हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४१ – बुन्देली कविता – ”चार दिना की ज्वानी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – चार दिना की ज्वानी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४१ – बुन्देली कविता – चार दिना की ज्वानी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

चार दिना की ज्वानी है

काहे की अभमानी है

*

एक दिना सब खें जाने

छोटी सी जिनगानी है

*

मढ़िया की सिढ़ियाँ चढ़बे

याद आत अब नानी है

*

गर्मी में दरसन देउत

बो बाबा बरफानी है

*

देखे बिना न चैन परै

ऐंसो दुश्मन जानी है

*

बाँदकपुर बारो भोला

जागेसुर बरदानी है

*

नाकों दम कर दव ऊ ने

भगवत’ बा भैरानी है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जीवन जिए जा रहा हूँ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – जीवन जिए जा रहा हूँ…!

☆ ॥ कविता॥ जीवन जिए जा रहा हूँ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

बचपन में, गाँव में,

बरसात के दिनों में

नदिया के पानी को तूफ़ानी रफ्तार से

जोर-शोर से दहाड़ मारकर

अपने प्रियतम सागर से मिलने के लिए

रोते-बिलखते हुए देखा है।

 

पर पापी पेट के फेरे में

जबसे घर-गाँव छूटा है

और महानगर में आकर बसा हूँ

महानगर के बीचों-बीच

चौबीसों घंटों सड़कों पर

वाहनों के लगातार बहते हुए

रेलों का शोर-शराबा सुनकर

कान बहरा गए हैं  और ह्रदय

एक अजीब से खौफ से बैठा जाता है।

 

रोज-रोज, बार-बार

मन वापस गाँव लौट जाने को करता है

पर गाँव में भी अब कहाँ

वो बचपन के लंगोटिया यार

निःस्वार्थ प्रेम करने वाले लोग रह गए हैं

इसलिए न चाहते हुए भी

महानगर में रहने के लिए

अभिशप्त जीवन जिए जा रहा हूँ।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – युद्ध के विरुद्ध… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – युद्ध के विरुद्ध… ? ?

युद्ध लीलता है ज़िंदगियाँ,

कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष,

 

जो चले जाते हैं,

उनके अपने,

लंबे समय तक

संभल नहीं पाते हैं,

जिन बच्चों की

चढ़ जाती है बलि

क्रूर युद्ध में,

उनके माता-पिता

जीते जी मर जाते हैं,

 

उजड़ जाते हैं मकान,

बिखर जाते हैं मोहल्ले,

सभ्यता को निर्वसन कर

जुलूस निकाला जाता है,

आदमी के अंदर का राक्षस,

पूरी विद्रूपता के साथ

बाहर निकल आता है,

 

कोई खो देता है हाथ,

कोई पाँव, कोई आँख,

मनुष्य से लेकर

जीव-जंतु, पशु-पक्षी,

हरेक रोने पर विवश होता है,

बची साँसों को

ढोने पर विवश होता है,

 

उत्सव को चीखों में

बदल देता है यूद्ध,

संहार को सृजन

घोषित कर देता है युद्ध,

 

पंछियों को दाना खिलाने वाले हाथ,

गिद्धों का भक्ष्य बनने लगते हैं,

आदमी का चोला ओढ़े गिद्ध

शिकार पर निकलने लगते हैं,

 

सुनो मनुज!

युद्ध कभी

अंतिम विजय नहीं होता,

युद्ध कभी

समस्याओं का अंत नहीं होता,

 

युद्ध केवल मरण है,

बलात थोपा हुआ मरण,

मरण जीव की नियति तो है

पर जीवन की नीति नहीं हो सकती,

 

नियति को

नीति सिद्ध करने का प्रयास है युद्ध,

जीव को जीवन से

च्युत करने का अट्टहास है युद्ध,

 

जीव को

जीवन की राह पर लौटाओ।

हे मनुष्य!

मनुष्य को युद्ध से बचाओ!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 11:37 बजे, 4 मार्च 2026, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ Ganga: The Eternal Journey from the Himalayas to the Ocean ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🏞️ Ganga: The Eternal Journey from the Himalayas to the Ocean 🏞️

 Is the Ganga Born from a Mountain… or from Many Rivers?

