हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १५६ ☆ लघुकथा – आ अब लौट चलें ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा आ अब लौट चलें। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १५६ ☆

☆ लघुकथा – आ अब लौट चलें ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

वही धरती, वही आसमान, वही सूरज, चाँद वही। इधर- उधर उड़ते पक्षी भी वही, फिर क्यों लग रहा है कि कुछ तो अलग है? आसमान कुछ ज़्यादा ही साफ दिख रहा है, सूरज देखो कैसे धीरे- धीरे आसमान में उग रहा है, नन्हें अंकुर सा। पक्षियों की आवाज कितनी मीठी है? अरे! ये कहाँ थे अब तक? अहा! कहाँ से आ गईं इतनी रंग – बिरंगी प्यारी-प्यारी चिड़ियाँ?

 वह मन ही मन हँस पड़ा। सब यहीं था, मैं ही शायद आज देख रहा हूँ ये सब! प्रकृति हमसे दूर होती है भला कभी? पेड़ – पौधों पर रंग- बिरंगे सुंदर फूल रोज खिलते हैं, हम ही इनसे दूर रहते हैं? जीवन की भाग – दौड़ में हम जीवन का आनंद उठाते कहाँ हैं? बस भागम -भाग में लगे रहते हैं, कभी पैसे कमाने और कभी किसी पद को पाने की दौड़, जिसका कोई अंत नहीं? रुककर क्यों नहीं देखते धरती पर बिखरी अनोखी सुंदरता को? वह सोच रहा था —–

 – -अरे, खुद को ही तो समझाना है, हँसते हुए एक चपत खुद को लगाई और फिर मानों मन के सारे धागे सुलझ गये। कोरोना के कारण इक्कीस दिन घर में रहना अब उसे समस्या नहीं समाधान लग रहा था। बहुत कुछ पा लिया जीवन में, अब मौका मिला है प्रकृति की सुंदरता देखने का, उसे जीने का —–

 अगली अलसुबह वह चाय की चुस्कियों के साथ छत पर पक्षियों से घिरा उन्हें दाना खिला रहा था। सूरज लुकाछिपी कर आकाश में लालिमा बिखेरने लगा था। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान पहले कभी न आई थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६५ ☆ हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६५ ☆ हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत…

भारतीय संस्कृति में प्रकृति केवल हमारे चारों ओर बसी हुई कोई वस्तु नहीं, बल्कि हमारा अपना विस्तार है। मिट्टी की सुगंध, तुलसी की पवित्रता, पीपल की शीतल छाया, नदी की कलकल ध्वनि—ये सब भारतीय मन के भाव संसार का हिस्सा हैं। यही कारण है कि हमारे यहां पेड़-पौधों को जीव माना गया है, और हरियाली को सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत।

आज जब दुनिया तनाव और भागदौड़ में उलझी है, हरियाली हमें एक सरल-सा संदेश देती है—

“धीरे बढ़ो, पर निरंतर बढ़ो।”

यही ग्रीन मोटिवेशन का आधार है।

हरी पत्ती का दर्शन — सकारात्मकता का पहला पाठ

किसी भी पौधे को ध्यान से देखिए—

वह कभी शिकायत नहीं करता, कभी थकता नहीं, बस संभावनाओं की ओर बढ़ता रहता है।

न सूरज की गर्मी रोकती है, न बारिश की बूंदें, न मिट्टी की कठोरता।

इस छोटे से पौधे के भीतर इतनी अद्भुत इच्छा होती है कि वह पत्थरों के बीच भी रास्ता बना लेता है।

भारतीय दर्शन में इसे उद्यम कहा गया है

अर्थात मनुष्य की वही भीतरी शक्ति, जो परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, आगे बढ़ना जानती है।

यही सीख हर पौधा हमें रोज देता है।

भारतीय संस्कृति और हरियाली—एक आत्मीय संबंध

भारतीय परंपरा में हर पौधा अपने भीतर कोई न कोई सांस्कृतिक अर्थ समेटे हुए है…

तुलसी — शुद्धता और जीवन शक्ति

पीपल — प्राण-वायु, दीर्घायु और आध्यात्मिक ऊर्जा

बरगद— स्थिरता और दीर्घकालिक दृष्टि

नीम — स्वास्थ्य और संरक्षण

कृष्ण कमल, कदंब, बेल — भगवान कृष्ण और शिव के भाव-संदेश

यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने कहा…

“वृक्ष आत्मा नहीं बोलते, पर हमारी आत्मा से बोलते हैं।”

आज के समय में, जबकि मनुष्य मानसिक दबावों से जूझ रहा है, यह सांस्कृतिक सीख पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

हरियाली का मनोवैज्ञानिक प्रभाव—सकारात्मकता की नई परिभाषा

समकालीन विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का मत है कि हरे रंग की उपस्थिति—

  • मन में शांति बढ़ाती है
  • दिल की धड़कन संतुलित करती है
  • चिंता और तनाव को कम करती है
  • रचनात्मकता को बढ़ाती है

इसीलिए हरे पौधे घरों, अस्पतालों,कार्यालयों और धार्मिक स्थलों में बहुतायत से लगाए जाते हैं।

