हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ मच्छर  “दानी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ मच्छर  “दानी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

——डाटा-आटा-टाटा–आटा-घाटा-चांटा-काटा——-चिरकुट मच्छर ने कबीले के सरदार मच्छर से कहा-बाॅस लगता है आपको पुस्तक मेले से लाई हुई “तुकबंदी”की किताब पसंद आ गई है।कविता लिखने का मूड है शायद !

सरदार दहाड़ा—हमारे पास किन्तु परन्तु इफ बट अगर मगर का  कोई काम नहीं।

जोकुछ है एकदम साॅलिड है।

चिरकुट चिरौरी करने लगा-माई बाप! कई भूत(पूर्व) सरदार बेशक कविताई,पेंटिंग में माहिर थे।एक तो हवाई जहाज उड़ाता था।पर आप तो”फेंक”भी लेते हैं,उड़ना उड़ाना,जिमिंग,कुकिंग,ड्रमवादन नौकायन सभी कुछ कर लेते हैं।ऑल इन वन।गोडसे का मंदिर बनायेंगे कहते हैं लोग।आपका तो बनना ही चाहिए।

चिरकुट को सरदार ने सबासी दी।ऐसा है चिरकुट-हमने अच्छे अच्छे पोर्टफोलिओ लेडी मच्छर “एनोफिलीस”को दे रखे हैं।वे जनसेवा में पारंगत हैं।मीडिया में वक्त बेवक्त भूं भूं करती रहती हैं।जनता भुनभुन में उलझी रहती है और हम पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक बिंदास उड़ते रहते हैं।

श्रीलंका ने हमें तड़ीपार कर दिया।इंडिया 2030 तक हमें डोडो बना देगा।ये मुंह और मसूर की दाल।हम अंगद का पांव हैं।डटे रहेंगे।

सोचो चिरकुट!अगर हम न हों तो “स्वच्छता अभियान”का क्या होगा।झाड़ूवाले बाबा का क्या होगा।”फार्मा कंपनियां” चांदी कैसे कूटेंगी।ओडोमास मार्टिन कछुआछाप क्लोरोक्विन———!तुम्हें पता है

हमने “उड़नशील यूनिवर्सिटी से एम ए भी किया है।लिंग्विस्टिक्स पढ़ा है।वक्त के साथ शब्दों के मानी बदल जाते हैं।अब “मच्छरदानी”का अर्थ मसहरी नहीं रहा।मच्छर “दानी” (कर्ण के समान दानी)हो गया है।चीनी मसहरी के आॅर्डर मिले तो चिंग चिंग हमारे तलुए चाट रहा है।डंकमारकला की देशव्यापी कार्यशालाओं के कारण नेता हमारे एहसानमंद हैं ।

चिरकुट तुम कह सकते हो कि “येभी कोई दान है?”

बस नज़रिए का फर्क है–‘”हुस्न रंगीन है न सादा है।बस अपनी अपनी निगाह होती है।”

 इतना कहकर सरदार मच्छर फिर उड़ान भरने लगा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पर्यायवाची ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पर्यायवाची ? ?

कितना ही डराओ,

दबाओ, कुचलो,

मारो, पीटो, वध करो,

बार-बार संघर्ष करते हो,

हर बार उठ खड़े होते हो,

तुम पर क्या

मृत्यु का असर नहीं होता?

मैं हँस पड़ा,

मात्र शरीर नश्वर होता है,

पर शब्द ईश्वर होता है..,

सुनो,

अशेष का पर्यायवाची होता है,

सर्जक, जगत में

आठवाँ चिरंजीवी होता है!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 5 :05 बजे, 18 जुलाई 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ तुका म्हणे – काय ते विरक्ती… – अभंग रचना ☆ रसग्रहण – प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? काव्यानंद ?

