हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०९ – कविता – ☆ ये लोकतंत्र या शोकतंत्र… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “ये लोकतंत्र या शोकतंत्र” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०९ 

☆ ये लोकतंत्र या शोकतंत्र… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

वे पाँच साल में याचक बनकर आते हैं

फिर शासक बनकर याचक हमें बनाते हैं

यह कितना अजब खेल है

क्या सचमुच ही ये लोकतंत्र

पर इसके पीछे कितना है विश्वासघात

कितना छल है कितना षड्यंत्र।

 

सब अपनी मर्जी के मालिक

सबके अपने-अपने विभाग

सारी सुविधाओं के भोगी

भाषण में इनके हमें मिले

बलिदान त्याग

कुछ के स्विस बैंकों में खाते

जो कुछ भी ऊपर से पाते

कलपुर्जों के इस कलयुग में

इन सेवा करने वालों के है

ब्लैक मनी के जटिल तंत्र,

कितना छल है कितना षड्यंत्र।।

 

आते हैं संकट इन पर तब

नैतिकता पाठ पढ़ाते हैं

आरोपों से मुँह घुमा फिरा कर

जनता को बहलाते हैं

चक्की में इस महंगाई के

बूढी होती तरुणाई के

दयनीय प्रजा क्या समझ सके

ये राजनीति के कुटिल मंत्र,

कितना छल है कितना षड्यंत्र।।

 

आयोगों पर आयोग बिठा

फिर उन्हें नियंत्रित स्वयं करें

कुछ अपने कुछ उनके प्यादे

कुछ उदासीन कुछ आत्मनिष्ठ

सेवा निवृत कुछ लोग भरें

आयोगों के इस जंगल में जंगल

वोटों के मचते दंगल में

तत्परता से है जुटा तंत्र

कितना छल है कितना षड्यंत्र

सचमुच ही क्या यह लोकतंत्र।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश कि एक ग़ज़ल # १३० ☆ कड़वी हर एक हक़ीक़त  ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय ग़ज़ल  “कड़वी हर एक हक़ीक़त ” ।)       

✍ जय प्रकाश की एक ग़ज़ल  # १३० ☆ कड़वी हर एक हक़ीक़त ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

 

आँखों में शर्मो हया रख

थोड़ा तो वादे वफ़ा रख ।

 *

जुर्म की गिरह में मत बँध

जुर्मों को देके सज़ा रख ।

 *

लोग तो हँसेंगे सुनकर

दर्दों को दिल में छुपा रख।

 *

कड़वी हर एक हक़ीक़त

जख्मों की पास दवा रख ।

 *

नेकी बस काम आएगी

ग़ैरों से ख़ुद को जुदा रख।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३५ ☆ बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३५ ☆

✍ बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ये ख़ुदा ने की कमी अच्छी नहीं

चार दिन की चाँदनी अच्छी नहीं

 *

हर समय की बेबसी अच्छी नहीं

आंखों में  इतनी नमी अच्छी नहीं

 *

बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो

आपकी ये ख़ामुशी अच्छी नहीं

 *

सब्र रखिये जब मुसीबत सर पड़ी

देखिये यूँ हड़बड़ी अच्छी नहीं

 *

कुछ शरीफ़ों का सलीका सीखिए

शर्ट की कॉलर खड़ी अच्छी नहीं

 *

अंधभक्ति हो के हो ला-उम्मती

ज़ीस्त ऐसी शेख़ जी अच्छी नहीं

 *

कान के तुम साथ रखना ध्यान भी

हर खबर उड़ती हुई अच्छी नहीं

 *

तू मकाम अपना रियाज़त से बना

इन्हिसारी वक़्त की अच्छी नहीं

 *

खानदानों तक अगर ये जा रही

दोस्त ऐसी दिल्लगी अच्छी नहीं

 *

पास अपनी तुम अना के दो भुला

इस तरह की आज़जी अच्छी नहीं

 *

और के अश्क़ों से जो भीगी हुई

ज़िंदगी में वो ख़ुशी अच्छी नही

 *

छीन लेती है ये ज़र ज़ेवर जमीं

अय अरुण ये काहिली अच्छी नहीं

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४१ – वॉट्सएप्प, इन दिनों…! ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता – वॉट्सएप्प, इन दिनों…!)

