हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान।)

☆ आलेख – जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

एक ही समयावधि में पैदा हुए और लगभग एक साथ बड़े हुए लोगों का समूह जनरेशन ( पीढ़ी ) कहा जाता है। आमतौर पर पन्द्रह से पच्चीस साल के अंतराल में पैदा हुए लोग एक पीढ़ी माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने बचपन, स्कूल, तकनीक और सामाजिक बदलाव एक साथ देखे होते हैं। इनकी आदतें, भाषा, फैशन, सोचने का ढंग अक्सर मिलता-जुलता होता है। परिवार के स्तर पर पीढ़ी का स्तेमाल- दादा- दादी की पीढ़ी, माता-पिता की पीढ़ी, बच्चों की पीढ़ी के रूप में किया जाता है। समय और जन्म समय के आधार पर जनरेशन ( पीढ़ी ) के प्रमुख प्रकार बेबी बूमर्स, जनरेशन एक्स और मिलेनियल्स हैं। प्रत्येक पीढ़ी को एक खास समय सीमा और ऐतिहासिक माहौल से पहचाना जाता है, उदाहरणार्थ– साइलेंट जनरेशन ( 1928- 1945 ), बेबी बूमर्स ( 1946- 1964 ), जनरेशन एक्स ( 1965- 1980 ), मिलेनियल्स ( 1981-1996), जनरेशन जी ( 1997-2012 ), जनरेशन बीटा ( 2025- 2039 ) आदि।

जेन जी से तात्पर्य जनरेशन जैड है। ये उन लोगों की पीढ़ी है, जो 1997 से 2012 ई० के बीच पैदा हुए हैं। बेबी बूमर्स, जेन एक्स, मिलेनियल्स के बाद अल्फावेट में जैड आया, इसीलिए इसे जनरेशन जैड कहा गया, इसे जूमर्स भी बोलते हैं तथा जेन एल्फा से तात्पर्य ये वो लोग हैं जो लगभग 2010 से 2026 ई० के बीच पैदा हुए। ये पीढ़ी जन्म से ही इन्टरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों से परिचित रही है, इसलिए इसे डिजिटल नेटिव भी कहा जाता है। जेन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके पास ज्ञान के अनगिनत स्रोत उपलब्ध हैं किन्तु उसी के अनुपात में वह मानसिक दबाव, अकेलेपन,तुलना, भविष्य की अनिश्चितता और पहचान के संकट से जूझ रही है। बाह्य रूप से आत्मविश्वासी दिखाई देने वाली पीढ़ी अंदर से चिंता, अवसाद, तनाव, डिजिटल लत जैसी मानसिक समस्याओं का सामना कर रही है। सामाजिक अलगाव से आभासी दुनिया में तो ये सक्रिय दिखाई देते हैं किन्तु वास्तविक जीवन में अकेलापन अनुभव करते हैं।

आज अधिकांश युवा अपने जीवन की तुलना दूसरों की उपलब्धियों से करने लगे हैं। इन्स्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक पर दिखाई देने वाला जीवन वास्तविक चित्र नहीं होता, उसका सम्पादित स्वरूप होता है फिर भी युवा उसी को आदर्श मान लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनका आत्मविश्वास घटता है, स्वयं को असफल समझने लगते हैं, हीन भावना विकसित होने लगती है। डिजिटल एडिक्शन से इनको नींद कम आती है, सामाजिक सम्बन्ध कमजोर होते हैं। जेन जी ऐसे समय में शिक्षा प्राप्त कर रही है, जहाँ प्रतियोगिताएँ अत्यन्त तीव्र हैं। अधिक अंक, बेहतर काॅलेज, श्रेष्ठ नौकरी, विदेशी शिक्षा की दौड़ मानसिक दबाव उत्पन्न करती है। कैरियर की अनिश्चितता के कारण युवा लगातार सोचते रहते हैं कि कौन-सा कौशल सीखें? भविष्य में रोजगार मिलेगा या नहीं? माता-पिता व्यस्त हैं, बच्चे मोबाइल पर हैं, भोजन अलग-अलग समय पर होने से भावनात्मक संवाद कमजोर हो रहा है।

सोशल मीडिया जेन जी के जीवन का मुख्य अंग बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी शिक्षा, रोजगार और रचनात्मकता के क्षेत्र में नयी सम्भावनाएँ खोलीं हैं। कई युवा यह सोचकर चिंतित रहते हैं कि भविष्य में मशीनें कहीं उनके कार्य का स्थान न ले लें, इसलिए आवश्यक है कि युवाओं में सृजनात्मक आलोचनात्मक चिंतन तथा मानवीय संवेदनाओं का विकास किया जाए। विद्यालय- महाविद्यालय स्तर पर नियमित मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाएँ। परिवार युवा के मानसिक स्वास्थ्य का सबसे मजबूत आधार होता है। जेन जी को भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की भी आवश्यकता होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की बातें धैर्यपूर्वक सुनें, उनकी तुलना अन्य बच्चों से न करें, केवल अंक के आधार पर उनका मूल्यांकन न करें। भोजन, भ्रमण और पारिवारिक गतिविधियों के लिए नियमित समय निकालें। डिजिटल क्रांति के बाद अशोभनीय या आयु अनुपयुक्त यौन सामग्री अत्यन्त सरल बना दी गई है, जो उनकी आयु और मानसिक परिपक्वता के अनुकूल नहीं होता। कई बार जिज्ञासा, साथियों का प्रभाव आदि के कारण बच्चे ऐसी सामग्री के सम्पर्क में आ जाते हैं। इस चुनौती का समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं अपितु संवाद में निहित है। माता-पिता को बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण सम्बन्ध विकसित करके उन्हें आत्मसंयम से समृद्घ करना होगा। शिक्षा, सरकार, परिवार व समाज सभी की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे इस दिशा में सकारात्मक वातावरण तैयार करें।