☆ तुका म्हणे – काय ते विरक्ती … – अभंग रचना ☆ रसग्रहण – प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

तुका म्हणे

काय ते विरक्ती न कळेची आम्हां /

जाणों एक नामा विठोबाच्या//१//

*

नाचेन मी सुखें वैष्णवांचें मेळीं /

दिंडी टाळघोळीं आनंदें या //२//

*

शांति क्षमा दया ते मी काय जाणें /

विठ्ठलकीर्तनें वांचूनियां //३//

*

कसया एकांत सेवूं तया वना /

आनंदें या जनामाजी असो//४//

*

कासया उदास होऊं देहावरीं /

अमृतसागरीं डुबोनियां //५//

*

तुका म्हणे मज असे हा भरवसा/

विठ्ठल सरसा चालतसे//६//

*

तुका म्हणे

तुकाराम महाराजांनी आत्मानुभवाने साधा सोपा भक्ती मार्ग स्वीकारला आहे. आणि तोच त्यांनी आपला जीवनक्रम ही मानला आहे. त्या मार्गाचे मोठेपण आणि सोपेपणा सांगताना ते म्हणतात.

विरक्ती म्हणजे नेमके काय हे आम्हाला माहीत नाही. आम्ही फक्त विठ्ठलाचे नाम जाणतो त्याचेच नाम संकीर्तन करतो. त्यांच्याच पायी लीन होतो.तेथेच आम्हाला जीवनाचे सारसर्वस्व भेटते. तेच आम्हाला सुखशांती मिळवून देते. म्हणूनच आम्ही टाळमृदंगाचा गजर करत वैष्णवाच्या मेळ्यात सहभागी होऊन आनंदाने नाचत भक्तीरसात न्हाऊन निघतो

.दया,क्षमा, शांती हे सारे काही आम्ही विठ्ठलाच्या तन्मयतेने केलेल्या कीर्तनातूनच जाणतो. विठ्ठला शिवाय आम्ही काहीच जाणवत नाही. मग आम्ही जप तप साधना करण्यासाठी काय म्हणून वनवासात एकांतात राहून तपश्चर्या करावी.आम्ही जनसमुदायात मिसळताना आनंदी होतो. तेच आम्हाला फलदायी वाटते. हितकारक वाटते. परमार्थ, अध्यात्म, विरक्ती हे शब्द आम्हाला फारच बोजड वाटतात. त्यांचा अर्थ ही आम्हाला निपटणे कळत नाही.ते सारेच कठीण आहे.अवघड आहे.म्हणून त्या जंजाळात पडावेसेही वाटत नाही. देवाचे भक्तीभावाने नामस्मरण करा. आनंदाने नाचा.तुम्हाला सर्व काही तेथेच मिळेल. त्यासाठी वनात राहून तपश्चर्या करण्याची जरुरी नाही. विविध प्रकारची कर्मकांडे, यज्ञयाग वृतवैकल्ये करण्यात ही काही अर्थ नाही.

.सर्वसामान्य माणसांच्या आनंदायी मेळ्यात राहूनच परमोच्च पारमार्थिक आनंद परम सुखाने लुटता येतो. भक्ती रसाने तुडूंब भरलेल्या अमृतसागरात डुंबत असताना परमेश्वरानेच दिलेल्या या देहाकडे मी उदास वाण्याच्या नजरेने मी का पाहावे आणि त्याला कशासाठी दंडीत करावे. लोकांच्यात सामील होऊन,त्यांच्यात मिळूनमिसळून विठ्ठलाचे नामस्मरण व नामसंकीर्तन करत रहाणे हाच परमार्थ करण्याचा अत्यंत सोपा पण अतिशय प्रभावी मार्ग आहे. तो मार्गच आपल्या मनोकामना पूर्ण करील. तोच आपल्याला सर्व काही शिकवील.म्हणूनच परमार्थ करताना विषेश आणि विशिष्ट कर्मकांडे करण्याची आवश्यकता नाही. भक्ती मार्ग इतका सहज आणि सोपा असताना तो अवघड आणि दुस्तर का करावयाचा.?

 *

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २४८ – होता था घर एक ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  – होता था घर एक)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २४८ ☆

होता था घर एक ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

शायद बच्चे पढेंगे’

होता था घर एक.’

शब्द चित्र अंकित किया

मित्र कार्य यह नेक.

*

अब नगरों में फ्लैट हैं,

बंगले औ’ डुप्लेक्स.

फार्म हाउस का समय है

मिलते मल्टीप्लेक्स.