✍ वॉट्सएप्प, इन दिनों…! ☆ श्री हेमंत तारे  

न कबीर, रहीम, रसखान के दोहे,

न ग़ालिब कि गजलें,

न कामायनी पर चर्चा,

और

न कोई यात्रा वृतांत।

किसी

लुटि पिटी बेवा सा लगता है

वॉट्सएप्प, इन दिनों ।

 

सुना है,

ये सब साझा करने वाले हाथ

फरमा रहे हैं आराम

क्योंकि,

ज़ेरे ईलाज

और

दाखिले अस्पताल है

इन दिनों

दोस्त मेरा ।

 

यकीं है मुझे

दिन, दो दिन में

फिर वॉट्सएप्प पर

ताजा दम

लौटेगा,

दोस्त मेरा ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४९ ☆ कविता – सत्येंद्र के पद… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी रचना  – “सत्येंद्र के पद“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४९ ☆

✍ कविता – सत्येंद्र के पद… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राधे श्री चरनन शरण में  लीजो।

निज दर्शन हर जग नारि में दीजो ।।

*

आतम तत्व तुम्हीं हो राधे, परमातम है कान्हा।

यह परतीति हृदय मम कीजै, करूं युगल प्रणामा।।

*

 काम क्रोध मद मत्सर जो हो, जारि देउ तुम राधे।

 राधे श्याम दोउ हृदय बिराजो क्षमा करहु अपराधे।।

*

जग बौरानौ भयौ आज कोरोना सबकूं मारे डारै ।

 काल कूट सम भय बिराजो जग जीवित ही मारै।।

*

करि कृपा कटाक्ष श्री राधे, हर लीजे कष्ट हमारे।

मैं जनम जनम जपूं हमेशा, जय श्री राधे राधे।।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९८ – विद्या… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – विद्या।)

☆ लघुकथा # ९८ – विद्या श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“तुम्हारा नाम क्या है?” गायत्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“दीदी हमें हमारा नाम नहीं पता, कोई काली कह देता है, कोई गुड़िया कह देता है, कोई मुनिया कह देता है, कोई कहता अरे ओ सुन, लेकिन दीदी ज्यादातर लोग कामवाली बाई कहते हैं।”

“ठीक है, ठीक है, ज्यादा बातें मत कर, सीधे काम पर लग जाओ, जल्दी से मुझे रोटी सब्जी बना दो। रसोई में राजमा भीगा पड़ा है, दोपहर में चावल बना लेना। राजमा रोटी मुझे दे दो, बच्चे स्कूल से आएंगे उन्हें खाना खिला देना। रोज के काम की लिस्ट मैं सामने टेबल पर रख चली जाऊंगी पढ़ी-लिखी हो ना।”

“जी दीदी वैसे पांचवी क्लास तक पढ़ी हूं। थोड़ा-थोड़ा जोड़ के अक्षरों को पढ़ लेती हूं आप चिंता मत करो मैं खाना अच्छा बनाती हूं। आपके यहां जो पहले काम करती थी झुमरी वह मेरी मौसी है उसी से मैंने सारा घर का काम खाना बनाना सीखा है, आप किसी बात की चिंता मत करो।”

“मेरे घर से जाते ही तुम अकेली घर में रहोगी ध्यान रखना कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। बगल में शर्मा जी का नौकर बहुत तेज है वह जरूर आएगा। ज्यादा किसी से बात मत करना दोपहर में बच्चे आएंगे उन्हें खाना खिला देना शाम को मैं आऊंगी तब तुम्हें घर जाने की छुट्टी मिलेगी। अभी शुरू में तुम्हें ₹5000 दूंगी। काम देखूंगी, फिर पैसे बढ़ाऊंगी।”

“दीदी, स्कूल के बहार तो बहुत भीड़ लगी थी। सब लोग वोट डालने गए हैं क्या आप वोट नहीं डालते?”

