हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “चाय पानी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– सर…

– कहो। क्या बात है?

– सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।

– कोई जरूरत नहीं इसकी।

– फिर बिल पास नहीं होगा, सर!

– न हो। बोलो जो आब्जेक्शन‌ लगाना हो लगा दो!

वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर‌ चला गया! कुछ पल बाद वापस आया।

– सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो!

– बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं!

वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया!

अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।

– क्यों?

– क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?

वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया!

वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका!

– हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं! बोलो चाय मंगवा लूं?

राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!

– फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।

उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३४ – कविता – हमारे बाबूजी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३४ ☆

☆ कविता ☆ ~ हमारे बाबूजी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ l

कविता, लिखता, कविता पढ़ता , कविता में इसे सजाता हूँll

*

माना माँ का स्थान बड़ा,               माँ जन्माती, दुलराती है l

गा गा कर लोरी सुना सुना,          थपकी दे हमें सुलाती है ll

*

एक बात ह्रदय से कहता हुँ, तेरा बेटा हूँ, यह कह इतराता हूँl

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

आँखों में प्यार उमड़ता है,          ममता हॅसती इतराती है l

मेरी हर हरकत सह करके,     माँ मुझ पर प्यार लुटाती है ll

*

गोदी माँ की फूलों सी है,       पर अंगुली पिता की धरता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

इस तारे को सूर्य बनाने में,     जीवन को खपा दिया तुमने l

हे पिता पसीना बहा बहा,      एक सागर बना दिया तुमने ll

*

तेरे  इस बड़े समुन्दर में,       जीवन जलयान चलाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

है याद मुझे वह सुन्दर पल,   उस भाप के  इंजन की गाडी l

हर प्रश्नों का उत्तर पूछूँ, तुझको सहलाकर, खुजलाकर दाढ़ी ll

*

मेरे हर प्रश्नों के उत्तर थे,        इसके संग धाक जमाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

मेरे भविष्य की चिंता को,           तेरा ललाट बतलाता था l

हर ख़ुशी और गम का खांका,    तेरे माथे खींच जाता था ll

*

अपनी इस सुघर हवेली का,      तुमको आधार बताता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

तुम देव लोक को चले गए, एक भव्य लोक को बना दिया l

 क्यारी में जल दे दे करके,    फूल अनोखा खिला दिया ll

*

सच पिता बड़ी छतरी होता,    जिसके नीचे छिप जाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल  बनाता हूँ ll

*

सम्मान पिता का करता जो,  सम्मान जगत में पाता है l

आदर्श पुत्र कहलाता है,    वह सबके दिल को भाता  है ll

*

अपनी इस छोटी रचना का,    इसे सार तत्व बतलाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

पैंगोंग झील

04 जुलाई 2022 को आज विश्व प्रसिद्ध पैंगोंग झील पहुँचने के लिए सात बजे हुंदर से निकलना पड़ा। ड्राइवर का कहना था कि दोपहर में ग्लेशियर का पानी पिघल कर रास्ते में तेज़ी से बहकर व्यवधान उत्पन्न करता है, इसलिए कई स्थानों पर सड़क टूट जाती है। सीमा सड़क संगठन के कर्मचारी उसे ठीक करते चलते हैं। सुबह चाय बिस्कुट लिया और नाश्ता पेक करवा कर रख लिया।

पैंगोंग झील की जुड़वा त्सो मोरीरी झील का जायज़ा भी लेना ठीक रहेगा। मोरीरी झील को पैंगोंग झील की जुड़वा बहन कहा जाता है, जो लद्दाख के चांगथंग क्षेत्र में स्थित है। इस झील की समुद्र तल से ऊंचाई 4522 मीटर (14,836 फीट) है, जिसकी वजह से यहां पर भी ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है और यही कारण है कि यहां पर पर्यटकों की ज्यादा भीड़ नहीं होती। इस झील की लंबाई 135 किमी. है जो भारत और चीन दोनों देशों में विस्तारित है। इस झील में भारत का हिस्सा 1/3 (45 किमी.) और चीन का हिस्सा 2/3 (90 किमी.) है। यह झील अपने रंगों को बदलने में माहिर है। इस झील का रंग सूर्य किरणों और उनके बर्फीले पहाड़ों पर प्रतिबिम्ब से नीला, लाल और कभी-कभी हरा भी दिखलाई पड़ता है। झील के रंग से आसपास का आभामंडल भी उसी रंग का बनता है।

इस झील के किनारे कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, लेकिन 2009 में 3-इडियटस् फिल्म का शूटिंग होने के कारण यह झील काफी चर्चा में आई और अब आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। झील के पानी का कहीं पर भी निकास न होने की वजह से इसका पानी खारा है और खारा होने के बावजूद भी सर्दियों में यह झील जम जाती है, उस समय इसके ऊपर बाइक और कार वगैरह को आसानी से चलाया जा सकता है।

हुंदर, डिसकिट, खालसर और अगम के बीच एक तरफ़ गगनचुंबी पहाड़ दूसरी तरफ़ पाँच सौ फुट से एक हज़ार फुट गहरी खाई के किनारे से ख़तरनाक रास्ता पर चलते जान मुँह को आती रही। सब चुप थे। ज़ुबान को जैसे लकवा मार गया हो। घबराहट से जान छुड़ाने के लिए फ़िल्मी गीत तेज आवाज़ में बजाए जाने लगे। उसके बाद रेतीले पिघलते पहाड़ों की शृंखला आरम्भ हुईं। सीमा सड़क संगठन ने श्योक नदी के बीच से रास्ता निकाला है। जिसमें बीच-बीच में कई धाराएँ निकली हैं। रास्ता अक्सर बंद रहता है। अगम में एक नाश्ते की दुकान पर हुंदर से लाया नाश्ता निपटा रहे थे तभी खबर मिली कि आगे रास्ता बंद है। रास्ता खुला लेकिन थोड़ी दूर चलने पर फिर रुकना पड़ा। सीमा सड़क संगठन के श्रमिक बिल्कुल स्याह पड़ चुके हैं। वे बहुत मुश्किल वातावरण में सड़कों की मरम्मत और रखरखाव करते हैं। भोपाल से साथ लाए मिठाई उन्हें खिलाई और उनके हालचाल पूछे। श्योक नदी के अंदर से रास्ता है। जो ठंड के दिनों में बर्फ़ से भर जाता है। 

