हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – व्यंग्य – “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३

☆ व्यंग्य ☆ “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

“गेहूँ के साथ घुन पिसता है” आपने अक्सर सुना होगा। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच जारी घमासान युद्ध में विश्व भर में यह कथन सार्थक हुआ। नष्ट हुए तेल ठिकानों, अवरुद्ध आपूर्ति मार्गों ने न सिर्फ तेल और गैस के दाम विश्व भर के देशों में बढ़ा दिए हैं वरन चिंताजनक कमी पैदा कर दी। यद्यपि फिलहाल युद्ध विराम हो गया है पर युद्ध के बादल अभी छंटे नहीं हैं। युद्ध में बुरे फंसे ट्रंप को अपमानित कराकर आखिर “कम्बल ने उन्हें छोड़ दिया” फिर भी अगले पल वे क्या करेंगे, उन्हें खुद भी नहीं पता, कह नहीं सकते कि कब वे फिर से “कम्बल पकड़ लें”। युद्ध के परिणाम कहीं साइकिल और चूल्हा युग के दर्शनों से वंचित, पैदल चलने से परहेज करने वाली नई पीढ़ी को इसका अनुभव न करा दें। आरोप – प्रत्यारोप के साथ – साथ “तू तू – मैं मैं” की पक्ष – विपक्ष की राजनीतिक बयानबाजियों, हुल्लड़, प्रदर्शनों से तो सभी परिचित हैं। विपक्ष तो सदा ही सरकार को कमजोर, अदूरदर्शी, नाकाम साबित करने के लिए मुद्दों और अवसरों की तलाश में लगा रहता है। यद्यपि हमारे देश की सरकार काफी समय से चीख – चीख कर कह रही थी कि अभी हमारे सामने पेट्रोल, डीजल का संकट नहीं है और अब तो युद्ध विराम भी हो गया है, गैस की थोड़ी समस्या है किंतु इसके समाधान के प्रयत्न भी जारी हैं। पर जो सरकार की बात सुन और समझ कर जनता को भी समझाए क्या आप उसे विपक्ष कहेंगे ? विपक्ष सरकार को नकारा साबित करने निरंतर अपने कदम कठोर करता जा रहा है, सरकार ने इस समस्या से निपटने पहले कदम, फिर कठोर कदम और अति कठोर कदम उठाना शुरू कर दिए हैं।

गैस सिलेंडर प्राप्त करने के लिए गृहणियां अपने – अपने पतियों – पुत्रों से गैस एजेंसियों की ओर कदम उठाने और वहां पहुंचकर जब तक गैस न मिले अंगद की तरह पैर जमाए रखने की हिदायत दे रही हैं। लोगों का सूर्योदय – सूर्यास्त गैस एजेंसियों के समक्ष लगी लाइन में हो रहा है। कुछ अच्छी पत्नियां तो गैस की लाइन में लगे अपने पति को टिफिन पहुंचाते हुए भी देखी गईं। सरकार तेल और गैस के लिए लगी लाइनें देख कर चिंतित होती रही है और विपक्ष खुशियां मनाता रहा, विपक्ष चाह रहा था कि लाइन बढ़ती जाएं, लोगों में टकराव शुरू हो। डीजल – पेट्रोल पंपों में भी उपभोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा तेल लेने प्रयासरत देखा गया। जो इसमें सफल हो जाता उसकी खुशी देखते ही बनती। विपक्ष गैस, डीजल – पेट्रोल की किल्लत का ठीकरा सरकार पर फोड़ रहा है। उसका कहना है कि सरकार के मुखिया ट्रंप के चमचे हैं वे ईंधन की आपूर्ति के लिए प्रयास करने की जगह घुइयां छील रहे हैं।

टीवी चैनलों में डिवेट जारी है। सरकार और विपक्ष के प्रतिनिधि एक दूसरे का चीर हरण कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह परिस्थितियों से निपट रही है, उसके पास 2 माह का पर्याप्त स्टॉक है और कच्चे तेल के जहाज आ रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार का झूठ बताता रहा। उसका कहना है कि ऐसा है तो गैस, पेट्रोल के लिए लंबी कतारें क्यों लगी ? इसके विपरीत सरकार का कहना है कि पेट्रोल, डीजल, गैस की कमी की अफवाह फैलाकर लोगों की लाइन लगवाने का काम विपक्ष ने किया। जनता उलझन में है कि किसकी बात को सही माने ! कुछ लोगों का कहना है कि सरकार 5 राज्यों के होने वाले चुनावों तक रुकी है फिर देश में तेल और गैस की मारा मारी भी होगी और दाम भी बढ़ेंगे। सरकार तो सरकार है क्या नहीं कर सकती। कुछ लोग कह रहे हैं कि यदि हम थाली, घंटा बजाकर, दिया और टॉर्च जलाकर कोरोना को भगा सकते हैं तो हमें अमेरिका, इजरायल, ईरान का युद्ध परमानेंट रुकवाने के लिए भी इसी तरह के कुछ प्रयोग करना चाहिए। आश्चर्य है, जिन लोगों को दीवाली के पटाखों से प्रदूषण का खतरा नजर आता था, पृथ्वी की ओज़ोन परत फटती नजर आती थी, जो पटाखों की मनाही के लिए देश – विदेश में हाहाकार मचाने लगते थे वे सब ईरान, इजरायल, अमेरिका के आतिशी युद्ध पर मौन रहे। एक बात और बता दूं मेरे पड़ोसी वर्मा जी जब – तब मेरे पास आकर मुझसे युद्ध रुकवाने का आग्रह करते रहे, कहते थे आप पत्रकार हैं, सक्षम हैं, आपको इस सिलसिले में मोदी जी से बात करना चाहिए। अच्छा हुआ युद्ध विराम हो गया, ट्रंप कम्बल से छूटे, हमारी सरकार को राहत मिली, विपक्ष नए मुद्दे की तलाश में लग गया और वर्मा जी ने भी मेरा पीछा छोड़ा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९० – व्यंग्य – डिजिटल उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डिजिटल उपवास )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९० – व्यंग्य  – डिजिटल उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

धरमपुरा गांव के स्वघोषित समाजशास्त्री ‘फरेब सिंह’ ने जब प्रधानी के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की, तो उन्होंने गांव वालों को एक नया और डरावना सपना दिखाया—’डिजिटल नरक’। फरेब सिंह का चुनावी घोषणापत्र किसी धार्मिक ग्रंथ और सॉफ्टवेयर मैनुअल का मिला-जुला खिचड़ी था। उन्होंने तर्क दिया कि गांव की बदहाली का कारण सड़कें नहीं, बल्कि मोबाइल के भीतर बैठा वह ‘अदृश्य राक्षस’ है जो सबका डेटा और पुण्य एक साथ चबा रहा है। उन्होंने वादा किया कि जीतते ही वे पूरे गांव में ‘डेटा-जामर’ लगवाएंगे और हर ग्रामीण को एक ‘एनालॉग शांति कार्ड’ देंगे। उनका दावा था कि जो उन्हें वोट देगा, उसके स्मार्टफोन से निकलने वाली ‘नेगेटिव ऊर्जा’ को वे एक विशेष सरकारी फिल्टर के जरिए बिजली में बदल देंगे, जिससे गांव के मंदिर की लाइटें मुफ्त में जलेंगी। गांव के लोग, जो रील बनाने और देखने के चक्कर में अपनी फसल और अक्ल दोनों गंवा रहे थे, अचानक ‘डिजिटल वैराग्य’ के इस क्रांतिकारी विचार पर लट्टू हो गए।