भारत में जेन जी दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या है। ये वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी हैं, अत: भारतीय संस्कृति के अनुरूप इनको मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलन पर बल देना ही होगा। योग, प्राणायाम, ध्यान, नियमित दिनचर्या, सत्संग, संगीत और प्रकृति के निकट ले जाना होगा, जो तनाव कम करने तथा भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। परिवार संवेदनशील बनें, विद्यालय सहयोगी हों, समाज कलंकमुक्त दृष्टिकोण अपनाए और सरकार मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराए तो जेन जी की अपार क्षमता राष्ट्र निर्माण में प्रभावी योगदान दे सकती है।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (५) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (५) ? ?

आत्मषटकम् पर मनन-चिंतन की प्रक्रिया में आज पाँचवें श्लोक पर विचार करेंगे। अपने परिचय के क्रम में अगला आयाम आदिगुरु शंकराचार्य कुछ यूँ रखते हैं,

 न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:

पिता नैव मे नैव माता न जन्म:

न बंधुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।

इसका शाब्दिक अर्थ है कि न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है। न मेरा कोई पिता है, न कोई माता है, न ही मेरा जन्म हुआ है। न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु  है और न ही कोई शिष्य। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

मृत्यु के संदर्भ में देखें तो शंकराचार्य जी महाराज के कथन से स्पष्ट है कि देह छूटना आशंका नहीं होना चाहिए। यों भी यात्रा में पड़ाव आशंका नहीं हो सकता। यात्रा तो परमात्मा के अंश की है, यात्रा आत्मा की है। यात्रा के सनातन और यात्री के शाश्वत होने का प्रसंग आए और योगेश्वर उवाच, स्मृति में न आए, यह संभव ही नहीं। भगवान गीतोपदेश में कहते हैं,

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

 आत्मा का किसी भी काल में न जन्म होता है और न ही मृत्यु। यह पूर्व न होकर, पुनः न रहनेवाला भी नहीं है। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।

मैं मृत्यु नहीं हूँ, अत: स्वाभाविक है कि जन्म भी नहीं हूँ। जो कभी जन्मा ही नहीं, वह मरेगा कैसे? जो कभी मरा ही नहीं, वह जन्मेगा कैसे?..ओशो की समाधि पर लिखा है, ‘नेवर बॉर्न, नेवर डाइड, ऑनली विज़िटेड दिस प्लानेट अर्थ बिटविन….’ उन्होंने न कभी जन्म लिया, न उनकी कभी मृत्यु हुई। वे केवल फलां तिथि से फलां तिथि तक सौरग्रह धरती पर रहे।’

विचार करें तो बस यही अवस्था न्यूनाधिक हर जीवात्मा की है। स्पष्ट है कि केवल जन्म और मृत्यु तक सीमित रखकर जीवन नहीं देखा जा सकता।

पिता न होना अर्थात किसीके जन्म का कारक न बनना और माता न होना अर्थात किसीको जन्म देने का कारण न होना। जन्म से मृत्यु तक जीवात्मा द्वारा देह धारण  करने का कारण और कारक परमात्मा ही हैं। प्राप्त देह, यात्रा की निमित्त मात्र है।

न मार्ग का दर्शन, न मार्ग का अनुसरण.., न गुरु होना, न शिष्य होना। बंधु, मित्र न होना, रक्त का या परिचय का सम्बंध न होना। जगत के सम्बंधों तक सीमित नहीं है अस्तित्व। माता, पिता, गुरु, शिष्य, बंधु, मित्र इहलोक के नश्वर सम्बंध हैं जबकि जीवात्मा ईश्वर का आंशिक अवतरण है।

जातिभेद का उल्लेख करते हुए आदिगुरु स्पष्ट करते हैं कि मैं न कुलविशेष तक सीमित हूँ, न ही वंशविशेष हूँ।  ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ …जाति का एक अर्थ उत्पत्ति भी है। जीवात्मा उत्पत्ति और विनाश से परे है।

जीवात्मा अपरिमेय संभावना है जिसे देह और मर्त्यलोक की आशंका तक सीमित कर हम अपने अस्तित्व को भूल रहे हैं। अपनी एक रचना स्मरण आ रही है,

संभावना क्षीण थी, आशंका घोर,

बायीं ओर से उठाकर

आशंका के सारे शून्य,

धर दिये संभावना के दाहिनी ओर..,

गणना की संभावना खो गई,

संभावना अपरिमेय हो गई..!

