हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३९ – कविता – जो रस था गांव की माटी में ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३९ ☆

☆ कविता ☆ ~ जो रस था गांव की माटी में ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

क्यों कहां खो गयीं संस्कृतियाँ

 खोये वे अपने मानदंड

 खो गई धरोहर पुरखों की

 क्यों हुए आज  इतने उद्दंड

*

 भोजन करने के नीति नियम

 के पीछे वैज्ञानिक कारण था

 व्रत फलाहार नियमों में था

 व्रत के उपरांत ही पारण था

*

 पर आज हर तरफ लोप हुआ

 भोजन की पंगत नहीं रही

 सब खड़े-खड़े भोजन करते

 साधु की संगत नहीं रही

*

 तामस भोजन का चलन चला

छूटा घी, खांड, दूध, दही

चूल्हा, चौका, अइला, घईली

 खोयी घर की कंहतरी, रही

*

 ताजा गन्ना,शरबत खोया

खोया भाजी, भूना हो रहा

तिल वाली तिलकुट कहाँ गयी

बयना का तिलवा कहाँ रहा

*

 ये सभी व्यंजन अमृत थे

 थे प्यार के रस में पगे हुए

 रिश्ते भी अमृत जैसे थे

 थे आपस में थे बंधे हुए

*

 श्रेयस उस रस को ढूंढ रहा

 जो रस था  गांव की माटी में

 नीरस जीवन, रुखे रिश्ते

 होते शहरी परिपाटी में 

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

08 जुलाई 2022 को हम श्रीनगर से पहलगाम जा रहे हैं। पहलगाम का रास्ता भी सैलानियों को बहुत प्रभावित करता है। मार्ग में पाम्पोर में केसर के खेत दिखाई देते हैं। जगह-जगह क्रिकेट के बैट रखे नजर आते हैं। यहां विलो-ट्री की लकडी से बैट बनते हैं। रास्ते पर सबसे पहले पम्पोर आया। जिसे पम्पर या पानपर के नाम से भी जाना जाता है। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग झेलम नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित कश्मीर का एक ऐतिहासिक शहर है। प्राचीन काल में इसे पदमपुर के नाम से जाना जाता था। यह अपने केसर के लिए प्रसिद्ध है। पम्पोर दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है जहां दुनिया का सबसे महंगा केसर उगाया जाता है। पम्पोर केसर के लिए जगप्रसिद्ध है जिसका पाँच साला पौधा छै पत्तियाँ धारण करता है। अक्टूबर में फसल आती है। तीन पत्तियाँ लाल और तीन पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। लाल रंग की पत्तियाँ असली केसर होता है। जो बहुत महँगा मिलता है। हरे रंग की पत्तियों का औद्योगिक उपयोग पान और सब्ज़ी में मसालों के तौर पर होता है। यह क्षेत्र श्रीनगर शहर के केंद्र लाल चौक से लगभग 11 किलोमीटर दूर है। पम्पोर के क्षेत्र में स्थानों के नाम आम तौर पर -बल प्रत्यय के रूप में होते है, जैसे नामलाबल, कदलाबल, द्रंगबल, फ़्रेस्टबल और लेट्राबल के इलाके। पम्पोर में तीन झीलें भी हैं, झीलों में से एक सरबल झील के नाम से जानी जाती है। सरबल झील, तुलबाग से वुयान के रास्ते में चटलम के पास केसर के खेतों से होते हुए जाती है। चटलाम के निकट स्थित होने के कारण इसे चटलाम आर्द्रभूमि भी कहा जाता है।

उसके बाद अवंतिपुर या अवंतीपोरा आया, जिसे वूंटपोर के नाम से जाना जाता है। शहर का नाम अवंतिपुर कश्मीरी राजा अवंतिवर्मन के नाम पर रखा गया था और इसमें उनके द्वारा निर्मित 9वीं शताब्दी के दो हिंदू मंदिरों के खंडहर हैं। इस शहर की स्थापना अवंतिवर्मन ने की थी जो उत्पल वंश के पहले राजा थे और उन्होंने 855 से 883 ईस्वी तक कश्मीर पर शासन किया था। अवंतिवर्मन ने राजा बनने से पहले अवंतीपोरा में विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर का निर्माण किया, जिसे “अवंतिसवामिन” कहा जाता है। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने शिव को समर्पित “अवंतीश्वर” नामक एक दूसरा हिंदू मंदिर बनाया। दोनों मंदिर विशाल आयताकार पक्के आंगनों में बनाए गए थे। वे मध्य युग में नष्ट हो गए। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वविद् दया राम साहनी द्वारा उनकी खुदाई की गई थी। भारतीय राज्यों में सिर्फ़ कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसका प्रामाणिक इतिहास कल्हण नामक विद्वान द्वारा राज़तरंगिणी नाम से अवंतीपुर में ही लिखा गया था।

भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कश्मीर में नाग, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड। श्रीनगर से 53 किलोमीटर की दूरी पर अनंतनाग है। यह श्रीनगर और जम्मू के बाद जम्मू और कश्मीर का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। इस शहर को इस्लामाबाद और अनंतनाग दोनों नामों से पुकारा जाता है।

शहर का संस्कृत नाम अनंतनाग नीलमात पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है। कश्मीर और लद्दाख के राजपत्र के अनुसार, इसका नाम विष्णु के महान नाग और अनंत काल के प्रतीक अनंत के नाम पर रखा गया है। माना जाता है कि इस्लामाबाद नाम एक मुगल गवर्नर इस्लाम खान के नाम से लिया गया है, जिन्होंने इस क्षेत्र में एक बगीचा लगवाया था।

डोगरा शासन के दौरान, अनंतनाग/इस्लामाबाद कश्मीर घाटी के तीन जिलों में से एक का मुख्यालय था, जिसे “अनंतनाग वज़रात” कहा जाता था। मार्तंड सूर्य मंदिर कश्मीर के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है, जिसे लगभग 500 ईस्वी में बनाया गया था। यह मंदिर अनंतनाग से 9 किमी पूर्व-उत्तर-पूर्व और मट्टन के दक्षिण में केहरीबल में स्थित है। इस प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को शासक सिकंदर बुतशिकन ने नष्ट कर दिया था। अनंतनाग में एक रेस्टोरेंट में नाश्ता और काफ़ी पीकर चल दिए।

अमरनाथ यात्रा के कारण कई जगह जाम लग रहा था इसलिए क़ाफ़िला घिसटते हुए चल रहा था। हम लिद्दर नदी की कलकल के सरगम में ठंडी हवाओं के साथ चिनार और पाइन पेड़ों से बात करते आगे बढ़ते रहे। लिद्दर नदी पहले कभी लम्बोदरी नदी कहलाती थी। पेड़ों पर आशियाना जमाये पक्षी दिख जाते और हमें देखकर फुदक लेते। एक बंदरिया बच्चों को समेटने में परेशान थी। पाइन के पेड़ पर सुबह के नाश्ते के बाद की ऊधम उसकी परेशानी का सबब थी। उसके बच्चे पेड़ की डाल से लटक कर नीचे आ जाते। बंदरिया उन्हें पेड़ पर चढ़ने को हड़काने के लिए नीचे उतरती तो बच्चे ऊपर चढ़ जाते। ट्राफ़िक जाम में बंदरों की मटरगस्ती और लिद्दर नदी के बहाव के साथ एक कौए की काँव-काँव सुनकर चीड़-चिनार-देवदार वृक्षों की तरफ़ ध्यान गया। जिनके साये में ट्राफ़िक जाम का वक़्त गुज़ारा। ख़्याल आया कि इस सुंदर वातावरण में कोयल कूकनी चाहिए। परंतु कोयल कश्मीर में नहीं कूकती। उसे कूकने के लिए सतपुड़ा वाले आम के पेड़ चाहिए।    