प्रचार के अंतिम सप्ताह में फरेब सिंह ने गांव के तालाब के पास एक ‘सोशल मीडिया विसर्जन कुंड’ बनवाया। यह वास्तव में एक गहरा गड्ढा था जिसके चारों ओर टूटे हुए कंप्यूटर के कीबोर्ड और माउस लटकाए गए थे। उन्होंने घोषणा की कि जो भी ग्रामीण अपनी ‘फेसबुक की बुराइयां’ और ‘व्हाट्सएप के झूठ’ इस कुंड में मानसिक रूप से विसर्जित कर फरेब सिंह को वोट देने का संकल्प लेगा, उसका अगला सात जन्म तक किसी भी ‘स्कैम कॉल’ या ‘लोन मैसेज’ से पाला नहीं पड़ेगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘गपोड़ी लाल’ चिल्लाते रहे कि गांव को मुफ्त इंटरनेट चाहिए, लेकिन फरेब सिंह ने उन्हें ‘असुर’ घोषित कर दिया जो जनता की निजता को खतरे में डालना चाहता है। गांव के बुजुर्गों को लगा कि फरेब सिंह साक्षात कलियुग के यमराज से उनका स्मार्टफोन बचाने आए हैं। लोग अपनी फटी धोतियों के कोने में चिपके पुराने हैंडसेटों की पूजा करने लगे ताकि फरेब सिंह की ‘सुरक्षा ढाल’ उन्हें मिल सके।

मतदान के अगले दिन जब फरेब सिंह की भारी मतों से जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘डेटा-मुक्ति प्रमाण पत्र’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। फरेब सिंह ने बड़े इत्मीनान से अपनी नई चमचमाती गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक डाक टिकट जैसा कागज थमा दिया, जिस पर लिखा था— “डेटा ही माया है।” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, यह क्या है? हमारा नेटवर्क तो अब भी गायब है और मोबाइल में कुछ नहीं चल रहा!” फरेब सिंह ने अपनी नई आईफोन की स्क्रीन चमकाते हुए गंभीर स्वर में कहा— “मूर्खों! नेटवर्क गायब नहीं हुआ, मैंने गांव के टावर का किराया डकार कर उसे अपने नाम आवंटित करवा लिया है। अब तुम सब ‘डिजिटल उपवास’ करो ताकि मेरा निजी बिजनेस बिना किसी रुकावट के तेज चल सके। तुमने डेटा छोड़ा, मैंने उसे पकड़ लिया; यही तो असली समाजवाद है!” जनता सन्न खड़ी अपने पत्थर जैसे मोबाइल देख रही थी और फरेब सिंह अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ाकर ‘हाई-स्पीड’ घोटाले की नई फाइल जमा करने शहर की ओर कूच कर गए।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७१ ⇒ अपनापन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपनापन।)

?अभी अभी # ९७१ ⇒ आलेख – अपनापन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्रेम में अगर ढाई अक्षर होते हैं, तो अपनापन में पाँच ! यानी ढाई से दो गुना। प्रेम को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन अपनेपन को परिभाषित करना इतना आसान नहीं।

फेसबुक पर अपने बारे में लिखने का मौका कम ही आता है ! परिचय को रिश्ते में बदलने में वक्त तो लगता है। केवल विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित रिश्ते में अपनेपन का अहसास होना ही फेसबुक की खूबी है।।

कल 1 अप्रैल था ! कई लोग 1 अप्रैल को पैदा होते हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ ! जब छोटे थे, तो जन्मदिन सिर्फ माँ को याद रहता था। माँ हलवे से मुँह मीठा करती थी। पिताजी कुछ न कुछ लेकर ज़रूर घर आते थे। कभी कोई खिलौना, कभी नये कपड़े, तो कभी सायकल।

समय के साथ जन्मदिन का स्वरूप बदलता चला गया। जन्मदिन, स्कूल, दफ़्तर और परिचितों की सीमाएं पार करता हुआ फेसबुक तक पहुँच गया। कल फेसबुक पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया।।

पहली बार अपनेपन का अहसास हुआ ! अपरिचय से परिचय का रिश्ता जब इतना मजबूत होने लगता है, तो सब अपने लगने लगते हैं। रोज सुबह ” अभी अभी ” से अपनों की पहचान हुई। अपनों को नापने का कोई मापदंड नहीं होता। आश्चर्य हुआ, खुशी भी हुई। इतनों में अपनेपन का अहसास हुआ।

शब्द भाव प्रकट करते हैं। भाव दो शब्दों में भी प्रकट किए जा सकते हैं, और 200 में भी ! मेरे लिए भाव अधिक महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं तो मौन से भी अपनेपन की अभिव्यक्ति होती है। प्रकट रूप से व्यक्त हर शब्द का मैं सम्मान करता हूँ, उसके पीछे छुपे गहन अर्थ को समझना सबके बस की बात नहीं, अतः कभी कभी व्यक्ति के भाव को पूरा सम्मान भी नहीं मिल पाता।

जाने अनजाने हुई इस भूल के लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।।

अभी अभी का यह सिलसिला आपके प्यार और आशीर्वाद का ही फल है। मेरे जीवन भर की उपलब्धि केवल यह अभी अभी ही है। जन्मदिन के अवसर पर आप सबने मुझे अपनेपन का अहसास कराया। कुछ का मैं धन्यवाद कर पाया, कुछ का नहीं। सभी के द्वारा व्यक्त भावों, उद्गार और जन्मदिन पर प्रेषित शुभकामनाओं हेतु मैं सबका पुनः आभार प्रकट करता हूँ।

आपके इस अपनेपन के कारण मुझे कभी अपनी उम्र का अहसास नहीं हुआ। ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर जरिया मुझे नज़र नहीं आया। मित्रों, हितैषियों और शुभचिन्तकों की इतनी बड़ी तादाद है कि मैं उनका व्यक्तितगत रूप से आभार नहीं प्रकट कर सकता।

अंत में जगजीतसिंह के शब्दों में केवल इतना ही कहूँगा –

तुमको देखा तो ये ख़याल आया

ज़िंदगी धूप, तुम घना साया।।

आभार, शुक्रिया, धन्यवाद। बारम्बार ….