*

बेघर खुद को कर रहे

तोड़-तोड़ घर आज.

इसीलिये गायब खुशी

हर कोई नाराज़.

*

घर न इमारत-भवन है

घर होता सम्बन्ध.

नाते निभाते हैं जहाँ

बिना किसी अनुबंध.

*

बना फेसबुक भी ‘सलिल’

घर की नयी मिसाल.

नाते नव नित बन रहे

देखें आप कमाल.

*

बिना मिले भी मन मिले,

होती जब तकरार.

दूजे पल ही बिखरता

निर्मल-निश्छल प्यार.

*

मतभेदों को हम नहीं

बना रहे मन-भेद.

लगे किसी को ठेस तो

सबको होता खेद.

*

नेह नर्मदा निरंतर

रहे प्रवाहित मित्र.

फेसबुक’ घर का बने

सलिल’ सनातन चित्र.

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २४६ – “उन को इस बातका गुमा न हुआ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत उन को इस बातका गुमा न हुआ...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २४६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “उन को इस बातका गुमा न हुआ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

कमीज में जो बटन थे वे सभी

टूट गये ।

रह गये वही लोग थे जो पीछे

छूट गये ॥

 

उन को इस बातका गुमा न हुआ

था लेकिन,

करें क्या उनकी सिफारिश के

बन्द फूट गये ॥

 

इस इमारत में नहीं खिडकी

कोई दरवाजा,

कहाँ से आये थे वे लोग

हमें लूट गये॥

 

ये बात और सारा घर था

मेरा कसरती,

फिर भी दुबले वे सभी लोग

मुझे कूट गये ॥

 

उसे नशा न था पर रही

कौन सी थी जिद

उखड़ गया तभी जब गले में

दो घूँट गये ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 ४.८.२०२५

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १९ – कविता – हम शिवा के वंशज… ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १९ ☆

☆ कविता  ☆ ~ हम शिवा के वंशज ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

 देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा… 1

*

हिमगिरी सा ताज सिर पर,

सागर चरण पखारे

 विंध्य  के शिखर से

माँ भी शक्ति निहारे

 बाग जलियांवाला,

मेरठ की क्रांति बोली

 काकोरी, चौरी चौरा,

 बलिया की बागी टोली

 यमुना के तट पर मथुरा,काशी, प्रयाग, गंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…2

 *

 नाना की लाड़ली थी,

झांसी की लक्ष्मी बाई

 सौ मिल का सफर कर,

 कालपी थी आई

लड़की नही थी वह,

 जलती सी एक चिंगारी

थी दुर्गा, चंडी, शक्ति ,

काली की थी कटारी

हम शान्ति दूत भी है, शिव ग्रीव के भुजंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा… 3

 *

 मंगल, भगत, उधम,

उद्धम मचाये आंधी

थे क्रांति वीर योद्धा,

नेता सुभाष, गांधी

 अशफाक, बिस्मिल सिर पर

 शोभता कफन था

 आजाद बोस खुदी  के

  श्वास में वतन था

ये क्रांति वीर योद्धा,सच में थे मस्त मलंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…4

 *

श्री राम -कृष्ण की है,

प्यारी धरा हमारी

नानक,कबीर, तुलसी,

 के ज्ञान की ये क्यारी

यह वीर बिरसा मुंडा,

कलाम की है धरती

स्वामी विवेकानंद के

व्याख्यान को जो सुनती

रसखान, सूर मीरा, रैदास का मन चंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…5

 *

 शक्ति पीठ मंदिर,

ज्योतिर्लिंग  शिवाला

कहता है जय भवानी,

 मेवाड वाला भाला

माँ भारती के माथे

कश्मीर सा मुकुट है

माँ के चरण की पैजन,

 सागर का सुन्दर तट है

दो भव्य हैं भुजाये कच्छ, कंचन जंघा

देखो लहर रहा है, किस शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…6

 *

 आकाश, अग्नि, तेजस

हम त्रिशूल वाले

 हम चंद्रयान को भी,

 चांद पर उतारे

 ब्रह्मोस की गरज हम,

राफेल दम हमारा

 जिसने की शरारत

घुसकरके हमने मारा

 हम कोटिक युवा शक्ति  होने न देंगें दंगा

देखो लहर रहा है, किस शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…7

हम समृद्ध वृहद भारत,

बढ ती अर्थ शक्ति

विज्ञान कला कौशल,

हम है एक हस्ती

क्षय मुक्त हिन्द होगा,

संकल्प है हमारा

हम स्वास्थ्य वीर योद्धा

हमसे करोना हारा

हम आत्म निर्भर भारत, बजता हमारा डंका

देखो लहर रहा है, किस शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…8

 ♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 274 ☆ वटवृक्ष…  ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # 274 ?

