हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ३४ – अस्तित्व… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अस्तित्व।)

✍ अस्तित्व… ☆ श्री हेमंत तारे  

सतत अनदेखी

भी

नकार नही सकती

अस्तित्व

अनन्त काल तक

किसी दमदार बीज का ।

 

देर- सबेर

करवा ही देता है बीज

एहसास

अपने होने का

पैदा होकर चट्टान के गर्भ से ।

 

और

उसी दिन

कुछ नरम पड़ जाती है चट्टान

जननी बनकर ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४२ ☆ कविता – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “चौथी सीट“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४२ ☆

✍ कविता – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मालूम है अपनी जगह हमको,

तुम न दिखाओ जगह हमको।

*

माना तुम्हारे हाथ हैं लंबे पर

अपने हाथ मत दिखा हमको।

*

तुम गैर हो गैर ही रहोगे सदा,

अपना होना न सिखा हमको।

*

दिल में  बसने की कोशिश न कर,

प्यार ने ही तो छला सदा हमको।

*

सीखना है तो खिले फूल से सीखो,

मुस्कुराना उसीने सिखाया हमको।

*

तुम अपने आप में ही सुखी रहो,

अपने आप में रहने दो हमको।

*

न कोई गिला शिकवा न उम्मीद,

अपने आप पर भरोसा है हमको।

*

मेहनत ने नहीं पैदा किए भेद कभी,

सुविधाओं ने ही बांट दिया हमको।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९१ – जीवन का रंग… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)

☆ लघुकथा # ९१ – जीवन का रंग श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“अरे अरे पगली जब अक्ल बंट रही थी तो कहाँ थी तू, बेवकूफी की हद है, तुम्हें अलमारी में ना ठीक से कपड़े रखने आता है और ना ऑफिस जाते समय मेरे खाने का ठीक से टिफिन रखना आता है। कोई नई डिश बना भी नहीं सकती, रोज-रोज वही रोटी सब्जी ही बस बना कर दे देती हो? मेरे ऑफिस का चपरासी तक अच्छे से टिफिन लेकर आता है। जाने क्या तुम एम ए (इकोनॉमिक्स) से हो और घर का हिसाब किताब तक ठीक से संभाल नहीं  सकती।”

सुबह-सुबह जयंती को मनोज बड़बड़ा रहा था।

जयंती ने गंभीर स्वर में कहा – “मनोज तुम्हें मुझसे इतनी ही दिक्कत है तो मुझे छोड़ कर चले क्यों नहीं जाते। अपने परिवार वालों और दोस्तों के सामने हमेशा मेरी बेइज्जती करते रहते हो और यह क्यों भूल जाते हो कि मेरे पिताजी के दिए हुए फ्लैट में ही रह रहे हो तब शादी क्यों कर ली थी?”

मनोज ने गुस्से में कहा- “अच्छा सुबह- सुबह लड़ाई झगड़ा बंद करो? बस अब आंसू बहाने लगोगी, बस रो रोकर जीती हो। चलो अब जल्दी से नाश्ता लगा दो? ”

तभी फोन की घंटी बजती है।

अब देखो किसका फोन है जयंती?

“मनोज मैं तुम्हारे लिए नाश्ता लग रही हूं?”

मोबाइल की घंटी बजती रही थोड़ी देर बाद जयंती ने फोन उठाया।

फोन मनोज की बहन का था “क्या बात है भाभी तुम्हें फोन उठाने तक की फुर्सत नहीं है घर तो बुलाती नहीं हो और ध्यान भी नहीं रखती हो?”

जयंती ने फोन मनोज को थमा दिया।

“भैया क्या है सुबह-सुबह आप भी फोन नहीं उठा रहे हो अपनी बहन को भूल गए हो क्या?”

“नहीं नहीं मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं? कड़वे झूठ का जहर पी रहा हूं जीवन का सारा रंग ही बेरंग हो गया है।”

“कोई बात नहीं भैया तुम्हारे जीवन में मैं रंग भर देती हूं आज शाम को मैं कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास रहने को आ रही हूं?”

