हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५५ – लघुकथा – संशय ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५५ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ संशय ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

महेंद्र को उम्मीद थी कि, वे एक दिन उसके घर जरूर आयेंगें । वह पलक पावड़े बिछाए उनका बराबर इंतजार करता रहता था । अपने मन में वह तमाम ख्वाहिशों को बुनता और सोचता कि अगर वे उनके घर आये तो वह अपनी टूटी चारपाई पर एक फटा ही सही लेकिन सुन्दर साफ बढ़िया सा चादर बिछायेगा। छोटी सी कटोरी में गइया के थोड़े से दूध में जमी मीठी दही खिलायेगा।

कई बार उसे ऐसा लगता था कि वे आज उसके घर की तरफ आ रहे हैं, बस चंद पलों में आ ही जायेगे, ये सब सोच कर उसका मन बाँसो उछलने लगता था ।

वह स्वयं तो रोज उनके घर जाता, उनको नमस्ते कर हालचाल भी पूछता, उनके हर दुख सुख में अपने सामर्थ्य के हिसाब से खड़ा रहताl

पिछले दिनों जब उनके घर में उनका लड़का करोना से बीमार था, तब उनके अपने लोग दूर से झाँक कर चले गए थे, लेकिन महेन्द्र इन बातों से बेफिक्र न सिर्फ उनके घर गया था, बल्कि उनका हाल चाल पूछते हुए बोला था कि बाबूजी, भईया ठीक हो जायेगे, मैंने भईया के लिए हनुमान जी से मन्नत मांगी है ।

भला हो कोरोना का, शायद वह भी उसके प्रेम और समर्पण को समझ गया था, यही कारण था कि चौदह दिन बीतने के बाद उसका नन्हका भी पहले की तरह स्वस्थ होकर किलकारी भर रहा था।

लेकिन महेन्द्र को एक बात समझ में आ रही थी कि वे उसके घर तो नही आते है लेकिन उनके मन में मेरे बाबू के प्रति ममता और प्यार तो जरूर है।

आखिर वे मेरे घर क्यों नही आते है, इस बात का उसे उत्तर नहीं मिल रहा था ।

एक जब उसने थोड़ा दिमाग लगाया, तो उसे हल्का हल्का समझ में आया कि इसमे तो पद और कद का मामला है, जिसके बढ़ने और घटने का संकट या संशय है । बस..बस.. बस यही बात है कि वह नही आते है ।

चलो उनके इस संशय – संकोच पर भी आंच न आये । वे भले ही न आएं, लेकिन उनकी यशकीर्ति और ऊंचाइया छुए, अंततः वह ऐसा सोच कर खुश हो गया थाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

बिजना घाट से भड़पुरा: 16 अक्टूबर 2018

सुबह जल्दी ही अगली यात्रा पर निकल लिए। पहले नदी के कछार में से ही चलते रहे। मुरकटिया घाट से नर्मदा का पहले बाई फिर दाई ओर मुडना देखा, उन दीर्घ चट्टानों को देखा जिन्हे नर्मदा मानो अपने साथ बहा कर लाई हो और फिर किनारे लगा दिया।हमें यहाँ नर्मदा का एक स्वरूप और दिखा बीच नदी पर स्थित गुफाओं का निर्माण मानो नर्मदा ने चट्टानो पर अपनी लहरिया छैनी हथौडी चलाकर गुफायें बना डाली हैं। आगे चले दुर्गम तो नहीं पर कठिन मार्ग कहीं नर्मदा के तीरे-तीरे तो कहीं बीहड डांगर पार करते हम बढते रहे।

अचानक रास्ते में एक नाला आ गया। किसानों से पूछा तो उन्होंने ऊपर से नाला पार करने को बताया। हम सीधी चढ़ाई चढ़ने लगे। रास्ता बिलकुल भी नहीं था खेतों में कँटीली झड़ियाँ थीं। एक कोने से हरी घास में से रास्ता टटोला तो मिल गया। नाला पार करके डाँगर के उतार-चढ़ाव से लोग भारी थकने लगे। नाले की ठंडाई में थोड़े समय आराम किया। आगे जाकर एक महाराज मिल गए।

उनसे चार पुरुषार्थ की चर्चा चल पड़ी। हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थ की बड़ी महिमा गाई जाती है, धर्म अर्थ काम मोक्ष। कोई भी मनुष्य जब कोई काम करता है तो इनमे से किसी एक या एकाधिक पुरुषार्थ की प्रेरणा से कर्म करता है। एक साधु से जब हमने इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि वे तो सब छोड़ चुके हैं। हरि ओम्।

हमने पूछा कि आदमी प्रकृतिजन्य चीज़ों जैसे भोजन करना, साँस लेना और निस्तार करना छोड़ सकता है क्या?