क्ति नामक गाँव से एक रास्ता लेह जाता है। हमने श्योक जाने वाला रास्ता पकड़ा। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। एक तरफ़ नदी का पाठ है और दूसरी तरफ़ से रास्ता। कभी भी कहीं से ग्लेशियर का पानी तेज़ी से आ सकता है। पेट्रोलिंग पुलिसकर्मी गाड़ियों को निकालने में सहायता करते हैं। अभी एक जगह बहुत देर से फँसे हैं। बाईकर्स निकलते जा रहे हैं। दुनिया के अत्यंत दुरूह रास्ता पर यात्रा करना रोमांचक है। पैंगांग पहुँचना है, कब पहुँचेंगे, कैसे पहुँचेंगे, कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। साहस और धैर्य की परीक्षा का समय है। कुछ लोग उत्तेजित हैं तो कुछ बोरियत ढ़ो रहे हैं। साथ रखा पानी पेशाब बनकर ख़त्म होता जा रहा है। अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। हृदय गति बेचैनी का मापक यंत्र साथ है। हृदय गति बढ़ती जा रही है। मापी तो 72-75 रहने वाली हृदय गति 96-98 आ रही है। बैठे-बैठे घुटने पथराने लगे हैं। हालाँकि आक्सीजन का स्तर 97-98 है। जितने भी फ़िल्मी गीत थे सब तीन बार सुन चुके हैं। अभी पता चला है कि आगे बड़े ग्लेशियर से पानी एकदम आने लगा है। पता नहीं ग्लेशियर महोदय की कृपा कब होगी। कब पानी पिघलना रोकेंगे और रास्ता खुलेगा।

आजकल युवा जोड़े बाईक पर खूब आने लगे हैं। युवकों में साहसिक रोमांचक यात्रा का रुझान बढ़ा है। तीन-चार सौ गाड़ियों का जाम लग चुका है। बाईकर सबसे आगे पहुँच गए हैं। पानी रुकने पर वे पहले निकलेंगे बाद में गाड़ियाँ। हमारे साथी श्योक नदी के पानी को छूने चले गये, तभी रास्ता खुल गया। भागकर आये। साँसें फूल गयीं। दो साथी आगे निकल गये। उन्हें आगे से बिठाना था। एक पर्वत से पानी की मोटी धार रास्ते पर  बह रही थी। गाड़ियाँ एक-एक करके निकालना जोखिम भरा काम था। दो घंटे फँसे रहे। हरेक गाड़ी के निकालने पर लगता था कि यह तो फँस जाएगी या पानी के बहाव में बह जाएगी। एक जेसीबी बीच-बीच में पत्थरों को पानी में डालकर पूरते जाती थी। फिर तीन-चार गाड़ियों को निकालते थे। सौम्या बिटिया और कैलाश भाई गाड़ी से उतर कर नजारा देखने चले गये। वे उस स्थान पर पहुँचे जहां गाड़ियाँ फँस रही थीं। उनके पैर बर्फीले पानी में जमने लगे। उन्होंने पानी के बहाव में फँसती गाड़ियों को धक्का लगाना शुरू किया। कई लोग उनकी फ़ोटो लेकर फ़ेस्बुक और व्हॉटसएप पर डालने लगे। उन्होंने पंद्रह-बीस गाड़ियाँ निकालीं। जब हमारी गाड़ी पहुँची तो दूर खड़े होकर इंतज़ार कर रहे थे। हमारा ड्राइवर होशियार था। उसने रास्ते का निरीक्षण कर एक झटके में गाड़ी निकाल ली।

श्योक से दुर्बक का रास्ता भी बहुत दुस्साहसिक और जोखिम भरा था। एक तरफ़ एक हज़ार से फुट अधिक ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ दो हज़ार फुट गहरी खाई में बहती श्योक नदी, बीच में पहाड़ों से झरनों के रूप में उतरता ग्लेशियर का बर्फीला पानी। ड्राइवर ख़तरनाक तरीक़े से तेज गाड़ी चला रहा था। उसे टोंकने पर बोला- आप चुप रहो, हमारा भरोसा करो। हमने कहा- आपका भरोसा तो है लेकिन मशीन का क्या भरोसा कब दगा दे जाये। संभल कर चलो। पत्थरों में से गाड़ी निकालने पर क्या मालूम नीचे से कोई बुश वग़ैरह कट गया हो। उसे बात समझ आई। थोड़ी देर ठीक चला और फिर अपनी पर आ गया। बंदर पलटी खाना कभी नहीं छोड़ता। दुर्बक में लंच लिया।     

पैंगोंग त्सो विवादित क्षेत्र है। उसके बिल्कुल नज़दीक से गुज़रे। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से लगभग 20 किमी पूर्व में झील का एक हिस्सा चीन द्वारा नियंत्रित है लेकिन भारत द्वारा उसका दावा किया जाता है। झील का पूर्वी छोर तिब्बत में है। 19वीं सदी के मध्य के बाद, पैंगोंग त्सो जॉनसन लाइन के दक्षिणी छोर पर था, जो अक्साई चिन क्षेत्र में भारत और चीन के बीच सीमांकन का एक प्रारंभिक प्रयास था। खुर्नक किला झील के उत्तरी किनारे पर पैंगोंग त्सो के लगभग आधे रास्ते पर स्थित है। तिब्बत अधिग्रहण के समय अर्थात् 1958 से खुर्नक किला क्षेत्र पर चीनियों का नियंत्रण है। दक्षिण में छोटी स्पंगगुर त्सो झील है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)  झील से होकर गुजरती है। यह क्षेत्र एलएसी के साथ एक संवेदनशील सीमा बिंदु बना हुआ है। इस क्षेत्र में चीनी पक्ष से घुसपैठ आम बात है। 20 अक्टूबर 1962 को, पैंगोंग त्सो ने चीन-भारतीय युद्ध के दौरान सैन्य कार्रवाई देखी, जिसमें चीन ने भारतीय ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा दबा लिया था। चूसुल की प्रसिद्ध लड़ाई पर चेतन आनंद ने हक़ीक़त फ़िल्म बनाई थी। जिसके प्रसिद्ध गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी” सुनकर तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आँखों में आँसू आ गए थे।

चीन का राष्ट्रीय राजमार्ग 219 पैंगोंग त्सो के पूर्वी छोर से गुजरता है। झील तक रुतोग से 12 किमी या शिकान्हे से 130 किमी की दूरी पर गाड़ी चलाकर पहुँचा जा सकता है। उसके बाद चीनी सीमा लग जाती है। पर्यटक झील पर एक नाव किराए पर ले सकते हैं, लेकिन पक्षियों के प्रजनन स्थल की रक्षा के लिए द्वीपों पर उतरने की अनुमति नहीं है। किनारे पर कई रेस्तरां हैं।

पैंगोंग झील का मज़ा यहाँ तक पहुँचने की रोमांचक यात्रा में है, तकलीफ़ में है, भूख-प्यास की तड़फ में है। यहाँ पहुँच कर विशाल झील में लहराता नीला पानी और उसके चारों तरफ़ सूखे पहाड़ों पर धूप और बादलों की आवारगी देख मन प्रफुल्लित हो गया है। 

