हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ – पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ ☆

☆ पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

वृक्ष काटते निशदिन मानव, होगा क्या परिणाम रे।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे।

जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे।।

निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे।

धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे।।

रौद्र रूप जब धारे माता, होगा क्या परिणाम रे।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।

वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।

दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।

भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।

हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बनें अभिराम रे।।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

भेड़ाघाट से बिजना घाट: 15 अक्टूबर 2018

एक दिन पहले, जैसे ही हम तिलवारा घाट के पुल पर जाकर खड़े हुए, वहाँ पान की दुकान वाले ने बताया कि नर्मदा के किनारे से रास्ता बहुत दलदली है। आप लोगों को घूँसोर होते हुए सिवनी गाँव से होकर लम्हेंटा पहुँचना होगा। हमने उससे आगे की जानकारी ली। जबलपुर और आसपास में दूधिया कत्था और मलाईदार चूना का जैसा ज़ायक़ेदार बीड़ा मिलता है वैसा कहीं नहीं मिलता सिवाय बनारस के अतः हमने एक मीठा पत्ता पान चटनी, चमन-बहार, लोंग, इलायची, पिपरमिंट का बनवा कर मुँह में दबाया और निकल पड़े। हम घूँसोर गाँव पहुँचे वहाँ पहले घर में पीने को पानी माँगा तो वे पानी देने में हिचकिचा रहे थे। हमने कहा हम छुआछूत नहीं मानते। आप साफ़-सफ़ाई से रहते हो बस यही हमारे लिए काफ़ी है। वे सतनामी समाज के थे। यह सतनामी समाज नर्मदा घाटी में कब, कैसे और कहाँ से आया। नर्मदा के उस पार दक्षिण के गाँवो में सतनामी समाज की सघन वसाहट है। जबलपुर जिले में नर्मदा के दक्षिण तट की तरफ़ बसे गाँवों में सतनामी बसे हैं।

 जब भारत में ग्यारहवीं सदी से मुस्लिम तेग़ की ख़ूनी ख़ूँख़ार आँधी चली तब हिमालय की तराई, दक्षिण के पथरीले पहाड़ और सतपुड़ा-विंध्याचल में नर्मदा के दोनों तरफ़ दो सौ किलोमीटर चौड़ी और एक हज़ार किलोमीटर लम्बी घाटी हिंदुओं के लिए सुरक्षित अभयारण्य बन गई। जहाँ भी इस्लामी सुल्तान या बादशाह का अत्याचारी दबाव पड़ता था वहाँ के रघुवंशी, गूज़र, लोधी, कुर्सी, कलार, काछी, सतनामी और उनके साथ लगे-लगे ब्राह्मण, चमार, बँसोड, भंगी नर्मदा घाटी की गोद में आकर बस जाते थे। सघन जंगलों से पूरी तरह ढँकी रहने वाली घाटी आबाद होने लगी थी। अंग्रेज़ों द्वारा रेल लाइन बिछाने के पहले तक नर्मदा घाटी में पहुँच दुरूह हुआ करती थी।

1672 में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार चोपड़ा, पुरी और श्रीदास ने मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ए सोसल कल्चरल एंड इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के भाग तीन में लिखा है। “18वीं शताब्दी में अवध के बाबा जगजीवनदास ने एक अलग धार्मिक पंथ बनाया जो कि सत्य और ज्ञान पर विश्वास करने वाला सतनाम पंथ कहलाया।”

इस पंथ के लोग उत्तरी भारत में विस्तृत रूप से फैले थे।  औरंगज़ेब के शासनकाल में कट्टर नीतियों के चलते सिक्ख, जाट, मराठों के साथ-साथ सतनामी लोगों ने भी विद्रोह का परचम लहराया था। इस सम्प्रदाय के गुरू घासीदास माने जाते हैं। जो मध्य युगीन सतनामी समाज में विश्वास और उपासना विधि को जीवित रखना चाहते थे तथा उनमें अभिनव चेतना लाने की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने प्रचारित किया कि वास्तविक भगवान कर्मकांड में निहित नहीं है सतनाम ध्यान में प्रकट होते हैं। उन्होंने अक्षर ब्रह्म का शब्द देकर ध्यान लगाने और निर्गुण ईश्वर के भजन गाने की प्रणाली सतनामी समाज में विकसित की थी। ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। इसलिये मानव समाज में कोई भेद नहीं होना चाहिये जैसा कि जाति प्रथा से भेदभाव परिलक्षित होता है। छतीसगढ में सतनाम आंदोलन पिछड़े, निम्न और अछूत समझे जाने वाले वर्गो में धार्मिक और सामाजिक चेतना लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यह कबीर, नानक, दादू पंथ की कड़ी को मानने वाले हैं।

सतनामी मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक सतनामी किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी ने मुग़ल कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकड गया और एक बड़े संघर्ष में बदल गया। धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें सशक्त शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात फैल गई कि सतनामी कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फ़र्क़ नहीं पडा था। उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आत्मदान करने वाले भक्तों की शक्ति के कारण यह स्थिति थी।

सतनामी संघर्ष को मुग़लों द्वारा बेरहमी से  कुचलने की प्रक्रिया में बचे-खुचे सतनामी अपनी जान बचा कर अलग अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास के पूर्वजों का भी एक परिवार रहा जो कि महानदी के किनारे-किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुचा था। जहाँ पर संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार किया। वे गिरौदपुरी तहसील बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ पैदा  हुये थे। गुरूजी को सतनाम पंथ सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी पंथ के प्रवर्तक कहा जाता है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में रायपुर जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया था। ब्राम्हणों और मन्दिर के पुजारियों द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक शोषण का विरोध करने का यही मार्ग उनको सूझा था। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाई जाती है। बिलासपुर के विश्वविद्यालय का नाम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय है। सतनामियों के घरों से चाय-पानी प्रसाद पाकर आगे बढ़ते जा रहे थे।

