हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२७ ☆ व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ भुल्लन भैया की मूर्ति

हमारे शहर के रत्न भुल्लन भैया जन-जन के हृदय में निवास करते रहे। दो बार भारी बहुमत से एमैले का चुनाव जीते। चुनाव के समय दारू, कंबल, पैसे का मुक्त-हस्त से वितरण करते थे।उसके बाद भी कोई विरोध करे तो हाथ में डंडा या जूता धारण कर नये अवतार में प्रकट होते थे। उनके चेलों-चांटों की संख्या विशाल रही। पार्टी में ऊपर तक उनकी रसाई थी।

एक रात मित्रों के साथ ‘गीली’ पार्टी में हिस्सा लेकर लौटते भुल्लन भैया की कार एक नाले में प्रवेश कर गयी। ड्राइव करने वाला उनका मित्र भी सुरा के सुरौधे में था। परिणामत: दोनों ही स्वर्ग या नरक की राह पर निकल गये।

शहर में खबर फैलते ही खलबली मच गयी। बड़े-बड़े नेता भुल्लन भैया के संभावनाशील सुपुत्र लल्लन को धीरज बंधाने आने लगे। लल्लन भैया हिलक हिलक कर कहते थे, ‘ऐसे बिना बोले बताये चले गये। हम कुछ सेवा नहीं कर पाये।’ भुल्लन भैया के क्रिया-कर्म में भारी भीड़ उमड़ी। कई चेले आंसू बहाते और सस्वर विलाप करते देखे गये।

चुनाव-क्षेत्र में स्वर्गीय भुल्लन भैया का असर देखकर पार्टी ने लल्लन भैया को उनके पिताजी के स्थान पर स्थापित करने के प्रयास शुरू कर दिये। जल्दी ही लल्लन भैया में भी उनके स्वर्गवासी या नरकवासी पिता के गुण प्रकट होने लगे। मुहल्ले में उनकी अघोषित सल्तनत कायम हो गयी।

पिताजी के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करने के लिए लल्लन भैया ने जल्दी ही घोषणा की कि पास के चौराहे पर स्वर्ग या नरक वासी उनके पिताजी की विशाल मूर्ति लगेगी। धन्नासेठों से चन्दा इकट्ठा होने लगा। अपने रसूख और ताकत का इस्तेमाल कर लल्लन भैया ने जल्दी ही इतना धन इकट्ठा कर लिया जो मूर्ति के अलावा उनके चुनाव अभियान और दीगर खर्चों में काम आ सके। राजस्थान के एक कलाकार को मूर्ति का ऑर्डर दे दिया गया।

तीन-चार महीने में मूर्ति बनकर आ गयी। लल्लन भैया ने उसे चौराहे पर ऊंचे आधार पर स्थापित करवा दिया। मूर्ति के नीचे आठ दस पंक्तियों में भुल्लन भैया के गुणों और उपलब्धियों का बखान कर दिया गया। सिर्फ एक तरफ का पत्थर खाली रहा जिस पर मूर्ति के अनावरण का ब्यौरा और तारीख लिखी जानी थी। इसके बाद अनावरण के इंतज़ार में मूर्ति को पूरी तरह कपड़े से ढंक दिया गया।

इसके बाद लल्लन भैया अड़ गये कि उनके यशस्वी पिता की मूर्ति का अनावरण ‘राश्टपति’ या ‘उपराश्टपति’ के कर-कमलों से होगा, अन्यथा मूर्ति ऐसे ही ढंकी-मुंदी खड़ी रहेगी। नगर के सांसद महोदय को चेतावनी दे दी गयी कि उपरोक्त विभूतियों को बुलाने का इंतज़ाम करें, अन्यथा स्वर्गीय भुल्लन भैया के चुनाव-क्षेत्र में पार्टी के लिए सूखा पड़ जाए तो लल्लन भैया को दोष न दिया जाए। सांसद महोदय सांसत में पड़ गये। दिल्ली तक फोन बजने लगे। अंततः सांसद महोदय उपराष्ट्रपति जी की मंज़ूरी लेने में सफल हो गये।

उपराष्ट्रपति जी पधारे। अनावरण का कार्यक्रम शानदार संपन्न हुआ। लल्लन भैया फूले फूले घूमते थे। कार्यक्रम में उन्होंने एक पढ़े- लिखे दोस्त से लिखवाया हुआ स्वागत-भाषण पढ़ा, लेकिन पढ़ने में उनकी गाड़ी वैसे ही अटकने लगी जैसे किसी मोटर के आगे गड्ढे आने से अटकती है। उन्होंने दांत-दर्द का बहाना करके भाषण का कागज उसे लिखने वाले दोस्त को ही पकड़ा दिया। बाद में उन्होंने दोस्त को उलाहना दिया— ‘जरा ढंग का लिखते जो हम पढ़ सकते। इतने बड़े लोगों के सामने हमारी ‘इंसल्ट’ करा दी।’

अनावरण संपन्न हो गया। उपराष्ट्रपति जी के कार्यक्रम पर करदाता के कुल दो-तीन करोड़ खर्च हुए, जिसका लल्लन भैया गर्व से बखान करते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९८ – तकदीर… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– तकदीर…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९८  — तकदीर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(रिश्तों पर आधारित मेरी एक भावनात्मक सोच)

उसने जीवन पर्यंत अपनी तकदीर की तुलना अमावस से की। उसके पास न कभी ठीक से पैसा आया और न सेहत उस पर कृपालु हुई। यही उसकी तकदीर को अंधेरे पक्ष में ढालता था। परंतु आज उसके लिए तकदीर की परिभाषा बदल रही थी। उसके अपने बेटे – बेटियाँ उसके कंठ में पानी डाल रहे थे। सब की आँखों में उसके लिए मोह की आभा थी। पत्नी रो कर कह रही थी मत जाओ! उसने अपनों का यह संसार तकदीर से ही तो पाया था। बंद होती उसकी आँखों की अंतिम भाषा में लिखा हुआ था, — “इतनी तकदीर तुम्हारे पास थी और तुम यही पहचान न पाए थे।”

© श्री रामदेव धुरंधर

14 – 03 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२७ – सार्थक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२७ ☆ सार्थक… ?

जीवन मानो एक दौड़ है। जिस किसी से पूछो, कहता है; वह दौड़ना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है। फिर बताता है कि अब तक जीवन में कितना आगे बढ़ चुका है। अलबत्ता कभी विचार किया कि आगे यानी किस ओर बढ़ रहे हैं? मनुष्य प्रतिप्रश्न दागता है कि यह कैसा निरर्थक विचार है? स्वाभाविक है कि जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि प्रश्न तो सार्थक ही था पर मनुष्य का उत्तर नादानी भरा है। जीवन की ओर नहीं बल्कि मनुष्य मृत्यु की ओर बढ़ रहा होता है।

भयभीत या अशांत होने के बजाय शांत भाव से तार्किक विचार अवश्य करना चाहिए। मनुष्य चाहे न चाहे, कदम बढ़ाए, न बढ़ाए, पहुँचेगा तो मृत्यु के पास ही। मनुष्य के वश में यदि पीछे लौटना होता तो वह बार-बार लौटता, अनेक बार लौटता, मृत्यु तक जाता ही नहीं, फिर लौट आता, चिरंजीवी होने का प्रयास करता रहता।

स्मरण रखना, मृत्यु का कोई एक गंतव्य नहीं है,  बल्कि यात्रा का हर चरण मृत्यु का स्थान हो सकता है, मृत्यु का अधिष्ठान हो सकता है। विधाता जानता है मनुष्य की वृत्ति, यही कारण है कि कितना ही कर ले जीव, पीछे लौट ही नहीं सकता। जिज्ञासा पूछती है कि लौट नहीं सकते तो विकल्प क्या है? विकल्प है, यात्रा को सार्थक करना।

सार्थक जीने का कोई समय विशेष नहीं होता। मनुष्य जब अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य होता है, फिर वह अवस्था का कोई भी पड़ाव हो, उसी समय से जीवन सार्थक होने लगता है।

एक बात और, यदि जीवन में कभी भी, किसी भी पड़ाव पर मृत्यु आ सकती है तो किसी भी पड़ाव पर जीवन आरंभ क्यों नहीं हो सकता? इसीलिए कहा है,

कदम उठे,

यात्रा बनी,

साँसें खर्च हुईं

अनुभव संचित हुआ,

कुछ दिया, कुछ पाया

अर्द्धचक्र पूर्ण हुआ,

भूमिकाएँ बदलीं-

शेष साँसों को

पाथेय कर सको

तो संचय सार्थक है

अन्यथा

श्वासोच्छवास व्यर्थ है..!

