हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 63 – आशाओं के द्वार खुलेंगे .. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना आशाओं के द्वार खुलेंगे…… । )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 63 ☆

☆ आशाओं के द्वार खुलेंगे ….  ☆  

 

सिकुड़े सिमटे पेट

पड़े रोटी के लाले

दुर्बल देह मलीन

पैर में अनगिन छाले

मन में है उम्मीद

कभी कुछ तो बदलेगा

इस बीहड़ में कब तक खुद को रहे संभाले।।

 

सूरज के संग उठें

रात तक करें मजूरी

घर आकर सुस्ताते

बीड़ी जलाते सोचें,

क्यों रहती है भूख

हमारी रोज अधूरी,

कौन छीन लेता है अपने हक के रोज निवाले।।

 

अखबारों में

अंतिम व्यक्ति की तस्वीरें

बहलाते मंसूबे

स्वप्न मनभावन लगते

और देखता फिर

हाथों की घिसी लकीरें

क्या अपनी काली रातों में होंगे कभी उजाले।।

 

अपना मन बहलाव

एक लोटा अरु थाली

इन्हें बजा जब

पेट पकड़कर गीत सुनाते

बहती मिश्रित धार

बजे सुख-दुख की ताली।

आशाओं के द्वार खुलेंगे, कब बंधुआ ताले।।

 

रोज रात में

पड़े पड़े गिनते हैं तारे

जितना घना अंधेरा

उतनी चमक तेज है

क्या मावस के बाद

पुनम के योग हमारे

बदलेंगे कब ये दिन और छटेंगे बादल काले।।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 44 – बापू के संस्मरण-17- मैं फरिश्ता नहीं, छोटा सा सेवक हूँ ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “महात्मा गांधी और राष्ट्र भाषा”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 42 – बापू के संस्मरण – 17 – मैं फरिश्ता नहीं, छोटा सा सेवक हूँ ☆ 

नोआखली-यात्रा के समय की बात है । गांधीजी चलते-चलते एक गांव में पहुंचे ।

वहां किसी परिवार में नौ-दस वर्ष की एक लड़की बहुत बीमार थी । उसके मोतीझरा निकला था । उसी के साथ निमोनिया भी हो गया था । बेचारी बहुत दुर्बल हो गई थी । मनु को साथ लेकर गांधीजी उसे देखने गये । लड़की के पास घर की और स्त्रियां भी बैठी हुई थीं । गांधीजी को आता देखकर वे अंदर चली गईं । वे परदा करती थीं ।

बेचारी बीमार लड़की अकेली रह गई । झोंपड़ी के बाहरी भाग में उसकी चारपाई थी । गांव में रोगी मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटे गंदी-से-गंदी जगह में पड़े रहते । वही हालत उस लड़की की थी ।

मनु उन स्त्रियों को समझाने के लिए घर के भीतर गई।  कहा, ” तुम्हारे आंगन में एक महान संत-पुरुष पधारे हैं । बाहर आकर उनके दर्शन तो करो ।” लेकिन मनु की दृष्टि में जो महान पुरुष थे, वही उनकी दृष्टि में दुश्मन थे । उनके मन में गांधीजी के लिए रंचमात्र भी आदर नहीं था । स्त्रियों को समझाने के बाद जब मनु बाहर आई तो देखा, गांधीजी ने लड़की के बिस्तर की मैली चादर हटाकर उस पर अपनी ओढ़ी हुई चादर बिछा दी है । अपने छोटे से रूमाल से उसकी नाक साफ करदी है । पानी से उसका मुंह धो दिया है । अपना शाल उसे उढ़ा दिया है और कड़ाके की सर्दी में खुले बदन खड़े-खड़े रोगी के सिर पर प्रेम से हाथ फेर रहे हैं । इतना ही नहीं बाद में दोपहर को दो तीन बार उस लड़की को शहद और पानी पिलाने के लिए उन्होंने मनु को वहां भेजा । उसके पेट और सिर पर मिट्टी की पट्टी रखने के लिए भी कहा. मनु ने ऐसा ही किया । उसी रात को उस बच्ची का बुखार उतर गया ।

अब उस घर के व्यक्ति, जो गांधीजी को अपना दुश्मन समझ रहे थे, अत्यंत भक्तिभाव से उन्हें प्रणाम करने आये  बोले,”आप सचमुच खुदा के फरिश्ते हैं । हमारी बेटी के लिए आपने जो कुछ किया, उसके बदले में हम आपकी क्या खिदमत कर सकते हैं?” गांधीजी ने उत्तर दिया, “मैं न फरिश्ता हूं और न पैगम्बर , मैं तो एक छोटा-सा सेवक हूं। इस बच्ची का बुखार उतर गया, इसका श्रेय मुझे नहीं है । मैंने इसकी सफाई की । इसके पेट में ताकत देने वाली थोड़ी सी खुराक गई, इसीलिए शायद बुखार उतरा है ।