भेड़ाघाट से बिजना घाट की यात्रा सबसे लम्बी थकाऊ और उबाऊ थी। पहले हमने तय किया था कि रामघाट में रुककर रात गुज़ारेंगे। मंगल सिंघ परिहार जी वहाँ से चार किलोमीटर आगे रास्ता देख रहे थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के दम पर सभी को खींचे जा रहे थे। चार घण्टे पैदल चल चुके थे। दोपहर में तेज़ धूप में चलने से शरीर का ग्लूकोस जल जाता है और हवा में ऑक्सिजन भी कम हो जाती है। मांसपेशियाँ जल्दी थकने लगतीं हैं और साँस फूलने लगती है। दो बजे के बाद सूर्य की किरणे सामने से परेशान करने लगती है। ऐसे माहौल में नदी किनारे रास्ता भी नहीं था। बर्मन लोगों ने नदी के कछार को हल चलाकर मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले में बदल दिया था। खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं था। साथियों को बाटी-भर्ता का लालच देकर खींचे जा रहे थे, जबकि भोजन का कहीं कोई ठिकाना नहीं था। उधर दनायक जी को परिहार जी मोबाइल से जल्दी पहुँचने को कह रहे थे। सब थक कर चूर थे। ऐसे में दल को खींच कर आगे ले जाना ज़रूरी था।

मंगल सिंग परिहार बहुत पुराने परिचित सहकर्मी रहे हैं। उन्होंने दिन के ग्यारह बसे से, जब हम भेड़ाघाट से चले ही थे, तब से बिजना गाँव से नर्मदा पार करके मुरकटिया घाट आकर मोबाईल से सम्पर्क साध कर हमारी स्थिति लेना शुरू कर दिया। वे हर आधा घंटे में दनायक जी को मोबाईल से सम्पर्क साध कर स्थिति पूछते जा रहे थे। कभी मोबाईल लगता था और कभी नहीं लगता था। हम लोग रामघाट से सड़क छोड़ नर्मदा किनारे आ गए, वहाँ से अत्यंत दुरुह यात्रा शुरू हुई। छोटी नदी, नाले, झरने, सघन हरियाली और ताज़े गोंड़े गए खेतों की मिट्टी के बड़े-बड़े ढेलों के बीच से घुटनों और ऐडियों की परीक्षा का समय था क्योंकि कहीं भी समतल ज़मीन नहीं थी। आगे छोटी पहाड़ियों का जमघट एक के बाद एक घाटियाँ का सिलसिला जिनको स्थानीय बोली में ड़ांगर कहते हैं। चम्बल में जैसे बीहड़ होते हैं जिनमे कँटीले पेड़-पौधे होते हैं वैसे नर्मदा के आजु-बाजु ड़ांगर का साम्राज्य है उनके बीच से पानी झिर कर जंगली नालों को आकार देते हैं। उनको पार करने के लिए ऊपर चढ़ाई चढ़ना फिर उतरना फिर चढ़ना। यात्रियों का दम निकलने लगता है। पसीने से तरबतर शरीर में पूरी साँस धौंकनी के साथ भरकर पहाड़ियों को पार करने के बीच में नर्मदा दर्शन से हिम्मत बनती टूटती रहती है। चार बजे हाल-बेहाल और निढ़ाल-पस्त हालत में बिजना घाट के सामने वाले मुरकटिया घाट पर मंगल सिंघ परमार बिस्कुट और केले फल के साथ स्वागत आतुर मिले। वहाँ उनकी सिकमी ज़मीन थी। उसी पर खड़े थे। बैठने को कोई छायादार जगह नहीं थी। यात्री बिस्कुट और केलों को क्षणभर में चट कर गए। नाव से नर्मदा पार करके दूसरी पार उतरे वहाँ एक बर्मन दादा पूड़ी और खीर का भंडारा करा रहे थे। यात्रियों ने भंडारा खाया। ख़ूब पानी पिया तो कुम्लाए चेहरों की रंगत और ढीले शरीरों में जान लौटने लगी।

15 अक्टूबर को मंगल सिंग परिहार के आश्रम नुमा फ़ार्म हाऊस में विश्राम का अवसर मिला। मंगल सिंघ परिहार ने प्राकृतिक छटाओं में बसा अपना आश्रम दिखाया। जिसमें पारिजात और रुद्राक्ष के वृक्ष लगे हैं। सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत सुंदर नज़र आता है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज नागौद रियासत के राजा रहे हैं। परमार, परिहार, बुंदेले और बघेल सब गहडवाल राजपूत हैं। परमारों ने महोबा, परिहारों ने नागौद, बुन्देलों ने छतरपुर और बघेलों ने रीवा रियासत स्थापित की थी। ये सब पहले अजमेर के पृथ्वीराज़ चौहान या कन्नौज के जयचंद राज्यों के सरदार थे। 1091-92 में मुहम्मद गोरी के हाथों अजमेर, दिल्ली और कन्नौज हारने के बाद इन्होंने इन राज्यों को स्थापित किया था। नागौद कभी स्वतंत्र राज्य और कभी रीवा के बघेलों का करद राज्य हुआ करता था। उसके उत्तर-पश्चिम में केन नदी का अत्यंत ऊपजाऊ कछारी भाग था लेकिन दक्षिण-पूर्व में पथरीली ज़मीन थी। अतः राजपूतों ने नर्मदा के कछारी मे बसने का निर्णय लिया था।

अंग्रेज़ों ने 1861 में जबलपुर को राजधानी बनाकर सेंट्रल प्रोविंस राज्य बनाया तो रीवा, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल रियासत छोड़कर मध्य प्रांत के नागौद  सहित बाक़ी सब इलाक़े उसमें रख दिए। तब ही नर्मदा घाटी का सर्वे करके जबलपुर की सीमा नर्मदा के दक्षिण में चरगवाँ-बरगी तक निर्धारित कर दी। परिहारों को ज़मींदारी में मगरमुहां का इलाक़ा दिया गया। कई परिहार सौ-सौ एकड़ के ज़मींदार बनकर आज के पाटन और शाहपुरा इलाक़े में आ बसे। उनमें मंगल सिंघ परिहार के पूर्वज भी थे। मंगल सिंघ के पिताजी मुल्लुसिंघ परमार निरक्षर थे परंतु उन्होंने अपने आठ बेटों को पोस्ट-ग्रेजुएट कराया।

