हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ९ – !!अनगिन भाव!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!अनगिन भाव!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ९ ☆

☆ !! अनगिन भाव!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

पल- पल घटता जाता जीवन, लेता कब है यह ठहराव।

मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।

०

सांँसों की आवाजाही में, हो जाती हैं सदियांँ पार।

कितने सपने आंँखों में है, जो ना हो पाते साकार।।

लहरा सकती थी परचम भी, आजादी का रहा अभाव।

मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।

०

छलनी होता यह मन मेरा, हर दिन देखूं जब अखबार।

जिनको बनना ही था रक्षक, करते वह भी अत्याचार।।

किया समर्पण तो क्या पाया, देते जब अपने ही घाव।

मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।

०

घने कोहरे में रख छोड़ी, मासूम कली इक नवजात।

पाला है नारी ने तुझको, नारी को ही देता घात।।

मन मसोस कर रह जाती हूँ, किसे दिखाऊँ अपना ताव।

मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३७ – कविता – चम्पत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “चम्पत…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३७ ?

? कविता – चम्पत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

हुए चोर चम्पत, लेकर चढ़ावा राम जी

श्रद्धा-भक्ति को मिले कैसे बढ़ावा राम जी

=2=

स्वार्थ के हर दौर में निर्दोष ही ठगे गये

सह रहे वे आज भी देखो छलावा राम जी

=3=

धर्म की प्रतिष्ठा को घेरा है भ्रष्टाचार ने

भक्तों के हिस्से तो आया बस रुलावा राम जी

=4=

मंदिर-मस्जिद-तीर्थ सब व्यापार का अड्डा बने

और क्या होगा बुरा इसके अलावा राम जी

=5=

महँगाई के तीरों से मूर्छित जन पुकारते

भेजिए हनुमत को फिर से बुलावा राम जी

=6=

हम भी अपने मन की बात कहना चाहते प्रभु

अच्छे दिन का दे रहे क्यों भुलावा राम जी

=7=

धर्म के प्रतीक सारे आपसे समृद्ध हैं

बदनाम ना हो तिलक, जनेऊ ,कलावा राम जी

=8=

मतदान की क़तार में जनमत खड़ा रहा

इ.वी.एम. दे गई फ़िर से झुलावा राम जी

=9=

प्रश्नपत्र लीक क्यों,खिलवाड़ क्यों भविष्य से

ख़ून खौलकर ये न बन जाए लावा राम जी

=10=

घर में हैं माँ-बाप तो फ़िर तीर्थ क्या जाना सखे

घर में ही रब,यीशु और काशी कावा राम जी

=11=

‘राजेश’ द्वेष-छल-कपट ने रोके सारे रास्ते

पाखण्डवादी कर रहे भक्ति का दावा राम जी

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१० ☆ मुक्तक – ।। जिओ मिसाल बेमिसाल किरदार बनकर ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१० ☆

☆ मुक्तक ।। जिओ मिसाल बेमिसाल किरदार बनकर ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

प्रेम की निगाह और दिल में अहसास रखो।

अपने ऊपर हमेशा  तुम विश्वास रखो।।

हर नजर में तेरे महोब्बत हो मिली हुई।

सदभाव को भी हमेशा अपने पास रखो।।

=2=

हर आदमी को समझने की नजर खास रखो।

हर आदमी की पीठ पर हाथ तुम शाबास रखो।।

मानवता का दामन  कभी छूटे नहीं तुमसे।

दिल में हमेशा संवेदना का ये आभास रखो।।

=3=

तरकश में तीर साथ आँखों में नीर भी रखो।

बसा कर दिल में अपने पराई पीर भी रखो।।

काम आओ सबके सुख- दुख दर्द में तुम।

दूर हर व्यसन से अपना यह शरीर भी रखो।।

=4=

मत गलत तुम कभी कोई तकरीर रखो।

हर किसी के लिए रहम की लकीर  रखो।।

जोड़ना ही जिंदगी और तोड़ना तो विनाश है।

बदल सके बुरे हालात ऐसी तरकीब  रखो।।

=5=

सोचो बड़ा मगर जरूरत को फकीर  रखो।

हौसलों की हाथ में हमेशा शमशीर रखो।।

हर दिल में जगह बनाओ अपने नाम की तुम।

मिसाल बेमिसाल जिंदगी एक नजीर रखो।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७३ ☆ कविता – लाल बहादुर शास्त्री… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – लाल बहादुर शास्त्री…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७३ ☆

☆ लाल बहादुर शास्त्री…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

सौम्य शांत सद्भावमय सात्विकवादी मूर्ति

लाल बहादुर ने किया था नेहरु की पूर्ति।।

*

नेहरु के अवसान पर ये सब लोग उदास

पर शास्त्रीजी ने रचा एक नया इतिहास ।।

*

सूझ-बूझ के थे धनी कर्मठ पर निष्काम

श्रम ही उनका शौक था श्रम ही था विश्राम।।

*

सीमा पै उत्पात था घर में अन्न अभाव

दोनों पर उनका पड़ा लेकिन सही प्रभाव।।

*

सेनाओं को शक्ति दी औ’ किसान को धैर्य

खूब निभाई दोस्ती औ’ दुश्मन से बैर।।

*

“जय जवान जय किसान” का नारा दे अभिराम

ध्वस्त कराये पाक के पैटन टेंक तमाम ।।

*

सारी सेना खुश हुई, प्रमुदित हुये किसान

जन हित में दोनों रहे सही सकल अभियान।।

*

कद के छोटे थे मगर शासन में होशियार

भारत को गौरव दिया जग में विविध प्रकार।।

*

उस निस्पृह व्यक्तित्व को बारम्बार प्रणाम

अमर रहेगा जगत में शास्त्रीजी का नाम ।।

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्रमाणपत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्रमाणपत्र  ? ?

