हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

☆ लघु उपन्यास  ☆ बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

मेरे महान देश का एक गौरवशाली प्रांत।

उसी प्रांत में, पर्वतों से घिरा एक खूबसूरत-सा शहर।

शहर से थोड़ा हट कर, एक तंग, बलखाती नहर के किनारे बसा, ऊंचा-नीचा-सा गांव।

उसी गांव की सीमा से थोड़ा इधर, एक बड़ा कारख़ाना।

बड़े कारख़ाने में कार्यरत, दो-ढाई हज़ार रंगबिरंगे कर्मचारी और अधिकारी।

उन कर्मचारियों और अधिकारियों के, सपरिवार रिहाइश के लिये, चार वर्ग-किलोमीटर में फैली,

फैक्टरी-एस्टेट।

उसी एस्टेट के तीन भागः-

एक ओर, बैंगलो एरिया, केवल राजपत्रित अधिकारियों के लिये।

दूसरे कोने पर, वर्कर काॅलोनी और कुली कैम्प, साधारण कामगार, मज़दूरों आदि के लिये।

उन दोनों के मध्य, स्टाफ़-क्वार्टर्स, दो पाटों के बीच, लगातार पिसने वाले सुपरवाइज़रों के लिये…

≡ एक ≡

आशी की झुंझलाहट देख, हँसी आने को होती है। किंतु हँस पड़ना मज़ाक नहीं, क्योंकि मेरे बिना हँसे ही कह डालती है।

“कितनी बुरी बात है!”

उस तड़प में, एक कृत्रिम सी-पीड़ा हो जैसे!

मैं गम्भीर और अनमना-सा उसकी ओर ताकता रहता हूं। फिर पूछ ही लेता हूं, “क्या बुरी बात है मैडम?”

“मैडम-वैडम कुछ नहीं! जल्दी से उठ कर नहा लीजिये, वरना नाश्ते से हाथ धो बैठेंगे।”

“मैं दरअसल, एक बात सोच रहा था।” मैं कुछ कहने लगता हूं, मगर वह मुझे बीच में ही टोक कर कहती है, ”सिर्फ़ एक बात?…

बाई दि वे, आप सुबह से इस नेक काम सोचने के अलावा कर ही क्या रहे हैं? भई, छुट्टी का यह मतलब तो नहीं, कि आदमी दिन भर बिस्तर में पड़ा सोचता ही रहे। उसे उठकर कुछ तो करना ही चाहिये।”

मैं मुस्करा कर कह देता हूं, ”जब तुम अपनी बातचीत मंे, चाहिये शब्द का प्रयोग करती हो, तो जिस को कुछ भी पता न हो, उसे भी मालूम पड़ जाता है, कि तुम एक लेडी टीचर हो!”

मेरी बात सुनकर वह हँसती हुई एक निर्णय-सा सुना देती है, ”साढ़े ग्यारह तो हो ही गये। अब नाश्ते की बात भुलाकर, सीधे लंच की ही चिंता करूं। आप आराम से पड़े, अपने सोचने के कार्यक्रम को जारी रखिये। कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा… अब मेरी तरफ़ ऐसे मत देखिये, चाय का एक कप और बना लाती हूं।”

काफी दिन, बल्कि कहना चाहिये, कई वर्ष बाद, अर्चना का पत्र मिला है। इस दौरान, कितनी ही घटनाएं घट गई। कुछ मेरे साथ, जो अच्छी तरह मालूम हैं। कुछ उधर, जिन के बारे में बहुत कम मालूम है।

पत्र उठा कर, फिर पढ़ने लगता हूं… मैं कितने दिनों से आपको पत्र लिखने की सोच रही थी। लिखा भी कई बार। किंतु हर बार, पत्र अधूरा ही रहा और चिथड़े होकर, हवा में उड़ता हुआ, जाने कहां जा पहंुचा। मगर आज तो निश्चय कर के ही बैठी हूं। इस पत्र को पूरा करने के बाद, आज ही डाक के हवाले कर देना है… मैं भी कितनी स्वार्थी हूं! यह निर्णय पहले भी तो ले सकती थी। स्वार्थी शायद हूं ही! सीधे-सीधे ही लिख दूं, कि अरूणा के विवाह की तिथि निश्चित हो गई है। लड़का इंजीनियर है। स्वभाव का हँसमुख है। घर में अन्य सभी भी अच्छे स्वभाव के हैं। सबसे बड़ी बात यह है, कि लेन-देन का कोई भी चक्क्र नहीं… अगले महीने की सोलह में, दिन ही कितने रह गये! आप ही सोचिये, कैसे कर पाउंगी मैं यह सब? क्या यह संभव है, मुझ अकेली के लिये? मां, बाबू जी, सभी का काम, मुझे ही तो देखना होगा। मगर अनिल भइया, उनके स्थान पर तो आप ही को खड़ा होना होगा… मैं आप पर कोई बोझ नहीं डालूंगी और न कोई उलझन ही होगी। बस, आप इस मौक़े पर पहुंच ज़रूर जाना, वरना लोग कहेंगे, इन बेचारी अभागी लड़कियों का कोई भी अपना नहीं… एक बात और… अकेले नहीें आना… अर्चना।

चाय का प्याला लिये, वह फिर सामने मौजूद है और कह रही है, ”पत्र को बार बार और लापरवाही से पढ़ने के बजाये, एक ही बार जो ढंग से पढ़ लिया जाये!”

मैं उसकी बात का उत्तर न देकर, प्याला थाम लेता हूं।

चाय बहुत गरम है। घंूट भरते ही, तालू जल गया है। बिल्कुल उसी तरह, जैसे उस दिन अरूणा हलवे की प्लेट लेकर आई थी और…

अरूणा का विवाह हो जायेगा। मगर अर्चना? और वह मीता? मीता के अंकल?… सफ़ेद साड़ी में लिपटी और नंगे फ़र्श पर सीधी लेटी आंटी… उस बडे़े अफ़सर की बड़ी सी कोठी…

भयानक शोर… मशाीनों की निरंतर खड़खड़ाहट… कारीगर और मिस्त्री लोगों की हठधर्मी और अश्लील मज़ाक… यूनियन वालों के मज़दूर एकता और इन्क़्लाब जिं़दाबाद के बुलंद होते नारे… बड़े साहब के अजीबो-ग़रीब आदेश और छोटे साहब के जान लेवा अन्दाज़… एक एक दिन का अवकाश स्वीकृत कराने के लिये, घंटों चलते तकरार… यह अब तक क्यों नहीं हुआ? और वह काम कब तक पूरा होगा?… आप लोग कुछ करते क्यों नहीं? आप लोग तो किसी भी लायक़ नहीं!

