(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी जी को समर्पित – भावना के दोहे – माँ।)
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सर- ए- आईना…‘।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक – बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८७ ☆
☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेख – “श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९४ ☆
न्यूयॉर्क से – संस्मरणात्मक आलेख – श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ज्ञानरंजन
(जन्म: 21 नवंबर 1936, निधन : 07 जनवरी 2026)
(हिंदी के प्रमुख कथाकार और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक थे। ‘साठोत्तरी’ पीढ़ी के साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान। उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई और वे जबलपुर के जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रहे। उनकी कहानियों में मानवीय रिश्तों का तीखा विश्लेषण और शहरी जीवन का मार्मिक चित्रण मिलता है, ‘कबाड़खाना’ उनकी लोकप्रिय गद्य रचना है और उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले।)
ज्ञानरंजन हिंदी कहानी के उस युग के प्रवर्तक स्वर हैं जिन्होंने “आम आदमी” को कथा का केंद्र बनाया। उन्होंने हमारे भीतर बसने वाले मौन, असहमति और पीढ़ियों के फासले को इतने स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया कि उनकी कहानियाँ समय की डायरी बन गईं। वे दैहिक जीवन से दुनिया छोड़ गए हैं। सबको किसी न किसी दिन जाना ही होता है, किन्तु वे अपने शब्द संवाद में और हमारे संस्मरणों में चिर जीवी बने रहेंगे।
उन्होंने पहल में मुझे स्थान दिया था, उनके निवास पर जाकर उनसे मिलने के अवसर आए, उनकी सादगी के चित्र सजीव हो रहे हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर, किसी समारोह में अनायास कई बार मिले, चरण स्पर्श करने का यत्न करते ही कंधे पकड़ लेते थे।
नमन ज्ञानरंजन 🙏
उनकी लेखनी में कोई कृत्रिमता नहीं थी । उनकी सोच जीवन के छोटे क्षणों में बड़े अर्थ खोजती थी। उनकी कहानी ‘पिता’ याद आ रही है। ऐसी कहानियाँ हमें अपने घर के भीतर झाँकने को विवश करती हैं । उस कमरे तक जहाँ पिता और पुत्र हृदय से नहीं, संकोच से बात करते हैं। समाज जैसे-जैसे ‘तरक्की’ की दौड़ में बढ़ा, पिता का अनुभव ‘अप्रासंगिक’ माना जाने लगा है । यही त्रासदी उनकी कथा पिता का महत्त्वपूर्ण बिंदु है।
ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी कथा साहित्य ने अपना एक साक्षी खो दिया। किंतु उनकी कहानियों का असर जीवित रहने वाला है। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक या आधुनिकता से नहीं, मनुष्यता से ही पीढ़ियाँ जुड़ी रहती हैं।
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नीचे मैं उनकी कहानी पिता का जो कथानक स्मरण है दे रहा हूं ।
उसी भाव को पिता पुत्र की वर्तमान पीढ़ी पर अधिरोपित कर श्रद्धांजलि स्वरूप एक नई कहानी लिख कर उन्हें समर्पित करता हूँ।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ज्ञानरंजन की कहानी — “पिता” का कथा सार
कहानी ‘पिता’ में एक वृद्ध व्यक्ति अपने बेटे के पास शहर आता है। बेटा अब एक आधुनिक, व्यवस्थित, व्यस्त जीवन में है। वह पिता का आदर करता है, पर उस आदर में वह आत्मीयता नहीं नियम और दूरी है।
पिता छोटे कस्बे के, सहज और भावुक व्यक्ति हैं। शहर की ठंडी दीवारों में उन्हें अपनेपन की जगह नहीं मिलती। टीवी, फ़ोन, ऑफिस की बातें और ‘मॉडर्न’ रहन-सहन के बीच पिता धीरे धीरे खुद को असहज महसूस करने लगते हैं। कहीं कुछ कहना चाहते हैं, पर शब्द नहीं ढूँढ पाते।
