(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “जिनको खादी को लिबास है“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५० ☆
☆ बुन्देली कविता – “जिनको खादी को लिबास है“☆ आचार्य भगवत दुबे
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित “बिट्टू…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०५ ☆
☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक – ‘बिट्टू’
लेखक डॉ. संजीव कुमार
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ मातृत्व की पावन तपस्या पर अभिनव उपन्यास – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
डॉ. संजीव कुमार का ‘बिट्टू’ कालजयी और शाश्वत साहित्यिक मूल्यों को रेखांकित करता नया रोचक उपन्यास है। वे विविध नवाचारी विषयों, और विधाओं में इतना सारा मौलिक रच चुके हैं कि रिकॉर्ड बुक्स में लगातार दर्ज होकर साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं।
हिंदी उपन्यास साहित्य का मूल उद्देश्य मानव मन की अतल गहराइयों को छूना और समाज को एक संवेदनशील आईना दिखाना है। यह कृति इस साहित्यिक मानक पर शत प्रतिशत खरी है।
उपन्यास एक बंधी-बंधाई कहानी नहीं है, बल्कि स्त्री के अस्तित्व, उसकी अदम्य जिजीविषा और मर्मस्पर्शी त्याग का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह समाज को करुणा और संवेदना के शाश्वत मूल्यों से जोड़ता है। उपन्यास की नायिका ‘बिट्टू’ एक शांत, विनम्र और बेहद हँसमुख स्त्री है, जिसका जीवन विवाह के शुरुआती दिनों में किसी मधुर गीत की तरह खुशियों से भरा हुआ था। किंतु, कहानी का मुख्य साहित्यिक द्वंद्व ‘माँ बनने की अभिलाषा’ से शुरू होता है। दस वर्षों का लंबा और मरुस्थल जैसा इंतज़ार, समाज के तीखे ताने और पारिवारिक दबाव के बीच बिट्टू का संघर्ष पाठक को भावनात्मक रूप से अपने साथ बहा ले जाता है।
लेखक ने यहाँ बड़ी कुशलता से दिखाया है कि कैसे एक स्त्री का मातृत्व केवल उसकी व्यक्तिगत इच्छा नहीं रह जाता, बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का एक क्रूर प्रश्न बना दिया जाता है।
इस कथा-प्रवाह में बिट्टू का चरित्र अटूट विश्वास और संकल्प के एक ऊंचे शिखर की तरह प्रस्तुत किया गया है। जहाँ एक ओर बिट्टू का पति उसके मातृत्व को लेकर मौन धारण कर लेता है और रूढ़िवादी समाज उसे ‘दोषी’ ठहराने लगता है, वहीं बिट्टू अपनी आस्था की लौ को बुझने नहीं देती।
वह मंदिर, मन्नत, व्रत और डॉक्टरों के चक्कर काटकर भी हार नहीं मानती। यहाँ तक कि अपनी जान दांव पर लगाकर सर्जरी का बड़ा जोखिम उठाना, उसके इसी संकल्प को दर्शाता है कि वह अपने मातृत्व को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
लेखक की भाषा सरल होते हुए भी गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है। पूरी रचना में प्रतीकों और उपमाओं का बहुत ही सुंदर और ललित प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, जब बीमारी की रिपोर्ट आती है, तो लेखक उसे “वज्रपात” के समान बताते हैं। यह ललित शैली पाठक के हृदय में आदि से अंत तक करुणा का संचार करती चलती है।