उस दिन, लोक राम सामने आ खड़ा हुआ था। उसके इस तरह आने का अकसर एक ही अर्थ होता था।

“फिर बुलाया है?” मैंने जानते हुए भी पूछा।

“जी, फ़ौरन पहुंचने को कहा है।”

“कोई ख़ास बात?”

“बात तो नहीं मालूम। मगर मूड क़ाफ़ी ख़राब लगता है। दो-तीन को अभी-अभी झाड़ चुके हैं।”

मैं रजिस्टर छोड़, उठ खड़ा हुआ। कैबिन से बाहर निकला। लगभग सभी मशीनें चल रही थीं। किंतु कितने ही वर्कर अपनी मशीनें चलती छोड़ और चार-चार पांच-पांच के झंुड बना कर, गप्पों में व्यस्त थे। मुझे आता देख, उन की गतिविधयों में कोई भी व्यवधान नहीें पड़ा। केवल तीन चार ही, अपनी मशीनों के पास जा खड़े हुए।

तभी, अनिल, अपनी मशाीन बंद करके, ज्यूट से हाथ पोंछता हुआ मेरी ओर लपकता-सा आया और बोला, ”ऐसे तो काम नहीं चलेगा।”

मालूम था, मैं इस समय ज़रा सा भी रूक गया, तो कुछ अन्य वर्कर यहीं आ पहुंचेंगे। तब आध पौन घंटे से पहले तो क्या ही छूट पाउंगा!

अतः चलते-चलते ही कहा, ”मुझे मैनेजर साहब ने बुलाया है, लौटकर तुम्हारी बात सुनूंगा।”

मैनेजर, अर्थात नरेन्द्र मोहन के सामने, चार अधीनस्थ अधिकारी, अपराधियोें की तरह, सिर झुकाये खड़े थे। सामने खाली पड़ी कुर्सियों पर, शायद किसी को भी, बैठने का साहस नहींे हो पाया था। संभवतः ये सभी महानुभाव, सामने तन कर बैठे मैनेजर से, अच्छी खासी झाड़ खा चुके थे।

”ठीक है, आप लोग तशरीफ़ ले जा सकते हैं।” नरेन्द्र मोहन ने, एक ही बार में, हाथ हिलाकर, उन्हें विदा कर दिया।

अब मेरी बारी थी। उसने मुझे, ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर तक देखा। जैसे, वह अजायबघर में रखी कोई विशेष चीज़, पहली बार देख, चकित हुआ जा रहा हो।

“कहिये श्रीमान! कैसे तकलीफ़ की?”

“सर, आपने मुझे बुलाया था।”

“ओह!” उसकी वाणी में चिरपरिचित कटुता और व्यंग्य की मिली जुली झलक थी।

“आपके फ़ोरमैन साहब आये हैं, या आज भी अपने दौलत-ख़ाना पर पड़े, आराम फ़रमा रहे हैं?”

“सर, उनकी चोट, अभी तक ठीक नहीं हुई।”

“हां… और आप की चोट? सुना है, चोट खाने में आप भी काफ़ी माहिर हैं।”

“नहीं सर, मुझे तो कोई चोट नहीं लगी।”

“ख़ैर, नहीं लगी, तो लग जायेगी। हां, यह बताइये, मैंने जो पचपन जाॅब बनाने के लिये कहा था, बन गये?”

“वे तो नहीं बने सर।”

“क्यों…? कब तक बन पायेंगे?”

“सर, अभी तो वे शुरू भी नहीं किये गये।”

“क्या…?” वह बुरी तरह गुर्राया।

“सर, जितने काम इस वक़्त मशीनों पर चढ़े हैं, सभी अर्जेंट हैं। उनमें से किसी को भी, दो दिन तक, मशीन से उतारना पाॅसिबल नहीं। फोरमैन साहब ने यही कहा था सर।”

“समझ में नहीं आता, आप को किस अक़्लमंद ने सुपरवाइज़र बना दिया!”

“सर, वोह…।”

“नो… नो आर्गूमेंट्स! मैं कुछ नहीं जानता, शाम तक वे पचपन काम बन जाने चाहिये! समझे?”

“सर, कौन सा काम बंद करा दूं?”

“यह मुझे बताना पड़ेगा? मिस्टर, नौकरी करनी है, तो ठीक से करो, वरना… तुम्हारी ए0 सी0 आर0 अभी गई नहीं, यहीं रखी है मेरे पास!”

मैनेजर नरेन्द्रमोहन ने ए0 सी0 आर0 ख़राब करने की फिर धमकी दी थी। उसके द्धारा, एक-दो उल्टे सीधे शब्द लिख देने से ही, मेरा कैरियर तबाह हो सकता था… नाॅट रिलाइवल… प्रमोशन, नाॅट येट आदि कुछ भी लिख देना मामला चैपट करने के लिये पर्याप्त था।

बहुत पहले से ही, वह मुझ से चिड़ा हुआ था। तभी से, जब मैं नौकरी के लिये, इस संस्थान में टेस्ट देने के लिये आया था। वह उस समय एसिसटेंट मैनेजर के पद पर था। उसी ने हम बत्तीस मेें से, पांच को चुनना था।

सुबह से शाम पांच बजे तक, उसने हमें यों ही धूप में बिठाये रखा। फिर कहा, ”आप लोग कल आइये।”

चलने लगे, तो हमें रोक कर, वह बहुत ही धीमी आवाज़ और राज़दारी के लहज़े मेें कहने लगा, ”देखो, कल आप लोगों को प्रेक्टिकल टेस्ट के लिये, एक जाॅब बनाने को दिया जायेगा। जो काम बनाना है, उसकी ड्राइंग भी आपको दे दी जायेगी। ड्राइंग को अच्छी तरह देख कर फ़ैसला कर लेना। सोच लेना, उस जाॅब को तुम बना भी सकते हो या नहींे। ऐसा न हो, कि मशीन ही तोड़ डालो। चलो, मशीन की भी कोई बात नहीं, अपना हाथ पैर कटवा लिया, तो हमारे लिये भी आफ़त खड़ी हो जायेगी। वैसे भी, अगर कुछ काम आता जाता न होगा, तो अपना कीमती वक्त बरबाद करोगे और हमें अलग परेशान करोगे!”