“ठीक है बहन तुम आ जाओ, कम से कम तुम्हारे आने से खाना तो ढंग से मिलेगा।”

मनोज तेज गति से ऑफिस की ओर चला जाता है। जयंती मन ही मन विचार करती रहती है कि सारा दिन मैं सेवा करती हूं जीवन का रंग तो मेरा फीका हो गया है और इन दोनों  बहन भाई के नाटक खत्म ही नहीं हो रहे हैं। अब ये दोनों मिलकर बातों के तीर चलाएंगे।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९१ ☆ आयुष्य… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९१ ?

☆ आयुष्य… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

खूप सुंदरच म्हणायला हवं,

हे आयुष्य,

सुख – दुःख सावली सारखं,

येतं – जातं!

आपण येऊन पोहोचतो,

अशा ठिकाणी—

जिथे सारे रिपू निघून जातात!

आपण शुध्द होऊन,

फक्त सात्विकताच स्वीकारतो!

निर्मम होऊन,

चालत राहतो अखेर पर्यंत,

परतीच्या प्रवासात!!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२४ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २४ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२४ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २४ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तेरे दीवानों में तो शामिल हुआ, 

प्यार मेरा किन्तु नाकाबिल हुआ, 

हम वफा की राह पर जब भी बढ़े 

सिर्फ नफरत का जहर हासिल हुआ।

0

जब अनुभव की आग तपाती है, 

पीड़ा से सहकार कराती है, 

अहंकार के सारे दोष जला देती, 

कुंदन सा हमको दमकाती है।

0

तू सच्चा किरदार निभा, 

बिना स्वार्थ व्यवहार निभा, 

लाभ-हानि पर ध्यान न दे 

अगर किया है प्यार निभा।

0

श्रम करने में कैसी लाज, 

श्रम देगा उन्नति के ताज, 

कवच बनाना तुम पौरुष का 

झपटेंगे दुर्दिन के बाज।

0

तेरी तृष्णा न खा जाये ईमान को, 

भेड़िया यह बनाती है इन्सान को, 

संग लाती है दौलत, सभी व्याधियाँ 

चाटना पड़ती है धूल धनवान को।

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८५ ☆ आलेख – “राजस्थान में हिंदी : एक सांस्कृतिक और भाषाई अध्ययन” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८५ ☆

?  आलेख – राजस्थान में हिंदी : एक सांस्कृतिक और भाषाई अध्ययन ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

राजस्थान, जिसे ‘राजाओं की भूमि’ के नाम से जाना जाता है, न केवल अपने वैभवशाली इतिहास, दुर्गों और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह एक समृद्ध भाषाई परंपरा का भी क्षेत्र रहा है। यहाँ की हिंदी भाषा ने सदियों से विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों को आत्मसात करते हुए एक विशिष्ट पहचान बनाई है। राजस्थान में हिंदी के विविध स्वरूप, बोलचाल में क्षेत्रीय अपभ्रंश, साहित्यिक हिंदी का विकास और सरकारी प्रयासों ने मिलकर एक ऐसी विविधता से भरी भाषाई संस्कृति को जन्म दिया है जो अतीत और वर्तमान के बीच  सशक्त सेतु का कार्य करती है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य …

राजस्थान में हिंदी का सतत  विकास एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। अरावली पर्वतमाला के भौगोलिक विभाजन ने यहाँ की भाषा को दो प्रमुख भागों , उत्तर-पश्चिमी राजस्थान (मारवाड़ या मरूदेश) और दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान (मेरवाड़ा) में विभाजित किया। यहाँ की आदिभाषा ‘मरूभाषा’ या ‘मरुवाणी’ रही है, जो समूचे राज्य की साहित्यिक भाषा भी बनी। भाषाविदों के अनुसार, राजस्थानी भाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ, जिसके साहित्यिक रूप को ‘डिंगळ’ के नाम से जाना गया।