इनके अलावा अवंतिपुर में 9वीं शताब्दी में बने दो मंदिरों के भग्नावशेष तथा मार्तड का सूर्य मंदिर भी आकर्षक हैं। सागरतल से 2130 मीटर की ऊंचाई पर बसा पहलगाम कभी चरवाहों का छोटा सा गांव था। किंतु यहां बिखरी नैसर्गिक छटा ने इसे खुशनुमा सैरगाह बना दिया। लिद्दर नदी इसकी छटा को और बढाती है। नदी पर कई जगह बने लकडी के पुल और दूर दिखते हिमशिखर पिक्चर पोस्टकार्ड से दृश्य प्रस्तुत करते हैं। देवदार के जंगल, झरने और फूलों के मैदान तो जगह-जगह नजर आएंगे। बैसरन के मर्ग, आडु, चंदनवाडी जैसे स्थान घोडों पर बैठकर घूमे जा सकते हैं। साहसी पर्यटक पहलगाम से तरसर, मरसर झीलें, दुधसर झील और कोलहाई ग्लेशियर जैसे ट्रेकिंग रूटों पर निकल सकते हैं। अमरनाथ यात्रा का मुख्य मार्ग पहलगाम से चंदनवाडी, शेषनाग, महागुनस, पंचतरणी, संगम होते हुए अमरनाथ गुफा जाता है।

हमारा क़ाफ़िला ग्यारह बजे पहलगाम पहुँचा। पहलगाम शाब्दिक अर्थ = चरवाहों का गाँव है। जम्मू और कश्मीर के अनन्तनाग जिले का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। साथ ही अमरनाथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। विश्व भर से हजारों पर्यटक प्रति वर्ष यहाँ आते हैं। यह अनन्तनाग से 45 किमी की दूरी पर लिद्दर नदी के किनारे स्थित है। पहलगाम, अननतनाग ज़िले की पाँच तहसीलों में से एक तहसील है। अनंतनाग से पहलगाँव की तरफ़ रास्ता मुड़ते ही लिद्दर नदी आपका स्वागत करती है। लिद्दर नदी किसी समय लम्बोदरी नाम से जानी जाती थी।

लिद्दर घाटी की पश्चिमी सीमा कश्मीर घाटी से लगी है और उत्तरी सीमा सिंधु घाटी के लगती है। घाटी की कुल लंबाई  40 किलोमीटर है। इसकी अधिकतम चौड़ाई पांच किमी है। लिद्दर बेसिन, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में पीर पंजाल रेंज, उत्तर में सिंधु घाटी और पूर्वोत्तर में जांस्कर श्रेणी द्वारा परिसीमित है।  लिद्दर जल निकासी बेसिन का कुल  क्षेत्र 1,134 किमी है। यह घाटी लिद्दर नदी द्वारा निर्मित है जो अंग्रेजी के वाई (Y) अक्षर के आकार में है। पहलगाम के ऊपर नदी दो धाराओं, पूरबी लिद्दर और पच्छिमी लिद्दर के रूप में बहती है। इन दो धाराओं में से पूर्वी लिद्दर नदी ऊपर की ओर चन्दनवाड़ी से होकर गुजरती है और इसका स्रोत शेषनाग झील और शीशराम ग्लेशियर है। पश्चिम लिद्दर नदी कोल होई ग्लेशियर से निकलती है और अपने रास्ते में कई हरे शंकुधारी जंगलों और अल्पाइन घास की उपत्यकाओं से गुजरती है। लिद्दर घाटी अन्य ज़िलों के लिये स्वच्छ जलापूर्ति का स्रोत है और साथ ही कृषि हेतु सिंचाई का साधन भी।  लिद्दर नदी अपने मार्ग में कई उल्लेखनीय प्राकृतिक स्थलों और पर्यटन स्थलों, उदाहरणार्थ, अरु, पहलगाम, बेताब घाटी, और अकद से होकर गुजरती है। इस घाटी में अवस्थित मुख्य कस्बों में मंडलान, लारिपोरा, फ्रास्लन, अशमुकाम और सीर हमदान हैं।

पहलगाम में घुड़सवारी का भय मिश्रित मज़ा लिया। तीन घंटे घुड़सवारी का एक स्पॉट मिनी-स्विट्ज़रलैंड है। जिसका रेट 2,500.00 रुपए प्रति सवार है। सौदेबाज़ी के बाद 2000.00 प्रति सवार तय हो गया। घोड़े पर बैठ कर सीधे पहाड़ चढ़ना सचमुच दिलेरी का काम है। पत्थर, कीचड़, पेड़, पौधे, अन्य घुड़सवार के बीच शुरू में घबराहट हुई। परंतु घोड़े पर बैठने की तकनीक समझने पर सहजता आ गई। सीधी चढ़ाई चढ़ने में अधिक पता नहीं चला लेकिन उतरने में सामने खाई दिखने से भय लगता रहा। घोड़े भी आपस में टकराते रहे। घोड़ा एक पेड़ के किनारे चला तो दाहिनी घुटना पेड़ से टकरा गया। एक कराह के साथ मुँह से गाली निकल गई।

एक फ़ोटोग्राफ़र प्रति फ़ोटो प्रिंट का 100.00 माँग रहा था, और उसकी फ़ोटो मोबाईल में देने का 20.00 प्रतिफ़ोटो। सौदेबाज़ी उपरांत क्रमशः 50.00 और 10.00 रुपए तय हुआ। उसने 128 फ़ोटो निकाल लिए। फ़ोटो प्रिंट में समय अधिक लगना था इसलिए मोबाईल में फ़ोटो लेने की सौदेबाज़ी शुरू हुई। उससे सारी फ़ोटो 1000.00 रुपए में ले लीं। वहीं पराठा खाया और घोड़े पर सवार होकर वापिस चल दिए।

अनंतनाग-पहलगाम सड़क पर ग्रीनहाइट होटल में रुके। एक बहुत ही शानदार और खूबसूरत लोकेशन पर आरामदायक होटल की बालकनी से लिद्दर नदी पर राफ़्टिंग के नज़ारे लुभावने थे। हमसे रहा नहीं गया। बालकनी में कुर्सी रखकर अड्डा जमाया। कमरे की बालकनी से सामने लिद्दर नदी के पार पहाड़ियों की एक के बाद एक चार क़तार दिख रही हैं। उनके पीछे सूर्य अस्ताचलगामी हो रहा है। नदी के दोनों तरफ़ होटलों का अम्बार है। दाहिनी तरफ़ पहाड़ों की आठ-दस क़तारें और उनके ऊपर बादलों की अठखेलियाँ आकर्षित कर रही हैं। लिद्दर नदी की ध्वनि सुनते बहुत देर तक बालकनी में बैठे रहे।