Have you ever paused to ask a simple yet fascinating question: Where does the Ganga really begin?

Does this sacred river emerge from a single mountain spring? Or is it formed slowly, lovingly, by many rivers joining hands along the way?

The truth is far more beautiful than either of these possibilities.

The Ganga is not merely a river; it is a grand confluence of glaciers, mountain streams, mythology, devotion and civilization. From the icy lap of the Himalayas she begins as a delicate trickle, gathers strength through valleys and gorges, blesses the vast plains of India, flows into Bangladesh, and finally surrenders herself to the infinite embrace of the Bay of Bengal.

Along the way she carries not only water, but stories—stories of sages, kings, pilgrims, cities and generations that have lived and flourished on her banks.

Let us travel with her.

The Tapasya of Bhagirath and the Birth of Bhagirathi 🏞️

High in the Himalayas, at an altitude of nearly 4,000 metres, lies the Gangotri Glacier. At its snout is a cave-like opening known as Gomukh—literally “the mouth of the cow”. From here emerges a slender, sparkling stream called the Bhagirathi.

But the story of this river begins long before the glacier.

Ancient legends tell us that King Sagar’s sixty thousand sons were reduced to ashes by sage Kapila. Their souls could be liberated only if the sacred Ganga descended from heaven to purify them. Generations passed before their descendant King Bhagirath undertook severe penance to bring the celestial river to earth.

His austerities moved the gods. Brahma permitted Ganga to descend. Yet her force was so powerful that the earth could not bear her fall. It was then that Lord Shiva received the mighty river in his matted locks, gently releasing her in streams so that the earth could accept her.

Thus the first earthly flow of the river was named Bhagirathi, in honour of the king whose devotion brought her down.

Bhagirathi through the Himalayan Valleys 🏞️

From Gomukh, the young Bhagirathi rushes through the dramatic Himalayan valleys, touching sacred places such as Gangotri, Harsil and Uttarkashi. Along the way, smaller rivers—like Jadh Ganga, Asi Ganga and Bhilangana—join her growing current.

The journey here is breathtaking. Towering snow peaks stand guard above deep gorges. Ancient deodar forests whisper with the wind.

Temples and ashrams dot the riverbanks, where sages have meditated for centuries.

Tehri: Where the Past Sleeps Beneath the Waters 🏞️

Further downstream stands the mighty Tehri Dam, built on the Bhagirathi.

Once upon a time, an old and bustling hill town called Tehri existed here—its narrow streets filled with markets, homes and memories. Today the old town lies submerged beneath the vast reservoir created by the dam.

The modern structure has brought electricity and water to millions, yet beneath the calm surface of the lake lie echoes of a vanished town. The river seems to remind us gently: civilisation evolves, landscapes change, but the flow of time—like the river—never stops.

After travelling nearly 205 kilometres, the Bhagirathi arrives at one of the most sacred confluences of the Himalayas: Devprayag.

But to understand what happens here, we must first follow the story of another magnificent river—Alaknanda.

Alaknanda and the Sacred Panch Prayags 🏞️

The Alaknanda rises near the Satopanth and Bhagirath Kharak glaciers in the high Himalayas. Unlike Bhagirathi, its journey is marked by five sacred confluences known collectively as the Panch Prayag.

Each of these meeting points has its own spiritual resonance.

Vishnuprayag 🏞️

Here the Dhauliganga meets the Alaknanda amidst towering cliffs. The waters roar through the narrow gorge as though two spirited companions have clasped hands to continue their journey together.

Nandprayag 🏞️

At this gentle confluence, the Nandakini merges with the Alaknanda. Tradition connects this place with Nanda, the foster father of Lord Krishna, lending the site a tender devotional aura.

Karnaprayag 🏞️

Here the Pindar River joins the Alaknanda. According to legend, the great warrior Karna of the Mahabharata performed penance at this very place, giving the town its name.