उसने यह बात, पान चबाते हुए, कुछ ऐसे ढंग से कही, कि अगले दिन, बत्तीस में से, केवल पंद्रह लड़के, टेस्ट के लिये पहुंचे।

कच्चे इस्पात का एक-एक टुकड़ा और रेती, सभी उम्मीदवारों को थमा दिया गया और कहा गया, कि धातु को शिकंजे में कस कर और सीधी रेती चला कर, प्रत्येक ओर से 90० के पक्के कोण बनाते हुए, दो इंच का घन तैयार करना है।

हम सभी, रेतियां चलाने लगे। पांच-सात मिनट ही हुए थे। कि वह आ पहुंचा और आंखें फैला कर बोला, ”वाह! क्या बात है! यह फ़ाइलिंग हो रही है? कहां से सीख कर आये आप लोग फ़ाइल चलाना?”

सभी उम्मीदवार पसीने में भीग गये और एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।

“देखो, मैं बताता हूं, फ़ाइल कैसे चलाई जाती है।” इतना कह कर, उसने एक लड़के के हाथ से रेती पकड़ ली। उसका हैंडिल घुमा कर दूसरी ओर किया और उल्टी रेती चलाने लगा।

”कुछ समझे?… ऐसे चलाओ फ़ाइल।”

वह गम्भीर लग रहा था। किंतु मुझे, मेरे एक परिचित ने पहले ही समझा रखा था, कि वह मैनेजर, सीधे लोगों को उल्टी दिशा दिखाने में निपुण हैं। उसने जिससे कुछ लिया दिया होता है, वह उसे पहले ही होशियार कर देता है और शेष सभी को, उल्टे रास्ते पर घुमा देता है।

चुनांचे, मुझे और एक अन्य लड़के के अलावा, सभी उल्टी रेतियां चलाने लगे। दो मिनट के तमाशे के बाद ही, वह ऊंची आवाज़ में बोला, ”गुड! वेरी गुड! ये तेरह लड़के वाक़ई बहुत क़ाबिल हैं। मगर इनकी योग्यता के मुताबिक़, इस फैक्टरी में तो कोई भी काम नहीं है। इन्हें कहीं और जाकर, किसी बड़ी पोस्ट के लिये कोशिश करनी चाहिये।”

फिर उसने दरबान को बुला कर आदेश दिया, ”इन तेरह शरीफ़ आदमियों को साथ ले जाकर, परले गेट तक पहुंचा दो।”

तब, हम दो लड़के ही, पूरे लाॅट में से नौकरी पर लिये गये थे। किंतु उस समय, मैंने उल्टी रेती क्यों नहीं चलाई थी, वह इसी बात पर चकित और अप्रसन्न था।

उसके बाद भी, जब मैंने वर्कर से सुपरवाइज़र बनने के लिय परीक्षा में बैठना चाहा, तब उसने तमाशा दिखाया था।

“आप को यह किसने नेक राय दी सुपरवाइज़र बनने का सपना देखने की?”

”सर, राय तो किसी ने नहीं दी। दूसरे लड़के आवेदन दे रहे थे, मैंने भी दे दिया।”

“मतलब, आप सिर्फ़ भेड़चाल में शामिल हुए। अपने दिमाग़ से बिल्कुल काम नहीं लिया!”

”सर, मैं तो…।”

“देखो, तुम्हारे भले के लिये कह रहा हूं… उस बाबूगिरी के काम में कुछ नहीं रखा। अब तक यहां जितना काम सीखा है। कुर्सी पर बैठकर, सभी भूल जाओगे। मेरी मानो, तो जाकर अपनी एप्लीकेशन वापिस ले लो।”

अच्छा यही हुआ, कि वह उस दौरान, एक महीने की छुट्टी पर चला गया और उसकी अनुपस्थिति में, मैं बड़ी आसानी से, सुपरवाइज़र चुन लिया गया।

किंतु उसके बाद भी उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वह सड़क पर चलते-चलते ही, मुझे रोक लेता और शुरू हो जाता… कितने साल हो गये, फैक्टरी में काम करते? बताइये तो, माइक्रोमीटर में कितनी चूड़ियां होती हैं?… हाइटगेज क्या बला होती है?… पिच और लीड में क्या फ़र्क होता है? इन्टरलाॅकिंग कटर किस काम आते हैं? चूड़ियां काटने के लिये, गियर का सेट कैसे चुना जाता है? आप्टिकल पाय कैसे तैयार किया जाता है?

बहुत दिन बाद पता चला, कि वह इस प्रकार मुझे ही नहीं, अपितु बहुत से ऐसे लोगों को, जिन्हें वह नापसंद करता था, परेशान करता ही रहता था। जब तक कि सामने खड़ा व्यक्ति, पूरी तरह नर्वस होकर हथियार न डाल दे, वह प्र्रश्न पर प्रश्न दाग़ता ही चला जाता था और वह उस व्यक्ति को बार बार एहसास दिलाये जाता, कि वह महज़ एक नाकारा गधा है, जो फैक्टरी से मुफ़्त का वेतन बटोर कर, पूरे राष्ट्र को हानि पहुंचा रहा है!

मैं वर्कशाप में लौट कर आया, तो देखा, एक सौ चार में से, केवल तीस-बत्तीस मशीनों पर ही वर्कर काम कर रहे हैं। शेष सभी, संभवतः फ़ोरमैन साहब के अवकाश पर होने का जशन मना रहे थे।

सोहन लाल टर्नर, एक बहुत अच्छा और अनुभवी कारीगर था। वह वर्कर लोगों के बीच, ‘उस्ताद’ के रूतबे से पूजा जाता था। इस समय वह भी, अपनी मशीन छोड़, दस-बारह शार्गिदों की टोली के दरम्यान खड़ा, शेरो शायरी में मशग़ूल था।

मुझे समीप आते देख, कुछ वर्कर खिसकने लगे। किंतु उस्ताद ने उन्हें हाथ के संकेत से रोक लिया और अपने चेहरे पर शानदार क़िस्म की मुंस्कराहट लाकर, मुझे सम्बोधित करते हुए बोला, ”लीजिये साहब, आप भी एक ताज़ातरीं शेर मलाहिज़ा फ़रमाइये। अर्ज़ किया है, किः-

बस एक ही उल्लू काफ़ी था बरबाद गुलिस्तां करने को

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा

मैंने उसकी लम्बी मंूछों की ओर देखते हुए पूछा, ”यह शेर आपने लिखा है? मैंने तो इसे थोड़े दिन पहले, एक मुशायरे में सुना था।”

वह मुस्करा कर बोला, ”किसी ने चुरा लिया होगा!”

मैंने जलभुन कर कहा, ”बाई दि वे, आप की शेरोशायरी का यह दौर कब तक चलेगा?”