सैलानियों को आकर्षित करने वाले अन्य स्थानों में कोकरनाग 2012 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान औषधीय गुणों वाले प्राकृतिक चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीरी भाषा में नाग का अर्थ चश्मा भी होता है। वेरीनाग में भी कुछ प्राकृतिक चश्में हैं। यहां बादशाह जहांगीर ने चश्मों का जल एक ताल में एकत्र कर उसके आसपास एक उद्यान बनवाया था। 80 मीटर के दायरे में फैले आठ कोणों वाले इस ताल एवं उद्यान में चिनार के वृक्षों की कतारें सैलानियों का मन मोह लेती है। चार बजे के लगभग आधा घंटा वहाँ बिताया।

09 जुलाई 2022 को सुबह छै बजे पहलगाम से गुलमर्ग के लिए रवाना होना था लेकिन दो साथियों की तबियत ठीक न होने की वजह से नौ बजे के बाद रवाना हो सके। कश्मीर घाटी में श्रीनगर से किसी भी दिशा में निकल जाएं तो प्रकृति के इतने रूप देखने को मिलते हैं कि लगता है जैसे प्रकृति ने अपना खजाना यहीं छुपा रखा है। गुल का मतलब फूल और मर्ग याने वादी, गुलमर्ग का अर्थ हुआ फूलों की वादी। लिद्दर नदी में कल साफ़ कंचन पानी प्रवाहित हो रहा था। विगत रात अमरनाथ गुफा पर बादल फटने से आज सुबह लिद्दर नदी का पानी मटमैला हो गया है। अमरनाथ गुफा के एकतरफ से झेलम और सिंधु नदियों की सहायक नदियों का प्रवाह है।

अमरनाथ गुफा के पास बादल फटा है। सैलाब आया, कई लोग मारे गए, कई लापता हैं। इसे प्राकृतिक आपदा कहकर बात खत्म नहीं की जा सकती। प्रकृति ने नदी के रास्ते में तंबू लगाने के लिए नहीं कहा था। कोई तो ऑथोरिटी होगी, जिसकी देख रेख में अमरनाथ यात्रा चल रही है। क्या श्राइन बोर्ड इस आपदा के लिए ज़िम्मेदार नहीं? साफ दिख रहा है कि नदी के बीच में तंबू लगे हैं। पहाड़ों में मौसम की अनिश्चितता के चलते अतिरिक्त सावधानी की ज़रूरत थी। पहाड़ों को जिस क्रूरता के साथ काटा जा रहा, जंगल काटे जा रहे हैं, उससे पहाड़ कमज़ोर हुए हैं। बुलडोजरों से पहाड़ भी आतंकित हैं।

गुलमर्ग जाने के लिए अनंतनाग, अवंतिपुर के बाद नारबल से बाईं तरफ़ कट गया। कश्मीर में कौए और कुत्ते खूब हैं और खूब तंदुरुस्त भी हैं। सर्वत्र मांसाहार होने से बचा-खुचा खाना और कचरा उनका खाना ख़ज़ाना होता है। यदि ये दोनो यहाँ न हों तो धरती का स्वर्ग जानवरों हड्डियों और पक्षियों के पंखों से भर जायेगा। यह भी कश्मीरियत है। सुबह पैदल घूमने निकले तो फ़ौजियों से मेल-मुलाक़ात हुई। वे बनारस, नागालैंड और उत्तराखंड से आकर यहाँ ड्यूटी निभा रहे हैं। उन्हें स्टेट बैंक का अफ़सर होना बताया तो उन्होंने खुश होकर जयहिंद कहा। कुछ देर उनके निजी जीवन पर चर्चा हुई। उन्होंने हमसे पूछा कि सेवानिवृत्त जीवन कैसा चल रहा है। हमने जो बात कही वह उनके दिल को छू गई- हमने कहा- हर छै माह में लम्बा निकल लेते हैं। पैसा छोड़ कर जाएँगे, लड़का है तो बहु उड़ाएगी और बेटी है तो दामाद उड़ाएगा, इससे कहीं ठीक है कि आधा ख़ुद उड़ा कर जाओ। आधा छोड़ जाओ। वे हँस दिए, हम चल दिये।

कल बक़रीद है। कल से तीन दिन सब बंद रहेगा। लोग ईद की ख़रीदी में भारी संख्या में बाज़ारों में पहुँच रहे हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस भारी संख्या में सड़क पर उतरी है। हर एक किलोमीटर के फ़ासले पर एक सुरक्षित वाहन कश्मीर पुलिस का और दूसरा रिज़र्व पुलिस का मुस्तैद है। हालाँकि दंगा उपद्रव की कोई सम्भावना नहीं है। ताली दो हाथ से बजती है और यहाँ दूसरा हाथ नदारत है। और अभी चुनाव भी नहीं हो रहा है। अचानक ट्रेन का फाटक आ गया। बारामूला से बनिहाल ट्रेन चलने लगी है। वह निकलने वाली है। हम रुके हैं।

जम्मू-बारामूला लाइन को जम्मू और कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए बिछाया जा रहा है। 356 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक जम्मू से शुरू होकर बारामूला पर खत्म होगा। यह भारतीय रेलवे के उत्तरी क्षेत्र के फिरोजपुर रेलवे डिवीजन के अधिकार क्षेत्र में आता है। 359 मीटर (1,178 फीट) लंबा चिनाब ब्रिज इस लाइन पर बना है। मार्ग के निर्माण में प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिसमें प्रमुख भूकंप क्षेत्र और दुर्गम इलाके शामिल हैं। यह रेल अभी बनिहाल से बारामूला तक चल रही है। सरकार ने अगस्त 2022 तक कटरा-बनिहाल खंड को पूरा करने के लिए समय-सीमा तय की है, लेकिन कटरा-बनिहाल खंड को तय समय सीमा में पूरा करना मुश्किल लगता है।

बहुत देर होती देख सड़क पर उतर गये। एक कश्मीरी सज्जन से बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कश्मीर में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती है। सरकारी स्कूलों में उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती है। कॉन्वेंट स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम है परंतु हिंदी नहीं बल्कि उर्दू एक वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। सभी हिंदी बोलते और समझते हैं लेकिन लिखना पढ़ना नहीं आता है। यहाँ सम्पर्क भाषा को हम हिंदी के बजाय हिंदुस्तानी कह सकते हैं। जम्मू-श्रीनगर रोड पर पुलिसिया हुक्म से रुके हैं। उन्होंने सामने से बालटाल से लौटने वाला अमरनाथ यात्रा कारवाँ छोड़ा है। बस, मिनी बस, कार, ट्रैव्लर्ज़ सरपट दौड़ रहे हैं। हमारी कार के सामने मुस्तैद सिपाही खड़ा है। हम संतरे की गोली चूस रहे हैं। उनका दाहिना हाथ बट पर और बायाँ हाथ बैरल पर है। ज़रा सी भी ग़ैर-बाजिब हरकत पर आप गोलियों के हमदम हो सकते हैं।

