(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४७ ☆
आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते…।)
☆ हेमंत साहित्य # ५२ ☆
पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण – “साइकिल वाले सर… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६१ ☆
संस्मरण – साइकिल वाले सर… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
बात 1994-95 की है। लवलेश सोलापुर में तैनात थे, दो चार महीने ही हुए थे। हिंदी कार्यशाला का आयोजन था। पैंसठ सत्तर वर्ष के एक वृद्ध करीब साढ़े छह फुट लंबे चोडा सीना, रंग गोरा ऑफिस में प्रविष्ट हुए। हिंदी कार्यशाला में व्याख्यान देने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था। वे डी.ए.वी. कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल थे और एन.सी.सी. के कमांडेंट। हालांकि अंग्रेजी के विद्वान थे पर हिंदी ऐसी बोलते थे कि सुनने वाले के दिल में उतर जाए। पंजाबी थे और उनके संभाषण में पंजाबी टोन और अधिक रस घोल देती।
उन्हें देखते ही मिलने की एक सहज उत्कंठा जागृत हो जाती। व्याख्यान समाप्त होने के बाद लवलेश उनके सामने हाजिर हुआ और जैसे दृष्टि मिली तो वह एक विद्यार्थी की तरह उनके चरणों में झुक गया। उन्होंने उसे बाँह पकड़ कर उठाया और खाली पड़ी कुर्सी पर बिठाया तथा स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए। लवलेश का परिचय पूछा, कहाँ के निवासी हो, रुचियाँ क्या क्या हैं, सोलापुर में कहाँ रहते हो। वे पूछते गए और वहउत्तर देता गया।
वे भसीन सर के नाम से विख्यात थे। पूरा नाम पुराने लोग ही जानते होंगे। साइकिल पर हमेशा चलते और साइकिल पर एक झोला टंगा रहता। साइकिल वाले सर। रविवार का दिन था। लवलेश परिवार के साथ नाश्ता करने वाला था । घर के नाम पर एक ही कमरा था और उससे अटैच टॉयलेट बाथरूम। बेटे ने बताया कोई वृद्ध अंकल हैं साइकिल लिए हुए। लवलेश बाहर निकला और उन्हें प्रणाम करके अंदर ले आया। चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। उनके सामने नाश्ते की प्लेट रखी, उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। बातचीत में बताया कि उनकी दो बेटियाँ हैं। एक बेटी मुंबई में डॉक्टर है दामाद भी डॉक्टर हैं। छोटी बेटी डॉक्टरी पढ़ रही थी कि अचानक बीमार पड़ी तो आज तक पड़ी है। उसके इलाज पर सब कुछ चला गया। पैंशन से जैसे तैसे खर्च चल जाता है। ट्यूशन भी कर लेता हूँ। फिर मुस्कुरा कर तनाव झटक दिया और बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। चलते चलते बोले कि मैं यहाँ से गुजर रहा था तो सहज ही साइकिल आपकी ओर मुड़ गई। वैसे मैं किसी के घर बहुत कम जाता हूँ।
कई बार बाजार में मिले तो उसी साइकिल पर। बाजार में भी लोग उनकी बहुत इज्जत करते। वे सबसे उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई की बात करते और कोई कठिनाई होती तो उसे दूर करने के लिए साइकिल पर ही उस बच्चे के स्कूल या कॉलेज में पहुंच जाते। प्राचार्य से बात करके समस्या सुलझा देते। सभी प्राचार्य उनका बहुत सम्मान करते क्योंकि अधिकांश उनके विद्यार्थी रहे थे या एनसीसी कैडेट्स।