रात को वे बेटे को सोते देखते हैं और सोचते हैं , “यह अब मेरे बस का नहीं रहा।”
यह वाक्य पूरी कहानी का सार है। “पिता” केवल एक निजी संबंध की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ी के सोच परिवर्तन की कहानी है।
यह उस मौन पीढ़ी की कथा है जो समझ तो सब जाती है, पर कह नहीं पाती। और उस नई पीढ़ी की भी, जो सुन तो लेती है, पर समझना भूल गई है।
कहानी का वातावरण अत्यंत सूक्ष्म है । बेटे की व्यस्तता, पिता की निस्तब्धता, घर की ठंडी हवा, और उनके भीतर का अकेलापन । सब मिलकर एक अदृश्य संवाद रचते हैं।
पुत्र पिता को नई सुविधाओं से आराम पहुंचाना चाहता है, पर आत्म संतोषी पिता को वह पसंद नहीं।
एक दिन पुत्र खिड़की से देखता है कि पिता खटिया बाहर निकाल कर गर्मी से बचाव के लिए उस पर पानी छिड़क रहे हैं, किन्तु वह चाह कर भी कुछ कर नहीं सकता ।
ज्ञानरंजन का यह शिल्प आज भी पीढ़ीगत विमर्श का जीवंत प्रतीक है।
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भाव रूपांतरित कथा
“वाया वीडियो कॉल”
(ज्ञानरंजन की कहानी “पिता” का समकालीन पुनराख्यान)
लेखक : विवेक रंजन श्रीवास्तव
न्यूयॉर्क से
हवाई जहाज की खिड़की से नीचे झिलमिलाती बर्फ़ दिख रही थी। बूढ़े पिता ने कौतूहल से उस परतदार सफेदी को देखा । जैसे किसी पुराने समय की चिट्ठियाँ अब बर्फ़ बनकर फैल गई हों।
वह पहली बार बेटे के देश जा रहे थे,न्यूयॉर्क। बेटे ने महीनों पहले कहा था, “आपको देखे ज़माना हो गया, अब आ जाइए कुछ दिनों को।” टिकिट भेज रहा हूं।
पिता की पीढ़ी के पास अनुभव के समय का सरोवर था । धीरे बहता, विचार करता, जमा होता। बेटे की पीढ़ी के पास समय नहीं, बस “शेड्यूल” था । हर मुलाकात मोबाइल पर ‘कैलेंडर एंट्री’ में दर्ज।
एयरपोर्ट से घर तक बेटे ने गाड़ी में स्पॉटिफ़ाई पर कोई अंग्रेज़ी गाना लगाया, बीच-बीच में मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालता रहा। पिता खिड़की से बाहर देखते रहे। वही दृश्य जो उन्होंने कई बार कल्पना में देखे थे, उँची इमारतें, चौड़ी सड़कों का स्वप्निल अनुशासन। पर भीतर एक हल्की उदासी उठ रही थी, जिस पर वे विजय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करते , खिड़की से देखते बेटे से पूछते पर बेटे का मोबाइल नोटिफिकेशन, चौराहे के सिग्नल उसे उनसे उन्मुक्त बात करने से रोक देते ।
घर पहुँचे तो बेटे ने रोबोटिक आवाज़ से कहा, “Alexa, लाइट ऑन करो।”
पिता मुस्कुरा दिए, यह नई दुनिया थी, जहाँ चाय तक आवाज़ से बनती थी और रिश्ते इमोजी से जताए जाते थे।
रात को, जब बेटा लैपटॉप पर देर तक काम करता रहा, पिता ने चुपचाप खिड़की से बाहर देखा , बर्फ़ गिर रही थी।
उन्हें याद आया, कैसे कभी गाँव में वह बेटे के लिए स्वयं घोडा बन जाते थे, और वह दौड़ में सबसे आगे निकलने का सपना देखा करता था। अब वही बेटा ऐसी दौड़ में था जिसका अंत किसी को नहीं पता।
अगली सुबह कॉफी के साथ पिता बोले,
“तुम्हें कभी अपने बचपन का घर याद आता है?”
बेटे ने हँसकर कहा, “डैड, अब तो सब कुछ क्लाउड में है, लगता है यादें भी।”
पिता ने मुस्कुराहट में अपनी भावनाएं छिपा ली।
बेटे की पत्नी और बच्चे कोई 6 घंटे की ड्राइव पर रहते हैं, शाम को वीडियो कॉल पर बेटा अपनी पत्नी और बच्चों को दिखा रहा था “ भारत से दादाजी आए हैं।”
पिता स्क्रीन पर झुके बच्चों को देख मुस्कुराए। उन्हें लगा, अब हर रिश्ता “वाया वीडियो कॉल” है निकट मगर असम्पृक्त।
रात में बेटे ने पास आकर धीमे से उनका हाथ दबाते हुए कहा, “डैड, मुझे पता है आप सोचते हैं मैं दूर चला गया हूँ।”
पिता ने उसकी ओर देखा बोले “नहीं बेटा!