मनुष्य अपने अस्तित्व की अपरिमेय संभावनाओं को पढ़ने लगे तो कह उठेगा,..’मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ,…शिवोऽहम्।’

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६३ – आलेख – वाकई लेखक होना गौरव की बात है ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६३ ☆

☆ आलेख ☆ ~ वाकई लेखक होना गौरव की बात है ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज बड़ी तेज बरसात हो रही थी। ऑफिस पहुंचने में विलंब तो हो ही रहा था, लेकिन  किया ही क्या जा सकता था। बेटे ने कार स्टार्ट  की और यह कहते हुए  कि –  “पापा, बरसात तेज हो रही है मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आता हूँ। आप कार चला कर जा सकते हो लेकिन उम्र के लिहाज से और जब इतनी बरसात हो रही हो, सड़कें पानी से लबालब भरी हों, तो आपको कार से जाना उचित नहीं है।”

मेट्रो रेल ही सिर्फ ऐसा साधन है जिससे आप, भीषण बारिश, भारी जाम के बावजूद भी निश्चित समय में लखनऊ के एक छोर एयरपोर्ट से इंदिरानगर के मुंशी पुलिया तक आप जा सकते हैं।

“पापा, यदि बिलम्ब हो रहा तो आप मेट्रो से ही चले जाइये, समय से पहुंचने की गारंटी मेट्रो के सिवाय कोई दूसरा नहीं देगा। आप बिना किसी तनाव के अपने ऑफिस समय से पहुंच सकेंगे।”

मुझे उसका सुझाव बिल्कुल अच्छा लगा। अपने आगामी उपन्यास के कुछ पंक्तियों को मन में संजोये मै कार में बैठा और टीपी नगर मेट्रो स्टेशन पहुँच गया।  लेखक अपने मन के अंदर आए भाव को एक झटके में कलम से कागज़ पर उतार देना चाहता है, ऐसा एक लेखक की फितरत होती है। मन में आयी पंक्तियां कहीं विस्मृति न हो जाए, मैं मेट्रो में बैठने के साथ ही फोन के स्क्रीन की ओर मुँह करके बकबकाना शुरू कर दिया। मैं धारा प्रवाह बोल रहा था, मोबाइल के नोटपैड पर मेरे अगले भोजपुरी उपन्यास का कथानक बड़ी ही मस्ती के साथ अपना स्थान बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे। मैं अपनी धुन में इतना मगन था कि मैं बायें -दाएँ कुछ भी नही देख रहा था कि लोग क्या सोचते होंगे या मेरा उपहास कर रहे होंगे।

इस आलेख के बीच में लेखन और उसके लेखन के विषय में एक बात कहता चलूँ, नहीं तो यह बात भूल जाएगी – 

“कभी-कभी तो लेखकों को यह कहते सुनता हूँ। भाई मैं नही लिखता हूँ, वह जो ऊपर वाला है वह लिखवाता है। यह ऊपर से ही उतरता है। मुझे इस विषय में बहुत ज्यादा नहीं कहना क्योंकि  सच में होता तो वही है जो ऊपर वाला चाहता है। लेकिन यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति सी लगती है।  दरअसल जब लेखक की दृष्टि किसी एक चीज पर म एकाग्र भाव के साथ पड़ती है, और उस विषय में दिल और दिमाग़ दोनों  एक साथ समन्वय स्थापित करते हैं, तब मन  के भीतर उस विषय पर एक कहानी, कविता और उपन्यास रचने के लिए भाव प्रकट हो उठते हैं। शब्दों की तेज बौछार शुरू हो जाती है जो वाणी और कलम के माध्यम से, वर्षो पहले सिर्फ कागज़ पर और अब कागज  या कंप्यूटर मोबाइल के स्क्रीन पर छपने लगते है। यानि ये शब्द भाव ऊपर से न  उतरकर, मन के अंदर से निकलतें है। लेखक समय, परिस्थिति अपने इर्द-गिर्द के वातावरण- जैसे दिल तक पहुंची गहरी चोट, खुशी से उछल कर बाहर निकल आने वाले दिल, क्या दिन थे वे, होगा क्या आगे, कहीं गम -कहीं खुशी, ब्रह्मांड में चमकते तारे, पहाड़ों से निकलती नदियां, झुरमुट में छुप कर बैठे हुए जीव, गांव की मिट्टी की भीनी भीनी सुगंध, शहर की चमक दमक,  ब्रह्म एक है, चौरासी कोटि देव हैं, हमहुँ लिखिबे, हमहुँ लिखव, हमउ लिखेंगे, हमाऊँ भी लिखियै, आम्ही सुद्धा लिहू”, अमारो लिखबो, हर चीज से कथानक ढूढ़ निकालता है। फिर तैयार होती है,  एक लघु कथा, एक नाटक, एक उपन्यास, एक संस्मरण, एक यात्रा वृतांत, एक पत्र, कुछ व्यंग, कुछ हास्य एक गद्य एक पद्य की क्षणिका, कुछ छंद, कुछ दोहे, कुछ सवैईया, कुछ मुक्तक, कुछ गजल कुछ सजल, कुछ छंद मुक्त कुछ छंद बद्ध, कुछ अगेय, कुछ गेय, कविताएं।”

बात कहां से शुरू हुई कहां चली गयी, मैं तो इस धारा प्रवाह लेखन में भूल ही गया। आइये पुनः वही से शुरु करें, जहाँ छोड़ा था – अब आगे क्या घटित हुआ।