वे बोले प्रकृतिजन्य चीज़ें कभी छूटती हैं क्या? ये तो ज़िंदगी के साथ ही छूटेंगीं, बच्चा।

हमने कहा कि चार पुरुषार्थ में अर्थ, धर्म और मोक्ष मानव निर्मित अवधारणा या सिद्धांत हैं जबकि काम प्रकृतिजन्य है, उसकी माया जीव-जंतु पेड़-पौधों सब में दिखती है। उसे अनंग याने  बिना अंग का भी कहा गया है। वह पकड़ में ही नहीं आता तो कैसे छूट सकता है। वे बग़लें झाँकने लगे, कुछ सोचते रहे। फिर बोले सब भगवान की माया है। माया ही तो नहीं छूटती, बड़ी हठीली होती है।

हम अर्थ पर आ गए। पूछा अर्थ छूटता है क्या? वे सचेत हो चुके थे, वे मौन सोचते रहे। फिर पूछा हमारा अर्थ से क्या आशय है।

हमने कहा धन जिससे हम ख़रीदारी करते हैं। धन कमाया जाय या दान में मिले उसकी प्रकृति खरदीने की होती है। जहाँ ख़रीद-बेंच आई तो व्यापार शुरू और व्यापार आया तो लालच तो आना ही है। लालच आया तो चैन गया। धन सारा सुख और आराम दिला सकता है। जैसे आपके आश्रम को चलायमान रखने के लिए धन की ज़रूरत होती है।

वे बोले बिना अर्थ के तो कुछ सम्भव ही नहीं है। काम और अर्थ का निपटारा करके हम धर्म और मोक्ष पर आए कि धर्म और मोक्ष कहीं परिभाषित नहीं हैं। धर्म वह है जिसे जीव धारण करता है अतः सबके धर्म अलग-अलग हुए फिर वे अलग धर्म सामूहिक रूप से सब लोगों पर एक से कैसे लागू हो सकते हैं, वे चुप रहे।

मोक्ष गूँगे का गुड बताया जाता है जिसे जीते जी मिला वह बता नहीं सकता कि मोक्ष की क्या प्रकृति है। जैसे महावीर या बुद्ध ने अपने मोक्ष को कभी नहीं बताया। मोक्ष कैसे मिलेगा, यह बताया है। उनके शिष्यों ने बताया कि उन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया। जिसे मरने पर मोक्ष मिला वह मोक्ष की प्रकृति बताने हेतु मरने के बाद वापस आ नहीं सकता।

हम अपरिभाषित मूल्यों के दिखावे में जीने वाले समाज हैं। कहते कुछ हैं, मानते कुछ हैं, करते कुछ हैं। इसी को आडंबर या पाखण्ड कहते हैं। पश्चिमी सभ्यता के लोग काम और अर्थ को खुलकर जीते हैं। धर्म और मोक्ष से उन्हें कुछ मतलब नहीं है। इसलिए उन्हें कुछ छुपाना नहीं पड़ता है। हमारा समाज भी अब काम और अर्थ को जी भरकर जी रहा है। उपभोग से अर्थ व्यवस्था का विकास होता है, रोज़गार पैदा होते हैं।

साधु जी मुस्कराए और गले लगाकर पीछा छुड़ाया। चिलम को ब्रह्मान्ध्र तक खींच काम की प्राकृतिक महिमा और मानव जनित धर्म, अर्थ और मोक्ष की अंतरधारा में विलीन हो गए। हम आगे की यात्रा पर निकल गए।

फिर नशा धर्म का या नशे का धर्म निभाते साधु मिले। आँखों के लाल डोरे उनके अफ़ीमची और गाँजे की चिलम खींचने की कहानी कह रहे थे। उन्होंने तुलसी जी की चौपाई सुनाई।

जड़-चेतन गुण-दोष मय विश्व कीन्ह करतार

संत हंस गुण पय लहहिं छोड़ वारि विकार।

साधुओं से रुद्र शिव शंकर चर्चा और तत्व ज्ञान की मीमांसा पश्चात औघड़ बाबा के साथ गाँजा चिलम सुट्टा खींचा और आशीर्वाद का आदान प्रदान हुआ। शाम को पाँच बजे भड़पुरा पहुँच गए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ – !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!पिता!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ ☆

☆ !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

जिनकी क्षमताएंँ ऊंँची हो आकाश से,  मन में सपने सजाते तुम्हारे लिए ।

देखना चाहते खुद से उत्तम तुम्हें , करते हैं सब समर्पित तुम्हारे लिए ।‌‌।

शब्द भी श्रेष्ठ से सदा खोजती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

मन में गहराई रखकर वे पाताल सी,  दर्द दुनियाँ के तुमसे छुपाते सदा ।

असीमित प्रेम करते हैं संतान से, रौब बातों में अपनी दिखाते सदा ।।

रौब से झांँकता उनका डर टोहती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

उनका साया हिमालय सा दे हौसला,  वो कहें धैर्य खोना न चलते रहो ।

हर कदम पर खड़ा हूंँ मैं परछाई सा, पीछे देखो नहीं आगे बढ़ते रहो ।।

पिता तुल्य पाया न रिश्ता कोई, जग के रिश्तों को जब-जब भी मैं तोलती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३४ – कविता – सलामी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सलामी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३ ?

? कविता – सलामी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

चापलूसों द्वारा ये गुलामी देखिये

डूबते सूरज को उफ़ सलामी देखिये

=2=

जनता हलाकान है कोहराम हर तरफ़

चुनी हुई सरकार की नाकामी देखिये

=3=

अच्छे दिनों की बात उनके भाषणों में है

परिणाम इसका आप दूरगामी देखिए

=4=

कल के फटीचर जो आज कुर्सी पा गये

अब हुए करोड़ों के आसामी देखिये

=5=

हो गये हरामी सभी नामी गिरामी

आगामी साजिशों पे उनकी हामी देखिए

=6=

त्राहिमाम पानी पे मचा है देश में

पी रहा शरबत कोई बादामी देखिये

=7=

‘राजेश’ नुक्ताचीनी बेवज़ह की छोड़िये

खूबियाँ औरों में, ख़ुद में ख़ामी देखिए

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०७ ☆ मुक्तक – ।। चार दिन की जिंदगानी बनाएं बेमिसाल कहानी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०७ ☆