पर जो वे नहीं बोले वह था “दूरी केवल मीलों से नहीं, संवाद और मौन से भी मापी जाती है।”
कुछ देर बाद धीरे से बोले, “देखो, बाहर अब भी बर्फ़ गिर रही है, पर कोई आवाज़ नहीं होती।”
बेटा चुप था। दोनों ने खिड़की से बाहर की ओर देखा।
शायद वही मौन अब दोनों पीढ़ियों के बीच था , सफेद, सुंदर और बर्फ़ सा ठंडा।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – इंसाफ का पोस्टमार्टम।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७६ – व्यंग्य – इंसाफ का पोस्टमार्टम ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
सफेद कुर्ते और कड़कीली इस्तरी वाली पतलून पहने ‘बड़े चौधरी’ गाँव की चौपाल पर पधारे। हाथ में चमचमाता टैबलेट था और बगल में खड़े कारिंदे पंखा झल रहे थे। सामने वो बदनसीब खड़ा था जिसकी बेटी की आबरू तार-तार हो गई थी।
बड़े चौधरी: “रे बावले, यूँ रोए जावे है! आँसू पोंछ और ये बता कि जब यो कांड होया, उस बखत हवा की रफ़्तार के थी?”
पीड़ित पिता: “साहब, हवा का के करना? मेरी तो दुनिया उजड़ गई।”
बड़े चौधरी: (झुंझलाकर) “तन्ने समझ कोन्या आवे! देख, अगर हवा तेज़ होती तो तेरी छोरी की चिल्लाहट दूर तक जाती। जे हवा धीरे थी, तो यो ‘लोकल कम्युनिकेशन’ का फेलियर है। हम सोच रहे हैं कि हर खेत में एक ‘लाउडस्पीकर’ लगवा दें, ताकि जब कोई हाथ लगावे, तो छोरी सीधा रागनी गा दे और सारा गाम जाग ज्या।”
एक ग्रामीण: “चौधरी साहब, वे लड़के तो नशे में धुत थे, सरेआम घूम रहे थे।”
बड़े चौधरी: “नशा? अरे भाई, वो नशा नहीं था, वो तो ‘फ्रस्ट्रेशन’ था। उन छोरों ने पढ़ाई करी, पर नौकरी कोन्या मिली। अब खाली दिमाग तो शैतान का घर होवे है। अब वे शैतानी खेत में नहीं करेंगे तो के लाइब्रेरी में जाकर करेंगे? हमें समझना होगा कि ये ‘बायोलॉजिकल डिजास्टर’ है। अच्छा ताऊ, एक बात बता, तेरी छोरी ने भागने की कोशिश करी थी के खड़ी रही?”
पिता: “साहब, वे चार थे, पापी थे… वो बेचारी कहाँ भागती?”
बड़े चौधरी: “न्यूं कोन्या काम चाले! देख, हमने डेटा निकाला है कि अगर पीड़ित 40 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से भागे, तो बलात्कारी उसे पकड़ नहीं सकता। हम गाम की हर छोरी को ‘पीटी उषा’ बनाने की ट्रेनिंग देंगे। जुल्म रोकना हमारा काम कोन्या, जुल्म से तेज भागना सिखाना हमारा विजन है।”
तभी साहब ने अपने टैबलेट पर कुछ ग्राफ दिखाए और बोले:
“हमने फैसला किया है कि जिस खेत में ये हादसा हुआ, उस खेत की मिट्टी का सैम्पल लैब में भेजेंगे। अगर मिट्टी ज्यादा मुलायम हुई, तो कसूर जमींदार का है क्योंकि लड़कों को फिसलने का डर नहीं था। और सुनो, आइंदा से कोई छोरी रात को बाहर निकले तो साथ में ‘आधार कार्ड’ जरूर रखे, ताकि अपराधी को पता रहे कि वो किसके साथ गलत कर रहा है। बिना पहचान के तो बेचारे लड़के कन्फ्यूज हो जाते हैं।”
गाँव का एक बुजुर्ग: “साहब, उन दरिंदों को फांसी कड़ थानी (कब तक) होगी?”
बड़े चौधरी: (हँसते हुए) “फांसी? अरे ताऊ, फांसी देने से रस्सी खराब होती है और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है। हम तो उन छोरों का ‘हृदय परिवर्तन’ करेंगे। उन्हें तीन महीने तक ‘नैतिक शिक्षा’ की रील दिखाई जाएगी। हमें अपराधी से नफरत नहीं करनी, उसके ‘एक्शन’ को ‘इग्नोर’ करना सीखना है।”
अंत में चौधरी साहब गाड़ी में बैठते हुए बोले— “देखो भाई, गाम की इज्जत गाम के हाथ में। छोरियों को कहो कि वे मार्शल आर्ट सीखें और लड़कों को हम कहेंगे कि वे फोटो खींचते वक्त फ्लैश कम इस्तेमाल करें। आखिर हमें डिजिटल इंडिया भी तो बनाना है!”
