© शांतिलाल जैन
F-13, आइवोरी ब्लॉक, प्लेटिनम पार्क, माता मंदिर के पास, TT नगर, भोपाल. 462003.
मोबाइल: 9425019837
© शांतिलाल जैन
F-13, आइवोरी ब्लॉक, प्लेटिनम पार्क, माता मंदिर के पास, TT नगर, भोपाल. 462003.
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श्री जय प्रकाश पाण्डेय

“सवाल एक – जवाब अनेक (7)”
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का विभिन्न लेखकों के द्वारा दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु तो अवश्य ही खोल देंगे। तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।
वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा, सामूहिक द्वेष और स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में………
तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न और उसके अनेक उत्तर। प्रस्तुत है सातवाँ जवाब लखनऊ शहर की ख्यातिलब्ध व्यंग्यकारा सुश्री इन्द्रजीत कौर जी (हाल ही में आपका व्यंग्य संकलन “पंचरतंत्र की कहानियां” प्रकाशित हुआ है) की ओर से –
सवाल : आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम ?
लेखक आंख बनकर समाज की तस्वीर लोगों के सामने रखता है। अनदेखे व अनछुए पहलुओं को उजागर करवा कर आमजन में जागरूकता फैलाता है । इसके लिए जरूरी है कि लेखक आखों को हमेशा और पूरी खुली रखें। ऐसा न हो कि कुछ घटनाओं पर वह आंखें बंद कर ले और कुछं पर आंखे इतनी ज्यादा चौड़ी कर ले कि समाज के लिए खतरा ही बन जाए। किसी भी घटना के अनेक कोण होते हैं लेखक की सजगता इस बात में है कि वह हर कोण से देखकर कार्य ,कारण और परिणाम में संबंध स्पष्ट करें।सुश्री सुषमा सिंह
☆ छल ☆
(सुश्री सुषमा सिंह जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। सुश्री सुषमा सिंह जी की कविता “छल” एक अत्यंत भावुक एवं हृदयस्पर्शी कविता है जो पाठक को अंत तक एक लघुकथा की भांति उत्सुकता बनाए रखती है। सुश्री सुषमा जी की प्रत्येक कविता अपनी अमिट छाप छोड़ती है। उनकी अन्य कवितायें भी हम समय समय पर आपसे साझा करेंगे।)
हाथों में थामे पाति और अधरों पर मुस्कान लिए
आंखों के कोरों पर आंसु, और मन में अरमान लिए
हुई है पुलिकत मां ये देखो, मंद मंद मुस्काती है
मेरे प्यारे बेटे ने मुझको भेजी पाति है।
बार-बार पढ़ती हर पंक्ति, बार-बार दोहराती है
लगता जैसे उन शब्दों को पल में वो जी जाती है
अपलक उसे निहार रही है, उसको चूमे जाती है
मेरे प्यारे बेटे ने मुझको भेजी पाति है।
परदेस गया है बेटा, निंदिया भी तो न आती है
रो-रो कर उस पाति को ही बस वो गले लगाती है
पढ़ते-पढ़ते हर पंक्ति को, जाने कहां खो जाती है
खोज रही पाति में बचपन, जो उसकी याद दिलाती है
कितनी हो बीमार, हो कितना भी संताप लिए
खिल जाए अंतर्मन उसका, जब बेटे की आती पाति है
फिर से आई एक दिन पाति, वो तो जैसे हुई निहाल
बेटे की पाति पाकर के, खुशी से खिला था उसका भाल
उसे देख पाने की इच्छा, मन में कहीं दबाए थे
अंखियां थी अश्रु से भीगी, सबसे रही छिपाए थी
अंतिम सांसे गिनते-गिनते, सभी पातियां रही संभाल
पीड़ा थी आंखों में उसके, खोज रही थीं अपना लाल
आंचल में उस दुख को समेटे, और दिल पर लिए वो भार
दर्द भरी सखियों को संग ले, अब वो गई स्वर्ग सिधार।
बीते दिन किसी ने पिता से पूछा, क्या आई बेटे की पाति है?