☆  वटवृक्ष… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

गावाकडच्या  दारासमोरचा

 वटवृक्ष,

खूप आवडायचा लहानपणी,

त्याची ती लालचुटूक फळं,

ते खायला येणारे लाल चोचीचे पोपटी रावे!

पारंब्यांवर मन उगीचच घुटमळत  रहायचे !

बायका यायच्या वटपौर्णिमेला,

हातात धागा घेऊन,

मागायच्या दान,

“जन्मोजन्मी हाच नवरा मिळो” !

म्हणायच्या सावित्रीची गाणी,

सत्यवान जिवंत झाल्याची कहाणी,

ऐकवायच्या एकमेकींना—–

त्या ग्रामीण बायका!

अंब्याचं वाण द्यायच्या,

एकमेकींना!

पडायच्या पाया थोरामोठ्यांच्या!

किती भाबड्या होत्या,

त्यांच्या भावना !

 

काॅलेज मधे होते शिकत,

तेव्हा साजरे झाले महिला वर्ष!

महिला चळवळींनी जोर धरला,

महिला सजग झाल्या!

समानतेची मागणी करू लागल्या !

उफाळून आला स्त्रीवाद!

 

आज कुंडीत चाळीस वर्षापूर्वी,

सासुबाईंनी,

लावलेल्या वडाच्या फांदीचा

वटवृक्ष झालाय!

 

त्याला पाणी घालताना विचार आला,

हे बोन्साय नव्हे ,

गावाकडच्या मातीत लावलं तर  फोफावेलही……

 

घरात येऊन टी.व्ही.लावला तर,

सगळ्याच मालिकांमधून…..

वटपूजेचे इव्हेंटस् सुरू…..

आणि बातम्यांमधे….हनिमूनला गेलेल्या जोडप्यातील….

नवरीच्या..कुटील कारस्थानी सत्यकथा!

 

आठवली बालपणी पाहिलेली,

खेडूत बायकांची,

वडाची पूजा आणि फेरगाणी!

 

त्यापासून करून घेतलेली मुक्तता!

                आणि

आज पुन्हा..फेसबुक, टी.व्ही.मालिकेतला वटपौर्णिमेचा जल्लोष!

मला माझ्याच मनाचं

बोन्साय झाल्यासारखं वाटतंय,

वटवृक्ष होता… होता….

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 287 ☆ व्यंग्य – हमारे कार्यालय ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘हमारे कार्यालय‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 287 ☆

☆ व्यंग्य ☆ हमारे कार्यालय

साढ़े  दस बजे कार्यालय खुलते हैं। खुलने का मतलब यह नहीं कि कर्मचारी अपनी सीटों पर आ जाते हों। खुलने का मतलब सिर्फ यह है कि साढ़े दस के बाद कभी भी दफ्तर के पट खुल जाते हैं। चपरासी मेज़ों पर कपड़ा मारने लगता है। जहां झाड़ू लगाने का रिवाज़ है वहां झाड़ू लगने लगती है। जो लोग साढ़े दस को साढ़े दस समझ कर आ जाते हैं वे झाड़ू से उठे गर्द-ग़ुबार से बचने के लिए बाहर भीतर परेड करते हैं।