“मैं ऑफिस से आते हुए वोट डालते हुए आऊंगी। चलो कोई बात नहीं मैं भी तुम्हारा वोटर आईडी बनवा दूंगी और धीरे-धीरे सारी चीज सिखा दूंगी।”

“दीदी एक बात तो सुनो  हमारे मोहल्ले में कुछ लोग आते हैं। वह हमें बड़ी सी गाड़ी में भरकर ले जाते हैं एक पर्चा देते हैं उसमें बहुत सारे चित्र बने रहते हैं, हमें एक चित्र की ओर इशारा कर देते हैं, हम उस पर ठप्पा लगा देते हैं और हमें पैसे भी मिलते हैं, दीदी साड़ी और रुपया मिलता है। खाना भी बन रहा है मैंने अपने आदमी से कहा कि शाम को घर लेते आना खाने को।”

“कोई बात नहीं अब तुम हमारे यहां काम करने लग गई हो धीरे-धीरे तुझे मैं पढ़ना लिखना और बातें सिखा दूंगी अभी मुझे ऑफिस जाने दें।”

“मैं रविवार को एक बस्ती में गरीब  महिला और बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। तुझे भी साथ लिए चलूंगी। तब तो किसी भी कागज में क्या लिखा है खुद पढ़कर समझ सको। अब से तुम्हारा नाम विद्या और अपने विद्या नाम को सफल कर सकोगी। शाम को बढ़िया खाना बना कर रखना।”

मुस्कुराते हुए गायत्री जी अपने कर को स्टार्ट करके ऑफिस चली जाती हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९८ ☆ कळले मला… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९८ ?

☆ कळले मला… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

धुक्यात दिसते धूसर हे शहर कळले मला,

तुझ्याच साठी जगले आजवर कळले मला!

*

उदास वाटा, निबीड जंगल, भयावह सर्व,

प्रकाश नव्हता, तिकडे लांबवर, कळले मला!

*

प्रवाह नेतो, आपण मुकाट जावे तिकडे,

अमृत समजत, प्राशावे जहर कळले मला!

*

 शिकवण होती, इथे ‘बायका जगतात असे’,

नवीन मुलगी आहे बेखबर कळले मला!

*

 नसतो दोषी, येथे कोणी, प्राक्तना समज,

नियती आहे लहरी जन्मभर कळले मला!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३१ – नींद जाने कब खुलेगी ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण कविता “नींद जाने कब खुलेगी ।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३१ – नींद जाने कब खुलेगी ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बोतलें बिकने लगी हैं

आज पानी की,

गन्ध गायब हो न जाए

रातरानी की!

कैद कूलर में हुई शीतल पवन,

घट गया अमराइयों में

स्वार्थ अपना ही अगन

अस्मिता खतरे में,

छप्पर-छाँव-छानी की!

आंचलिकता है अछूतों की तरह,

रौब है अँग्रेजियत का

रातपूतों की तरह

आ रसोई तक गई

चप्पल लखानी की!

खेत सूखे और प्यासे हैं कुएँ,

बाँझ लतिका, तरू नपुंसक

मेघ सन्यासी हुए

नींद जाने कब खुलेगी ?

राजधानी की!