अगर आप बदला चुकाना चाहते हैं तो निडर बनिये और दूसरों को भी निडर बनाइये. यह दुनिया खुदा की है । हम सब उसके बच्चे हैं । मेरी यही विनती है कि अपने मन में तुम यही भाव पैदा करो कि इस दुनिया में सभी को जीने-मरने का समान अधिकार है ।”

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 14 – वक्त कभी रुकता नहीं ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता वक्त कभी रुकता  नहीं ) 

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 14 – वक्त कभी रुकता नहीं ☆

 

जीवन वक्त के पीछे चलता है, वक्त कभी रुकता नहीं,

हम वक्त को नजरअंदाज करते है वक्त कभी नजरअंदाज करता नही ||

 

जीवन-चक्र वक्त का गुलाम है, वक्त कभी टूटता नही,

मत करो नजरअंदाज वक्त को,वक्त कभी वापिस लौट कर आता नहीं ||

 

दिन रात चलता है वक्त, वक्त घड़ी देखकर चलता नहीं,

चकते-चलते जीवन रुक जाता है मगर वक्त कभी रुकता नहीं ||

 

हिम्मत हारने से कुछ नहीं होता, वक्त के साथ हम चलते नहीं,

ये हमारी फिदरत है वक्त के भरोसे रह जिंदगी में कुछ करते नही ||

 

हम भले बुरे में वक्त का बंटवारा करते, वक्त कभी कुछ कहता नहीं,

अच्छा बुरा वक्त हमारी सोच है, वक्त अपना बंटवारा करता  नहीं ||

 

वक्त के संग जिंदगी गुजार ले, वक्त जिंदगी के लिए रुकता नहीं,

जिंदगी झुक जाएगी वक्त के आगे, वक्त जिंदगी के आगे कभी झुकता नहीं ||

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 65 – कोरोना ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक समसामयिक विषय पर आधारित विचारणीय कविता  कोरोना। सुश्री प्रभा जी ने इस कविता के माध्यम से  वैश्विक महामारी पर गंभीर विमर्श किया है। आज इस वाइरस के कारण मानवजाति के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे। आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 65 ☆

☆ कोरोना ☆

प्रथम पाहिली बातमी,

चीनमध्ये पसरलेल्या,

या भयानक विषाणू संसर्गाची,

वटवाघूळाच्या भक्षणाने,

झालेल्या आजाराची!

 

अनेक अफवा, तर्कवितर्क,

हा विषाणू पक्षाप्राण्यातून आलाय

की प्रयोगशाळेत तयार केलाय,

मानवाने मानुष्यजातीच्या

विनाशासाठी…….??

 

जगभर पसरलेली ही लागण,

सगळेच व्यवहार ठप्प!

जग थांबले आहे जणू

स्टॅच्यूच्या खेळासारखे!!

 

मी घरात बंद गेले सहा महिने,

विश्वशांती,विश्वाचे आरोग्य,

सांभाळणारा विधाताही

बंद देवळात…..

आणि आम्ही करतोय प्रार्थना…

ए मालिक तेरे बंदे हम…..

 

आम्ही करतोय कविता,

घेतोय वाफ नाकातोंडात

व्हाटस् एप्प वर वाचतोय

सुरक्षित रहाण्याचे उपाय….

 

मोबाईल वर वाजतेय धून

बाहेर न पडण्याविषयी…..

 

आणि मैत्रीण करतेय आग्रह…

गाठीभेटीचा….

पण गावात …शहरात…गल्लीत…

पसरलेला हा कोरोना–कोविड–

नाही मुभा देत कुणाच्याच घरी

जाण्याची अथवा कुणाला

घरी बोलवण्याचीही….

 

या उमाळ्याच्या गाठीभेटींपेक्षा

आवश्यकता आहे अस्तित्व

टिकविण्याची, स्वतःचं आणि इतरांचंही…..

घरात राहूनच जिंकायचे आहे युद्ध

ज्याचं त्यालाच….

सांगून टाकते निर्वाणीचं….

