(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी…।
रचना संसार # १०४
☆ गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – रथ यात्रा ।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१३ ☆
☆ संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
जी हाँ ये सारी कच्छ रियासत की अपनी स्वयं की मुद्राएं थींl ये सोने, चांदी और ताँबे के सिक्कों से बनी होती थींl इन सभी सिक्कों के एक तरफ कच्छ के राजा का नाम देवनागरी लिपी में और राजघरानों के चिन्ह त्रिशूल, कटार और अर्धचंद्र उकेरे होते थेl
कच्छ का मांडवी तट जो अरब सागर का एक तट था यहाँ चौरासी देश की ध्वजाएं लहराती थींl इसी कारण से इसे चौरासी झंडो का बंदरगाह भी कहते थेl ये झंडे कच्छ के व्यापारिक साम्राज्य को दर्शाते थेl यहाँ हाथी दाँत, खजूर, लकड़ी, मसाले आदि आयात होते थेl और हस्तशिल्प, घी, चमड़ा, नमक आदि निर्यात होते थेl
उन दिनों वस्तु विनिमय होता था परन्तु कच्छ में व्यापारियों को प्रवेश करने से पहले इन मुद्राओं को खरीदना होता था, तभी वो मुद्राओं से व्यापार कर सकते थेl
सिर्फ समुद्री मार्ग से नहीं अपितु सडक मार्ग से भी व्यापार राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और मुंबई में भी होता थाl सड़क व्यापार अधिकतर ऊँट से होता थाl ये खराई ऊँट होते थेl ये पानी में भी तैर सकते थेl ये ऊँट समुद्र के आसपास के मैंग्रोज खाते थेl ये कई दिनों तक मीठे पानी के बिना भी जीवित रह सकते थेl
ऊन दिनों मांडवी बंदरगाह पर जहाजों को दिन और रात के समय रास्ता दिखाने की बड़ी ही अनोखी तकनीक होती थीl दिन में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ से दूरबीन की सहायता से समुद्री जहाजों को देखकर अधिकारी रंगीन झंडे लहराते थेl ज्वार का इंतजार करते ये किनारे से लग जाते थेl
वहीं रात्रि में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ पर बहुत बड़ी सी मशाल जलती थी जो लाइट हाउस का काम करती थीl जब दूर से आने वाले जहाज की लाइट दिखती तब मांडवी के नाविक अपनी नावों में मशालें जलाकर उनके पास पहुंचते और उन्हें अपने साथ सुरक्षित ले आते थेl जब ठंड के दिनों में कोहरा होता तब एक समयावधि पर तोप दागते थे और विशाल नगाड़े भी बजाते थेl जिससे जहाजों को बंदरगाह की दिशा मालूम हो जाती थीl
जब 1947 में हमें आजादी मिली तब कच्छ को भी भारत में मिला लिया गयाl उस समय के अंतिम शासक मदनसिंह जी ने अंतिम सिक्का बनवाया जिसपर देवनागरी लिपि में जयहिंद लिखवाया थाl
स्वतंत्रता के पश्चात कच्छ को मुंबई के एक जिले रूप में सम्मिलित कियाl तब कच्छ की सरकार मुंबई से चलती थीl पर भाषाओं को ध्यान में रखकर मुंबई का विभाजन हुआ तब कच्छ को मुंबई से अलग कर गुजरात में शामिल कर दिया गयाl
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘वो मेरा मार्गदर्शक…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३२ ☆
कविता – वो मेरा मार्गदर्शक… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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एक पूरा समुद्र उफान पर है दिल में मेरे,
एक बूंद को भी आंसू बनने से रोका है मैंने…
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जज्ब कर ली है, कठोरता सारे जहान की,
खुद को मोम की तरह पिघलने से रोका है मैंने…
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परख लिया है, पहले हर एक पैमाने को,
खुद से रूबरू होने का, फिर फैसला लिया मैंने…
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सिर्फ,फूलों सी नाजुक, पावन मुस्कुराहटें रोकती है मुझे,
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९५ ☆
☆ गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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चरण वंदना आपकी , करता सकल जहान ।
तीन लोक भी कर रहे, नित्य सतत गुणगान ।।
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बिन गुरुवर नहि मिल सके,कभी किसी को ज्ञान ।
प्रीत हृदय प्रिय धारते, शिष्य लगा कर ध्यान ।।
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काज सहज बनने लगे, जब हो गुरु आशीष ।
इनके पूजन से मिलें, जगदीश्वर जगदीश ।।
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सम्पूरण विश्वास से, सहज साधना साध्य।
ज्योतित जलती लौ रहे, गुरुवर को आराध्य।।
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गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह उस दिव्य चेतना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है, जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करती है। गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं देते, वे जीवन को देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। उनके सान्निध्य में व्यक्ति स्वयं को पहचानता है, अपने भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत करता है और सत्य की ओर अग्रसर होता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष स्थान इसलिए मिला है, क्योंकि वे मनुष्य के व्यक्तित्व का पुनर्जन्म कराते हैं। वे केवल शब्दों से नहीं, अपने आचरण, तप, त्याग और करुणा से शिक्षा देते हैं।
आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने जीवन के प्रत्येक गुरु—माता-पिता, शिक्षक, प्रकृति और उन सभी अनुभवों—के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें, जिन्होंने हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दी। यही सच्ची गुरु वंदना है, और यही ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का श्रेष्ठ मार्ग भी।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. अनुराग वाजपेयी जी द्वारा लिखित “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २११ ☆
☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)
(समकालीन विसंगतियों का आईना)
लेखक – डॉ. अनुराग वाजपेयी
प्रकाशक – प्रकाशन, जयपुर
(संस्करण – 2026)
मूल्य- रु 250/-
☆ समकालीन विसंगतियों का आईना – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
आजादी के बाद से देश ने प्रत्येक क्षेत्र में खूब प्रगति की है।
यदि कुछ ह्रास हुआ है तो वह है नैतिकता , आचरण और जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट स्पष्ट दिखती है।
साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य वह औजार है जो इन विसंगतियों पर सफलता से प्रहार कर रहा है।
डॉ. अनुराग वाजपेयी उनके पिछले आधा दर्जन व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। उनके द्वारा रचित यह नव प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘ईमान का बोझा’ इसी कसौटी पर खरा उतरने वाला एक प्रभावशाली संग्रह है। यह किताब समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, प्रशासन और आधुनिक जीवनशैली की उन परत-दर-परत विसंगतियों को खोलती है, जिनसे आज का सामान्य नागरिक नित्य जूझ भी रहा है, तथा विडंबना और हास्यास्पद है कि जहां भी जिसे जो अवसर मिल रहा है वह बेइमानी से बाज नहीं आ रहा। बेईमानी नया सामाजिक लोकाचार बनता जा रहा है।
पुस्तक का शीर्षक ‘ईमान का बोझा’ मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। लेखक ने बड़े ही तीखेपन से यह स्थापित किया है कि आज के दौर में ईमानदारी एक भारी पत्थर की तरह है, जिसे ढोना कठिन हो गया है। जो व्यक्ति जितना अधिक ‘हल्का’ (यानी सिद्धांतहीन) है, वह उतनी ही तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। यह आधुनिक भौतिकवादी समाज में कड़वा यथार्थ है।
लेखक ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली, बाबुओं की मानसिकता और भ्रष्टाचार के जो चित्र खींचे हैं, वे यथार्थ के दर्शन करवाते हैं। रिश्वतखोरी के नए तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए लेखक दिखाते हैं कि कैसे समाज में अनैतिकता को अब ‘सभ्यता’ का लबादा ओढ़ा दिया गया है।
कोरोना काल, एवं लॉकडाउन के कुछ व्यंग्य किताब में शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि ये सारे व्यंग्य समय समय पर लिखे हुए हैं, तथा इस पुस्तक में संकलित हैं।डिजिटल युग के प्रभावों को जिस तरह से पुस्तक में पिरोया गया है, वह पाठकों को वैचारिक मंथन के लिए विवश करता है। ‘छुट्टियों’ के प्रति देश के उत्साह और ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ के नाम पर किए जा रहे छलावे पर लेखक की टिप्पणियां व्यंग्य की शास्त्रीय परंपरा को पुष्ट करती हैं।
व्यंग्य के मूल्यों की कसौटी पर परखें, तो ‘ईमान का बोझा’ समाज को आईना दिखा रहा है। लेखक केवल हास्य रंजन करने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं। वे समाज के प्रति अपनी ‘अकुलाहट’ और चिंता उनकी कलम से व्यक्त करते हैं।
अनुराग वाजपेयी की भाषा सहज है, वाक्य रीडर्स फ्रेंडली हैं। लेकिन उसमें कटाक्ष की धार पैनी है। वे कठिन विषयों को भी रोचक किस्सागोई के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो व्यंग्य अभिव्यक्ति की बड़ी ताकत है।
पुस्तक केवल समस्याओं को नहीं गिनाती, बल्कि उन कारणों पर भी प्रहार करती है जो व्यक्ति को ‘बेईमान’ बनने के लिए प्रेरित करते हैं।
‘ईमान का बोझा’ आज के दौर का यथार्थ पाठ है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो व्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं और जो ईमानदारी का बोझ ढोकर भी मुस्कान बनाए रखना चाहते हैं।
डॉ. अनुराग वाजपेयी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि व्यंग्यकार का काम केवल व्यवस्था को कोसना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर छिपे उस जागरूक नागरिक को जगाना है, जो शोर-शराबे में कहीं खो रहा है।
यह संग्रह व्यंग्य साहित्य के प्रेमियों और अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
किताब खरीद कर पढ़ने की सलाह है। ये 100 पृष्ट एक दस्तावेज हैं। 34 आलेख हैं, सभी एक दूसरे से बेहतर सुगठित ललित साहित्यिक मूल्यों पर खरे हैं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मानित लेखक, समालोचक, समीक्षक, व्यंगयकार
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – स्वतंत्र पहचान…।)