भारतीय आध्यात्मिक विचार कहता है—

जिस मन में हरियाली रहती है, वहां नकारात्मकता कभी टिक नहीं पाती।

ग्रीन मोटिवेशन: प्रकृति की भाषा में सफलता का सूत्र

पेड़,पौधों की दुनिया में एक अद्भुत शांति है, पर इसके भीतर छिपा है गहरा जीवन-संदेश—

  • जड़ मजबूत हो, तो तूफान भी झुका नहीं सकते।
  • धीरे-धीरे बढ़ने में भी एक स्थायी शक्ति होती है।

जो देता है, वही सच्चे अर्थ में बढ़ता है — जैसे पेड़ बिना किसी स्वार्थ के छाया, ऑक्सीजन, फल, फूल और जीवन देता है।

जीवन में सफलता का यह “ग्रीन सूत्र” हमें सहज रूप से समझा देता है कि

विकास का सबसे सुंदर रूप वही है, जो शांत, सतत और सबके लिए उपयोगी हो।

अन्ततः यही कहा जा सकता है कि हर पौधा एक अध्यापक है।हरियाली हमारी संस्कृति की जड़ है,और सकारात्मकता उसका फल।

जब मनुष्य प्रकृति को केवल देखने या सजाने की चीज नहीं मानता, बल्कि जीवन-शक्ति समझता है, तभी उसके भीतर वह प्रज्ञा जागती है जिसे भारतीय ऋषियों ने “अनुभूति” कहा है।

आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उनसे जुड़कर जीने की है।

क्योंकि—

जहां हरियाली होती है, वहां ईश्वर की कृपा, मन की शांति और जीवन का संतुलन—तीनों साथ रहते हैं।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८६ ☆ दुबई से ~ लंबी फ्लाइट की तैयारी ~ ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८६ ☆

?  दुबई से ~ लंबी फ्लाइट की तैयारी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इन दिनों दुबई से

ग्लोबल विलेज वाली दुनियां में लंबी घंटों की थका देने वाली उड़ान का नाम सुनते ही मन में  सफर शुरू हो जाता है। दुबई से न्यूयॉर्क तक के पंद्रह घंटे , एक सीट पर वही लंबी सुरंग हैं जिसमें यात्री अपने धैर्य, शरीर और आदतों की परीक्षा खुद देता चलता है। ऐसी यात्रा में असुविधा का बीज छोटी सी चूक से भी उग आता है। इसलिए तैयारी केवल बैग पैक करने का काम नहीं, बल्कि मन और शरीर को उड़ान के हिसाब से ढालने की कला है।

सबसे पहली तैयारी सीट चुनने से शुरू होती है। यूं तो विमान में हर सीट एक ही दिशा में जाती है, लेकिन अनुभव अलग अलग होता है। जिसे बाहर झांकना अच्छा लगता है वह खिड़की वाला स्थान चुन कर खुद को थोड़ी राहत दे सकता है, और जिसे पैरों को फैलाने की आजादी चाहिए वह बीच वाले रास्ते के पास बैठे तो यात्रा कहीं ज्यादा संयत हो जाती है। शरीर ऐसे लम्बे समय में सबसे तेजी से थकता है, इसलिए कपड़े हल्के और ढीले होने चाहिए ताकि नसें खून का दौरान बनाएं रखें।  शरीर उड़ान के हर उतार चढ़ाव के साथ सहज रह सके।

हैंड बैगेज की तैयारी में छोटी छोटी चीजें बड़ा काम करती हैं। गर्दन को थामने वाला तकिया, आंखों को रोशनी से बचाने वाला मास्क, पसंद का संगीत, कुछ हल्के स्नैक्स, मॉइश्चराइज़र और चार्जर जैसे मित्र पूरी उड़ान में साथ देते हैं और परेशानियों को उससे पहले ही रोक लेते हैं जब वे आकार भी नहीं ले पातीं। उड़ान के दौरान शरीर हाइड्रेटेड रखना चाहिए। अच्छा हो कि फ्लाइट से पहले नहा कर फ्रेश ढीले  कपड़े पहनकर रेडी हो। अक्सर लोग विमान में चाय, कॉफी या सोडा के भरोसे रहते हैं, पर ये पेय शरीर की नमी खींच लेते हैं और लंबी उड़ान में यही छोटी गलती कई गुना भारी पड़ती है। नमी की कमी केवल गला नहीं सुखाती, बल्कि सिरदर्द, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ाती है। हमें जेट लेग से निपटना होता है इसलिए अपनी बाडी क्लाक को नींद के मामले में उस देश के समय के अनुरूप पहले से ही ढालने का यत्न करें जहां आप जाने वाले हैं।

लंबे सफर की असली चुनौती यह है कि पंद्रह घंटे सीट से चिपके रहने का मन तो बना लिया जाता है, पर शरीर इसे स्वीकार नहीं करता। हर दो तीन घंटे में उठकर कुछ कदम चल लेने और पैरों को स्ट्रेच करने से रक्त संचार सुचारू बना रहता है और बेचैनी कम होती है। दुनिया भर के डॉक्टर लगातार चेताते हैं कि एक ही स्थिति में बहुत देर तक बैठे रहने से नसों में अवांछित गांठें बनने का खतरा बढ़ता है, इसलिए सफर में थोड़ी चहल कदमी दवा जैसी काम करती है।