व्हाटस् एप्प च्याच भाषेत…

“घरी हूँ मैं बरी हूँ मै”

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – सप्तदशोऽध्याय: अध्याय (24) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद)

(ॐ तत्सत्‌के प्रयोग की व्याख्या)

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।

प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌।।24।।

ब्रह्मवादी इससे ही सब ‘ओम‘ का कर उच्चार

यज्ञ, दान, तप, कर्म का करते हैं व्यवहार ।।24।।

 

भावार्थ :  इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ‘ॐ’ इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।।24।।

Therefore, with the utterance of “Om” are the acts of gift, sacrifice and austerity as enjoined in the scriptures always begun by the students of Brahman.।।24।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  राजभाषा दिवस के अवसर पर आपके अप्रतिम दोहे । )

  ✍  लेखनी सुमित्र की – दोहे  ✍

 

मन की मन को पढ़ सके, हुआ कौन विद्वान।

परिभाषा निस्सीम, है असीम अनुमान।।

 

कितने तल है बताये, मन के कितने कोण।

कृष्ण कभी, अर्जुन कभी, अश्वत्थामा द्रोण।।

 

मन दुर्योधन द्रौपदी, कंस,यशोदा नंद।

मन राधा गोपी का मन है मुरली छंद।।

 

ओर छोर मन का नहीं, छोड़ा है आकाश ।

लघुतम निर्मल रूप है, जैसे किरण उजास।।

 

गति को गति देते रहे, मारुति पुत्र हनुमंत।

मन की गति जानी नहीं, पतझड़ कभी बसंत।।

 

मन भेाैर, मन काग है, मन है शिखी  मराल।

मन ही कड़वी नीम है, मन ही मिष्ठ रसाल।।

 

बेजा कब्जा भूमि पर,अनाधिकार है  यत्न ।

मन मनुष्य का डोलता, जहां पड़े हो रत्न।।

 

मन का मोती बिंध गया, गया चित्त का चीर।

मन के हाथों बिक गए, इतने ग़ालिब मीर ।।

 

जो कुछ मन को जोड़ता, क्या है उसका नाम ।

निर्मल धारा प्रेम की, मधुता भरे  प्रणाम।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 51 ☆  सबको जाना ही है ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  एक भावप्रवण रचना “ सबको जाना ही है”। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 51 ☆

☆  सबको जाना ही है ☆

 

हरदम का साथ कहाँ, सबको जाना ही है

ज़िंदगी की रस्में हैं, उन्हें निभाना ही है

 

मंज़र पल में बदलता, कहीं भी मुकाम नहीं

बादल हों चाहें ग़म के, हमें मुस्कुराना ही है

 

आसमान में उड़ते परिंदे, हार मानते कहाँ

पतंगों सा ख़्वाबों को, हमें उडाना ही है

 

सूखता शजर गर्मियों में, बारिश में खिल उठता

कितनी भी मुश्किलें हों, गीत गुनगुनाना ही है

 

मिटटी में जिस्म होगा, रह जायेंगे मीठे बोल

जो सरगम अमर हो जाए, वो तो गाना ही है

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 64 – तुरपाई ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  मानवीय संवेदनशील रिश्तों पर आधारित एक अतिसुन्दर एवं सार्थक लघुकथा  “ तुरपाई ”।  निःस्वार्थ  सेवा /सहयोग का फल ईश्वर आपको कब देंगे आप नहीं जानते। एक भावप्रवण एवं सुखान्त लघुकथा । इस सार्थक  एवं  भावनात्मक लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 64 ☆

☆ लघुकथा – तुरपाई ☆

गांव में एक अनाथ बच्चा ‘तरुण’। घूम – घूम कर माँग कर खाता था। पता नहीं कब और कहाँ से आया। छोटा सा था और सब की बातें सुनता रहता था।

बस्ती में एक एक घर उसे पहचानने लगे थे। धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।  अब वह कभी-कभी किसी का काम कर देता था और जो मिल जाता था खाकर अपना गुजारा करता। जहां नींद लगता एक पट्टी डाल सो जाया करता था।

गांव में एक दर्जी जिनके पास अपना कहने को कोई नहीं और संपत्ति के नाम पर कहने को कुछ भी नहीं था। एक सिलाई मशीन और टूटी फूटी झोपड़ी जो उन्होंने एक पेड़ और खंभे की आड़ से बना रखा था। जिसमें मशीन रखकर हर समय फटा पुराना सीते हुए दिखाई देते थे।

कभी-कभी तरुण वहीं पर आकर बैठता और कहता… बाबा मुझे कुछ बनना है कुछ काम सिखा दो। यहाँ पर कोई मुझे काम देना नहीं चाहता। दर्जी के मन में रोज सुनते सुनते दया की भावना उमड़ उठी। उन्होंने कहा.. चल मेरे भी कोई नहीं है और तू भी अनाथ है।