पर्यटन के दौरान सैलानी अक्सर खाने पीने में गलती करते हैं। पैकेज में ब्रेकफ़ास्ट और डिनर शामिल होता है। लोग क्या खाना है, निश्चित नहीं करते। वे वहाँ क्या परोसा गया है और लोगों की प्लेट में क्या खाया जा रहा है। ख़ुद की ज़रूरत और पचाने की क़ाबिलियत को अनदेखा कर गफ़लत में ठूँस कर नाश्ता कर लेते हैं। अपच के शिकार होते हैं। फिर कम खाना लेने से और खूब चलने से कमजोर होकर इन्फ़ेक्शन पकड़ लेते हैं। सैलानी को पाचन क्षमता और घूमने में मेहनत के हिसाब से खुद की प्लेट तय करनी चाहिए। 

असल में पर्यटन आसान काम नहीं है। लोग या तो ज़रूरत से अधिक खाकर पेट ख़राब कर लेते हैं या सही समय पर सही खाना नहीं खाने और अधिक मेहनत से कमजोरी के कारण इन्फ़ेक्शन के शिकार हो जाते हैं। सही समय पर सही भोजन और आराम से सेहत दुरुस्त रहती है। साथ में मानसिक और भावनात्मक मज़बूती भी पर्यटन में ज़रूरी है। अन्यथा आप घूमने का आनंद लेना तो दूर की बात है, चिड़चिड़े होकर सम्बन्धों को ख़राब कर सकते हैं। 

दो सदस्यों की तबियत ख़राब हो गई है। एक को ठंड लगने से टॉन्सिल में इन्फ़ेक्शन हो गया है। दूसरी सदस्य को सर्दी जुकाम हुआ था तब से पेट साफ़ नहीं हो रहा है। पम्पोर लेठपोरा में शाश्वत और प्रतिभा को अमरनाथ यात्रा हेतु तैनात स्वास्थ्य शिविर में दिखाया। वहीं एक केसर की दुकान पर्ल ओफ़ कश्मीर से 250.00 में गोरे और चमकदार होने के लिए एक ग्राम केसर और दिल की माली हालत सुधारने के लिए 400.00 में कहवा का एक डिब्बा यह सोच कर ख़रीदा कि अब फिरसे जवाँदिल और गोरे होकर कश्मीर आयेंगे। सौदेबाज़ी के बाद 650.00 की जगह 550.00 ही भुगतान किए।

नारबल से गुलमर्ग के लिए मुड़े। यहाँ से बारामूला 37 किलोमीटर और उरी 86 किलोमीटर दूर है। उसके उस तरफ़ मुज़फ़राबाद बॉर्डर है। जहाँ से भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार होता है। आगे मागम से निकले। ईद की ख़रीददारी शबाब पर दिखी। पापलर पेड़ की क़तारें शुरू हो गईं। जो कि गुलमर्ग की पहचान हैं। कुंजर और टंगमर्ग के बाद हम गुलमर्ग पहुँच गये। हम गुलमर्ग रिज़ॉर्ट में रुके। पुराना होटल हट टाइप बना है। केबल कार में बैठकर आसमान नापने की क़वायद में एक एजेंट को बुलाकर पता किया तो उसने कहा-कल ईद होने के कारण सभी स्टाफ़ चला गया है, और उसकी बुकिंग ऑनलाइन होती है। वह भी बंद हो चुकी है। इसलिए घोड़ों से या बड़ी गाड़ी से घूमने का विकल्प है।

राजमार्गो पर लगे दिशा-निर्देशों पर लिखे अनेक शहरों के नाम सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन अधिकतर सैलानी, गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम आदि घूमने जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में कई छोटे सुंदर गांव और आसपास धान के खेत आंखों को सुहाते हैं। सीधी लंबी सडक के दोनों और ऊंची दीवार के समान दिखाई पडती पेडों की कतार अत्यंत भव्य दिखाई देती है। पुरानी फिल्मों में इन रास्तों के बीच फिल्माए गीत पर्यटकों को याद आ जाते हैं। तंग मार्ग के बाद ऊंचाई बढने के साथ ही घने पेडों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ देर बाद सैलानी गुलमर्ग पहुंचते हैं तो घास का विस्तृत तश्तरीनुमा मैदान देख कर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार उत्तराखंड में पहाडी ढलवां मैदानों को बुग्याल कहते हैं, कश्मीर में उन्हें मर्ग कहते है। गुलमर्ग का अर्थ है फूलों का मैदान। समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग सैलानियों के लिए वर्ष भर का रेसॉर्ट है। यहां से किराये पर घोडे लेकर खिलनमर्ग, सेवन स्प्रिंग और अलपत्थर जैसे स्थानों की सैर भी कर सकते हैं। घोड़े से खिलन मर्ग, चिल्ड्रन पार्क, महाराजा पैलेस तक जाकर फ़िज़ा का लुत्फ़ उठा सकते हैं। केबल कार (गंडोला) द्वारा गुलमर्ग से कुँगडोरा जाकर चारों तरफ़ मनभावन दृश्यों का आनंद के सकते हैं।

विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फकोर्स भी यहीं है। सर्दियों में जब यहां बर्फ की मोटी चादर बिछी होती है तब यह स्थान हिमक्रीडा और स्कीइंग के शौकीन लोगों के लिए तो जैसे स्वर्ग बन जाता है। यहां चलने वाली गंडोला केबल कार द्वारा बर्फीली ऊंचाइयों तक पहुंचना रोमांचक लगता है। ढलानों पर लगे चीड या देवदार के पेडों पर बर्फ लदी दिखती है। तमाम पर्यटक बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं तो बहुत से स्लेजिंग करके ही संतुष्ट हो लेते हैं। यहां पर्यटक चाहें तो स्कीइंग कोर्स भी कर सकते हैं। हर वर्ष होने वाले विंटर गेम्स के समय यहां विदेशी सैलानी भी बडी तादाद में आते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला नंदा देवी, एलओसी और पीर पंजाल रेंज का शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। हिमालय पर्वतमाला की सुंदरता को संजोने के अलावा, पर्यटक घुड़सवारी और स्नो स्कीइंग जैसी अन्य गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। केबल कार गुलमर्ग गोंडोला दुनिया की दूसरी सबसे लंबी और दूसरी सबसे ऊंची केबल कार है।  दो चरणों में विभाजित, यह प्रति घंटे लगभग 600 लोगों को अपहरवत पर्वत तक ले जाता है, जहां गुलमर्ग में अधिकांश शीतकालीन खेल होते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला के चरण 1 द्वारा गुलमर्ग रिज़ॉर्ट से कोंगदूरी पर्वत (मध्य स्टेशन) तक पहुँचे। यह 2,990 मीटर की ऊँचाई से शुरू हुआ और 400 मीटर की ऊर्ध्वाधर वृद्धि से 3390 मीटर की ऊँचाई पर पहुँचा कर रुका। गुलमर्ग गोंडोला का चरण 2 कोंगदूरी पर्वत को अपहरवत चोटी से जोड़ता है। केबल कार 1,330 वर्टिकल मीटर से लगभग 4,000 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ती है। स्टेशन पर पहुंचने के बाद पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए 30 मिनट का ट्रेक किया। यहां से एलओसी या नियंत्रण रेखा दिखाई दे रही है।