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६० ☆ # “प्रकाश पुंज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रकाश पुंज…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६० ☆

☆ # “प्रकाश पुंज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

(14 अप्रैल डा आंबेडकर जयंती पर विशेष)

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

ताप से जिसके बेड़ियों का लोहा

धीरे-धीरे पिघला था

 

बह रहा था लहू

जख्मी हाथ और पांव से

बहिष्कृत थे हम

समाज और गांव से

दूषित हो जाते थें लोग

अशुचि हमारी छांव से

प्रभाकर की प्रभा से

जल उठा गरल

जो हमने निगला था

चीरकर सदियों  का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

कुआं हमने खोदा

पर जल पर हमारा हक नहीं था

फसल बोई, काटी

पर अन्न पर हमारा हक नहीं था

पौधा लगाया वृक्ष बनाया

पर फल पर हमारा हक नहीं था

लिखकर नया अध्याय

उसने पुराना अध्याय बदला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

शिक्षित बनो यह मंत्र देकर

उसने अभियान चलाया

संगठित रहो यह मन्त्र देकर

उसने अभिमान जगाया

संघर्ष करो यह तंत्र देकर

उसने स्वाभिमान बढ़ाया

जीने की राह दिखाने

वह प्रकाश पुंज अकेला निकला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

तूफानों से लड़कर

पर्वतों में राह बनाई

बुझीं बुझीं आंखों में

जीने की चाह जगाई

कमजोरों को गले लगा कर

सबको अपनी बांह थमाई

शक्तिमान बनाया समाज को

जो कभी दुबला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

उसने आसमान को झुकाया

विद्वत्ता के दम पर

उसने जर्रे जर्रे को चमकाया

उपकार किया हम पर

उसने रोशनी का दिया जलाया

वार किया तम पर

आलोकित हुए पथ पर

जन सैलाब उबला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

दया करुणा प्रेम हो जिसमें

वही सच्चा इंसान है

वंचितो शोषितो पीड़ितों के

हर सांस का वह प्राण है

रोम रोम में बसा

वह मानव नहीं भगवान है

रूढ़ियों को तोड़कर

जिसने व्यवस्था को बदला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

ताप से जिसके बेड़ियों का लोहा

धीरे-धीरे पिघला था /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०३ – मुझे, उपग्रह ही रहने दो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता मुझे, उपग्रह ही रहने दो।)

☆ अभिव्यक्ति # १०३ ☆ मुझे, उपग्रह ही रहने दो☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

चांद कुछ कहता रहा,

कहा कुछ,

हम, समझे कुछ,

उसने कहा था,

किसने कहा, कि मुझे,

सौंदर्य की, उपमा दो,

किसने कहा कि,

मुझे पृथ्वी का भाई,

बना दो,

कुछ भी, करते हो,

कुछ भी, कहते हो,

मुझे, उपग्रह ही रहने दो,

पृथ्वी का, छोटा सा,

मुझे निश्छल भाव से,

परिक्रमा करने दो, पृथ्वी की,

सागर से लगाव, रहने दो,

मुझे पृथक न, करो,

अपनो से,

बस चांद ही रहने दो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गुंड… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ गुंड… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

 चांगले लोकही आंधळे जाहले

फालतू वागले कावळे जाहलें

संगती भोवल्या नासल्या भावना

भोग भोगायचे सोहळे जाहले

 *

गुंतले ते असे लाभल्या यातना

जाणते शाहणे वेंधळे जाहले

 *

सापळे मांडले कोंडली माणसे

भक्त सारे कसे बावळे जाहले

 *

धर्म आहे कुठे राहिला चांगला

कर्म आहे इथे पांगळे जाहले

 *

साधना संपली वासना जागली

पाप ही हासले सोवळे जाहले

 *

बंधने संपली कायदे मोडले

गुंड आता पुन्हा मोकळे जाहले

 *

रंगल्या बातम्या संपली तीवृता

ढोंग आता किती कोवळे जाहले

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ६ – कॅसेट -☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ६ – कॅसेट – ☆ विभावरी कुलकर्णी

आज घर आवरताना एक जुनी कॅसेट सापडली आणि त्या फितीप्रमाणेच मनही भूतकाळातील आठवणींत गुंडाळले गेले. माझ्या लहानपणी ज्यांच्याकडे रेडिओ, टेप-रेकॉर्डर, टीव्ही असेल किंवा घरात नळ, गॅस आणि झोपायला गादी-कॉट असेल, तर त्या घराकडे ‘फार श्रीमंत’ लोक म्हणून बघितले जायचे. “त्यांचे काय बाबा, मोठे लोक आहेत ते! ” असा एक विशिष्ट आविर्भाव त्यामागे असायचा.

​अशा काळात एके दिवशी वडिलांनी एक मोठा बॉक्स घरी आणला. (आमच्यासाठी बॉक्स उघडणे ही सुद्धा एखाद्या दिवाळीपेक्षा कमी नसे! ) तो बॉक्स उघडताना वाड्यातील सगळे ‘बालवीर’ तिथे जमले. प्रत्येकाच्या चेहऱ्यावर आनंद आणि कमालीची उत्सुकता होती. मोठी माणसे कडेकडेने उभी होती. त्यातील स्त्रियांच्या चेहऱ्यावर संमिश्र भाव होते—कौतुक, थोडी असूया, प्रचंड उत्सुकता आणि थोडी हळहळ! अखेर विविध सूचनांच्या भडिमारानंतर तो बॉक्स उघडला गेला आणि आतून एक मस्त काळा, चमकदार, अनेक बटणे असलेला ‘पाहुणा’ घरात प्रविष्ट झाला. तो म्हणजे ‘टू-इन-वन’.

​प्रथम त्यातले काहीच कळेना, पण हळूहळू त्या पाहुण्याशी परिचय वाढत गेला आणि नवनवीन गुपिते कळू लागली. रेडिओ तसा ओळखीचा होता, पण त्यातील ‘कॅसेट प्लेअर’ ही गोष्ट अगदीच नवीन होती. कॅसेट आत कशी फिरते, याचेही तासनतास निरीक्षण झाले. त्यातून येणारा आवाज आणि आपल्याला हवी तीच गाणी लावता येणे, हे सर्व जादू वाटण्यासारखे होते.

​पण माझे बालकुतूहल मला शांत बसू देईना! या कुतूहलापोटी घरात कोणी नसताना अनेक वस्तू खोलून पाहण्याचे ‘प्रताप’ मी केले आहेत. ती कॅसेट नेमकी वाजते कशी? मग एकदा संधी साधून मी ती उलट-सुलट करून पाहिली. तिला ‘A’ आणि ‘B’ अशा दोन बाजू असतात आणि दोन्हीकडे वेगळी गाणी कशी वाजतात, हा माझ्यासमोर मोठा प्रश्न होता. अशाच एका गाफील क्षणी त्यातील काळी रिबन बाहेर आली! आता नक्की ओरडा मिळणार, या भीतीने मी घामाघूम झाले. पण शक्कल लढवून कॅसेटच्या चाकात करंगळी घातली, ती गोल फिरवली आणि रिबन हळूहळू आत गेली. तेव्हा कुठे माझा जीव भांड्यात पडला.