राजस्थान के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि यह क्षेत्र सदैव से विदेशी आक्रमणों का केन्द्र रहा है, परंतु इन आक्रमणों ने यहाँ की भाषा और संस्कृति को समृद्ध ही किया। विभिन्न आक्रांताओं के साथ आए सांस्कृतिक प्रभावों ने स्थानीय बोलचाल की भाषा में नए शब्द, मुहावरे और अभिव्यक्तियाँ जोड़ीं, जिससे हिंदी के स्थानीय स्वरूप में निरंतर परिवर्तन और विकास होता रहा।

राजस्थान में हिंदी के विभिन्न स्वरूप और क्षेत्रीय अपभ्रंश …

राजस्थान में हिंदी ने अनेक क्षेत्रीय रूप धारण किए हैं, जो स्थानीय बोलियों और भाषाई परंपराओं से गहराई से प्रभावित हैं। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से राजस्थानी भाषा हिंदी की एक महत्वपूर्ण बोली मानी जाती है, जिसमें डिंगल और पिंगल जैसी साहित्यिक परंपराएँ विकसित हुई हैं। राजस्थानी भाषा में डिंगल के सरस दोहे, नाथों की बानियों के गूढ़ साक्षात्कार, ढोला-मरवण की विरहोक्तियाँ और वीरदर्पोचित चैतावणी  शामिल हैं।

बोलचाल की हिंदी में राजस्थानी के प्रभाव स्पष्ट घुल मिल चुके हैं। स्थानीय बोलियों जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी आदि ने हिंदी के स्थानीय स्वरूप को आकार दिया है। इन बोलियों में प्रयुक्त होने वाले शब्द, मुहावरे और वाक्य संरचनाएँ हिंदी में समाहित होकर उसे एक विशिष्ट राजस्थानी अंदाज़ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, ‘छानो’ (अच्छा), ‘बिगो’ (जल्दी करो) जैसे शब्द स्थानीय हिंदी का हिस्सा बन गए हैं।

साहित्यिक हिंदी और राजस्थानी लेखक…

हिंदी साहित्य के विकास में राजस्थानी लेखकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। राजस्थानी साहित्य अपनी समृद्धता, व्यापकता एवं लोकप्रियता के कारण हिन्दी साहित्य की धरोहर है तथा विवेचनीय है। हिंदी साहित्य के ‘आदिकाल’ के परिसीमन में आने वाली ‘पुरानी हिन्दी’ की बहुत सी रचनाएँ राजस्थानी भाषा में ही मिलती हैं।

राजस्थानी साहित्य मुख्यतः वीर-रस प्रधान है, जिसमें युद्ध, बलिदान तथा स्वधर्म के लिए सर्वस्व का उत्सर्ग कर देने की भावना प्रमुखता से व्यक्त हुई है। चारण साहित्य में वीरस्तुति काव्य (प्रशस्ति) की समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें शौर्य और बलिदान की गाथाएँ वर्णित हैं। विरह में भी शौर्य भरे  भावना प्रधान वृत्तांत राजस्थानी हिंदी साहित्य को विशिष्ट बनाते हैं।

हिंदी साहित्य में राजस्थान के योगदान की बात करें तो कबीर की साखियों की भाषा खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य ‘सधुक्कड़ी’ भाषा है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी के विकास में राजस्थानी भाषा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

हिंदी के लिए राजस्थान सरकार के प्रयास..