उनके बहुत सारे विद्यार्थी आईएएस करके उच्च पदों पर आसीन थे। लवलेश के एक मित्र ओबीसी कैडर के थे और उनके बेटे को इंजीनियरिंग में एडमिशन के लिए कास्ट वेलीडिटी सर्टिफिकेट चाहिए था। बहुत भागा दौड़ की पर सफलता नहीं मिली। वे दोनों घर पर हताश बैठे थे कि भसीन सर आ गए। हमारी चिंता सुनकर बोले कि मैं एक पत्र लिखता हूँ। आप उसे भेज दीजिए। उनकी हैंड राइटिंग इतनी सुंदर थी बिल्कुल मोती जैसी। टाइपिंग की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनकी हैंड राइटिंग उनकी पहचान थी। उनके पत्र का यह असर हुआ कि बच्चे का प्रोवीजनल एडमिशन हो गया और कॉलेज को अनुदेश प्राप्त हुए कि इस प्रमाण पत्र के लिए योग्य विद्यार्थियों का एडमिशन रोका न जाए और उनसे लिखित ले लिया जाए कि भविष्य में वे प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देंगे।
एक बार सुबह-सुबह आए। अब उनका लवलेश के घर पर आना आम बात हो गई थी। आकर कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे पर बहुत चिंता के भाव थे। लवलेश ने चाय का प्याला हाथ में दिया तो कांपते हाथों ले लिया, बोले कुछ नहीं। फिर लवलेश ने व्यग्रता से पूछा कि सर क्या बात है। उनकी आंखों में आँसू छलक आए। बोले, “घर की अंदरूनी बातें किसी से नहीं कहता, आपसे भी नहीं कहूंगा। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, न उधार मांगा। ट्यूशन करता रहा। पर आज ऐसी नौबत आ गई है कि उधार मांगना पड़ेगा। बिजली का बिल छह हजार का आ गया है। बिजली वाले कहते हैं कि पहले बिल भरिए, फिर देखेंगे। फिर लवलेश से सीधे बोले, “मुझे छह हजार उधार दे दीजिए, मैं वापस कर दूंगा। ” लवलेश ने कहा कि सर उधार तो नहीं दे पाऊंगा पर आपका बिल अवश्य भर दूंगा। उनके चेहरे पर संतोष के भाव देखकर लवलेश को बहुत खुशी हुई।
लवलेश को कुछ पुस्तकें व एक शब्दकोश चाहिए था। सोलापुर में कहीं मिल नहीं रहे थे। एक पुस्तक तो भसीन सर की ही लिखी हुई थी पर उनके पास उसकी प्रति नहीं थी। सारी पुस्तकें चाँद प्रकाशन की थी। मुंबई वीटी (अब सीएसएमटी) के सामने चाँद प्रकाशन का बोर्ड लगा देखता था। भसीन सर बोले, “जब भी मुंबई जाओ तो चाँद प्रकाशन में जाना और मेरा नाम लेकर बोलना कि ये पुस्तकें मैंने मंगाई हैं।” दो लाइन शायद लिख कर भी दी थीं। खैर लवलेश चाँद प्रकाशन में गया और उनका लिखा कागज देते हुए पुस्तकें बता दीं। वह व्यक्ति अंदर केबिन में गया और लौटकर आया तो लवलेश के हाथ में पुस्तकें थमा दीं। पैसे पूछने पर मना कर दिया कि आप ले जाकर उन्हें दे दीजिए। लवलेश आश्चर्य में था कि इतने बड़े प्रकाशक ने बिना मूल्य लिए कैसे दे दीं। बाद में पता चला कि चाँद वाले और भसीन सर पंजाब के प्रसिद्ध आनंद परिवार से ताल्लुक रखते थे। पर किसी को बताते नहीं थे।
ऐसे थे भसीन सर। लवलेश के मन मस्तिष्क पर आज भी छाए हुए हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – प्रीति की डोर।)
कामवाली बाई एकदम से बोली-“दीदी यह कितनी सुंदर साड़ी है आज आप अपनी अलमारी की सफाई कर रही हो क्या?”
“दीदी यह साड़ी आपने कहां से खरीदी कितने की है मेरे लिए भी एक ऐसी ला देना अपनी तनख्वाह में से थोड़े-थोड़े पैसे में आपको दे दूंगी” कामवाली कमलाबाई ने कहा।
नेहा बोली -“अच्छा काम तो करो जल्दी-जल्दी आज मुझे अपनी फ्रेंड के यहाँ जाना है।”
“दीदी मेरे भाई की बेटी की भी शादी है तो आप ऐसे दो साड़ी ला सकती है।”
“एक अपनी भतीजी को गिफ्ट करूंगी और एक मैं खुद पहनूंगी।”
नेहा ने कहा-“अच्छा ठीक है ला दूंगी अब जा बाहर घंटी बज रही है, देख दरवाजे पर कौन आया है?”