मंगल सिंघ जी से देर रात तक बातें होतीं रहीं। वे हमें एक वेदान्ती साधु के दरबार में ले गए। हमसे कहा कि साधु जी वेदों के प्रकांड विद्वान हैं। आप उनसे गूढ़ प्रश्न कीजिए तब उनकी ज्ञान गंगा बहने लगेगी। हम लोग उनके दरबार मे पहुँचे पाँव-ज़ुहार होने के बाद बातचीत चली तो मौक़ा देखकर हमने एक सवाल का तीर चलाया कि हमारी जानने कि इच्छा है कि महाराज रुद्र और शिव का अंतर बताएँ, तो बड़ी कृपा होगी। स्वामी जी ने थोड़ा इधर-उधर घुमाया। फिर विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि प्रश्न गूढ़ है और उनका ज्ञान वेदों तक ही सीमित है उन्होंने पुराण नहीं पढ़े हैं। वे नेपाल से नर्मदा की गोद में आकर बस गए हैं। नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। वापस आकर परिहार जी ने शिमला मिर्च की साग-रोटी और दाल-चावल का बढ़िया भोजन कराया। उसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। परिहार जी की बातें सुनते रहे। उनकी बातों के क्रम को बीच में बोलकर तोड़ना उनके रुतबे को कम करने जैसा होता है यह बात हम जानते थे परंतु अन्य लोगों को नहीं पता था। एक सहयात्री ने टोकने की कोशिश कि तो हमने उसे चुपके से समझा दिया कि भैया:-

बंभना जाय खाय पीय से

   क्षत्री जाय बतियाय

       लाला जाय लेय-देय से

           शूद्र जाय लतियाय।

इस बुंदेलखंड की कहावत को गाँठ बाँध लो और क्षत्री की बातें चुपचाप सुनो। सुबह दो-दो रोटियाँ तोड़कर आश्रम से फिर नर्मदा की गोद मे पहुँच गए। इस प्रकार 13, 14 और 15 अक्टूबर की यात्रा पूरी हुई। यहाँ से हमारे एक और साथी प्रयास जोशी ने हमसे विदा ली।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३ – कविता – कॉकरोच… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कॉकरोच“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३?

? कविता – कॉकरोच… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

फैले हैं कितने-कहाँ कॉकरोच पता कर

इनकी कहाँ तलक है एपरोच पता कर

= 2 =

मरे हुए पे रोते हैं, ज़िन्दा को रुलाते

कब मरा ज़मीर निःसंकोच पता कर

= 3 =

पेट्रोल गैस डीजल की किल्लतों से उफ़्फ़

सत्ता को कुछ आई क्या खरोंच पता कर

= 4 =

लीकेज़ किसने किया युवा पूछ रहा है

नीट से लड़ाई किसने चोंच पता कर

= 5 =

कौन कर रहा है अच्छे दिन के नाम पर

ये लूटमार-छीन-झपट-नोंच पता कर

= 6 =

क़िरदार जा टकराया एपस्टीन शिला से

तब भी तनिक न आई क्यों मोच पता कर

= 7 =

कंकाल ले बहन का पहुँचा बैंक में बंदा

क्यों ऐसा दाँव-पेंच किसकी सोच पता कर

= 8 =

ख़्वाहिश तो बादशाह की भी रहती अधूरी

सियासती लोचे में क्यूँ ये लोच पता कर

= 9 =

‘राजेश’ हर मशीनरी निढाल पड़ी है

कानून को किसने लिया दबोच पता कर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०६ ☆ ।। मुक्तक ।। बढ़ रहा तापमान, हो रहा पर्यावरण का नुकसान ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०६ ☆

☆ ।। मुक्तक ।। बढ़ रहा तापमान, हो रहा पर्यावरण का नुकसान ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

= 1 =

नदी ताल में कम हो रहा जल हम

पानी यूँ बहाते जा रहे हैं।

ग्लेशियर पिघल रहे और समुन्द्र

तल यूँ बढ़ाते जा रहे हैं।।

काट कर सारे वन कंक्रीट के कई

जंगल बसा दिए विकास ने।

अनायस विनाश की ओर कदम

दुनिया के चलाते जा रहे हैं।।

= 2 =

पॉलीथिन के ढेर पर बैठकर हम

पॉलीथिन हटाओ नारा दे रहे हैं।

प्रक्रति का शोषण कर के सुनामी

भूकंप काअभिशाप ले रहे हैं।।

पर्यवरण प्रदूषित हो रहा दिन रात

आधुनिक संस्कृति के कारण।

भूस्खलन,भीषण गर्मी,ओलावृष्टि

नाव बदले में आज खे रहे हैं।।

= 3 =

ओज़ोन लेयर छेद,कार्बन उत्सर्जन

अंधाधुंध दोहन दुष्परिणाम है।

वृक्षों की कटाई बन गया आजकल

विकास प्रगति दूसरा नाम है।।

हरियाली समाप्त करने की बहुत

कीमत चुका रही है दुनिया।

इसी कारण ऋतुचक्र,वर्षा चक्र नित

असुंतलन आज आम है।।

= 4 =

सोचें क्या देकर जाएंगे हम अपनी

अगली पीढ़ी को विरासत में।

शुद्ध जल और वायु को ही कैद कर

दिया जीवन शैली हिरासत में।।

जानता नहीं कि आदमी कुल्हाड़ी

पेड़ पर नहीं पाँव पर चल रही।

प्रकृति ही नहीं संपूर्ण मानवता नष्ट हो

जाएगी दानवी हिफाज़त में।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६९ ☆ कविता – शिक्षा की महत्ता… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – शिक्षा की महत्ता…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६९