☆ मुक्तक ।। चार दिन की जिंदगानी बनाएं बेमिसाल कहानी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

इस दुनिया के रैन -बसेरे में चार दिन रहना है।

जीत लो बस दिल सबका  ही यही कहना है।।

तेरे कर्म तेरे मीठे बोल बस यही साथ जाएंगे।

मिले सबका संग-साथ यही जीवन का गहना है।।

=2=

बहुत कम समय मिलता बस साथ बिताने को।

मत गवां देना   इसे बस  तुम रूठने मनाने को।।

शिकवा शिकायत में ही यह वक्त न निकल जाए।

बस तैयार रहना हमेशा  हर रिश्ता निभाने  को।।

=3=

नजर के फेर में तुम नजारों को मत गवां देना।

खो कर  यकीन तुम सहारों को मत गवां देना।।

उठो ऊपर कितना भी जुड़े रहना जमीन के साथ।

भगा कर तेज नाव  किनारों को मत गवां देना।।

=4=

जीवन प्रतिध्वनि सा लौटकरआती आवाज वही है।

अच्छा बुरा झूठ सच करना हमेशा अच्छी बात नहीं है।।

जैसा दोगे वैसा पाओगे   यही नियम है सृष्टि का।

सुखी सफल जीवन का   बस एक  जवाब यही है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७० ☆ कविता – स्वामी विवेकानंद… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – स्वामी विवेकानंद। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७०

☆ स्वामी विवेकानंद…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

युवा तापस जिसने ऊंची उठाई धर्म-ध्वजा शिकागो में जिसकी वाणी,

मुग्ध जग सुनता रहा विवेकी, अध्यात्म ज्ञानी तेज था

बंगाल का इसी भारत का समर्पित देश प्रेमी लाल था ।।।।

*

जगो, उठो, बढ़ो आगे बराबर बढ़ते रहो

लक्ष्य जब तक पा न जाओ सतत् संकल्पित रहो।

*

शक्ति संचय, साधना हो मनुज सेवा के लिए

सदा जागृत भावना हो देश सेवा के लिए ।।2।।

*

सिखाया जिसने हमें अपने प्रखर व्यक्तित्व से

विचारों से धर्म से सत्कर्म को अस्तित्व दे।

ज्योति जिसकी आज भी देती है हमको रोशनी

उन विवेकानन्द की तप त्यागमय थी जीवनी ।।3।।

*

देती है सबको सहज कर्तव्य की नित प्रेरणा

भरती है हरेक के मन को एक पावन चेतना

उस व्रती के चरणों मेंरख भाव के श्रद्धा सुमन

विश्व सेवा के लिए आओ करें हम आज प्रण ।।4।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५५ आणि ५६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५५ आणि ५६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ५५ – – – 

नसे मानसीं नष्ट आशा दुराशा।

वसे अंतरीं प्रेमपाशा पिपाशा॥

ऋणी देव हा भक्तिभावे जयाचा।

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा॥५५॥

अर्थ: ज्याच्या मनातील दुष्ट वासना आणि वाईट विचार नाहीसे झाले आहेत, भगवंताला आपल्या प्रेमपाशात बांधण्याची उत्कट इच्छा ज्याच्या मनामध्ये तीव्रतेने आहे आणि ज्याच्या प्रेमामुळे आणि शरणागत वृत्तीमुळे स्वतः भगवंत त्याचा ऋणी झाला आहे, असा भक्त भगवंताचा जगातील सर्वात उत्कृष्ट किंवा धन्य भक्त आहे.

(नष्ट -त्याज्य/वाईट, दुराशा – दुष्ट वासना वासना /इच्छा, प्रेमपाश- प्रेमाने बांधून ठेवणे, पिपाशा – तृष्णा /तहान)

विवेचन : भगवद भक्तीत जो रंगून गेला आहे, तो मनाने अंतर्बाह्य निर्मळ असतो. आत एक आणि बाहेर एक असे त्याच्याजवळ असत नाही. वासना, विकार आणि दुष्टभावना यांना त्याच्या मनात थारा नसतो. किंबहुना ह्या गोष्टी त्याला सहनच होत नाहीत. जसे आपल्याला शुभ्र वस्त्रावर एखादाही डाग चालत नाही, त्याप्रमाणे त्याचे मन शुभ्र वस्त्रासारखे आणि पारदर्शक असते. अशा भक्त विषयी बोलताना तुकाराम महाराज म्हणतात, ” जैसी गंगा वाहे तैसे ज्याचे मन, भगवंत जाण त्याचे हृदयी. “

“मना वासना दुष्ट कामा नये रे.. ” असे समर्थ सुरुवातीच्या श्लोकांमध्ये आपल्याला सांगतात. त्याचे तात्पर्य हेच आहे. रावणाच्या मनामध्ये सीतेची कामना होती. धृतराष्ट्राच्या मनात पुत्रमोह होता. दुर्योधनाच्या मनात राज्याची कामना होती. अशा वाईट आणि दुष्ट विचारांमुळे त्यांचा नाश झाला.