चमचमाती गाड़ी धूल उड़ाती चली गई। पीछे रह गया वो पिता, जो अब ये सोच रहा था कि उसकी बेटी के साथ ‘हादसा’ हुआ था या साहब के लिए कोई ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ तैयार हुई थी।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “ॐ का : पौधों पर सकारात्मक प्रभाव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७२ ☆ ॐ का : पौधों पर सकारात्मक प्रभाव… ☆
ॐ केवल एक शब्द नहीं, यह सृष्टि की पहली धड़कन है। जब यह ध्वनि हरियाली से जुड़ती है, तो पेड़-पौधे केवल बढ़ते नहीं, जीवंत चेतना बन जाते हैं। ॐ के साथ सूरजपुर गाँव के सभी लोग अपने दिन की शुरुआत करते ।नदी किनारे एक छोटा-सा उपवन था। वहाँ एक साधिका रोज़ सुबह सूर्योदय से पहले आती, नंगे पाँव धरती को स्पर्श करती और एक बरगद के नीचे बैठकर धीरे-धीरे ॐ का उच्चारण करती।
उसकी आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर स्थिर और प्रेम से भरी थी।
“ॐ… ॐ… ॐ…”
ध्वनि हवा में नहीं,
धरती की नसों में उतर जाती थी।
धीरे-धीरे उस उपवन में परिवर्तन होने लगा। सूखे पौधों में नई कोंपलें फूटने लगीं, पत्तियाँ अधिक हरी और चमकदार होने लगीं, फूलों में सुगंध बढ़ गई, पक्षी वहाँ अधिक समय ठहरने लगे। गाँव के लोग आश्चर्य में थे। किसी ने पूछा—
“माँ, आपने कोई दवा डाली है क्या?”
साधिका मुस्कुराई और बोली—
“नहीं पुत्र,
मैंने केवल ॐ की ध्वनि से उन्हें याद दिलाया है
कि वे भी ब्रह्म का ही अंश हैं।”
ॐ और पेड़-पौधों का गहरा संबंध भावात्मक सत्य है । ॐ की ध्वनि कंपन है,और हर पौधा कंपन को महसूस करता है।जब प्रेमपूर्ण ध्वनि मिलती है,तो पौधा तनाव नहीं, विकास चुनता है।
ॐ = शांति + संतुलन + जीवन ऊर्जा।
पेड़-पौधे शांति में सबसे अच्छे से बढ़ते हैं। ॐ धरती को यह संदेश देता है कि तुम अकेली नहीं हो,मैं तुम्हारे साथ हूँ।”जब आप पेड़ लगाएँ,तो केवल पानी न दें…ॐ की ध्वनि भी दें।जब आप पौधे के पास बैठें,तो उसे वस्तु न समझें…जीवित परिवार मानें।हर “ॐ” एक बीज है,जो हरियाली के रूप में फल देता है।
आप जहाँ भी पेड़ लगाएँ, जहाँ भी हरियाली की बात करें, वहाँ आपकी वाणी में ॐ की शक्ति हो इसका ध्यान रखें । ग्रीन मोटिवेशन सिर्फ पौधे उगाना नहीं बल्कि पौधों के साथ निरंतर ग्रो होना है ।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बाल कहानी – “बर्फ की आत्मकथा” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३५ ☆
☆ बाल कहानी – बर्फ की आत्मकथा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मैं पानी का ठोस रूप हूं. द्रव्य रूप में पानी बन कर रहता हूं. जब वातावरण का ताप शून्य तक पहुंच जाता है तो मैं जम जाता हूं. मेरे इसी रूप को बर्फ कहते हैं. मेरा रासायनिक सूत्र एचटूओ है. यही पानी का सूत्र भी है. यानी मेरे अंदर हाइरड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु मिले होते हैं.
जब पेड़पौधे वातावरण से कार्बन गैस से कार्बन लेते हैं तब मेरे पानी से हाइड्रोजन ले कर शर्करा बनाते हैं. इसे ही पौधों की भोजन बनाने की प्रक्रिया कहते हैं. इसे हिंदी में प्रकाश संश्लेषण कहते हैं. इस क्रिया में मेरे अंदर की आक्सीजन वातावरण में मुक्त हो जाती है.
बर्फ अपनी आत्मकथा सुना रहा था. सामने बैठा हुआ बेक्टो ध्यान से सुन रहा था.
बर्फ ने कहना जारी रखा. ध्रुवों पर तापमान शून्य के करीब रहता है. इस कारण वहां का पानी जम रहता है. इस जमे हुए पानी के पहाड़ को हिमनद कहते हैं. ये बर्फ के रूप में जमा होता है. यह सुन कर बेक्टो की आंखें फैल गई.
