हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०७ ☆ अनुकरणीय सीख… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनुकरणीय सीख। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०७ ☆

☆ अनुकरणीय सीख… ☆

‘तुम्हारी ज़िंदगी में होने वाली हर चीज़ के लिए ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। इस बात को जितनी जल्दी मान लोगे, ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाएगी’ अब्दुल कलाम जी की यह सीख अनुकरणीय है। आप अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं, क्योंकि जैसे कर्म आप करते हैं, वैसा ही फल आपको प्राप्त होता है। सो! आपके कर्मों के लिए दोषी कोई अन्य कैसे हो सकता है? वैसे दोषारोपण करना मानव का स्वभाव होता है, क्योंकि दूसरों पर कीचड़ उछालना अत्यंत सरल होता है। दुर्भाग्य से हम यह भूल जाते हैं कि कीचड़ में पत्थर फेंकने से उसके छींटे हमारे दामन को भी अवश्य मलिन कर देते हैं और जितनी जल्दी हम इस तथ्य को स्वीकार कर लेते हैं; ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाती है। वास्तव में मानव ग़लतियों का पुतला है, परंतु वह दूसरों पर आरोप लगा कर सुक़ून पाना चाहता है, जो असंभव है।

‘विचारों को पढ़कर बदलाव नहीं आता; विचारों पर चलकर आता है।’ कोरा ज्ञान हमें जीने की राह नहीं दिखाता, बल्कि हमारी दशा ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ व ‘थोथा चना, बाजे घना’ जैसी हो जाती है। जब तक हमारे अंतर्मन में चिन्तन-मनन की प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती; भटकाव निश्चित् है। इसलिए हमें कोई भी निर्णय लेने से पूर्व उसके सभी पक्षों पर दृष्टिपात करना आवश्यक है। यदि हम तुरंत निर्णय दे देते हैं, तो उलझनें व समस्याएं बढ़ जाती हैं। इसलिए कहा गया है ‘पहले तोलो, फिर बोलो’ क्योंकि जिह्वा से निकले शब्द व कमान से निकला तीर कभी लौटकर नहीं आता। द्रौपदी का एक वाक्य ‘अंधे की औलाद अंधी’ महाभारत के युद्ध का कारण बना। वैसे शब्द व वाक्य जीवन की दिशा बदलने का कारण भी बनते हैं। तुलसीदास व कालिदास के जीवन में बदलाव उनकी पत्नी के एक वाक्य के कारण आया। ऐसे अनगिनत उदाहरण विश्व में उपलब्ध हैं। सो! मात्र अध्ययन करने से हमारे विचारों में बदलाव नहीं आता, बल्कि उन्हें अपने जीवन में धारण करने पर उसकी दशा व दिशा बदल जाती है। इसलिए जीवन में जो भी अच्छा मिले, उसे अपना लें।

अनुमान ग़लत हो सकता है, अनुभव नहीं। यदि जीवन को क़ामयाब बनाना है, तो याद रखें – ‘पांव भले ही फिसल जाए, ज़ुबान को कभी ना फिसलने दें।’ अनुभव जीवन की सीख है और अनुमान मन की कल्पना। मन बहुत चंचल होता है। पल-भर में ख़्वाबों के महल सजा लेता है और अपनी इच्छानुसार मिटा डालता है। वह हमें बड़े-बड़े स्वप्न दिखाता है और हम उनके पीछे चल पड़ते हैं। वास्तव में हमें अनुभव से काम लेना चाहिए; भले ही वे दूसरों के ही क्यों न हों? वैसे बुद्धिमान लोग दूसरों के अनुभव से सीख लेते हैं और सामान्य लोग अपने अनुभव से ज्ञान प्राप्त करते हैं। परंतु मूर्ख लोग अपना घर जलाकर तमाशा देखते हैं। हमारे ग्रंथ व संत दोनों हमें जीवन को उन्नत करने की सीख देते और ग़लत राहों का अनुसरण करने से बचाते हैं। विवेकी पुरुष उन द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना भाग्य बना लेते हैं, परंतु अन्य उनकी निंदा कर पाप के भागी बनते हैं। वैसे भी मानव अपने अनुभव से ही सीखता है। कबीरदास जी ने भी कानों-सुनी बात पर कभी विश्वास नहीं किया। वे आंखिन देखी पर विश्वास करते थे, क्योंकि हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती और उसका पता हमें उसे परखने पर ही लगता है। हीरे की परख जौहरी को होती है। उसका मूल्य भी वही समझता है। चंदन का महत्व भी वही जानता है, जिसे उसकी पहचान होती है, अन्यथा उसे लकड़ी समझ जला दिया जाता है।