दरअसल मेरे मोबाइल में देसी हिंदी गूगल टाइपिंग का एक ऐप है, जो मेरी आवाज को पहचान कर हिंदी टाइप करता है। उसके साथ मेरी दोस्ती का आलम यह है, मुझे टाइपिंग में लिखने में त्रुटि हो जाएगी लेकिन मेरे बोलने और उसके लिखने में बिल्कुल ही त्रुटि नहीं होती है। लेखन का नशा ऐसा कि शर्म भी बेशर्म हो जाती है।

अब भीड़ भरी मेट्रो में कौन इस संवाद को सुन रहा था, यह कौन नहीं सुन रहा था, इससे मुझको कुछ भी लेना देना नहीं था। हालांकि मैं इतना भी तेज नहीं बोल रहा था कि किसी को दिक्कत हो,  मुझे तो लगता है कि शायद मेरे बगल के व्यक्ति को छोड़कर कोई सुन ही नहीं पा रहा था। बस सुन रहा था मेरे होठों से सटा हुआ मेरा प्यारा मोबाइल। अपना तो हर हाल में दिल में आए भाव को मोबाइल पर उतारने का नशा रहता है। मैं वही काम कर रहा था। अचानक एक बुजुर्ग से दिखने वाले लेकिन दिव्य व्यक्तित्व और आभामंडल वाले शालीन, शिष्ट- भद्र  व्यक्ति मेट्रो में हमारे सीट के सामने आए हैं। स्थानाभाव के कारण वे आगे बढ़ जाना चाहते थे। मेट्रो में आस-पास कोई जगह नहीं थी। अचानक मुझे और मेरे बगल में बैठी हुई एक बिटिया दोनों के मन में एक साथ यह भाव आया कि अभी तो इतनी जगह रिक्त ही है कि यदि हम लोग थोड़ा-थोड़ा खिसक जाए तो एक व्यक्ति के बैठने के लिए पर्याप्त जगह हो जाएगी। सच में हम दोनों ने ऐसा ही किया।

वे भद्र व्यक्ति जो मुझसे करीब 4-5 साल उम्र में बड़े ही थे, आगे निकलने ही वाले थे कि हमने टोका –

“भाई साहब!  ठहरिये, आइये आप भी बैठ लीजिए।” इतना कुछ सोचने और अपनी बात को कहने के बीच ट्रेन खुली। इसी बीच भाई साहब का संतुलन बिगड़ा लेकिन मैंने उन्हें अपने हाथों से पकड़ा और वे हमारे बगल में बैठ गए। यह बताना उचित होगा कि यह सब काम मैंने अपने लेखन को विराम देकर किया था।

खैर फिर मैं भूल गया कि मुझे कौन देख रहा है मैं धीरे-धीरे बोलकर लिखना शुरू किया। मुझे शायद मेरे पड़ोसी से अधिक कोई नहीं सुन समझ रहा था कि मैं उपन्यास लिख रहा हूँ या किसी से बात कर रहा हूँ।

मैंने लिखना बंद किया तब तक बगल वाले उसे भद्र व्यक्ति ने मुझसे कहा-

“सर ! आप राइटर है क्या?” उन्होंने मुझसे यह कह कर कहा मेरा सिर गर्व से ऊपर उठा दिया। वाह, मुझे राइटर बोल रहे हैं। आप बताएंगे कि आप कैसे इसे लिखते हैं?  कौन सा ऐप यूज करते हैं?

मैंने उन्हें विधिवत सब कुछ समझा दिया, इतना ही नहीं उनके मोबाइल में इस ऐप को डाउनलोड और एक्टिव भी कर दिया।

जीवन के चौथे पड़ाव पर लेखन शक्ति, स्मरण शक्ति, चलने फिरने में सब कुछ में दिक्कत आती है। ऐसे में यह ऐप काफी कारगर है। ईश्वर से कामना करता हूं कि सब शक्ति कमजोर हो जाए लेखन शक्ति और स्मरण शक्ति बनी रहे।

हम दोनों के बीच आपसी परिचय हुआ, बातचीत हुई, मुझे पता चला कि मेरे बगल में बैठे हुए अग्रज पुलिस डिपार्टमेंट के बड़े सीनियर अफसर रह चुके थे और अभी हाल में दो-तीन साल पूर्व सेवानिवृत हुए थे। लेखक के रूप में उनके मन में मेरे प्रति  बहुत सारा सम्मान का भरा प्रतीत हो रहा था। बात की बात में उन्होंने कहा कि मेरे एक सीनियर डीआईजी साहब थे, उन्होंने भी कई किताबें लिखी है। मैं भी मन ही मन कहा, चलो मैंने भी लगभग एक दर्जन पूरे कर लिए।

खैर तब तक अगला मेट्रो स्टेशन हजरतगंज आ गया हम दोनों ने एक दूसरे का   हाथ जोड़कर  अभिवादन किया और वे हजरतगंज मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुझे भी अगले मेट्रो स्टेशन केडी सिंह बाबू स्टेडियम  पर उतरना था। लेकिन मेरे बगल में बैठे दूसरे सज्जन की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी उन्होंने बड़े ही आदर से कहा, भाई साहब आप लेखक है ?