☆ शिक्षा की महत्ता…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

शिक्षा ही देती इस जग में, सबको समुचित ज्ञान है

शिक्षा से ही संभव इस जीवन में हर कल्याण है।

शिक्षा के बिन अंधकार है, फीका हर व्यवहार है

शिक्षा से ही पाता मानव धन उन्नति सम्मान है ।।1।।

*

सदा सुशिक्षित विनयशील का युग करता गुणगान है

अपने विद्वानों पर ही होता सबको अभिमान है।

दूर दूर इससे ही जाते शिक्षा पाने लोग हैं

सुख दुख में सब साथ निभाती विद्या मित्र समान है ।।2।।

*

शिक्षा ही इस जग में सचमुच हर विकास का प्राण है

शिक्षा से ही संभव गहराई का अनुसंधान है।

शिक्षा सचमुच अक्षय धन है, शिक्षा सुख की खान है

शिक्षा बिन भटकाव बहुत हैं, मुश्किल निज अधिकार है ।।3।।

*

सुलभ कामना पूर्ति मंत्र-शिक्षा पर केन्द्रित ध्यान है

ज्ञानवान ही कर सकता भावी का कुछ अनुमान है।

मिली न शिक्षा सही अगर तो पग-पग पर कठिनाई है

संकट की रक्षा करने को सही ज्ञान भगवान है ।।4।।

*

शिक्षा बिन अंधा सा औ’ निर्बल जैसा इन्सान है

शिक्षा के प्रकाश से होती हर मुश्किल आसान है।

शिक्षा ने ही सुलभ कराई सुविधाएं विज्ञान कीं

शिक्षा से ही हुआ विश्व का चतुर्मुखी उत्थान है ।।5।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५१ आणि ५२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५१ आणि ५२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ५१ – – 

मदें मछरे सांडिला स्वार्थबुद्धी|

प्रपंचिक नाही जयाते उपाधि|

सदा बोलणे नम्र वाचा सुवाचा|

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा|५१|

अर्थ : जो अहंकार आणि द्वेषरहित आहे, ज्याने स्वार्थ बुद्धीचा त्याग केला आहे, जो संसारात राहूनही विरक्त वृत्तीने वागतो, नेहमी नम्र आणि मधुर वाणीनेच बोलतो, असा मनुष्य सर्वोत्तम अशा भगवंताचा जगातील उत्कृष्ट भक्त होय.

(मद – अहंकार, मछरे -मत्सर/द्वेष, सांडिला – सोडून दिले आहे, स्वार्थ बुद्धी – केवळ स्वतःचा फायदा पाहणे, उपाधि – बाह्य पाश /बंधन, सुवाचा – गोड /मधुर बोलणे)

विवेचन : हा फार सुंदर आणि अर्थपूर्ण असा श्लोक आहे. खऱ्या भक्ताची लक्षणे आपल्याला समर्थ या ठिकाणी सांगत आहेत. खरा भक्त अहंकार आणि द्वेष रहित असतो. त्याने स्वार्थ बुद्धीचा त्याग केलेला असतो. काही ठिकाणी या श्लोकामध्ये पाठभेद आढळतात. काही पुस्तकांमध्ये सांडली असा शब्द आहे तर काही पुस्तकांमध्ये सांडिला असे म्हटले आहे. या शब्दांमुळे अर्थामध्ये जरा फरक पडतो ज्या पुस्तकामध्ये मदे मत्सरे सांडीली स्वार्थ बुद्धी असे म्हटले आहे, तिथे सांडली म्हणजे त्याग केला या अर्थाने मद, मत्सर आणि स्वार्थ बुद्धी या तिघांचाही खऱ्या भक्ताने त्याग केलेला असतो असा अर्थ घेता येतो. तर जेव्हा सांडीला हा शब्द वापरलेला आढळतो तेव्हा मद, मत्सर आणि स्वार्थ बुद्धी हे दुर्गुण खऱ्या भक्ताला सोडून गेलेले असतात. म्हणजे त्याला ते स्पर्शही करत नाहीत असा अर्थ घेता येतो. तसेच काही पुस्तकात मत्सरे तर काही ठिकाणी मछरे हा शब्द वापरला आहे. अर्थात दोन्हींचा अर्थ मत्सर हाच आहे.

या शब्दांच्या जास्त खोलात न शिरता आपल्याला असे लक्षात येते की खरा भक्त हा अहंकार आणि द्वेषरहित असतो. त्याच्याजवळ स्वार्थ बुद्धी नसते. मद म्हणजे गर्व किंवा अहंकार. माणसाला स्वतःच्या कर्तृत्वाचा खूप गर्व असतो. त्यातूनच मग तो मी हे केले, मी ते केले, माझ्यामुळेच हे झाले अशा प्रकारची अहंकारी विधाने करत असतो. एखादी व्यक्ती आपल्यापेक्षा वरचढ आहे असे दिसले की मग त्याचा मत्सर जागा होतो. तो त्याचा द्वेष करू लागतो आणि मग त्या व्यक्तीला नामोहरम करण्यासाठी कोणत्याही पातळीला जातो.

स्वार्थ म्हणजे स्व -अर्थ. स्वार्थी माणूस केवळ स्वतःचाच फायदा पाहत असतो. पैसा, संपत्ती यासारख्या गोष्टी कितीही मिळाल्या तरी त्याचे समाधान होत नाही. अजून हवे, अजून हवे असे त्याला वाटत राहते. एकदा हातात भरपूर पैसा आला की मग त्याच्या जोडीला मद येतो. अहंकार वाढत राहतो. त्याचबरोबर प्रतिस्पर्ध्याचा द्वेषही मनामध्ये ठाण मांडून बसतो. पण जो परमेश्वराचा खरा भक्त असतो, त्याची मानसिक अवस्था या सगळ्याच्या पलीकडे गेलेली असते. तो तृप्त असतो. आहे त्या परिस्थितीत संतुष्ट आणि समाधानी राहतो. कोणाचा तिरस्कार किंवा द्वेष करणे त्याच्या मनात येत नाही.

या श्लोकात खऱ्या भक्ताचे आणखी एक सुंदर लक्षण समर्थ सांगतात. खरा भक्त प्रपंच तर करतो पण कसा? तर संसारात राहूनही तो त्यापासून अलिप्त असतो. तो विरक्त वृत्तीने जगतो. खरा भक्त असण्यासाठी भगवे कपडे, माळा, टिळा, टोपी, गंध इत्यादी धारण केले पाहिजे असे नाही. त्यासाठी कुठे वनात जावे लागत नाही. आपण संसारात राहून सुद्धा भगवंताचे लाडके भक्त होऊ शकतो.