झील के परे जो पहाड़ दिखते हैं वे चीन की सीमा में हैं। अगस्त 2017 में, पैंगोंग त्सो के पास भारतीय और चीनी सेना में हाथापाई हुई थी जिसमें लात मारना, मुक्का मारना, पत्थर फेंकना और लाठी और छड़ जैसे परम्परा गत हथियारों का उपयोग शामिल था। 11 सितंबर 2019 को, चीनी सैनिकों ने उत्तरी तट पर भारतीय सैनिकों का सामना किया। 5-6 मई 2020 को, झील के पास लगभग 250 भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए।

भारत की ओर की झील की यात्रा के लिए एक इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है क्योंकि यह चीन-भारतीय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित है। सुरक्षा कारणों से भारत नौका विहार की अनुमति नहीं देता है। एक मान्यता प्राप्त गाइड के साथ समूहों की अनुमति है। टांगसे, लुकूँग होते हुए शाम को पाँच बजे आख़िर पैंगोंग झील पर पहुँच गये। झील के उस पार चीन की सीमा में बीच के पहाड़ों पर एक टुकड़ा धूप चमक रही थी। आजुबाजु के पहाड़ों पर स्याह बादलों की कालिमा छाई थी। पहले पी-3 टेंट हाऊस में सामान रखा। लेकिन उसके पहले एक झंझट से निपटना पड़ा। जब हमने मैनेजर को टेंट आवंटन का पत्र दिया तो वह बोला कि उसके पास हमारे आवंटन की कोई सूचना नहीं है। हमने भुगतान नहीं किया होगा। हमने तब तक सामान उतार लिया था। सामान सहित उस पर चढ़ाई कर दी। उसके मालिक से बात कराने को कहा। वे तीन चार लोग मिलकर सलाह करने लगे। हमने ज़ोर से डाँटा तो उन्होंने तुरंत दो टेंट दे दिए। यह खेल बाद में समझ आया कि वे हमें तनाव में रखकर किराया वसूलना चाह रहे थे। उनका मालिक हमारी बुकिंग का भुगतान सीधे टूर ऑपरेटर से प्राप्त कर चुका था। हमारा भुगतान उनकी ऊपरी कमाई होती। बढ़िया चाय पी। पहली फ़ुरसत में पैंगोंग झील किनारे पहुँचे। भारतीय समाज पर फ़िल्मों का इतना प्रभाव है। इसे यहाँ पहुँच कर समझा जा सकता है। 3-इडियटस् फ़िल्म ने इस स्थान को प्रसिद्धि दिलाई है। उसका यहाँ कारोबारी उपयोग होने लगा है। करीना कपूर टाइप पीले रंग की स्कूटर पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाने का मूल्य एक सौ, तीन कुर्सियों का किराया तीन सौ रुपया लिया जाता है। 

कैम्प में पी-3 के मैनेजर को टेंट में तीसरा बिस्तर लगाने को बुलाया। उसका नाम अजित है। वह झारखंड से नौकरी करने जान जोखिम में डालकर इतनी दूर आया है। उसकी मासिक तनख़्वाह 15,000/-  माहवार है। यहाँ का पर्यटक मौसम मई से सितम्बर कुल 5 महीने रहता है। वह पूरी टीम के साथ मई में यहाँ आया है। खाना पीना यहीं से मिलता है। मासिक तनख़्वाह टेंट के मालिक उसके खाते में जमा कर देते हैं। उसके परिवार के लोग झारखंड में बैंक एटीएम से निकाल लेते हैं। इस प्रकार सीज़न में 75,000/- उसे मिल जाते हैं। उसने बताया ऊपरी कमाई से सीज़न में दो लाख अलग से ले जाते हैं। जिसमें गेस्ट की टिप्स और टेंट के मालिक की जानकारी के बग़ैर किराए से आमदनी शामिल है। मालिक लेह के राजनीतिक वर्चस्व वाले लोग हैं। इतनी दूर रोज़ आ नहीं सकते। वे बुकिंग के हिसाब से भुगतान सीधे प्राप्त करते हैं। भूले भटके पर्यटकों को टेंट उपलब्ध कराकर मैनेजर ऊपरी कमाई कर लेते हैं। सितम्बर में पेंगोंग झील पूरी तरह जमना शुरू होती है तो तापमान -40 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है।

पेंगोंग में साल के बारह महीने भारी मात्रा में सैनिक मौजूदगी रहती है। 1962 से 2020 तक भारतीय और चीनी सैनिकों में भिड़ंत होती रही है। चीन के साथ यह अत्यंत संवेदन शील इलाक़ा है। विषम परिस्थितियों में भी सैनिक मोर्चा नहीं छोड़ते हैं। राष्ट्राध्यक्ष को जब भी किसी स्थानीय कारण से जनता का ध्यान भटकाना होता है तब उनके एक इशारे पर सैनिक मुठभेड़ होती रहती हैं। 

बताया जाता है कि 1962 के युद्ध के दौरान यही वो जगह थी, जहां से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था। भारतीय सेना ने भी चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेजांग ला से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था। पिछले कुछ सालों में चीन ने पैंगोंग झील के अपनी ओर के किनारों पर सड़कों का निर्माण भी किया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह झील यक्ष राज कुबेर का मुख्य स्थान है। माना जाता है कि भगवान कुबेर की ‘दिव्य नगरी’ इसी झील के आसपास कहीं स्थित है। इसका उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, ये तो शायद ही कोई बता पाए। 

आधिकारिक तौर पर, मैकमोहन रेखा भारत और चीन के बीच की सीमा को परिभाषित करती है। यह ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा भारत और फिर तिब्बत के बीच एक समझौते के रूप में खिंची गई थी। चीन हमेशा सीमा समझौते पर आपत्ति जताता है क्योंकि उसका दावा है कि यह समझौता झूठा है क्योंकि चीन इसका हिस्सा नहीं था बल्कि तिब्बत था।

पेंगोंग से चूसुल 30 किलोमीटर और मिराक 45 किलोमीटर चीन सीमा पर अंतिम गाँव है। सुबह सेना के दो हेलिकोप्टर पेट्रोलिंग पर जाते दिखे। एक सेनानी ने बताया कि ऑफ़िसर कमांडिंग चूसुल पोईंट पर चाय-नाश्ता की मेज़ पर

तुरतुक

भारत-पाकिस्तान सीमा पर तुरतुक गाँव है। सरहदें अच्छी भी होती हैं और खराब भी। अच्छी इसलिए की सरहदें किसी मुल्क को उसके वजूद का अहसास दिलाती हैं। खराब इसलिए कि ये लोगों को एक दूसरे से जुदा कर देती हैं। सरहदें बनने का दर्द भारत से बेहतर और कौन जान सकता है। सरहद ने एक ही मुल्क के लोगों को एक दूसरे के लिए बेगाना बना दिया। जहां बंटवारे की लाइन खींची गई, वहां के आधे लोग एक तरफ और आधे लोग दूसरी तरफ के हो गए।