ध्यान रहे, जीवन में वर्ष तो हरेक जोड़ता है पर वर्षों में जीवन बिरला ही फूँकता है। आपका बिरलापन प्रस्फुटन के लिए प्रतीक्षारत है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Beyond the Horizon… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Beyond the Horizon ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Beyond the Horizon… ??

My subtle vision is expanding

beyond the very vault of the sky

where the dominion of words dissolves

and the vast realm of feeling begins

*

There I behold the rising

of a new limitless horizon

Where the frantic race of civilization fades

and the heartbeat of creation can be heard

where it is not the eyes that see

but the inner soul that perceives

*

And there dwells poetry

like a loving tribal mother

who sits in quiet stillness

giving birth to the future

My subtle vision continues

to expand beyond the sky itself

unfolding a new horizon

leading into a pristine era…!

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ बड़की बहू — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “बड़की बहू“.)

 ☆ कथा कहानी  ☆ बड़की बहू — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

अरे बड़की बहु, बेटी मुझको  चाय पिला दो, एक घंटे से जग कर बैठा हूँ, अभी तक मुझे चाय नहीं मिली. जी, बाबू  जी, अभी लाती हूँ, अदरक अभी ही डाला है, चाय जरा ठीक से खौल जाय तो लेकर आती हूँ, बड़की बहु यानी मनोरमा ने अपने ससुर, देव बाबू को कहा. यह बड़की बहु और देव बाबू का रोज सुबह का यह प्रथम वार्तालाप होता है. मनोरमा रोज परिवार में सबसे पहले उठती है, नित्यकर्म से निवृत्त होकर वह सबसे पहले अपने लिए और देव बाबू के  लिए चाय बनाती है. देव बाबू भी अप आदत से बाध्य, एक – दो बार मनोरमा से चाय मांगते ही हैं, हांलाकि उन्हें भी पता रहता है कि चाय बन रही है. थोड़ी देर बाद बड़की बहु और देव बाबू दोनों एक साथ दिन की पहली चाय पीते हैं. यह क्रम पिछले बीस सालों  से निरंतर चल रहा है.

छब्बीस साल पहले देव बाबू की पत्नी संध्या जी का कैंसर की बिमारी से पचास साल की आयु में देहांत हो गया. संध्या जी अपने पीछे देव बाबू  के साथ -साथ  , अपने तीन बेटे अतुल, आलोक, अजय और एक बेटी पल्लवी को छोड़ कर गयीं थीं. पत्नी संध्या के आकस्मिक निधन से देव बाबू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. जिस समय संध्या जी का देहांत हुआ, उस समय तक किसी बेटे की शादी नहीं हुई थी. पल्लवी सबसे छोटी बेटी थी, जो कि उस समय केवल पन्द्रह साल की थी और कक्षा नौ में पढ़ रही थी. परिवार में किसी के कुछ समझ में नहीं आ रहा था. संध्या जी के देहांत के बाद काफी रिश्तेदार आये थे. देव बाबू की बड़ी बहन शोभा, लगभग आठ महीने रह कर परिवार को संभाले रखी, लेकिन कोई कितने दिन रहता. अन्त में शोभा दीदी  , देव बाबू को यह कहते हुए कि मैं बीच- बीच में आती रहूंगी, घबराना मत, भगवान सब ठीक कर देंगे, अपने घर चलीं गयीं. देव बाबू भी दीदी को कितना दिन रोकते.

दीदी के जाने के बाद बेटी पल्लवी ने अपनी  नन्हीं हाथों में घर की बागडोर सम्भालने का प्रयास  किया. उसके इस प्रयास में तीनों भाई भी लग गए. कोई झाड़ू लगा देता, कोई बर्तन साफ कर देता, कोई आटा गूंथता और देव बाबू रोटी सब्जी बनाते. दाल, चावल और सब्जी भी ऐसे ही बन जाता. यह सामूहिक कार्य कई महीनों तक चला. एक दिन रात में पल्लवी ने अपने सबसे बड़े भाई अतुल को कहा भईया, मैं खाना बना लूंगी, आप लोग बाकी के काम कर लो. अतुल ने पल्लवी से  कहा सोच लो, कर पाओगी! पल्लवी ने कहा भईया आप भी तो नौकरी करते हैं, सुबह नौ बजे निकल जाते हैं और रात में आठ बजे तक लौटते हैं, कितना करेंगे. मैं तो अभी कक्षा नौ में ही पढ़ती हूँ और स्कूल तो बगल में ही है. दोनों भईया भी तो पढ़ाई कर रहे हैं, एक एम एस सी और दूसरे बी एस सी में हैं. मुझे करने दीजिये, जो काम मैं नहीं कर पाऊंगी, वह काम  आप लोग देख लीजियेगा. तो उस दिन से चौके के जिम्मेदारी पल्लवी ने अपने उपर स्वयं ले लिया.

एक दिन की बात, सम्भवतः रविवार का दिन था, शाम को देव बाबू के एक बचपन के मित्र लहरी जी आ गए. पल्लवी चाय बना कर ले आयी. लहरी जो को पल्लवी ने प्रणाम किया और चाय और नमकीन का प्लेट  रख कर चली गई. लहरी ने कहा कि यार भाभी को गये एक साल से उपर हो गया, घर की कोई व्यवस्था करो. देव बाबू ने कहा कि सोच तो मै भी रहा हूँ, लेकिन कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ. लहरी ने पूछा क्या सोच रहे हो? देव बाबू ने कहा कि सोच रहा हूँ कि अतुल की शादी कर दूं, उसे रेलवे में नौकरी करते हुए चार साल हो भी गया है और शादी की उम्र भी हो ही गयी  है. लहरी ने कहा कि यह विचार तो बहुत ही अच्छा है, कोई लड़की देखी है! देव बाबू ने कहा एक लड़की के बारे में पता लगा है, पढ़ी- लिखी है और परिवार भी बहुत ही सम्भ्रान्त है और मेरे परिवार से उनका पुराना परिचय है. लहरी ने कहा कि फिर देरी किस बात की है, शादी तय कर दो. लेकिन अतुल से भी पूछ लो, अब हम लोगो का जमाना तो रहा नहीं. देव बाबू बोले एक दिन अतुल से अकेले में बात करता हूँ, वह न तो नहीं कहेगा क्योंकि वह भी सारी बातें खुद भी समझता है . लेकिन बात तो करना ही पड़ेगा, देव बाबू ने कहा. लहरी ने कहा जल्दी बात करके, शादी करके, बहु ले आओ, घर में एक महिला का होना  बहुत जरूरी है.

