिकेट में असफल होते हैं उन्हें जल्दी ही लोग भुला भी देते हैं.
अतः जरूरी है कि हम अपनी पारी श्रेष्ठतम तरीके से खेलें. क्रीज पर जितना भी समय हमें परमात्मा ने दिया है उसका परिस्थिति के अनुसार तथा टीम की जरूरत के अनुसार अच्छे से अच्छा उपयोग किया जावे. कभी आपको तेज गति से रनो की दरकार हो सकती है तो कभी बिना आउट हुये क्रीज पर बने रहने की आवश्यकता हो सकती है. जीवन की क्रीज पर हम स्वयं ही अपने कप्तान और खिलाड़ी होते हैं. हमें ही तय करना होता है कि हमारे लिये क्या बेहतर है? हम जैसे शाट लगाते हैं गेंद वैसी और उसी दिशा में भागती है, जिस दिशा में हम उसे मारते हैं. जिस तरह एक सफल खिलाड़ी मैच के बाद भी निरंतर अभ्यास के द्वारा स्वयं को सक्रिय बनाये रखता है, उसी तरह हमें जीवन में भी सतत सक्रिय बने रहने की आवश्यकता है. हमारी सक्रियता ही हमें स्थापित करती है, जब हम स्थापित हो जाते हैं तो हमें नाम, दाम और काम सब अपने आप मिलता जाता है. जीवन आदर्श स्थापित करके ही हम दर्शको की तालियां बटोर सकते हैं.
(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं। सुश्री रंजना इस एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं। सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से जुड़ा है एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है। निश्चित ही उनके साहित्य की अपनी एक अलग पहचान है। अब आप उनकी अतिसुन्दर रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है भावप्रवण गीत – वृत्त वियदगंगा)
भावार्थ : प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।।29।।
Those deluded by the qualities of Nature are attached to the functions of the qualities. A man of perfect knowledge should not unsettle the foolish one of imperfect knowledge. ।।29।।
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
(आपसे यह साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं e-abhivyakti के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं । अब हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा – “जूते” जो निश्चित ही आपको जीवन के कटु सत्य एवं कटु अनुभवों से रूबरू कराएगी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 3 ☆
☆ जूते ☆
हम नर्मदा-यात्रा पर थे। आदिवासी फगनू सिंह हमारे मार्गदर्शक थे। साथ मदद के लिए छोटू भी था। फिर भी सामान ढोने के लिए हमें रोज़ अपने पड़ाव से दो आदमी लेने पड़ते थे जिन्हें हम अगले पड़ाव पर छोड़ देते थे। गाँवों में निर्धनता ऐसी कि मज़दूरी के नाम से तत्काल लोग हाज़िर हो जाते। जितने चाहिए हों, उठा लो।
मंडला तक के आखिरी चरण में हमारे साथ दो आदिवासी किशोर थे। चुस्त, फुर्तीले, लेकिन पाँव में जूता-चप्पल कुछ नहीं। कंधे पर बोझ धरे, पथरीली ज़मीन और तपती चट्टानों पर वे नंगे पाँव ऐसे चलते जैसे हम शीतल, साफ ज़मीन पर चलते हैं। हम में से कुछ लोग हज़ार दो हज़ार वाले जूते धारण किये थे। दिल्ली से आये डा. मिश्र उन लड़कों की तरफ से आँखें फेरकर चलते थे। कहते थे, ‘इन्हें चलते देख मेरी रीढ़ में फुरफुरी दौड़ती है। देखा नहीं जाता। हम तो ऐसे दो कदम नहीं चल सकते।’
मंडला में यात्रा की समाप्ति पर डा. मिश्र इस दल को सीधे जूते की दूकान में ले गये। बोले, ‘सबसे पहले इन लड़कों के लिए चप्पल ख़रीदना है। उसके बाद दूसरा काम।’