तुम सोच रहे हो कि सूर्य के प्रकाश से मेरा पानी पिघलता नहीं होगा ? बिलकुल नहीं. सूर्य का प्रकाश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. इस कारण जानते हो ? नहीं ना. तो सुनो. सूर्य का जितना प्रकाश मेरे ऊपर पड़ता है उतना ही मैं वापस वातावरण में लौट देता है. मैं सूर्य के प्रकाश को अपने पास नहीं रखता हूं. इसे वैसा ही वातावरण में लौटा देता हूं जैस यह मेरे पास आता है.
यही वजह है कि बर्फिली जगह लोगों को काला चश्मा लगाना पड़ता है. यहां पर प्रकाश बहुत तीव्र होता है. इस की चमक से आंखे खराब हो सकती है. इसलिए वे आंखों पर चश्मा लगाते हैं.
ओह ! बेक्टो की आंखे चमक गई. उस ने पूछा कि सूर्य का प्रकाश उसे पिघलाता नहीं है.
तब बर्फ ने कहा कि सूर्य का प्रकाश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. इस का कारण यह है कि मैं बर्फ की कोई ऊष्मा अपने अंदर ग्रहण नहीं करता हूं. मेरी मोटीमोटी पर्त भी पारदर्शी होती है. वे प्रकाश को आरपार पहूंचा देती है. या वातावरण में लौटा देती है. इसलिए मैं पिघलता नहीं है.
यदि मैं पिघल जाऊ तो जानते हो क्या होगा ? बर्फ के पूछने पर बेक्टो ने नहीं में गरदन हिला दी. तब बर्फ बोला कि यदि मेरी सभी बर्फ पिघल जाए तो इस से समुद्र के सतह पर 60 मीटर ऊंची दीवार बन जाएगी. इस पानी की दीवार में धरती की आधी आबादी डूब कर मर जाए.
यह सुन कर बेक्टो चकित रह गया.
बर्फ ने बोलना जारी रखा. मैं पिघलता नहीं हूं इसलिए हिमनद के रूप में जमा रहता हूं. यदि कभी मैं पिघलता हूं तो इस का कारण आसपास के वातावरण के तापमान बढ़ने से पिघलता हूं. वैसे जैसा रहता हूं वैसा जमा रहता हूं. यही मेरी कहानी है.
बेक्टो को बर्फ की कहानी अच्छी लगी. उस ने कहा कि आप तो सूर्य से भी नहीं डरते हैं.
इस पर बर्फ बोला कि सूर्य मेरा कुछ नहीं बिगाड़ता है. कारण यह है कि मैं ताप को ग्रहण नहीं करता हूं. इसलिए वातावरण से प्राप्त सूर्य के ताप को उसी के पास रहने देता हूँ. यदि तुम भी किसी की बुराई ग्रहण न करें तो तुम्हारी अंदर बुराई नहीं आ सकती है. तुम मेरी तरह अच्छाई ग्रहण करते रहो तो तुम भी मेरी तरह सरल और स्वच्छ बन सकते हो. यह कहते ही बर्फ चुप हो गया.
बेक्टो सोया हुआ था. उस की आंखे खुल गई. उस ने एक अच्छा सपना देखा था. इस सपने में वह बर्फ से आत्मकथा सुन रहा था. यह आत्मकथा बड़ी मज़ेदार थी इसलिए वह मुस्करा दिया.
(पूर्वसूत्र- नाईक सरांची अचानक झालेली ही भेट वर वर पहाता योगायोगाने घडलेल्या एखाद्या घटनेसारखी वाटली तरी प्रत्यक्षात ती तशी नव्हती. ती भेट लवकरच मला अमूल्य असं कांही देण्यासाठी एक निमित्त ठरणार होती हे मला तेव्हा माहित नव्हतं एवढंच!)
सरांशी झालेल्या भेटीच्या वेळी एखाद्या विकएण्डला मी देशपांडेंकडे जायचं असं ठरलं होतं. त्यानंतर काही दिवसांनी बऱ्यापैकी वेळ होता म्हणून मी राजू/नितीनना फोन केला आणि आज तुम्हाला सोयीचे असेल तर माझा दुपारनंतर येऊन जायचा विचार आहे एरवी पुन्हा कधीतरी असं सांगितलं.
” जरूर या. आज आम्ही घरीच आहोत. ” राजू अगत्याने म्हणाली, ” हो आणि येताना तुमच्या कथांची कात्रणं जमलं तर घेऊन या. ” असंही सांगितलंन.
“परवा तुम्ही इथून गेल्यानंतर नानांनी आमच्या ‘चिरानी प्रकाशन’ तर्फे तुमचा कथासंग्रह प्रकाशित करा असं आवर्जून सुचवलं होतं. आज अनायसे येताच आहात तर त्या कथांची कात्रणंही घेऊन या. ” राजू म्हणाली.