​नंतर समजले की आपल्याला हव्या त्या गाण्यांच्या कॅसेट्स दुकानात मिळतात. मग काय, एक कोरी कॅसेट घ्यायची, घरातील सर्वांनी एकत्र बसून आवडीच्या गाण्यांची यादी करायची आणि ती दुकानदाराकडे द्यायची. हा एक नवा खेळच सुरू झाला. जुनी गाणी पुसून नवीन गाणी भरता येतात, हे समजल्यावर तर आनंदाला पारावार उरला नाही. त्यावेळी ‘TDK’ आणि ‘SONY’ च्या कॅसेट्स सर्वात उत्तम असतात, हे तांत्रिक ज्ञानही मिळाले. पु. ल. देशपांडे, व. पु. काळे, शंकर पाटील यांचे कथाकथन आणि गाण्यांचे कार्यक्रम या कॅसेट्समुळे थेट घरात अवतरले. “एकदा घ्या आणि पुन्हा पुन्हा ऐका” या सुविधेमुळे रेडिओच्या सवयीच्या लोकांना स्वतःच्या बोटावर आवडते गाणे वाजवताना राजेशाही थाट वाटायचा.

​आनंदात गाणी ऐकणे चालू असताना अचानक ‘खटक’ असा आवाज होऊन टेप बंद पडायचा. मग सर्वांची नजर संशयाने माझ्याकडे वळायची. मी आपला शक्य तितका ‘बावळट’ चेहरा करून, “मी तर आज टेपला हातही लावला नाही, ” असे पटवून द्यायचे. कॅसेट बाहेर काढली की त्यातून लांबच लांब रिबन बाहेर आलेली असायची. तिथे माझा जुना अनुभव उपयोगी पडायचा; फक्त यावेळी करंगळीऐवजी पेन्सिलचा वापर करून ती रिबन गुंडाळून पुन्हा आत बसवली जायची. एकदा तर रिबन तुटलीच! पण सेलोटेपचा बारीक तुकडा लावून ती जोडण्याचे धाडस मी केले आहे. हे काम ज्यांनी केले असेल, त्यांना एखादा सर्जन ऑपरेशन करताना किती टेन्शनमध्ये असतो, याचा नक्कीच अनुभव आला असेल.

​आज काळ बदलला आहे. आता सगळं काही ‘ढगात’ (Cloud) आहे, ‘तू-नळी’ (YouTube) आहे आणि आपले गुगल बाबा तर आहेतच! एका क्लिकवर हवे ते गाणे मिळते आणि प्रत्येकाच्या कानात हेडफोन्स असतात. पण त्या काळी गाण्यांचा आणि जेवणाचा ‘मेन्यू’ एकत्र ठरायचा. त्या सहभोजन आणि सहश्रवणात जी सामूहिक मजा होती, ती केवळ त्या काळातील पिढीलाच ठाऊक!

​आज त्या एका जुन्या कॅसेटमुळे तो सगळा काळ डोळ्यांसमोरून पुन्हा एकदा झरझर फिरून गेला.

© विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ संध्याछाया सुखविती हृदया… ☆ सौ. राधिका माजगावकर पंडित ☆

सौ राधिका माजगावकर पंडित

? जीवनरंग ?

☆ संध्याछाया सुखविती हृदया… ☆ सौ राधिका माजगावकर पंडित

मिलिटरीमध्ये निर्णयात्मक, कडक शिस्तीच्या आणि नियम बद्ध वातावरणात वाढलेल्या कर्नल साहेबांचा खाक्या काही और होता. भल्या पहाटे निसर्गरम्य वातावरणात वावरायला त्यांना खूप आवडायचं. चिमणपाखरांची भाषा त्यांना अवगत असल्यामुळे त्या दोस्तांशी दोस्ती करून बागेतून गोल फेरफटका मारून ते आपल्या पेन्शनर मित्रांकडे वळायचे.

आज पंधरा दिवस झाले तरी वासुनानांचा पत्ता नव्हता. हॊ त्याला कारणही तसंच होतं आयुष्याच्या संध्याकाळी पुढे जाण्यात त्यांच्या बायकोने, 1ला नंबर पटकावला होता.

ती मला सोडून माझ्या आधी देवाकडे का गेली? ह्या प्रश्नांच्या भोवऱ्यातून वासुनाना अजूनही बाहेर पडले नव्हते.

अखेर ह्या मित्र मंडळींनी त्यांना बागेत आणलंचं. त्यांना बोलतं करण्यासाठी मित्रांची धडपड चालूच होती.

पण ‘आता मी काय करू? कसा जगू? वेळ, दिवस कसा घालवू? ह्या त्यांच्या प्रश्नाचं उत्तर कुणालाच देता येईना. सगळेच गप्प होते. सगळ्यांचं एकमेकांवर खूप प्रेम होतं इतकं की कट्ट्यावर बसलेल्या मंडळींच्या तोंडून नेहमी एकच वाक्य बाहेर पडायचं.

“हम पंछी एक डालके” 

आणि बरं का! ह्या सगळ्यांचे पुढारी होते कर्नल साहेब. खूप विचार करून त्यांना एक आयडिया सुचली. उत्स्फूर्तपणे ते म्हणाले, “मंडळी मला एक विचार सुचलाय. आपण आता रिकामं बसून नाही चालायचं. रिकाम्या डोक्यात शिरू पाहणाऱ्या सैतानाची कत्तल करायची. एकदम गोळी मारायची त्याला” 

गोंधळलेल्या नागुअप्पांनी त्यांचा धबधबा आंवरत विचारलंन्, “अरे बा, कर्नलया तुझी मिल्ट्री भाषा सोड. आणि सरळ भाषेत बोल ना जरा! आपण नक्की काय करायचं ते तरी सांग. कुठून तरी वासुनाना निराशेतून बाहेर आलेचं पाहयजेतं”

“सांगतो,! सगळ सांगतो! नागूआप्पा तुमच्यापासून सुरुवात करूया. नागोजीराव अहो काय बॉडी आहे तुमची 85 पार केलीतं पण अजूनही 75 चेच वाटताय तुम्हीं. आहात कुठे! कर्नल साहेबांची गाडी रुळावर येतच नव्हती.

“अरे करण्या! तुझी गाडी रुळावरून घसरतीय लेका, मी काय विचारतोय आणि तू कां मला हरभऱ्याच्या झाडावर चढवतोयस?

आता मात्र सगळेच’एक डालकेपंछी’ओरडले”कर्नल साहेब मुद्द्यावर या, आणि सांगा तुमची भन्नाट आयडिया” 

कर्नल, भरदार मिशीतून मिस्कील हंसतं बोलते झाले, “आठवून बघा लहानपणीआपल्या शाळेत पी. टी. चा स्पेशल एक तास राखून ठेवलेला असायचा.

हॊ असायचा, पण मग त्याचं काय इथं? आपण काय आता त्या पी. टी. ला जाऊन वेळ घालवू शकतो का?