केबिन की हवा अपनी अलग ही प्रकृति रखती है। जमीन की हवा जितनी नम रहती है उड़ान की हवा उतनी ही सूखी होती है। ऐसे में त्वचा और होंठ बार बार यह याद दिलाते हैं कि उन्हें भी थोड़ा ध्यान चाहिए। एक हल्का मॉइश्चराइज़र और लिप बाम इस पूरे मौसम परिवर्तन को सरल बना देते हैं।

भोजन को लेकर भी समझदारी जरूरी है। भारी खाना ऊंचाई पर और कठिन लगता है।

फ्लाइट में परोसे जाना वाला भोजन फ्री हो सकता है पर अपनी सेहत के अनुसार ही लिया जाना चाहिए।हल्का और संतुलित भोजन पेट और मन दोनों को शांत रखता है।

यात्रा केवल शारीरिक नहीं होती, मानसिक भी होती है। इतने लंबे सफर में खिड़की के बाहर की दुनिया कई घंटे तक एक समान दिखती है, वही आसमान  बस , ऐसे में मन के लिए मनोरंजन की तैयारी भी जरूरी है। कुछ किताबें, डाउनलोड की हुई फिल्में या संगीत एक अदृश्य सहयात्री बन जाते हैं और समय को बेहतर तरीके से आगे बढाते हैं। अगर कोई दवा नियमित रुप से लेनी है तो उसे साथ रखना और उड़ान के हिसाब से उसका समय तय कर लेन बुद्धिमानी भरा कदम है।

इसके साथ ही दस्तावेजों की जांच उड़ान की अनिवार्य जरूरत है। कई यात्री लंबी यात्रा की चिंता में सबसे साधारण गलती इसी मोड़ पर कर बैठते हैं। इसलिए पासपोर्ट, टिकट और वीजा को अंतिम बार देखकर ही यात्रा की शुरुआत करना मन की शांति को अगले कई घंटों तक सुरक्षित रखता है। इमिग्रेशन के संभावित सवाल जवाब पहले ही सोच लेना चाहिए। जिस देश में जाना हो वहां के नियमों को समझ लेना चाहिए, उदाहरण के लिए दुबई में खसखस भूल कर भी न ले जाएं। अमेरिका में कोई प्रतिबंधित बीज, या प्रतिबंधित दवाएं आदि न ले जाएं। जो मेडिसिन रखें उनका प्रिस्क्रिप्शन साथ रखें।

इन सारी तैयारियों का मकसद एक ही है कि लंबी यात्रा थकान के बोझ से मुक्त होकर एक शांत और यादगार अनुभव बन सके। उड़ान चाहे कितनी भी लंबी हो, थोड़ी सजगता और थोड़ी समझदारी उसे सहज ही सरल बना देती है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

इन दिनों दुबई में

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७२ – कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७२ – कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

…यह घर अब घर नहीं रहा, यह तो उनकी ज़िंदगी की सड़ांध थी, जिसे बाज़ार के बिल्डर ने दो पन्नों के विज्ञापन से उनके मुँह पर फेंक दिया था। वे घबराकर फिर पन्ना पलट दिए। अब देश के मुख्य समाचार थे। लेकिन क्या ख़बरें? मन पर ज्वेलरी और घर के विज्ञापनों का नशा ऐसा तारी हो चुका था कि देश की लूट, नेता की बकवास, या कहीं हुए बड़े घोटाले की ख़बरें भी फीकी पड़ गईं। अब उन्हें लगा कि असली लूट तो उनके भीतर मची है, जो उन्हें पल-पल ख़ुद से दूर कर रही है। ऊपर लाल स्याही में लिखा था—आज धनतेरस पर ग्रहों का ऐसा योग बना है जो चार सौ साल बाद आया है। “ऐसे शुभ मुहूर्त को व्यर्थ न जाने दें, कुछ न कुछ ज़रूर खरीदें!” इस वाक्य ने श्रीधर बाबू के जले पर नमक नहीं, सीधे तेज़ाब डाल दिया। वे सोचने लगे, ‘क्या ख़रीदूँ?’ महीने के अंत में दीवाली आई है। जो थोड़ा-सा पैसा बचा था, वह घर की अनिवार्य पूजा सामग्री और तेल-बत्ती में चला गया। अब क्या ख़रीदें? शायद ‘चार सौ साल बाद’ वाले इस योग का मतलब यही है कि चार सौ साल तक श्रीधर बाबू जैसा आदमी कुछ नहीं ख़रीद पाएगा। यह शुभ मुहूर्त उनके लिए नहीं, उन विज्ञापन देने वालों के लिए आया था, जिनके ग्रह एकदम ‘उच्च’ चल रहे थे।