“बस, कैन्टीन से चाय आने ही वाली है। उसके बाद तो आप जानते ही हैं, मशीन होगी और हम होंगे।”

मैंने कहा, ”एक बात नोट कर लीजिये। आज शाम तक, वे पचपन स्क्रू, नई ड्राइंग के हिसाब से हर हालत में बन जाने चाहिये।”

“शाम तक?… न बन सकेें, तो?” उसने मुंह बना कर पूछा।

“तब मैनेजर एन0 मोहन साहब, अपना ताज़ा कलाम पेश करेंगे, जो ख़ास तौर पर आप की खि़दमत में होगा।”

एक कोने में, जहां चार-पांच मशीनें, मरम्मत के लिये पड़ी थीं, उनके पीछे बैठे कुछ आदमी, जुआ खेल रहे थे।

“शरम आनी चाहिये आप लोगों को!” मुझ से बिना कहे न रहा गया। वे झटपट, ताश के पत्ते और रेज़गारी, जेबों मंे ठोंस, उठ खड़े हुए।

“डयूटी पर भी जुआ? कितनी बुरी बात है!” मैंने कृष्ण की ओर देखते, फटकार लगाई। मगर वह कुछ महसूस करने के बजाये, तन कर खड़ा हो गया और कहने लगा, ”हां साहब, हम तो जो भी करें, बुरा है। छोटे लोग हैं न, इसलिये बुरा है! आप बड़े लोग, सारी सारी रात, उधर बड़ी क्लब में जो कुछ किया करते हैं, वह तो धर्म और पुन्य का काम होता होगा!”

“देखो, छुट्टी के बाद तुम लोग कुछ भी करो, मुझे कोई मतलब नहीं। मगर यहां…।”

ग़ौर किया, इसी दौरान दस बारह वर्करों का झंुड, मुझे घेरे खड़ा है।

“आप लोग अपनी अपनी मशीन पर जाकर काम शुरू कीजिये।” मैंने कुछ सख्ती से कहा। किंतु तभी, चाय वाला, एक हाथ में चाय का ड्रम और कंधे पर समोसे का डिब्बा लटकाये आ पहुंचा और सभी वर्कर, अपना अपना कप या गिलास उठाये, किलकारियां सी मारते हुए, चाय वाले की ओर भाग खड़े हुए।

मैं पुनः अपनी सीट पर आ बैठा और इस महीने, फिटिंग गु्रप में कितना काम हो चुका है, हिसाब करने लगा। देखा, कुछ फिटरों ने इस महीने में, बहुत ही कम काम अब तक किया है। मगर वे लोग तो कम करें या अधिक, उन्हें पूरा वेतन चाहिये। यही नहीं, पूरे वेतन के अलावा, कम से कम पचास प्रतिशत, पीस वर्क का लाभ भी हर हालत में मिलना चाहिये। नहीं मिलेगा, तो यूनियन वाले आ धमकेंगे और यहां मेज़ पर मुक्का मार कर दहाड़ेंगे, ”आप ग़रीब मज़दूरों का शोषण करने पर तुले हैं। हम ऐसा हरगिज़ होने नहीं देंगे।”

“मगर इन आदमियों ने, पूरा दिन काम भी तो नहींे किया।”

“अरे, आप अपना टाइम भूल गये, इधर कुर्सी पर बैठते ही!”

 

अनिल आ खड़ा हुआ।

“कहिये साहब, अब तो टाइम है आप के पास?”

“बोलो?”

“बोलना क्या है, इस सेक्शन से मेरा ट्रांस्फ़र करा दीजिये।”

“यहंा क्या तकलीफ़ है?”

“इस सेक्शन में, अनुशासन नाम की तो चीज़ ही नहीं रह गई है। जो जिस के जी में आता है, करता है। दिन भर चाय उड़ती हैैै। बीड़ियां फंूकी जाती हैं, मुशायरे होते हैं और जगह जगह जूए के अड्डे बने हैं… यह सब क्या है?”

मैंने कहा, ”मिस्टर अनिल, क्या आप इस फैक्टरी के नये महाप्रबंधक नियुक्त हुए हैं, जो इस तरह अनुशासन हीनता के ग़म में घुले जा रहे हैं?”

वह निराश सा होकर बोला, ”बडे़ ही अफ़सोस की बात है!”

मैंने कहा, ”बैठो और बैठकर इतमिनान से अफ़सोस करो।”

किंतु वह खड़ा ही रहा और बोला, ”आप भी दूसरे स्टाफ़ की तरह, वर्करों को हीन समझते हैं!”

मैंने हंस कर कहा, ”अरे भई, मैंने तो बैठने के लिये कहा है।”

वह समीप पड़े लकड़ी के स्टूल पर बैठ गया, तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की। कहा, ”अनिल, तुम बस अपना काम किये जाओ।”

“अरे ये लोग?”

“ये लोग तो यों ही चलेंगें। सच मानो, इस देश को, कोई भी नहीं सुधार सकता।”

“न जाने क्यों, मुझे आप से हमदर्दी होने लगी है!”

“अब शायद तुम ख़ुद, मुझे हीन समझने लगे हो!”

“अच्छी बात! आप जब बात को समझना ही नहीं चाहते, तो यहां बैठ कर क्या करूंगा!”

वह उठने लगा। मगर मैंने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया।

“बात क्या है?” मैंने धीरे से पूछा।

“आप को शायद मालूम नहीं, कृष्ण, नरेन्द्र मोहन का आदमी है।”

“मालूम है।”

“मगर यह मालूम नहीं होगा, कि इस फैक्टरी में एक षड्यंत्र रचा जा रहा है।”

“षड्यंत्र?”

“मुझे डर है, कहीं आप भी इसका शिकार न हो जायें।”

“वैसे मामला क्या है?”

“मैं शाम को आप से मिलूंगा।” कह कर वह उठ खड़ा हुआ। वह कैबिन से बाहर निकला ही था, कि कोई वर्कर, मशीनों की ओर से चिल्लाया, ”साला चमचा, आ गया अपने बाप को तेल लगा कर!”

 

षड्यंत्र! कैसा षड्यंत्र होगा, जिसका, मैं स्वयं भी शिकार हो सकता था? मैंने तो कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। फिर लोगों को मुझे से क्या शिकायत है? क्यों नाराज़ हैं वे?

चमचा! मुझे हंसी आ गई। किसी पर, मेरे जैसे मामूली आदमी का ‘चमचा’ होने का आरोप! क्या कहने!