बंटवारे की इस लड़ाई में सरहद के पास ऐसे बहुत से इलाके थे जिन पर दोनों मुल्क अपना दावा ठोंक रहे थे। ऐसे ही इलाकों में से एक था जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाके का तुरतुक गांव। बंटवारे के वक्त ये पाकिस्तान में था। चूंकि ये गांव दोनों मुल्कों की सरहदों के बीच स्थित था, लिहाजा यहां बाहरी लोगों के आने पर पाबंदी थी। यहां के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, तो तुरतुक भी उसके हाथ से निकल कर भारत में शामिल हो गया। तुरतुक गाँव गांव में हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध तीनों धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। यह गांव श्योक नदी के तट पर स्थित है, जहां जाने के बाद आपको काफी सुंदर और बेहतरीन नजारा देखने को मिलेगा।

 यह भारत द्वारा 1971 ई० में पाकिस्तान से छीना गया गांव है, जो वर्तमान समय में भारत का एक हिस्सा बन चुका है। यह गांव चारों ओर से पहाड़ों से घिरे होने के साथ-साथ श्योक नदी के तट पर बसा हुआ है, जहां जाने के बाद एक अलग ही दुनिया का एहसास होता है। वर्तमान समय में यह गांव लद्दाख का काफी बड़ा आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जिसे देखने के लिए हर साल देश के अलग-अलग क्षेत्रों से सैलानी यहां आते हैं।

 05 जुलाई 2022 को सुबह पाँच बजे नींद खुली तो पेंगोंग झील देखने चले गए। ग़ज़ब का प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ था। सूर्य रश्मियों का हिमशिखरों पर रंगीन नृत्य और उनका झील पर सतरंगी प्रतिबिम्ब आभा देखते बनती थी। आठ बजे पेंगोंग से रवाना हुए। हमें अब पुनः श्योक नदी के और भी ख़तरनाक दर्रों से गुजरते हुए सिंधु की सहायक नदियों के काँठे में पहुँचना है।   

लद्दाखी हिमालय सिंधु की सहायक नदियों के साथ, भारत का पंजाब क्षेत्र बनाता है, जबकि नदी का निचला भाग पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत में एक बड़े डेल्टा में समाप्त होता है। सिंधु नदी ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र की कई संस्कृतियों का मिलन स्थल रही है। तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का उदय हुआ, जो कांस्य युग की एक प्रमुख शहरी सभ्यता थी। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान पंजाब क्षेत्र का उल्लेख ऋग्वेद की ऋचाओं में सप्त सिंधु और अवेस्ता धार्मिक ग्रंथों में सप्त हिंदू (दोनों शब्दों का अर्थ “सात नदियों”) के रूप में किया गया है। सिंधु घाटी में उत्पन्न होने वाले प्रारंभिक ऐतिहासिक साम्राज्यों में गांधार और सौवीर के रोर वंश शामिल रहे हैं। सिंधु नदी पश्चिमी दुनिया के ज्ञान में शास्त्रीय काल की शुरुआत में आई, जब फारस के राजा डेरियस ने नदी का पता लगाने के लिए 515 ई.पू. में अपने ग्रीक दरबारी स्काइलैक्स ऑफ कैरींडा को भेजा।  

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर, जैसे हड़प्पा और मोहनजो-दारो, लगभग 3300 ईसा पूर्व के हैं। प्राचीन दुनिया के कुछ सबसे बड़े मानव आवासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता पूर्वोत्तर अफगानिस्तान से पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत तक फैली हुई थी। झेलम नदी के पूर्व से ऊपरी सतलुज पर रोपड़ तक ऊपर की ओर पहुंचती है। तटीय बस्तियाँ पाकिस्तान, ईरान सीमा पर सुतकागन डोर से लेकर भारत के आधुनिक गुजरात कच्छ तक फैली हुई हैं। उत्तरी अफगानिस्तान में शॉर्टुघई में अमु दरिया पर एक सिंधु स्थल है, और हिंडन नदी पर सिंधु स्थल आलमगीरपुर दिल्ली से केवल 28 किमी की दूरी पर स्थित है। आज तक, 1,052 से अधिक शहर और बस्तियां मुख्य रूप से घग्गर-हाकरा नदी और उसकी सहायक नदियों के सामान्य क्षेत्र में पाई गई हैं। बस्तियों में हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो के प्रमुख शहरी केंद्र, साथ ही लोथल, धोलावीरा, गनेरीवाला और राखीगढ़ी थे। सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर 40 सिंधु घाटी स्थलों की खोज की गई है। हालांकि, सिंधु लिपि की मुहरों और उत्कीर्ण वस्तुओं की खोज की गई वे अधिकांश सिंधु नदी के किनारे पर पाए गए थे।

“इंडिया” शब्द सिंधु (Indus) नदी से लिया गया है। प्राचीन काल में, “भारत” शुरू में सिंधु के पूर्वी तट के साथ उन क्षेत्रों को संदर्भित करता था, लेकिन 300 ईसा पूर्व तक, हेरोडोटस और मेगस्थनीज सहित ग्रीक लेखक पूरे उपमहाद्वीप में इस शब्द का उपयोग कर रहे थे जो पूर्व की ओर बहुत आगे तक फैला हुआ है। सिंधु का निचला बेसिन ईरानी पठार और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक प्राकृतिक सीमा बनाता है। यह क्षेत्र पाकिस्तानी प्रांतों बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध और अफगानिस्तान और भारत के देशों को शामिल करता है। डेरियस द ग्रेट (दारा) के शासनकाल के दौरान सिंधु घाटी पर कब्जा करने वाला पहला पश्चिम यूरेशियन साम्राज्य फारसी साम्राज्य था। उनके शासनकाल के दौरान, कर्यंदा के यूनानी खोजकर्ता स्काइलैक्स को सिंधु के मार्ग का पता लगाने के लिए नियुक्त किया गया था। इसे सिकंदर की हमलावर सेनाओं ने पार कर लिया था, लेकिन उसके मैसेडोनिया के लोगों द्वारा पश्चिमी तट पर विजय प्राप्त करने के बाद – इसे हेलेनिक दुनिया में शामिल करने के बाद, सिकंदर ने एशियाई अभियान को समाप्त करते हुए नदी के दक्षिणी मार्ग के साथ पीछे हटने का चुनाव किया। सिकंदर के एडमिरल नियरचस सिंधु डेल्टा से फारस की खाड़ी का पता लगाने के लिए टाइग्रिस (दजला-फ़रात) नदी तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। सिंधु घाटी पर बाद में मौर्य और कुषाण साम्राज्यों, इंडो-ग्रीक साम्राज्यों, इंडो-सीथियन और हेप्टालाइट्स का प्रभुत्व था। कई शताब्दियों में मुहम्मद बिन कासिम, गजनी के महमूद, मोहम्मद गोरी, तैमूरलंग और बाबर की मुस्लिम सेनाओं ने सिंध और पंजाब पर आक्रमण करने के लिए नदी पार की, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रवेश द्वार उपलब्ध हुआ।