“दीदी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आई है” कमला ने कहा।
नेहा ने कहा-” ठीक है उन्हें बताओ मैं आ रही हूँ चाय भी बना देना।”
“शर्मा आंटी आज कैसे आना हुआ आपका आप तो हमें भूल ही गए?”
शर्मा आंटी ने कहा “नहीं बेटा आज सुबह मेरे पड़ोस में जो मिस्टर मैसेज चड्ढा जी रहते हैं अपनी कार से सुबह अपने बेटे बहू के पास जा रहे थे खबर आई उनका एक्सीडेंट हो गया है अभी कुछ देर बाद उनकी डेड बॉडी घर आएगी मैं उनके पास जा रही हूँ तुम भी वहां आ जाना बस यही बात बताने आई हूँ।“
सुनते ही नेहा चौक गई “आंटी रुकिए मैं आपके साथ आती हूँ।“
“पर शर्मा आंटी मैंने आज सुबह ही उन्हें देखा था वह सब्जी वाले के साथ झगड़ा कर रही थी फल खरीद रही थी ₹10 कम भी दिए उन्होंने।”
रोते हुए नेहा बोली “उनके पास इतनी प्रॉपर्टी थी खेती बाड़ी चार मकान किराए के तभी आंटी कंजूसी से हमेशा रहती थी। बेटे बहु किसी को अपने पास रहने नहीं देती थी हमेशा सबसे झगड़ा ही करती थी।”
श्रीमती शर्मा ने बोला “छोड़ बेटा नेहा जो हुआ सो हुआ जीते जी हम ऐसे ही करते हैं जैसे सारा कुछ जमीन जैसा हमें लेकर ऊपर ही जाना है”
“ठीक है आंटी 2 मिनट रुकिए मैं आती हूँ।”
अंदर से दो साड़ी निकाल के लाती है और कहती है “कमल में थोड़ी देर में आ रही हूं यह साड़ी तुम्हें पसंद थी तुम पहन लेना यह नई साड़ी ही मैंने खरीदी थी आज किट्टी में पहन के जाने वाली थी, यह अपने भतीजी को दे देना घर का ध्यान रखना खाना बना कर रखना मैं थोड़ी देर में आता हूँ”, वह रोने लगाती हैं।
कमला ने कहा “नेहा दीदी मत रो अब मैं कौन सा आपको छोड़कर कहीं जाऊंगी चिंता मत करो एक साड़ी से नहीं मानूंगी अभी और साड़ियाँ आपसे लेनी है।”
“सच कह रही हो कमल तुमसे मेरी प्रीत की डोर जो है अब यह टूटेगी नहीं।”
– व्यंग्य यात्रा का भव्य सम्मान समारोह दिल्ली में सम्पन्न – ☆ साभार – श्री संजय भारद्वाज –
“शब्दाभिव्यक्ति को समृद्ध बनाती है साहित्य केंद्रित कला ” – संदीप राशिनकर
पुणे। किसी भी साहित्यिक विधा में निहित अभिव्यक्ति के सामर्थ्य को उसके साथ प्रकाशित कला ना सिर्फ समृद्ध करती है वरन् शब्द निहित अर्थों को भिन्न दृष्टि और वृहद आकार देती है। यह विचार के चर्चित चित्रकार संदीप राशिनकर ने दिल्ली के हिन्दी भवन में आयोजित महत्वपूर्ण व्यंग्य यात्रा के भव्य सम्मान समारोह में हुए अपने सम्मान के अवसर पर अपने उद्बोधन में व्यक्त किए।
उन्हें यहां व्यंग्य यात्रा शब्दान्वेषी कला भूषण सम्मान से सारस्वत अतिथि लीलाधर मंडलोई, अशोक त्यागी और अध्यक्ष प्रेम जनमेजय द्वारा सम्मानित किया गया। सम्मान निधि, स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र स्वरूप के इस सम्मान के प्रत्युत्तर में आपने कहा कि शब्दों का अन्वेषण कर कलात्मक अर्थवत्ता के साथ साहित्य के प्रभाव को बहुगुणित करती साहित्य केंद्रित कलाओं का साहित्यिक पुरस्कारों में समावेश किया जाना, कला की साहित्यिक महत्ता को रेखांकित किया जाना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। उन्होंने प्रेम जनमेजय एवं सम्मान समिति का इस पहल के लिए आभार माना। इस अवसर पर सर्वश्री विष्णु नागर, विनोद कुमार विक्की, हरीश पाठक, डॉ . संजीव कुमार, बी. एल.आच्छा और स्नेहलता पाठक को रवीन्द्रनाथ त्यागी, धर्मवीर भारती स्मृति विविध व्यंग्य यात्रा सम्मानों से सम्मानित किया गया।