मला हे अनपेक्षित होतं.
पण मला ते सहजासहजी स्विकारावंसं वाटेना. मुख्य म्हणजे मी आजवर केलेलं कथालेखन स्वान्तसुखायच तर होतं. केवळ एखादा अनुभव मनाला भिडला किंवा चांगला कथा विषय सुचला की लगेच लिहायला वेळ मिळायचाच नाही आणि वेळ मिळेल तेव्हा निवांत लिहू म्हंटलं तरी ते बऱ्याचदा जमायचंही नाही. मग लेखनाला थोडीफार तरी नियमितता यावी या विचाराने मी चांगल्या चांगल्या मासिकांच्या कथालेखन स्पर्धांना कथा लिहून पाठवायचं ठरवलं. त्यानिमित्ताने लेखन सराव रहावा एवढाच उद्देश होता. अनेक कथांना स्पर्धा पुरस्कार मिळत गेले, कथा आवडल्याची वाचक पत्रे येऊ लागली हाच आनंद माझ्यासाठी पुरेसा होता. त्यामुळे कथा साठत जातील तसे त्यांचे कथासंग्रह प्रकाशित होण्यासाठी आवर्जून प्रयत्न करावेत असं मला कधीच वाटलं नव्हतं. बॅंकेच्या कामाचे व्याप आणि जबाबदाऱ्याच एवढ्या होत्या कीं मनात नेहमी त्याचेच विचार गर्दी करायचे. त्यामुळे कथा लिहून झाली कीं मनाचा तो कप्पा लगेच आपोआपच बंद व्हायचा!
पण योगायोगच असा की कांही वर्षांपूर्वी नाईक सरांनीच पाठपुरावा करून महाराष्ट्र राज्य साहित्य-संस्कृती महामंडळाच्या अनुदान योजनेतून माझा ‘जगावेगळी’ हा पहिला कथासंग्रह प्रसिद्ध होईपर्यंत सातत्याने आग्रह, मार्गदर्शन आणि प्रयत्न करीत मला प्रोत्साहित केलं होतं. आणि आता या दुसऱ्या संग्रहाचं नियोजनही त्यांच्याच पुढाकाराने सुरू होणार होतं!!
सरांचा माझ्यावर लोभ होता हे खरंच, पण यावेळी सरांचा हा प्रस्ताव मला सहजासहजी स्वीकारता येईना. त्यादिवशी मी जाताना कथांची फाईल घेऊन गेलो पण ती देताना अतिशय मोकळेपणानं मी त्या दोघांनाही हेच सांगितलं होतं.
“सरांच्या मनात माझ्या बद्दल असलेल्या सद्भावनांमुळेच तुम्हाला त्यांनी हे सुचवलेलं असणार नक्कीच. म्हणूनच मला मनापासून एक सांगावसं वाटतं. तुम्ही दोघेही लेखक आहात, साहित्यप्रेमी आहात, आणि रसिक वाचकही! तुम्ही दोघांनीही या कथा वाचून कथासंग्रह प्रकाशित करायच्या दृष्टीने तुम्हाला त्या आवडतायत कां योग्य वाटतात कां ते पहा. मगच पुढे काय करायचं ते आपण ठरवूया. सर म्हणाले म्हणून घाई गडबडीने कांही नको करायला. ” ते दोघेही हसून ‘बरं’ म्हणाले. त्यांच्या हसण्याचा अर्थ मला पुढे त्यांच्याकडून कथांचं डीटीपी सुरू झाल्याचं कळलं तेव्हाच समजला. प्रूफ रिडिंग मी स्वतः करायची तयारी दाखवली तेव्हाही राजू हसून ‘चालेल’ म्हणाली. डीटीपी तिने स्वत:च केलेलं होतं. प्रूफरिडींग मी दर शनिवार-रविवार त्यांच्याकडे जाऊन पूर्ण केलं खरं पण विशेष कौतुक म्हणजे किरकोळ अपवाद वगळता त्यात कांहीच चुका नव्हत्या. तो कथासंग्रह प्रकाशित होईपर्यंत प्रत्येक टप्प्यावर असं अतिशय मनापासून आणि हसतमुखाने दिलेलं राजू आणि नितीन यांचं योगदान खरोखरच कौतुकास्पद होतं! त्या दोघांची ही कामाची पद्धत आणि त्यांचं साहित्यप्रेम माझ्या दृष्टीने आदर्श म्हणावं असंच होतं!