आप सोचते होंगे कि यह सब जानकारी कहाँ से लाते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन तीन बार तीन तरफ़ से तिब्बत यात्रा पर गए थे। उन्होंने “मेरी लद्दाख़ यात्रा” और “मेरी तिब्बत यात्रा” में इस क्षेत्र का विशद विवेचन किया है। प्रत्येक घुमंतू को उनकी “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” और “घुमक्कड़ शास्त्र” ज़रूर पढ़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त हेनरिख हेरर की किताब “मेरे तिब्बत में सात साल” दलाई लामा के तिब्बत से पलायन के पहले के सात सालों का जीवंत वृतांत भी पठनीय है। 

बहुत ज्ञान बघार लिया। अब दर्रों पर आते हैं। श्योक नदी काराकोरम दर्रे के पास से निकलती है। श्योक और नुब्रा नदियों की घाटी वाले क्षेत्र को नुब्रा के नाम से जाना जाता है। नुब्रा-सियाचिन घाटी में बड़े पैमाने पर अप्सरास समूह, रिमो समूह, और तेराम कांगरी समूह शामिल हैं। इस प्रकार हमने इन सभी गगनचुंबी शिखरों से सटे दर्रों को श्योक से सिंधु काँठे में पहुँचने हेतु पार किया।

पूर्वी और मध्य हिमालय अर्थात् सिक्किम, भूटान, नेपाल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश मानसूनी बादलों को रोक कर ख़ाली कर देते हैं। वृष्टिछाया के कारण भारतीय मानसून के नमी भरे बादलों का प्रवेश लद्दाख़ में नहीं होता है। यहाँ सितम्बर से जनवरी तक भारी हिमपात होता है। इस प्रकार लद्दाख एक उच्च ऊंचाई वाला वनस्पति विहीन बियाबान है। पानी का मुख्य स्रोत पहाड़ों पर शीतकालीन हिमपात है। हिमालय के उत्तरी किनारे के क्षेत्र- द्रास, सुरू घाटी और ज़ांस्कर- में भारी हिमपात होता है और वर्ष में कई महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से लगभग कट जाता है। ग्रीष्मकाल छोटा होता है, हालांकि फसल उगाने के लिए काफी लंबा होता है। वनस्पति की कमी के कारण ऊंचाई पर कई स्थानों पर हवा में ऑक्सीजन का अनुपात कम है।

पेंगोंग से चलकर तंगस्ते से लेह सड़क पकड़ी। खारू होते हुए लेह 110  लिखा था। पेंगोंग जाते समय खारदुंग ला पार किया था। अब 17,600 फुट ऊँचाई वाला चांगला दर्रा पार करना था। पहला पड़ाव सोलतक था, दस बजे चांगला दर्रा पर पहुँचने वाले थे तभी ट्राफ़िक जाम का सामना हो गया। सेना की गाड़ियाँ भी साथ में थीं। तंगस्ते से लेह के रास्ते पर कई गाँव है। जिनके घोड़े, याक और अन्य पशु चरते दिख रहे थे। उनके गोबर के कंडे भी बनते दिखे।

चांगला पार करके हम फिरसे सिंधु घाटी में प्रवेश कर गए। यहाँ के ग्लेशियर पंजाब और सिंध को तर करते हैं। जिंग्राल, शक्ति आया। शक्ति के आगे सीमा सुरक्षा संगठन का सड़क निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए ट्राफ़िक जाम फिर सामने आ खड़ा हुआ। वहाँ सीमा सड़क संगठन और इंडीयन आयल कोर्पोरेशन मिलकर प्रोजेक्ट हिमांक नाम से एक सड़क बना रहे हैं। खारू तक उम्दा सड़क बन चुकी है। हेमिस मठ खारू से आठ किलोमीटर है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # १३ – बाढ़ में बन्दर बाँट… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय व्यंग्य “बाढ़ में बन्दर-बाँट“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # १३ ?

? बाढ़ में बन्दर-बाँट… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

एक बाढ़ आई… दर्जनों पुल ढहे… सैकड़ों घर डूबे… हजारों बहे…लाखों मरे… करोड़ों का नुक़सान हुआ…अरबों की मदद चाहिए… l… नतीज़ा ?.. अरबों की मदद सेंक्शन हुई… करोड़ों जमा हुए… लाखों बाँटे गये… हजारों बँटे… सैकड़ों हिस्से में आये… दर्ज़ेनों में बन्दर-बाँट हुआ… एक… सिर्फ़ एक पल्ले पड़ा है… उसी एक रूपये की रेवेन्यु टिकट लेकर आम आदमी लाइन में खड़ा है… l

आपदा प्रबंधन, बाढ़ राहत कोष, हवाई सर्वेक्षण और बाढ़ आकलन पुनर्वास… इन चार स्कन्धों पर बाढ़-ग्रस्त अभिशप्त जनों की लाशें ढोई जाने की रस्में बख़ूबी अदायगी होती हैं l पूर्व चेतावनी प्रणाली, नियंत्रित संरचना ये सब इस शव-यात्रा में अनिवार्यतः शामिल होते हैं.. l…

“ज़नाज़े में बहुत हैं तमाशाई देखो

चूना लगाके अहा!रोशनाई देखो”

 नज़ारा देखो… कितने स्कूलों की छत भरभराकर नौनिहालों की इहलीला समाप्त कर गई… सरकारी निर्माण को परखने, एन.ओ.सी. देने हेतु विशेषज्ञ अभियंता हैं… तो बीच में विश्वसनीय मापक बन काहे टाँग अड़ाती हैं ये अतिवृष्टि एवं बाढ़..?

 “पुलिया टूटी, सड़क बही,

 हर ओर तबाही का मंज़र

 सीधी – सादी आबादी,

 आँसू पीने की आदी है”

चमचासान की मुद्रा में बैठे, मौक़ा-परस्त चमचे नियमों को परास्त कर, लोकतंत्र के गाल पर तमाचा जड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकते… आपको तो विदित है ही कि, “चमचा जिस बर्तन में रहता है, उसे खाली कर देता है… l “क्या कुछ ग़ायब नहीं हो जाता…?…

गोदाम से ग़ायब हुआ, अनाज देखिये,

‘राजेश’ इस वतन का उफ़ रिवाज देखिये…!

 

“चले केन्द्र से पूरे एक सौ

आते-आते पचपन ग़ायब

सावन ग़ायब, बचपन ग़ायब

मेल-जोल अपनापन ग़ायब”

किसी को रूखा-सूखा नसीब हुआ है, इसका तात्पर्य ही यही है कि कोई कथरी ओढ़कर घी चुपड़ी हथिया चुका है—

“जिनके हिस्से बारिश आई, सर से पाँव तर-बतर हुए

आम आदमी के हिस्से में केवल बूँदा-बाँदी है”

बाढ़ आकर तबाही मचाकर अलविदा हो जाती है… परन्तु ऐसे बहुतायत हैं, जिनकी आँखों में निश-दिन बाढ़ है, जिनका जीवन ही बारामासी आषाढ़ है…!