तभी अगले पन्ने पर नज़र गई। यह इलैक्ट्रॉनिक सामानों की पूरी बारात थी। मोबाइल, टीवी, फ्रिज… और टीवी? मत पूछिए। एक तो कमरे की दीवार के साइज़ का, दूसरा ऐसा जो सिर्फ़ बोलने से चलता है—जैसे मालिक से भी ज़्यादा होशियार हो। और दाम? श्रीधर बाबू, जो एक प्राइमरी स्कूल के मामूली टीचर थे, के लिए वह दाम मतलब उनकी साल भर की पगार थी। पगार नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का मूल्य। लेकिन नीचे लिखा था, “आसान फ़ाइनेंस उपलब्ध, प्रोसेसिंग फ़ीस ज़ीरो, ब्याज ज़ीरो परसेंट!” बस! यहीं से श्रीधर बाबू के मन में शैतान जाग उठा। ज़ीरो परसेंट ब्याज! अगर वे एक शानदार टीवी फ़ाइनेंस पर ले लें तो! किश्तें भरते रहेंगे, कम से कम घर आने वाले पड़ोसियों को तो लगेगा कि आदमी का रुतबा है। वे मन ही मन हिसाब लगाने लगे—कितनी किश्तें होंगी, कितनी चाय बचानी पड़ेगी, बच्चों की कॉपी-किताब में कितनी कटौती करनी पड़ेगी। तभी उन्हें याद आया—बच्चों की पढ़ाई के नाम पर तो केबल कनेक्शन कब का कटवा दिया था! जब केबल ही नहीं है तो दीवार साइज़ के टीवी का क्या करेंगे? बस, वहीं खुली आँखों का सपना धड़ाम से टूट गया। उन्हें लगा, यह ज़ीरो परसेंट ब्याज नहीं है, यह तो उनकी बची-खुची ज़मीर को गिरवी रखने का ऑफर था। मन भारी हो गया, हाथ भी अखबार के अस्सी पन्नों के वज़न से दब गए।

उन्होंने दो-तीन पन्ने जल्दी-जल्दी पलटे। स्थानीय समाचार! पढ़कर क्या करेंगे? वही रोज़ की ख़बरें—लूट हुई, मर्डर हुआ, किसी नेता ने जनता को ‘महान’ बताया और किसी ने ख़ुद को ‘जनता का सेवक’। ये ख़बरें तो अब केवल विज्ञापनों के बीच का ‘फ़िलर’ बनकर रह गई हैं। फिर आया वह पन्ना, जहाँ शहर भर के बड़े और छुटभैये नेता अपनी फोटो चिपकाकर, हाथ जोड़कर खड़े थे। “धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ!” भले ही उनमें से कई तो खुलेआम गुंडे हों, जिन पर कई मुकदमे चल रहे हों। श्रीधर बाबू को हँसी आई, जो तुरंत ही कड़वाहट में बदल गई। उन्होंने सोचा, कोई इन नेताओं को समझाए कि ये जो शुभकामनाएँ छपवाते हैं, इनका पैसा भी देते हैं क्या? और कौन प्रभावित होता है इन शुभकामनाओं से? वे जो हीरे ख़रीद रहे हैं, या वे जो सीलन भरे मकान में सड़ रहे हैं? इन नेताओं के चेहरों पर जो नकली मुस्कान थी, वह भी एक विज्ञापन थी—ईमानदारी का विज्ञापन, जिसका स्टॉक बाज़ार में ख़त्म हो चुका है। कुल पचास से ऊपर पन्नों के इस अखबार में आधे से ज़्यादा में विज्ञापन थे। ख़बरें तो कहीं गायब थीं, और गायब थी अखबार की वह पुरानी स्याही की खुशबू, जो ज्ञान की गंध हुआ करती थी। अब इसमें से आती है सिर्फ़ विज्ञापन की भीनी महक, जिसका सरोकार ख़बरों से नहीं, सिर्फ़ पैसे से है, श्रीधर बाबू की जेब से है।

श्रीधर बाबू का मन बुरी तरह उचट गया। त्यौहार की सुबह-सुबह मन इतना भारी हो गया कि लगा जैसे उन्होंने धनतेरस पर सोना नहीं, अपनी सारी ख़ुशियाँ बेच डाली हैं। उन्हें लगा, हम सब इन विज्ञापनों के गुलाम हो गए हैं। हमारा वजूद बचा कितना है? इंसान की पहचान अब इंसानियत से नहीं, ब्रांड से होती है। बिना ब्रांडेड कपड़े के आदमी की औकात कौड़ी की है, भले ही उसमें इंसानियत कूट-कूट कर भरी हो। अखबार बंद करके श्रीधर बाबू ने उसे अलग रखा। पहले पन्ने के किनारे पर ऊपर में कीमत लिखी थी: कुल पृष्ठ ५२ + ८, मूल्य ५ रु। पाँच रुपए का यह कागज़, यह अखबार, आज आपको कितना ‘चूना’ लगा सकता है, सोचिए? यह सिर्फ पाँच रुपए का कागज़ नहीं था, यह उनकी पूरी आर्थिक और मानसिक हैसियत का आईना था। एक विज्ञापन! सिर्फ़ एक विज्ञापन आपके भीतर घुस कर बैठ गया तो? वह धीरे-धीरे आपके छोटे से सुखी संसार को चाटकर ख़त्म कर देगा। श्रीधर बाबू की आँखों में नमी थी। वे उस बिल्डर को, जौहरी को, और उस ज़ीरो परसेंट ब्याज को कोस रहे थे। लेकिन सबसे ज़्यादा वे उस पांच रुपए के अखबार को कोस रहे थे, जिसने एक ही सुबह में उन्हें उनकी गरीबी का इतना मार्मिक और पीड़ादायक अहसास करा दिया था।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७३ ☆ बाल कविता – परियाँ कहतीं ‘वो ईश्वर है’… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७३ ☆ 

बाल कविता – परियाँ कहतीं ‘वो ईश्वर है’ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