अनिल, एक अच्छा, किंतु बहुत ही भावुक, दुबला पतला सा नवयुवक, बेहद परिश्रमी, दिन भर काम पर ही पिला रहने वाला कामगर। मगर मामूली सी बात पर भी, आवेश में आकर, चेहरा सुर्ख कर लेने वाला एक आदर्शवादी।

उसे ट्रेड टेस्ट में पास कराने में, मैंने सहयोग दिया था, या कहिये, कि उसके कार्य करने का ढंग ही इतना बढ़िया और प्रभावशाली था, कि बिना किसी पूर्व परिचय के भी, मुझे बोर्ड के पास जाकर, उसकी सिफ़ारिश करनी पड़ी थी। नौकरी पर लग जाने के कुछ दिन बाद ही, वह बहुत से पुराने और अनुभवी कारीगरों को भी पीछे छोड़ने लगा था। जिस किसी कठिन कार्य को हाथ में लेते, वे पुराने कारीगर झिझकते, या नख़रा दिखाते, वह आगे बढ़कर, और बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेता और जब तक उस जाॅब को पूरा करके, इंस्पेक्शन वालों से पास न करा लेता, वह साँस न लेता। इंस्पेक्शन वालों को भी उस पर पूरा भरोसा हो चला था। अनिल के हाथ से निकला काम है, तो सही हीे होनाा चाहिये।

मगर अनिल के आदर्शवाद से, मैं कभी कभी परेशान हो उठता था… लोगों को शरम भी नहीं आती! ये लोग, बिना काम किये ही, पूरा वेतन ले जाते हैं… इन अफ़सरों को तो गोली से उड़ा देना चाहिये, जो कारों में बैठ, मज़दूर काॅलोनी में जाकर, बच्चों को टाॅफ़ियां बांटने के बहाने, नल से पानी लेती औरतों के वक्ष के उभार देख कर तृप्त होते हैं… अब तो लगने लगा है, कि इस पूरे देश का ही बेड़ा ग़र्क़ होने वाला है! यहां तो हर आदमी को अपनी ही पड़ी है… यहां तो तुरंत सैनिक शासन क़ायम हो जाना चाहिये…।

अनिल कई दिन से ड्यूटी पर नहीं आ रहा था। पता चला, उसे बुख़ार चढ़ा है। फिर पता चला, बुख़ार उतर ही नहीं रहा है। एक दिन सोचा, शाम को उसके क्र्वाटर पर जाकर, पता किया जाये।

मैं बीच का आदमी हूं। फैक्टरी के भीतर और फैक्टरी के बाहर क्वार्टरों के मामले में भी। दायें हाथ, थोड़ा चल कर और मुख्य मार्ग पार करके, अफ़सरों के बंगले हैं और बायें हाथ थोड़ा चल कर और ढलान उतर कर, वर्करों के एक एक कमरे वाले, खपरैलनुमां क्वार्टरों की क़तारें शुरू हो जाती हैं। मेरा क्वार्टर इस दायें और बायें का संगम है। दो कमरे, आगे पीछे, दोनों ओर बरामदे और खुला आंगन। शेष सभी सुविधाएं भी उपलब्ध…।

किंतु वर्कर लोगों के एक एक कमरे वाले क्वार्टर!

केवल एक कमरा, छोटा सा बरामदा, उसी में एक ओर रसोई। पानी के नल और संडास की, बाहर संयुक्त व्यवस्था। जहां लोग क़तारों में खड़े, अपनी बारी की प्रतीक्षा किया करते। पानी की एक एक बाल्टी के, ‘पहले और बाद में’ के प्रश्न पर घंटों गाली गलौज। कितनी ही बार मारपीट की नौबत और कितने ही, जवान होते लड़के लड़कियों की प्रेम कहानियां, यहीं पर जन्म लेतीं और परवान चढ़तीं…।

वर्कर काॅलोनी के क्वार्टर शुरू होते ही, गोबर की दुर्गंध, नथुनों में प्रवेश करने लगी। सड़क किनारे, दरी बिछा कर ताश खेलने वालों में से कुछ ने, चकित सा होकर, एक बार मेरी ओर देखा और पुनः पतों में खो गये। नल पर पानी लेती कुछ स्त्रियों ने जैसे मुझे पहचानने का सा प्रयास किया। फिर मुंह घुमा कर आपस में खुसर पुसर करने लगीं। चार-पांच बच्चे, एक अन्य फटे कपड़े पहने मरियल से बच्चे को दबोचे हुए थे। न जाने वे उसकी चिथड़े हुई निक्कर की जेब से, क्या निकालना चाह रहे थे। एक मज़दूर की गाय, साथ वाले के बगीचे में मुंह मार रही थी और एक स्त्री घंूघट काढ़े और हाथ में लम्बा सा डंडा लिये, गाय पर पिल पड़ने के लिये भागी चली आ रही थी…।

मैंने उस ब्लाॅक में क्वार्टर की संख्या पढ़ी… यही होना चाहिये। बाहर दरवाजे़ के पास, पत्थर के कोयले की अंगीठी, पूरी तरह नहीं जली थी। उसमें से निकलता गहरा काला धुआं, फ़िज़ा मंे फैला जा रहा था।

अनिल की बहन थी, जो भीतर से, पंखा हाथ में लिये, अंगीठी को, पूरी तरह रोशन करने के लिये चली आ रही थी।

“अनिल है?” मैंने पूछा।

उसने हाथ जोड़ नमस्ते की, तो पंखा उसके हाथ से छूटने लगा। मगर ज़मीन पर गिरा नहीं।

“बुख़ार उतरा?” मैंने पूछा।

“ना… कम भी नहीं हुआ… आइये।”

अनिल आंखें बंद किये लेटा था। उसकी मां, ठंडे पानी में भिगो कर पट्टी उसके माथे पर रख रही थी। बोली, ”कल रात तो तबीयत बहुत ही बिगड़ गई थी… अरूणा, कुर्सी ज़रा इधर खिसका दो।”

मैं बैठ गया। एक मिनट, अनिल के तमतमाये चेहरे की और देखता रहा। फिर पूछा, ”दवा कहां से ली?”

“अपने अस्पताल की चल रही है। दवा क्या है, पानी-सा ही घोल कर दिये जा रहे हैं। बीमार ठीक हो तो कैसे!” मां ने निराश-सी होकर कहा।

तभी, अनिल की दूसरी बहन, जो अरूणा से दो ढाई वर्ष बड़ी लगती थी, दवा की शीशी लिये आ पहंुची।

“कौन सा डाक्टर था ड्यूटी पर?” मैंने पूछा।

“चैटर्जी।” वह उदास और थकी सी बोली।

मैंने कहा, ”ऐसा करों, पर्ची मुझे दे दो। डाक्टर चैटर्जी से कहकर, मैं अभी दवा बदलवा लाता हूं।”

“अरूणा…“ बड़ी बहन ने छोटी को आवाज़ दी, ”लैम्प इधर रख जाओ।”

तभी अनिल ने आंखें खोलीं और मेरी ओर देखा।

“आप ने क्यों कष्ट किया?”