इस बातचीत के दो दिनों के बाद मकरसंक्रांति की छुट्टी थी, इस कारण अतुल घर पर ही था. देव बाबू ने अतुल को अपने कमरे में बुलाया और कहा कि बेटा तुमसे एक जरुरी बात करना है. अतुल ने कहा बाबू जी कहिये, क्या बात है? देव बाबू ने कहा कि तुम्हें नौकरी करते हुए चार साल हो गये हैं, अब तुम शादी कर लो, अगर तुम्हारे मन में कोई लड़की हो तो बताओ, नहीं तो मैं  कहीं बात चलाऊँ. अतुल ने कहा, पापा शादी आप ही तय कर दीजिए. जहाँ आप को ठीक लगे, तय कर दीजिए, मुझे कुछ नहीं कहना है. लेकिन एक बात मेरे मन में बार- बार आता है कि जो भी लड़की  आयेगी, क्या वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल पायेगी, जिसकी आप अपेक्षा करते हैं. वह भी तो कालेज से निकली हुई कोई लड़की ही तो होगी. उसके कुछ अपने सपने होंगे. अगर वह सपने पूरे करना चाहे तो, अथवा आजकल लड़कियां शादी के बाद पति के साथ अलग रहना चाहतीं हैं, अगर वह भी यही  चाहे तो क्या होगा?

देव बाबू थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले कि अतुल बेटा तुम्हारी बात तो सही है, लेकिन क्या इस कारण से तुम शादी ही नहीं करोगे? देखो मैं तुम्हारी शादी की बात परिवार के लिए नहीं , तुम्हारे लिए कर रहा हूँ. तुम्हारी शादी की उम्र हो गई है और तुम कमाने भी लगे हो. एक उम्र में सबकी शादी होती है, तो तुम्हारी शादी की भी बात मैं कर रहा हूँ. परिवार की अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं, अभी तक तो ईश्वर ही परिवार चला रहा है, आगे भी वही देखेगा! तुम बताओ कि तुम शादी करना चाहते  हो कि नहीं. अतुल बोला पापा मैं शादी तो करना ही चाहता हूँ, लेकिन बस एक ही डर है कि अगर परिवार में वह घुल- मिल नहीं पायी, तो क्या होगा? देव बाबू बोले कल से डरने की जरूरत नहीं, कल हमेशा अनिश्चित होता है, इस कारण सही उम्र में शादी कर लेना ही उचित होता है. अतुल ने कहा ठीक है पापा जैसा आप को ठीक लगे, वैसा करिये.

पिता और पुत्र में इस वार्तालाप के लगभग दो- तीन माह के बाद  , देव बाबू की छोटी बहन शुभांगनी, जो जमशेदपुर में रहती थी, उसने देव बाबू को फोन किया कि भईया, अतुल बेटे के लिए मैंने एक लड़की देखी है, उसकी बायोडाटा मैं भेज रही हूँ, आप देख लीजिए. लड़की का परिवार मेरे बगल में ही रहता है और वे मेरे काफी घनिष्ट हैं, काफी अच्छे लोग हैं. लड़की ने एम एस सी , भौतिक विज्ञान  से किया है. आगे पी एच डी करने का उसका विचार है. देव बाबू ने व्हाट्सएप खोला और उसका  फोटो सहित पूरा विवरण देखा. पहली ही नज़र में देव बाबू को लड़की तो पसंद आ गयी, लेकिन उन्होंने शुभांगनी  को तत्काल  कुछ कहा नहीं. रात्रि में जब अतुल आफिस से घर आया तो देव बाबू ने कहा कि तुम्हारी जमशेदपुर वाली बुआ ने एक लड़की का बायोडाटा भेजा है, तुम भी देख लो. अभी यह बात बाप- बेटे में हो ही रही थी कि बेटी पल्लवि आ गयी. पूछी पापा किसका बायोडाटा है और देव बाबू के हाथ से मोबाइल लेकर देखने लगी. पल्लवि बोली तो यह बात है, भईया की शादी की बात चल रही है और हम लोगों को पता ही नहीं. फोटो देख कर बोली कि लड़की तो काफी सुन्दर है, भईया की इसके साथ बहुत ही अच्छी जोड़ी रहेगी और जब तक देव बाबू कुछ कहते, वह दौड़ कर बाकी दोनों भाईयों को भी फोटो दिखा दिया. सभी भाईयों ने भी कहा जोड़ी तो अच्छी रहेगी.

दूसरे दिन देव बाबू ने शुभांगनी से बात किया और भाई- बहन में यह तय हुआ कि पहले देव बाबू जमशेदपुर जा कर लड़की देख लें, परिवार से मिल लें, और अगर पसंद आ जाये तो फिर आगे शादी की बात की जाये. देव बाबू बोले कि ठीक है मैं अगले हफ्ते जमशेदपुर आ रहा हूँ. उन्होंने अतुल को बता दिया कि मैं अगले हफ्ते जमशेदपुर लड़की देखने जा रहा हूँ. अतुल ने कहा कि ठीक है , जैसा आप उचित समझिये. जब देव बाबू जमशेदपुर पहुंचे तो स्टेशन पर शुभांगनी और उसके पति अमर नाथ , दोनों देव बाबू को लेने आये थे. घर पहुंचने पर अमर नाथ ने कहा कि भईया लड़की के पिता , विश्वम्भर सिंह जी भी आप की तरह ही कोल इंडिया में काम करते थे, और वे लोग भी मूलतः गाजीपुर के रहने वाले हैं, अभी यहीं मकान खरीद लिया है और यहीं बस गये हैं.. उनका एक बेटा है, जो किसी बैंक में उच्चाधिकारी है और एक बेटी मनोरमा है, जिससे अतुल की शादी की बात हम लोग सोच रहे हैं. आज शाम को उनके परिवार को हमने अपने यहाँ खाने पर बुलाया है. उसी समय आप लड़की भी देख लीजियेगा और परिवार से भी मिल लीजियेगा. देव बाबू बोले ठीक है.

शाम को सात बजे के आसपास विश्वम्भर सिंह जी सपरिवार अमर नाथ जी के घर पर आये. अमर नाथ ने विश्वम्भर सिंह जी से देव बाबू का परिचय कराया. दोनों चूंकि कोल इण्डिया में ही अधिकारी थे, इसलिए परिचय होते ही एक प्रकार का औपचारिक संबंध तुरन्त स्थापित हो गया और पुरानी बातें होने लगीं. विश्वम्भर सिंह जी ने देव बाबू जी से पूछा  कि सेवानिवृत्त के बाद आप अपना समय कैसे व्यतीत करते हैं? देव बाबू ने हंसते हुए कहा कि अब मुझे बिना कुछ किये समय व्यतीत करने की आदत पड़ गयी है. दोनों में बातें हो ही रहीं थी कि अमर नाथ जी आ गये और देव बाबू से मनोरमा का परिचय कराया. मनोरमा ने देव बाबू का चरण स्पर्श किया. देव बाबू ने आर्शिवाद दिया और बैठने के लिए कहा. मनोरमा ने एक शमीज- सलवार का सूट पहन रखा था. देव बाबू ने मनोरमा से कुछ औपचारिक बातें करते हुए भी, बड़े ध्यान से मनोरमा को देख भी रहे थे. मनोरमा को भी इस बात की जानकारी तो थी ही कि यह सारा आयोजन उसकी शादी के पृष्ठभूमि में ही हुआ है.