यदि नीयत साफ व मक़सद सही हो, तो यक़ीनन किसी न किसी रूप में ईश्वर आपकी सहायता अवश्य करते हैं, जिसके फलस्वरूप आपकी चिंताओं का अंत हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि परमात्मा में विश्वास रखते हुए सत्कर्म करते जाओ; आपका कभी भी बुरा नहीं होगा। यदि हमारी नीयत साफ है अर्थात् हम में दोग़लापन नहीं है; किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर का भाव नहीं है, तो वह हर विषम परिस्थिति में आपकी सहायता करता है। हमारा लक्ष्य सही होना चाहिए और हमें ग़लत ढंग से उसे प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यदि हमारी सोच नकारात्मक होगी, तो हम कभी भी अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाएंगे; अधर में लटके रह जाएंगे। इसके साथ एक अन्य बात की ओर भी मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगी कि हमारे पाँव सदैव ज़मीन पर टिके रहने चाहिए। उस स्थिति में हमारे अंतर्मन में अहं का भाव जाग्रत नहीं होगा, जो हमें सत्य की राह पर चलने को प्रेरित करेगा और भटकन की स्थिति से हमारी रक्षा करेगा। इसके विपरीत अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता का भाव हमें वस्तुस्थिति व व्यक्ति का सही आकलन नहीं करने देता, बल्कि हम दूसरों को स्वयं से हेय समझने लगते हैं। अहं दौलत का भी भी हो सकता है; पद-प्रतिष्ठा व ओहदे का भी हो सकता है। दोनों स्थितियाँ घातक होती हैं। वे मानव को सामान्य व कर्त्तव्यनिष्ठ नहीं रहने देती। हम दूसरों पर आधिपत्य स्थापित कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं।यह अकाट्य सत्य है कि ‘पैसा बिस्तर दे सकता है, नींद नहीं; भोजन दे सकता है, भूख नहीं: अच्छे कपड़े दे सकता है, सौंदर्य नहीं; ऐशो-आराम के साधन दे सकता है, सुक़ून नहीं। सो! दौलत पर कभी भी ग़ुरूर नहीं करना चाहिए।’

अहंकार व संस्कार में फ़र्क होता है। अहंकार दूसरों को झुकाकर खुश होता है; संस्कार स्वयं झुक कर खुश होता है। इसलिए बच्चों को सुसंस्कृत करने की सीख दी जाती है; जो परमात्मा में अटूट आस्था, विश्वास व निष्ठा रखने से आती है। तुलसीदास जी ने भी ‘तुलसी साथी विपद् के विद्या, विनय, विवेक’ का संदेश दिया है। जब भगवान हमें कठिनाई में छोड़ देते हैं, तो विश्वास रखें कि या तो वे तुम्हें गिरते हुए थाम लेंगे या तुम्हें उड़ना सिखा देंगे। प्रभु की लीला अपरंपार है, जिसे समझना अत्यंत कठिन है। परंतु इतना निश्चित है कि वह संसार में हमारा सबसे बड़ा हितैषी है। इंसान संसार में भाग्य लेकर आता है और कर्म लेकर जाता है। अक्सर लोग कहते हैं कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है। परंतु वह अपने कृत-कर्म लेकर जाता है, जो भविष्य में उसके जीवन का मूलाधार बनते हैं। इसलिए रहीम जी कहते हैं कि ‘मन चंगा, तो कठौती में गंगा।’

सो! संसार में मन की शांति से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है। महात्मा बुद्ध शांत मन की महिमा का गुणगान करते हैं। ‘दुनियादारी सिखा देती है मक्कारियां/ वरना पैदा तो हर इंसान साफ़ दिल से होता है।’ इसलिए मानव को ऐसे लोगों से सचेत व सावधान रहना चाहिए, जिनका ‘तन उजला और मन मैला’ होता है।’ ऐसे लोग कभी भी आपके मित्र व हितैषी नहीं हो सकते। वे किसी पल भी आपकी पीठ में छुरा घोंप सकते हैं। ‘भरोसा है तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के कई-कई अर्थ निकलते हैं।’ इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न कीजिए; ज़िंदगी छोटी हो जाती है। ‘गुस्से के वक्त रुक जाना/ ग़लती के वक्त झुक जाना/ फिर पाना जीवन में/ सरलता और आनंद/ आनंद ही आनंद।’ हमारी सोच, विचार व कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं। कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं, जो दुआ की तरह मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं, जो किस्मत बदल देते हैं। ऐसे लोगों की कद्र करें; वे भाग्य से मिलते हैं। अंत में मैं कहना चाहूंगी कि मानव स्वयं अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है और उस तथ्य को स्वीकारना ही बुद्धिमानी है, महानता है। सो! अपनी सोच, व्यवहार व विचार सकारात्मक रखें; वे ही आपके भाग्य-निर्माता व भाग्य-विधाता हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७९ – नवगीत – मिलन की आस… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मिलन की आस…।

? रचना संसार # ७९ – गीत – मिलन की आस…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।

उलझा बाहुपाश में मनवा,

हृदय मिलन की आस।।

*

महके बेला गंधिल क्यारी,

मधुर कलश मकरंद।

मंजुल मुखी रूप रति मोहे,

मधुमासी आनंद।।

महुआ किंशुक गुलमोहर ने,

लिखे प्रेम अनुप्रास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

**

चंदन काया दिव्य सुवासित,

दे आमंत्रण भान।

सम्मोहित सब चपल चंचला,

अवगुंठित पट जान।।

इन अधरों की पढ़ लो पाती,

सुखद मिले आभास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

**

चहुँदिशि है प्रतिबिंब प्रेम का,

क्षण संदल अभिसार।

प्रतिभासित कोमल सुदीप्त भी,

यौवन की रसधार।।

करे समर्पण तन-मन अपना,

डोर थाम विश्वास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

**

मेघावरी ललित प्रिय अलकें,

अनुपम अंजन धार।

दृष्टि-वाण से करती घायल,

दो आलिंगन हार।।

बजती मादक शहनाई भी,

आलोकित मधुमास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०८ ☆ भावना के दोहे – नभ के नील वितान पर ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नभ के नील वितान पर।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नभ के नील वितान पर ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