“कष्ट कैसा!”

“आप…”

“तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगे।” कह कर मैं उठ खड़ा हुआ। चलने लगा, तो अरूणा बरामदे से ही बोली, “थोड़ा रूकिये, चाय बनने वाली है।”

“नहीं, इस समय चाय नहीं।” मैंने कहा।

“मैंने तो चायपत्ती भी डाल दी।”

उसकी अबोधता पर हँसी आने लगी। कहा, ”दूध और चीनी मत डालना। चाय पीने बैठ गया, तब डाक्टर तो मिल चुका। लाओ, वो पर्ची दो।”

अर्चना ने पर्ची दे दी। उसका चेहरा, अनिल से काफी मिलता था।

गम्भीरता, पूरे घर में शायद सबसे अधिक, उसी के हिस्से में आई थी।

“मैं चलंू आप के साथ। पूछने लगी।”

“किस लिये?”

“आपको एक बार फिर, इतना चक्कर लगानाा पड़ जायेगा।”

”उसकी चिंता मत करें।”

“लौट कर तो चाय पी लेंगे न?”

“न पीने वाली तो कोई बात नहीं।” मैंने हंसकर कहा।

अस्पताल से दवा लेकर लौटने और चाय पीकर, अनिल के क्र्वाटर से बाहर निकलने तक घना अंधेरा हो चला था।

दोनों बहनों ने एक साथ हाथ जोड़े। उस समय, उनके चेहरों पर तनाव कुछ कम था। डाक्टर द्धारा बदल दी गई दवा से, भाई के शीघ्र स्वस्थ हो जाने की सम्भावना मेें ही, शायद यह परिवर्तन हुआ था।

मैंने हाथ जोड़ और मुस्करा कर, दोनों बहनों के अभिवादन का उत्तर दिया।

शायद अंधेरे में ही, इधर-उधर से कई नज़रें, मेरे ऊपर जमी थीं। किसी ने ज़ोर से गले को खखारा और बलग़म का बड़ा सा थोबा, मेरे पैरों के समीप दे मारा।

 

क्रमशः…

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मुरारि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मुरारि ? ?

काल बावरा

मेरी देह में

मुझे तलाशता रहा,

मुरारि की मानिंद

मेरा शब्द संसार

काल के माथे पर

नाचता रहा!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६१ ☆ गफ़लत न कीजियेगा निभाने में… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गफ़लत न कीजियेगा निभाने में “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६१ ☆

✍ गफ़लत न कीजियेगा निभाने में… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

दुनिया की भीड़ भाड़ में अपना न मिल सका

जो भी मिला है मुझसे से वो पूरा न मिल सका

 

मंज़िल की चाह जब न तलब मेरी बन सकी

मंज़िल का मेरी मुझको भी रस्ता न मिल सका

 *

उस पीर की मज़ार पै जाते थे चश्मे-नम

इक शख़्स वापसी में पै रोता न मिल सका

 *

इस हाई वे से हो गई रफ्तार तेज़  पर

राही को बचने धूप से साया न मिल सका

 *

विरसे में जो था बाँट लिए  भाई जब सभी

वो साथ देने माँ का ही जाया न मिल सका

 *

इस काहिली ने मुझपे सितम  ढाया इस तरह

तक़दीर में जो मेरी वो लिक्खा न मिल सका

 *

मुफ़्लिस की मुफ़्लिसी के सितम की ये इंतिहां

बच्चे को उसका चाहा खिलौना न मिल सका

 *

गफ़लत न कीजियेगा निभाने में कुछ कभी

करता रफ़ू जो रब्त की धागा न मिल सका

 *

शानों पे जिनको मैंने चढ़ा दी अरुण उड़ान

अंतिम सफ़र को उनका ही शाना न मिल सका

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६५ – ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये अखाड़ा निराला है।)

☆ हेमंत साहित्य # ६५ ☆

✍ ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे  

ये अखाड़ा निराला है,

ये वही पहलवान हैं,

जिन्हें अखाड़े में उतारा था हमने।

अपने ही हाथों से

अपने ही कंधों पर बिठाया,

फिर ताज भी पहनाया हमने।

 

मैं अकेला नहीं था,

माशरे के सभी मकीं थे

धर्म की घुट्टी पीकर

सो गये मदहोश,

और उँगली की एक स्याही

वर्षों की खामोशी बन गई।

 

हम सुनते रहें,

वे हमें सुनाते रहे रामधुन,

कि कहीं जाग ना जायें

हम

सुनकर सिसकियाँ

हमवतनों की

अपनों की.

हम सपनों में भारत गढ़ते रहे,

वे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे।

 

मैं ढूँढ़ता रहा

उनकी आँखों में संवेदना।

पर वहाँ तो

कुर्सी का धुआँ था,

जिसने इंसान को ही ओझल कर दिया।

 

अगर संवेदना होती,

तो कलियाँ न कुचली जातीं।

पुस्तकों से भरे हाथ

ढाल न बनते,

गलियारों में धुआँ न उतरता,

लाठियाँ भविष्य की पीठ पर

इतिहास न लिखतीं।

 

अस्पतालों की खिड़कियों से

झाँकता हुआ कल,

पट्टियों में लिपटा पूछता रहा—

क्या यही था

उजाले का वादा?

 

फिर भी सिंहासन मुस्कुराता रहा,

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अहंकार का मुकुट पहनकर

वह आईनों से भी

नज़रें चुराता रहा।

 

कौन समझाए उन्हें—

सिंहासन शाश्वत नहीं होते।

सोने की लंका भी

एक दिन राख हुई थी।

 

समय की मुट्ठी में

हर ताज की धूल लिखी है।

जनता देर से बोलती है,

मगर जब बोलती है,

तो अखाड़े बदल जाते हैं।

 

ये अखाड़ा निराला है…

यहाँ जीत उसी की नहीं होती

जो सबसे ऊँचा बैठा हो,

जीत अंततः उसी की होती है

जिसे कहते हैं

वोटर।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११८ – कॉरपोरेट मीटिंग्स की माया – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – कॉरपोरेट मीटिंग्स की माया)  