साहित्य सदैव राजश्रायी रहा है, और राजस्थान तो अनेकानेक राज्यों , राजाओं का समुच्चय बना रहा है, जहां पुरस्कारों , राज दरबारो में साहित्य पनपता रहा है। इन दिनों राजस्थान सरकार ने हिंदी के विकास और प्रसार के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की हैं।  डिजिटल युग में हिंदी को और अधिक बढ़ावा देने तथा इसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों से एकीकृत करने की आवश्यकता भी समझी गई है।

राजस्थान में प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के उपयोग को बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिससे सरकारी विभागों में हिंदी के मानकीकृत उपयोग को सुनिश्चित किया जा रहा है । राज्य सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी हिंदी को महत्व दिया है।  अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अब अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी माध्यम में भी पढ़ाई का विकल्प दिया गया है। यह निर्णय उन गाँवों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है , जहाँ हिंदी माध्यम के उच्च माध्यमिक स्तर के सरकारी विद्यालय उपलब्ध नहीं है।

भाषाई विवाद और राजस्थानी को मान्यता ..

राजस्थान में भाषाई विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वर्ष 1944 से चल रही है, ठाकुर राम सिंह तंवर के नेतृत्व में दिनाजपुर में राजस्थानी भाषा का पहला अधिवेशन हुआ था।  25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था, लेकिन यह विधेयक अभी भी लंबित है। क्षेत्रीय भाषाओं के पोषण से   राष्ट्रभाषा हिन्दी का  स्वतः पोषण ,   यह दृष्टिकोण हिंदी और राजस्थानी के पारस्परिक संबंध को प्रतिबिंबित करता है।

राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता देने का मुद्दा रोजगार से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि संवैधानिक मान्यता मिलने पर राजस्थान लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं स्थानीय भाषा में भी आयोजित हो सकेंगी ।

राजस्थान में हिंदी का उज्ज्वल भविष्य …

राजस्थान में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल प्रतीत होता है, लेकिन इसके लिए कुछ चुनौतियों का समाधान करना भी आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति , 2020 ने शिक्षा में मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग पर जोर दिया है.  इस नीति के तहत प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई पर जोर दिया जाएगा, जिससे बच्चों की  भाषाई नींव मजबूत हो सकेगी और वे अपने आसपास के समाज और संस्कृति से बेहतर तरीके से जुड़ सकेंगे।

भविष्य में हिंदी और राजस्थानी के समन्वित विकास की आवश्यकता है। “राजस्थानी की मान्यता से हिन्दी कमजोर नहीं होगी वरन उसे बल मिलेगा”।  इस सत्य को समझना चाहिए।

राजस्थान के भाषा संस्थान, सम्मान और विश्वविद्यालय …

राजस्थान में हिंदी शिक्षण, शोध और प्रचार-प्रसार के लिए अनेक संस्थान सक्रिय हैं। राजस्थान में हिंदी सेवा के लिए अनेक शासकीय एवं निजी संस्थाओं द्वारा पुरस्कार और सम्मान भी प्रदान किए जाते हैं। हिंदी और राजस्थानी साहित्य के विकास में विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थानों की पत्रिकाएं छपती हैं।  हिंदी के प्रचार-प्रसार और इसके उत्थान के लिए कार्यक्रमों के निरंतर आयोजन होते हैं । कवि सम्मेलनों में जन भागीदारी साहित्य के प्रति लोगों की अभिरुचि बताती है।

राजस्थान में हिंदी का इतिहास और विकास एक गतिशील और बहुआयामी प्रक्रिया रही है। विभिन्न  सांस्कृतिक प्रभावों , पर्यटन और स्थानीय भाषाई परंपराओं ने मिलकर हिंदी के एक ऐसे स्वरूप को जन्म दिया है जो राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। राजस्थानी भाषा और हिंदी का पारस्परिक संबंध इस बात का उदाहरण है कि कैसे क्षेत्रीय भाषाएँ राष्ट्रभाषा को समृद्ध कर सकती हैं। भविष्य में शिक्षा नीतियों, तकनीकी एकीकरण और सांस्कृतिक जागरूकता के माध्यम से राजस्थान में हिंदी का विकास जारी रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी और राजस्थानी के बीच सहअस्तित्व और पारस्परिक समृद्धि के मार्ग को और अधिक सशक्त बनाया जाए, ताकि राजस्थान की भाषाई विरासत भावी पीढ़ियों तक संरक्षित रह सके। डिजिटल युग ने प्रकाशन , त्वरित वैश्विक  पहुंच के नए मार्ग बनाए हैं, जिनका उपयोग हिंदी के विस्तार को बहुआयामी आकाश दे रहा है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९७ – हल कुछ निकले तो सार्थक है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – हल कुछ निकले तो सार्थक है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९७ – हल कुछ निकले तो सार्थक है… ☆