 “अहो मुद्याचं बोला हॊ कर्नल साहेब “उतावळे साठीचे संभाजीराव आता मात्र कावले होते. त्यांच्या गरम होत चाललेल्या डोक्यावर हात ठेवून साहेब म्हणाले, धीर धर! यार असा तापू नकोसआपल्या डोक्यात सैतान नकोय आणि संतापही नकोय. तुमच्या अधीर मनाला अधिक न ताणता माझ्या भेजातल्या आयडिया सांगतो,

 असं बघा नागप्पा ती समोर बालमंडळी बसली आहेतं ना, मोबाईल मध्ये डोकं खूपसून, त्यांना आपण मैदानात मोकळ्या हवेत, कोवळ्या उन्हात आणायचं आणि व्यायामात गुंतवायचं. एका जागी बसलेल्या ह्या गुळाच्या ढेपा हलल्याच पाहिजेत. बागेच्या गोल रिंगणात त्यांना पळवायचं. ” 

अरे पण महाभागा ती पोरं तयार होतील कां?

 कां नाही? त्यांचे बापही तयार होतील. पिझ्झापास्ता खाऊन ढेकर देणाऱ्यांना रींगणात पळवलेलं त्यांच्या आईबापांनाही नक्की आवडेल.

“अगदी बरोब्बर! मुलांना शिस्त लावणे त्यांना नाही जमलं, पण ते आपण जमवलं, आणि मी म्हणतो परस्पर पावणे बारा वाजले तर आईबाप कशाला विरोध करतील? उलट त्यांच्या ते पथ्यावरच पडेल. आपणचं सुरुवात करूया”

” बेस्ट आयडिया” आप्पा उत्साहाने उभे राहयले.

मिशीतल्या मिशीत हंसणाऱ्या कर्नल साहेबांच्या मनात आलं, होईल -होईल, दोस्तांना गुंतवण्याचा आपला प्रयोग नक्कीच यशस्वी होईल. त्यांच्याअंगात चैतन्याचं वारं सळसळायला लागलं.

आणि मग कर्नल पुढे सरसावून म्हणाले, “म्हणजे आयडिया नंबर एक पटलीय ना तुम्हाला? कापऱ्या हातांच्या टाळ्या खणखणीत वाजल्या आणि बेंबीच्या देठापासून, शाळकरी मुलांसारखा कोरस भरगच्च होकार दणदणला.

कोपऱ्यातून विशूभाऊंचा आवाज आला, “अरे त्या बालचमुंबरोबर आपणही कवायत करू या की! त्यांना लगोरी, विटी दांडू काकडी कोशिंबीर इत्यादी खेळ शिकवूया. पोरं दमली कंटाळली तर मामाच पत्र हरवलं, बटाटा शर्यत इत्यादी गंमतीशीर खेळात त्यांना आपण गुंगवूया. हे जुने मजेचे खेळ खेळताना बागेतल्या कुंदकळ्यांबरोबर या बाळ गोपाळांच्या हास्यकळ्याही उमलतील. “कोपऱ्यातल्या त्या आवाजाला टाळ्यांनी दणकून दाद दिली. आणि पेन्शनरांच्या घोळक्यातून दिलखुलास खोडकर हंसू बाहेर पडलं. कर्नलचा खणखणीत आवाज दणाणला, “सुनो यार! आता आयडिया नं. 2 ते आपलं, वर्तुळातलं, समोरचं फिरत मोफत वृत्तपत्र वाचनालय आहे ना! तिकडे आपल्याला आता वळायचय” 

“त्यात काय! रोजच आपण जातो की तिथे. ती तर आपली फेवरेट जागा आहे. जगातल्या उलाढाली, राजकीय गोष्टी, साहित्य, विज्ञान, तंत्रज्ञान याची बँक लुटायला. गप्पांचा फड संपल्यावर या आवडत्या अड्ड्याकडे आपण हमखास रोजच वळतोच की, कोवळ्या उन्हाची शाल पांघरून पेपर वाचायला का मज्जा येते राव!

त्या सुखकल्पनेतून मित्राला बाहेर काढत कर्नल म्हणाले, “सदुभाऊ पण या अड्डयावर आता आपण ह्या बाळगोपाळांना पण घेऊन जायचंय. “

काय सांगताय! पण येतील का ती पोर आपल्या म्हाताऱ्यांच्या बरोबर?

अहो येतील की, आपण त्यांचे प्रेमळ आजोबा होऊन त्यांची मोबाईल मधली मान वर्तमानपत्रात अडकवायची. असं बघा, अण्णांना वयामुळे दिसत नाही. ही छोटी मंडळी पेपर वाचून दाखवतील त्यांना.

मुलांना पण त्यामुळे स्पष्ट उच्चाराची, मराठी वाचायची, सामाजिक जबाबदारीची जाणीव होईल”.

रघुदादांनी अण्णांच्या पाठीवर थाप मारली. “अण्णा लेका दुहेरी फायदा होईल तुझा. त्या मुलांचा आणि त्यांच्या बापांचा पण फायदा होईल. ” 

“तो कसा काय?

असं बघ मोबाईलचं भूत मानगुटीवर बसल्यामुळे पोरांचं डोकं आणि डोळेही बिघडलेत. तासंतास स्क्रीन समोर बसल्याने पाठदुखी, मान दुखी, चिडचिडेपणाआणखी काही विकारांनी आकार घेतलाय.

 त्यांच्या विकासाचा कणाच मोडलाय रे!

त्यांना दुजोरा देत जोशीभाऊ म्हणाले, “वर्तमानपत्रात राजकारण, खेळ, अर्थशास्त्र एकाच ठिकाणी मिळेल त्यामुळे मेंदूला चालना मिळून मेमरी वाढते. शब्दसंग्रह वाढून ज्ञानात भर पडते. नियमित वाचनाची सवय लागून रिकामं मन सैतानाचं घर न बनता बुद्धीचा आगर होतं. ” 

इतका वेळ पेपर वाचणारे गजाभाऊ ओरडले “अरे ही बघा आजकी ताजी खबर, उत्तर प्रदेश सरकारने शाळांमधून हिंदी आणि इंग्रजी वर्तमानपत्रे उपलब्ध करून देण्याचा आणि प्रार्थनेच्या आधी दहा मिनिटे वृत्तपत्र वाचनाचा निर्णय घेतलाय. आणि जगभरातून ह्या निर्णयाचंशाळांतून स्वागतच झालय”

हे ऐकल्यावर कर्नल साहेबांनी आनंदाने आरोळीच ठोकली. “अरे मग आपणही हा निर्णय मान्य करून मराठी पेपर वाचन सुरू करूया. मुलांच्या जिभेला मातृभाषेचं वळण लाऊ. इंग्लिश मीडियम मुळे मराठी इंग्रजीची त्यांच्या बोलण्यात येणारी खिचडी तरी वाचेल. कर्नल साहेब बाकी तुमच्या पोतडीतल्या आयडिया भन्नाटचं असतात. उशीर कशाला! उद्याचाच मुहूर्त धरू.

बागेतल्या मारुती पुढे शकुनाचा नारळ फोडून, खोबऱ्याचा प्रसाद वाटून, कार्यक्रमाचा श्री गणेशा आत्ताच करूया.