अम्बर नील वितान-सा, खुला मौन का द्वार।

सभी जगह है एक-सा, शून्य सृजे संसार।।

 *

 सूरज तपता आज तो, रचता दिन का राग ।

 जगह-जगह घूमे  फिरे, ओढ़ा स्वर्णिम भाग ।।

 *

धीरे-धीरे मेघ ने, ले ली अपनी राह ।

ओस बूँद की झलकियाँ, यही  धरा की चाह ।।

 *

नभ के नील वितान पर, सूर्य करे उद्घोष।

तम की सीमा है जहाँ, उजियारे का रोष ।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९० ☆ जीवन की सच्चाई समझो… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक – भावप्रवण कविता – जीवन  की  सच्चाई  समझो… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९० ☆

☆ जीवन  की  सच्चाई  समझो… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

जीवन  की  सच्चाई  समझो |

कहाँ कुँआ  है खाई  समझो ||

कोई   अपना   कौन   पराया |

किसने किसका साथ निभाया ||

हर मुश्किल में खुलतीं आँखें |

मुखड़ा साफ  नजर में आया ||

परिचय की  गहराई  समझो |

जीवन  की  सच्चाई  समझो ||

जो  लगते थे  सबसे  प्यारे |

रहे  सदा  आँखों  के   तारे ||

बुरे  वक्त  में   बदली  रंगत |

लगते हैं अब  मन के  कारे ||

इनकी  ये  चतुराई  समझो |

जीवन की  सच्चाई  समझो ||

मुँह  में राम  बगल  में  छूरी |

जिनके जीवन की यह  धूरी ||

बहुरुपिया है आज  आदमी |

जिनकी फितरत बस दस्तूरी ||

उनकी यह कुटिलाई समझो |

जीवन  की  सच्चाई  समझो ||

है गतिशील  समय यह भाई |

आगे की गति समझ न आई ||

सच्चा सहज सरल हो जीवन |

संतों  ने  यह   बात   सुझाई ||

कर्मों  की  अच्छाई  समझो |

जीवन  की सच्चाई  समझो ||

*

कभी किसी का हक मत छीनो |

समझो  मत  निर्धन  को  हीनो ||

सबका  जीवन  पतझड़  जैसा |

याद  रखो यह  सबक कुलीनो ||

कैसे   करें   भलाई   समझो |

जीवन  की  सच्चाई  समझो ||

*

बनो न कच्चे कभी कान के |

लेना निर्णय  स्वयं जान  के ||

तब ‘संतोष’ मिलेगा तुमको |

निकलोगे जब स्वयं ठान के ||

निंदा   सदा  बुराई   समझो |

जीवन  की  सच्चाई समझो ||

कहाँ कुँआ है खाई  समझो ||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १० – कविता – मैं, तेरी सखी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मैं, तेरी सखी…‘।)

☆ शशि साहित्य # १० ☆

? कविता – मैं, तेरी सखी…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

मैं बैठी, निपट अकेली,

भारी मन और सजल नयन..

मीठी मधुर, एक आवाज आई,

कैसी हो तुम, प्रिय सखी..

 

पहले मुझसे सुन लो तुम,

मेरा परिचय प्रिय सखी,

 

दुनिया कहती, सिर्फ कान है मेरे,

प्यार भरा दिल भी रखती हूं.. प्रिय सखी,

 

तेरा मन बहलाने को,

दर्द टूटने का भी सह लूंगी..

एक झरोखा बना मुझ में,

और बाहर की दुनिया को देख,

चहकना चिड़ियों का देख,

फूलों का खिलना देख,

सूरज, चंदा का उगना, और फिर ढ़लना देख..

बना ले मुझको अपना चित्र पटल..

और सारी भावनाएं उकेर दे..

ना समझ, खुद को कैद में मेरी,

दुनिया की खुदगर्जी से,

बचा रखा है, अपने आगोश में..

मैं हूं तेरी हमदर्द सखी,

मुझको अपना मान सखी…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २७९ – मौलिक प्रवास…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २७९ – विजय साहित्य ?

☆ मौलिक प्रवास…! ☆

☆

मित्रासवे दुचाकीने

बालपणी दिली साथ

जवळच्या प्रवासात

“सायकल”  दावी वाट…! १

*

वाट वाकडी तिकडी

कींवा डोंगराचा घाट

कच्च्या पक्क्या रस्त्यातून

“सायकल”  काढी वाट…! २

*

कधी मागे, कधी पुढे

बैसवोनी सवंगडी

वाण सामान वहाया

“सायकल”  हरघडी…! ३

*

हवा भरताच धावे

प्रवासात भरे रंग

“सायकल”  सफरीचा

मनमौजी असे ढंग…! ४

*

हातामध्ये असे ब्रेक

नियंत्रित हिची धाव

क्षण भर विश्रांतीचे

गाठी मुक्कामाचा गाव…! ५

*

नित्य घडतो व्यायाम

वेळ वाचवीते खास

नाही खास देखभाल

करी मौलिक प्रवास..! ६

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ३९ आणि ४० ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ३९ आणि ४० ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

।। श्री नारद उवाच ।। 

भक्तिसूत्र ३९ – – 

महत्संगस्तुदुर्लभोऽगम्योऽमोघश्‍च ॥ ३९ ॥

अर्थ : संत महापुरुषांची संगत दुर्लभ, अगम्य व अमोघ – (कधीही व्यर्थ न जाणारी) आहे.