सबसे रमणीय स्थानों में से एक, खिलनमर्ग हिमालय की कुछ सबसे ऊंची चोटियों की मनोरम झलकियों से घिरा हुआ है। खिलनमर्ग एक लघु घाटी है जो 6 किमी की पैदल दूरी पर गुलमर्ग से 2000 फीट ऊपर स्थित है और जम्मू-कश्मीर में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। यह स्थान साहसिक खेलों के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का सही समावेश है, जो इसे हजारों आगंतुकों के लिए एक पसंदीदा स्थान बनाता है। ऑफबीट यात्रा के प्रति उत्साही लोगों के लिए खिलनमर्ग एक बेहतरीन जगह है क्योंकि यह स्थान सीधे वाहनों से उपलब्ध नहीं है। इस जगह तक पहुंचने के लिए या तो गुलमर्ग से पैदल चलना पड़ता है या एक टट्टू लेना पड़ता है। टट्टू की सीधी चढ़ाई चलनी पड़ी।

खिलनमर्ग वसंत ऋतु में खिलने वाले और सुगंधित फूलों से आच्छादित है और सर्दियों में स्कीइंग के प्रति उत्साही लोगों के लिए एक प्रिय गंतव्य है। जब ऊपर पहुँचे तो नंगा पर्वत शिखर और नन और कुन की जुड़वां चोटियाँ भी खिलनमर्ग से दिखाई दे रही थीं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १७ – अरावली… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपकी एक भावप्रवण रचना “अरावली“.)

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १७ ?

? अरावली… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

= 1 =

मज़बूर है बेबस है,वो अरावली सा है l

उत्तर की खोज में एक,प्रश्नावली सा है ll

= 2 =

बिछी हुई सियासती,बिसात हर तरफ़

सरकारी छतों से उफ़,बरसात हर तरफ़

माहौल आक़ाओं की विरुदावली-सा है ll

= 3 =

गीतावली दोहावली कवितावली सभी

सच की सूक्तियाँ लिए,शब्दावली सभी

ये ख़लबली हर धनबली,बाहुबली-सा है ll

= 4 =

श्रद्धांजलि पुष्पांजलि दिखावटी है सब

संवेदना बनावटी-मिलावटी  है अब

बर्ताव ऊपरी भले ही,मखमली सा है

= 5 =

चापलूसी-चमचागिरी की बयार है

झूठ की बहार,सच का तिरस्कार है

राजपथ भी अब तो,सँकरी गली सा है

= 6 =

बिछा रहे हैं शूल वो,राहों में हर तरफ़

पढ़ा नहीं जिन्होंने कभी,प्यार का हरफ़

अन्दर वो ज़हर,बाहर गुड़ की डली सा है

= 7 =

रंगीनियाँ-रौनक़ में,मेहबूबा की गली सा

मनहूस दरअसल,वो है कपटी छली सा

बहरूपिया लल्ला सा,कभी लली सा है

 = 8 =

चाहे जो चबा जाये,ऐसी मूँगफली सा

भौंरा जो मँडराये,उस फूल कली सा

चरित्र ये उस्मान की चित्रावली सा है

= 9 =

‘राजेश’ की हर दृश्यावली दीपावली सी

मेरी तो वंशावली है,गंगाजली सी

मेरा दर्द तुलसी की रत्नावली सा है ll

 

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९० ☆ मुक्तक ।। नव वर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९० ☆

☆ मुक्तक ।। नव वर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

विधा।।।।

= 1 =

नववर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है।

तुझकोअब पीड़ा दर्द हर मन से हरना है।।

करनीआलोकित धरा नवप्रभात किरणों से।

किसी महामारी से अब और नहीं डरना है।।

= 2 =

हर मन में तुझको भाव सदभाव भरना है।

भाव घृणा का तुझको अब नष्ट करना है।।

अहम नहीं  अहमियत का विचार जगाना।

मानवता को सदा लिए जीवित रखना है।।

= 3 =

शत्रु  की हर ललकार का उत्तर धरना है।

हर निर्बल निर्धन की भी झोली भरना है।।

विश्व में भारत मस्तक करना ऊंचा और।

हर दिल से निकालना प्रेम का झरना है।।

= 4 =

हे नववर्ष नारी समता   का पाठ पढ़ना है।

नैतिक शिक्षा प्रसार और अधिक करना है।।

मां भारती चरणोंअलख जलानी देशप्रेम की।

प्रकृति का दामन भी हरियाली से भरना है।।

= 5 =

नववर्ष आशायों का दामनऔर भरना है।

नई-नई चुनौतियों से अभी और लड़ना है।।

जन-जन के सपनों में   भी भरना है रंग।

नववर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “जागर विश्वजननीचा” -लेखिका : सुश्री कल्याणी हर्डीकर ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “जागर विश्वजननीचा” -लेखिका : सुश्री कल्याणी हर्डीकर ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक : जागर विश्वजननीचा 

लेखिका: कल्याणी हर्डीकर

पृष्ठे: २७२

मूल्य : ३९५₹ 

या विश्वाच्या उत्पत्तीला कारण ठरली आहे स्त्रीशक्ती, मातृरूपातल्या या स्त्रीशक्तीची प्राचीन काळी सर्वत्र पूजा होत असे. तिला देवी मानले जात असे, तिचा सन्मान राखला जात असे. तथापि कालांतराने पितृसत्ताक धर्माचा प्रभाव वाढत गेला आणि हिंदू धर्माच्या प्रभावाखालचा आपला भारत देश वगळता दुर्दैवाने इतरत्र सर्वत्र मातृपूजा किंवा देवतांचे अस्तित्व यांचा लोप होत गेला…. भारतात मात्र या आदिशक्तीची विविध रूपांत उपासना होतच राहिली. अनेक आक्रमणांना धैर्याने तोंड देत आणि असंख्य संकटांवर मात करीत भारतात विविध देवतांचा वेळोवेळी जागर होत राहिला. त्या अभिमानास्पद, अद्वितीय वारसा संस्कृती याचा अर्थ समजावून सांगणारे हे पुस्तक आहे. आणि त्याच बरोबरीने आजही देशोदेशीच्या संग्रहालयांमधून अवशेषांच्या रूपात आढळणाऱ्या विविध मातृस्वरूप देवतांचा धांडोळाही या पुस्तकात घेण्यात आला आहे. विशेष म्हणजे आता जगात, प्रामुख्याने पाश्चात्त्य देशांत, ठिकठिकाणी मातृदेवतेच्या संकल्पनेचे पुनरुज्जीवन करण्याचे जोमदार प्रयत्न होताना दिसत आहेत. मानवी संस्कृतीच्या इतिहासातील त्या परिवर्तनाचीही चाहूल घेणारे हे पुस्तक आहे. सर्जनशक्ती धारण करणाऱ्या स्त्रीला म्हणजेच मातेला देवतास्वरूप मानण्यामागच्या धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक मानसिकतेचे रहस्यही या पुस्तकात उलगडून दाखवलेले आहे. एका चिरंतन विषयाचा कालसुसंगत अन्वयार्थ मांडणारे हे पुस्तक सर्व जिज्ञासू भाविकांच्या संग्रही हवेच!

परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०४ ☆ ग़ुमशुदा रिश्ते… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ग़ुमशुदा रिश्ते। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०४ ☆

☆ ग़ुमशुदा रिश्ते… ☆

‘हक़ीक़त में गुमनाम सपने ढूंढ रही हूं/ अपनों की भीड़ में/ आजकल ग़ुमशुदा ढूंढ रही हूं।’ ग़ुमशुदा… ग़ुमशुदा…ग़़ुमशुदा। जी हां! यह है आज की ज़िंदगी की हक़ीक़त…हर इंसान को तलाश है सुक़ून की, जो अपनों के सान्निध्य व संसर्ग से प्राप्त होता है और सबसे कठिन है … अपनों की भीड़ में से अपनों की तलाश करना। वे तथाकथित अपने; जो अपना होने का स्वांग रचते हैं और स्वार्थ-साधने के हित आपके आसपास मंडराते रहते हैं। ऐसे लोग तब तक आपके अपने बनकर रहते हैं, जब तक आप किसी पद पर काबिज़ हैं और पद-प्रतिष्ठा के न रहने पर वे आपको पहचानते भी नहीं। यदि आपको उनकी ज़रूरत होती है, तो वे पास से कन्नी काट जाते हैं। यही कटु यथार्थ है ज़िंदगी का– जहां सब रिश्ते-नाते स्वार्थ से जुड़े हैं। सो! रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपने ही अपने बन, अपनों को छलते हैं। चारों ओर अविश्वास का वातावरण व्याप्त है; संदेह, शक़ व आशंका मानव के हृदय में इस प्रकार रचे-बसे हैं कि पति-पत्नी के रिश्ते भी दरक़ रहे हैं। पहले सात फेरों के बंधन को सात जन्मों का पावन बंधन स्वीकार, उसका निबाह हर कीमत पर किया जाता था; परंतु अब स्थिति पूर्णत: विपरीत है। एक छत के नीचे रहते हुए, एक- दूसरे के सुख-दु:ख से बेखबर पति-पत्नी अपना जीवन अजनबी-सम ढोते हैं। उनमें स्नेह, संबंध व सरोकार समाप्त हो चुके हैं। सब अपने-अपने अहम् में डूबे, एक-दूसरे को नीचा दिखाने हेतू भावनाओं पर कुठाराघात कर सुक़ून पाते हैं और बच्चे एकांत की त्रासदी झेलते हुए ग़लत राहों पर अग्रसर हो जाते हैं; जहां से लौट पाना मात्र स्वप्न बन कर रह जाता है।      

हर इंसान गुमनाम सपनों के पीछे बेतहाशा दौड़ता चला जा रहा है। कम से कम समय में अधिकाधिक धन कमाने की होड़ के निमित्त वह झोंक देता है अपना जीवन और होम कर देता है अपने स्वप्न… जिसका उदाहरण कॉरपोरेट जगत् के रूप में हम सब के समक्ष है। इस क्षेत्र में काम करने वाले युवा अक्सर विवाह के बंधन को नकारने लगे हैं। यदि वे इस बंधन को पावन समझ स्वीकार भी लेते हैं; तो उनमें चंद दिनों बाद अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि उनकी नज़रों में घर-परिवार की अहमियत होती ही नहीं। उनके बीच पारस्परिक संवाद भी नहीं होता, क्योंकि उनके पास न एक-दूसरे के लिए समय होता है, न ही होती है– एक-दूसरे की दरक़ार। वे दोषारोपण करने का एक भी अवसर नहीं चूकते और एक दिन ज़िंदगी उन्हें उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां वे एक-दूसरे की भावनाओं को नकार स्वतंत्रता से जीवन जीना चाहते हैं… जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है तथा उन अभागोंं को  माता-पिता दोनों का स्नेह व संरक्षण मिल ही नहीं पाता। सो! इन विषम परिस्थितियों में उनका सर्वांगीण विकास कैसे संभव हो सकता है?

हां! यदि बुज़ुर्ग माता-पिता भी उनके साथ रहते हैं, तो वे देर रात तक उनकी राह निहारते रहते हैं। दोनों थके-मांदे, काम का बोझ सिर पर लादे अलग-अलग समय पर घर लौटते हैं और दिन-भर की खीझ एक-दूसरे पर निकाल संतोष पाते हैं। अक्सर बच्चे उनकी बाट जोहते-जोहते सो जाते हैं और वे संडे मम्मी-पापा बन कर रह जाते हैं। यदि बच्चे किसी दिन मान-मनुहार करते हैं, तो उन्हें उनके कोप का भाजन बनना पड़ता है। सो! वे आया व नैनी के प्रति अपने माता- पिता से अधिक स्नेह व आत्मीयता का भाव रखते हैं। जब वे दूसरे बच्चों को अपने माता- पिता के साथ मौज-मस्ती व अठखेलियां करते देखते हैं, तो उनके हृदय का आक्रोश ज्वालामुखी पर्वत के लावे के समान सहसा फूट निकलता है और वे डरे-सहमे से अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और दिन-रात मोबाइल व टी• वी• में खोए रहते हैं…आत्मीय संबंध- सरोकारों से दूर आत्मकेंद्रित होकर रह जाते हैं तथा बच्चों व युवाओं की अपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्तता, माता-पिता द्वारा प्रदत्त एकाकीपन के उपहार के रूप में परिलक्षित होती है।

वैसे तो आजकल हर इंसान ग़ुमशुदा है।  अतिव्यस्तता के कारण सबके पास समयाभाव रहता है। दोस्तो! आजकल तो इंसान की ख़ुद से भी मुलाक़ात नहीं होती। इक्कीसवीं सदी में मानव मशीन बनकर और संयुक्त परिवार, एकल परिवार के दायरे में सिमट कर रह गए हैं। पति-पत्नी व बच्चे एकल परिवार की इकाई स्वीकारे जाते हैं। हां! इस युग में कामवाली बाईयों का भाग्योदय अवश्य हुआ है। उन्हें मालकिन का दर्जा प्राप्त हुआ है और वे सुख- सुविधाओं का बखूबी आनंद ले रही हैं। उन्हें किसी का तनिक भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं। यह है, इस सदी की विशेष उपलब्धि…उनका जीवन-स्तर अवश्य काफी ऊंचा हो गया है, क्योंकि उनके बिना तो आजकल गुज़र-बसर की कल्पना करना भी बेमानी है। वैसे भी उनके तो भाव भी आजकल बहुत बढ़ गए हैं। उनसे सबको डर कर रहना पड़ता है। उनकी इच्छा के बिना तो घर में पत्ता भी नहीं हिलता। वे बच्चों से लेकर बड़ों तक को अपने इशारों पर नचाती हैं। इतना ही नहीं, सगे-संबंधी भी उस घर में दस्तक देते हुए क़तराने लगे हैं।