ग्यारह बजे के आसपास कर्मचारी दफ्तर के कंपाउंड में घुसने लगते हैं। कंपाउंड में प्रवेश करते ही ड्यूटी शुरू हो जाती है। अपनी मेज़ पर पहुंचना ज़रूरी नहीं होता। बाहर ही सहयोगी, मित्र मिल जाते हैं। दो घड़ी बात करने का, पारिवारिक हाल-चाल लेने का, डी.ए. और बोनस के बारे में पूछने का मन होता है। इसके बाद  बरामदे के किसी कोने में गुटखा थूक कर कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया जाता है। कार्यालय का कोई कोना असिंचित नहीं होता। लोग आते-जाते, सीढ़ियों से उतरते-चढ़ते निष्ठा से कोनों को सींचते हैं।

सवा ग्यारह बजे भी आधी मेज़ें खाली होती हैं। पूछने पर सहयोगी सच्चा सहयोगी-धर्म निबाहते हैं— ‘अभी आ जाएंगे’। फिर जोड़ देते हैं —‘अगर छुट्टी पर नहीं हुए तो।’ ज़्यादा पूछताछ करने वाले को डपट दिया जाता है— ‘अभी ग्यारह ही तो बजे हैं, थोड़ा घूमघाम कर आ जाओ।’ अगर चुस्ती और नियमितता का आदी कोई आदमी किसी काम का मारा दफ्तरों में आ जाता है तो यहां की चाल देखकर सकते में आ जाता है।

दफ्तर में प्रवेश करने पर कुछ मेज़ें खाली मिलती हैं, लेकिन कुछ मेज़ों के इर्द-गिर्द पूरा दफ्तर मिल जाता है। इन्हीं मेज़ों पर दो-चार लोग बैठे होंगे, बाकी इनके आसपास कुर्सियों पर होंगे। अबाध चर्चा चलती है— घोटालों की, क्रिकेट टेस्ट की, संभावित ट्रांसफरों की, नेताओं द्वारा साहब की रगड़ाई की। इसी बीच अगर काम का मारा कोई दफ्तर में आ जाता है तो वह कभी खाली  मेज़ को और कभी गप्पों में मशगूल इस गुच्छे को देखता है। बातचीत में बाधा डालने और रंगभंग करने की उसकी हिम्मत नहीं होती क्योंकि कर्मचारी पर काम करने की बाध्यता नहीं होती। ज़्यादा अकड़ दिखाओगे तो इतने चक्कर लगाने पड़ेंगे कि अंजर- पंजर ढीला हो जाएगा। क्या करोगे? शिकायत करोगे? जाओ, जहां जाना हो चले जाओ। अब तुम खड़े रहो, हम जा रहे हैं चाय पीने। लौट कर आने तक खड़े रहोगे तो सोचेंगे।

कर्मचारी-नेताओं की कुर्सियां हमेशा खाली रहती हैं। जन-सेवा में लगे रहते हैं, काम की फुरसत कहां? अफसर की हिम्मत कहां जो ज़बान हिलाए। नेता सुबह से शाम तक व्यस्त रहते हैं— मंहगाई, बोनस, भत्तों के लिए लड़ने में, अखबारों में विज्ञप्तियां देने में। एक ही काम वे नहीं कर सकते —कर्मचारियों को काम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए कहना। जो नेता कर्मचारियों को काम करने के लिए कहता है वह लोकप्रिय नहीं होता। इसलिए नेता ज़माने की नब्ज़ देखकर काम करते हैं।

कोई कर्मचारी मजबूरी में मेज़ पर सिर रखे झपकी लेता दिखता है। बीच-बीच में सिर उठाता है, अधखुली आंखों से इधर-उधर देखता है, फिर पूरा मुंह फाड़कर उबासी लेता है। लगता है गाल की खाल फट जाएगी। इसके बाद धीरे-धीरे फिर सिर को मेज़ पर टिका देता है। एकाध बार बीच में बुदबुदाता है— ‘बोर हो गए। कोई काम नहीं है।’

एक और मेज़ के पीछे एक ज़्यादा समझदार युवक है। वह काम के अभाव में कर्नल रंजीत या अमिताभ या कामिनी का उपन्यास पढ़ रहा है। बीच में कोई फाइल आकर उसके अध्ययन में बाधा डालती है। उसे फुर्ती से निपटा कर वह अगली मेज़ की तरफ धकेल देता है और फिर उपन्यास में डूब जाता है।