सर्वश्री विष्णु नागर, समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक बलराम, गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, एनबीटी के निदेशक लालित्य ललित, अशोक गुप्ता, व्यंग्य चित्रकार माधव जोशी, श्रीया गवली, पंकज सक्सेना जैसे अनेक लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में यह समारोह संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का सुचारू संचालन नीरज मिश्र और सम्मान समिति के संयोजक रणविजय राव ने किया। स्वागत सुश्री आशा कुंद्रा, सोनी लक्ष्मी राव ने किया और आभार माना अशोक त्यागी ने।
साभार – श्री संजय भारद्वाज, अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे
≈संस्थापक संपादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
“भगवंत हृदयस्थ आहे” ही ओळ आवडणे, त्याचेच सतत चिंतन करणे म्हणजे त्याचा मनापासून हृदयपूर्वक सातत्याने पाठलाग करणे म्हणजे अभ्यास व तो ही अगदी सहजपणे! नैसर्गिकपणे! एखादी गोष्ट मनापासून केली की त्याचा परिणाम मिळतोच!
“As we think we become” या त्रिकालाबाधित सत्याचा अनुभव घेणे म्हणजे “एक तरी ओवी अनुभवावी… ” श्रवण मनन चिंतनानेच सिंहावलोकन शक्य आहे व जीवनानुभवांचा एकेक बिंदू जोडणे तरच जीवनरूपी वर्तुळ पूर्ण करता येईल. पूर्णाचा अंश आपण असल्याने अपूर्णाकडून समाधान शक्य नसल्याने या सर्व बिंदूतूनच संपूर्णाची वाटचाल शक्य आहे.
‘सिंहावलोकन’ आणि ‘अनुभव हेच गुरु’ या न्यायाने व शास्त्र वाचन श्रावणाने सत्य अनुभवणे महत्त्वाचे मानले जाते.
अनुभव हाच श्रेष्ठ गुरु:
”नास्ति विद्या समं चक्षुः नास्ति सत्य समं तपः।
नास्ति राग समं दुःखं नास्ति त्याग समं सुखम्॥”
(विद्येसारखा डोळा नाही आणि सत्यासारखे तप नाही. पण ही विद्या केवळ पुस्तकी नसून अनुभवातून आलेली असावी, कारण स्व-अनुभव हाच खरा ‘चक्षु’ म्हणजेच डोळा आहे.)
सिंहावलोकनाचे महत्त्व:
चाणक्य नीतीमध्ये म्हटले आहे की, माणसाने सिंहाकडून एक मोठा गुण शिकला पाहिजे:
“बह्वल्पकार्यं वा यो नरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारंभेण तत्कुर्यात् सिंहादेकं प्रचक्षते॥”
(सिंह ज्याप्रमाणे आपले पूर्ण लक्ष देऊन शिकार करतो आणि अधूनमधून मागे वळून पाहतो, तद्वतच माणसाने आपल्या कार्याचा आढावा घेत पूर्ण शक्तीने काम करावे.)
२. संत साहित्याचा आधार
महाराष्ट्रातील संत परंपरेने ‘अनुभव’ किंवा ‘अनुभवामृत’ यालाच परब्रह्म मानले आहे.
संत ज्ञानेश्वर महाराज:
ज्ञानेश्वर माऊलींनी ‘ज्ञानेश्वरी’मध्ये अनुभवाचे महत्त्व ठायी ठायी सांगितले आहे. ते म्हणतात की, जोपर्यंत आत्मज्ञान अनुभवाला येत नाही, तोपर्यंत शब्दज्ञान व्यर्थ आहे.
“जैसी हाता आली कडाडी। आणि मती पडे वेडी।
तैसे अनुभवाचे गुढी। उभविली आम्ही॥”
(जेव्हा अनुभवाची गुढी उभारली जाते, तेव्हा बुद्धीचे तर्क तिथे थिटे पडतात. स्वतःचा अनुभव हेच सर्वश्रेष्ठ प्रमाण आहे.)