उपन्यास में संतान हीनता पर सामाजिक प्रताड़ना के यथार्थ को चित्रित करते हुए लेखक लिखते हैं कि, “शुरू-शुरू में घरवाले उसे समझाते, लेकिन धीरे-धीरे ताने और फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं। कोई कहता- ‘शायद इसी में कोई दोष है।’ कोई कहता- ‘इतने साल हो गये, अब क्या उम्मीद!'”, यह अंश हमारे समाज की उस कड़वी और नग्न सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ बाँझपन का सारा दोष केवल और केवल स्त्री के माथे मढ़ दिया जाता है। लेखक ने यहाँ सीधे प्रहार के बजाय “फुसफुसाहटों” शब्द का जो प्रयोग किया है, वह उस मानसिक पीड़ा को दर्शाता है जो किसी सीधे वार से भी अधिक गहरी और जानलेवा होती है। परंतु, इस घने अंधकार के बाद मातृत्व की उपलब्धि और परम तृप्ति का वह उजला क्षण भी आता है, जब वह पहली बार अपने बच्चे को गोद में लेती है। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकलती हैं और वह मन ही मन कहती है, “हे भगवान, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए… तूने मुझे माँ बना दिया।”, यहाँ बिट्टू के दस वर्षों के तप और संघर्ष का एक सुखद अंत होता है। “अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए” का यह भाव यह सिद्ध करता है कि एक भारतीय स्त्री के लिए जीवन का चरम लक्ष्य और उसकी संपूर्णता मातृत्व की प्राप्ति ही है।
परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहानी का सबसे कारुणिक मोड़ तब आता है जब वह ब्रेन ट्यूमर जैसी घातक बीमारी की चपेट में आ जाती है। लेकिन इस काल के सामने भी बिट्टू टूटती नहीं है, बल्कि वह नियति और मृत्यु पर अपनी ममता से विजय प्राप्त करती है। अपने अंतिम दिनों में, वह काँपते हाथों से अपने मासूम बच्चे के सिर पर हाथ रखती है और कहती है, “बेटा, मज़बूत बनना। माँ ने तेरे लिए बहुत इंतज़ार किया था… अब तू ही मेरा संसार है।” मृत्यु के द्वार पर खड़ी होकर भी अपने बेटे के भविष्य की यह चिंता और उसके चेहरे की शांति यह संकेत देती है कि उसने अपनी जीवन-साधना पूरी कर ली है। अब उसे मृत्यु का कोई भय नहीं है।
साहित्यिक मानकों की कसौटी पर यदि हम इस कृति को परखें, तो ‘बिट्टू’ बांझपन की सामाजिक विसंगति पर एक अत्यंत सफल, प्रौढ़ और श्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध होता है। अरस्तू के प्रसिद्ध ‘विरेचन सिद्धांत’ के अनुसार, जो साहित्य पाठक के मन के विकारों को धोकर उसे करुणा से पवित्र कर दे, वही उत्तम साहित्य है। यह उपन्यास पाठक के भीतर इसी पवित्र करुणा का संचार करता है। भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों वस्तु, अर्थात् पात्र-चित्रण, रस और उद्देश्य के कड़े मानकों पर यह रचना पूरी तरह सुदृढ़ और संतुलित है। इसका शिल्प और इसका कथ्य दोनों ही उच्च कोटि के हैं। डॉ. संजीव कुमार ने एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कृति हिंदी साहित्य को सौंपी है, जो पाठकों को पुस्तक बंद करने के बाद भी देर तक सोचने पर विवश करती है। यह उपन्यास दुःख की राख से अपनी खुशियों का संसार बुनने वाली एक साधारण स्त्री के असाधारण और कालजयी महागाथा बनने की अमर कहानी है।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२२ ☆
☆ है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “2 जून रोटी समारोह ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ ☆
🌻लघुकथा🌻 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆
एक शानदार होटल में बड़े – बड़े पोस्टरों में रोटी की सुंदर सुंदर तस्वीरें लगा दिखाई दिया। डीजे बजाये जा रहे थे। बढ़िया डेकोरेशन चमचमाते टेबिल कुर्सीयाँ और मदमस्त लोग।
सुरमई शाम और हल्की सी बारिश के बीच मौसम खुशनुमा हो चला। परिवार सहित लोग आते जाते दिखे।
जो आसपास से निकल रहे थे बस भिन्न- भिन्न सजी रोटियों की तस्वीरें देख ठिठक जा रहे थे।
एक महिला दो बच्चों को लिए धीरे- धीरे दरवाजे पर पहुंच गई।
नया होटल खुला है क्या?