हमारे दफ्तरों की एक विशेषता यह है कि वहां काम न रहने पर भी किसी को बात करने की फुरसत नहीं होती। काम से आये आदमी को कर्मचारी बबर शेर की नज़र से देखता है। उसकी नज़र पढ़ते ही आदमी झुलस कर सिकुड़ जाता है। एक बार बाबू की नज़र पड़ने के बाद वह गिन गिन कर कदम रखता, दबे पांव मेज़ की तरफ बढ़ता है। दफ्तर के दरवाज़े में घुसते ही आदमी का मनोबल नीचे की तरफ गिरता है। आवाज़ धीमी हो जाती है। बहुत से लोग हकलाने लगते हैं। यहां सिर्फ छात्र-नेताओं और स्थानीय नेताओं की आवाज़ ही बुलन्द रह पाती है, बाकी लोग ज़्यादातर मिमियाते,चिरौरी करते दिखते हैं। अगर बाबू का मूड ठीक हुआ और टाइम हुआ तो काम कर देता है।

झपकी लेने वाले बाबू के सामने बड़ी देर से एक आदमी खड़ा अपनी उंगलियां मरोड़ रहा है। कुछ देर पहले उसने बाबू से कुछ पूछा था। सहमी हुई आवाज़ में दो-तीन बार दोहराने के बाद बाबू ने अपना सिर उठाया था और कुछ जवाब दिया था। जवाब इस तरह दिया गया था कि आदमी कुछ समझ नहीं पाया। बाबू ने फिर अपना सिर  मेज़ पर रख दिया था। आदमी ने फिर से बाबू से पूछा था। अब की बार बाबू ने सिर उठा कर भौंहें चढ़ाकर गुर्रा कर इस तरह जवाब दिया कि आदमी घबरा गया। जवाब फिर भी उसके पल्ले नहीं पड़ा। बाबू ने सिर वापस मेज़ पर टिका दिया।

आदमी अब पांव घसीटता बाबुओं के गुच्छे के पास पहुंच गया है। बातचीत में थोड़ा विराम होते ही वह अपना सवाल दोहराता है। एक बाबू गुटखा चबाते, कोई दो शब्दों का जवाब उसकी तरफ फेंक कर मुंह घुमा लेता है। गुटखे के उस पार से आया हुआ यह जवाब भी आदमी की पकड़ में नहीं आता। बाबू  फिर गप्पों में मशगूल हो गया है। अब उसकी सवाल पूछने की हिम्मत नहीं पड़ती।

ढीले पांवों से वह उपन्यास वाले बाबू की मेज़ पर पहुंचता है। भिनभिन करके अपना सवाल पूछता है। बाबू शायद सस्पेंस या रोमांस के शिखर पर है। वह बिना किताब से सिर उठाये कोई जवाब टपका देता है। जवाब फिर आदमी के सिर के ऊपर से गुज़र जाता है। हिम्मत बटोर कर वह फिर सवाल दोहराता है। अब बाबू उपन्यास से सिर उठाता है और ज़बान का कुछ बेहतर उपयोग करके कहता है, ‘सोहन बाबू के पास जाओ।’ ‘जाओ’ के साथ ही वह वापस सस्पेंस या रोमांस की दुनिया में उतर जाता है।

अब आदमी में यह हिम्मत नहीं कि पूछे कि सोहन बाबू कौन से हैं और कहां बिराजते हैं। हार कर वह बाहर बेंच पर एक टांग ऊपर रखकर बैठे चपरासी के पास पहुंचता है, बड़ी  शिष्टता से पूछता है, ‘सोहन बाबू कौन से हैं?’

चपरासी भी दुर्वासा के वंश का है। भृकुटि  तान कर मेज़ पर सोये बाबू की तरफ इशारा करता है, कहता है, ‘वह तो रहे। और कौन से हैं?’