संत तुकाराम महाराज:
तुकोबांनी तर स्पष्टच सांगितले आहे की, केवळ पाठांतर करून उपयोग नाही, तर जे अनुभवलं आहे तेच बोलावे:
“येथें पाहिजे जातीचें। येरागबाळाचें काम नव्हें॥”
(येथे केवळ पुस्तकी ज्ञान चालत नाही, तर ज्याने तो अनुभव घेतला आहे, तोच टिकू शकतो.)
तसेच, “अनुभवें आले अंगा। ते या जगा देतसे॥” – म्हणजे मला जे अनुभवातून उमजले, तेच मी जगाला सांगत आहे.
समर्थ रामदास स्वामी:
‘दासबोध’मध्ये समर्थांनी ‘प्रचिती’ (म्हणजेच अनुभव) याला फार महत्त्व दिले आहे:
”प्रत्ययाविण जे बोलणें। तें सगळेंची श्लाघ्यवाणें।”
(ज्या गोष्टीला अनुभवाचा किंवा प्रत्ययाचा आधार नाही, ते बोलणे व्यर्थ आहे. माणसाने आपल्या प्रचितीवरूनच पुढचे मार्ग शोधले पाहिजेत.)
३. अनुभवातून मार्गदर्शन
संत साहित्यानुसार, आपले जीवन हाच एक ग्रंथ आहे. जेव्हा आपण ‘सिंहावलोकन’ करतो, तेव्हा:
१. प्रचिती: आपल्याला सत्याचा प्रत्यय येतो.
२. सावधानता: भूतकाळातील ठेच आपल्याला भविष्यात सावध करते.
३. आत्मबोध: “मी कोण आहे आणि मी कुठे चुकलो? ” हे आरशासारखे स्वच्छ दिसते.
थोडक्यात: संतांच्या मते, तुमच्या हृदयातील ‘अनुभव’ हाच ईश्वर आहे जो तुम्हाला सतत मार्गदर्शन करत असतो
सिंहावलोकन’ हा शब्द अतिशय अर्थपूर्ण आहे. ज्याप्रमाणे सिंह चालता चालता थांबून मागे वळून पाहतो आणि आपण कापलेल्या अंतराचा व परिस्थितीचा आढावा घेतो, त्याचप्रमाणे मानवी आयुष्यात ‘आत्मपरीक्षण’ करणे गरजेचे असते.
१. अनुभवांची शिदोरी आणि शहाणपण
आपल्या आयुष्यात घडणारी प्रत्येक घटना—मग ती चांगली असो वा वाईट—काहीतरी शिकवून जाते. जेव्हा आपण शांतपणे मागे वळून पाहतो (सिंहावलोकन करतो), तेव्हा आपल्याला कळते की ज्या संकटांमुळे आपण खचलो होतो, त्यांनीच आपल्याला अधिक मजबूत बनवले आहे.
२. चुकांमधून सुधारणा
माणूस चुकांचा पुतळा आहे, पण त्याच चुकांची पुनरावृत्ती टाळणे म्हणजे प्रगती. स्वतःच्या भूतकाळातील निर्णयांचे विश्लेषण केल्यावर आपल्याला समजते की, “त्यावेळी मी असे वागायला हवे होते. ” हे आकलन म्हणजेच ‘अंतर्गत मार्गदर्शन’ होय.
३. स्वतःची ओळख
बाहेरचे जग आपल्याला काय करावे हे सांगत असते, पण आपला अनुभव आपल्याला काय ‘जमेल’ हे सांगतो. स्वतःच्या अनुभवांचे चिंतन केल्यावर आपल्याला आपल्या मर्यादा आणि शक्ती समजतात. यातूनच ‘स्वत्व’ गवसते.
४. दृष्टीकोनात बदल
एखादी घटना घडते तेव्हा आपण भावनेच्या भरात असतो. मात्र, काही काळाने जेव्हा आपण ‘सिंहावलोकन’ करतो, तेव्हा त्या घटनेकडे पाहण्याचा आपला दृष्टीकोन अधिक प्रगल्भ आणि तटस्थ झालेला असतो. हा तटस्थपणाच आपल्याला योग्य दिशा दाखवतो.