मौन अधर अब सिसक पड़े थे, अश्रु बह निकले छल-छल
अब न आएगी कोई पाति, अब न होगा कोलाहल
मैं ही भेजा करता था पाति, मैं ही करता था वो छल
अब न आएगी कोई पाती, अब न होगी कोई हलचल
उस दुखिया मां को सुख देने को, मैं ही करता था वो छल।
© सुषमा सिंह
बी-2/20, फार्मा अपार्टमेंट, 88, इंद्रप्रस्थ विस्तार, पटपड़गंज डिपो, दिल्ली 110 092
श्रीमद् भगवत गीता
पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
द्वितीय अध्याय
साँख्य योग
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।57।।
आनन्दित जो शुभाशुभ को भी पा दिन रात
सदा राग से रहित जो वही स्थित धी तात।।57।।
भावार्थ : जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।।57।।
He who is everywhere without attachment, on meeting with anything good or bad, who neither rejoices nor hates, his wisdom is fixed. ।।57।।
© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर
मो ७०००३७५७९८
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
श्री विनोद साव

☆ व्यंग्य और कविता के बीच सेतु थे डा.शेरजंग गर्ग और प्रदीप चौबे ☆
(प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री विनोद साव जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। हम भविष्य में आपकी चुनिन्दा रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।)
कविता, व्यंग्य क्षेत्र में सक्रिय रहे दो रचनाकार प्रदीप चौबे और डा.शेरजंग गर्ग ने अपनी रचनायात्रा को विराम दिया और साहित्य बिरादरी से उन्होंने अंतिम बिदागरी ले ली. अब उनका व्यक्तित्व नहीं उनका कृतित्व हमारे सामने होगा और उनके व्यक्तित्व को हम उनके कृतित्व में ही तलाश पाएँगे उनसे सीधे साक्षात्कार के जरिए अब नहीं.
इन दोनों रचनाकारों से मेरा विशेष परिचय नहीं रहा सामान्य परिचय ही रहा. आंशिक मुलाकातें हुईं पर हम एक दूसरे के नाम को जाना करते थे, हमारे बीच पूरी तरह अपरिचय व्याप्त नहीं था. ये दोनों रचनाकार व्यंग्य की विधा से जुड़े रहे इसलिए मैं भी इनसे थोडा जुड़ा रहा. मैंने कविता नहीं की पर प्रदीप चौबे की कविताओं में जो हास्य-
व्यंग्य की छटा मौजूद थी उसने उनकी ओर मेरी और सभी विनोदप्रिय श्रोताओं व रचनाकारों का ध्यान खूब खींचा. चौबे जी के साथ ‘प्लस’ यह रहा कि उनकी हास्य चेतना और मंचों पर उनकी प्रस्तुति में उनके बड़े भाई शैल चतुर्वेदी की प्रेरणा ने भरपूर काम किया और वे अपने भैया की तरह हास्य-व्यंग्य के सफल कवियों में गिने जाने लगे और कवि सम्मेलनों में उनकी तूती बोलने लगी थी. बल्कि कई बार श्रोताओं को ठठा ठठाकर हंसवाने में प्रदीप जी आगे भी निकल जाते थे. भ्रष्टाचार पर तंज करती कविता और भारतीय रेल में पूरे हिंदुस्तान को देखने दिखने का जो उनका उपक्रम था उनमें देश की दारुण दशाओं का भी चटखारेदार वर्णन कर लोगों को वे खूब हंसाया करते थे और बड़े निश्छल ह्रदय से हंसाया करते थे. इसकी एक बानगी देखें:
हर तरफ गोलमाल है साहब
आपका क्या ख़याल है साहब
कल का ‘भगुआ’ चुनाव जीता तो,
आज ‘भगवत दयाल’ है साहब
मुल्क मरता नहीं तो क्या करता
आपकी देख भाल है साहब
उनकी कविताओं में उनके निश्छल मन का भान होता था. वे मामूली स्थितियों में चले हुए लतीफों को पिरोकर भी हास्य का ऐसा जायका परोसते थे कि सुनने वालों के पेट में बल पड़ जाते थे. मृतात्मा और दाहकर्म पर उनकी एक कविता थी जिसमें भीषण गर्मी के दिनों में किसी के दाहकर्म में शामिल होने से ऐसी दैहिक पीड़ादायक अनुभूति होती थी कि मृतात्मा के चले जाने का मानसिक आघात कम हो जाता था जो मृतात्मा के प्रति लोगों की संवेदना को भी मार देती थी. तब आदमी ऐसे दाह्संस्कारों में जाने से बचना चाहता था. उसी में एक पंक्ति थी कि ‘आदमी को मरना चाहिए देहरादून में.’ और डा.शेरजंग गर्ग देहरादून में दिवंगत हुए क्योंकि डा.गर्ग देहरादून के रहने वाले थे. पर प्रदीप चौबे ने अंतिम साँस अपने शहर ग्वालियर में ली.