हल कुछ निकले तो सार्थक है, लिखना और सुनाना ।

वर्ना क्या रचना, क्या गाना, क्या मन को बहलाना ।।

*

अविरल नियति-नटी सा चलता, महा काल का पहिया ।

विषधर सा फुफकार लगाता, समय आज का भैया ।।

*

भीष्म – द्रोण अरु कृपाचार्य सब, बैठे अविचल भाव से ।

ज्ञानी – ध्यानी मौन साधकर, बंधे हुये सत्ता सुख से ।।

*

ताल ठोंकते दुर्योधन हैं, घूम रहे निष्कंटक ।

पांचों पांडव भटक रहे हैं, वन-बीहड़ पथ-कंटक ।।

*

धृतराष्ट्र सत्ता में बैठे, पट्टी बाँधे गांधारी ।

स्वार्थ मोह की राजनीति से, धधक रही है चिनगारी ।।

*

गांधारी भ्राता शकुनि ने, चौपड़ पुनः बिछाई है ।

और द्रौपदी दाँव जीतने, चौसर – सभा बुलाई है ।।

*

शाश्वत मूल्यों की रक्षा में, अभिमन्यु की जय है ।

किन्तु आज भी चक्रव्यूह के, भेदन में संशय है ।।

*

क्या परिपाटी बदल सकेगी, छॅंट पायेगी घोर निशा ।

खुशहाली की फसल कटेगी, करवट लेगी नई दिशा ।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४६ – पहचान ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा पहचान”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४६ ☆

🌻लघु कथा🌻 पहचान 🌻

कमल पुष्प जैसी पवित्रता, सुंदरता, आध्यात्मिक ज्ञान, और सृजन का प्रतीक अरविंद यथा नाम तथा गुण को व्यक्तित्व में उतारते डॉक्टर अरविंद सरल सहज भाव से भरे हुए।

क्लीनिक पर लगातार भीड़ को नियंत्रित करते उनके सहयोगी। अचानक अफरा-तफरी, भागा दौड़ी। समझ में आता तब तक क्लीनिक में लगभग बीस व्यक्तियों का समागम।

डॉक्टर साहब – – जल्दी कीजिए इनको बचा लीजिए, हमारी दुनियाँ है हम लुट जाएंगे, हम तो परदेसी हैं।

आज एक समारोह में आए हैं तबीयत थोड़ी खराब थी पर इतनी खराब हो जाएगी यह पता नहीं था, प्लीज हेल्प मी!!!!!!

सहायकों ने दूर हटने का ईशारा किया। आपके पास कोई कागज  दवाई पर्चा है? ऐसे कोई डा नहीं देखता। सच ही तो है – – आज की दुनिया में डॉक्टरों की क्लीनिक को तोड़फोड़ करते देर नहीं लगती सारा दोष डा पर डाल दिया जाता है।

चश्मे से झाँकते डॉ साहब अपनी कुर्सी से उठते हुए बोले – “कुछ नहीं होगा हम है न शांति बनाएं!!! पेशेंट का नब्ज जाने किस भाव से उन्होंने देखा और दवाइयां इंजेक्शन का इशारा।“

तत्काल इलाज मिलते ही सब कुछ उठते हुए तूफान की जगह शांत होती लहरें चेहरे पर मुस्कुराहट।

तब तक गर्म चाय लिए एक साहसी आदमी सभी को चाय दे रहा था।

इससे पहले कुछ बात होती मरीज के सिर पर हाथ फेरते कहा– हम डॉक्टर लोगों का जीवन सदैव कर्तव्यों का पालन करते हुए निकलता है। हम वचनबद्ध रहते हैं। बाकी प्रभु की इच्छा। हाथ जोड़ रिश्तेदार डॉक्टर साहब आपकी फीस???