विवरण :  मागील सूत्रात महात्म्याची कृपा हे भक्तीप्राप्तीचे अंतरंग साधन आहे असे सांगितले पण तो महत्संग दुर्लभ, अगम्य व अमोघ म्हणजे व्यर्थ न जाणारा आहे असे ते म्हणतात. एका सुभाषितकाराने म्हटले आहे, ‘प्रत्येक पर्वतावर माणिक म्हणजे रत्न सापडत नाही. प्रत्येक हत्तीच्या गंडस्थळात मौक्तिक (मोती) नसतो. प्रत्येक वनात उत्तम चंदनवृक्ष असतो असे नाही, त्याप्रमाणे सर्वत्र साधू दिसतात, सापडतात असे नाही. ‘ बहुतेक संसारी जीव अनादि अज्ञानमूलक संस्काराने शुभाशुभ पापपुण्याचे फल भोगीत असतात. त्यातही बहुतेकांची ऐहिक पारत्रिक विषयभोगातच अधिक प्रवृत्ती असते. मनबुद्ध्यादिकाना तेच संस्कार असतात. म्हणून त्यांची धाव विषयापावेतोच जाते, विषयसंपादन हाच पुरुषार्थ होऊन बसतो. अशा बहिर्मुखतेमुळे हृदयस्थ सच्चितानंद भगवंताचे यथार्थ ज्ञानही नसते. म्हणून भक्तीकडे प्रवृत्ती होत नाही. एखादाच सत्त्वसंपन्न विचारी पुरुष पूर्वसुकृताने परमार्थमार्गात प्रविष्ट होत असतो.

मनुष्य हा समाजप्रिय प्राणी आहे. त्यामुळे त्याला दुसर्‍याच्या संगतीमधे रहावे लागणे अनिवार्य आहे. संगत ही परमार्थाला मारकही असू शकते किंवा पोषकही असू शकते. ऐहिकतेकडे, सुखासीनतेकडे मनुष्याची स्वाभाविक प्रवृत्ती असते. दुर्गुण मनुष्य सहज उचलतो. पण सद्गुण मात्र प्रयत्नपूर्वक बाणवावे लागतात. मद्यप्राशन कसे करावे? हे शिकवण्याची शाळा कुठेही नाही, परंतु आज मद्यार्क निर्मिती हा सर्वात जास्त महसूल मिळवून देणारा उद्योग आहे आणि तोही महाराष्ट्रासारख्या सतांच्या भूमीत, हा दैवदुर्विलास नव्हे काय?

श्रीसमर्थ मनोबोधात संगती कशी असावी याचे वर्णन करतात.

जयाचेनि संगे समाधान भंगे । 

अहंता अकस्मात येउनि लागे ॥ 

तये संगतीची जनीं कोण गोडी । 

जिये संगतीने मती राम सोडी ||४५||

ज्या संगतीमुळे मनुष्य रामापासून दूर जातो अशा संगतीची मनुष्याला स्वाभाविक ओढ असते. पण त्यामुळे मनाचे समाधान भंग पावते. मनुष्याचा जन्म होताच त्याची देहबुद्धि जागृत होते. देहबुद्धि नष्ट होणे हे परमार्थ प्राप्तीसाठी अत्यावश्यक असते. एक सुभाषित आहे.

सङ्ग: सर्वात्मना त्याज्य: स चेद्धातुं न शक्यते ।

स सद्भि: सह कर्तव्य: सन्त: सङ्गस्य भेषजम् ॥

सुभाषितकार म्हणतात की मुख्य म्हणजे संगत कुणाचीच करू नये. पण जर करायचीच असेल तर सज्जनांचीच संगत करावी. समाजात राहून पूर्ण नि:संग होणे कुणाही मनुष्यास शक्य नाही. समाजात सज्जन-दुर्जन, चांगली, धूर्त, लबाड, वाईट सर्वच प्रकारची माणसे असतात. या सर्वांची संगत पूर्णपणे टाळणे शक्य नाही, तरीही कोणाच्या संगतीत रहावे व कोणाच्या संगतीत राहू नये य़ाचे स्वातंत्र्य मनुष्याकडे नक्कीच आहे. तेव्हा मनुष्याने विवेकाने नास्तिक, लोभी, दुर्जन यांची संगत टाळावी व संतांचीच संगत धरावी.

संगतीचा विलक्षण परिणाम मनुष्यावर होत असतो. मनुष्याच्या हातात कोणी काठी दिली तर तो काठी कुणाला मारण्याचा प्रयत्न करेल पण काठीऐवजी त्या मनुष्याच्या हातात आपण जपमाळ दिली तर मात्र तो त्या माळेने नामजप करण्याची शक्यता जास्त. काठीच्या संगतीचा परिणाम वेगळा आणि जपमाळेच्या संग लाभला तर मनुष्याच्या वागण्यात किती फरक पडतो आणि जर साक्षात भगवंताचा म्हणजे त्याच्या नामाचा संग लाभला तर त्या मनुष्यात किती फरक पडेल. संतसंगतीमुळे मनुष्याच्या जीवनाचे सार्थक होते.