मनोरमा , देव बाबू को पहली ही दृष्टि में पसंद आ गयी. रात के भोजन के उपरांत, विश्वम्भर सिंह जी ने देव बाबू को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया, जिसे देव बाबू ने स्वीकार कर लिया. दो दिन के बाद रविवार को शुभांगनी, अमरनाथ और देव बाबू , विश्वम्भर सिंह जी के यहाँ शाम को गये. चाय पीने के बाद विश्वम्भर सिंह जी ने देव बाबू से मनोरमा के शादी की बात की. देव बाबू ने कहा कि मुझे तो आप की बेटी को अपने घर की बहू बनाने में हर्ष ही होगा, लेकिन अब हम लोगो का जमाना तो रहा नहीं, अब तो बच्चे ही निर्णय करते हैं. अच्छा होगा यदि मेरा बेटा और आप  की बेटी दोनों आपस में बात कर लें. मेरे तरफ से तो हाॅं है. तो तय हुआ कि मनोरमा और अतुल पहले मिल लें, अगर वे दोनों शादी के लिए सहमत हों, तो आगे बात किया जाये. मनोरमा ने कहा कि उसका इस महीने पी एच डी के लिए कोई फार्म भरना है और विभागाध्यक्ष  से भी कई मीटिंग है, तो इस महीने उसके लिए मिलना सम्भव नहीं है. अगले महीने वे मिल सकते हैं.

खैर दूसरे महीने अतुल अपनी बुआ शुभांगनी के यहाँ जमशेदपुर पहुँच गया. दूसरे दिन अतुल और मनोरमा दोनों, एक माल में मिले. औपचारिक बातों के उपरांत अतुल ने मनोरमा से कहा कि मनोरमा मेरी माँ का देहांत कई वर्षों पहले हो चुका है, मैं बड़ा भाई हूँ, मेरे दो और छोटे भाई और एक छोटी बहन है . इस कारण शायद तुम्हें कुछ ज्यादा जिम्मेदारी उठानी पड़े. मेरी मजबूरी यह है कि मैं परिवार को अभी छोड़ कर अलग नहीं रह सकता. बाकी तुम सोच लो. मनोरमा अतुल की सारी बातें ध्यान से सुनती रही. फिर थोड़ी देर के बाद मुस्कुराते हुए बोली, अतुल जी अभी तो हमारी शादी भी नहीं हुई है और आप अलग रहने की बात सोचने लगे! अतुल यह सुन कर थोड़ा शर्मिंदा हुआ, लेकिन फिर सम्भलते हुए बोला कि मैं केवल अपनी स्थित स्पष्ट कर रहा था. मनोरमा ने कहा देखो अतुल ईश्वर की जो इच्छा होगी, वही होगा. माल में ही एक होटल में दोनों ने खाना खाया और खाने के उपरांत दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. देव बाबू तो सुन कर बहुत खुश हुए. घर में भी सभी भाई- बहन बहुत खुश थे कि चलो अतुल भईया की शादी अब जल्दी हो जायेगी.

दो महीने बाद मनोरमा और अतुल की शादी बड़े धूम- धाम से जमशेदपुर में हो गई. अपने घर से विदा हो कर मनोरमा जब अतुल के घर आयी तो मनोरमा का स्वागत घर के दरवाजे पर परिवार के सभी बड़े- बुजुर्गों ने घर के बड़ी बहू के रूप में परम्परागत रीति से किया. घर के चौखट लांघने के उपरांत अचानक मनोरमा को शादी के बाद उसको  परिवार में अपने वर्तमान स्थिति का आभास हुआ. जो मनोरमा कल तक एकदम  स्वछंद लड़की व बेटी मात्र थी, अचानक वह देव बाबू परिवार की बड़की बहू हो गई. एक सप्ताह तक परिवार के रिश्तेदारों का आना-  जाना लगा रहा. एक सप्ताह के बाद देव बाबू की सारी बहनें एक -एक करके अपने घर चलीं गईं. उसके दो – चार दिनों के भीतर सारे मेहमान भी  चले गए और घर में केवल देव बाबू, उनके तीनों बेटे, बेटी और बहू रह गये. रिश्तेदारों और मेहमानों के चले जाने के बाद घर एकदम खाली -खाली लगने लगा था.

एक सप्ताह के बाद एक दिन देव बाबू ने अतुल को बुलाया और कहा बेटा यह दस लाख का चेक लो और बहू के साथ यूरोप घूमने चले जाओ. अतुल ने कहा कि पापा आप के दिमाग में यह विचार कहाँ से आ गया . देव बाबू ने कहा कि बेटा हम लोगों का जमाना कुछ और था, आज कुछ और है! परिवर्तनों को मैं अच्छी तरह समझता हूँ, यूरोप घूमने चले जाओ . काम तो जीवन भर लगा ही रहेगा! मनोरमा सुनी तो एकदम चौंक गयी. अतुल से बोली कि पापा के दिमाग में भी क्या- क्या चलता रहता है!

खैर वीजा और अन्य आवश्यक काम करने में एक माह लग गए और एक माह के उपरांत अतुल और मनोरमा अपनी यूरोप यात्रा पर निकल गये. लगभग बीस दिनों के बाद दोनों वापस आये. मनोरमा ने अपने पी एच डी करने का विचार तत्काल के लिए छोड़ दिया और एक स्थानीय कालेज में अस्थायी रूप से पढ़ाने लगी. लेकिन मनोरमा ने बिना किसी शोर- शराबा के धीरे -धीरे परिवार का काम समझने व करने लगी. इतने दिनों के भीतर पल्लवी भी बी एस सी में पहुँच चुकी थी. परन्तु ननद- भौजाई दोनों मिल कर ऐसे रहतीं थीं कि जैसे दोनों सगी बहनें हों. देव बाबू यह देख कर बहुत खुश थे. समय अपने गति से आगे बढ़ता जा रहा था.

देव बाबू के दोनों बेटों आलोक और अजय की भी नौकरी लग गयी. आलोक की नौकरी एक साफ्टवेयर कम्पनी में बंगलौर में लगी और अजय की रिजर्व बैंक आफ इण्डिया में लगी और उसकी पोस्टिंग चेन्नई में हुई. परिवार में खुशी की लहर दौड़ गयी. दोनों भाई अपनी- अपनी नौकरी पर चले गए. उन दोनों के चले जाने से घर अचानक खाली लगने लगा. लेकिन सब लोग खुश भी थे कि चलो इस जमाने में भी बिना किसी पैरवी के दोनों को अच्छी नौकरी मिल गई.

मनोरमा के पैर भारी होने के कारण घर में झाड़ू- पोछा करने और बर्तन साफ करने के लिए एक नौकरानी रख लिया गया था.  चूंकि मनोरमा के डिलवरी के दिन करीब आ रहे थे, तो मनोरमा की माँ जानकी देवी ने मनोरमा को जमशेदपुर अपने घर बुला लिया. देव बाबू भी यही चाहते थे, क्योंकि घर में कोई बड़ी महिला तो थी नहीं जो कि देखती. एक महीने के बाद मनोरमा को एक प्यारी सी बेटी हुई. खबर सुनते ही अतुल जमशेदपुर के लिए चल दिया, उसको  तो खुशी का ठिकाना नहीं था. पूरा परिवार बहुत खुश था . परिवार में बहुत दिनों के बाद एक शिशु का आगमन हुआ था. लगभग दो महीने के बाद मनोरमा घर आयी. पौत्री के खुशी में देव बाबू ने एक बड़ा आयोजन किया . बंगलौर और चेन्नई से दोनों चाचा लोग भी आये. पल्लवी के तो खुशी का ठिकाना नहीं था, उसे कोई बुआ कहने वाली आ गयी थी. वह उस नन्हीं सी गुड़िया को सदैव अपने पास ही लिए रहती थी.