आपल्यासारख्या सर्वसामान्य माणसांना ऐहिक सुखाची कामना असते. सत्ता, पैसा, सोनेनाणे कितीही मिळाले तरी हवेच असते. पण भगवंताचा खरा भक्त मात्र या गोष्टींपासून दूर असतो. तो कामना करतो ती भगवंताचीच! त्याच्या मनात तळमळ असते ती भगवंतप्राप्तीचीच! त्याची समर्पण भावना एवढी तीव्र असते की स्वतः भगवंत त्याच्या ऋणात राहतो. त्यांना कोणतेही ऐहिक सुख नको असते. तुकाराम महाराज म्हणतात, ” न लगे मुक्ती आणि संपदा संत संग देई सदा.. ” त्यांचे भगवंताशी प्रेमाचे नाते जोडलेले असते. “तूंचि बापधनी” अशी भावना परमेश्वराबद्दल भक्ताच्या मनात असते. तोच त्यांचे आई-वडील, गुरु सगळे काही असतो.

भगवंताला देखील अशा भक्तांचा दास व्हावेसे वाटते. आपल्या दासाला कोणताही त्रास झालेला भगवंताला चालत नाही. मग जनाईला तो दळण दळू लागतो, नाथांच्या घरी तो पाणी भरतो, विठू महाराच्या रुपात दामाजींचे कर्ज फेडतो, पुंडलिकासाठी विटेवर उभा राहतो, अर्जुनासाठी त्याच्या रथाचे सारथ्य पत्करतो. यात त्याला कोणताही कमीपणा वाटत नाही.

देव बांधला जात नाही आणि त्याला कोणी बांधू शकत नाही. श्रीकृष्ण लहान असताना यशोदेने त्याला बांधण्याचा प्रयत्न केला. परंतु जो जो त्याला बांधायला जावे तो तो दोरी अपूर्ण पडत होती. मग भगवंताने स्वतःच तिच्याकडून बांधून घेतले. असा भगवंत भक्तांच्या प्रेमाने बांधला जातो. हे अदृश्य बंधन असते. देव भावाचा भुकेला असतो.

सुदामा हा श्रीकृष्णाचा मित्र होता हे आपल्या सगळ्यांना माहिती आहे. परंतु तो श्रीकृष्णाचा परमभक्त होता. तो जेव्हा श्रीकृष्णाच्या भेटीसाठी द्वारकेला आला तेव्हा श्रीकृष्णाने स्वतः त्याच्या पायात मोडलेले काटे काढले, त्याचे पाय धुतले, सेवासुश्रुषा केली. अशा रीतीने भगवंत हा भक्तांचा ऋणी होतो. परंतु त्यासाठी भक्ताची देखील तेवढी योग्यता असावी लागते.

आपले सगळे संत भगवंताचे असेच प्रेमळ भक्त होते. “संतांचीया गावा प्रेमाचा सुकाळ, नाही तळमळ दुःख लेश ” असे उद्गार संतांच्या बाबतीत तुकाराम महाराज काढतात. म्हणूनच आपण सगळ्या संतांना माउली म्हणून संबोधतो. अशा संतांचा तर भगवंत देखील ऋणी असतो आपण अशा संतांचे दास व्हावे म्हणजे दासानुदास व्हावे. एवढी समर्पण भावना जर आपल्याजवळ असेल तर भगवंत प्राप्ती दूर नाही.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या मनातील दुराशा आणि वाईट विचार मला जाणवतात का? आणि ते नाहीसे करण्याचा मी प्रयत्न करतो का?

२) भगवंताला प्रेमपाशात बांधण्याची तळमळ माझ्या मनात आहे का? की माझी भक्ती केवळ ऐहिक गोष्टींसाठीच आहे?

३) “दासानुदास” होण्याची माझी तयारी आहे का – संतांच्या चरणी नम्रतेने जाण्याइतकी समर्पण भावना माझ्यात आहे का?

== == == 

मनाचे श्लोक क्र. ५६ – – – 

दिनाचा दयाळू, मनाचा मवाळू |

स्नेहाळू कृपाळू, जनी दास पाळू |

तया अंतरी क्रोध संताप कैचा |

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा |५६|

अर्थ :  जो अनाथ आणि दुःखितांवर प्रेम करतो, जो मनाने अत्यंत मृदू आहे, प्रेमळ आणि सर्वांवर कृपेचा वर्षाव करणारा आहे, तसेच शरणागताला आश्रय देणारा आहे आणि ज्याच्या अंतरात राग किंवा संताप यांना त्रास नाही, असा परमेश्वराचा भक्त जगामध्ये खरोखरच धन्य होय.

(मवाळ – मृदू, स्नेहाळ – प्रेमळ, दासपाळू – शरणागताला आश्रय देणारा, संताप -त्रास)

विवेचन ::  हा श्लोक “जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा” या पालुपद-मालिकेचा सुंदर समारोप आहे.

हा श्लोक वाचताना एक विशिष्ट लय आपोआपच प्राप्त होते. ‘ ळ ‘ची पुनरावृत्ती याला एक वेगळेच सौंदर्य देते. परंतु हे केवळ भाषिक दृष्टीने जरी असले तरी अर्थाच्या दृष्टीने देखील हा श्लोक तेवढाच सुंदर आहे. जो भक्त भगवंताचा होऊन राहिला आहे, त्याच्यामध्ये काही गुणांचा परिपोष आपोआपच होत असतो. अशा भक्ताच्या अंगी कोणते गुण असतात ते समर्थांनी या श्लोकात सांगितले आहे.