बाढ़ आई-गई, अपनी बला से!…तथाकथितों के सर कड़ाही में और पाँचों उँगलियाँ घी में सराबोर रहे! तभी तो इस व्यंग्यकार ने उवाचा है —

“चमचे पहले चाँदी के थे,

अब चमचों की चाँदी है”

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८६ ☆ ग़ज़ल ।। शख्स नहीं कि शख्सियत बन कर जिए आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८६ ☆

☆ ग़ज़ल ।। शख्स नहीं कि शख्सियत बन कर जिए आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।। काफिया – दार ।। रदीफ – होना चाहिए।।

=1=

आदमी को    साहिबे   किरदार होना चाहिए।

जिंदगी में आदमी को जिम्मेदार होना चाहिए।।

=2=

जिंदगी कुछ ऐसा बन कर ही  जिए आदमी।

हर मुकाम जिंदगी का यादगार होना चाहिए।।

=3=

बात जब भी   किसी    निशाने   की आए तो।

निशाना तो बस अचूक कारगार ही होना चाहिए।।

=4=

शख्स नहीं कि शख्सियत बन कर जिए आदमी।

कुछ और न हो बस आदमी खुद्दार होना चाहिए।।

=5=

ऊपरवाले का एक नायाब तोहफा है यह जिंदगी।

इसलिए जिंदगी से बस   वफादार होना चाहिए।।

=6=

हजारों सुख-दुःख के रंग मिलते हैं एक उमर में।

हर बात का हीआदमी को कद्रदार होना चाहिए।।

=7=

स्याह सफेद हर रंग जरूरी है जिंदगी के लिए।

बस आदमी को जरूर जवाबदार होना चाहिए।।

=8=

कदम कदम पर मिल रहा है दुनिया में धोखा।

हर आदमी को आज बस खबरदार होना चाहिए।।

=9=

हंस जरूरी हो गया है   आज इस जमाने में।

हर हालात में आदमी नहीं दागदार होना चाहिए।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५० ☆ कविता – मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५०

☆ मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

मनुज भावों कर एक अनुपम खजाना है.

दुर्विचारों से सदा जिसको बचाना है

 *

सुख-दुखों का स्रोत मन के भाव ही तो हैं-

जिसे सद्‌भावों से हर दिन खुद सजाना है।

 *

मन अगर है शांत, संतोषी तो नित सुख है

अगर मैला है तो मैला हर ठिकाना है।

 *

झलक मन ही उसके सब व्यवहार देते हैं

कठिन होता मनोभावों को छुपाना है।

 *

प्रेम-पागे भाव सबको सदा भाते हैं।

भले भावों का प्रशंसक यह जमाना है।

 *

प्रिय कल्पना शुभ भावना ही नित सहेली हैं

दोनों का रिश्ता सतत सदियों पुराना है। ४॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०१ ☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सम्बन्ध बनाम मर्यादा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०१ ☆

☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆

सम् + बन्ध अर्थात् समान रूप से बंधा हुआ… जहां समता हो; समानता हो; स्वैच्छिक बंधन हो; एक-दूसरे के प्रति सर्वस्य न्यौछावर करने का जज़्बा हो; मर-मिटने का संजीदा भाव हो; पहले आप, पहले आप की शालीनता हो; दूसरों में अच्छाई व गुण तलाशने का प्रयास हो। सो! यह संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित करने के लिए, दूसरों के दु:ख से द्रवित होकर, उन्हें कष्ट से मुक्ति प्रदान करने व करवाने का भाव अहम् भूमिका अदा करता है।

परंतु यह सब तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं।   आजकल तो सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। हम धन-सम्पत्ति व रुतबा देखकर उसकी ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि आज का युग प्रतिस्पर्द्धा का युग है। हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने हेतु मर्यादा को ताक पर रख, सीमाओं को लांघ कर आगे बढ़ जाना चाहता है। पैसे के लिए मानव सब संबंधों को दरक़िनार कर केवल अपनी उन्नति व स्वार्थ-पूर्ति के बारे में सोच-विचार करता है और राह में आने वाली समस्त बाधाओं को रौंदता हुआ लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। वह संबंधों की गरिमा व अहमियत को नकार बेतहाशा आगे बढ़ता जाता है और बीच राह आने वाली बाधाओं व किसी के प्रतिरोध करने पर किसी की हत्या करने में भी गुरेज़ नहीं करता।

चलिए! हम दृष्टिपात करते हैं उस मन:स्थिति पर… जब मानव में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की भावना बलवती होती है। उस स्थिति में वह अच्छे-बुरे व उचित-अनुचित के भाव का तिरस्कार कर, अपनी नज़रें लक्ष्य पर केंद्रित कर उस ओर अग्रसर होता है। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है और संबंध सेतु हैं… जीवन का मूलाधार हैं। इनके अभाव में धरा पर जीवन की कल्पना अधूरी है… सर्वथा असंभव है। परंतु आजकल तो पति-पत्नी दाम्पत्य बंधन में बंध, एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी-सम व्यवहार करते हैं; एक-दूसरे से बेखबर जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं; विवशता से अपना जीवन ढोते हैं। इस कारण संयुक्त परिवार- व्यवस्था चरमरा गयी है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों व वृद्धों को भुगतना पड़ रहा है। स्नेह व सुरक्षा के अभाव में बच्चों के कदम अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं, जो अपने कुकृत्यों से समाज व देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।

यदि हम संबंधों का वर्गीकरण करें, तो कुछ संबंध जन्मजात होते हैं– जैसे माता-पिता भाई-बहन व अन्य परिवारजन..जिन से हम जन्म से ही रूबरू हो जाते हैं तथा इसमें हम तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हमें न चाहते हुए भी उनसे निबाह करना पड़ता है। शायद! यह माता-पिता द्वारा प्रदत्त उपहार स्वरूप होते हैं, जिनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा कर्तव्य नहीं, दायित्व होता है। हमें न चाहते हुए भी उन संबंधों को सहर्ष स्वीकारना व अहमियत देनी पड़ती है। कई बार बच्चे माता-पिता की ग़लतियों का अंजाम भुगतते हुए, आजीवन एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं तथा दायित्व-वहन करते हुए अपने जीवन का स्वर्णिम काल नष्ट कर देते हैं।

मानव एक सामाजिक प्राणी है और संबंध स्थापित करना उसकी मजबूरी होती है, क्योंकि अकेले रह कर जीवन जीने की कल्पना करना बेमानी है। तीसरे स्वार्थ के संबंध होते हैं, जिन्हें मानव अपनी खुदगर्ज़ी के लिए स्थापित करता है और उसका प्रयोग वह स्वार्थ-सिद्धि हेतु सीढ़ी के रूप में करता है। उस स्थिति में वह दूसरे को हानि पहुंचाने, यहां तक कि उसकी हत्या करने में तनिक भी संकोच नहीं करता। ऐसे संबंधों का