एक दिन रात्रि के भोजन के समय जब  परिवार के सब लोग एक साथ बैठे थे तो मनोरमा ने कहा कि अजय और आलोक को नौकरी करते हुए काफी दिन हो गये, बाबूजी अब इनकी भी एक – एक करके शादी कर ही दीजिये. यह सुन कर अतुल ने कहा कि इन दोनों की शादी तो होगी ही, पहले पल्लवी की शादी कर देते हैं. पल्लवी  ने कहा कि भईया आप मुझे भगाने के पीछे क्यों पड़े हो, अभी तो भतीजी मिली है.  तो उस दिन तय हुआ कि पहले पल्लवीकी शादी पहले कर लिया जाए, फिर  दोनों भाईयों की शादी के बारे में सोचा जायेगा. इसी बीच मनोरमा को कहीं से पता चला कि अजय का प्रेम संबंध किसी प्रेरणा नामक लड़की, जो कि अजय के साथ ही उसके आफिस में काम करती है, के साथ चल रहा है. एक दिन बातों ही बातों में मनोरमा ने पूछ ही लिया कि अजय भईया अगर कोई आपको पसंद है तो बताईये आप की भी शादी कर ही दिया जाए. संकोच करने की आवश्यकता नहीं, आज नहीं तो कल आप को बताना ही पड़ेगा!  अच्छा हो ” शीघ्रम शुभम् ” के सिद्धांत का पालन करते हुए, आप शादी कर ही लो. अचानक मनोरमा द्वारा अपनी शादी की बात सुन कर अजय चौंक गया. बोला भाभी आपको कैसे पता चला! मनोरमा बोली भईया हमारे भी  अपने सूत्र हैं, छिपाने से कोई लाभ नहीं, अगर आप गम्भीर हों, तो हमें बताईये, मैं बाबू जी से बात करती हूँ.

अजय बोला भाभी मुझे कुछ समय दीजिये, प्रेरणा से  पूछ कर बताता हूँ. मनोरमा बोली चलो आप ने नाम तो बता दिया, अब फोटो भी दिखा ही दो. अजय ने अपने मोबाइल में प्रेरणा का जो फोटो रखा था, दिखा दिया. मनोरमा बोली पसंद तो आप की बहुत ही अच्छी है, कभी  अगर सम्भव हो तो बात कराना. अजय बोला भाभी प्रेरणा  से बात तो करा दूंगा, लेकिन शादी की बात तो आप दो साल सोचों मत. मनोरमा बोली वह क्यों? अजय बोला मैं नौकरी छोड़ कर एम बी ए करने के लिए सोच रहा हूँ, क्योंकि आजकल आगे के कैरियर के लिए एम बी ए आवश्यक हो गया है. मनोरमा बोली बात तो आप की सही है. ठीक है, पहले तो पल्लवी की ही शादी होनी है. अपने जानकारी में कोई पल्लवी लायक लड़का देखो तो बताना . अजय ने कहा भाभी मेरा एक बैचमेट है, यहीं अपने शहर का ही है, मेरे साथ कालेज में था. वह कालेज के बाद वायु सेना में आफिसर हो गया है. उसके परिवार में भी मेरा आना -जाना है, इधर काफी दिनों से मेरी उससे बात नहीं हुई है, लेकिन कोई बात नहीं, मैं उससे बात करता हूँ. मनोरमा  बोली ठीक है.

खैर इसी बीच देव बाबू के एक रिश्तेदार ने पल्लवी के लिए एक लड़का बताया. देव बाबू भी उसके परिवार को जानते थे. पल्लवी की शादी की बात चलायी गयी. कुछ दिनों में पल्लवी की शादी तय हो गई. लेकिन लड़के ने कहा कि अभी पांच महीने उसे कोई छुट्टी आफिस से नहीं मिलेगी , इस कारण शादी कुछ महीनों के लिए टाल दिया गया. आने वाले जनवरी में पल्लवी की शादी होनी  तय हो गयी. परिवार में किसी बेटी की शादी बहुत दिनों बाद हो रही थी, तो घर में काफी खुशी का माहौल था. कपड़े और गहनों की खरीदारी करते- करते मनोरमा थक चुकी थी, क्योंकि परिवार में वही अकेली महिला! यद्यपि लड़के वाले काफी सज्जन थे, उनकी कोई भी मांग नहीं थी, लेकिन देव बाबू तो अपनी एकलौती बेटी के शादी में इतने उत्साहित थे कि पूछो न! खैर साहब तय समय पर पल्लवी की शादी धूम – धाम से हो गई और पल्लवी अपने ससुराल चली गई.

पल्लवी की शादी की तैयारी और बाकी कामों से मनोरमा पूरी तरह थक चुकी थी, उसी में छोटी बेटी को भी सम्भालना पड़ता था. पल्लवी के जाने के बाद मनोरमा एकदम अकेली हो गई. पल्लवी की शादी में काफी पैसे खर्च हुए, देव बाबू तो बहुत पहले ही रिटायर हो चुके थे, उनके पास तो कुछ खास पैसा तो था नहीं, अतः अधिकांश खर्च अतुल को ही करने पड़े. हालांकि दोनों छोटे भाई भी नौकरी कर रहे थे, लेकिन किसी ने पल्लवी की शादी में कुछ भी पैसा दिया नहीं. अतुल ने एक बार इसकी चर्चा मनोरमा से किया भी, लेकिन मनोरमा ने कहा कि किसी भाई से कुछ मत कहिये. अगर उनको अपनी बहन की शादी में देना होता तो खुद ही दे देते. मनोरमा ने आगे कहा कि क्या उनको नहीं पता है कि शादी में कितना पैसा खर्च हो रहा है? जाने दीजिये, भगवान सब करा देगा. लेकिन एक बात जो अतुल को नहीं पता था वह यह कि देव बाबू ने अपने दोनों छोटे बेटों से पैसा मांगा था, लेकिन दोनों बेटों ने कुछ बहाना बना कर, पैसे देने में असमर्थता जाहिर कर दिया था. देव बाबू मन ही मन इतने दुखी हुए थे कि इसकी चर्चा उन्होंने अतुल अथवा मनोरमा से भी नहीं किया,  उन्होंने सोचा कि शादी के शुभ अवसर पर इस बात को किसी को नहीं बताना चाहिए, ईश्वर सब ठीक कर देगा, और हुआ भी ऐसा ही. पल्लवी की शादी बहुत ही शानदार और धूम- धाम से हो गई.

पल्लवी की शादी के एक वर्ष के बाद मनोरमा को एक बेटा हुआ. देव बाबू बहुत ही प्रसन्न हुए. पौत्र के जन्म के उपलक्ष्य में एक बहुत बड़ा आयोजन किया गया. परिवार के सभी लोग आये. पल्लवी भी अपने पति कौशिक के साथ आयी. आयोजन के बाद पल्लवी कुछ दिनों के लिए मायके ही रह  गयी. एक दिन जब दोनों ननद और भौजाई बैठे हुए कुछ सामान्य परिवारिक बातें कर रहे थे तो मनोरमा बोली कि पल्लवी, अब मैं काम करते – करते बहुत थक गयी हूँ, अब अजय की शादी हो तो मुझे कुछ आराम मिले! पल्लवी हंस कर बोली भाभी आप भ्रम में हो, शादी होते ही , मेरे दोनों भाई अपनी पत्नी को  लेकर अपने- अपने घर चले जायेंगे . देखियेगा कोई एक दिन के लिए भी अपनी पत्नी को यहाँ पर नहीं छोड़ेगा. मनोरमा बोली पल्लवी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? पल्लवी बोली जैसा आपने और भईया ने परिवार के लिए किया, वैसा कोई नहीं करेगा, इतना त्याग आजकल कौन करता है! और हुआ भी ठीक वैसे ही. जैसे ही आलोक और अजय की शादी हुई, दोनों अपनी- अपनी पत्नी को बिना पूछे, यहाँ तक कि उन्होंने  देव बाबू जी से भी नहीं पूछा और शादी के एक हप्ते के बाद , अपनी पत्नी को साथ लेकर चले गए. फिर मनोरमा क्या बोलती! और बोलने के लिए बचा भी क्या था! अपने दोनों छोटे बेटों के इस व्यवहार से देव बाबू मन ही मन काफी दुखी थे, लेकिन उन्होंने भी किसी से कुछ नहीं कहा और वैसे भी उन्हें यह आभास तो था ही कि उनके कहने से भी क्या होने वाला. केवल परिवार में कलह ही होगा. इसलिए वह सब ईश्वर की इच्छा मान कर चुप ही रहे.