जूते की दूकान वाले ने पूरे सेवाभाव से उन लड़कों को रबर की चप्पलें पहना दीं। लड़कों ने तटस्थ भाव से चप्पलें पाँव में डाल लीं। हमारा अपराध-बोध कुछ कम हुआ। जूते की दूकान से हम कपड़े की दूकान पर गये जहाँ फगनू सिंह को अपने लिए गमछा ख़रीदना था। सब ने अपने जूते दूकान के बाहर उतार दिये। ख़रीदारी ख़त्म करके हम सड़क पर आ गये। आदिवासी लड़के हमारे आगे चल रहे थे। गर्मी में सड़क दहक रही थी।
एकाएक डा. मिश्र चिल्लाये, ‘अरे,ये लड़के अपनी चप्पलें दूकान में ही छोड़ आये।’ लड़कों को बुलाकर चप्पलें पहनने के लिए वापस भेजा गया।
हमारे दल के लीडर वेगड़ जी ताली मारकर हँसे, बोले, ‘प्रकृति को मालूम था कि हमारा समाज इन लड़कों को पहनने के लिए जूते नहीं देगा, इसलिए उसने अपनी तरफ से इंतजाम कर दिया है। ये लड़के हमारी दया के मोहताज नहीं हैं।’
(सुश्री रक्षा गीता जी का e-abhivyakti में स्वागत है। आपने हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर किया है एवं वर्तमान में कालिंदी महाविद्यालय में तदर्थ प्रवक्ता हैं । आज प्रस्तुत है उनकी कविता “मुखौटा”।)
संक्षिप्त साहित्यिक परिचय
एम फिल हिंदी- ‘कमलेश्वर के लघु उपन्यासों का शिल्प विधान
पीएचडी-‘धर्मवीर भारती के साहित्य में परिवेश बोध
धर्मवीर भारती का गद्य साहित्य’ नामक पुस्तक प्रकाशित
(प्रस्तुत है सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की सातवीं कड़ी देऊळ…. । आज के इस आध्यात्मिक विषय पर कदाचित गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी” अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे प्रभु की मूरत वैसी ही दिखाई देती है। किन्तु ,उस मूरत से अपने आप को कैसे जोड़ना है वह आपको तय करना है।सुश्री आरूशी जी का यह आलेख ईश्वर के सम्मुख अपनी भावनाओं को परत दर परत खोलता जाता है। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़ पाएंगे। )
साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #7
☆ देऊळ…. ☆
पवित्रता, श्रद्धा, भक्ती ह्यांचा निवास… परमेश्वरापुढे नतमस्तक होऊन, मीपणा दूर ठेवून, आपल्या मनातील भावना त्याला सांगण्याचे ठिकाण… आपले दुःख दूर व्हावे म्हणून त्याला साकडे घालायचे असेल तर इथेच येतो आपण…
प्रत्येकाच्या आयुष्यात एखादे तरी देऊळ असते जिथे त्या व्यक्तीला खूप शांत, आनंदी, समाधानी वाटते… त्या जागी पोचताच क्षणी एकदम हलकं वाटतं…
काही जण रोज देवळात जातात, काही जण मनात आलं की जातात, तर काही जण देवळात जायचं म्हटलं की नाक मुरडतात… काही जण नेम म्हणून जातात, तर काही जण नवस फेडायला जातात… प्रत्येकाचा देव वेगळा, तसं प्रत्येकाचं देऊळ वेगळं… पण सरते शेवटी देवळात गेल्यावर शरणागती हाच एक भाव उरतो… त्याचा दिखावा करायची गरज नसते, तिथे फक्त तो आणि आपण असतो… एका दैवी पातळीवर संवाद घडतो, त्यात कोणाची ढवळा ढवळ नसते…
घरी दररोज पूजा केली तरी देवळात गेल्यावर जे हाती लागतं, ते शब्द बद्ध करणं मुश्किल आहे… ज्याला त्याला आयुष्य सुखकर करतांना आधार देण्याचं, धीर देण्याचं काम बऱ्याचवेळा देऊळ करतं… हे झालं बाह्य रुपी मंदिराबद्दल.. पण कधी अंतस्थ मंदिराबद्दल विचार केला आहे?
मीपण हल्ली हल्लीच असा विचार करू लागले आहे… म्हणजे तशा भावना जागृत व्हायला लागल्या आहेत… म्हणजे नेमकं काय हे सांगू शकत नाही, पण बऱ्याच वेळा बसल्या जागी त्याला शरण जाते आणि त्याच्याशी गप्पा मारते, मन मोकळेपणाने… शरीर रुपी मंदिरात तो कधी मित्र म्हणून असतो, कधी पिता म्हणून, कधी आई, कधी मोठा भाऊ, कधी जोडीदार बनून समोर येतो… सर्व भाव भावनांना त्याच्या पर्यंत पोचवताना, आपला भार आपण त्याच्यावर टाकून मोकळे होतो… सहजच अगदी…
तो हृदयस्थ असतो, फक्त त्याला ओळखायची गरज असते… जन्म, मृत्यू ह्याच्या पलीकडे जाताना तोच तर नेहमी बरोबर असतो, हो ना !