चोखंदळ वाचकांनी खालील मनाच्या श्लोकांचा अभ्यास अवश्य करावा.

मना गुज रे तूज हे प्राप्त झाले।

परी अंतरी पाहिजे यत्न केले॥

सदा श्रवणे पाविजे निश्चयासी।

धरी सज्जनसंगती धन्य होसी॥२०२॥

*

मना सर्वही संग सोडुनि द्यावा।

अती आदरे सज्जनाचा धरावा॥

जयाचेनि संगे महादुःख भंगे।

जनी साधनेवीण सन्मार्ग लागे॥२०३॥

*

मना संग हा सर्वसंगास तोडी।

मना संग हा मोक्ष तात्काळ जोडी॥

मना संग हा साधका शीघ्र सोडी।

मना संग हा द्वैत निःशेष मोडी॥२०४॥

*

एकनाथी भागवतात कृष्ण आणि उद्धवाचा संवाद आहे, त्यात भगवंत म्हणतात,

“ऐशी तुझी सुलभ भक्ति । तरी अवघेचि भक्ति कां न करिती । 

देवो म्हणे भाग्येंवीण माझी भक्ति । न घडे निश्चितीं उद्धवा ॥ 

कोटि जन्मांची पुण्यसंपत्ती । जरी गांठीं असेल आइती । 

तैं जोडे माझ्या संतांची संगती । सत्संगें भक्ती उल्हासे॥”

(संदर्भ:- एकनाथी भागवत अध्याय ११, १५४९, ५०)

पूर्वसुकृत उदयास आले तरच संतसंग लाभतो. ध्यानीमनी राम असेल तर आपल्या कामात सुध्दा राम दिसतो. श्रीसद्गुरू गोंदवलेकर महाराजांच्या पायाला कान लावला तर त्यातून रामनाम ऐकायला येई असे वर्णन त्यांच्या चरित्रात आढळते.

माऊली म्हणतात की माझे अनंत जन्माचे पुण्य फळा आले म्हणून माझ्या मुखी नाम आले. साधकाने नाम घेताना हा भाव नित्य ध्यानी ठेवला तर नामाची गोडी खात्रीने चाखायला मिळेल असे वाटते.

लौकिक उदाहरण द्यावयाचे तर विजेचा प्रखर दाब जेथे साठविला गेला आहे त्या विद्युत घटाशी दुरून जरी स्पर्श झाला तरी ती वीज सर्वांगात क्षणात प्रविष्ट होते, तसे संत हे ज्ञान, वैराग्य, भक्तिप्रेम यानी कायावाचामनाने संपूर्ण व्यापून गेलेले असतात. तसेच सर्वानी याचा आपल्या जीवनात उपयोग करून घ्यावा व आपले जीवन भगवन्मय बनवावे हीच त्याची धारणा व खटपट असते. याकरिता त्याच्या संगतीत कोणी कसा जरी आला तरी त्याचे गुण दोष याति न विचारिता, सर्व संत त्या व्यक्तीवर कृपा करीत असतात. कोणी कितीही अज्ञानी, दुष्ट, दुराचारी, पापी असला तरी त्याची ती पापशक्ती संतांच्या पापनाशक, तारक अशा करुणाशक्तीपुढे व्यर्थ होते म्हणून महत्संग ‘अमोघ’ आहे असे सूत्रात म्हटले आहे.

भक्तिसूत्र ४० – – 

लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव ॥ ४० ॥

अर्थ : केवळ भगवंताच्या कृपेनेच सत्संग लाभतो.

विवेचन :  मागील सूत्रात महात्संग दुर्लभ आहे असे सांगितले आहे. दुर्लभ म्हणजे अशक्य नव्हे, अशक्याचा विचारच करावयाचा नसतो. दुर्लभ म्हणजे सामान्य प्रयत्नाने प्राप्त न होणारा. ज्याकरिता काही विशेष अधिकार, विशेष साधन अपेक्षित असते, तसा महत्संग दुर्लभ म्हणजे अगदीच न प्राप्त होणारा असा म्हणता येत नाही, तर त्याचे जे साधन या सूत्रात सांगितले आहे त्यानेच प्राप्त होणारा तो आहे. ते म्हणजे भगवत्कृपा.

जोपर्यंत भगवंताची कृपा होत नाही तोपर्यंत सद्‌गुरू प्राप्त होत नाही असे एक वचन आहे. भगवंताची कृपा कधी होईल याचा काहीही नेम नाही. ज्याप्रमाणे पाऊस कधी पडेल, याचा अंदाज हवामान खाते सांगू शकेल, पण अमक्या वेळी अमुक ठिकाणी पाऊस पडेलच असे सांगणे शक्य नाही. भगवंताच्या कृपेच्या बाबतीत सुद्धा आपण हेच समजू शकतो. आजपर्यंत अनेक संत होऊन गेले, त्यांनी विविध प्रकारे साधन केले आणि भगवंताची प्राप्ती करून घेतली. पण इथे प्रत्येकाचा मार्ग वेगळा आहे, प्रत्येकाची सामाजिक, आर्थिक आणि बौद्धिक पातळी वेगवेगळी असल्याचे आपल्या लक्षात येईल. पण त्यांची स्थिती अमुक अमुक होती म्हणून त्यांना भगवंताची प्राप्ती झाली असे म्हणणे चुकीचे ठरू शकेल.