Rudraprayag 🏞️

At Rudraprayag, the Mandakini, flowing down from the sacred valleys of Kedarnath, meets the Alaknanda. The meeting feels almost symbolic—two rivers associated with Lord Shiva embracing each other before continuing towards the plains.

Devprayag 🏞️

After this remarkable journey through the five sacred confluences, the Alaknanda finally reaches Devprayag, where destiny awaits.

Devprayag:

The Birthplace of the Ganga 🏞️

At Devprayag one witnesses a striking sight.

The waters of the Alaknanda appear deep green, calm and mature. The Bhagirathi arrives swift and energetic, with a slightly different hue. For a short distance the two colours run side by side before blending into one.

Local people narrate a delightful comparison.

They jokingly say, “This is like the meeting of a mother-in-law and a daughter-in-law.”

The Alaknanda—having travelled longer—is the experienced “saas”.

The lively Bhagirathi is the young “bahu”.

For a while they seem to maintain their separate identities, as though each is asserting her character. Then slowly they merge completely—and from that moment the river is known as the Ganga.

Rishikesh and Haridwar: Gateways to the Plains 🏞️

From Devprayag the newly formed Ganga flows towards two of India’s most revered towns.

First comes Rishikesh, the world-renowned centre for yoga and meditation. Suspension bridges such as Lakshman Jhula and Ram Jhula, along with evening Ganga aartis, create an atmosphere of quiet spiritual enchantment.

A little further lies Haridwar, where the river finally emerges from the mountains into the vast plains of northern India. At Har Ki Pauri, thousands gather every evening to watch lamps float upon the river during the sacred aarti. For a moment it feels as though the stars themselves have descended upon the water.

The Lifeline of the Indo-Gangetic Plains 🏞️

Beyond Haridwar the Ganga broadens and slows, nurturing the fertile Indo-Gangetic plains—one of the most densely populated and agriculturally productive regions in the world.

Along this journey many rivers join her.

From the north come rivers such as the Ramganga, Ghaghara, Gandak, Kosi and Mahananda—most of them originating in the Himalayas or Nepal.

From the south arrive tributaries like the Yamuna, Tons, Son and Punpun.

The most celebrated confluence occurs at Prayagraj, where the Ganga meets the Yamuna and the mythical Saraswati. This is the sacred Triveni Sangam, the site of the world-famous Kumbh Mela, where millions gather in a breathtaking expression of faith.

A Gentle Reminder:

Caring for the River 🏞️

As the Ganga flows through great cities and industrial belts, she faces a challenge unknown in her pristine Himalayan origins—pollution.

Efforts such as the Namami Gange Project aim to restore her purity. Yet the responsibility does not lie with governments alone. Every citizen shares the duty of keeping rivers clean.

After all, if the Ganga is truly our mother, protecting her purity must become our collective pledge.

From India to Bangladesh:

The Padma 🏞️

In West Bengal the Ganga approaches the international border and enters Bangladesh, where she takes on a new name—the Padma.

Here she meets the Jamuna, which carries the waters of the mighty Brahmaputra. Further downstream they merge with the Meghna, creating one of the largest river deltas in the world.

This vast delta is home to the legendary Sundarbans, with its dense mangrove forests and the elusive Royal Bengal Tiger.

The Final Embrace

of the Sea 🏞️

After travelling thousands of kilometres from the icy Himalayas, the Ganga—now united with many rivers—finally spreads into the waters of the Bay of Bengal.

Yet the journey does not truly end.

The ocean’s waters rise as vapour, become clouds, drift back to the Himalayas and fall again as snow and rain. From that snow another glacier forms, another stream emerges—and once more the Ganga begins her timeless pilgrimage.

More than a River:

The Soul of a Civilization 🏞️

For India, the Ganga is far more than a geographical feature.

She is memory, mythology and motherly grace flowing through millennia. Cities rose on her banks, sages found enlightenment beside her waters, poets sang of her beauty, and generations drew sustenance from her generosity.

From the Himalayas to the ocean, her journey mirrors the journey of life itself—ever flowing, ever renewing.