पूरे कमल की तरह खिलखिलाते उन्होंने जवाब दिया सिर्फ मेडिसिन का बिल दे देना है और हाँ जब कभी मैं आपके शहर आया मुझे याद रखिएगा। यह रहा मेरा कार्ड।

पीछे से किसी ने कहा– आज भी भगवान किसी न किसी रूप में आते हैं। डॉक्टर अरविंद की पहचान, सदैव के लिए बन गई मुस्कान 😊

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५३ – देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५३ ☆ देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज के दिन को “विश्व सहनशीलता” दिवस के रूप में मनाए जाने का क्रम विगत कुछ दशकों से ज़ारी हैं। जब इस बावत जानकारी प्राप्त हुई, तो थोड़ा विस्मय भी हुआ। हम अभी तक ये ही समझते थे, कि असहनशीलता सिर्फ हमारे देश के नागरिकों में ही होती हैं, क्योंकि हम लोग तो बिना बात के भी असहनशील होने में देरी नहीं करते हैं। गुस्सा करना तो हम सबके दिलो दिमाग की प्राथमिकता में है।

छोटी छोटी बातों को लेकर नाराज़ होना हमारी परंपरा बन चुकी हैं। दिलों में आपसी भाई चारे की विरासत तो कब की दफ़न हो चुकी है। छोटे से लेकर उम्र दराज व्यक्ति लड़ने के बहाने खोजता रहता है। वो ज़माना लद गया, जब “जर, जोरू और जमीन” (धन, औरत और जमीन) के लिए ही झगड़े हुआ करते थे।

पश्चिम ने हमारी संस्कृति को अर्श से फर्श (आसमान से जमीन) पर पटक दिया हैं। पिता-पुत्र, भाई-बहन, पति-पत्नी जैसे पवित्र संबंधों को असहनशीलता ने विच्छेद कर तार तार कर दिया है।

शर्म और हया जैसे शब्दों को तो हिंदी के शब्द कोश से हटाने के प्रयास सफल रहें हैं। अंग्रेजी में “लेट गो” या पंजाबी भाषा में “ठंड रख” सुने हुए कई दशक हो गए हैं। नित जीवन में तो अब “जीरो टॉलरेंस” पूरी तरह अपना लिया है।

हमारे संतो ने मानव के हृदय में धीरज रखने के लिए, बहुत सारी रचनाएं, रची हैं। कबीर की वाणी भी ऐसा ही कुछ कह रही हैं।

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥

अब लेखनी को विराम देता हूं कहीं प्रतिदिन लंबा लंबा पढ़ कर आप असहनशील ना हो जाएँ।☺️

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३०६ ☆ नवी सत्ता नवे रस्ते… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३०६ ?

☆ नवी सत्ता नवे रस्ते… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मनाच्या कोंडवाड्यातच अचानक भेटले घोडे

मिरवणुक काढुया म्हणता सुखाने नाचले घोडे

*

वरातीच्याच खर्चाची जराशी काळजी होती

स्वतःचा खर्च केला अन् खुशीने झिंगले घोडे

*

गुलालाची इथे उधळण अरे सूर्या कुणी केली

तुझ्या आधीच पृथ्वीवर तुझे बघ पोचले घोडे

*

रथाचे चाक वेगाने फिराया लागले आता

नवी सत्ता नवे रस्ते भराभर दौडले घोडे

*

तुकोबा ज्ञानराजाची निघाली पालखी आहे

सनातन पालखी सोबत किती बघ दंगले घोडे

*

जुगारी धनिक लोकांनी उडवली धूळ टापांची

बुकीने लाटले पैसे बिचारे धावले घोडे

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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