यावन्नानुग्रहस्साक्षाज्जायते परमात्मनः।

तावन्न सद्गुरुं कञ्चित्सच्छास्त्रमपि नो लभेत॥

पूज्य बाबा बेलसरे एका ठिकाणी म्हणतात. साधना करून काहीही साधत नाही. मग, साधना का करायची? साधना अशासाठी करायची की साधनाने साधत नाही हे कळण्यासाठी साधना करायची. शेवटी देवाची प्रार्थना करायची की देवा, मला शक्य ते मी सर्व केलेझ तरी तुझी प्राप्ती झाली नाही. आता तूच काहीतरी कर. असे केले तर मनात शरणागत भाव दृढ होऊ लागतो. ज्याक्षणी साधक संपूर्ण शरणागत होऊन देवाची आळवणी करतो, तेव्हा भगवंताला यावेच लागते…! द्रौपदीने काकुळतीला येऊन भगवंतांची प्रार्थना केली, भगवंत धावत आले. गजेंद्राने अशीच प्रार्थना केली, भगवंत त्याला वाचवायला आले.

संत तुकाराम महाराजांचे चरित्र सामान्य प्रापंचिक मनुष्यासाठी आदर्श आहे, असे श्रीगोंदवलेकर महाराज सांगतात. संत तुकारामांच्या गाथेचा अभ्यास करताना असे लक्षात येते की त्यांना साक्षात्कार होण्या आधीचे जे अभंग आहेत, त्यात ते पांडुरंगाला विनवणी करतात की देवा मला सत्संग घडू दे. त्यात ते सत्संगाचा महिमा अधोरेखित करतात.

“तुम्ही संत मायबाप कृपावंत| काय मी पतित कीर्ती वाणू ||१|| अवतार तुम्हां धराया कारण उद्धरावे जन जडजीव ||२|| वाढवाया सुख भक्ति भाव धर्म कुळाचार नाम विठोबाचे ||३|| तुका म्हणे गुण चंदनाचे अंगी तैसे तुम्ही जगी संतजन ||४||”

भगवंतांची प्राप्ती झाल्यानंतर एका अभंगात ते म्हणतात,

“आम्ही वैकुंठवासी| आलो याच कारणासी||बोलिले जे ऋषी| साच भावे वर्ताया ||”

या सूत्रात ‘लभ्यते’ हे क्रियापद सहेतुक वापरले आहे. म्हणजे यात ‘लाभ’ होणे हा अर्थ ध्वनित होतो. लाभ हे शब्द अनुकूल व प्रयोजनयुक्त वस्तूच्या प्राप्तीकडेच केला जातो. संत तुकाराम महाराजांचा एक अभंग इथे देणे उचित होईल.

“दुर्बुद्धहि ते मना । कदा नुपजो नारायणा ॥१॥

आतां मज ऐसें करीं । तुझे पाय चित्तीं धरीं ॥२॥ 

उपजला भावो । तुझे कृपे सिद्धी जावो ॥३॥ 

तुका म्हणे आतां । लाभ नाहीं या परता ॥४॥”

– – सत्संगतीपेक्षा दुसरा श्रेष्ठ लाभच नाही, असे संत तुकाराम महाराज आपल्याला सांगतात.

साधकाच्या हातात आपली साधना नियमितपणे करावी आणि आपला शरणागत भाव कसा वाढेल यासाठी प्रयत्न करावेत. भगवंत कृपा केल्याशिवाय रहाणार नाही.

भगवत्कृपा व सत्संग याच्या प्राप्तीचा कार्यकारण संबंध सांगितला तो कसा सिद्ध होणार? याचे उत्तर पुढील सूत्रात दिले आहे.

नारद महाराज की जय!!!

– भक्ती सूत्र क्र. ३९ आणि ४०. 

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कहानी – साहब की घड़ी।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

इस देश में समय का हाल वही है जो किसी सरकारी अस्पताल के वेंटिलेटर का—धड़कन चल रही है, पर भरोसा किसी को नहीं। लोग कहते हैं ‘समय बीत रहा है’, जबकि सच्चाई यह है कि हम बीत रहे हैं और समय हमें किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी के भाव तौल रहा है।

एक महाशय थे, जो ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ की तरह अपना भविष्य बुन रहे थे। उन्हें गुमान था कि वे समय के सारथी हैं। वे हाथ में ऐसी ‘स्मार्ट’ घड़ी बाँधते थे जो उनके दिल की धड़कन से लेकर उनके बैंक बैलेंस तक का हिसाब रखती थी। पर उस दिन मामला ‘ऊपर की अदालत’ का था। सुबह-सुबह उनके घर के बाहर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी किसी घोटाले की फाइल दब जाने के बाद किसी मंत्री के चेहरे पर होती है।

साहब ने पूछा, “कौन हो भाई? यहाँ क्यों धरना दे रखा है?” वह बोला, “हुजूर, मैं समय का पटवारी हूँ। आपकी सांसों का खसरा-खतौनी जाँचने आया हूँ। सुना है आप वक्त को मुट्ठी में करने की फिराक में हैं?”