रोज हवाएँ बदला करतीं,

कभी पश्चिमी,कभी पूर्वी।

जाने इनको कौन चलाता,

कभी दक्खिनी,कभी उत्तरी।

 *

कभी बहें ये शीतल-शीतल,

कभी आग-सी बरसाती हैं।

कभी बहें ये तूफानी-सी,

कभी प्यार से सरसाती हैं।

 *

टिमटिम तारों-सी नभ में तो,

कभी पूर्ण उजियारी जैसी।

कभी बादलों के सँग मस्ती,

कहीं निपट अँधियारी जैसी।

 *

कोई तारा तेज चमकता,

कोई बिल्कुल मंदा-मंदा।

जाने क्या व्यापार हो रहा,

लगता जैसे गोरखधंधा।

 *

तारे भी दिन-रात चल रहे,

अटल दीखता बस ध्रुव तारा।

मण्डल दिखे सप्तऋषियों का,

दीख रहा गतिमय नभ सारा।

 *

कभी गरजकर बादल बरसें,

कहीं प्रलय-सी है आ जाती।

कहीं नहीं बरसे जल बिल्कुल,

धरा प्यास से ही मर जाती।

 *

कभी-कभी ये बादल राजा,

इंद्रधनुष को हैं ले आते।

रूप दिखाकर ये मनभावन,

पल दो पल में ही खो जाते।

 *

कहीं श्रृंखलाएँ गिरिवर की,

कोई ऊँची , कोई छोटी।

कहीं पठारों की मृतकाएँ,

कहीं दलदली बेहद खोटी।

 *

कहीं जंगलों की अमराई,

जिसमें पशुओं का विचरण है।

किस्म-किस्म के वन तरुओं पर,

पक्षि गणों का मृदु कलरव है।

 *

कहीं बह रहीं नदियाँ कल-कल,

कहीं मनोरम झरने प्यारे।

इन्हें देखकर प्यार उमड़ता,

प्यास बुझा सुख देते सारे।

 *

सागर कहीं महासागर हैं,

खारे जल से अटे हुए हैं।

अनगिन जीव रहा करते हैं,

मोती,माणिक छिपे हुए हैं।

 *

कहीं सुगन्धित धरा नहाए,

अन्न,फलों को रोज लुटाए।

प्राणों को नवजीवन देकर,

सप्त-सुधा रस है बरसाए।

 *

चलो! चलें परियों से पूछें,

कौन सभी का है निर्माता।

परियाँ कहतीं “वो ईश्वर है-

सबका चालक,जीवन दाता।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ७९ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ७९ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या बोलण्यातला प्रामाणिकपणा मला जाणवला होता पण त्यामुळेच ‘प्रभूदेसाई यांच्याविरुद्ध लेखी तक्रार करण्यामागच्या त्यांच्या भूमिकेवर ते ठाम राहिले तर? ‘ हा प्रश्न मनाला त्रास देत होताच.)

कांहीही झालं तरी हा तिढा सुटायलाच हवा असं उत्कटतेनं मनात आलं आणि ‘त्या’ची आठवण झाली. ‘तो’ जे करेल तेच सर्वार्थाने योग्यच असेल असं वाटलं न् मन थोडं शांत झालं. आजोबांच्या तेव्हाच्या मन:स्थितीचा विचार करता आपण लगेचच घाईघाईने मुद्द्याला हात घालणं योग्य नाही हेही जाणवलं. जे करायचं ते आधी विचार करूनच ठरवायला हवं होतं. त्यामुळे आजच्यापुरता हा विषय इथंच थांबवणं ओघानं आलंच.

“आजोबा, आज तुमच्याशी बोललो, खूप बरं वाटलं ” मी म्हणालो. “तुम्ही मोकळेपणानं सगळं सांगितलंत म्हणून तुमची नेमकी बाजू तरी मला समजली. आणि पटलीही. त्यामुळे तुम्ही केलेल्या तक्रारीच्या बाबतीत काय करायचं, तुमच्यावर अन्याय न होता कसा मार्ग काढायचा हे मी पाहिन. याबाबत आधी आमच्या साहेबांशीही बोलेन. आपण भेटू लवकरच. येत्या एक-दोन दिवसातच मी आधी फोन करून तुमच्याकडे येईन. चालेल? “

त्यांनी होकारार्थी मान हलवली. माझ्या बोलण्यातली सकारात्मकता ही त्यांनी जे सांगितलं त्यावरची माझी त्याक्षणीची उस्फूर्त प्रतिक्रिया होती. माझ्या या प्रतिक्रियेनंतरचं आजोबांच्या नजरेत उमटलेलं समाधान माझी उमेद वाढवणारं होतं!