त्या कथासंग्रहाला प्रस्तावना कुणाची घ्यायची असा विषय निघाला तेव्हा मी अतिशय मनापासून भ. रा. नाईक सरांचंच नाव घेतलं होतं. पण तरीही त्या दोघांनी ‘साप्ताहिक सकाळ’ चे त्यावेळचे संपादक श्री. ‘सदा डुम्बरे’ यांचं नाव सुचवलं!
“या संग्रहातील बऱ्याच कथा ‘साप्ताहिक सकाळ’ कथा स्पर्धेतील विजेत्या कथा आहेत. त्यामुळे आधी ‘सदा डुम्बरे’ सरांनाच विचारूया ” राजू म्हणाली होती.
ते योग्यही होतं. पण त्यांची वेळ घेऊन त्यांना भेटणं, त्यांनी संमती देणं, त्यांच्या व्यस्त वेळापत्रकातून वेळ काढून प्रस्तावित संग्रहातील सर्व कथा त्यांनी वाचणं आणि प्रस्तावना लिहून देणं हे सगळंच मला अशक्यप्रायच वाटू लागलं!
” मी फोन करून त्यांची अपॉइंटमेंट घेईन. ते काय म्हणतात ही पुढची गोष्ट. प्रयत्न तरी करू. ” राजू म्हणाली. आणि पुढे आठवड्याभरातच “मी त्यांची भेट घेऊन त्यांना आपला मनोदय सांगितला. त्यांनी लगेच होकारही दिलाय. मी कथांची फाईल घेऊनच गेले होते. ती त्यांना वाचायला देऊन आलेय. सदा डुम्बरेसर तुम्हाला ओळखतात म्हणाले. ” असंही तिने सांगितलं.
सदा डुम्बरे सर मला ओळखतायत हे समजलं तेव्हा कथास्पर्धांमधील माझ्या कथांमुळे ते फक्त नावानेच ओळखत असणार असंच मला वाटलं पण ते तेवढंच नव्हतं! जेव्हा त्यांनी दिलेल्या सहकार्याबद्दल मी आवर्जून ‘धन्यवाद’ द्यायला त्यांना फोन केला तेव्हा त्यांनी माझ्या संदर्भातल्या एका प्रसंगाची खूप जुनी अशी एक आठवण आवर्जून मला करून दिली, तेव्हा मी आश्चर्याने थक्क होऊन गेलो! एखाद्याबद्दलची कृतज्ञता योग्य वेळी मनापासून बोलून दाखवण्यातला त्यांचा मोठेपणा खरंच अपवादात्मक असाच. त्यांनी मला आठवण करून दिलेली माझ्या संदर्भातली ती घटना माझ्या दृष्टीने तशी एक साधीच घटना होती. पण तरीही ती त्यांनी इतकी वर्षं उलटून गेल्यानंतरसुद्धा माझ्या नावासकट लक्षात ठेवावी हे आश्चर्य वाटावं असंच होतं!
लिहिण्याच्या ओघात त्या घटनेचा संदर्भ आलाच आहे तर ती घटनाही आवर्जून सांगणं मला अगत्याचं वाटतं. कारण ती घटनाच आज डुम्बरे सरांचं मोठेपण अधोरेखित करायला निमित्त ठरलेली आहे! मी आधी उल्लेख केल्याप्रमाणे ही तेव्हापासून सहा सात वर्षे आधीची घटना. मी कथालेखन स्पर्धेसाठी ‘साप्ताहिक सकाळ’ साठी पाठवलेली एक कथा वेळेत पोहोचू शकली नव्हती त्यामुळे स्पर्धेसाठी तिचा विचार झालेला नव्हता. पुढच्या वर्षी तीच कथा मी ‘साप्ताहिक सकाळ कथालेखन स्पर्धे’साठी पुन्हा पाठवली. सुदैवाने त्याच कथेला त्यावर्षी पहिल्या नंबरचा पुरस्कारही जाहीर झाला. तसे त्यांचे पत्रही मला मिळाले. तरीही त्या कथास्पर्धेचा सविस्तर निकाल पहाता यावा म्हणून मी एका पेपरस्टॉल वरून नुकताच प्रकाशित झालेला ‘साप्ताहिक सकाळ’ चा अंक आवर्जून विकत घेतला. आणि तो सहज चाळू लागलो तेव्हा मला धक्काच बसला. कारण त्या अंकात गेल्यावर्षी मी स्पर्धेसाठी पाठवलेली हीच कथा तेव्हा स्पर्धेत समाविष्ट न झाल्याने प्रसिद्धीसाठी मात्र स्वीकारलेली असावी, म्हणूनच ती या आठवड्याच्या अंकात आज प्रसिद्ध झाली होती! पुढच्याच आठवड्यात प्रसिद्ध होऊ घातलेल्या कथा-विशेषांकात यावर्षीची पारितोषिक प्राप्त सर्वोत्तम कथा म्हणूनही हीच कथा अनवधानाने पुन्हा प्रकाशित होणार होती! ते आक्षेपार्ह तर ठरणार होतंच आणि ‘साप्ताहिक सकाळ’च्या प्रतिमेला तडा जायला निमित्तही! अर्थातच डुंबरे सरांची चूक नसूनही मुख्य संपादक म्हणून याची झळ डुंबरे सरांनाही बसणार होतीच. मी त्या अंकातील स़पादक म्हणून दिलेला त्यांचा फोन नंबर पाहून लगेच त्या नंबरवर फोन केला. फोनवर सुदैवाने संपादक सदा डुम्बरे सरच होते. मी त्यांना नेमकी वस्तुस्थिती सविस्तर सांगताच ते अवाक् झाले.