प्रदीप जी से लखनऊ के अट्टहास समारोहों में भी मुलाकातें हुईं. गद्य व्यंग्य लेखन में उनकी रूचि भले ही कम थी पर गद्य व्यंग्यकारों को पढने समझने का सलीका उनके पास था. अन्य मंचीय कवियों के सीमित संकीर्ण ज्ञान से वे दूर थे. एक बार भिलाई आगमन पर उन्होंने सबके बीच मुझे पहचानकर लपककर गले लगाते हुए कहा था कि ‘आप व्यंग्यकार विनोद साव हैं.’
डा.शेरजंग गर्ग वर्ष २००२ में विश्व पुस्तक मेले दिल्ली में मिले और उन्होंने भावना प्रकाशन द्वारा आयोजित मेरे व्यंग्य संग्रह ‘मैंदान-ए-व्यंग्य’ के विमोचन कार्यक्रम में आना स्वीकार किया और वे आए थे. नरेंद्र कोहली जी ने विमोचन किया और कार्यक्रम का संचालन हरीश नवल ने किया था. मेरे एल्बम में उस समय का एक रंगीन चित्र है जिसमें कथाकार द्वय राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और शेरजंग गर्ग जैसे वरिष्ठ रचनाकारों के साथ मैं भी खड़ा हूं उस समय के एक उभरते हुए लेखक के रूप में.
शेरजंग गर्ग ने व्यंग्य के अतिरिक्त हिन्दी आलोचना में भी अपने हाथ चलाए और बालसाहित्य लेखन में भी.. और अपनी ग़ज़लों से भी उनकी पहचान बनी. इस बहुविध लेखन के बीच डा.गर्ग को देखने से लगता था कि उन्होंने ज्यादा आत्मसात बालसाहित्य की भावना (स्पिरिट) को किया होगा क्योंकि उनके सुदर्शन व्यक्तित्व में बालसुलभता का भाव विशेष रूप से उभरकर आता था और संभवतः उनकी इसी बालसुलभता और बच्चों जैसी निर्मलता ने उन्हें दिल्ली में रहते हुए भी साहित्य की राजनीति और उखाड़-पछाड़ से अलग रखा होगा. अपने बालसाहित्य लेखन के लिए वे ज्यादा पुरस्कृत हुए थे. मुझे भी एक बार दिल्ली प्रवास पर प्रेम जनमेजय के साथ बालभवन दिल्ली में उनके सम्मान समारोह को देखने का अवसर मिला था. ऐसी ही निर्मल भावना से शेरजंग गर्ग व्यंग्य लेखन में साहसिक वक्तव्य दे लिया करते थे. समाज के प्रति भावना कम रख समाजसेवी का मुलम्मा अपने पर चढ़ाए हुए लोगों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा है कि ‘ये समाज सुधारक हैं.. अरे ये ह्रदय विदारक हैं.’ उनके शेरो-शायरी हो बालसाहित्य, उनमें व्यंग्य की चेतना बरक़रार रहती थी. उनकी एक ग़ज़ल की ये पंक्ति देखें
चुल्लू में डूबने का अब लद चुका जमाना
उल्लू से दोस्ती कर, क्या शर्मसार होना।
व्यंग्य और कविता कर्म के बीच सेतु थे डा.शेरजंग गर्ग और प्रदीप चौबे.