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

संपर्क – 82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०४ – गीत – नए वर्ष में खुशहाली का… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण “गीत – नए वर्ष में खुशहाली का…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०४ – गीत – नए वर्ष में खुशहाली का… ☆

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

जन गण मन को स्वस्थ निरोगी,

सुखदाई परिवेश मिले।

 *

जीवन सबका जगमग दमके,

सुख की हर बदली बरसे।

छल-छद्मों की गिरें दिवालें,

नेह प्रेम चहुँ दिश सरसे।

 *

मानव पर यदि तम घिर जाए,

कभी न उसको क्लेश मिले ।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

नये वर्ष में सुख यश वैभव,

नित नूतन संगीत बजे।

नई सर्जना नई चेतना,

मधुर-मधुर नवगीत सजे।

 *

मिले सभी को तरुवर छाया,

निष्कंटक पथ कानन  हो।

अन्तरघट में बजे बाँसुरी,

मन-भावन वृंदावन हो।

 *

द्वार तुम्हारे चलकर पहुँचें,

कृष्ण-सखा योगेश मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

मिले सुजन-सान्निध्य सभी को,

कलयुग में द्वापर युग हो।

सत्य न्याय का शंखनाद हो,

राम राज्य-सा सतयुग हो ।

 *

हम विकास के पथ पर सबको,

लेकर साथ सदा बढ़ते।

मित्र सुदामा बने अगर तो,

उनका भी मंगल करते।

 *

भटके राही के चिंतन को, 

यथा उचित निर्देश मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

शांति और सद्भाव शीलता,

सदियों से सबकी चाहत।

है वसुधा परिवार हमारा,

दीन दुखी का हो स्वागत।

 *

गीता की अमरित वाणी को,

जग में फिर सम्मान मिले।

हो अखंड कण-कण भारत का,

विश्व गुरू का मान मिले।

 *

पुनर्जन्म जब हो धरती पर,

हमको भारत देश मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

पाँच सदी पश्चात हमारे

राम-लला घर आए हैं।

विश्व जगत में छाईं खुशियाँ,

घर-आँगन मुस्काए हैं।

 *

दो हजार चौबीस शुभंकर

रामराज्य परिवेश मिले।

काशी विश्वनाथ का मंदिर

मथुरा का आदेश खिले।

 *

सत्य सनातन की वाणी को

जागृति का हुँकार मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६० – देश-परदेश – Health Talk Show ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ व्यंग्य # १६० ☆ देश-परदेश – Health Talk Show ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त विज्ञापन देखकर दिल में विचार आया कि डॉ नरेश त्रेहान ना सिर्फ देश के वरन पूरे विश्व में कुछ चुनिंदा चिकित्सकों में से एक है, क्यों ना इनको रूबरू सुना जाय।

घर से चलते चलते वार्ता स्थल की जानकारी ले रहे थे, तभी इस विज्ञापन के ऊपरी भाग पर नज़र पड़ गईं। कार्यक्रम के एक प्रायोजक रजनीगंधा पान मसाला बनाने वाले भी हैं।

हमें ऐसा लगा, वहां जाकर पहले रजनीगंधा पान मसाले का सेवन करना पड़ेगा, उसके बाद ही डॉ साहब अपना ज्ञान हम सबको बताएंगें। जब कार्यक्रम का खर्च रजनीगंधा पान मसाला के निर्माता ही कर रहें है, तो वो अवश्य चाहेंगे कि वहां बैठे सभी श्रोता पान मसाला अवश्य खाएं, ताकि आने वाले समय में उनकी बिक्री में वृद्धि हो।

डॉ त्रेहान जैसी शख्सियत विज्ञान के साथ योग की बात भी खूब करते हैं। पान मसाले का बैनर उनके पीछे लगा होगा तो लोग अवश्य ही पान मसाले की और आकर्षित होंगे।

विश्व प्रसिद्ध हस्ती, स्वास्थ्य के प्रति इतने घटिया उत्पादों के साये में हमें क्या ही ज्ञान देगी। हमने अपना इरादा बदला और अपना देसी गुड़ाखू मुंह में दबा कर मोबाइल पर तन्मयता से ये सब लिख रहें हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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