जन्म प्रमाणपत्र,

शिक्षा प्रमाणपत्र,

चरित्र प्रमाणपत्र,

आय प्रमाणपत्र,

विवाह प्रमाणपत्र,

निवास प्रमाणपत्र,

जीवन प्रमाणपत्र,

मृत्यु प्रमाणपत्र,

जीते हो या साँस भर भरते हो,

चैतन्य हो या निष्प्राण,

प्रमाणपत्रों की दुनिया में

जीना पड़ता है सप्रमाण..!

?

© संजय भारद्वाज   (2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – प्रणय वल्लरी..।

? रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

हिरणी के इस चंचल मन को

हवा वसंती महकाती।

खिलता हरसिंगार चमन में,

हम गाते गीत प्रभाती।।

*

सौरभ सरिता उर में बहती,

खिलती आशा की कलियाँ।

पिया कहे सिंगार सलौना,

चाहत में डूबी अँखियाँ।।

यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं,

मुस्कानें सब मदमाती।

*

प्रणय वल्लरी झूम रही है,

अंग-अंग यौवन छाया।

सजा कुंतलों पर गजरा है,

देख मदन भी बौराया।।

प्रेम तूलिका लिखती पाती,

भेद खोलकर हर्षाती।

*

प्रीति हमारी यह मधुमासी,

प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।।

संबंधों के गठबंधन में,

भ्रमरों की बारातें हैं।।

मधुरस छलके तृषित अधर से,

धड़कन -धड़कन इतराती।

*

प्रियतम तेरी बनी मेनका,

आशाएँ आलिंगन की।

मन राधा बन बैठा व्याकुल,

राह तके अनुमोदन की।।

लगती आग मिलन की ऐसी,

प्रेम क्षितिज में इठलाती।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२८ ☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – इंतजार।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

खिड़की से नित झाँकती, नई नवेली नार ।

सपने मन में सज रहे, चलती मधुर बयार ।।

* 

आकर खिड़की पर दिखी, उसकी मधु मुस्कान।

मन में उसके जग रहे, नये-नये अरमान।।

 *

नयन निहारे प्यार से, देख रही है राह।

आ जाओ मेरे सजन, बस इतनी-सी चाह।।

 *

रस्ता उनका देखती, कब आओगे श्याम।

इंतजार होता नहीं, मिले नहीं आराम।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१० ☆ संतोष के मुक्तक… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – संतोष के मुक्तक । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१० ☆

☆ संतोष के मुक्तक… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

औरों  को  जो  ज्ञान   बांटते

अपनी सीख से स्वयं भागते

देखें  गर  वो  अपना  अंतस

गुण अवगुण को स्वयं छांटते

*

रंग   बदलते   चेहरे   देखे

घाव  हृदय  पर  गहरे देखे

बहुरुपिया  है यहाँ आदमी

सच  पर हमने  पहरे  देखे

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆ राधेय ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  ‘राधेय’।)

☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆

? कविता – राधेय ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में, कल मुझे भी मरना है l

वध तो होगा ही है मेरा, अब फिर क्यूँ पीछे हटना है ll

*

भविष्य कहेगा मित्रता में, क्यों दिया दुर्योधन का साथ?

वचन बद्ध था रहा सदा मैं, सभी अपनों का छूटा हाथ ll

*

रश्मिरथि होकर भी जग में, बहुत हुआ बदनाम l

क्या गुनाह था माधव मेरे, नहीं  मिला पाण्डु पुत्र  नाम ll

*

था अर्जुन से शूरवीर पर, गुरु अहम ने किया दूर l

धर्म अधर्म के बीच धनंजय, आपका व्यवहार रहा सदा ही क्रूर ll

*

माता कुंती ने ममता की, छाँव कभी न डाली थी l

पांचो पुत्र रहे सदा सलामत, यही कसम उन्होंने खाली थी ll

*

आज धंस गया भू में पहिया, परशुराम का श्राप धरे l

तभी केशव ने आज्ञा दी थी, पार्थ गांडीव तीर भरे ll

*

धराशायी ये सूत पुत्र था, करके मैदिनी का आलिंगन l

सूर्यदेव भी देख वत्स को, अस्ताचल  करते चिंतन ll

*

कहती हूँ  जागो जगवालों, बच्चों को इतिहास सुनाओ l

सुर्य पुत्र की सुनो कहानी, क्या था राधेय यह बतलाओ ll

*

कहती हूँ अद्धभुत वीर तुम, अर्पित श्रद्धा सुमन तुम्हें l

द्रवित हुआ है मन मेरा, सदा करूँ मैं नमन तुम्हें ll

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २९ – कविता – कुछ पता नहीं… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘कुछ पता नहीं…‘।)

☆ शशि साहित्य # २९ ☆

? कविता – कुछ पता नहीं…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

इस छोर को तो थामा मैंने,

उस छोर का कुछ पता नहीं…

 

क्यों डर रही पतंग हवा में,

पकड़ कुछ ढीली,

कुछ पता नहीं…

 

थी अब तक खुशियां मेरी मुट्ठी में,

रेत की तरह फिसल रही,

कुछ पता नहीं…

 

जो मेरे भी इंतजार में तड़प उठे,

उन तरसती निगाहों का,

कुछ पता नहीं…

 

हम तो चले थे कदम ब कदम पीछे तेरे,

कब मिटा दिए निशां लहरों ने,

कुछ पता नहीं…

 

उतावली हो रही बहारें,

महकने को मचलने को…

मगर अब इंतजार…

कुछ पता नहीं…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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