 मैं भी शरमाते और सकुचाते हुए कहा –

“जी.. हाँ थोड़ा बहुत जरूर लिख लेता हुँ। नहीं भाई साहब आप जिस तरह से बोलकर लिख रहे थे वाकई कहानी मेरे दिल तक पहुँच रही थी।” मैं तो बिल्कुल भाव विभोर हो गया था। आप अच्छा लिखते हैं। मुझे अपने उपन्यास लेखन के बीच ही श्रोता और पाठक दोनों मिल चुका था। मै बहुत ख़ुश था।

भाई साहब आप रहते कहाँ हैं?.. मैने उन्हें बताया, तो वे भी बोल पड़े,

“जी, मैं भी इधर रायबरेली रोड पर ही रहता हूँ।” वे सज्जन किसी  गवर्नमेंट जॉब में तो नहीं थे, लेकिन किसी कारपोरेट सेक्टर के  पदाधिकारी थे,  जैसा उन्होंने मुझे अपना परिचय दिया।

अब मेरा मेट्रो स्टेशन आ चुका था। मैंने अपना पिट्ठू बैग अपने पीठ पर लादा और  मन में यह सोचता हुआ बाहर निकला कि वाकई लेखक होना गौरव की बात है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 101 – The Illusion of True Sustainability… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Illusion of True Sustainability 

☆ Witful Warmth# 101  ☆

☆ Satire ☆ The Illusion of True Sustainability… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

We are living in the golden age of performative environmentalism, where buying things is marketed as the solution to overconsumption. Companies sell us canvas tote bags to replace plastic ones, resulting in people owning eighty different tote bags that require more water to produce than a small lake. Fast fashion brands launch “eco-conscious” lines made from recycled plastic bottles, which look terrible and fall apart after two washes. We drive massive electric SUVs that weigh three tons, feeling like eco-warriors while ignoring where the electricity actually comes from. True sustainability would mean buying less stuff, but that doesn’t look good on an Instagram feed, so we continue to purchase green-dyed products to save the planet one transaction at a time.

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© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

गरारू घाट से समनापुर 12 नवम्बर 2019

आज कार्तिक मास  की चौदहवीं के चाँद की रात है, आज तक चौदहवीं के चाँद के रूप में रूपहले परदे पर वहिदा रहमान का चेहरा शकील बदायुनी के गीत

और रवि के संगीत की धुन पर मुहम्मद रफ़ी  के दिलकश गायन के साथ गुरुदत्त की अदायगी को जानते थे। सोचा आज नर्मदा के लावण्यमय सलिल प्रवाहित धुन पर चाँदनी को लहरों पर लास्य करते देखेंगे। रात दो बजे कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में सुवासित वसुन्धरा का अवलोकन किया तो मैथिलीशरण गुप्त लिखित पंचवटी काव्य सहज ही फूट पड़ा।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती धरती, हरित तृणों की नोकों से,

मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

सोचा यहाँ टेंट में लेटे हुए इतना सुंदर दृश्य है तो नर्मदा के कल-कल जल में चाँदनी का नृत्य लास्य कैसा होगा, हमसे रहा नहीं गया। नर्मदा किनारे पहुँचे तो अलौकिक सौदर्य से स्तब्ध रह गए, ऐसा लगा जीवन को सम्पूर्णता प्राप्त हुई, यदि अभी यमराज आकर चलने को कहें तो चाँदनी के डोले में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी यमलोक चल देंगे। फिर तंद्रा टूटी तो क्या देखा…!

क्या ही स्वच्छ चाँदनी यह, क्या ही निस्तब्ध निशा;

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?

बंद नहीं अब भी चलते हैं, नियति के कार्य-कलाप,

कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप।।

क़रीब एक घंटा शांत और चुपचाप चार चीजें हमसे बतियाती रहीं, नर्मदा, चाँदनी, कलकल ध्वनि और शीतल पवन, ब्रह्म मुहूर्त होने को था,  एक झपकी लेने इन शब्दों को गुनगुनाते वापस लौट पड़े…!

है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।

और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,

शून्य श्याम-तनु जिससे नया रूप झलकाता है।

सौंदर्य रसपान के बाद की निद्रा चार बजे नर्मदा उसपार से आती मुर्ग़े की बाँग से टूटी और हम पंचवटी के किरदारों की तर्ज़ पर लोटा भरकर प्रकृतिजन्य निस्तार को निकल गए।

गरारू घाट पर नर्मदा के अद्भुत सौंदर्य के दर्शन होते हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय गरूड़ देव ने तपस्या की थी, दो आमने-सामने पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर हैं जिन्हें गौड़ राजा बलवंत सिंह ने सत्रहवीं सदी में इंडो-पर्शियन शैली में बनवाया था। गुंबद व आर्च पर्शियन शैली और तोरण व गर्भगृह भारतीय शैली में बने हैं। असल में जिसे पर्शियन कला कहा जाता है वह पूरी तरह पर्शियन नहीं है, सिकंदर द्वारा पर्शिया याने ईरान को जीतने के बाद ग्रीक मूर्तिकला और भवन निर्माण ईरानी तरीक़ों में घुल मिल गए हैं। गुंबद और आर्च में वही मिलाजुला रूप दिखता है।