एक जोरदार ठहाका–
किसी ने कहा — इसे कौन बुला लिया। इस सेलिब्रेशन में।
महिला ने फिर पूछा — यदि होटल नया है तो किफायती दाम में आज रोटी मिल जायेगी। थोड़े से पैसे है मेरे पास बच्चों का पेट भर जायेगा।
धक्का देते किसी ने कहा — यहाँ दो जून रोटी सेलिब्रेशन हो रहा है। रोटी नही मिलेगी।
दोनों बच्चे पोस्टर पर ललचाते हुए हाथ फेर रहे थे। उनका पसीना शायद दो जून की रोटी के लायक नही बहा था।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७९ ☆ देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆
सोशल मीडिया अपने आप को समाज का बहुत बड़ा शुभचिंतक मानता है। इसकी पैरवी करने वाले तो ये तक कह देते हैं, कि “सोशल मीडिया ही समाज का वास्तविक आईना है”।
दिल को बहलाने के लिए ख्याल बुरा नहीं है, ग़ालिब! अलग अलग तरह के आईने भी आपकी शक्ल को विभिन्न आकारों में दिखा देते हैं। पतले व्यक्ति को मोटा और मोटे व्यक्ति को पतला बताने वाले आईने हमने भी बहुत देखें हैं।
आज प्रातःकालीन भ्रमण पर एक परिचित के घर के सामने से निकलते हुए, एक पेशे से सेवानिवृत वकील साहब मिल गए, उनके चाय के आग्रह को मना नहीं करते हुए, हम उनके घर चले गए।
उनकी पत्नी टीवी के सामने कापी पेन लेकर बैठी थी। वो बोली अभी दस मिनट सब शांत बैठे रहें, उसके बाद ही चाय की व्यवस्था करूंगी।
टीवी के किसी समाचार चैनल पर भविष्य वक्ता कुछ जानकारी दे रहे थे, वो कॉपी में लिखती जा रही थीं। वकील साहब भी अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे। दस मिनट बाद बड़ी कठिनाई के बाद काग़ज़ के छोटे से कप में एक बड़ी चम्मच की मात्रा के बराबर चाय प्राप्त कर, हम अपने होठ ही गीले कर पाए।
वकील साहब की पुत्री एक बड़े हॉस्पिटल में महिला चिकित्सक हैं। भाभी जी भविष्य वक्ता द्वारा “सिजेरियन ऑपरेशन” के लिए अच्छे समय की जानकारी नोट कर रही थी। उनकी पुत्री उस समय किए जाने वाले ऑपरेशन का अधिक/ विशेष चार्ज, वसूल सकें। वकील साहब भी मुकदमा दायर करने का सबसे बढ़िया समय कौन सा है, की जानकारी बार काउंसिल को प्रतिदिन देते है, ताकि वकील उस विशेष समय के लिए अतिरिक्त राशि फीस के नाम पर लूटी जा सके।
चाय के समय वकील साहब बोले, कल ही बिटिया की सगाई टूट गई है। हमें भी आश्चर्य हुआ, तब वो बोले लड़के वाले कहते है, किसी भी वकील की बेटी से विवाह नहीं करेंगे, वर्ना भोपाल वाली त्रिशा जैसा कुछ हो ना जाए। वो बहुत दुखी मन से बोले, समाज में लोग वकीलों से पारिवारिक संबंध जोड़ने से मना करने लगे हैं। आगे बोले पड़ोस में रहने से भी लोग डरते हैं। वकील के घर के आस पास जमीन भी तो सस्ती मिल जाती है।
बहुत देरी से मुंह में रखे हुआ गुटखा थूकने का समय आ गया है। इसलिए लेखनी को विराम देता हूँ।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…२।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२
ये बाढ़ / अनोखी है / अजब है
अछोर महत्वाकाँक्षाओं की
क्षुद्र स्वार्थी और
सर्वनाशी बाढ़
में
मनुष्य और प्रकृति
दोनों घिर गये हैं
गिर गये हैं
इरादे
आदमी के ।
हम / ढो रहे हैं
आजादी का दंभ
और आम आदमी
आज भी बेबस है, मजबूर है
चन्द्रमा भले पास आ गया हो
रोटी अभी भी दूर है
जाने कितने शिशुमन
दफन हो जाते है
किसी नदी के तट पर
या किसी स्कूल के अहाते में
बहुत कम जगह है
सुविधा के छाते में।
है
मेरे खाते में
जमा है
कुछ
घुटने चलती यादें
और कुछ असफल फरियादें
क्या करेंगें आप
और क्या करूँगा मैं
संकटों / यादों और फरियादों का
सिलसिला
अशेष है, असमाप्त है,
कविता अमर है
कविता समाप्त
है।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मर्यादा को लाँघे था...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “मर्यादा को लाँघे था...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुझी बुझी आंखें…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘ये दुनिया, ये दुनिया…‘।)