कमलपुष्पाचे उदाहरण आपल्या सगळ्यांना माहिती आहे. कमळ चिखलात असते पण त्यात राहूनही ते त्यापासून दूर असते. असेच संसारात देखील राहता आले पाहिजे. संसाराची उपाधी खऱ्या भक्ताला असत नाही म्हणजेच त्याला संसाराचे पाश बांधू शकत नाहीत. संसारात असूनही तो मुक्त असतो, विरक्त असतो.

खऱ्या भक्ताचे आणखी एक सुंदर लक्षण समर्थ सांगतात. त्याचे बोलणे नम्र असते, बोलण्यात माधुर्य असते. आपल्या बोलण्याने तो कोणालाही दुखवत नाही. यासाठी वेगळे काही करावे लागत नाही. खऱ्या भक्ताच्या अंगी हे गुण आपोआप येतात. निवडणूक आली म्हणजे बरेच पुढारी अगदी नम्रतेने जनतेला सामोरे जातात. कार्पोरेट क्षेत्रातही कामाच्या गरजेपोटी नम्रता धारण केली जाते. पण हे सगळे मुखवटे असतात. आतले रूप वेगळ्याच असते. असे आपल्याला अनेक प्रसंगी आढळून येते. खरा भक्त हा अंतर्बाह्य निर्मळ असतो. मृदू सबाह्य नवनीत, तैसे सज्जनांचे चित्त. लोणी जेवढं मऊ आणि मुलायम असतं, तसंच सज्जनांचे चित्त असतं असं तुकाराम महाराज म्हणतात.

समर्थ रामदास किंवा संत तुकाराम यांच्यासारखे संत काही वेळा कठोरपणाने बोलताना दिसतात. पण त्यामागे समाज हिताची तळमळ असते. आई सुद्धा आपल्या मुलाला प्रसंगी रागावते, तर कधी चिडून ” मर मेल्या… “असे सुद्धा उद्गारते. परंतु त्यातही तिचे प्रेम असते आणि मुलाच्या कल्याणाचाच विचार असतो. असेच संतांचीही बोलणे असते. जाणीवपूर्वक कोणाचेही मन दुखवावे म्हणून ते बोलत नसतात.

म्हणून आपणही परमेश्वराचे प्रिय भक्त होण्याचा प्रयत्न करावा. अहंकार, मत्सर आणि स्वार्थ बुद्धी यांच्यासारख्या दुर्गुणांचा त्याग करण्याचा प्रयत्न करावा. प्रपंचात रहावे, प्रपंच उत्तम करावा. परंतु ज्या काही गोष्टी घडतात, त्यांच्याकडे साक्षीभावाने पाहायला शिकावे म्हणजे आपल्याला त्या बंधनकारक होत नाहीत. अनावश्यक बोलणे टाळावे आणि जे काही आपण बोलू त्यात नम्रता आणि माधुर्य असावे. असा भक्त हा त्या सर्वोत्तम परमेश्वराचा जगातील सर्वोत्कृष्ट असा भक्त असतो.

स्वसंवाद ::

१) माझ्या बोलण्यात नम्रता आणि माधुर्य आहे का – की ते केवळ गरजेपुरते असते आणि आतमध्ये वेगळेच असते?

२) माझ्या मनात कोणाबद्दल मत्सर किंवा द्वेष आहे का – आणि त्याची मला जाणीव होते का?

३) “संसारात राहूनही विरक्त” – माझ्या जीवनात मी साक्षीभावाने वागण्याचा प्रयत्न करतो का की संसारातील गोष्टी मला पूर्णपणे बांधून टाकतात?

– – – 

श्लोक क्र. ५२ – – 

क्रमी वेळ जो तत्त्वचिंतानुवादे।

न लिंपे कदा दंभ वादे विवादे॥

करी सुखसंवाद जो उगमाचा।

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा॥५२॥

अर्थ : खरा भक्त तत्वचिंतनात वेळ घालवतो. अहंकार, दंभ आणि वादविवादात तो वेळ घालवत नाही किंवा त्यात गुंतून पडत नाही. तो उगमाचे म्हणजे आपल्या मूळ स्वरूपाचे चिंतन करून स्वतःशी किंवा इतरांशी सुख संवाद साधतो असा भक्त परमेश्वराचा खरोखरच धन्य असा भक्त होय.

(क्रमी – वेळ घालवतो, तत्त्वचिंतन – परमात्मस्वरूपाचे चिंतन, अनुवाद – आचरण /अनुकरण, लिंपे – लिप्त होत नाही किंवा दोष लावून घेत नाही, दंभवाद – फसवा युक्तिवाद, विवाद – निष्फळ वाद, उगम – मूळ स्वरूप)

विवेचन : खरा भक्त आपला वेळ कसा घालवतो हे समर्थ पहिल्या आणि तिसऱ्या ओळीत सांगतात तर भक्ताने कसे असू नये हे दुसऱ्या ओळीत त्यांनी सांगितले आहे.

– – क्रमी वेळ जो तत्त्वचिंतानुवादे…

साधकाचे अंतिम ध्येय परमेश्वराला प्राप्त करून घेणे हे असते एकदा त्याने ही गोष्ट आपल्या मनाशी निश्चित केली की मग त्याचे चिंतन करण्यातच तो आपला वेळ घालवतो. त्याव्यतिरिक्त जो इतर गोष्टींमध्ये आपला वेळ घालवतो तो खरा साधक नव्हेच! तो मूळ तत्वाचे म्हणजे परमेश्वराचे चिंतन करतो. याच ओळीत अनुवादे हा शब्द आला आहे याचा अर्थ नीट समजून घ्यायला हवा. साधारणपणे अनुवाद म्हणजे भाषांतर असे आपण समजतो परंतु या ठिकाणी त्याचा अर्थ आचरण किंवा अनुकरण असा घ्यायला हवा. म्हणजे ज्याला परमेश्वराच्या मूळ स्वरूपाचे ज्ञान झाले आहे तो साधकाने जसे वागायला हवे तसेच वागत असतो. आपल्या गुरूंनी किंवा आपल्या श्रेष्ठ ग्रंथांनी जी गोष्ट सांगितली आहे, त्याचे अनुकरण करत असतो. त्याचा अनुभव घेत असतो. ज्ञानेश्वरी सारख्या ग्रंथाबद्दल एक तरी ओवी अनुभवावी असे म्हटले जाते. म्हणजे केवळ ज्ञानेश्वरीवाचून उपयोग नसतो तर त्याप्रमाणे वागून त्या ओवीची अनुभूती घेणे, अनुभव प्राप्त करणे हा त्याचा अर्थ आहे आणि खरा भक्त तेच करत असतो.