कर्नल साहेबांनी पिल्लू सोडलं “मंडळी आता गुढीपाडवा जवळचं आलाय सगळ्या भाभीजींना माझा निरोप सांगा भरपूर मसाले भात करून आणायचा. कडुलिंबाच्या चटणीचा उतारा हवाच श्रीखंडपुरीची ऑर्डर देऊया. आणि साजरं करूया वनभोजन. उंच उंच गुडी बागेतच उभी करूया. मदतीला चिल्लीपिल्ली वानर सेना आपल्या हाताशी असेलच. अशाप्रकारे चैतन्य बागेत चैतन्य उसळलं. सगळ्यांनी ही कल्पना उचलून धरली आणि होकार भरला 

 मंडळी काय सांगू तुम्हाला! तेव्हांपासून दरवर्षी ह्या चैतन्य उद्यानात गुढीपाडवा साजरा केला जातो बागेत उंच उंच गुढी उभारली जाते. माळापताकांनी बाग सजवली जाते. हौशी पुरुष मंडळी सनई सुरू करतात आणि मग काय! त्या चैतन्य बागेत वनभोजन साजरं होतं. नववर्षाची अशी ही उत्साही आनंदी सुरुवात गुढीपाडव्यापासून सुरू झाली.

अशा प्रकारे कर्नल साहेबांचा उपक्रम पार पाडतांना सगळेच आनंदात असतात.

बायकोच्या वियोगाचं काही काळ का होईना वासुनाना दुःख विसरलेत. कारण बागेत रोज पेपरवाचन, कवायत पकडापकडी, पळणे, p. T. चा तास साजरा होतो. बाल मंडळींबरोबर हे ज्येष्ठही आता चिरतरुण झालेत. दुःख आणि दुखणं गोंजारायला त्यांना आता वेळच नाहीय्ये बरं का!

आणि हॊ ह्याचं सगळं श्रेय नक्कीच कर्नलसाहेबांनाच आहे. तर धन्यवाद कर्नल साहेब. मित्र-मैत्रिणींनो तुम्हांलाही गुढी पाडव्याच्या आत्तापासूनच शुभेच्छा.

धन्यवाद 

© सौ राधिका माजगावकर पंडित

पुणे – 51  

मो. 8451027554

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ सृजनाचे क्षण… भाग – २ ☆ उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

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☆ सृजनाचे क्षण… भाग – २ ☆ उज्ज्वला केळकर

आता ‘पांघरूण’कथेविषयी. याच क्रेशमधला एक मुलगा. त्याचं नाव मी ठेवलं ‘सर्जा’. सर्जाचं घर, मी, तळा-गाळातलं कुठलंही प्रतीनिधिक घर असेल, तसं रंगवलं. त्याची आई विड्या वळून संसार चालवणारी. म्हातारी, दमेकरी सासू, दोन भावंड, दिवसभर उनाडणारी, बाप रिक्षा चालवायचा पण सगळा पैसा बाई-बाटलीत उडवायचा. मनात येईल, तेव्हा बायकोच्या तोंडावर काही नोटा फेकायचा. तेवढंच त्याचं आपल्या संसाराबाबतचं कर्तव्य. ‘साल्या, भडव्या, रांडलेका’शिवाय बोलणं नाही. आईदेखील सदा करवादलेली.

आज क्रेशमध्ये चादरींचं वाटप होतं. त्यासाठी सगळ्या आयांना बोलावलं होतं. मी कथेत चादरींची केली ब्लॅंकेटस्. नाना रंगांची आकर्षक ब्लॅंकेटस्. आपल्याला कोणत्या रंगाचं ब्लॅंकेट मिळेल? तो विचार करायचा. त्याला लाल ब्लॅंकेट मिळालं होतं. त्याचा जर्मनीतला भाऊ डेव्हीड सारखंच. सर्जा अतिशय उत्तेजित झाला होता. त्याला आज जेवण-खाण काही सुचत नव्हतं. त्याने घरी आल्या आल्या आपल्या भावंडांना बोलावलं आणि सगळे ते ऊबदार ब्लॅंकेट पांघरून झोपून गेले.

सर्जाचा बाप दारू पिऊन घरी येतो. आज त्याच्या खिशात दमड्या नसल्यामुळे त्याला बाईकडे जाता आलेलं नाहीये. तो अस्वस्थ आहे. घरी येताच त्याचा पाय त्या नव्या ब्लॅंकेटमध्ये अडकतो. तो खाली पडतो. उठता उठता त्याचे लक्ष एकदम त्या आकर्षक ब्लॅंकेटकडे जाते. त्याच्या डोक्यात वीज चमकते. हे ब्लॅंकेटच आज तिला द्यावं. ती एकदम खूश होऊन जाईल. अशी चिकटेल, लई मजा येईल. तो सर्जाच्या अंगावरचे ब्लॅंकेट ओढू लागतो. ‘ब्लॅंकेट दे’ म्हणतो. सर्जा म्हणतो, ‘माझ्या जर्मनीतल्या बापाने माझ्यासाठी पाठवले आहे. मी देणार नाही. ’

‘तुझ्या जर्मनीतल्या बापाकडेच निघून जा, ‘ असं म्हणत सर्जाचा बाप ते ब्लॅंकेट हिसकावून निघून जातो. पाठीमागच्या सीटवर ब्लॅंकेट ठेवून तो रिक्षा सुरू करतो.

सर्जा रडत राहतो. त्याच्या अश्रूभरल्या डोळ्यासमोर येतं, ते फोटोतल्या ज्यो बाबांचे उबदार घर. त्याला अधीकच उघड्यावर पडल्यासारखं वाटतं. रडत रडत तो आपल्या आईच्या मांडीवर डोकं ठेवतो. आई आपल्या फाटक्या धडुत्याचा पदर त्याच्या अंगावर सरकवते…इथे कथा संपते.

तर अशा अनेक कथांमागच्या कथा सांगता येतील. अनेकदा प्रत्यक्ष अनुभव न घेता मानसिक अनुभवावरही मी कथा लिहिल्या आहेत. जे सुचलं, ते एकदा कागदावर उतरलं, की तृप्तता येते. समाधान वाटतं. आनंद होतो. तरीही मी, काही जण म्हणतात, त्याप्रमाणे असं म्हणणार नाही, की मी ‘स्वान्त सुखाय’ लिहिते. ‘स्वान्त सुखाय’च जर लिहायचं असेल, तर छापायला पाठवायचा खटाटोप कशाला करायचा? मला जे वाटतं, भावतं, ते तसं इतरांनाही भावतं, आवडतं का? हे मला समजून घ्यावसं वाटतं, त्यांच्या प्रतिक्रिया समजून घ्याव्यात, त्यातून काही नवीन शिकायला मिळेल का, हेही बघावं, असं वाटतं म्हणून मी लिहिते आणि छापायलाही देते.