संत हे भगवंताचे श्रेष्ठ भक्त असतात म्हणून संतांमध्ये वरील श्लोकातील गुण आपल्याला प्रकर्षाने दिसतात किंवा जाणवतात. अत्यंत प्रेमळपणा हा संतांचा गुण! ते अनाथांची, दिनांची, दुःखी जनांची माउली होतात. संत एकनाथांनी तप्त वाळवंटात रडत असलेले हरिजनाचे मूल कडेवर उचलून घेतले. पूर्वजांचे श्राद्ध करीत असताना भुकेल्या हरिजनांना जेवू घातले, तृषार्त गाढवाच्या मुखी गंगेचे पाणी घातले. प्रसंगी परमेश्वर तरी कठोर होतो, परंतु संतांना मात्र सर्वसामान्यांचा अपार कळवळा असतो. दुष्टांचे निर्दालन करण्यासाठी मी अवतार घेतो असे गीतेमध्ये भगवंत म्हणतात. परंतु ज्ञानेश्वर माउलींसारखे संत दुष्ट नाहीसे होवो असे म्हणत नाहीत तर दुष्टांचा दुष्टपणा नाहीसे होवो असे म्हणतात.

सर्वसामान्यांच्या त्रासाने संत संतापत किंवा दुःखी होत नाहीत. त्यांच्याजवळ अपार करुणा असते. मऊ मेणाहुनी आम्ही विष्णुदास.. असे संत तुकाराम महाराज म्हणतात ते याचसाठी. संत कधी कधी कठोरपणे वागले किंवा बोलले तरी देखील त्यात लोककल्याणाची तळमळ आणि प्रेम असते. दासपाळू म्हणजे भगवंताच्या भक्ताला ते आश्रय देणारे असतात.

गीतेत भगवंतांनी स्थितप्रज्ञ पुरुषाची जी लक्षणे वर्णन केली आहेत, असे स्थितप्रज्ञ म्हणजे संत असतात. परंतु अशा व्यक्तींबद्दल बोलताना समर्थ त्यांना संत, महात्मे किंवा साधू असे म्हणत नाहीत तर अशा व्यक्तींसाठी ते ‘दास सर्वोत्तमाचा ‘शब्द वापरतात. हे शब्द अत्यंत अर्थपूर्ण आहेत. दास म्हटले म्हणजे अहंता येत नाही. ज्या व्यक्ती आपल्याला साधू, संत, महात्मे म्हणवून घेतात, अशांच्या ठिकाणी अहंकार येण्याची शक्यता असते. त्याचप्रमाणे अशी माणसे आपल्याला सिद्धी प्राप्त आहे अशा प्रकारचा दावा करतात. खरे तर सिद्धी या परमार्थापासून दूर नेतात. परंतु सामान्य माणसे सिद्धीला भुलतात. याच गोष्टीचा गैरफायदा अशी मंडळी घेऊन समाजातील लोकांना फसवत असतात. फसवणुकीची अशी खूप उदाहरणे आपल्याला वर्तमानपत्रातून वाचायला मिळतात. सुशिक्षित लोक देखील अशा प्रकारच्या चमत्कारांना बळी पडतात. म्हणून समर्थांच्या उपदेशामध्ये सिद्धींचा उल्लेखही नाही. समर्थांच्या दृष्टीने संत पुरुष तोच की जो परमेश्वराचा दास असतो.

परमेश्वराचा साक्षात्कार झालेले संत निरिच्छ असतात. विपरीत परिस्थितीने ते दुःखी होत नाहीत आणि अनुकूल परिस्थिती आली म्हणून हर्षित होत नाहीत. लोककल्याणाची त्यांना तळमळ असते. त्यासाठीच ते आपले आयुष्य घालवतात आणि म्हणून आता उरलो उपकारापुरता… असेच ते म्हणतात. असेच सर्वोत्तमाचे दास जगामध्ये धन्य भक्त म्हणवले जातात.

स्वसंवाद ::

१) माझ्या मनात दुसऱ्यांबद्दल खरी करुणा आहे का – की ती केवळ दिखाव्यापुरती असते?

२) “दुष्टपणा नाहीसे होवो” असे म्हणण्याइतकी उदारता माझ्या मनात आहे का – की मला माणसेच नको असतात?

३) मी “दास” आहे की “महात्मा” होण्याच्या मागे आहे – नम्रतेने परमेश्वराचा दास राहणे मला खरोखर पसंत आहे का?  

– क्रमशः श्लोक ५५ आणि ५६.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२५ ☆ ऑनर किलिंग… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ऑनर किलिंग। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन चढी नाम खुमारी / स्वर- विभा जी योगाश्रम, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२५ ☆