तरीही आपण नेमकं काय करायचं याबद्दल मात्र त्याक्षणी माझ्या मनात पुरेशी स्पष्टता नव्हती हे खरंच. प्रभूदेसाईंना जास्तीतजास्त कठोर शिक्षा करायची म्हणजे नेमकं काय करायचं की जेणेकरून सहस्त्रबुद्धे आजोबांचं समाधान होईल? शिक्षा कोणतीही असो बँकांच्या नियमात बसूनच करायला हवी. सहस्त्रबुद्धे आजोबांची बाजू मला पटणं पुरेसं नव्हतं. जे घडलं असं आजोबांनी सांगितलं त्याला कोणतेही सबळ पुरावे, साक्षीदार त्यांनी सादर केलेले नव्हते. केवळ ते म्हणतात म्हणून एका जबाबदार ब्रॅंच मॅनेजरला कठोर शिक्षा करण्याची कोणतीही तरतूद कोणत्याच बँकेच्या नियमात नाहीय. स्वतःची बाजू मांडताना प्रभूदेसाई मला म्हणाले होते त्यातला शब्द न् शब्द मला स्वच्छ आठवला. “एका यशस्वी ब्रॅंच मॅनेजरचं वीस वर्षांचं निर्दोष, चांगलं रेकॉर्ड पहायचं की एका य:कश्चित तक्रारदाराला अनावश्यक महत्व द्यायचं हे तुम्ही ठरवायला हवं सर.. ” असं

प्रभूदेसाई मला म्हणाले होते. त्यांचं तेव्हाचं बोलणं ऐकताना मला ते कांहीसं अति आत्मविश्वासाचं, अहंकाराचा दर्प असलेलं असंच वाटलं होतं. पण आज मी काय करायला हवं हे ठरवायची वेळ आली तेव्हा तेच बोलणं नकळत मला दिशा दाखवून गेलं. त्यामुळे आता सहस्त्रबुध्दे आजोबांबाबतची माझ्या मनातली सहानुभूती जपत असतानाच ग्राहक-सेवेच्या गुणात्मकतेबरोबरच बँक कर्मचाऱ्यांच्या बाबतीतले बॅंकेचे नियमही मला दुर्लक्षून चालणार नव्हतं. तरीही जे करायचं ते सहस्त्रबुद्धे आजोबांना न्याय मिळाल्याचं समाधान देणारंही असायला हवं असं मला मनापासून वाटत होतं!

त्यादिवशी सहस्त्रबुद्धे आजोबांचा निरोप घेऊन मी बाहेर पडल्यानंतर परस्पर आॅफिसला जाताच गेल्या दोन दिवसांपासूनचा सविस्तर वृतांत वखरेसाहेबांना सांगून त्यांच्याशी चर्चा करायला मी त्यांच्या केबिनमधे पोहोचेपर्यंतच्या तासाभरात माझ्या मनात येऊन गेलेल्या उलट-सुलट विचारांचा हा सगळा सारांश!

आज उद्या एवढ्यात हा प्रश्न मार्गी लागायची निकड असणारे वखरेसाहेब माझीच वाट पहात होते.

“भेटले कां ते तक्रारदार? झालं बोलणं? “

“हो सर.. “

“काय म्हणतायत? तक्रार मागं घ्यायला तयार झाले कीं अजूनही हटून बसलेत? “

आत्ता या घटकेला ती तक्रार मागे घेतली जाणं हेच वखरेसाहेबांइतकंच मलाही निकडीचं वाटत होतं.. पण…?

“त्यासंबंधीच सविस्तर बोलायचंय सर. तुम्ही बिझी असाल तर दुपारी लंचनंतर येऊ कां सर? ” त्यांचा अंदाज घेत मी विचारलं.

“छे छे.. नाही.. नको. हाच विषय आधी एकदाचा संपवायला हवा. आत्ताच सेंट्रल ऑफिसमधून याचसंबंधी फोन आला होता. मी एक-दोन दिवसात काम होऊन जाईल असं सांगितलंय. “

मी चमकून त्यांच्याकडे पाहिलं.

“कां? प्रॉब्लेम आहे कां कांही? ” त्यांनी उतावीळपणे विचारलं.

“प्रॉब्लेम आहेच सर. आणि आपल्यालाच तो सोडवायचाय. त्याबद्दलच बोलायचं होतं. “

“ठीकाय. बोला. “

“या तक्रारीला जी घटना निमित्त झाली ती नेमकी काय होती याबाबत प्रभूदेसाईंनी मला जो सांगितला होता तो आणि सहस्त्रबुद्धे आजोबांनी सांगितलेला असे दोन्ही घटनाक्रम पूर्णतः परस्परांच्या विरूध्द आहेत सर. ” मी म्हणालो.

“हो. हे अपेक्षितच होतं. प्रभूदेसाई बोललाय माझ्याशी. आणि ते सहस्त्रबुध्दे आजोबाही कसे तर्कटी, संतापी आणि तक्रारखोर आहेत हेही सांगितलंय त्यानं. “

मी सावध झालो. मी फक्त सहस्त्रबुद्धेंबद्दलची सहानुभूती आणि बँक कर्मचाऱ्यांबद्दलचे नियम याच दोन बाबींचा विचार केलेला होता. वखरेसाहेबांचं

प्रभूदेसाईंबद्दलचं अतिशय चांगलं मत मी गृहितच धरलं नव्हतं. पण खरं तर कोणताही निर्णय घेताना हे मतही अतिशय निर्णायक ठरायचीच शक्यता जास्त होती कारण वखरेसाहेब हेच स्वतः कोणत्याही निर्णयावर शिक्कामोर्तब करणारे अधिकारी होते!