अनेक जण अर्थप्राप्तीसाठी लिहितात. नावलौकिक मिळावा म्हणूनही लिहितात. मागणी तसा पुरवठा करणारीही काही लेखक मंडळी आहेत. संपादक, प्रकाशक, प्रायोजक यांनी सांगितलं, म्हणून लिहिणारीही काही लेखक मंडळी आहेत. इतरांचं कशाला? मी माझंच एक उदाहरण सांगते. सांगली आकाशवाणीच्या नाट्यविभागाने एकदा मला सांगितलं, जागतिक आरोग्यादिनाच्या निमित्ताने ‘फास्ट फूड’ या विषयावर तुम्ही नभोनाट्य लिहा. ठाशीव, साचेबंद विचार – फास्ट फूडचे फायदे-तोटे इ. बद्दल मला लिहावेसे वाटत नव्हते. या शब्दाभोवती विचार करता करता ‘फास्ट फूड’ संकल्पनेच्या नाना परी मला सुचल्या. बाजारात मिळणारं नेहमीचं फास्ट फूड, दहा दिवसात दहावी विज्ञान, भूगोल, इ. ‘इंटलेक्चुअल फास्ट फूड, ’ ‘कल्चरल फास्ट फूड’, ‘जेनेटिक फास्ट फूड’ (९ महिन्यांऐवजी ९ आठवड्यात बाई बाळंतीण व्हावी, म्हणून संशोधन) वगैरे… फॅँटसीच्या अंगाने मी हे नभोनाट्य लिहिले. ते अनेकांना आवडलेही. माझ्याकडे वरील विषयाची मागणी झाली नसती, तर मी हे नभोनाट्य वा नंतर याचीच केलेली कथा मुळीच लिहिली नसती. म्हणजे हा विषय मला सुचलाच नसता. माझी एकूण ५ नभोनाटये, व १००च्या वर ‘प्रतिबिंब’ शीर्षकाखालील कौटुंबिक श्रुतिका प्रसारित झाल्या आहेत.

सांगली आकाशवाणीच्या नाट्यविभागाने माझ्याकडून ‘एड्स्’ या विषयावरही सांगून नभोनाट्य लिहून घेतले. त्या विषयावरही मागणी नसती, तर मी नाटक, कथा लिहिली नसती.

एकदा एका मुलाखतीत कुणी तरी मला माझ्या लेखन प्रवासाविषयी विचारले. मग मीही त्याचा मागोवा घेऊ लागले. मला आठवतं, मी आठवीत असताना पहिली कविता लिहिली. त्यावेळी गोवा मुक्तिसंग्राम अगदी शिखरावर होता. रोज नव्या बातम्या. त्यावर चर्चा वगैरे… एक दिवस बातमी आली, या संग्रामातले शिलेदार हेमंत सोमण रस्त्यातून तिरंगा घेऊन चालत असताना पोर्तुगीज सैनिकाने त्यांना गोळी घातली. ते शहीद झाले. सर्वांना वाईट वाटलं. त्या दिवशी कशी कोण जाणे, मला कविता सुचली,

‘ हेमंत सोमणांनी गोव्यात झेंडा रोविला.

तडतडा तडकले पोर्तुगीज झेंडा त्यांनी पाहिला ‘ यानंतर ओळींवर ओळी… ते हुतात्मा झाले इथपर्यंतच्या. सगळ्यांनी कवितेचे कौतुक केले. पण दुसर्‍या दिवशी बातमी आली, त्यांना गोळी मारली नाही. त्यांना तुरुंगात टाकले. बातमी चांगलीच होती. आम्ही आनंदोत्सव साजरा केला. झाले ते चांगलेच झाले, पण माझी बिच्चारी कविता मात्र शहीद झाली. त्यानंतर शाळेत फारशी काही कवितेच्या वाटेला गेले नाही. नाही म्हणायला ११वीच्या निरोप समारंभाच्या वेळी एक कविता करून म्हंटलेली आठवते.

कॉलेजमध्ये असताना मला कवितेत रस असणार्‍या, कविता करणार्‍या मैत्रिणी मिळाल्या. आणि मीही उत्साहाने कविता करू लागले. हळू हळू वैचारिक, ललित लेखनही सुरू झालं. अभ्यासाचा सराव म्हणून असेल, मी कविता, कथा, पुस्तके यांची समीक्षाही करू लागले.

माझं लग्न झालं आणि मी सांगलीजवळील माधवनगरसारख्या खेड्यात एकत्र कुटुंबात राहू लागले. पुढे दोन-तीन वर्षे घरात काम काम आणि कामच. काही नवीन सुचायला आणि विचार करायला वाव आणि वेळच नव्हता. माझे लेखन थांबलेच जसे. नाही म्हणायला किरकोळ कविता अधून –मधून लिहिल्या जात. त्या जाणणार्‍या आणि कविता लिहिणार्‍याही काही जेष्ठ कवयित्री तिथे मला मिळाल्या. महिला मंडळाच्या ‘वंदना’ या हस्तलिखित वार्षीकाच्या संपादनाचेही काम तिथे मी केले.

पुढे १९७० साली मला सांगलीच्या डी. एड. कॉलेजमध्ये अध्यापनाची नोकरी लागली. तिथे अनेक विद्यार्थिंनींशी संबंध आला. त्यांच्या नाना कथा आणि व्यथा मला कळल्या, पण तरीही मी कथेच्या वाटेकडे वळले नव्हते. बाकीचे लेखन मात्र पूर्ववत चालू होते. या काळात माझे अनुभवविश्वही विस्तारले. मला लेखनाला नवनवे विषय सुचले. तरीही या काळात माझे प्रामुख्याने लेखन हे कॉलेजचे सांस्कृतिक कार्यक्रम बसवण्यासाठी झालं.

माझं कथालेखन त्या मानाने उशिरा सुरू झालं. त्याला कारणही तसंच घडलं. मला लग्नानंतर दहा वर्षाने मुलगा झाला. तोपर्यंत मुलाची (मुलगा किंवा मुलगी) वाट पाहून आम्ही अनाथाश्रमातून मूल दत्तक घ्यायचे ठरवले होते. त्यासाठी फॉर्म भरणे वगैरे चालू केले होते आणि अचानक मला दिवस गेल्याचे लक्षात आले. नंतर माझ्या मनात आलं, जर मी आधी मूल दत्तक घेतलं असतं आणि नंतर मला स्वत:चं मूल झालं असतं, तर घरातली, नात्यातली, शेजारची त्याच्याशी कशी वागली असती? यातून मला ‘परक्याचं पोर’ हे कथा सुचली. बाळंतीण असतानाच मी ती लिहिली. ही माझी पहिली वाहिली कथा. ती खूप गाजली. मला अनेक खुषीपत्रे आली. त्यानंतर मी बर्‍याच कथा लिहिल्या. त्याही गाजल्या. माझे ५ कथासंग्रह प्रकाशित आहेत. १. कृष्णस्पर्श २. धुक्यातील वाट ३. झाले मोकळे आकाश ४. फास्ट फूड ५. पाचा उत्तरी सफल संपूर्ण. माझे २ कविता संग्रह आहेत. १. चंद्रपालखीची वाट २. मृगजळाकाठी. एक भौगोलिक पुस्तक आहे. ‘भारतीय नद्यांची ओळख. ’ यात भारतातील मुख्य नद्या व त्यांना मिळणार्‍या ३-४ महत्वाच्या उपनद्या यांची भौगोलिक व सांस्कृतिक महिती दिली आहे.