असा भक्त निष्करण वादविवादात गुंतून पडत नाही. आपल्याला थोडेफार ज्ञान झाले, काही मोजक्या ग्रंथांचे आपण वाचन केले म्हणजे आपल्याला फार कळते आहे असे आपल्याला वाटू लागते. मग आपण ते दाखवण्यासाठी समोरच्या व्यक्तीशी वादविवाद करत बसतो आणि मी किती श्रेष्ठ आहे, मला किती कळते हे अप्रत्यक्षपणे दाखवण्याचा प्रयत्न करत असतो. खरा भक्त बोलतो, गातो ते फक्त परमेश्वराबद्दल बोलण्यासाठीच. त्याचीच महती तो गात असतो. म्हणून तो व्यर्थ वादविवादात पडत नाही किंवा त्यात स्वतःला गुंतवून घेत नाही.

आपल्याला दिवसाचे चोवीस तास मिळतात. त्यातील आठ ते दहा तास झोपेत जातात. दहा ते बारा तास आपली नोकरी, प्रपंचाचे काम यात जातात आणि उरलेले तीन -चार तास आपण आपल्या मनाप्रमाणे घालवतो. त्यात टीव्ही पाहणे, मोबाईल पाहणे, मित्रमंडळींमध्ये गप्पा मारणे यासारख्या गोष्टी करतो. खरा भक्त या वेळेत काय करतो? तर तो स्वतःशी संवाद साधतो, आत्मचिंतन करतो. त्यालाच सुखसंवाद असे म्हणता येईल. हा सुखसंवाद उगमाकडे जाण्याचा असतो. गंगा नदी किंवा यमुना नदी आपण पाहिलेली असते परंतु हिमालयात प्रवास करणारे यात्रिक किंवा भाविक गंगोत्री किंवा यमुनोत्री म्हणजेच गंगेच्या किंवा यमुनेच्या उगमपर्यंत जातात. म्हणजेच मूळ स्थान शोधून काढतात.

आपल्यालाही मनुष्यजन्म प्राप्त झाला आहे. परंतु आपणही आपले मूळ स्वरूप काय आहे हे जाणून घेतले पाहिजे. कोहम म्हणजे मी कोण आहे, माझे मूळ स्वरूप कोणते आहे असे प्रश्न आपल्याला पडले पाहिजेत. मग आपण सोहम पर्यंत येतो म्हणजे तो मीच आहे हे आपल्याला कळू लागते आणि मग आपलाच आपल्याशी संवाद होऊ लागतो. ” तुका म्हणे होय मनाशी संवाद, आपुलाची वाद आपणाशी. ” आणि जेव्हा भक्ताच्या वागण्यात ही सगळी लक्षणे दिसू लागतात, तेव्हा तो फक्त खरोखरच परमेश्वराचा धन्य भक्त ठरतो.

स्वसंवाद ::

१) माझा रिकामा वेळ कशात जातो – तत्त्वचिंतनात की मोबाईल, गप्पा यासारख्या गोष्टींमध्ये?

२) मला थोडे ज्ञान झाले म्हणून मी वादविवादात पडतो का – की माझ्या ज्ञानाचे आचरण करण्यावर माझा भर असतो?

३) “कोहम ते सोहम” – मी कोण आहे हा प्रश्न मला कधी पडला आहे का? माझ्या मूळ स्वरूपाचा शोध घेण्याची माझ्या मनात खरी ओढ आहे का?

– क्रमशः श्लोक ५१ आणि ५२.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२४ ☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शब्द-शब्द साधना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे ले चल मांझी उस पार / स्वर- रुखसार खान, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२४ ☆

☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘शब्द शब्द में ब्रह्म है/ शब्द शब्द में सार। शब्द सदा ऐसे कहो/ जिन से उपजे प्यार।’ वास्तव में शब्द ही ब्रह्म है और शब्द में ही निहित है जीवन का संदेश…इसलिए सदा ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए, जिससे प्रेम भाव प्रकट हो। कबीरदास जी का यह दोहा ‘ऐसी बानी बोलिए/ मनवा शीतल होय। औरहुं को शीतल करे/ ख़ुद भी शीतल होय’ …उपरोक्त भाव की पुष्टि करता है। हमारे कटु वचन दिलों की दूरियों को इतना बढ़ा देते हैं; जिसे पाटना कठिन हो जाता है। इसलिए सदैव मधुर शब्दों का प्रयोग कीजिए, क्योंकि ‘शब्द से खुशी/ शब्द से ग़म। शब्द से पीड़ा/ शब्द ही मरहम’ शब्द में निहित हैं ख़ुशी व ग़म के भाव– परंतु उनका चुनाव आपकी सोच पर निर्भर करता है।

वास्तव में शब्दों में इतना सामर्थ्य है कि जहाँ वे मानव को असीम आनंद व अलौकिक प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं; वहीं ग़मों के सागर में डुबो भी सकते हैं। दूसरे शब्दों में शब्द पीड़ा है और शब्द ही मरहम है। शब्द मानव के रिसते ज़ख्मों पर कारग़र दवा का काम भी करते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस मन:स्थिति में किन शब्दों का प्रयोग किस अंदाज़ से करते हैं।