‘डोण्ट वरी. प्रभूदेसाई माझाच माणूस आहे. स्टार परफॉर्मर आहे तो. त्याच्या विरुद्ध कुणी तक्रार करावी हेच आश्चर्य आहे ‘ असं याच संदर्भात प्रभूदेसाईंबद्दल बोलताना

वखरेसाहेब मला यापूर्वीही म्हणाले होते ते आठवलं. प्रभूदेसाई मला पूर्णतः अनोळखी असताना, अतिशय अल्पसहवासातल्या त्यांच्या बोलण्यावरून आणि सहस्त्रबुद्धे आजोबांनी सांगितलेल्या त्यांच्या अनुभवावरून तयार झालेलं प्रभूदेसाईंबद्दलचं माझं मत व्यक्त करायची घाई करणं अनेक वर्षांच्या अनुभवावरून तयार झालेल्या वखरेसाहेबांच्या मनातल्या प्रभूदेसाई या व्यक्तीच्या प्रतिमेला तडा देणारंच ठरणार होतं. ते मला नको होतं. कारण हे माझ्यासाठी योग्य निर्णय घेण्यातला फार मोठा अडसरच ठरायची शक्यता होती.

“हो सर. काल मी सहस्त्रबुध्देंना प्रथम भेटलो तेव्हा त्यांच्याबद्दलचा हाच पूर्वग्रह माझ्या मनात होता. ” गेल्या दोन दिवसात मी आणि सहस्त्रबुद्धे यांच्या भेटीत नेमकं जे जे बोलणं झालं ते सांगायला मी सुरुवात केली. वखरेसाहेब शांतपणे आणि उत्सुकतेने सगळं ऐकत होते. प्रभूदेसाईंबद्दलचं त्यांचं मत कलुषीत न करता सहस्त्रबुद्धे आजोबांबद्दलचा त्यांच्या मनातला पूर्वग्रह आणि गैरसमज दूर होणं माझ्यासाठी खूप महत्त्वाचं होतं.

त्यादिवशी नेमकं काय घडलं होतं ते सगळं सहस्त्रबुद्धेंच्याच शब्दात माझ्या तोंडून ऐकताना वखरेसाहेबांच्या चेहऱ्यावरची अस्वस्थता मला ठळकपणे जाणवली. माझं बोलणं संपलं तेव्हा नि:शब्दपणे ते क्षणभर स्तब्ध झाले.

“सर, या सगळ्या पार्श्वभूमीवर प्रभूदेसाई काय किंवा सहस्त्रबुद्धे आजोबा काय कुणालाही झुकतं माप न देताही अन्याय झाल्याची भावना त्या दोघांच्याही मनात निर्माण होणार नाही याची काळजी घेणं आपल्यासाठी आवश्यक आहे असं मला वाटतं. “

“हे सगळं प्रकरण इतके दिवस दुर्लक्षित राहिलंच कसं पण? त्याला जबाबदार कोण हेही ठरवायला हवंच ना? ” ते उद्वेगाने म्हणाले.

“हे प्रकरण तडजोड न होता यापुढंही असंच लटकत राहिलं, तर तेही करावं लागेलच. पण ती नंतरची गोष्ट. आत्ता तडजोड होण्यासाठी तातडीनं काय करायचं ते आधी ठरवूया सर. “

“मी.. मी आज त्या प्रभूदेसाईला बोलावून घेतो ताबडतोब. आपण बोलू या त्याच्याशी. तशीच वेळ आली तर तो माझ्या शब्दाबाहेर जाणार नाही खात्री आहे माझी. “

“नाही सर. नको. आत्ता नको. आता कोणत्याही परिस्थितीत जे करायचं ते आपणच ठरवायला हवं. शिवाय तुम्हाला प्रभूदेसाईंच्याबद्दल एवढी खात्री असेल तर तशीच वेळ आली तर त्यांची मदत तेव्हा घेता येईलच कीं.. ” शक्य तेवढं सौम्य शब्दांत त्यांचा अंदाज घेत मी म्हणालो.

“पण आपण करायचं म्हणजे नेमकं काय करायचं..? ” त्यांनी उत्सुकतेने विचारलं.

“सर, मी माझं मत सांगेन आणि मार्गही सुचवेन. त्यात तुमच्या सल्ल्यानुसार बदलही करूया, मात्र जे कांही करायचं ते वेळेची निकड बघता आपण तातडीने करायला हवंय. “

“नो प्राॅब्लेम. बोला.. “

मला पटकन् काय बोलावं सुचेचना. मनाशी पुसटसंही कांहीच ठरवलेलं नसल्यामुळे जे आपल्या मनात आहे ते सगळं हातचं कांहीही राखून न ठेवता मोकळेपणानं व्यक्त होण्याखेरीज पर्यायच नव्हता. आणि मग दुसऱ्याच क्षणी, याच संदर्भात घडलेल्या सर्व प्रसंग, चर्चा आणि त्या त्या वेळी मनात उमटलेल्या माझ्या प्रतिक्रिया याच्याच गेले दोन रात्रंदिवस मनोमन सुरू असलेल्या मंथनाचं उत्स्फूर्त शब्दरूप माझ्याही नकळत मनाच्या तळातून उत्कटतेने व्यक्त होत राहिलं…!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मैत्री… लेख क्र. २१ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे ☆

सौ. गीता वासुदेव नलावडे

? मनमंजुषेतून ?

 ☆ मैत्री… लेख क्र. २१ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे

चौथीच्या वर्गावरच्या शिक्षिका पेपर तपासायला गेल्यामुळे मी त्यांच्या वर्गावर जरा डोकावले, तर ऋजुता मोरे (नाव बदललेले) जोरात किंचाळत होती.