सोलहवीं सदी में मुग़ल सेनापति आसफ़ख़ान द्वारा रानी दुर्गावती के पराभव के बाद अकबर ने गोंडवाना को अधीनस्थ करके कराधीन राज्य के रूप में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया जिसकी राजधानी मदनमहल रही आई लेकिन राज्य व्यवस्था गोंडवाना राजाओं के हाथ में रही। मुग़लों को सालाना एकमुश्त रक़म बतौर नज़राना मिल जाती थी। गोंडवाना राजा छोटी रियासतों और जागीरों के माध्यम से राज्य का प्रबंधन और लगान वसूली करता था। फ़तहपुर, मकड़ाई, शोभापुर, देवगढ़, छिन्दवाड़ा और छत्तीसगढ़ी  रियासतें तथा जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों में हर्रई जागीर जैसी सैकड़ों जागीरें थीं। राजा बलवंत सिंह मुग़ल दरबार में जाते रहते थे। वे शाहजहाँ के समकालीन थे जो कि मुग़ल स्थापत्य कला का स्वर्णकाल माना जाता है। राजा बलवंत सिंह ने मुग़ल स्थापत्य कला से प्रभावित होकर इन मंदिरों का निर्माण और मरम्मत कार्य करवाया था। इन मंदिरों का रख रखाव अच्छा नहीं है। पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर से नर्मदा का पूर्व की तरफ़ दस किलोमीटर से पश्चिम में दस किलोमीटर तक प्रवाह का विहंगम दृश्य दिखता है। संभवतः नर्मदा के पूरे प्रवाह में ऐसा नज़ारा सिर्फ़ वहीं से नज़र आता होगा। उत्तरी तट पर बिखरी हरियाली और पेड़ों के प्रतिबिम्ब नर्मदा में झिलमिल करते लुभावने लग रहे थे। पहाड़ियों के दक्षिण में दलहन के पीले खेतों के साथ गन्ने के खेतों के हरियाली बिखेरते नज़ारे थे।

जब हम गरारू घाट से सात बजे चले तब केरपानी घाट पर बना नर्मदा पुल और उसके बारह पाए स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन वह पाँच किलोमीटर दूर था। नर्मदा किनारे बखेरे खेतों से पगडंडी पकड़ी कहीं-कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई से मिट्टी गीली होने से रेतीले रास्ते पर चलना पड़ा। तीन नालों की गहराई बड़ी मुश्किल से पार कर पाए। बारह बजे के आसपास केरपानी पुल के नीचे डेरा जमाया वहाँ से दो किसान विधिविधान से अखंड परिक्रमा उठा रहे थे। उन्होंने भंडारा का आयोजन किया था, उसी में भरपेट प्रसादी ग्रहण की। उन दोनों ने कर्मकांड पूरा करके भोजन किया फिर विदाई देने आए साथियों के साथ गाँजे की संगत जमाई।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१ – सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१  ?

? सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

आग लिए तुम बदन में अपने,मुझे जलाने आ जाओ

अपनी रेशम सी ज़ुल्फ़ों में,मुझे सुलाने आ जाओ

=2=

हरियाली चहुँ ओर  छा गई,आया देखो सावन

अधरों से रस छलक न जाए, मुझे पिलाने आ जाओ

=3=

लता वृक्ष उपवन मदमाए, झूम उठी अमराई

अपनी बाहों के झूले में, मुझे झुलाने आ जाओ

=4=

पक्षी लगे मारने ताने,दर्द पपीहा बढ़ा रहा

अपनी कोकिल बोली से,मुझे बुलाने आ जाओ

=5=

आ भी जाओ सजनी अब,ये विरह सताये

चंद ख़ुशी की चाह में ‘राजेश’, ग़म को भुलाने आ जाओ ll

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५।)

☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆

? कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

26 जनवरी 2001 जब सम्पूर्ण भारत अपना राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस मना रहा था तभी सुबह के 8.46 मिनट पर कच्छ की भूमी में कंपन हुआl कंपन भी सामान्य नहीं अपितु अति भयंकरl जिसे देश ने सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा का नाम दे दियाl देखते ही देखते यहाँ के घर मलबों में परिवर्तित हो गयेl मलबों में लाखों लोग दब गयेl जहाँ कुछ बच्चों ने अपने माता -पिता को खो दिया वहीं कुछ पालकों ने अपनी आखों के सामने अपने लाड़लो को काल के मुँह में समाते देखाl देखते ही देखते लोग बेघर हो गयेl इतनी संख्या में मृत जन थे कि जलाने के लिये लकड़ियाँ भी कम पड़ गई थींl

जैसे ही ये समाचार सामने आया तब भारत की सरकारी, प्राइवेट, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जैसे संगठन एकजुट होकर मदद करने हेतु सामने आये l इन सभी ने निशुल्क स्वास्थ्य शिविर, भोजन, कपड़े और रहने हेतु टेंट देने शुरु कियेl

आश्चर्य ये था कि यहां के भुंगे मकानों को कुछ भी नहीं हुआl क्यूंकि ये भुंगे गोलाकार होते हैं जिससे भूकंप का इसके किसी एक कोने की दीवार पर दबाव नहीं पड़ताl हवा का दबाव इन्हें क्षति नहीं पहुँचाताl इनमे लगी ईटे मिट्टी, गोबर और घास फूस से बनी होती हैं l छत शंकु आकार की लकड़ी के खम्भों से बनी होती है तो हल्की हो जाती है जिससे भीतों पर वजन नहीं पड़ताl

इस भूकंप ने कच्छ को झिंझोड़कर कर रख दियाl पर ये अद्भुत शक्ति के लोग कहाँ हार मानने वाले थेl इन सभी ने पुनः मिलकर कच्छ के नवीनीकरण की शपथ ग्रहण लीl आज खावड़ा में सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा हाइब्रिड रीयूजेबल एनर्जी पार्क बनाया जा रहा हैl