And perhaps that is why millions still whisper with reverence:

“Ganga Maiya ki Jai.”

Jai Maa Gange!

Har Har Gange! 🏞️

 

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© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०४ ☆ बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०४ ☆

?  आलेख – बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की धरती पर प्राकृतिक रूप से कभी शेरों का बसेरा नहीं रहा लेकिन वहां के इतिहास और संस्कृति की रगों में शेर किसी स्वदेशी जीव से कहीं अधिक गहराई तक समाया हुआ है। यह एक अद्भुत विरोधाभास है कि जिस देश के जंगलों में भेड़-बकरियां और लोमड़ियां घूमती थीं वहां की राजमुद्रा पर बबर शेर की दहाड़ अंकित है। वास्तव में शेर का ब्रिटिश साम्राज्य में आगमन सैन्य वीरता और शाही गौरव की चाहत का परिणाम था।

मध्यकाल के दौरान इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने अपनी अदम्य वीरता के कारण शेर को अपने ढाल पर स्थान दिया और वहीं से यह जीव ब्रिटेन की पहचान बन गया। तब शेर केवल एक पशु नहीं बल्कि एक ‘मेटाफर’ यानी रूपक था ,  संदेश था कि ब्रिटिश साम्राज्य शेर की तरह शक्तिशाली और निडर है। आज भी शाही प्रतीक चिन्ह में सुनहरी आभा लिए खड़ा शेर ब्रिटेन के आत्मविश्वास का परिचय देता है।

अनेक भव्य भवनों के प्रवेश द्वार पर प्राचीन दो  शेरों  की मूर्तियां नजर आती हैं।

ब्रिटेन के अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की बात करें तो वहां की विविधता और भी रोचक हो जाती है। जहां इंग्लैंड का प्रतीक शेर है वहीं स्कॉटलैंड ने एक काल्पनिक जीव ‘यूनिकॉर्न’ को अपना राष्ट्रीय पशु चुना है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यूनिकॉर्न ही वह एकमात्र जीव है जो शेर को टक्कर दे सकता था। इसी प्रकार वेल्स का राष्ट्रीय पशु ‘ड्रैगन’ है जो वहां की लोककथाओं और संघर्ष की कहानियों का नायक रहा है। पक्षियों में ‘रॉबिन’ को वहां का राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है जो अपनी सुरीली आवाज और लाल छाती के कारण सर्दियों के मौसम में भी जीवंतता का संचार करता है।

शेर का बाल कहानियों में नायक बनना भी इसी सांस्कृतिक सोच का रोचक विस्तार है। असल दुनिया में भले ही वह एक हिंसक शिकारी पशु हो लेकिन कहानियों में उसे एक न्यायप्रिय जंगल के राजा और नैतिकता के रक्षक के रूप में ढाला गया है। ब्रिटिश लेखकों ने शेर को शक्ति के ऐसे स्वरूप में पेश किया जो अन्यायी नहीं बल्कि अनुशासित है। यही कारण है कि लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वायर पर बनी शेरों की विशाल मूर्तियां हों या बच्चों की कहानियों के पात्र यह जीव अब विदेशी नहीं बल्कि पूरी तरह ब्रिटिश मानस का हिस्सा बन चुका है। शायद शेर का ऐसा महत्वपूर्ण वर्णन वहां के शासकों को अलिखित शिक्षा देने की प्रेरणा भी सदियों से बना हुआ है।

लायंस क्लब की स्थापना में बबर शेर का नाम सिंह के राजसी सेवा भाव को प्रतिबिंबित करता है।

यह गौरवमयी यात्रा बताती है कि कोई जीव किसी देश का प्रतीक बनने के लिए वहां के भूगोल में मौजूद हो यह अनिवार्य नहीं है बल्कि वह वहां के लोगों के आदर्शों में जीवित होना चाहिए। ब्रिटेन ने शेर की हिंसक छवि के बजाय उसके राजसी गौरव को अपनाकर उसे अमर बना दिया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अर्थतंत्र की रीढ़ को। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆

राजनीति में लग गया, नेताओं को रोग।

अर्थतंत्र की रीढ़ को, तोड़ रहे ये लोग।।

*

ऋण देकर उपकृत करें, बाँट रहें खैरात।

फिर उसको माफी करें, यह कैसी सौगात।।

*

जनता देती टैक्स है, सुविधाओं की आस।

सत्ताधारी कर रहे, उनको सदा निरास।।

*

बाढ़ अकाल आगजनी,तोड़ फोड़ के नाम।

करें सुरक्षा कुछ नहीं, भुगतें सब अंजाम।।

*

जात धर्म के नाम पर, तुष्टिकरण का रोग।

इनके अंदर है भरा, भंडारे का भोग।।

*

दान वीर ऐसे बने, जैसे मिली हो छूट।

अपने वोट सहेजने, कोषालय की लूट।।

*

अपराधों को रोकने, असफल हैं ये लोग।

क्षतिपूर्ति के नाम पर, पाल रखा है रोग।।

*

अर्थतंत्र कमजोर कर, हर्षित होते आज।

पैर कुल्हाड़ी मारते, सबके सिर पर गाज।।

*

अर्थ तंत्र है देश की, वह मजबूत गठान।

इससे ही बढ़ती सदा, हर मुल्कों की शान।।

*

नैतिकता पर जोर दें, तजें अनैतिक राह।

चारित्रिक पथ पर चलें, चहुँ दिश होती वाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४५ ⇒ मंदबुद्धि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मंदबुद्धि।)

?अभी अभी # ९४५ ⇒ आलेख – मंदबुद्धि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं मंदबुद्धि हूं! जिनकी बुद्धि मंद होती है, उन्हें मंदबुद्धि कहते हैं। अक्ल और बुद्धि एक ही होती है, बस इसी भ्रम में लोग मुझे भी अक्लमंद समझ लेते हैं। मुझे अपने बारे में कोई भ्रम नहीं। मैं बचपन से ही ऐसा हूं।

बूढ़ा होने से बुद्धि नहीं आ जाती! जो लोग अपने सफेद बाल डाई करके काले करते हैं, वे भी मौका आने पर, यह कहने से नहीं चूकते, कि हमने अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये। वैसे भी कम पोषण से भी आजकल कम उम्र में बाल सफेद होना शुरू हो जाते हैं। जिनके सर में बाल ही नहीं हैं, उन्हें ऐसे जुमलों से बचना चाहिए।।

पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। रही सही कसर, जन्म पत्री पूरी कर देती है। हर बच्चे की कुंडली में बल, बुद्धि और यश लबालब भरा रहता है। जब बड़ा होने पर मेरे सितारे गर्दिश में आए, और उपलब्ध जन्म कुंडली ज्योतिषी को दिखाई तो उन्हें मुझमें साढ़े साती का योग नजर आया। शनिदेव मुझ पर मेहरबान थे।

मुझे अच्छी तरह याद है, तब हर शनिवार को नगर पालिका द्वारा सड़कों की धुलाई होती थी। एक पाड़ा गाड़ी में, पानी की टंकी रखी रहती थी, जिससे एक सफाई कर्मी पहले चमड़े के मशक में पानी भरता था और बाद में उससे सड़कों की धुलाई सफाई होती थी। सड़क से लगे फुटपाथ के पास एक छोटे से स्थान में शनि महाराज विराजमान हो जाते थे। हर शनिवार को लोग शनि को तेल चढ़ाते थे। मैने कभी नहीं चढ़ाया, इसलिए शनि महाराज मुझसे नाराज़ थे।।

सुना है बादाम खाने से याददाश्त अच्छी होती है, बुद्धि तेज होती है। तब बादाम मूंगफली के भाव बिकती थी। लेकिन तब भी हम चने और मूंगफली ही खाते थे। आज तो मूंगफली भी बादाम के भाव मिल रही है। भला हो सेहत के ठेकेदारों का, जो उन्होंने हमें मीठे तेल से सोयाबीन पर ला दिया। तेल से कॉलोस्ट्रोल बढ़ता है, बादाम खाओ, याददाश्त बढ़ाओ।