तिला म्हटलं, “बाईंनी दिलेला अभ्यास घेऊन माझ्या वर्गात ये. ” 

ती जागेवरून उठायला तयार नव्हती. दुसरी मुलं तिला उठवायला गेली तर ती त्यांना मारायला लागली, एकाला चावली. तिची तक्रार घेऊन मुलं माझ्या वर्गात आली.

मी तिला बोलवलं, समजावून सांगितलं, “तू खूप चांगली आहेस, मला आवडतेस, म्हणून तुला माझ्या वर्गात बोलावलं. “

ती खूप खुश होऊन आनंदाने वर्गात गेली पण लगेच दुसऱ्या मुलीसोबत परत आली, म्हणाली, “ही मला चिडवते. “

मी म्हटलं, “अगं, ही तुझी मैत्रीण आहे ना? मग भांडता काय अशा? “

त्यावर ती म्हणाली, “बाई, हिने त्या मुलाला मारले. हे हिच्या वडिलांना समजले तर ते तिला मारतील, आणि हे मला सहन होणार नाही. हिला मारलं, तर मला दुःख होईल, ही मी तिला समजावून सांगत होते. पण ती ऐकतच नाही. बाई, आम्ही दोघी मैत्रिणी आहोत. कितीही भांडलो, तरी एकत्र येतो, आमचं भांडण पाच मिनिटंही टिकत नाही. “

हे सांगताना तिचे डोळे भरून आले होते. एवढ्या लहान वयात मैत्रीचे उदात्त भाव तिच्या निरागस चेहऱ्यावर दिसत होते.

लहान मुलं ती – क्षणात भांडणार, क्षणात एक होणार. परंतु, आपल्या मैत्रिणीच्या चुका दाखवून तिला चांगलं वागायला प्रवृत्त करणाऱ्या या चिमुरडीचा मला खूप अभिमान वाटला. तिचा हा युक्तीवाद माझ्या मनाला स्पर्शून गेला.

खरंच आम्ही मोठ्यांनी यातून बरेच शिकण्यासारखे आहे, नाही का?

क्रमशः दर गुरुवारी… 

© सौ गीता वासुदेव नलावडे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०२ – कविता – ☆ स्वयं से लड़ते रहे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता स्वयं से लड़ते रहे” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०२ 

☆ स्वयं से लड़ते रहे☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

जिंदगी भर,  हम रहे लड़ते स्वयम से

पर हुए ना मुक्त, अब तक भी अहम से।

*

यज्ञ जप तप दान धर्म सुकृत्य कितने

कभी मन से तो कभी अनमने मन से

जुड़ी इनके साथ तृष्णाएँ  कईं थी

श्रेष्ठ होने के सतत चलते जतन थे,

पठन पाठन भी चले आगम निगम के

पर हुए ना मुक्त, अब तक भी अहम से।

*

जटिल होती ही गई,   श्रम साधनाएँ

खो गई कमनीय,  मन की सरलताएँ

हो तिराहे पर खड़े,  अब दिग्भ्रमित से

सूझती राहें नहीं,   किस ओर जाएँ,

समझ आया आज,  बचना था चरम से

पर हुए ना मुक्त,  अब तक भी अहम से।

*

सहज रहते, संग खुशियाँ खिलखिलाती

दर्प,  संशय,  भय,  पराजय से बचाती

 खोजते यदि,  समन्वय कर श्वांस से तो

सुगमता से,   जिंदगी  फिर मुस्कुराती

वहम से हो मुक्त,  मिल जाते परम् से

पर हुए ना मुक्त, अब तक भी अहम से।

☆ 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२३ ☆ भोर का संदेश ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “भोर का संदेश” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२३ ☆ भोर का संदेश ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

एक जलती अँगीठी सा

सूर्य धरकर भेष

ले खड़ा पूरब दिशा में

भोर का संदेश ।

 

कुनकुनी सी धूप

पत्ते पेड़ के उजले

जागकर पंछी

दाना खोजने निकले

नदी धोकर मुँह खड़ी

तट पर बिखेरे केश।

 

पर्वतों के बीच

घाटी धुंध में लिपटी

रात चुपके से

कोने में जा सिमटी

सितारे लौटे घरों को

चाँद अपने देश ।

 

मंदिरों की ध्वजा

फूँके शंख पुरवाई

पाँखुरी पर फूल की

इक बूँद अलसाई

लिख रही दिन के लिए है

नियति के आदेश ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२७ ☆ मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२७ ☆

✍ मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

आदमी की वो जात का ही नहीं

कह रहा है जो अब ख़ुदा ही नहीं

 *

हक़ है मजदूर को भी जीने का

मील मालिक ये सोचता ही नहीं

 *

घोल के ये नहीं पिला सकते

जब हुनर तुमको सीखना ही नहीं

 *

सुनके अफवाह हो गया दंगा

वाकया शहर में हुआ ही नहीं

 *

मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है

 शेर इनका कोई मरा ही नहीं

 *

जो है सरपंच आज दुनिया का

अम्न दुनिया में चाहता ही नहीं

 *

माँ के पाँवों से होके है रस्ता

और जन्नत का रास्ता ही नहीं

 *

वो अरुण कुछ न ब्रज में पायेगा

प्रेम रस में जो भीगता ही नहीं

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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