थोडक्यात सांगायचे तर:
बाहेरचा गुरु फक्त मार्ग दाखवू शकतो, पण त्या मार्गावर चालताना येणारे खड्डे आणि वळणे आपले अनुभवच आपल्याला शिकवतात. जो माणूस आपल्या भूतकाळातील अनुभवांचा आदर करतो, त्याला भविष्यासाठी कोणा दुसऱ्याच्या मार्गदर्शनाची फारशी गरज उरत नाही.
असे सगळे चिंतन सुध्दा गुरुकृपेशिवाय अशक्य आहे याची मला पूर्ण कल्पना आहे.
☆ शॉर्टकट… – भाग – १ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆
॓सुनंदाबाई, संध्याकाळी चांगली कोवळी मेथीची जुडी आणा. भाईसाहेब दोन-तीन दिवस बाहेरगावी जात आहेत. थोडे पराठे बरोबर देता येतील. ॑ नाश्ता करता करता राजश्री सुनंदाबाईंना दिवसभरच्या कामाच्या सूचना देत होती.
रमेश नाश्ता करून कोर्टाच्या कामासाठी बाहेर पडला होता. त्याच्या वडिलांपासून चालत आलेली त्यांची टॅक्स कन्सल्टेशनची फर्म चांगली नावाजलेली होती. एम कॉम झालेली राजश्री फर्ममध्येच अकाउंटस् चं काम सांभाळायची. आवरायला उशीर झाला की राजश्रीला चित्राची खूप आठवण येई.
॓दीदी, ड्रेसला इस्त्री करून ठेवली आहे. मॅचिंग बांगड्या गळ्यातलं पण ठेवलाय तिथेच आणि टेबलावर गोड ताज्या ताकाचा ग्लास ठेवलाय. आठवणीने प्या बरं का. मागचं सर्व आवरून येतेच मी ऑफिसला.॔ असा प्रेमळ आग्रह करणाऱ्या हुशार, चटपटीत चित्राला दुबईला पाठवून आता वर्ष होऊन गेलं होतं.
॓हल्ली ती फोनवर पहिल्यासारखी उत्साहाने बोलत नाही. नुसतं हो… नाही.. बरं.. म्हणंत फोन ठेवून देते. काही बिनसलय का तिचं ते एकदा नीट विचारलं पाहिजे.॔ असा विचार करत राजश्री सँडल्स घालत होती. तेवढ्यात फोन वाजला.
॓आता कोण असेल? आधीच उशीर झालाय ॔. असं मनात म्हणंत राजश्रीनं फोन उचलला. फोन तिच्या नेहमीच्या बँकेतल्या मॅनेजरचा होता. राजश्रीला शक्य तितक्या लवकर बँकेत भेटायला बोलावलं होतं.
॓संध्याकाळी नक्की येऊन जाते.॔ असं म्हणत राजश्रीनं फोन ठेवून दिला. एवढं अर्जंट काय काम असेल तिला प्रश्नच पडला.
*****
॓तुमच्याकडे कामाला असलेल्या चित्राचा आपण इथे तुमच्या मदतीने एन् आर् आय् अकाउंट उघडला आहे. या नॉन रेसिडेंट इंडियन अकाउंटमध्ये दरमहा 22/25 हजार रुपये जमा होतात आणि त्यातले 15/16 हजार रुपये काढले जातात.॔ संध्याकाळी भेटल्यावर बँक मॅनेजरने सांगितलं.
॓ हो. मी तुम्हाला सांगितलं होतं की चित्राला आम्ही दुबईला माझ्या मैत्रिणीकडे मदतीसाठी पाठवत आहोत. तिचा भाऊ येऊन घरखर्चासाठी थोडे पैसे काढत जाईल. राजश्री म्हणाली.॔
पण गेल्या चार-पाच महिन्यात या अकाउंटमध्ये नेहमीच्या रकमेशिवाय
आणखी जवळजवळ दीड लाख रुपये जमा झाले आहेत. काही फिक्सड् डिपॉझिट वगैरे करायचं असेल तर विचारा तिला. ही जमा रक्कम थोडी जास्त वाटली नेहमीपेक्षा म्हणून बोलावलं तुम्हाला. मॅनेजर म्हणाले ॔
॓थँक्स! मी कळवते तुम्हाला काय करायचं ते.॔ असं म्हणून राजश्री गडबडीने उठली.