वैसे मंदबुद्धि होने से मुझे कोई खास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा! I never stood second in my class. (जाहिर है, थर्ड ही आया हूंगा। ) मां के अनुसार मेरी आंख पर एक चोट के कारण मेरी आंखों और दिमाग पर गहरा असर पड़ा। फिर भी सूरदास और अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन मुझे प्रेरणा देते रहे। वैसे भी मुझे कहां स्वर्ग की आस थी।।

आज जब डिजिटल युग में भी 4-G का नेटवर्क स्लो चल रहा है, जिंदगी की गाड़ी भी बिना पटरी के चल रही है, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी बनते चले जा रहे हैं, इंसान का शातिर दिमाग जैविक हथियारों की खोज करने में लगा है, तो मैं क्यों न राम भजन करूं। इतने भक्त तो भक्ति काल में भी नहीं हुए, जितने आज नजर आ रहे हैं। वैसे भी कपास ओटना अपने बस की बात नहीं।

जीवन में यह मलाल जरूर रहेगा कि कभी गांधीजी का चरखा नहीं चलाया और न ही कबीर की तरह कभी ताने बाने पर ध्यान दिया। हां! पांव सदा चादर में रखे और हमेशा चादर सर्फ से धोता रहा। वैसे भी इड़ा और पिंगला नाड़ियां जब सुषुम्ना में प्रवेश करती हैं तो कोई बुद्धि का प्रमाण पत्र नहीं मांगती। सुना है, स्लेट खाली हो, तो सुषुम्ना में प्रवेश जल्दी मिल जाता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ – करुण पुकार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा करुण पुकार”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕 करुण पुकार🛕

मंदिर के पास घर निवास होने से सभी प्रकार के आराधना प्रार्थना की आवाज आती रहती है। कभी बच्चे होने का बधावा, कभी मुंडन में रोती किलकारी, कभी कन्या भोज, कभी देवी पूजन, कभी बेटी की बारात में माता पूजन, कभी बहू के आने के बाद मंदिर में चढ़ावा, और कभी किसी के अपने से बिछड़ जाने पर शांत मन से बैठ सीढियों पर बातें करना।

घंटी और साज बाजे की आवाज बदल जाती है। कभी शहनाई, कभी ढोल, कभी मृदंग, कभी मंजीरे की झनक और कभी सिसकती आँहे, सिर्फ घंटी की पुकार, परंतु ईश्वर को पाने या उनसे मन्नत करने का तरीका अलग-अलग परंतु ठिकाना सबका एक।

आज सुबह आरती वंदन के बाद घंटी की आवाज थोड़ी धीमी सी आ रही थी, परंतु शोर शराबा कुछ बाँटने का हो रहा था। मंदिर प्रांगण भीड़भाड़ से भरा था। नीचे – ऊपर, आती- जाती, सीढ़ी पर बैठी अम्मा का गीत आज ऊंचे स्वर पर कुछ प्रसन्नता पूर्वक आ रही थी – – – जो अक्सर बैठकर करुण पुकार करती रहती थी।

धीरे से सविता ने पूछा अम्मा क्या बात है। आज करुण पुकार की जगह मीठे- मीठे गीत गा रही हो। बिटिया— आज बरसों बाद मेरा बेटा अपना बेटा लेकर आ रहा है। उसने मुझे बताया है कि मंदिर में आ जाना देख लेना। बस उसी का इंतजार कर रही हूँ।

सविता आश्चर्य से देखती रही क्या?? तुम्हें ले जाएगा।

अरे कहाँ। मैंने उसे अपना बनाया था। अनाथ को लालन-पालन कर पढ़ा लिखा बड़ा किया।

बिटिया उसने मुझे अपना थोड़े ही माना था। मेरी संतान नहीं है वह।

सविता तो बस सुनकर हृदय से गमगीन हो गई। जिस बच्चे के लिए वह तड़प रही है। वह तो सिर्फ उसे एक नौकरानी (आया) समझ रहा था।