☆  चुभते तीर # ११८ – व्यंग्य  – कॉरपोरेट मीटिंग्स की माया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कॉरपोरेट जगत में काम करने से ज़्यादा ज़रूरी है काम करते हुए दिखना, और इसका सबसे बड़ा साधन है ‘मीटिंग’। एक तीन घंटे की मीटिंग का कुल निष्कर्ष यह होता है कि अगली मीटिंग कब होगी। मीटिंग में जो जितना भारी अंग्रेजी शब्द जैसे ‘सिनर्जी’, ‘पैराडाइम शिफ्ट’ या ‘लो-हैंगिंग फ्रूट’ बोलता है, उसे उतना ही बुद्धिमान माना जाता है। बॉस एक पीपीटी दिखाता है जिसमें ग्राफ हमेशा ऊपर की तरफ जा रहा होता है, भले ही असलियत में कंपनी डूब रही हो। कर्मचारी उस ग्राफ को देखकर इस तरह सिर हिलाते हैं मानो उन्हें साक्षात ईश्वर के दर्शन हो गए हों। सबसे मज़ेदार बात यह है कि जो काम एक साधारण ईमेल से हो सकता था, उसके लिए पंद्रह लोगों का कीमती समय बर्बाद किया जाता है, ताकि अंत में सब मिलकर समोसे खा सकें और एक-दूसरे को बधाई दे सकें।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “क्रेता“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆

✍ कविता ☆ क्रेता☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हम सब बिके हुए हैं

किसके हाथों, पता नहीं

शायद,

विचारवानों के, विद्वानों के

सभ्यताओं के, शासनों के

सत्ताओं या सत्ताधीशों के।

 

या कि

अपने अहम् के, मद मोह के

समाज के, संसार के

द्वेष के, आग्रहों के

दुराग्रहों के,

पता नहीं।

 

बस यही पता करना है

हम किसके हाथों बिके हैं

यह पता चल जाए

तो मुक्त हो सकते हैं।

क्रेता से, छुटकारा

पा सकते हैं।

लेकिन, बहुत सजग रहने की

ज़रुरत है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५७ ⇒ तन – बदन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तन – बदन।)

?अभी अभी # १०५७ ⇒ आलेख – तन – बदन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस काया को सत्तर वसंत हो गए लेकिन मैं आज तक तन में बदन का स्थान तय नहीं कर पाया। वनस्पति जगत में जरूर एक पेड़ के तीन भाग होते हैं, जड़, तना और फलती फूलती टहनियां। लेकिन इंसान के पास तो एड़ी से चोटी तक तन ही तन है। तन में मन है, मन में वतन है और जेब में वेतन है।।

मैंने यह भी सुना है कि अपने पांव पर खड़े होते ही कुछ लोगों के बदन में पैसे की गर्मी चढ़ जाती है तो कुछ सिने तारिकाएं बदन पे सितारे लपेट लेती हैं। आप विश्वास नहीं करेंगे एक ज़माने में तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बदन में ज्वाला जागी थी, और आजकल पश्चिम बंगाल की ममता के बदन में तो साक्षात दुर्गा माता का वास है।।

लगता तो ऐसा है मानो तन – बदन का चोली दामन का साथ है लेकिन जब मेरे दामन में खुशियां आती हैं तो चोली कहीं नजर नहीं आती। हां पूरे बदन में खुशी की एक लहर ज़रूर दौड़ जाती है, और जब कोई वामी अथवा टुकड़े टुकड़े गैंग वाला नजर आ जाता है, तो सारे तन – बदन में आग लग जाती है। आखिर ये आग कब बुझेगी।

जगदीश जी की आरती मैं रोज गाता हूं ! तन, मन, धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन इसमें भी अपना बदन चुपके से छुपा ही लेता हूं। एक भारतीय पत्नी के त्याग और समर्पण की तो बात ही मत पूछिए। लेकिन वहां भी तन, मन से आगे नहीं बढ़ा जाता। किसी के तन पर आपका अधिकार हो सकता है, चलिए मन भी आपको दिया, अब बदन तो छोड़ दो।।

अगर तन पर कपड़े धारण किए जाते हैं तो बदन पर मालिश की जाती है। तेज़ बुखार में तन की सुध नहीं रहती, पूरा बदन पहले टूटता है, फिर गर्म हो जाता है।

एक क्रोसिन पेन रिलीफ से शरीर को आराम मिलता है।

इससे यह सिद्ध हुआ कि हमारे शरीर में ही तन – बदन का वास है। जब भी दफ्तर की कुर्सी पर बैठें, ज़रा तनकर बैठें। घर पर व्यायाम से तन को व मन को स्वस्थ रखें, तथा अधिक व्यायाम के पश्चात बदन को ढीला छोड़ दें। लंबी गहरी सांस लेते रहें। सारा तनाव निकल जाएगा।।

जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे 

हसरत जयपुरी ! यकीन नहीं होता, तो देख लीजिए, तन – बदन का अध्यात्मिक दर्शन ;

तन में अग्नि, मन में चुभन

कांप उठा मोरा गोरा बदन

ओ रब्बा खैर …खैर

रब्बा खैर ही करे, तो सबकी खैर ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२३ – सावन का झूला… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय और अप्रतिम कथा – सावन का झूला।)

☆ कथा कहानी # १२३ – सावन का झूला श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सावन की रिमझिम फुहारों के बीच मालती जी अपने बगीचे में तुलसी के पास दीपक जला रही थीं। तभी उनकी नजर एक अनजान लड़की पर पड़ी, जो चुपचाप बगीचे में खड़ी झूले को निहार रही थी।

मालती जी चौंक उठीं।

“कौन हो तुम? और मेरे बगीचे में क्या करने आई हो?

कुछ चुराने का इरादा है क्या?”

लड़की सहम गई। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।

“माफ कीजिए… मैं चोर नहीं हूँ।”

मालती जी ने गौर से देखा। लड़की के चेहरे पर मासूमियत थी। उसके कपड़ों और बातचीत से लग रहा था कि वह किसी अच्छे घर की पढ़ी-लिखी लड़की है।

“तो फिर अंदर कैसे आई?”

लड़की ने झेंपते हुए कहा, “गेट खुला था… इसलिए चली आई।”

मालतीने कहा-

“लेकिन क्यों?”

लड़की कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखें झूले पर टिक गईं।

“मैं आपके बगल वाले घर में कुछ दिन पहले ही किराए से रहने आई हूँ।

सावन आया है… इस मौसम में तो हम मायके जाते थे, झूला झूलते थे, सहेलियों के साथ हँसते-गाते थे। लेकिन इस बार मायके नहीं जा पा रही हूँ।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“आज खिड़की से आपके आँगन में यह झूला दिखाई दिया। आपका इतना सुंदर बगीचा देखा तो बचपन याद आ गया। अब ऐसे बगीचे और झूले कहाँ देखने मिलते हैं?