☆ ऑनर किलिंग… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘ऑनर किलिंग’ विपरीतार्थक शब्द…’सम्मानपूर्वक मृत्यु’ अर्थात् समाज का एक घिनौना सत्य…जो सदियों से हर जाति, हर मज़हब के लोगों में प्रचलित है। प्रश्न उठता है, ‘आखिर यह प्रथा आई कहां से?’ शायद! इसका जन्म हुआ–मानव में निहित सर्वश्रेष्ठता के भाव से, उसके अहं व उसके ग़ुरूर से। यह दुर्भावना, वह दूषित व घृणित भाव है, जो मानव को मानवता से कोसों दूर ले जाता है। उसकी संवेदनाएं मर जाती हैं और वह ठूंठ मात्र रह जाता है, क्योंकि संवेदनशून्य व्यक्ति अहंनिष्ठ, हृदयहीन, दैवीय गुणों से विहीन तथा स्नेह, सौहार्द, ममता, त्याग, सहानुभूति आदि की भावनाओं से बहुत दूर होता है। ऐसा अहंलीन मानव दूसरों के अस्तित्व को नगण्य समझता है। परंतु वह घर-परिवार में एक-छत्र साम्राज्य चाहता है, यहां तक कि वह अपने आत्मजों को भी अपनी सम्पत्ति व धरोहर स्वीकारता है तथा आशा करता है कि वे कठपुतली की भांति उसका हर हुक्म बजा लाएं… उसके हर आदेश की तुरंत अनुपालना करें।’ नो’ व ‘असंभव’ शब्दों का उसके शब्दकोश में स्थान न हो, क्योंकि उसमें प्रत्युत्तर सुनने का सामर्थ्य-साहस होता ही नहीं। वह शख़्स अजीब होता है…जो अपने से अधिक योग्य, बुद्धिमान, सामर्थ्यवान् व शक्तिशाली किसी दूसरे को समझता ही नहीं।

अक्सर सब परिजन उसकी अमुक प्रवृत्ति से सदैव परेशान रहते हैं। उसके घर आते ही बच्चे इधर-उधर छुप जाते हैं और पत्नी का चेहरा भी भय से कुम्हला जाता है, क्योंकि वह नहीं जानती, कब वह किस बात पर क्रोधित हो; उस पर अकारण बरसने लगे? और उसके माता-पिता भी सदैव उसके व्यवहार के प्रति आशंकित रहते हैं, क्योंकि वह किसी भी पल मर्यादा की सीमाओं का अतिक्रमण कर किसी को भी कटघरे में खड़ा कर सकता है।

चलिये! अब बच्चों की नियति पर चर्चा करते हैं… किस मन:स्थिति में वे उस घर में रहते हैं, जहां पिता…पिता नहीं, एक हिटलर की मानिंद सदैव कटु व्यवहार करता है। बच्चों को वह अपनी जायदाद समझता है और उन्हें अपने अंकुश में रखना चाहता है। बच्चों को विवशता के कारण उसकी हर ग़लत बात को सही कहना पड़ता है, क्योंकि प्रतिपक्ष की दलील सुनने का धैर्य उसमें होता ही नहीं। बच्चे उसे अपनी नियति स्वीकार सुंदर कल की कल्पना में खोए रहते हैं कि आत्म-निर्भर होने के पश्चात् उन्हें वह सब सहन नहीं करना पड़ेगा।…वे निरंकुश व स्वछंद हो जाएंगे तथा अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने में स्वतंत्र होंगे।

परंतु समय से पूर्व, यदि बेटा या बेटी किसी को चाहने लगता है; प्रेम करने लगता है, तो सुनामी की गगनचुंबी लहरें उस घर की शांति व अमनोचैन को समाप्त कर देती हैं; लील जाती हैं। सहसा उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है और वह लातों व घूसों पर उतर आता है। बेटी को तो वह घर की चारदीवारी में कैद कर लेता है और उससे मोबाइल आदि भी छीन लिया जाता है। वह मासूम दीवारों से सिर टकराती, आंसू बहाती, बार-बार ग़ुहार लगाती रहती है कि वह उसके साथ अपना जीवन बसर करना चाहती है। वह दिल की गहराइयों से उसे पसंद करती है और उसके बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती। परंतु उसकी आवाज़ बंद कमरे की दीवारों से टकरा कर लौट आती है। यदि वह कभी अपने तथाकथित पिता से जिरह करने का साहस जुटाती है, तो उस पर प्रतिबंध व पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं और कुलनाशिनी, कुलक्षिणी व कुलटा कहकर उसे ही नहीं, उसके माता-पिता को भी प्रताड़ित किया जाता है। जब ज़ुल्मों की इंतहा हो जाती है, तो अवसर पाकर वह उन ज़ंजीरों को तोड़ कर भाग निकलती है, जहां वह अपने हमसफ़र के साथ स्वतंत्रता से सुख की साँस ले सके।

इसके पश्चात् अक्सर उस घर में हंगामा व गाली-ग़लौज़ होता रहता है और वह ज़ालिम हर पल आसमान को सिर पर उठाए धमाचौकड़ी मचाए रहता है। उसके मन में यही ख़लिश रहती है कि यदि वह एक बार उसके सामने आ जाए, तो वह उसे अपनी ताकत का एहसास दिला कर चींटी की भांति मसल कर सुक़ून पा सके। वास्तव में वह पिता होने से पहले हिटलर होता है, जो किसी भी सीमा तक जा सकता है और यही ‘शक्ति-प्रदर्शन’ है– ‘ऑनर-किलिंग।’ लड़की का पिता व परिवारजन, अपने-अपने मान-सम्मान की दुहाई देते हुए उन दोनों की हत्या कर अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने बच्चों को जन्म देकर कोई एहसान नहीं किया और न ही वे गुलाम हैं उनकी सल्तनत के …जिन पर उनका एकाधिकार है। सो! वे उनसे इच्छित व्यवहार व आदेशों की अनुपालना की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं?