इसी समय भारत सरकार ने तुरंत ही मुंद्रा पोर्ट को भारतीय रेल से जोड़ना शुरु कर दिया l सरकार ने यहां उद्योगों में करों में भारी छूट दे दीl इस पोर्ट को कार्गो हेतु पुरी तरह ऑटोमेटीक किया जिससे कम समय में ज्यादा सामान उतरने और चढ़ने लगा l देश की बड़ी कंपनियों ने यहां थर्मल पॉवर प्लांट लगाये जिससे विद्युत उत्पत्ति बढ़ गईl देखते ही देखते यह पोर्ट देश के कंटेंनर का करीब करीब 60% व्यापार देखने लगाl पोर्ट के विकास होने से लेबर से लेकर इंजीनियर को हर तरह का रोजगार मिलाl

वहीं कंडला पोर्ट जिसे हम दीनदयाल नाम से भी जानते है, ये पोर्ट हमारे देश के साथ एशिया का सबसे बड़ा सरकारी पोर्ट बन गयाl यह पोर्ट भी देश के सभी राज्यों से जुडा हुआ हैl ये पोर्ट मुख्य रूप से देश की बड़ी रिफाइनरी को कच्चा तेल सप्लाई करता हैl यह लिक्विड कार्गो पोर्ट की तरह काम करता हैl

आज ये दोनों पोर्ट फोर ट्रैक सड़क से जुड़ गये हैं l

दुनिया का कोई एसा देश नहीं जहाँ कच्छीयों ने अपना अधिपत्य न जमाया हो l ये कच्छी अति परिश्रमी, कभी ना हार मानने वाले, किसी भी परिस्थिति में कामयाबी पाने वाले होते हैंl

 हैं ना अद्भुत भूमि अद्भुत लोग?

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆ मुक्तक – ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆

☆ मुक्तक ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

जीवन में इतना भी नहीं   होना   सामान चाहिए।

क्यों भर रहे इतना कि कुछ लेना आराम चाहिए।।

जीवन के अंत समय बस दुआएं ही हैं साथ जाती।

जीवन में कुछ  अच्छा कमाया हुआ नाम चाहिए।।

=2=

क्रोध में वह सब मत गवाओं कि जो पास आया है।

शांत रह कर के जिन रिश्तों को    आपने कमाया है।।

संघर्ष को  बनाएं अपना दोस्त येआगे ले जाएगा।

बुद्धिविवेक धैर्य परिश्रम सेआदमी ने सब पाया है।।

=3=

संसार में जो भी समस्या उसका बना निदान भी है।

मत गवाओं अपना जीवन जो अनमोल महान भी है।।

एक दिन हम सब   कहानी  बन कर ही रह जाएंगे।

लोग कहें बाद में कि यह  एक अच्छा इंसान भी है।।

=4=

जिसने मुश्किलों का    सामना किया वो आगे बढ़ा है।

जिसने भाग्य को ही   कोसा वह आज वहीं खड़ा है।।

यह जीवन प्रभु  वरदान जैसा कि एक बार है मिलता।

वही बनता विजेता जाकर कि जो हालातों से लड़ा है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १४ – सैनिक भारत माता के!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता सैनिक भारत माता के!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १४ ☆

☆ सैनिक भारत माता के!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

मार भगाते सीमा से ही,

आता जो भी दुश्मन पास ।   

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

रक्षा करते हैं सरहद की,

छोड़ चले अपना घर बार ।

मारे देखो अरि को ऐसे,‌

शोणित बहता सीमा पार ‌‌।।

केवल हित भारत का चाहे,

नहीं हृदय में दूजी आस ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

राह निहारे बूढ़ी मैया,

खड़े हुए हैं बाबा द्वार ।

घर कब आओगे प्रियतम जी,

सजनी पूछे है हर बार ।।

कर्तव्यों को पूरा करके,

 आऊंगा रखना विश्वास ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

तन मन सब न्योछावर करके,

मातृभूमि की रखते आन ।

बनता है कर्तव्य हमारा,

शीश झुका कर दे सम्मान ।।

बांँध कफन वह सर पर रखते,

नहीं कराते हैं आभास ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६५ ⇒ रिश्ता और संपर्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ता और संपर्क।)

?अभी अभी # १०६५ ⇒ आलेख – रिश्ता और संपर्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 Relation & contact°

रिश्ता केवल खून का ही नहीं होता। हम यहां इंसानियत के रिश्ते की बात भी नहीं कर रहे। बिना जान पहचान के कोई रिश्ता नहीं पनपता। मेल जोल और मेल मिलाप किसी भी रिश्ते की बुनियाद है। रिश्ते हवा में नहीं बनाए जाते। वर वधू की तलाश में अखबारों में मेट्रिमोनियल और क्लासीफाइड विज्ञापन तो दिए जा सकते हैं, लेकिन बात तो पत्र व्यवहार और मिलने जुलने के बाद ही आगे बढ़ती है।

पहले चिट्ठी पत्री उन जान पहचान के लोगों में होती थी, जिनके बीच में किसी कारण भौगोलिक दूरियां होती थी। अनजान लोगों से कौन पत्र व्यवहार करता था। जब किसी अजनबी से पहली बार मुलाकात होती थी, तो सबसे पहले परिचय प्राप्त किया जाता था। आपका शुभ नाम ? अच्छा, आप हमारे पड़ोसी हैं। पहले परिचय, पश्चात् मेलजोल।।