आजकल देव बाबू ज्यादा बोलते नहीं, घर से भी बाहर कम ही निकलते हैं. कभी मनोरमा से पूछ लेते हैं कि बाजार से कुछ सामान या सब्जी आदि लाना है क्या? अगर मनोरमा कहती  कि हाॅं बाबू जी लाना है, तो ले आते. कोई अगर मित्र घर पर आ गया तो उनके साथ बैठ कर बातें कर लेते, नहीं तो अपना पूरा समय अपने दोनों पौत्र व पौत्री के साथ बिताते. आजकल थोड़ी उम्र सम्बंधित बीमारी जैसे उच्च रक्तचाप व डायबिटीज़ से कुछ अधिक ही परेशान हैं. इधर रक्तचाप काफी बढ़ जाने के कारण कई बार उन्हें  नर्सिंग होम में भर्ती भी करना पड़ा. एक दिन रात में देव बाबू ने अतुल और मनोरमा को बुला कर कहा कि देखो मैं अब अस्सी वर्ष से अधिक का हो गया हूँ, कोई भी आदमी अमर हो कर नहीं आया है, मैं भी अमर नहीं हूँ, एक दिन सबको भगवान के यहाँ जाना है. मेरे लिए बहुत परेशान मत हुआ करो. मनोरमा बोली बाबू जी आप कैसी बातें कर रहे हैं, इसमें परेशान होने वाली बात क्या है! घर में कोई भी बीमार रहेगा तो उसे परिवार के लोग डाक्टर को दिखायेगें  ही, घर में चुपचाप बैठ कर , बीमार व्यक्ति की उपेक्षा करेगा!  या उसके मरने की प्रतिक्षा करेगा! किसी को ऐसा नहीं करना चाहिए और मैं तो निश्चित रूप से ऐसा नहीं करुंगी. वैसे जैसी ईश्वर की इच्छा! देव बाबू मनोरमा को देखते रह गए, बस ऑंखों में ऑंसू भर आये.

खैर साहब समय कहाँ रूकता है, कुछ भी हो, वह तो अपनी गति से चलता ही रहता है. एक दिन रात में देव बाबू के सीने में काफी तेज दर्द शुरू हुआ, दर्द बरदास्त के बाहर होता जा रहा था. तुरन्त ऐम्बुलेंस बुलाया गया और उन्हे  एक प्रतिष्ठित नर्सिंग होम में ले जाया गया. समय पर डाक्टर भी आ गए, जरुरी टेस्ट आदि किये गए. पता लगा कि देव बाबू को बहुत गहरा हृदय आघात लगा है, लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है. लेकिन मनोरमा और अतुल को समझते देर नहीं लगा कि डाक्टर पूरी बात बता नहीं रहे. जिसका डर था, वही हुआ! दो दिन नर्सिंग होम में इलाज के बावजूद भी, रात में दो बजे  , देव बाबू नहीं रहे.

अतुल और मनोरमा दोनों देव बाबू के साथ ही कमरे में थे, लेकिन अब कमरे में केवल देव बाबू का पार्थिव शरीर भर था. पंक्षी पिंजरे से निकल चुका था!

खैर मित्रों ने अतुल और मनोरमा दोनों को सम्भाला और दोनों बेटों और पल्लवी को मोबाइल से देव बाबू के मृत्यु का समाचार बताया. दोनों बेटों और पल्लवी ने कहा कि मेरे आने के बाद ही अन्तिम संस्कार किया जाये. शाम होते- होते दोनों बेटे और पल्लवी तथा परिवार के अन्य लोग भी आ गये. पल्लवी ने कहा कि पापा का अन्तिम संस्कार वाराणसी में होगा. देव बाबू के पार्थिव शरीर के साथ परिवार के सभी लोग वाराणसी आये और हरिश्चन्द्र घाट पर पूरे धार्मिक विधी से देव बाबू का अंतिम  दाह संस्कार हुआ. इसके बाद परिवार के सभी लोग वापस घर आये. घर में रोज भागवत का पाठ करने के लिए शाम को एक पंडित जी आते थे. परिवार के सभी लोग एवं मित्रों के परिवार भी श्रृद्धा से भागवत का पाठ रोज सुनते थे. दसवीं और तेरहवीं को पूरे धार्मिक विधी से पूजा हुआ एवं पंडितों को खुले हृदय और श्रृद्धा से दान- दक्षिणा दिया गया.

आज देव बाबू के मृत्यु को पन्द्रह दिन हो चुके थे. अब तक अतुल और मनोरमा को एक क्षण के लिए   आराम व एकांत नहीं मिला था. आज जब मनोरमा को एकांत मिला तो वह रोने लगी. इतने में अतुल आ गया, मनोरमा को समझाने की जगह वह भी दहाड़ मार कर रोने लगा. रोने का आवाज़ सुन कर दूसरे कमरों से पल्लवी और दोनों भाई व अन्य लोग भी आ गए. किसी के पास कहने के लिए कुछ था नहीं,और कोई कहता भी क्या! सभी रोने लगे. थोड़ी देर बाद माहौल शांत हुआ. इतने में बाई सबके लिए चाय बना कर ले आयी. परिवार के पुराने पंडित, दूबे  जी भी थे, उन्होंने कहा देखो देव बाबू अपनी पूरी आयु अच्छी तरह जी कर और भरा – पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं, उनके लिए दुख करने का कोई कारण नहीं है. आप सब लोग देव बाबू के आर्शीवाद से अपना जीवन बिताईये. सभी लोग भी दूबे जी के विचार से तो सहमत थे ही, लेकिन मन नहीं मान रहा था कि देव बाबू नहीं रहे!

कुछ दिनों बाद दोनों भाई भी अपनी नौकरी की जगह पर चले गए, लेकिन पल्लवी नहीं गयी और एक माह के लिए रुक गई. मनोरमा भी सामान्य हो गई थी. एक दिन वह बच्चों को स्कूल भेज कर घर में यूँ ही बैठी थी कि पल्लवी आ गयी. पल्लवी बोली क्या भाभी , आप के बाल भी सफेद होने लगे, चलिए ब्यूटी पार्लर आप के बाल ठीक करा दें. मनोरमा बोली अरे अब उम्र हो गया तो बाल सफेद होंगे ही और इस उम्र में क्या ब्यूटी पार्लर जाना! तुम्हें जाना है तो चली जाओ. पल्लवी नहीं मानी और अपने साथ मनोरमा को ब्यूटी पार्लर ले गयी. रास्ते में पल्लवी बोली भाभी, किसी भी कारण से कभी भी, किसी का जीवन रुकता नहीं. मनोरमा ने स्नेह से पल्लवी को देखा और बोली मेरी छोटी ननद बहुत जल्दी बड़ी हो गई. इतना कह कर मनोरमा ने पल्लवी को गले लगा लिया.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

10.03.2026

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७१ – ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७१ ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जमाना जान गया पर मुझे पता ही नहीं

हुआ है इश्क़ अगर तो हुई ख़ता भी नहीं

.

अदाएँ देख अगर दिल हुआ दिवाना तो

जुनूने-इश्क से डरना कोई वजह तो नहीं

.

किया नहीं था, हुआ जो वो हो गया खुद ही

पता नहीं कि किया इश्क़ या किया ही नहीं

.

जिधर भी देखता तस्वीर एक ही दिखती

नहीं बाहर है कहीं दिल में वो बसा तो नहीं

.

नहीं वजूद रहा उससे अब अलग जब से

कहूँ कैसे कि कुछ हुआ तो पर हुआ ही नहीं

.