पता नहीं क्यों… मैं खुद को रोक नहीं पाई और चली आई।”

मालती जी की कठोरता धीरे-धीरे पिघलने लगी।

लड़की ने संकोच से पूछा, “अगर आप कहें तो… क्या मैं थोड़ी देर झूला झूल सकती हूँ?”

मालती जी कुछ कह पातीं, उससे पहले लड़की ने अपने कान पकड़ लिए।

“सॉरी… मुझे बिना पूछे यहाँ नहीं आना चाहिए था। अब नहीं आऊँगी।”

वह मुड़कर जाने लगी।

“अरे, रुको बेटी!”

मालती जी की आवाज़ सुनकर लड़की रुक गई।

मालती जी झूले के पास गईं और उसके बैठने की जगह साफ करते हुए बोली—”इतने दिनों से इस झूले पर कोई बैठा ही नहीं?  आज कोई बचपन की याद लेकर आया है, तो मैं उसे कैसे मना कर दूँ?”

लड़की की आँखें भर आईं।

वह धीरे से झूले पर बैठ गई। मालती जी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

झूला आगे-पीछे होने लगा।

लड़की के चेहरे पर बरसों बाद बचपन लौट आया।

कुछ देर बाद वह उठी और जाने लगी।

मालती जी ने पूछा, “बेटी, कल फिर आओगी?”

लड़की ने पलटकर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।

“अगर… आपको बुरा न लगे तो।”

मालती जी मुस्कुराईं, मगर उनकी आँखें भी नम थीं।

“बुरा क्यों लगेगा?

यह बगीचा मेरा है, लेकिन यह झूला तुम्हारे बचपन का भी तो है। जब मन करे, चली आना।”

लड़की ने आगे बढ़कर मालती जी को गले लगा लिया।

दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

सावन की बारिश बाहर भी हो रही थी और दोनों के भीतर भी।

मालती जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—”बेटी, मायका दूर हो तो क्या हुआ… अब यह आँगन भी तुम्हारा है।”

लड़की ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा—”और आप… मेरी अपनी मालती माँ।”

झूला अब भी धीरे-धीरे हिल रहा था।

उस दिन उस झूले पर सिर्फ एक लड़की नहीं झूली थी…

एक माँ को बेटी मिली थी और एक बेटी को अपना मायका।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ एक जुझारू व्यक्तित्व “भिखारी ठाकुर” ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

(जन्म – १८ दिसंबर १८८७ – मृत्यु १० जुलाई १९७१)

☆ आलेख ☆ एक जुझारू व्यक्तित्व “भिखारी ठाकुर” ☆

जुझारू होने का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता कि आप किसी संघर्षमय परिस्थिति में घिरे हैं और लगातार जूझ रहे हैं; बल्कि जुझारू होने का असली अर्थ यह है कि 👉आपके पास जो कुछ भी सीमित संसाधन हैं, उनमें ही संतुष्ट और पर्याप्त रहकर खुद को साबित करना है… 

हमारे छपरा शहर में एक चौराहा है,“भिखारी ठाकुर के नाम से चौराहा”। बचपन में जब हम छोटे थे, तो यह नाम सुनने में थोड़ा अजीब लगता था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नाम तो आसानी से समझ में आ जाते थे, लेकिन भिखारी ठाकुरनाम का अर्थ उस उम्र में पल्ले नहीं पड़ता था। हालांकि, जैसे-जैसे उम्र बढ़ी और समझदारी विकसित हुई, वैसे-वैसे भिखारी ठाकुर की महान उपलब्धियां भी समझ आने लगीं।

तब यह अहसास हुआ कि कोई व्यक्ति… शून्य से शुरू हुआ सफर तय करके भी सफलता के शिखर तक पहुँच सकता है। आज भिखारी ठाकुर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भोजपुरी संस्कृति और जुझारू व्यक्तित्व की एक वैश्विक पहचान बन चुके हैं।

लोक के महानायक और संघर्ष की जीवंत मिसाल – शून्य से शिखर का वास्तविक अर्थ… 

जिस अभावग्रस्त और पिछड़े परिवेश में भिखारी ठाकुर ने जन्म लिया था, वहाँ से उठकर कला और साहित्य की दुनिया में ऐसा इतिहास रचना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उनके जीवन ने यह साबित कर दिया कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए महलों की नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और हौसले की जरूरत होती है।

समाज का सटीक आईना:

विदेशिया‘, ‘बेटी-वियोगऔर भाई-विरोध जैसी उनकी रचनाओं ने केवल समाज का मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज के भीतर मौजूद कुरूपताओं, पलायन के दर्द और पारिवारिक टूटन को बहुत ही बेबाकी से सबके सामने रखा। उन्होंने आम जनमानस की भाषा और उनकी पीड़ा को अपनी कला की धुरी बनाया।

छपरा की माटी का गौरव…

छपरा (सारण) की इस पावन माटी ने देश को कई रत्न दिए हैं, लेकिन भिखारी ठाकुर का स्थान सर्वोपरि है। छपरा का वह चौराहा सिर्फ एक भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि एक साधारण सा दिखने वाला इंसान भी अपनी मेहनत और जुझारूपन से इतिहास रच सकता है।

आज के दौर में प्रासंगिकता

आज के समय में जब युवा हर छोटी-बड़ी असफलता से निराश हो जाते हैं, तब भिखारी ठाकुर का जीवन और उनका संघर्ष एक मजबूत प्रकाशस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि जो संसाधन आपके पास हैं, उन्हीं का इस्तेमाल करके अपनी एक अलग लकीर खींची जाए।

भिखारी ठाकुर और उनका वह चौराहा हमें यह सिखाता है कि सफलता पद या पैसों से नहीं, बल्कि आपके द्वारा समाज को दिए गए योगदान और आपके अटूट संघर्ष से आंकी जाती है।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२४ ☆ आई… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२४ ?

☆ आई ☆  प्रभा सोनवणे ☆

बहरली अंगणी जाई

अन आठवली माझी आई!

*

मन आईचे निर्मळ

शुभ्र फुलांची ओंजळ!

*

दूर टेकडीच्या पलिकडे

माझे एक सानुले खेडे!

*

त्या हिरव्या वळणावर

आहे मायवेडे घर!

*

जरी माहेर माझे दूर

येई इथंवर आईचा सूर!

*

किती काढाव्या आठवणी

येई डोळ्याला गं पाणी!

*

आई मायेची रांगोळी

आई ममतेची पाकोळी!

*

आई शिवालयातील समई

आई… मुक्ताई ….जनाई!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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