साहब बिफर पड़े, “अबे, जा यहाँ से! हम वर्तमान के मालिक हैं और भविष्य के सट्टेबाज।” पटवारी मुस्कुराया—वैसी ही मुस्कान जैसे शेर शिकार को देखकर ‘शाकाहार’ पर प्रवचन देने से पहले देता है। वह बोला, “मालिक, आप तो ‘धोबी के कुत्ते’ वाली स्थिति में हैं। वर्तमान आपको पहचानता नहीं और भविष्य ने अभी गोद लिया नहीं। आप तो बस उस ‘त्रिशंकु’ की तरह लटके हैं जो सोचता है कि स्वर्ग जा रहा है, पर असल में ग्रेविटी का शिकार है।”

शहर में शोर मच गया कि साहब का ‘वक्त’ रुक गया है। साहब ने सेल बदला, घड़ी पटकी, यहाँ तक कि कैलेंडर के पन्ने भी फाड़ दिए। पर अजीब बात! बाहर सूरज ढल ही नहीं रहा था। चिड़ियाँ हवा में रुकी थीं और साहब की चाय का धुआं भी किसी ‘स्टैच्यू’ की तरह खड़ा था।

साहब को लगा कि वे अमर हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा, पर पत्नी की आवाज़ ऐसे फंसी थी जैसे किसी ‘बफटिंग’ करते हुए वीडियो की तस्वीर। वे समझ गए—यह वरदान नहीं, यह ‘सस्पेंस’ का चरम है। क्या वे मर चुके हैं? या खुदा ने उनके लिए समय का चक्का ‘हाफ-क्लच’ पर छोड़ दिया है?

तभी उस पटवारी की आवाज़ आई, “साहब, इसे कहते हैं ‘सन्नाटा’। जब इंसान खुद को वक्त से ऊपर समझने लगता है, तब वक्त उसे अपनी लाइब्रेरी की एक ऐसी किताब बना देता है जिसे कोई नहीं पढ़ता। आप अपनी ‘महिमा’ के विज्ञापन छापते रहे, और यहाँ समय ने आपकी ‘एक्सपायरी डेट’ पर अपनी मुहर लगा दी।”

साहब घिघियाने लगे, “कोई तो रास्ता होगा? कोई तो रिश्वत? कोई तो गॉडफादर?” पटवारी ने एक कागज़ निकाला और कहा, “रास्ता एक ही है। अपनी इस ‘मैं’ वाली घड़ी को उतारकर उस ईश्वर की खूँटी पर टांग दो, जो बिना सुइयों के ब्रह्मांड चला रहा है। वरना आप ‘माया मिली न राम’ वाले मुहावरे का जीता-जागता विज्ञापन बन जाएंगे।”

साहब ने कांपते हाथों से अपनी स्मार्ट घड़ी उतारी। जैसे ही घड़ी ज़मीन पर गिरी, अचानक सब कुछ तेज़ी से घूमने लगा। सूरज बिजली की रफ़्तार से डूबा और उगा। साहब को लगा कि अब वे बच गए, अब वे भविष्य की गोद में हैं।

हवा चली, सन्नाटा टूटा। साहब ने चैन की सांस ली और अपने चेहरे पर हाथ फेरा। पर हाथ को चेहरा मिला ही नहीं! सामने वही पुराना पटवारी खड़ा था, जो अब हाथ में एक झाड़ू लिए फर्श साफ कर रहा था।

साहब ने चीखकर पूछा, “मैं कहाँ हूँ? मेरा भविष्य कहाँ है?” पटवारी ने इत्मीनान से जवाब दिया, “साहब, आप भविष्य की चिंता कर रहे थे, जबकि आप पिछले दस मिनट से एक ‘संस्मरण’ बन चुके हैं। अभी जो आपने जीया, वह आपकी आत्मा का ‘एक्जिट पोल’ था। अब आप न वर्तमान में हैं, न भविष्य में। आप बस इस कहानी का एक ‘फुल स्टॉप’ हैं, जिसे पाठक पढ़कर पन्ना पलटने वाला है।”

साहब गायब थे। कुर्सी खाली थी। घड़ी टूट चुकी थी। और ऊपर बैठा वह ‘महान मुनीम’ अपनी डायरी में लिख रहा था—”एक और गया, जो समझता था कि अलार्म लगाने से सूरज उसके इशारे पर जागता है।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९८ ☆ लघुकथा – “जानूमेट” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९८ ☆

?  आलेख – लघुकथा – जानूमेट ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

करीने से सजे ड्राइंग रूम के एक कोने पर अपनी राकिंग चेयर पर आगे पीछे डोलते हुए राजन एल्बम के पन्ने पलटते और खुद ही मुस्कराने लगते ।

तभी जुनू आई और इस तरह उन्हें मुस्कुराते देख बोलीं, क्या हुआ जानू, राजन बोले आई लव यू।

पिछले पैंतीस सालों के वैवाहिक जीवन में यह वाक्य हजारों बार जुनू और उनके जानू राजन के बीच संवाद, समझ, और प्यार व्यक्त करता ही रहा है।

नाश्ते के पहले अपनी दवा निकालते हुए डिब्बे पर छपा नाम जानुमेट 500 देख रंजन हमेशा मुस्कुरा देता था। जानूमेट। जैसे डाक्टर ने बीमारी की दवा नहीं, रिश्ते का नाम दे दिया हो। जब पहली नार्मल चेकअप में उसका शुगर लेवल अधिक आया था, तो मन में डर था, भविष्य का, परहेज का ।