जैसे जैसे इंसान के बीच भौगोलिक दूरियां बढ़ने लगी, संचार के साधन भी विकसित होते चले गए, जिन परिचित चेहरों की जानकारी डायरी में नोट की जाती थी, उनको मोबाइल में स्थान मिलने लगा और बाद में संचार क्रांति के बाद तो सारा संपर्क ही फोन के माध्यम से होने लगा। जहां डायरी में जान पहचान के २५-५० नाम होते थे, वहां फोन के कॉन्टैक्ट की संख्या सैकड़ा पर कर हजार की संख्या में पहुंचने लगी। आज अगर आपके व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर के संपर्क जोड़ लिए जाएं, तो

आप ही दांतों तले उंगली दबाने लगें।

क्या आज सोशल मीडिया पर हमारे जितने कॉन्टैक्ट हैं, उतने हमारे रिश्ते हैं ?आप नहीं समझते, आपका जवाब होगा। कब किससे क्या काम पड़ जाए आज के इस मशीनी युग में। वह जमाना गया जब बात बात पर साइकिल उठाकर बाजार जाना पड़ता था। आज फोन से कितनी सुविधा है, आप नहीं जानते। धीरे धीरे सभी काम ऑनलाइन होने लग गए हैं। अमेजिंग अमेजान है न।

न जान न पहचान, फिर भी अलादीन के चिराग की तरह मुंहमांगी चीज हाजिर और वह भी 24×7।।

क्या हमारे रिश्ते यंत्रवत और आभासी नहीं होते जा रहे। अपने काम से काम, और दूर की राम राम ! यह कैसी विडंबना है, जितनी जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उतनी ही इंसान की आपस में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। जो रिश्ते कभी जीवंत थे, वे आजकल औपचारिक होते जा रहे हैं। आज हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है और उसके मोबाइल में मोबाइल गेम्स हैं। बस यही उसकी दुनिया है। समझ में नहीं आता, मोबाइल ने हमें जोड़ा है, या हम सिर्फ मोबाइल से ही जुड़े हैं।

कभी ये आंसू मेरे दिल की जुबान होते थे, आजकल फेसबुक ही मेरी जुबान है।

फेसबुक पर बैठकर मोबाइल के बारे में ऐसी बातें करना बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे पानी में रहने वाली कोई मछली किसी को पानी से दूर रहने की हिदायत दे। मोबाइल की उपयोगिता हमने कोविड काल में देख ली। जब पूरे संसार हमारे लिए अछूता था, तब एक यह मोबाइल ही तो था, जिसने न सिर्फ गले से लगाया था, हर पल, हर क्षण हमारी मदद की थी। हमारे अकेलेपन का यह सहारा भी बना और एक उपयोगी संगी साथी भी। थैंक्स टू डिजिटल इंडिया।।

आप मानें या ना मानें, आज यह फोन हमारे शरीर का ही हिस्सा हो गया है। अब हमें शरीर के साथ इसकी भी देखभाल करनी है। जिस तरह अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें कई सावधानियां रखनी पड़ती हैं, फेसबुक और सोशल मीडिया की बुराइयों के प्रति हमें जागरूक, सावधान, और सतर्क रहना है। अगर आपने और विशेषकर आज की पीढ़ी ने मात्र इसे मनोरंजन का साधन समझ लिया तो मान लीजिए, आपने अपने लिए और युवा पीढ़ी के लिए नर्क का द्वार खोल लिया है।

पोर्न साइट्स और वैसी ही फिल्में आजकल आपके एंड्राइड फोन का हिस्सा हो गई हैं। बच्चों के वीडियो गेम्स दुस्साहसी ही नहीं, खतरनाक भी हैं। कई लोग तो महज सेल्फी के चक्कर में अपनी जान गंवा चुके हैं। अगर कोई बिल्डर अथवा प्रॉपर्टी ब्रोकर है तो उसका फोन टू व्हीलर हो अथवा फोर व्हीलर, कभी बंद नहीं हो सकता। जब कि ड्राइविंग के साथ मोबाइल का उपयोग अपराध ही नहीं, खतरनाक भी है।।

हम तो रसोई में चाकू का इस्तेमाल भी सावधानी से करते हैं, फिर मोबाइल के साथ लापरवाही क्यूं ? क्या हमारा सामाजिक जीवन मोबाइल द्वारा छीना नहीं जा रहा है। पहले रिश्तों में दरार आई और अब मोबाइल की बारी आई।

कितना अच्छा हो, जिस तरह कभी कभी जबान को लगाम देना सुखद लगता है, दोस्तों के बीच, परिवार के सदस्यों के बीच और इष्ट मित्रों के बीच, इस मोबाइल का मुंह भी बंद कर दिया जाए, ताकि हमारे रिश्ते जीवंत हों, खुली सांस ले सकें। फेसबुक पर स्वस्थ संवाद हो। साहित्य और अध्यात्म की चर्चा हो। आपसी समझ हो। रिश्तों की अहमियत हो, स्वार्थ और खुदगर्जी की नहीं। चाकू से सब्जी ही काटें, अपना हाथ नहीं।

खयाल रहे, बंदर के हाथ में कभी तलवार नहीं दी जाती।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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