© विनोद साव
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल – 9009884014
(साभार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय, जबलपुर)
डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव
☆ शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं ☆
(प्रस्तुत है डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी की कविता “शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं”। संयोगवश आज ही के अंक में भगवान शिव जी परआधारित श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी की एक और रचना “वह दूर हैं शिवालय, शिवका मुझे सहारा” प्रकाशित हुई है। दोनों ही कविताओं के भाव विविध हैं। दोनों कविताओं के सममानीय कवियों का हार्दिक आभार।)
विष पी पी मैं हूँ नील कंठ बना।
विष पी कर ही प्रेम के सूत्र बना,
मैं जग में प्रेम अमर कर जाऊंगा।।
शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।
विष पी पीकर मैं ही शेषनाग बना,
मैं भू माथे पर धारण कर जाऊंगा।
धरती धर खुद को निद्राहीन बना,
मैं मेघनादों का वध कर जाऊंगा।।
शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।
मैं रवि टूट टूट ग्रह तारे नक्षत्र बना,
नभ मंडल आलोकित कर जाऊंगा।
पी वियोग ज्वाला मैं पृथ्वी चंद्र बना,
शीतल हो श्रृष्टि सृजन कर जाऊंगा।।
शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।
नफरत पी पी कर मैं अग्नि बना,
वन उपवन नगर दहन कर जाऊंगा,
पी पी मैं लोभ द्वेष बृहमास्त्र बना,
अरि दल पल में दहन कर जाऊंगा।।
शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।
संयोग वियोग अभिसार से जीव बना,
मैं ही नियंता सर्जक बृहमा बन जाऊंगा।
उर पढ़ पढ़ मैं ही असीम ज्ञान बना,
मैं वेद पुराण उपनिषद बन जाऊंगा।।
शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।
प्रणय तपस्या में राधा की कृष्ण बना,
श्रृष्टि पालक नारायण मैं बन जाऊंगा।
मैं क्षिति जल पावक गगन समीर बना,
अणु परमाणु बृहम ईश्वर बन जाऊंगा।।
शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।
© डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव
श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे
☆ वह दूर हैं शिवालय, शिवका मुझे सहारा ☆
(प्रस्तुत है श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी की कविता “वह दूर हैं शिवालय, शिवका मुझे सहारा”। संयोगवश आज ही के अंक में भगवान शिव जी परआधारित डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जीकी एक और रचना “शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं”प्रकाशित हुई है। दोनों ही कविताओं के भाव विविध हैं। दोनों कविताओं के सम्माननीय कवियों का हार्दिक आभार।)
वह दूर हैं शिवालय, शिवका मुझे सहारा
शिव के बिना यहाँ तो, कोई मुझे न प्यारा
जा ना सके वहाँ तो, दिल मे उसे बिठाकर
हर साँस को बनालो, शिव नाम एक नारा
यह जान धूल मिट्टी, आकार तू बनाया
हर एक आदमी को, तूने किया सितारा
कैलाश घर तुम्हारा, दिल में किया बसेरा
जाने कहा कहाँ पर, संसार हैं तुम्हारा
कश्ती तुफान में थी, मैंने तुम्हे पुकारा
आँखे खुली खुली थी, था सामने किनारा
भगवान दान माँगे, मैने नही सुना था
सजदा किया हमेशा, सौदा किया न यारा
© अशोक भांबुरे, धनकवडी, पुणे.
मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८
सुश्री ज्योति हसबनीस
पिटुनिया
बागेतल्या बहराचे, चित्र मनाशी रंगवले,
ईवल्या ईवल्या पिटुनियाला वाफ्यामध्ये रोवले ।
बघता बघता जिवांची , जवळीक की हो वाढली ,
खेळता बागडता , डहाळीत डहाळी गुंतली ।
गुंतल्या डहाळीचे डोहाळे, साऱ्यांनीच जपले
तृप्त सृजनाचे कौतुक सोहळे नजरेने टिपले ।
रंगांचे हे बंदिस्त जग ,झाले खुले सर्वांसाठी ,
फुलपाखरांचे थवे लोटती , रंगोत्सवी या रंगण्यासाठी ।
विस्मित होई मन हे बघून, विविध छटा रंगांच्या ,
नकळत जोडले जाती कर अगाध लीलेस ईश्वराच्या ।
मनमोहक रंगीत साज ल्यालेला
देखणा कोपरा बागेतला ,
मनी रंगवलेला बहर प्रत्यक्षात उतरलेला ।
© सौ. ज्योति हसबनीस
श्रीमद् भगवत गीता
पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
द्वितीय अध्याय
साँख्य योग
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।56।।
दुखों में जो चिंता रहित सुख में भी निष्काम
वीत राग भय क्रोध में स्थिर प्रज्ञ वह नाम।।56।।
भावार्थ : दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।।56।।
He whose mind is not shaken by adversity, who does not hanker after pleasures, and who is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady wisdom. ।।56।।
© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर
मो ७०००३७५७९८
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
संस्थाएं – व्यंग्यम (व्यंग्य विधा पर आधारित व्यंग्य पत्रिका/संस्था), जबलपुर
विगत दिवस साहित्यिक संस्था व्यंग्यम द्वारा आयोजित 23वीं व्यंग्य पाठ गोष्ठी में सभी ने परम्परानुसार अपनी नई रचनाओं का पाठ किया. इस संस्था की प्रारम्भ से ही यह परिपाटी रही है कि प्रत्येक गोष्ठी में व्यंग्यकर सदस्य को अपनी नवीनतम व्यंग्य रचना का पाठ करना पड़ता है । इसी संदर्भ में इस व्यंग्य पाठ गोष्ठी में सर्वप्रथम जय प्रकाश पांडे जी ने ‘सांप कौन मारेगा, यशवर्धन पाठक ने ‘दादाजी के स्मृति चिन्ह’, बसंत कुमार शर्मा जी ने ‘अंधे हो क्या’, राकेश सोहम जी ने ‘खा खाकर सोने की अदा’, अनामिका तिवारीजी ने ‘हम आह भी भरते हैं’, रमाकांत ताम्रकार जी ने ‘मनभावन राजनीति बनाम बिजनेस’, ओ पी सैनी ने ‘प्रजातंत्र का स्वरूप’, विवेक रंजन श्रीवास्तव ने ‘अविश्वासं फलमं दायकमं’, अभिमन्यु जैन जी ने ‘आशीर्वाद’, सुरेश विचित्रजी ने ‘शहर का कुत्ता’, रमेश सैनी जी ने ‘जीडीपी और दद्दू’, डा. कुंदनसिंह परिहार जी ने ‘साहित्यिक लेखक की पीड़ा’ व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया.
इस अवसर पर बिलासपुर से पधारे व्यंग्यम पत्रिका के संस्थापक संपादक व्यंंग्यकार महेश शुक्ल जी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही. श्री महेश शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उदबोधन में व्यंग्यम पत्रिका के बारे में बताया – उस वक्त पत्रिका प्रकाशन का निर्णय कठिन था और हम सब रमेश चंद्र निशिकर, श्रीराम आयंगर, श्रीराम ठाकुर दादा , डा.कुंदन सिंह परिहार, रमेश सैनी आदि मित्रों के सहयोग से यह पत्रिका व्यंंग्यकारो में कम समय ही चर्चित हो गई थी. उस समय महेश शुक्ल ने अपने से संबंधित परसाई जी के संस्मरण सुनाए. इस अवसर पर बुंदेली के लेखक द्वारका गुप्त गुप्तेश्वर की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। गोष्ठी का संचालन रमेश सैनी और आभार प्रदर्शन व्यंंग्यकार एन एल पटेल ने किया.