नदी की धार है वो घाट हूँ मैं ठहरा सा

जुदा होकर भी कभी मैं हुआ जुदा ही नहीं

.

कहो मत नाखुदा किस्सा-ए-इश्क को लोगों!

करे सजदा ‘सलिल’ उसको जो है खुदा भी नहीं

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१४-३-२०२६

संपर्क:

१. विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

२. ए ५०३ रुद्राक्ष, भोपाल

 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आज की विभिषिका ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ आज की विभिषिका ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार।

जानें कैसा हो गया, अब तो यह संसार।।

*

आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर।

घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर।।

*

अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त।

दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।।

*

अमरीका इजरायला , और आज ईरान।

नहीं नियंत्रित आज ये, धारें मिथ्या मान।।

*

मध्य-पूर्व में आग है, जीना हुआ मुहाल।

जानें क्योंकर विश्व में, होता रोज़ बवाल।।

*

घातक सबके मन हुए, ख़ूनी हैं अंदाज़।

कपटी सब ही लग रहे, आवेशित आवाज़।।

*

रोक नहीं सकता इन्हें, सारे धारें क्रोध।

नहीं आज इनको रहा, मानवता का बोध।।

*

हिंसा से मिलता नहीं, कुछ भी जग में सोच।

धन-जन की बर्बादियां, करुणा के पग मोच।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४३ ⇒ न व नी त ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न व नी त ।)

?अभी अभी # ९४३ ⇒ आलेख – न व नी त ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

*AMUL BUTTER*

भारत कभी सोने की चिड़िया था, और यहां घी दूध की नदियां बहती थी, यह सत्य सनातन है।

द्वापर में सबै भूमि गोपाल की थी, जिन्होंने बृज की गोपियों के साथ रास रचाया था, धेनु चराई थी, बांसुरी की धुन सुनाई थी और गोपियों के घर से माखन चुराया था। खुद ने ही नहीं खाया था, ग्वाल बालों को भी खिलाया था और दाऊ ने बरबस मुख लिपटाया था।

बचपन में मुझे नवनीत बहुत पसंद था। हमारे घर में कभी घी दूध की नदियां नहीं बहीं, हां असली, पंखों वाली चिड़ियां जरूर छायादार वृक्षों पर आकर बैठ जाती थी। रोज सुबह समय निकालकर सावरकर वाचनालय निकल जाता था, जहां सरिता, मुक्ता जैसी अन्य पत्रिकाओं के साथ, नवनीत डाइजेस्ट भी मेरी प्रिय पसंद थी।।

नवनीत मक्खन को भी कहते हैं। तब हमने अमूल बटर का नाम भी नहीं सुन रखा था। तिलक पथ पर भावे की डेरी थी, जहां दूध, दही, घी, मक्खन और पनीर मिलता था। मक्खन की टिकिया मिलती थी, पन्नी में लिपटी हुई, नमक वाली और बिना नमक वाली। तब पॉलीथिन शब्द हमारे मुंह नहीं लगा था। कभी घर में दूध में मलाई जमने ही नहीं दी तो मक्खन कहां से निकलता। हम माखन चोर भले ही नहीं रहे, लेकिन मलाई हमने बहुत मारी। अपनी चोरी छुपाने के लिए हमने एक बिल्ली पाल रखी थी। मलाई हम खाते थे, और मार बिल्ली खाती थी। आज भी हम चाय मलाई मार के ही पीते हैं।

जिस तरह हाथी के दांत खाने के अलग, और दिखाने के अलग होते हैं, मक्खन भी दो तरह का होता है, खाने का, और लगाने का। कभी पोल्सन नाम का मक्खन भी आता था, जिसका हमने सिर्फ नाम ही सुना। ना कभी खाया और ना ही लगाया।।

वैसे मक्खन जैसी चिकनी चुपड़ी बातें भले ही हमसे करवा लो, हम किसी को मक्खन लगाने के सख्त खिलाफ हैं। हम संस्कारी लोग हैं। हमारे यहां हर काम रीति, रस्म और रिवाज से होता है। हल्दी जैसी गुणकारी वस्तु भी अगर हम खाते हैं तो लगाते भी हैं। बाकायदा हल्दी की रस्म होती है। गाजे बाजे के साथ, डंके की चोट हल्दी लगाई जाती है। हल्दी लगवाई है, कोई चोरी नहीं की।

होती है हमारे यहां तेल मालिश भी, मसाज भी, लेकिन तेल से, मक्खन से नहीं। तेल सरसों का भी चलेगा, खोपरे का भी चलेगा, अगर आप संपन्न हैं तो बादाम का तेल लगाओ, लेकिन कम से कम मक्खन को तो ब्रेड से अलग मत करो। जूते की पॉलिश भले ही क्रीम से होती हो, मक्खन से तो पॉलिश भी नहीं होती।।

जो लोग अधिक घी खाना चाहते हैं, उन्हें अधिक धन कमाना पड़ता है। पैसा सिर्फ मेहनत, भाग्य, पुरुषार्थ अथवा बेईमानी से ही नहीं कमाया जाता, चिकनी चुपड़ी, मीठी मीठी बातों से भी लक्ष्मी प्रसन्न होती है।

मिश्री सी जबान ही मक्खन का काम भी कर देती है। प्रेम के दो शब्द से तो पत्थर भी पिघल जाता है, फिर इंसान क्या। आप भी बस मीठा बोलिए, वही असली मक्खन है।

अमूल मक्खन स्वदेशी भी और नमकीन भी ! दाल मखनी हो या फिर पाव भाजी, मक्खन तो उसमें तैरना ही चाहिए। आज की पीढ़ी पिज़्ज़ा और आइसक्रीम के नाम पर ढेरों चीज़ (cheeze) और क्रीम का सेवन कर रही है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मक्खन स्वादिष्ट है और पौष्टिक भी। निर्मल बाबा का कहा मानें। खुद भी खाएं और चार लोगों को भी खिलाएं, लेकिन किसी को लगाएं नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 फरवरी से 1 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (16 मार्च से 22 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। 23 मार्च से काल पुरुष की कुंडली में कालसर्प योग लगने वाला है आपको भी इससे बचने का उपाय करना पड़ेगा मैं इस संबंध में एक अलग से वीडियो बनाया है जिसका लिंक इस साप्ताहिक राशिफल के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दिया गया है हम सभी जानते हैं की श्री हनुमान जी कलयुग के जीवंत देवता है। कलयुग में सभी प्रकार के कष्टों से से मुक्ति के लिए श्री हनुमान जी की उपासना अतिआवश्यक है। इसीलिए मैं पंडित अनिल पांडे आपको प्रति सप्ताह श्री हनुमान चालीसा की मंत्रवत चौपाइयों से होने वाले लाभ के बारे में बताता हूं। दो चौपाई के बारे में मैं आपको अभी बताऊंगा तथा दो चौपाइयों के बारे में मैं आपको इस वीडियो के अंत में बताऊंगा। आज की चौपाई है :-

बिद्यावान गुनी अति चातुर |

राम काज करिबे को आतुर ||

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |

राम लखन सीता मन बसिया ||

हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से ज्ञान, बुद्धि, रामकृपा और यश प्राप्त होता है।