आदमी वापस लौट कर मेज़ पर निद्रामग्न बाबू के सामने पहुंचता है। बाबू की नींद में खलल डालने के लिए उसका मन अपराधबोध से ग्रस्त है। वह फिर पुकार कर बाबू को इस नश्वर संसार में वापस बुलाता है। बाबू का सिर बांहों के ऊपर से धीरे-धीरे उठता है। आदमी कुछ दांत ज़्यादा निकालकर कहता है, ‘मेरी फाइल शायद आपके पास है।’

सोहन बाबू फिर  जबड़ा-तोड़ उबासी लेते हैं, फिर कहते हैं, ‘है न। हम तो आपसे दो-दो बार कहे कि हमारे पास है। आप सुने नहीं क्या?’

आदमी राहत  की सांस लेता है, कहता है, ‘तो फिर कष्ट करके निकाल दीजिए न।’

सोहन बाबू कष्ट करके अपना बायां हाथ उठाकर घड़ी देखते हैं, कहते हैं, ‘आधा घंटा में लंच होने वाला है। तीन बजे आइए, तभी देखेंगे।’

उनका सिर फिर मंज़िले-मक्सूद की तरफ झुकने लगता है और आदमी कुछ देर तक उनकी छवि निहारने के बाद पांव घसीटता दरवाज़े की तरफ बढ़ जाता है। चलते-चलते वह देखता है कि गुच्छे वाले बाबुओं ने अब ताश निकाल लिये हैं और उपन्यास वाला बाबू किताब पर झुका मन्द मन्द मुस्करा रहा है। लगता है हीरो हीरोइन का इश्क परवान चढ़ गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆‘ग़ज़ल – आसमान बन सकूँ’ ☆ डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘ ☆

डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘

☆ ‘ग़ज़ल – आसमान बन सकूँ’ ☆ डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘ ☆

बेघर के लिए छत और मकान बन सकूँ

दिल चाहता है मैं भी, आसमान बन सकूँ ।।

*

बरसाऊँ नेह इतना, बादल में छुप के मैं

बस प्रेम-प्यार की मैं, दास्तान बन सकूँ।।

*

जुगनू सी चमक से करूँ, हर घर में मैं उजाला

ग़म की न रहे रात,बस विहान बन सकूँ।।

*

जीने की ख़्वाहिशों के,मैं रंग भरूँ इतने

पलकों में ख़्वाब, ख़ुशियों का जहान बन सकूँ।।

*

मुस्कान हो हर लब पर, अरमान यही है

है जुस्तजू कि,जश्न का सामान बन सकूँ।।

*

हर हाल में बेहाल, आज ज़िन्दगी यहाँ

क्या लिक्खूं कि,हर लब की मुस्कान बन सकूँ।।

*

हमने ‘उदार ‘ रह कर, सबको गले लगाया

सबके दिलों में, प्रेम की पहचान बन सकूँ।।

© डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘

कैलीफ़ॉर्नियां, अमेरिका

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ || चैत्रपालवी || ☆ सौ. शुभदा भा. कुलकर्णी (विभावरी) ☆

सौ. शुभदा भास्कर कुलकर्णी (विभावरी)

? कवितेचा उत्सव ?

☆ || चैत्रपालवी || ☆ सौ. शुभदा भा. कुलकर्णी (विभावरी) 

साद देतसे चैत्राला, बहरातला वसंत.

गुढी उभारून करु नववर्षाचे स्वागत..

*

जिर्ण पर्णे टाकुनिया वृक्ष नव्याने नटले

मोहक चैत्रपालवी फांदी-फांदीवर डोले..

*

विविध रंगी फुलांचा सुगंध दरवळला

छत्र घेऊनी उन्हाचे गुलमोहर फुलला..

*

आम्रतरु मोहरला बाळकै-या खुणावती

हर्षभरे फांदीवरी राघू-मैना गाणी गाती..

*

रसभ-या फळांतुनी अमृतरस पाझरे..

गोड -आंबट द्राक्षांचे वेल दिसती साजरे…

*

वळिवाची एक सर तप्त ऊनं शमविते..

थंडगार वा-यावर हिरवाई डोलविते…

*

निसर्ग हा खुलेपणी भरभरुन देतसे..

मनी ‘चैत्रपालवी ‘ जपण्यास सांगतसे…

💦🌨️.

©  शुभदा भा.कुलकर्णी (विभावरी)

कोथरूड-पुणे.३८.

   मो.९५९५५५७९०८ 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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