आजकल संसार में जाल बिछा हुआ है और हर इंसान मुखौटा धारण कर, दोहरा जीवन जीने को विवश है। यह संबंध अस्थायी होते हैं और लक्ष्य-प्राप्ति के पश्चात् अस्तित्वहीन हो जाते हैं; समाप्त हो जाते हैं…जैसे नज़रों से ओझल होने पर, व्यक्ति मन से भी उतर जाता है…बहुत दूर चला जाता है।

मुझे याद आ रहे हैं, ऐसे बहुत से क़िरदार, जो माता- पिता द्वारा प्रदत्त संबंधों की सज़ा आज तक भुगत रहे हैं। पुत्र की लालसा में सात-सात कन्याओं का भरा-पूरा परिवार जुटा लेने का प्रचलन आज भी बदस्तूर जारी है। पहले लोग यह चिंता नहीं करते थे  कि वे अपने बच्चों को धरोहर रूप में इतना बड़ा कर्ज़ अर्थात् उत्तरदायित्व सौंप कर जा रहे हैं, जिसका भुगतान उन्हें तथा आगामी पीढ़ियों को आजीवन अपने हाथों अपने सपनों को होम करके चुकाना पड़ेगा। शायद! इस ओर उनका लेशमात्र ध्यान भी नहीं जाता कि वह मासूम बच्चा कब बड़ा होगा और उसके आत्मनिर्भर होने तक वे जीवित भी रहेंगे या सारा बोझ उसके कंधों पर ज़बरदस्ती लाद कर, इस दुनिया से रुख्सत हो जाएंगे और वह नादान उनकी भयंकर-भीषण कारस्तानियों का फल आजीवन भुगतने को बाध्य होगा। क्या नाम देंगे आप ऐसे माता-पिता को, जन्मदाता…जो सृष्टि- सृजन में भरपूर योगदान देकर अपनी संतान को नरक में अकारण झोंक देते हैं।

यदि हम इसकी व्याख्या करें, तो उनके इस कर्म को भी अक्षम्य अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसे अंधविश्वासी व स्वार्थी माता-पिता के लिए भी कठोर सज़ा व दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। यह देखकर अत्यंत दु:ख होता है कि रिश्तों से अनजान, एक नवजात शिशु को न जाने कितने अटूट रिश्तों-बंधनों में बांध दिया जाता है… मानो उसे चक्रव्यूह में जकड़ दिया जाता है; जहां से मुक्ति पाने का कोई विकल्प-उपाय नहीं होता। वह निरीह औरत की भांति उस अपराध की सज़ा आजीवन भुगतने को विवश होता है, जो उसने किया ही नहीं और न ही समाज द्वारा प्रदत्त होता है–उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार। इन परिस्थितियों में वह लड़का हो या लड़की, उसे अपना जीवन प्रतिदान रूप में देना पड़ता है…अपने सपनों-अरमानों को अपने हाथों रौंद कर; उनकी सहर्ष बलि देकर, अपने समस्त जीवन को बहन-भाइयों व माता-पिता के पालन-पोषण हेतु झोंकना पड़ता है। यहां लड़के- लड़की में भेद नहीं होता, क्योंकि यह मसला है, माता-पिता द्वारा की गई ग़लतियों का परिणाम भुगतने का..यहां तक तो समाज में समानाधिकार व्यवस्था लागू है…जिसमें कोई भेदभाव नहीं है। वैसे तो आजकल वृद्धावस्था में माता-पिता के भरण- पोषण का दायित्व, पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री को वहन करना लाज़िमी है। ठीक ही तो है, अब तो उसे संपत्ति में समानाधिकार प्राप्त है। अधिकार व कर्त्तव्य का चोली-दामन का साथ है। एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है। वैसे तो यह संतान का नैतिक दायित्व भी है।

हां! आवश्यकता है, माता-पिता को अपनी सोच बदलने की…सो! अब उन्हें बेटी के घर का अन्न-जल ग्रहण करने की परंपरा का त्याग करना होगा। वैसे भी बड़े-बड़े शहरों में अक्सर माता-पिता बेटियों के घर में रहते हैं। इसका मुख्य कारण है…बेटों का विदेशों में नौकरी करना और माता-पिता को पाश्चात्य  संस्कृति का रास न आना। अक्सर सिंगल चॉइल्ड होने के कारण भी बेटियों के लिए इस दायित्व को निर्वहन करना अनिवार्य हो जाता है।

आधुनिक युग में महिलाएं नौकरी करती हैं और दोहरा जीवन जीती हैं। परन्तु कहां बदल पाए हैं, हम अपनी दकियानूसी सोच; कहां त्याग पाए हैं रूढ़ियों, परंपराओं व प्राचीन मान्यताओं को… जिसका स्पष्ट प्रमाण है…पति व परिवारजनों की अपेक्षाओं में तनिक भी परिवर्तन न आना…जिसका संबंध उनकी सोच में परिवर्तनशीलता से है। परंतु वह सर्वथा असंभव है…ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। भले ही हम भौतिक दृष्टि से संपन्न हो गए हैं, परंतु हमारी सोच, विचारधारा व मानसिक धरातल सदियों पहले जैसा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…कन्या पक्ष के लोगों का वर-पक्ष के लोगों के सम्मुख ता-उम्र नत-मस्तक रहना; उनकी अप्रत्याशित इच्छाओं व मांगों की लंबी फेहरिस्त की पूर्ति करना, भले ही वे उस में सक्षम न हों। इतना ही नहीं, उनके माता-पिता और उनकी आगामी पीढ़ी के साथ न चाहते हुए भी संबंध-निर्वाह करना; उनकी नियति, मजबूरी व विवशता बन जाती है…. यहां तक कि मरणोपरांत मृत्युभोज व कफ़न जुटाना भी वधु के माता-पिता का ही दायित्व होता है। क्या हम चाह कर भी इन प्राचीन परंपराओं से भविष्य में भी मुक्ति पाने में समर्थ हो सकेंगे?