‘हीरा परखै जौहरी/ शब्द ही परखै साध। कबीर परखै साध को/ ताको मतो अगाध’ हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता व उपयोगिता के अनुसार इनका प्रयोग करता है। जौहरी हीरे को परख कर संतोष पाता है, तो साधु शब्दों व सत्य वचनों अर्थात् सत्संग को ही महत्व प्रदान करता है और आनंद प्राप्त करता है। वह उनके संदेशों को जीवन में धारण कर सुख व संतोष प्राप्त करता है; स्वयं को भाग्यशाली समझता है। परंतु कबीरदास जी उस साधु को परखते हैं कि उसके भावों व विचारों में कितनी गहनता व सार्थकता है; उसकी सोच कैसी है और वह जिस राह पर लोगों को चलने का संदेश देता है; वह उचित है या नहीं? वास्तव में संत वह है; जिसकी इच्छाओं का अंत हो गया है और उसकी श्रद्धा को आप विभक्त नहीं कर सकते; उसे सत्मार्ग पर चलने से नहीं रोक सकते–वही श्रद्धेय है, पूजनीय है। वास्तव में साधना करने व ब्रह्मचर्य को पालन करने वाला ही साधु है, जो सीधे व सपाट मार्ग का अनुसरण करता है। इसके लिए आवश्यकता है कि जब हम अकेले हों, तो अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं अर्थात् कुत्सित भावनाओं व विचारों को अपने मनोमस्तिष्क में दस्तक न देने दें। अहं व क्रोध पर नियंत्रण रखें, क्योंकि ये दोनों मानव के अजात शत्रु हैं, जिसके लिए अपनी कामनाओं-तृष्णाओं को नियंत्रित करना आवश्यक है।

अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को सबसे दूर कर देता है, तो क्रोध सामने वाले को तो हानि पहुंचाता ही है; वहीं अपने लिए भी अनिष्टकारी सिद्ध होता है। अहंनिष्ठ व क्रोधी व्यक्ति आवेश में न जाने क्या-क्या कह जाता है; जिसके लिए उसे बाद में प्रायश्चित करना पड़ता है। परंतु ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ अर्थात् समय गुज़र जाने के पश्चात् हाथ मलने अर्थात् पछताने का कोई औचित्य अथवा सार्थकता नहीं रहती। प्रायश्चित करना हमें सुख व संतोष प्रदान करने की सामर्थ्य तो रखता है, ‘परंतु गया वक्त कभी लौटकर नहीं आता।’ शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, परंतु शब्दों के ज़ख्म कभी नहीं भरते; वे तो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु कटु वचन जहाँ मानव को पीड़ा प्रदान करते हैं; वहीं सहानुभूति व क्षमा-याचना के दो शब्द बोलकर आप उन पर मरहम भी लगा सकते हैं। शायद! इसीलिए कहा गया है गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी मधुर वाणी द्वारा दूसरे के दु:खों को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। आपका दु:खी व आपदाग्रस्त व्यक्ति को ‘मैं हूं ना’ कह देना ही उसमें आत्मविश्वास जाग्रत करता है और वह स्वयं को अकेला व असहाय अनुभव नहीं करता। उसे ऐसा लगता है कि आप सदैव उसकी ढाल बनकर उसके साथ खड़े हैं।

एकांत में व्यक्ति के लिए अपने दूषित मनोभावों पर नियंत्रण करना आवश्यक है तथा सबके बीच अर्थात् समाज में रहते हुए शब्दों की साधना करना भी अनिवार्य है… सोच- समझकर बोलने की सार्थकता से आप मुख नहीं मोड़ सकते। इसलिए कहा जा सकता है कि यदि आपको दूसरे व्यक्ति को उसकी ग़लती का एहसास दिलाना है, तो उससे एकांत में बात करो, क्योंकि सबके बीच में कही गई बात बवाल खड़ा कर देती है। अक्सर उस स्थिति में दोनों के अहं का टकराव होता है। अहं से संघर्ष का जन्म होता है और उस स्थिति में वह दूसरे के प्राण लेने पर उतारु हो जाता है। गुस्सा चाण्डाल होता है… बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के उदाहरण आपके समक्ष हैं। परशुराम का क्रोध में अपनी माता का वध करना व ऋषि गौतम का अहिल्या का श्राप देना आदि हमें संदेश देता है कि व्यक्ति को बोलने से पहले सोचना अर्थात् तोलना चाहिए। उस विषम परिस्थिति में कटु व अनर्गल शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और दूसरों से वैसा व्यवहार करना चाहिए; जिसे सहन करने की क्षमता आप में है। सो! आवश्यकता है, हृदय की शुद्धता व मन की स्पष्टता की अर्थात् आप अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, दुर्भावना व दुष्भावनाएं मत रखिए, बल्कि बोलने से पहले उसके औचित्य-अनौचित्य का चिन्तन-मनन कीजिए। दूसरे शब्दों में किसी के कहने पर उसके प्रति अपनी धारणा मत बनाइए अर्थात् कानों-सुनी बात पर विश्वास मत कीजिए, क्योंकि विवाह के सारे गीत सत्य नहीं होते। कानों-सुनी बात पर विश्वास करने वाले लोग सदैव धोखा खाते हैं और उनका पतन अवश्यंभावी होता है। कोई भी उनके साथ रहना पसंद नहीं करता। बिना सोच-विचार के किए गए कर्म केवल आपको ही हानि नहीं पहुंचाते; परिवार, समाज व देश के लिए भी विध्वंसकारी होते हैं।

सो! दोस्त, रास्ता, किताब व सोच यदि ग़लत हों, तो गुमराह कर देते हैं; यदि ठीक हों, तो जीवन सफल हो जाता है। उपरोक्त उक्ति हमें आग़ाह करती है कि सदैव अच्छे लोगों की संगति करें, क्योंकि सच्चा मित्र आपका सहायक, निदेशक व गुरु होता है; जो आपको कभी पथ-विचलित नहीं होने देता। वह आपको ग़लत मार्ग व ग़लत दिशा की ओर जाने पर सचेत करता है तथा आपकी उन्नति को देख कर प्रसन्न होता है; आप को उत्साहित करता है। पुस्तकें मानव की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। इसलिए कहा गया है कि ‘बुरी संगति से इंसान अकेला भला’और एकांत में अच्छे मित्र के साथ न होने की स्थिति में सद्ग्रथों व अच्छी पुस्तकों का सान्निध्य हमारा यथोचित मार्गदर्शन करता है।