याशिवाय माझी बालवाङ्मयाची ३०-३२ पुस्तके प्रकाशित आहेत. त्यात कथा, कविता, नाटिका, चरित्र इ. प्रकारच्या पुस्तकांचा समावेश आहे. माझ्या काही कथांचा हिंदीत, तर तुरळकपणे उडिया, तेलुगु, कन्नडमध्ये अनुवाद झाले आहेत. मला माझ्या एकंदर लेखनासाठी, बालवाङ्मयाच्या ३ पुस्तकांसाठी, २ अनुवादीत पुस्तकांसाठी पुरस्कार मिळाले आहेत. तसेच मला जालंदर येथे पंजाब कला साहित्य अ‍ॅकॅडमीचा विशेष पुरस्कार प्राप्त झाला आहे. त्याचप्रमाणे मला कोटा येथे ‘शब्दसरोज सन्मान’, व जबलपूर येथे ‘डॉ. श्रीराम दादा ठाकूर संस्कारधानी सन्मान’ मिळाला आहे. पण महाराष्ट्राबाहेरचे हे पुरस्कार सन्मान मला माझ्या अनुवादित साहित्यासाठी मिळाले आहेत.

अनुवादीत साहित्य हा माझ्या लेखनाचा आणखी एक टप्पा. मला अनुवादित साहित्य वाचायला आवडतं आणि अनुवाद करायलाही आवडतो. अनुवाद म्हणजे केवळ एका भाषेतील शब्दाला, दुसर्‍या भाषेतील प्रतिशब्द देणे नव्हे. ते झाले भाषांतर. अनुवाद हीदेखील पुनर्निर्मिती असते. अनुसृजन असंही काही लोक त्याला म्हणतात. तो शब्द मला फार आवडतो. तर मी अनुवाद करते म्हणजे पुनर्निर्मिती किंवा अनुसृजन करते.

मी फक्त हिन्दी भाषेतील साहित्याचा अनुवाद करते. अनुवादामुळे, वेगवेगळे प्रदेश, तिथला परिसर, वातावरण, लोकजीवन, लोकसंस्कृती, त्यांचे रीतिरिवाज, त्यांची जीवनदृष्टी कळून येते. नवीन ज्ञान होतं. त्याचबरोबर हेही कळतं, की जीवनपद्धती वेगवेगळी असली, तरी संस्कृतीचा अंत:स्त्रोत एकच आहे. मी आत्तापर्यंत, मोहनलाल गुप्ता, प्रतिमा वर्मा, सूर्यबाला, मधु कांकरीया, भगवान वैद्य ‘प्रखर’, सुशांत सुप्रिय, गिरिमा घारेखान, हंसा दीप, इ. लेखकांच्या कथांचा अनुवाद केला आहे. रेत में खोयी नदी, संघर्ष, गोरा, गोदान इ. कादंबर्‍यांचा अनुवाद केला आहे. माझे ७ अनुवादित लघुकथा संग्रह प्रकाशित आहेत. हरीशंकर परसाई, घनश्याम अग्रवाल यांच्या व्यंग्य लेखनाचाही मी अनुवाद केला आहे. सरश्री तेजपारखी, स्वामी विवेकानंद यांच्या तत्वज्ञानात्मक पुस्तकांचाही मी अनुवाद केला आहे. माझ्या अनुवादीत पुस्तकांची संख्या ३५ च्या वर आहे. काही पुस्तके छापली जाण्याची वाट बघत प्रकाशकांच्या रांगेत उभी आहेत.

अभिमन्यू जसा चक्रव्यूहात शिरला आणि आत आतच जात राहिला, तसेच माझे अनुवादाच्या बाबतीत झाले आहे. मी एकदा अनुवादात घुसले, ती त्यातच गुरफटत गेले. माझे स्वत:चे लेखन बाजूलाच पडले. पण मला यातही आनंद मिळाला. अगदी नवनिर्मिती केल्याचा आनंद. तर असे हे माझे काही सृजनाचे क्षण, जे मला आनंद, समाधान, तृप्ती देऊन गेले. आपल्या सगळ्यांना ते सांगावेसे वाटले, म्हणून हा लेखन प्रपंच.

— समाप्त —

©  उज्ज्वला केळकर 

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈ संस्थापक संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ तेथे काळजीचे काय काम!! ☆ श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) ☆

श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) 

? मनमंजुषेतून ?

☆ तेथे काळजीचे काय काम!! ☆ श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) 

*अनेक वर्षांपूर्वीची कथा. एका जनपदाचा (त्यावेळी राज्यांना जनपद म्हटले जायचे…) राजपुत्र आपल्या असामान्य कर्तृत्वाने राजाधिराज झाला…! *

नव्हे…!!

*विश्वविख्यात झाला..!!! “*

नव्हे…!

*युगयुगांवर त्याने आपले नाव कोरले…!! “*

… *लौकिक अर्थाने त्याने आई वडिलांची आज्ञा पाळली. आपल्या गुरूंची आज्ञा पाळली. त्यांच्या प्राणप्रिय पत्नीला जेव्हा राक्षसाने फसवून पळवून नेले, तेव्हा त्याने उपलब्ध मनुष्यबळ, साधनसामग्रीच्या आधारे राक्षसाचा वध केला…! दुसऱ्याच्या राज्याचा मोह न करता, त्याच्या भावाला राज्याभिषेक करून हा स्वर्गाहून प्रिय असणाऱ्या आपल्या मातृभूमीत परत आला…!! *

– – *यात त्याने कायम “प्रतिसाद” देण्याचा आटोकाट प्रयत्न केला. * 

आपल्या मनात जे आहे तेच मी इथे लिहिले आहे…

*प्रत्येकाला “नर ते नारायण” अर्थात “राम ते प्रभू श्रीराम” असा प्रवास करण्याचा मूलभूत अधिकार भारतीय संस्कृती आपल्याला देत आली आहे…! “*

रामचरित्र जितके गाऊ तितके कमीच आहे…!

आज सर्वसामान्य माणसं एक तक्रार करीत असतात की कशातच राम राहिलेला नाही, त्यावेळी रामाची कथा प्रकर्षांने आठवते आणि ती कथा आपल्याला सांगते की जोपर्यंत रामकथा या भूमीवर जोपर्यंत ऐकली जाते, गायली जाते, सांगितली जाते, तोपर्यंत इथल्या कणकणात राम आहे…! आपण त्याचे स्मरण करून आपले विहित कर्तव्य पार पाडण्याचा प्रयत्न केला तर तो आपल्या सोबत असेल…

कारण…

कर्तव्य म्हणजे राम

बांधिलकी म्हणजे राम

समर्पण म्हणजे राम

निराश होण्याचे, तक्रार करण्याचे काहीच कारण नाही…

श्रीसद्गुरू ब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराज सांगतात त्याप्रमाणे आजपासून आपण *”मुखी नाम | हाती प्रपंचाचे काम ||”* हे सूत्र अंगीकारण्याचा प्रयत्न करू.

– – *”जेथे आहे रामनाम |*

 *तेथे काळजीचे काय काम ||”*

श्रीराम जयराम जयजयराम

© श्री संदीप सुंकले (दासचैतन्य)

मो. 8380019676

 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर

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