परंतु चंद महिलाएं अपनी संस्कृति को तज, ग़लत राहों पर चल पड़ी हैं। देर रात तक क्लबों में सिगरेट के क़श लगाना, जुआ खेलना तथा नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल है। अपहरण, फ़िरौती, हत्या व धन-सम्पदा पाने के लिए विवाह रचाना, पति व परिवारजनों पर दहेज की मांग का इल्ज़ाम लगा जेल भिजवाना–उनके शौक में शामिल है’, जिसमें महिला के माता-पिता का भी भरपूर योगदान रहता है। वे ‘तू नहीं, और सही’ और खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखने लगी हैं …वे हर पल को खुशी से भरपूर जी लेना चाहती हैं। सो! संबंध-सरोकार अंतिम सांसें ले रहे हैं… मरने के कग़ार पर हैं। लिव-इन के प्रचलन के कारण परिवार टूट रहे हैं; सिंगल पेरेंट की संख्या बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चे भुगत रहे हैं तथा अपराध-जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। सो! हमें प्रचलित मान्यताओं व अंधविश्वासों से मुक्ति पाने के लिए समाज में विवाह-रूपी संस्था को पुन: जीवन-दान प्रदान करना होगा। लिंग-भेद को नकारना होगा, ताकि तथाकथित माता-पिता ऐसे भीषण ग़ुनाह न करें और बच्चों को उनके कर्मों की सज़ा आजीवन न भुगतनी पड़े और वे अपने सपनों को साकार करने व जीवन को अपने ढंग से जीने को स्वतंत्र हों।

आइए! हम प्राचीन परंपराओं को तोड़, सामाजिक बुराइयों को दफ़न कर समूल नष्ट कर दें तथा नयी सोच, नयी उमंग व नयी तरंग के साथ, नवीन युग में पदार्पण करें, जहां लघुता-प्रभुता का भेद न हो और सब अपने कर्त्तव्य-दायित्वों का सहर्ष वहन करें। अपनी सीमाओं को लांघ, जीवन में मर्यादा का अतिक्रमण न करें, ताकि त्याग का सर्वोपरि भाव सदैव बना रहे। यही है मानव जीवन की अपेक्षा व पराकाष्ठा…जिसे धारण कर हम मासूमों को आत्महत्या करने से रोक पाएंगे…जो स्वयं को इन दायित्वों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाते हैं और वे पलायनवादिता की राह पर चल पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें अपने जीवन का अंत करने से सुगम, कोई दूसरा उत्तम उपाय-विकल्प दिखाई नहीं पड़ता।

परंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानव जीवन अनमोल है, जो हमें चौरासी लाख योनियों की यात्रा करने के पश्चात् प्राप्त होता है। सो! संबंधों को शाश्वत बनाए रखने के लिए दरक़ार है… स्नेह, सहयोग, समर्पण व त्याग की; प्रबल इच्छा-शक्ति, एकाग्रता व अटल विश्वास की… इन्हें जीवन में अपना कर, जहां हम संबधों व सरोकारों को जीवंतता प्रदान कर, समाज व देश को, समुन्नत व समृद्ध बना सकेंगे और स्नेह, प्रेम, सहयोग, सौहार्द, समन्वय व सामंजस्यता द्वारा समरसता का साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हो सकेंगे।

अंतत: मैं यह कहना चाहूंगी कि संबंध….अर्थात् यदि हम समान रूप से बंधे रहेंगे और मर्यादा व सीमाओं का उल्लंघन-अतिक्रमण नहीं करेंगे, तो ग़िले-शिक़वे व शिकायतें स्वत: समाप्त हो जाएंगी… हम अपने-अपने द्वीप से बाहर निकल, सौहार्दपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। स्वार्थहीन संबंध स्थायी होते हैं, क्षणिक नहीं…न उनमें कोई वाद-विवाद व संघर्ष होता है; न ही प्रतिदान की इच्छा व आकांक्षा। सो! यही है संबंधों के स्थायित्व का मात्र उपादान, जिससे मर्यादा भी सुरक्षित रह सकेगी।।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७३ – नवगीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम

? रचना संसार # ७३ – गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।

चलो सखी झूला झूलें हम,

शीतल सी बौछारों में।।

*

छोड़ घोंसलें भीगे-भीगे,

पंछी आए आँगन में।

नहीं मिला दाना चुगने को,

अब के देखो सावन में।।

चल झरनों से बात करें हम,

झम-झम करें फुहारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

धरती मिलने चली गगन से,

नयनों में काजल डाले।

आलिंगन को व्याकुल सरिता,

प्रीति समंदर-सी पाले।।

सुधि-बुधि खो कलिकाएँ बैठी,

भ्रमरों की गुंजारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

मादक अधर मिलन को व्याकुल,

मोहे पुरवाई प्यारी।

सुलगे देह प्रीति में साजन,

काम -बाण से मैं हारी।।

यौवन प्रेम मगन हो नाचे,

चाहत की झंकारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०२ ☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मौसम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

मौसम बदला आज कुछ, धुंध हुई कुछ साफ।

ठंडी -ठंडी चली हवा, हमने ओढ़ लिहाफ।।

 *

सूरज डूबा देख लो, मोहक होती शाम।

रजनी का आमंत्रण है, सपनों में मुलाकात।।

 *

चादर तम की भीतरी, चाँद झाँकता आज।

कितनी सुंदर चाँदनी, बज उठे हैं साज।।

 *

सूरज कंबल ओढ़ता, उसे लगी है ठंड।

चादर कुहरे की बढ़ी, मिला सभी को दंड।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८३ ☆ संतोष के दोहे – (तुलसी माँ की कथा) ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके संतोष के दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८३ ☆

संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

(तुलसी माँ की कथा) 

तुलसी माँ पिछले जनम, थीं वृंदा का रूप |

ईश विष्णु की भक्ति में, खूब गईं थीं डूब |

जालंधर से जब हुआ, वृंदा का सुविवाह  |

वृंदा पत्नी धर्म का, पूर्ण किया निर्वाह ||

देव-असुर  में जब हुआ, बहुत बड़ा संग्राम |

जालंधर भारी पड़ा, मचा खूब कुहराम ||

वृंदा ने तब ही किया, पूजन वंदन ध्यान |

वृंदा पुण्य प्रताप से, हारे देव महान ||

जगदीश्वर से देवता, करने लगे गुहार |

हमें सुरक्षित कीजिये, जालंधर संहार ||

वृंदा जैसी भक्त से, छल पर करें विचार|

कहें विष्णु इस युद्ध में, विजय मिले या हार ||

देव सभी करने लगे, विनती बारम्बार |

विष्णु जी ने तब लिया, जालन्धर आकार ||

पहुँचे वृंदा महल में, धर जालंधर रूप |

पूजा से वृंदा उठीं, इच्छा हुई विरूप  ||

जब वृंदा ने पग छुए, रूठे सब सत्कर्म |

जालन्धर की मृत्यु का, वृंदा समझीं मर्म ||

वृंदा ने जब क्रोध में, दिया विष्णु को श्राप |

बन जाओ पाषाण तुम, हुईं सती चुपचाप ||

उद्भव पावन स्थान पर, तुलसी पादप आप |

बोल उठे यह देख कर, क्षमा करें सब पाप ||

वृंदा के सुसतीत्व को, दिया बहुत सम्मान |

पूजन मेरे संग हो, सदा मिलेगा मान ||

सतवंती की शक्ति से, चकित स्वयं भगवान |

नारी की महिमा बड़ी, उसका हो सम्मान ||

तुलसी शालिग्राम का, करिए साथ विवाह |

एकादश तिथि में मिले, देवाशीष अथाह ||

आँगन तुलसी राखिये, बिन तुलसी घर सून |

रहता मन “संतोष” तब, खुशियाँ होतीं दून ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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