प्रेम सात्विक भाव है…प्रेम सामीप्य का प्रतिरूप है तथा एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए उन्हें क़रीब लाने का उपादान है। प्रेम संगीत है…प्रेम उच्छ्वास् है और प्रेम वह पावन भाव है, जो मलय वायु के झोंकों सम शीतलता प्रदान करता है। यह प्रश्न मन में अक्सर कुनमुनाता है कि जन्मदाता बच्चों में प्रेम का भाव प्रकट होते ही उनके दुश्मन क्यों बन जाते हैं? क्या झूठा अहं व मान-सम्मान बच्चों की ज़िन्दगी से अधिक अहमियत रखता है? शायद! उनकी नज़रों में प्रेम करना ग़ुनाह होता है, जिसका मूल्य अथवा ख़ामियाज़ा उनके आत्मजों को अपने प्राणों की बलि देकर ही चुकाना पड़ता है। चलिए! इन कट्टरपंथी दकियानूसी विचारधारा वाले माता-पिता के असामान्य व्यवहार पर दृष्टिपात कर लें। आजकल तो वे स्वयं को ख़ुदा स्वीकारने लगे हैं, क्योंकि वे अपनी इच्छानुसार बच्चों को जन्म देते हैं, अन्यथा भ्रूण-हत्या करवा कर उससे मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं और बच्चों के युवा होने पर उनके हृदय में उफ़नते प्रेम के ज्वार को देख वे उनके शत्रु बन जाते है और झूठी मान-मर्यादा हित आत्मजों के प्राण तक लेने में संकोच नहीं करते। ऐसे सिरफिरे लोगों को जो स्वयं को ख़ुदा से कम नहीं आंकते, क्या नाम देंगे आप?

यह शाश्वत् सत्य आजकल मान्य नहीं है कि जन्म व मृत्यु तो सृष्टि-नियंता के हाथ में है। मानव उसके हाथों का खिलौना- मात्र हैं। वह जितनी सांसें लिखवा कर इस संसार में जन्म लेता है, उससे एक सांस भी अधिक नहीं ले पाता। अरे! यह इक्कीसवीं सदी है… प्राचीन परंपराएं व मान्यताएं बदल गई हैं… सोच भी पहले-सी कहां है? शायद! वह ज़ालिम पिता यह सोचकर फूला नहीं समाता कि वह उसका जन्मदाता था। सो! उसकी हत्या व उसके प्राण लेकर उसने कोई अपराध अर्थात् ग़ुनाह नहीं किया।

विभिन्न प्रदेशों में खापें इस विचारधारा की पक्षधर व पोषक हैं कि युवाओं को अपनी इच्छानुसार विवाह करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। वे कुल-गोत्र व जात-बिरादरी की मर्यादा पर अधिक ध्यान देती हैं और उनकी हत्या करने तक को उचित ठहराती हैं। आश्चर्य होता है यह देख कर कि अनेक वर्ष तक एक छत के नीचे ज़िन्दगी बसर कर रहे पति-पत्नी को, भाई-बहन के रूप में राखी बांधने का फरमॉन स्वीकारना पड़ता है। कभी उन्हें व उनके माता-पिता को जात-बिरादरी व गाँव से निष्कासित कर दिया जाता है, तो कभी उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जातीं हैं।

परन्तु आजकल कुछ सुखद परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। चंद खापों का मृत्युभोज की परंपरा का विरोध करना या विवाह पर डी•जे• न चलाने की पेशकश, दहेज न लेने-देने की मुहिम आदि उनकी सकारात्मक सोच की ओर इंगित करता हैं। परंतु आवश्यकता है… समाज के तथाकथित ठेकेदार, बच्चों को अपनी इच्छानुसार जीवन साथी चयन करने की स्वतंत्रता प्रदान कर उदार-हृदयता का परिचय दें… उनके विरुद्ध मनमाने निर्णय लेकर बेतुके व विचित्र फरमॉन जारी न करें। संविधान ने सबको समानाधिकार प्रदान किए हैं और उन्हें भी अपनी इच्छानुसार जीवन-साथी के वरण करने का अधिकार है। सो! सबको एक-दूसरे की भावनाओं को अहमियत देते हुए समाज में समरसता स्थापित करने का भरसक प्रयास करना चाहिए।

यह अकाट्य सत्य है कि ऑनर किलिंग यदि एक की होती है, तो दोनों परिवार सकते में आ जाते हैं… उनके घर-परिवार में मातम-सा पसर जाता है, क्योंकि वे एक-दूसरे के अभाव में जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह हृदय-विदारक पीड़ा दोनों परिवारों की खुशियों को समूल नष्ट कर देती है तथा सुनामी की लहरों की भांति लील जाती है। प्रेम प्रतिदान का दूसरा रूप है…यह केवल देने का नाम है। सो! यदि समाज के रसूख़दार लोग बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान कर दें तथा मनचाहे जीवन साथी को वरण करने का अधिकार प्रदान करने की पहल करें, तो वे प्रसन्नता से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। सो! उनकी भावनाओं का तिरस्कार न करना ही जीवन की सार्थकता है। आइए! मिलकर जीवन को रोशन करें तथा समाज में नया उजाला फैलाएं। एक स्वर्णिम सुबह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है…सारी सृष्टि उपवन-सी महक रही है, जहां चिर-वसन्त है। हम भी मनोमालिन्य व ग़िले-शिक़वे मिटा कर प्रेम भाव से एक नए युग का सूत्रपात करें, जहां सम्बन्धों की गरिमा व अहमियत हो…हम स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाओं के स्थान पर, अलौकिक प्रेम व अनहद-नाद की मस्ती में खो जाएं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९८ – गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवित हम जलते गाँधी