“तुम्ही आज आवर्जून हे सांगितलंत खूप बरं झालं. मी तातडीने यात लक्ष घालतो. ” ते म्हणाले होते.
अर्थातच गुणवत्तेनुसार तयार केलेल्या पारितोषक प्राप्त कथांच्या यादीतल्या माझ्या कथेऐवजी दुसऱ्या कथेला ती संधी मिळणं अपेक्षितच होतं. मुख्य म्हणजे नकळत घडलेली चूक योग्य वेळी दुरुस्त होणंही तितकंच आवश्यकही होतं.
अर्थात हे सगळं याच क्रमाने त्या त्या वेळी घडत गेलं म्हणूनच केवळ फार मोठं अरिष्ट टळलं याचं मला समाधान होतं. प्रत्येक माणसांप्रमाणेच प्रत्येक कथाही आपापलं प्राक्तन घेऊनच जन्माला येत असते याचं एक लेखक म्हणून मला आलेलं ते प्रत्यंतरच होतं!
तीच कथा आता प्रकाशित होऊ घातलेल्या माझ्या ‘स्पर्श प्रकाशाचा’ या कथासंग्रहात समाविष्ट असणे आणि ती पुन्हा या संग्रहाला प्रस्तावना लिहिण्यापूर्वी ‘सदा डुम्बरे’ सरांच्याच समोर जाणे हा सुध्दा एक अनोखा योगायोगच होता!
खूप वर्षांपूर्वी घडलेलं हे सगळं मी विसरूनही गेलो होतो. पण या पार्श्वभूमीवर मी डुंबरेसरांना धन्यवाद द्यायला जेव्हा फोन केला तेव्हा माझ्याशी बोलताना त्यांनी याच घटनेची मला आठवण करून दिली आणि आपल्या हातून घडून गेलेली एखादी सकारात्मक गोष्ट सुध्दा नकळत दुसऱ्यासाठी प्रदीर्घकाळ स्मरणीय कशी ठरू शकते याचा सुखद अनुभव मला आला! एरवीही त्यांनी प्रस्तावना लिहायला नकार नसताही दिला पण माझं नाव नजरेसमोर आलेल्या क्षणी त्यांच्या मनात खोलवर रूजलेल्या त्या प्रसंगाच्या माझ्या संदर्भातल्या आठवणीचं त्यांना नेमकं स्मरण होणं आणि त्यांनी त्याचा मोकळेपणाने आवर्जून उल्लेख करणं हा त्यांचा चांगुलपणाच म्हणायला हवा!
नाईक सरांचं फक्त एकदोन दिवसांच्या सवडीनं पुण्यात येणं, त्यांना त्यावेळी माझी नेमकी आठवण होणं, त्यांचं मला आवर्जून फोन करणं, त्यांच्या लेक न् जावयाच्या घरी आमची भेट होणं, त्या दोघांनी नेमकी अलीकडेच त्यांची नवीन प्रकाशन संस्था सुरू केलेली असणं, सरांच्या मनातील माझ्याबद्दल असलेल्या लोभामुळे त्यांना माझा नवीन कथासंग्रह त्या घरच्याच प्रकाशन संस्थेतर्फे प्रकाशित व्हावा असं मनापासून वाटणं, आणि त्यांच्या इच्छेला त्यांच्या लेक जावयानेही अगदी मनापासून प्रतिसाद देणं या एका महिन्याभरातच घडून गेलेल्या सगळ्या अनपेक्षित घटनांचे इतरही अनेक धागेदोरे या कथासंग्रहाच्या प्रकाशन समारंभाशीही आश्चर्यकारकरित्या जोडले जाणार होते आणि ‘त्या’च्या कृपालोभाची अशा अनेक धाग्यादोऱ्यांनी घातली गेलेली वीण माझ्या उर्वरित आयुष्याला एक अनोखी कलाटणी देऊन जाणार होती हे मात्र माझ्या गावीही नव्हतं!