हाँ! सबसे बड़ी है मानव की सोच अर्थात् जो मानव सोचता है, वही उसके चेहरे के भावों से परिलक्षित होता है और व्यवहार उसके कार्यों में झलकता है। इसलिए अपने हृदय में दैवीय गुणों स्नेह, सौहार्द, त्याग, करुणा, सहानुभूति आदि  को पल्लवित होने दीजिए… ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर की भावना को दूर से सलाम कीजिए, क्योंकि सत्य की राह का अनुसरण करने वाले की राह में अनगिनत बाधाएं आती हैं। परंतु यदि वह उन असामान्य परिस्थितियों में अपना धैर्य नहीं खोता; दु:खी नहीं होता, बल्कि उससे सीख लेता है तो वह अपनी मंज़िल को प्राप्त कर अपने भविष्य को सुखमय बनाता है। वह सदैव शांत भाव में रहता है, क्योंकि ‘सुख- दु:ख तो अतिथि हैं’…’जो आया है, अवश्य जाएगा’ को अपना मूल-मंत्र स्वीकार संतोष से अपना जीवन बसर करता है। सो! आने वाले की खुशी व जाने वाले का ग़म क्यों? इंसान को हर स्थिति में सम रहना चाहिए, ताकि दु:ख आपको विचलित न करें और सुख आपके सत्मार्ग पर चलने में बाधा उपस्थित न करें अर्थात् आपको ग़लत राह का अनुसरण न करने दें। वास्तव में पैसा व पद-प्रतिष्ठा मानव को अहंवादी बना देते हैं और उससे उपजा सर्वश्रेष्ठता का भाव अमानुष। वह निपट स्वार्थी हो जाता है और केवल अपनी सुख-सुविधाओं के बारे में सोचता है। इसलिए ऐसा स्थान यश व लक्ष्मी को रास नहीं आता और वे वहां से रुख़्सत हो जाते हैं।

सो! जहां सत्य है; वहां धर्म है, यश है और वहीं लक्ष्मी निवास करती है। जहां शांति है; सौहार्द व सद्भाव है; मधुर व्यवहार व समर्पण भाव है और वहां कलह, अशांति, ईर्ष्या-द्वेष आदि प्रवेश पाने का साहस नहीं जुटा सकते। इसलिए मानव को कभी भी झूठ का आश्रय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वह सब बुराइयों की जड़ है। मधुर व्यवहार द्वारा आप करोड़ों दिलों पर राज्य कर सकते हैं…सबके प्रिय बन सकते हैं। लोग आपके साथ रहने व आपका अनुसरण करने में स्वयं को गौरवशाली व भाग्यशाली समझते हैं। सो! शब्द ब्रह्म है; उसकी सार्थकता को स्वीकार कर जीवन में धारण करें और सबके प्रिय बनें, क्योंकि हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-निर्माता हैं और हमारी ज़िंदगी के प्रणेता हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९६ – नवगीत – प्रभु श्री राम जी की महिमा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतप्रभु श्री राम जी की महिमा

? रचना संसार # ९६ – गीत – प्रभु श्री राम जी की महिमा…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

राम तुम्हारी महिमा सारे,

जग ने देखो गाई है।

राम कथा लिखकर तुलसी ने,

जन -जन में पहुँचाई है।।

*

अवतारे हैं राम अवध में,

देव पुष्प बरसाते हैं।

ढोल नगाड़े घर -घर बजते ,

ऋषि मुनि भी हर्षाते हैं।।

ऋषि वशिष्ठ से शिक्षा पाकर,

प्रेमिल -गंग बहाई है।

*

उनकी पत्नी भी जगजननी ,

जनक दुलारी सीता थीं।

तीन लोक में यश था उनका

देवी परम पुनीता थीं।

राज-तिलक की शुभ बेला पर

दुख की बदरी छाई है।

*

कुटिल मंथरा की चालों से,

राम बने वनवासी थे।

लखन जानकी संग चले वन,

क्षुब्ध सभीपुरवासी थे।।

चौदह साल रहे प्रभु वन में,

कैसी विपदा आई है।

*

सीता हरण किया रावण ने,

वह तो अत्याचारी था।

गर्व राम ने उसका तोड़ा,

जग सारा आभारी था।

वापस लेकर सीता आये,

बजी अवध शहनाई है।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२४ ☆ भावना के गीत – प्रेम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के गीत – प्रेम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के गीत – प्रेम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

प्रेम हवा का मंद झोंका

छूकर मन को जाता है

 जीवन में सुरभित पत्तों सा

हरियाली भर जाती है।

 *

मन में प्रेम के भाव लिए

 प्रेम भाव जगाता है

दुख की तपती राहों में,

शीतल छाँव पाता है।

 *

मीरा बनता प्रेम कभी

कभी राधा का गीत।

प्रेम छुपा माँ ममता में,

कभी सखी का गीत।

 *

प्रेम केवल प्रेम नहीं,

प्रेम मन का  पावन गान।

प्रेम है उपवन में छाया

मधुर मधुरिम बाहर।।

 *

जहाँ प्रेम के दीप जले,

मिटे वहाँ अंधियार।

प्रेम कटुता दूर करे,

महके हर परिवार।।

 

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०६ ☆ कविता – शिव संरचना… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – शिव संरचना आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०६ ☆

कविता – शिव संरचना☆ श्री संतोष नेमा ☆

रास्ते में चूने की

लाइन खींचते देख

हमने पूछा भैया क्या

कोई नेता आ रहे हैं….?

बोला नहीं मंदिर

के रास्ते चूने की

लाइन डाल रहे हैं …!

लोगों को भगवान की

राह दिखा रहे हैं …!

हमने कहा लोगों को

क्या मदिर की राह

का ज्ञान नहीं…?

बोला मंदिर क्या

भगवान का ही भान नहीं…!

 

अब तो वह भी भक्तों

को तरसते हैं…?

भक्त है कि भगवान पर ही 

फ़िल्मी स्टाइल में बरसते हैं …!

बोलते हैं आज खुश तो

बहुत होगा तू…जैसा

अहसान सा करते हैं…!

 

फिर भी भोले शंकर

सब के दुःख हरते हैं …!

कुछ तो शिवरात्रि की आड़ में

खुलकर नशा करते हैं…!

पीकर गांजा-भंग

खूब मज़ा करते हैं…!

अब त्यौहार भगवान

के किये कम अपने लिए

ज्यादा हो गए हैं …!

भक्त स्वादानुसार

खान-पान पर

आमादा हो गए हैं …!

“संतोष” भोले को

भोला समझने की भूल

न करना …!

हर अति के अंत की

है शिव संरचना …!

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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