? रचना संसार # ९८ ☆

☆  गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

सत्य अहिंसा प्रेम खो गया,

जीवित हम जलते गाँधी।

छलनी बंदूकों से छाती,

बस आँसू बहते गाँधी।।

*

रोती फिरती भावुक विमला,

नोचे बन दानव सारे।

पुरबी हवा हुई बोझिल है,

आये पश्चिम के धारे।।

भूले वेद धर्म सनातनी,

सत्य बात कहते गाँधी।

*

घाव प्रदूषण देता गहरा,

जले धूप से है काया।

आहत मंदिर-मस्जिद दोनों

नेताओं की है माया।।

बजता डंका महँगाई का

दंश सभी सहते गाँधी।

*

वैचारिक मतभेद हुए हैं,

घुन लगती सुविधाओं में।

मधुमक्खी के छत्ते लगते,

संत रहें दुविधाओं में।।

मंगल गीतों का टोटा है,

हम दुख में पलते गाँधी।

*

अनुशासन का नाम नहीं अब,

आँधी हैं हड़तालों की।

कुहरा छाया है युद्धों का,

कूटनीति घडियालों की।।

ओढ़े चादर लाचारी की,

हाथ सभी मलते गाँधी।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२५ ☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कॉलेज के दिनों की बात है। उन दिनों पर्यावरण संरक्षण पर हमें बड़े प्रेरक पाठ पढ़ाए जाते थे। अध्यापक बताते थे कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के आधार हैं। उनकी बातें मेरे मन में इतनी गहराई से उतर गईं कि मैंने निश्चय कर लिया है जीवन में जहाँ भी अवसर मिलेगा, मैं वृक्ष अवश्य लगाऊँगा।

उस दिन के बाद वृक्षारोपण मेरे लिए केवल एक सामाजिक कार्य नहीं रहा, बल्कि एक भावनात्मक दायित्व बन गया। किसी के जन्मदिन पर, किसी के विवाह के अवसर पर या किसी शुभ कार्य के आरंभ में मैं एक पौधा अवश्य लगाता। मुझे विश्वास था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति एक-एक वृक्ष भी लगाए, तो धरती की हरियाली कभी समाप्त नहीं होगी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते कई वर्ष बीत गए। एक दिन मुझे उस गाँव जाने का अवसर मिला जहाँ वर्षों पहले मैंने आम का एक पौधा लगाया था। गाँव पहुँचते ही लोगों ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया और खाने के लिए ताज़े आम लाकर रख दिए। आमों का स्वाद अद्भुत था। बातचीत के दौरान किसी ने मुस्कराकर कहा, “ये उसी वृक्ष के फल हैं जिसे आपने वर्षों पहले लगाया था।”

यह सुनते ही मैं कुछ क्षणों के लिए मौन रह गया। मेरी आँखें अनायास उस वृक्ष को खोजने लगीं। सामने एक विशाल आम का वृक्ष खड़ा था, जिसकी शाखाएँ फलों से लदी हुई थीं। मुझे लगा जैसे वह वृक्ष मुझे पहचान रहा हो। बरसों पहले मेरे हाथों से मिट्टी में रोपा गया छोटा-सा पौधा आज एक विशाल वृक्ष बनकर न केवल फल दे रहा था, बल्कि अनेक लोगों को छाया और सुख भी बाँट रहा था। उस क्षण मेरे हृदय में जो संतोष और प्रसन्नता थी, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

लेकिन उसी यात्रा में एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जिसने मन को उदासी से भर दिया। सड़क के किनारे मैंने बरगद, पीपल और आँवले के कई पौधे लगाए थे। मैं उत्सुक था कि वे अब बड़े वृक्ष बन चुके होंगे और राहगीरों को छाया दे रहे होंगे। परंतु जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि सड़क चौड़ी करने के लिए उन सभी वृक्षों को काट दिया गया था। जहाँ कभी हरियाली लहराती थी, वहाँ अब केवल धूल, पत्थर और कंक्रीट दिखाई दे रहे थे।

उन कटे हुए ठूँठों को देखकर ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे अपने परिवार के सदस्य छीन लिए हों। मन भारी हो गया। एक ओर उस आम के वृक्ष की सफलता का आनंद था, तो दूसरी ओर कटे हुए वृक्षों का दर्द। उसी क्षण मुझे अनुभव हुआ कि वृक्ष केवल पेड़ नहीं होते, वे हमारी स्मृतियों, भावनाओं और भविष्य से जुड़े होते हैं।

घर लौटकर मैंने अपने आँगन में लगे उन वृक्षों को देखा जिन्हें मैंने स्वयं रोपा था। वे हवा में झूम रहे थे। उनकी हरी पत्तियाँ मानो मुझे संदेश दे रही थीं-“जो हमें जीवन देता है, हम उसे कई गुना लौटाते हैं।”

मैंने उसी दिन फिर एक संकल्प लिया कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वृक्षारोपण का कार्य कभी नहीं छोड़ूँगा। कटे हुए वृक्षों का दुःख मनाने से अधिक आवश्यक है नए वृक्ष लगाना। क्योंकि वृक्ष केवल हमें ऑक्सीजन नहीं देते, वे आशा देते हैं, जीवन देते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संसार छोड़ जाते हैं।

आज भी जब उस आम के वृक्ष की याद आती है, तो ऐसा लगता है मानो वह मुझे आशीर्वाद दे रहा हो। तब मेरे मन से एक ही बात निकलती है-वृक्ष लगाना प्रकृति की सेवा ही नहीं, बल्कि आने वाले कल के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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