घरी येईपर्यंत उलट सुलट विचारांनी राजश्रीचं डोकं भणभणून गेलं. तोंड धुऊन तिनं कपडे बदलले. सुनंदाबाईने दिलेलं गरम थालीपीठ आणि तिला आवडणारी वेलचीची कॉफी पितानाही तिच्या डोक्यात चित्राच होती. चित्राचा विषय सुनंदाबाईंजवळ… तिच्या आईजवळ… काढावा का हा मनातला विचार तिने बाजूला केला.
आधी रमेशजवळच बोलावं याबद्दल, असं ठरवून ती गप्प राहिली. खाण्यापिण्याची भांडी आवरून सुनंदाबाई बाजारात गेल्या. रमेश यायला अजून तसा वेळ होता. हॉलमध्ये टांगलेल्या वेताच्या झोपाळ्यावर ती विचार करत बसली. तिचं मन पाच सहा वर्ष मागे गेलं.
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राजश्रीचं गर्भाशयाचं ऑपरेशन करायचं ठरलं होतं. कदाचित गर्भाशय काढावही लागणार होतं. ऑपरेशननंतर दोन-तीन महिने राहायला येऊ शकेल असं सासर… माहेरचं कुणीच नव्हतं. त्यामुळे घर सांभाळेल, तिची काळजी घेईल अशा एखाद्या चांगल्या बाईच्या ती शोधात होती. त्याचवेळी तिच्याकडे भांडी घासणाऱ्या बाईंनी तिला चित्राचं नाव सुचवलं होतं. चित्राची आई बाईंच्या लांबच्या नात्यातली होती. अलिबाग जवळच्या एका छोट्या गावात ती मुलगी कुटुंबीयांसह राहत होती. चित्राच्या कामसूपणाची, चांगुलपणाची बाईंनी खात्री दिली आणि मदतीसाठी चित्राला मुंबईला आणायचं ठरलं.
चित्राने थोड्याच दिवसात मुंबईच्या जीवनाशी जुळवून घेतलं. राजश्रीदीदी आणि भाई साहेबांचा विश्वास संपादन केला. ऑपरेशननंतर दीदीची मनापासून काळजी घेतली. तिची औषधं, खाणं.. पिणं सारं सांभाळलं. डायबेटीस असलेल्या भाईसाहेबांचं पथ्याचं खाणं शिकून घेतलं. स्वच्छ, नीटनेटक्या, हसतमुख मितभाषी चित्राला राजश्री आणि भाईसाहेबांनी घरातल्यासारखंच वागवलं होतं. त्यांना मूलबाळ नव्हतं आणि आता राजश्रीच्या ऑपरेशन नंतर ती शक्यताही दुरावली होती.
चित्राच्या बोलण्यातून कळलं होतं की तिच्या वडिलांना मुंबईत चांगली नोकरी होती पण त्यांच्या व्यसनामुळे साऱ्या संसारावर अवकळा आली होती. धाकट्या दोन भावांच्या शिक्षणासाठी चित्रांने स्वतःच शिक्षण आठवीनंतर सोडलं होतं आणि गावातच एक लहानशी नोकरी धरली होती. आईसुद्धा मोलमजुरी करत होती. चित्रा तिला मिळणाऱ्या पगारातून कुटुंबाला मदत करत होती. तिला घरच्यांची आठवण यायची पण लांब राहून का होईना आपण त्यांना मदत करतोय हे जाणवलं की तिला बरं वाटायचं.
राजश्री आणि भाईसाहेबांनी तर या कुटुंबाला आधार द्यायचं ठरवलंच होतं.
॓चित्रा, तू आता इथेच राहून रात्र शाळेत जाऊन तुझं शिक्षण पूर्ण कर. आपण जमेल तसं तुझ्या भावांना आणि आईलासुद्धा आणू इथे. दीदी आणि भाईसाहेबांच्या या बोलण्याने चित्राच्या डोळ्यात आनंदाश्रू उभे राहिले. तिची रात्र शाळा सुरू झाली. राजश्रीने खटपट करून, डिपॉझिट भरून एक छोटी दीड खोलीची जागा या कुटुंबासाठी मिळवली आणि काही महिन्यातच चित्राची आई आणि भाऊही मुंबईला आले. राजश्री आणि भाईसाहेबांनी ॓कमवा व शिका॔ असा चांगला गुरुमंत्र या कुटुंबाला दिला होता. कुटुंब खरंच गुणी होतं. जर मोठा दिनेश शाळेत जायच्या आधी जवळपासच्या सोसायटीतल्या चार-सहा जणांच्या गाड्या पुसायच्या तर कधी कुणाला दूध, भाज्या आणून द्यायचा. चित्राच्या आईला सुद्धा चांगली घरकामं मिळाली. धाकटा भाऊ जवळच्या शाळेत जायला लागला. सगळ्यांचं आयुष्य आधीपेक्षा सुकर झालं होतं.