आइये अब हम 16 मार्च से 22 मार्च 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल की राशिवार चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके व्यापार में वृद्धि होगी। आपको अपने संतान से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। धन की प्रति थोड़ी कम होगी। परंतु अगर आप सावधानी से कार्य करेंगे तो कचहरी के कार्यों में आपको सफलता मिलेगी। जनप्रतिनिधियों के प्रतिष्ठा में न तो वृद्धि होगी और ना ही नुकसान। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 16, 21 और 22 मार्च कार्यों को करने के लिए सफलता प्रदान करने वाले हैं। 19 और 20 मार्च को आपको सावधान रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास पर्याप्त मात्रा में धन आएगा। आप इस सप्ताह अपना पूरा ध्यान धन प्राप्ति में लगायें। जिससे की इस अवसर का आप अधिक से अधिक उपयोग कर सकें। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्सव जैसा रहेगा। कर्मचारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है परंतु आपको अपने अधिकारियों से इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी ठीक रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह सफलता प्राप्त करने के लिए आपको 17 और 18 मार्च का उपयोग करना चाहिए। 21 और 22 मार्च को कार्यों को पूर्ण सावधानी से करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि देव के मंदिर में जाकर उनका पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

यह सप्ताह आपके लिए शुभ फलदायक है। कर्मचारी व अधिकारियों के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। उनकी पदस्थापना उनके इच्छित स्थान पर हो सकता है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। राजनीतिज्ञों के लिए इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको भाग्य को छोड़कर अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए। कचहरी का कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयोगी है। 16 मार्च को आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्यों को करने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद मिल सकती है। भाग्य से रुके हुए कार्यों को करने का प्रयास करें। आपको सफलता प्राप्त होगी। दुर्घटनाओं से सावधान रहें। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। आपके व्यय में वृद्धि होगी। आमदनी पहले जैसी ही रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए 16, 21 और 22 मार्च विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। 17 और 18 मार्च को आपको पूर्ण सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य सामान्य रूप से कार्य करेगा। आमदनी सामान्य रहेगी। आपके या आपके जीवन साथी के स्वास्थ्य में थोड़ी खराबी आ सकती है। दुर्घटनाओं से आप साफ-साफ बचेंगे। अगर कोई दुर्घटना होती है तो भी आपको किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े कम ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 मार्च लाभदायक है। 16,19 और 20 मार्च को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। युवक और युवतियों के लिए सप्ताह अच्छा है। नए-नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। पुराने संबंधों में प्रगाढ़ता आ सकती है। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। उनको सावधानी पूर्वक कार्य करना चाहिए। अपने शत्रुओं को आप इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों हेतु शुभ है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्य करने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह थोड़े से प्रयासों से ही आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपका आपके माता-पिता का और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात पहले जैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में रिस्क लेने का कार्य न करें। भाग्य से आपको मामूली मदद मिल सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग कम मिलेगा। छात्रों का पढ़ाई में मन नहीं लगेगा। इस सप्ताह आपके लिए 16, 21 और 22 मार्च विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सुविधाजनक है अर्थात लाभदायक हैं। 19 और 20 मार्च को आपको कार्यों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गरीबों के बीच में चावल का दान दें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रों का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। आपको अपने संतान का बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को पढ़ाई में सफलता प्राप्त होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। उनकी प्रतिष्ठा में बाधा पड़ सकती है। आप सभी को अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। माता जी का स्वास्थ्य खराब हो सकता है। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। धन प्राप्त करने के मार्ग में कुछ बाधाएं आ सकती हैं। उनसे बचने का प्रयास करें। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 मार्च विभिन्न प्रकार के मामलों में लाभप्रद हैं। 21 और 22 मार्च को आपको बड़े सावधानी से कार्यों को संपन्न करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको अपने कार्यों में बार-बार सफलता प्राप्त होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए सप्ताह थोड़ा सावधानी भरा है। उनको इस पूरे सप्ताह सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिए। व्यापारियों के लिए इस सप्ताह सामान्य है। भाई बहनों के साथ आपके संबंधों में तनाव हो सकता है। भाग्य आपका साथ देगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 मार्च परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपका भाई बहनों के साथ संबंध उत्तम रहेगा। आपके भाई बहनों को भी विभिन्न कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। भाग्य से आपको थोड़ा कम मदद मिल पाएगी परंतु कामभर की मदद मिल सकती है। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी गिरावट संभव है। इस सप्ताह आपके लिए 16 तथा 21 और 22 तारीख परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको धन प्राप्ति के लिए पूर्ण प्रयास करना चाहिए। आप को इस सप्ताह अपने संतान से कम सहयोग मिलेगा। आपका और आपके जीवन साथी को थोड़ी स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो सकती है। पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं के प्रति आपको इस सप्ताह सचेत रहना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों को सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 तारीख विभिन्न प्रकार के मामलों में उपयुक्त है। 16 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उच्च स्तर पर होगा। आपके बहुत सारे कार्य आपके आत्मविश्वास के कारण ही पूर्ण हो जाएंगे। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको रिक्स नहीं लेना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपके जीवन साथी को थोड़ा कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 मार्च अनुकूल हैं। 17 और 18 मार्च को आपको सावधान रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

 श्री हनुमान चालीसा के मंत्रवत चौपाइयों का वर्णन इस प्रकार है।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा,

बिकट रूप धरि लंक जरावा।

भीम रूप धरि असुर संहारे,

रामचंद्र के काज संवारे॥

इन दोनों चौपाइयों के संपुट पाठ करने से श्री हनुमान जी आपके सभी कष्टों को हरते हैं तथा आपके सभी कार्य संपन्न हो सकते हैं।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ संसार दोघांचा + संपादकीय निवेदन – डॉ. सोनिया कस्तुरे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ डॉ. सोनिया कस्तुरे ☆

🎇अ भि नं द न 🎇

दक्षिण महाराष्ट्र साहित्य सभा, कोल्हापूर आणि शब्दांगण साहित्यिक सांस्कृतिक व्यासपीठ, मिरज यांच्या संयुक्त विद्यमाने साहित्य संमेलन मिरज येथे संपन्न झाले. या संमेलनात आपल्या समुहातील कवयित्री डॉ. सोनिया कस्तुरे यांना,  नाही उमगत ‘ ती ‘ अजूनही या त्यांच्या काव्यसंग्रहाला ‘ऋतुजा माने साहित्य पुरस्कार’ देऊन गौरविण्यात आले आहे.

ई अभिव्यक्ती परिवारातर्फे डॉ सोनिया कस्तुरे यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐🌹💐

– संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

पुरस्कार प्राप्त काव्य संग्रहातील कविता

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “संसार दोघांचा” ☆ डॉ सोनिया कस्तुरे

तू म्हणतोस संसार दोघांचा,

मग दोघ मिळून करु या ना…

*

तू चूल पेटवं, मी भाकरी करते,

तू भाजी चीर मी फोडणी देते,

मी कपडे धुते, तू वाळत टाक;

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघं मिळून करु या ना..!

*

भातुकलीत मी स्वयंपाक केला,

आता ही मीच सगळं करते ;

झोपडीत तर मी खूप राबते,

महालात ही मीच…

मी कोणत्याही पदावर असूदे

घर कामातून माझी सुटका नाही

तू म्हणतोस घर दोघांचं,

घर काम ही मिळून करु या ना,

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघ मिळून करु या ना..!

*

मी आई हे “सत्य”,

तू बाप हा “विश्वास”

मी जन्म देणं निसर्ग नियम,

तू संगोपनाला हातभार लाव ना,

 सत्य आणि विश्वास पेरत

मिळून मुलांना घडवूया ना…

तू म्हणतोस कुटुंब सर्वस्व तर

टी. व्ही, मोबाईल बाजूला ठेवून

पालक सभेला मिळून जाऊया ना…

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघ मिळून करु या ना..!

*

तुझ्या सुखदुःखाची मी सोबती

घराच घरपण मी, म्हणतोस,

मी थोडी “बाप” होते

तू थोडा “आई” हो ना…

मी तुझी आर्धांगिनी

तू माझं अर्धांग हो ना…

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघं मिळून करु या ना..!

*

© डॉ.सोनिया कस्तुरे

विश्रामबाग, जि. सांगली

भ्रमणध्वनी:- 9326818354

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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