इससे तो अच्छा था वह स्वयं ही अनाथ रहती किसी अनाथ को सनाथ बनाते। उसकी करुण पुकार बाजे शहनाइयों के बीच दब गई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७० – देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७० ☆ देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गर्मी का सीज़न इस बार भी निर्धारित समय से पूर्व ही आ गया है। दूसरी और पश्चिम एशिया का युद्ध भीषणतम हो कर गर्मी बढ़ाने में वैसा ही कर रहा है, जैसे कि जलती आग में घी करता है।

हमारे घर में विगत कुछ वर्षों से तथाकथित “शीतल पेय” का सेवन व्हाट्स ऐप महाविद्यालय से मिले ज्ञान से बंद हो चुका है। खाना बनाने वाली गैस की कमी के चलते घर में चाय के सेवन पर प्रतिबंध की चर्चा परवान चढ़ चुकी है। इसी क्रम में शीतल पेय की यादें ताज़ा हो गई हैं।

साठ के दश्क में कोका कोला, ऑरेंज (फेंटा नहीं) और सोडा कांच की बोतलों में उपलब्ध रहता था। सोडा दो आने और अन्य चार आने में बिक्री होती थी। दुकानदार कांच की बोतल के नाम से सिक्योरिटी डिपोजिट जमा करवा लेता था। बोतल की सही सलामती पर उस राशि की वापसी संभव हुआ करती थी। बोतल के ढक्कन हटाने पर ज़रा सा भी कांच टूटने  से राशि काट कर बोतल ग्राहक को थमा दी जाती थी। कुछ अमीर विवाह आदि कार्यक्रमों से खाली बोतल घर ले आते थे। जब कभी बाजार से शीतल पेय खरीदते तो घर रखी खाली बोतल घर से साथ ही ले जाते थे, और सिक्योरिटी जमा करने से बच जाते थे। इन कांच की बोतलों को खोलने वाले छोटे से यंत्र को ओपनर कहा जाता था। हमारे जैसे किशोर तो मुंह में लगे हुए दांतों की दाढ़ के सहारे ही बोतल खोल लेते थे। पड़ोस के लोग भी हमारी सेवाएं ले कर उसकी एवज में थोड़ा सा पेय दे दिया करते थे।

मोहल्ले के परिचित दुकानदार भी किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी देने पर सिक्योरिटी जमा करने की झंझट से मुक्त रहते थे।

अब तो प्लास्टिक युग में शीतल पेय भी विगत कुछ दशकों से प्लास्टिक की बोतलों में विक्रय किया जाता है, हालांकि बोतल खोलते ही इनकी गैस निकल जाती है, वो मज़ा नहीं आता है, जो कांच की बोतलों में हुआ करता था।

इस लेख के माध्यम से अपने मित्रों को संदेश देना चाहता हूं, कि हम जब भी उनके घर पर आएं, तो वो खाने वाली गैस की कमी के नाम पर चाय के स्थान पर शीतल पेय परोस सकते हैं। हमें कोई गुरेज नहीं है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२० ☆ दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२० ?

दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मी दगड कोरला देवा तू त्यात भेटला होता

अन् छन्नी हातोड्याचा आघात सोसला होता

*

देवा तू सोबत होता मी म्हणून चुकलो नाही

तू माझ्या ह्या हाताचा सन्मान राखला होता

*

मूर्तीची प्राणप्रतिष्ठा झालेली डोळ्यांदेखत

डोळ्यांचे सोने झाले मी श्वास रोखला होता

*

मज बहाल केली देवा तू दिव्यत्वाची शक्ती

पाषाण म्हणूनच मी तो नेमका जोखला होता

*

असुरांची टोळी होती मूर्तीला दगड म्हणाली

थडग्यांना पुजणारांनी तो डाव फेकला होता

*

मातेची आज्ञा झाली तू वनात गेला तेव्हा

वनवास पाच शतकांचा कलियुगी भोगला होता

*

ह्या आयोध्या नगरीचे प्रारब्ध उजळले आता

त्या जुलमी सत्तेनंतर तू उभा ठाकला होता

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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