डॉक्टर ने सहज स्वर में कहा था हर भोजन के साथ एक जानूमेट500, जीवन भर।

जीवन भर शब्द ने राजन को भीतर तक हिला दिया था, लेकिन जानूमेट ने उसे थाम लिया।

अब दिन के खाने की शुरुआत घड़ी से नहीं, जानूमेट से होती थी। नाश्ते की प्लेट लगे या देर हो जाए, उसका ध्यान पहले छोटी सी इस गोली पर जाता। जेब में, पर्स में, दराज में, कार में, हर जगह उसकी मौजूदगी रहती। जैसे कोई प्रेमी बिना बोले याद दिलाता रहे कि लापरवाही मत करना। दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाए तो वह घबराता नहीं था, बस जेब टटोलता था। जानूमेट है न।

धीरे धीरे उसने देखा कि दवा ने उसके भीतर एक अनुशासन जगा दिया है। वह समय पर खाने लगा, पैदल घूमने जाने लगा, मीठे से दूरी रखने लगा। हर तीन महीने में जांच करवाना अब मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बन गई थी। रिपोर्ट आते ही वह पहले खुद को देखता, फिर जानूमेट के डिब्बे को। जैसे कह रहा हो देखा, तुम्हारा साथ ।

कभी कभी उसे लगता यह गोली उससे ज्यादा फिक्र करती है उसकी। जब वह थक कर सब कुछ भूल जाना चाहता, तब जानूमेट उसे रोक लेती। जब वह कहता एक दिन न लेने से क्या होगा, तब जानूमेट चुपचाप आईने में उसका भविष्य दिखा देती। कोई डांट नहीं, कोई शोर नहीं, बस खामोश मौजूदगी।

एक दिन उसकी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा, पापा ये जानूमेट क्या है। उसने हंसते हुए कहा, यह मेरी जानू है। जो मुझे हर दिन याद दिलाती है कि खुद से प्यार कैसे किया जाता है। बेटी ने चौंक कर देखा, फिर समझ गई। उसने डिब्बे को आदर से उठाया, जैसे परिवार का कोई सदस्य हो।

शुगर की बीमारी ने उसे जो सिखाया, वह किसी प्रवचन में नहीं था। जीवन की देखभाल भी एक प्रेम है, बस उसमें, नियमित जांच होती है। जानूमेट ने उसे यह प्रेम करना सिखा दिया था। बिना शिकायत, बिना शर्त, हर भोजन के साथ। अपनी जिंदगी में जुनू और जानूमेट के अनुप्रास पर वह बरबस एक बार फिर मुस्करा पड़ा ।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७५ ☆ वर्ल्ड वेटलैंड डे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वर्ल्ड वेटलैंड डे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २७५ ☆ वर्ल्ड वेटलैंड डे… ☆

प्रकृति की सबसे शांत भाषा पानी है।जहाँ पानी ठहरता है, वहीं जीवन आकार लेता है। नदियाँ, झीलें, तालाब, पोखर और दलदली भूमि-इन्हें ही वेटलैंड्स कहा जाता है।

ये केवल जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की नाज़ुक जीवनधारा हैं। हर वर्ष 2 फ़रवरी को वर्ल्ड वेटलैंड डे मनाया जाता है, ताकि हम यह समझ सकें कि वेटलैंड्स की रक्षा करना,असल में जीवन की रक्षा करना है। पानी जहाँ थमता है,वहीं जीवन बोलता है…

वेटलैंड्स पक्षियों का आश्रय हैं,मछलियों का घर हैं, मिट्टी को उपजाऊ बनाने का आधार हैं और पर्यावरण को संतुलित रखने की अदृश्य शक्ति भी।

जब हम अपने गार्डन में नमी भरी मिट्टी देखते हैं, फूलों पर मंडराती तितलियाँ देखते हैं, या चिड़ियों को पानी पीते देखते हैं, तो यह सब हमें वेटलैंड्स के महत्व की याद दिलाता है। हर छोटा गार्डन, प्रकृति का एक मौन संदेश होता है। गार्डन केवल सौंदर्य नहीं है, वह प्रकृति से जुड़ने का माध्यम है। थोड़ा-सा पानी, थोड़ी-सी मिट्टी और थोड़ा-सा प्रेम। बस इतना ही चाहिए जीवन को पनपने के लिए। आज जब शहरीकरण बढ़ रहा है, तालाब सूख रहे हैं, और नदियाँ सिमटती जा रही हैं। तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम अपने स्तर पर प्रकृति को सँभालें।

प्रकृति विशाल है, पर उसकी साँसें बहुत नाज़ुक हैं। पानी की बचत करना, हरियाली बढ़ाना, अपने गार्डन को जीवंत रखना। ये छोटे-छोटे प्रयासवेटलैंड्स संरक्षण की दिशा में बड़ा योगदान बन सकते हैं। वर्ल्ड वेटलैंड डे हमें यही सिखाता है कि प्रकृति हमसे कुछ माँगती नहीं, बस समझदारी चाहती है। जहाँ वेटलैंड्स जीवित हैं, वहीं भविष्य सुरक्षित है।

प्रकृति से जुड़ना केवल पर्यावरण की चिंता नहीं,यह आत्मा की शांति का मार्ग भी है। जो इसे सहेजता है,वह अनजाने में स्वयं को भी सहेज लेता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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