दुनिया का दस्तूर है साहब! जब तक पैसा है, तब तक सब पूछते हैं…’हाउ आर यू?’ और पैसा खत्म होते ही ‘हू आर यू?’ यह जीवन का कटु यथार्थ है कि ‘हाउ से हू ‘ की यात्रा पलक झपकते कैसे सम्पन्न हो जाती है; इंसान समझ ही नहीं पाता और यह स्वार्थ का पहिया निरंतर समय के साथ ही नहीं, पद-प्रतिष्ठा के साथ घूमता रहता है। दौलत में वह चुंबकीय शक्ति है…जो ग़ैरों को भी अपना बना लेती है। सत्य ही तो है, ‘जब दौलत आती है, इंसान खुद को भूल जाता है और जब जाती है, तो ज़माना उसे भूल जाता है।’ धन-संपदा पाकर व्यक्ति अहंनिष्ठ हो जाता है तथा स्वयं को सर्वश्रेष्ठ स्वीकारने लगता है। दूसरों को अपने सम्मुख निकृष्ट समझ, उनकी भावनाओं का निरादर करने लगता है और सबको एक लाठी से हांकने लगता है। उस स्थिति में वह भूल जाता है कि लक्ष्मी चंचला है… एक स्थान पर टिक कर कभी नहीं रहती और जब वह चली जाती है, तो ज़माने के लोग भी अक्सर उससे मुख मोड़ लेते हैं… उसे लेशमात्र भी अहमियत नहीं देते। वास्तव में दोनों स्थितियों में वह एकांत की त्रासदी झेलता है। प्रथम में वह स्वेच्छा से सबसे दूरियां बनाए रखता है और दौलत के न रहने पर तो कोई भी उससे बात करना भी पसंद नहीं करता। यह है नियति उस इंसान की… जिसके लिए दोनों स्थितियां ही भयावह हैं। बिहारी का यह दोहा, ‘कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय/ इहि पाये बौराय जग, उहि पाये बौराय।’  इंसान बावरा है…धन-संपदा प्राप्त होने पर बौरा जाता है और धतूरा खाने के पश्चात् उसकी सोचने- समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है… उसका व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता। शायद! इसलिए कहा जाता है कि जिसे ‘मैं’ की हवा लगती है, उसे न दुआ लगती है, न दवा लगती है’ तथा अहंनिष्ठ व्यक्ति दौलत व सुरा-सुंदरी के नशे में आठों पहर धुत रहता है। सोने को पाकर और धतूरे को खाकर लोग आत्म-नियंत्रण खो बैठते हैं, यह कथन सर्वथा सत्य है।

वैसे तो आजकल ‘लिव-इन’ का ज़माना है तथा उसे कोर्ट-कचहरी द्वारा मान्यता प्राप्त है। सो! घर-परिवार तेज़ी से टूट रहे हैं, जिसमें ‘मी टू’ का भी अहम् योगदान है। वर्षों पूर्व के संबंधों को उजागर करने की स्वतंत्रता के कारण हंसते- खेलते परिवार अग्नि की भेंट चढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं, आजकल तो परस्त्री गमन की भी आज़ादी है, जिसके परिणाम-स्वरूप घर-परिवार में पारस्परिक संबंध व स्नेह-सौहार्द समाप्त हो रहा है। संदेह व अविश्वास के कारण रिश्ते दरक़ रहे हैं। इस विघटन के लिए दोनों दोषी हैं और उनकी समान प्रतिभागिता है। महिलाएं भी कहां कम हैं…वे भी पुरुषों की भांति जीन्स-कल्चर अपना कर, क्लबों व महफ़िलों की शोभा बनने में फ़ख्र महसूस करने लगी हैं। वे अक्सर सड़क व आफिस में शराब के नशे में धुत्त, मदमस्त हो सिगरेट के क़श लगाती व जुआ खेलती नज़र आती हैं, जिसे देखकर मस्तक शर्म से झुक जाता है। शायद! यह सदियों पुरानी दासता व अंकुश का परिणाम व जुनून है, जो सिर चढ़ कर बोल रहा है।

समाज में बढ़ रही अराजकता व विश्रंखलता का मुख्य कारण यह है कि हम परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करते हैं; स्वयं को नहीं। इसलिए जीवन में विषम परिस्थितियां व विसंगतियां उत्पन्न होती हैं और जीवन हमें दुआ नहीं, सज़ा-सा लगता है। अहं के कारण पति- पत्नी में स्नेह-सौहार्द रहा नहीं, न ही शेष बचे हैं..आत्मीयता व सामाजिक सरोकार। संवेदनाएं मर चुकी हैं और वे दोनों अकारण एक-दूसरे को नीचा दिखाने हेतु विभिन्न हथकंडे अपनाते हैं, जिसके परिणाम-स्वरूप आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता। वे प्रतिपक्ष के परिजनों पर आक्षेप लगा, कटघरे में खड़ा करने में तनिक भी संकोच नहीं करते। इस गतिविधि में महिलाएं अग्रणी हैं। वे पति व उसके परिवारजनों पर दहेज व घरेलू हिंसा का आरोप लगा किसी भी पल जेल भिजवाने से लेशमात्र भी ग़ुरेज़ नहीं करती हैं।

कैसा ज़माना आ गया है…’आजकल तो ख़ुद से ही ख़ुद की मुलाकात नहीं होती’ सर्वथा सत्य है। सो! अक्सर यह संदेश दिया जाता है कि ‘इंसान को कुछ समय अपने साथ अवश्य व्यतीत करना चाहिए।’ वास्तव में आत्मावलोकन व अपने अंतर्मन में झांकना सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम योग है, आत्म-साक्षात्कार है। एकांत में किया गया चिंतन आत्मा को परमात्मा से मिलाता है तथा उस स्थिति में पहुंच कर सभी कामनाओं व वासनाओं का अंत हो जाता है…आत्मा का परमात्मा से तादात्म्य हो जाता है। जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने द्वारा किए गए कर्मों का आकलन करता है, तो उसे ज्ञात हो जाता है कि आज तक उसने कैसे कर्म किए हैं? सो! वह सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है तथा राग-द्वेष के बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है…अपने मन का मालिक बन जाता है। वह अलौकिक आनंद अथवा अनहद-नाद की स्थिति में रहता है। उसे किसी की संगति की अपेक्षा नहीं रहती। उस स्थिति में वह यही कामना करता है …नैना अंतर आव तू, नैन झांप तोहे लेहुं/ ना हौं देखूं ओर को, ना तुझ देखन देहुं।’ इस स्थिति में आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाता है और वह हर पल सृष्टि-नियंता के दर्शन पाकर अलौकिक आनंद की मस्ती में रहती है।