आज से तू और मैं एक नया काम करते हैं “रिश्तो की तुरपाई” तेरा भी कोई नहीं और मुझे भी एक सहारा चाहिए। फटे पुराने कपड़ों पर तरुण धीरे-धीरे तुरपाई का काम करने लगा।

मन में स्कूल जाने की चाहत हुई उसने कहा बाबा मुझे स्कूल जाना है। उन्होंने कहा.. चला जा और पढ़ाई कर धीरे-धीरे वह पढ़ाई से आगे बढ़ने लगा। गरीब जान सरकारी स्कूल से फीस माफ हो गई। उसे पढ़ने के लिए बाहर जाना पड़ा।

दर्जी ने सोचा चला गया। चलो अच्छा है जीवन सुधर जाएगा उसका। उसकी अपनी जिंदगी है।

कुछ वर्षों में सब भूल जाएगा।

वर्षों बाद एक दिन अचानक एक बार गाँव में अतिक्रमण हटाओ के अंतर्गत सभी झुग्गी झोपड़ियों को तोड़ा जा रहा था। सयाने हो चुके दर्जी परेशान हो इधर उधर भागने लगे और गिड़गिड़ा कर कहने लगे.. अब इस उमर में मैं कहाँ जाऊँगा। मुझे यहीं रहने दो मेरी जिंदगी कितनी बची है। परंतु उसमें से कुछ आदमी निकलकर सारा सामान गाड़ी में भरने लगे और कहने लगे अब तुम्हें यहाँ नहीं रहना है साहब का आदेश है। डरकर दर्जी एक किनारे खड़ा हो गया। तुम्हें जहां छोड़ना है चलो गाड़ी में बैठो।

असहाय दर्जी अपने टूटे फूटे सामान और एक सिलाई मशीन की लालच में गाड़ी में बैठ गया।

गाड़ी एक दुकान के पास जाकर रुक गई। दर्जी ने सोचा यहाँ पर क्यों रुक गए? चश्मे से देखा दुकान के बोर्ड पर लिखा हुआ था “तुरपाई घर”। उसे समझते देर नहीं लगी। हाँफते हुए इधर – उधर देख अपने तरुण की खोज करने लगा। तरुण भी वहाँ बाहें फैला अपने रिश्ते को समेटने के लिए बेताब खड़ा था। आज सचमुच तुरपाई से भरपाई हो गई। दोनों ने गले लग जी भर कर रोया। सभी कर्मचारी कभी फटे हाल दर्जी और कभी अपने साहब को देख रहे थे। उनका आदेश था एक-एक सामान को संभाल कर दुकान पर लगा दिया जाए।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 64 ☆ सुगंधाचा तोरा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक समसामयिक एवं भावप्रवण कविता “सुगंधाचा तोरा”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 64 ☆

☆ सुगंधाचा तोरा ☆

 

साऱ्या फुलात वेगळी

छान भासते ही कळी

दुमड ही पाकळीची

जशी गालावर खळी

 

तिच्या सुगंधाचा तोरा

होता भाळलेला वारा

दोष फक्त त्याचा नाही

तीही पडेते ना गळी

 

कधी वेणी कधी हार

फूल दोरा झाले यार

जीव जीवात गुंतता

हळू उमलते कळी

 

पाकळीचे हे पदर

जसे मोकळे अधर

माशा घोंगावत आल्या

डंख दिला होता भाळी

 

आली वादळी वरात

होती कळी ही भरात

सुन्या सुन्या या बागेचा

हिरमुसलेला माळी

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 16 – पीली महकती यह सुबह …. ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “पीली महकती यह सुबह …..”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 16– ।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ पीली महकती यह सुबह  ….☆

 

जून की

पीली महकती

यह सुबह

 

गंध से भीगे

करोंदों की

उमर पर

तरस खाती

सी हवा लगती

मगर पर

 

उभर आती

है हरी

गीली सतह

 

बाँह पर रखे

हुये सिर

पड़ी कल से

ऊँघती है

स्मृति में जो

अतल -तल सी

 

स्वप्न में

कोई चुनिंदा

सी बजह

 

इधर करवट

लिये धूमिल

है निबौरी

पान की मुँह

में दबाये

सी गिलौरी

 

गुमशुदा कोई

गिलहरी

की तरह

 

© राघवेन्द्र तिवारी

22-06-2020

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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