अशीच एकदा राजश्रीची बालमैत्रीण सुलेखा एका लग्नाच्या निमित्ताने राजश्रीकडे चार-पाच दिवस राहायला आली होती. पाच वर्षांपूर्वी लग्न होऊन सुलेखा नवऱ्याबरोबर दुबईला गेली होती. त्यानंतर आत्ताच मैत्रिणींची भेट होत होती. त्यामुळे गप्पांना, खाण्यापिण्याला, फिरण्याला उधाण आलं होतं. सुलेखाचा नवरा सुरेंद्र दुबईत एका चांगल्या कंपनीत नोकरीला होता. सुलेखा तिथल्या शाळेत शिक्षिकेची नोकरी करत होती.
इथे आल्यावर, राजश्रीच्या घरी काम करणारी कामसू, विश्वासू, शांत स्वभावाची चित्रा सुलेखाच्या मनात भरली. त्यावेळी नुकतीच बारावी पास झालेल्या चित्रांनं पुढे कुठलं शिक्षण घ्यावं याची चर्चा राजश्रीकडे चालू असतानाच, ॓चित्रासारखी मुलगी आपल्याला मदतीला मिळाली तर?॔ असा विचार सुलेखाच्या मनात चमकून गेला.
॓अगं, चित्राला आमच्याकडे दुबईला पाठवतेस का? तिथे आता मुलींसाठी स्पेशल होम सायन्सचा कोर्स सुरू झालाय. आम्ही चित्राला त्या कोर्सला घालू आणि मला चित्राची घरकामात मदतही होईल. आम्ही दरमहा तिच्या इथल्या अकाउंटमध्ये साधारण 22… 25 हजार रुपये जमा करू. तिचं शिक्षण होईल आणि पैसे पण जमतील.॔ सुलेखाने आपला प्रस्ताव राजेश्रीकडे मांडला.
राजश्री विचारात पडली. चित्राच्या कुटुंबाला पैशाची गरज तर होतीच. दोन्ही भावांचे शिक्षण, चित्राचं लग्न, मुख्य म्हणजे स्वतःची जागा असं सगळंच व्हायचं होतं. त्यांच्या राहत्या खोलीच्या कराराचे अकरा महिने कधी संपायचे कळायचंही नाही. मग राजश्रीलाच धावपळ करून, जादा भाडं कबूल करून जागेचं नवीन ॲग्रीमेंट करून घ्यावं लागायचं. सुलेखाच्या या प्रस्तावामुळे या कुटुंबाचा फायदा होईल असंच राजश्रीला वाटलं.
मुलीला एवढ्या लांब, अनोळखी ठिकाणी पाठवायला सुनंदाबाई प्रथम तयार नव्हत्या. मग चित्रानेच आईची समजूत घातली. चित्राला पासपोर्ट मिळाल्यावर सुरेंद्र सुलेखानं दुबईहून आवश्यक ती कागदपत्रं पाठवली. चित्राच्या येण्याचा उद्देश, तिची राहण्या जेवण्याची व्यवस्था, तिचा दरमहाचा पगार अशा बऱ्याच गोष्टींची नोंद तिथल्या सरकारी खात्यात झाल्यावर अखेर एकदाचं परवाना पत्र आणि तिकीट दुबईहून आलं. स्वतःच्या आणि कुटुंबाच्या उज्वल भविष्याची स्वप्न पाहत चित्रानं आईचा, दीदी आणि भाईसाहेबांचा आशीर्वाद घेतला. भावांना जवळ घेऊन निरोप घेतला आणि मोठ्या हिमतीनं विमानात पाय ठेवला. दुबई एअरपोर्टवर सुरेंद्र सुलेखा तिला न्यायला आले होते. चित्रा सुखरूप दुबईला पोचल्याचा फोन आला तेव्हा सर्वांचा जीव भांड्यात पडला होता.