‘सो! खुली आंख से स्वप्न देखिए, ताकि वे गुमनामी के अंधकार में न खो जाएं और जब तक वे साकार न  हो जाएं, आप विश्राम न करें…उनके पूर्ण होने पर ही सुख की सांस लें।’ सपनों को साकार करना भी अपनों की भीड़ में ग़ुमशुदा अर्थात् अपनों की तलाश करने जैसा है। वास्तव में अपने वे होते हैं, जो सदैव आपकी ढाल बनकर आपके साथ  खड़े रहते हैं। इतना ही नहीं आपकी अनुपस्थिति में भी वे आपके पक्षधर रहते हैं। सो! स्वार्थ व मतलब के बगैर के संबंधों के का फल मीठा होता है।’ इसलिए मानव को नि:स्वार्थ भाव से निष्काम कर्म करने का संदेश दिया गया है। दुनिया की सबसे अच्छी किताब आप स्वयं हैं। ख़ुद को समझ लीजिए, समस्याओं का स्वत: अंत हो जाएगा। सो! अपनी सोच बड़ी व सकारात्मक रखिए। छोटी सोच शंका और बड़ी सोच समाधान को जन्म देती है। इसलिए सुनना सीख लो, सहना व रहना स्वत:आ जाएगा। जिसे सहना आ गया, उसे जीना आ गया। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है। जब आप संवाद करना बंद कर देते हैं; अमूल्य संबंध नष्ट होने लगते हैं, क्योंकि संबंध कभी भी जीतकर नहीं निभाए जा सकते… उनके लिए झुकना व पराजय स्वीकार करना लाज़िमी होता है।

अन्ततः ग़ुमनाम सपनों को तलाशना जितना कठिन है, उससे भी अधिक कठिन है… अपनों की भीड़ में ग़ुमशुदा अर्थात् अपनों को ढूंढना। वैसे तो आजकल हर इंसान ख़ुद से बेखबर है। वह कहां जानता है… वह कौन है, कौन से आया है और इस संसार में उसके जीवन का प्रयोजन क्या है? अज्ञानतावश वह आजीवन उलझा रहता है–माया-मोह के बंधनों में और शाश्वत् संबंधों से बेख़बर, वह लख चौरासी के बंधनों में उलझा रहता है। आइए! अपनों की भीड़ में से पहले स्वयं को ढूंढ कर, ख़ुद से मुलाकात करें। उसके पश्चात् उन अपनों को ढूंढें, जो मुखौटा धारण किए रहते हैं… गिरगिट की भांति हर पल रंग बदलते हैं। सो! आजकल किसी पर भी विश्वास करना अत्यंत कठिन व दुष्कर है। ‘कौन अपना कब दग़ा दे जाए’… कोई नहीं जानता। सो! अपने ही घर में दस्तक देते हुए भ्रमित मानव को अजनबीपन का अहसास होने लगा है…मानो वह ग़ुमशुदा है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७६ – नवगीत – आलोकित मधुमास… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – आलोकित मधुमास

? रचना संसार # ७६ – गीत – आलोकित मधुमास…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।

उलझा बाहुपाश में मनवा,

हृदय मिलन की आस।।

*

महके बेला गंधिल क्यारी,

मधुर कलश मकरंद।

मंजुल मुखी रूप रति मोहे,

मधुमासी आनंद।।

महुआ किंशुक गुलमोहर ने,

लिखे प्रेम अनुप्रास।

*

चंदन काया दिव्य सुवासित,

दे आमंत्रण भान।

सम्मोहित सब चपल चंचला,

अवगुंठित पट जान।।

इन अधरों की पढ़ लो पाती,

सुखद मिले आभास।।

*

चहुँदिशि है प्रतिबिंब प्रेम का,

क्षण संदल अभिसार।

प्रतिभासित कोमल सुदीप्त भी,

यौवन की रसधार।।

करे समर्पण तन-मन अपना,

डोर थाम विश्वास।

*

मेघावरी ललित प्रिय अलकें,

अनुपम अंजन धार।

दृष्टि-वाण से करती घायल,

दो आलिंगन हार।।

बजती मादक शहनाई भी,

आलोकित मधुमास।

       ☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०४ ☆ भावना के दोहे – नव वर्ष ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नव वर्ष)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नव वर्ष ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

बीते कल की सीख से, जगता नव विश्वास।

 ले आया नव वर्ष है, मन में नवल उजास ।।

 *

अब तो देखो ढल रही, ढली दिसंबर शाम।

बीते लम्हें को करें, दिल से सभी सलाम।।

 *

करते हम तो अलविदा, बीता प्यारा वर्ष।

नमन साल को कर रहे, खूब मनाओ हर्ष।।

 *

समय कभी रुकता नहीं, समय सिखाता सीख।।

जिसने कीमत समझ ली, मांगे समय न  भीख।।

 *

चक्र समय का घूमता, घूम रहा दिन रात ।

समय रेत सा फिसलता, करो समय से बात।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८६ ☆ अहम पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके  अहम पर कुछ दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८६ ☆

☆ अहम पर कुछ दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

अहम करे किस बात का, हे मूरख इंसान

क्यों जमीर को मारता, पाल पोष अभिमान

*

धन, दौलत, वैभव सभी, कभी न देते साथ

अंत समय सब छोड़कर, जाना खाली हाथ

*

छोटा हो या हो बड़ा, हो कोई इंसान

अहम पालता जो सदा, उसका गिरता मान

*

रखें बड़प्पन चित्त में, मन में उच्च विचार।

सबके प्रति सद्भावना,  प्रियता का व्यवहार।।

*

खुद की महिमा का कभी, खुद मत करें बखान

बड़बोलापन छोड़िये, गिरता उससे मान

*

अहम पाप का मूल है,  रहें अहम से दूर।

सहज सरल होकर करें, परहित कार्य जरूर।।

*

पाकर पद अधिकार जब,  बिगड़े चाल चरित्र।

काम, क्रोध, मद, लोभ तब, बनते कपटी मित्र।।

*

अहम सदा ले डूबता,  करता मति विध्वंस।

बचे न कोई देखलो, रावण, कौरव, कंस

*

जीवन में यदि चाहिए, शांति परम संतोष

छोड़ें कभी न नम्रता, नाहक  करें न रोष

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ६ – कविता – क्यूं उच्छवास में उदासी है ? ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता क्यूं उच्छवास में उदासी है ?।)

☆ शशि साहित्य # ६ ☆

? कविता – क्यूं उच्छवास में उदासी है ? ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

मलाल है, कि 25 भी निकल गया..

समय ही तो वह चक्र है,

जिसका हर पल बदल गया..

बीते कल पर डालो नजर,

कितने खजाने झोली में भर गया..

नए से रिश्ते, नयी दोस्तियां,

नई पहचान, नए सपने और,

नए अनुभव दे, परिपक्व कर गया..

कदमों तले तुम्हारे, ठोस आधार बन,

उन्नति के नए सोपान रच गया..

बिखेरे थे, जो धरती के गोद में,

उन बीजों का उत्सर्जन हो गया..

जितना बन सके, भला करते चलो,

धर्म से सुगम मार्ग, प्रशस्त हो गया..

बंदिशों की बेड़ी डालो, दुर्गुणों पर..

कह सको.. 26 नई उपलब्धियां दे गया..    

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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