हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तिनके…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆

☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तिनके अब पैरों के तले

रौंदे नहीं जाएंगे

अगर जोर जबरदस्ती की

तो पैर जख्मी हो जाएंगे

 

तिनकों का जख्म

आसानी से नहीं भरता है

जख्म नासूर बन जाए

तो कभी-कभी इंसान

दर्द से मरता है

 

बड़े-बड़े आंधी और तूफान

बरगद को उखाड़ देते हैं

लेकिन वह भी

तुच्छ समझे जाने वाले

तिनके के आगे

सर झुका देते

 

तिनके की जड़ें

अंदर तक जाती है

ना वह मरती है

ना कुंभलाती है

इसकी गहराई किसी को

समझ नहीं आती है

 

तिनके दुर्बल सही

पर कमजोर नहीं है

किसी और का

उन पर जोर नहीं है

जंगल ही उनका अपना घर है

कहीं और ठौर नहीं है

 

तिनके को प्रकृति की पनाह

में रहने दो

उन्मुक्त  हवा ओं के साथ बहने दो

परिंदों की बोली कहने दो

निसर्ग  की धूप-छांव

सहने दो

 

क्यों की,

जब तिनके प्रचंड गर्मी में

झुलसते है

अंदर ही अंदर

सुलगते है

जंगल की भीषण आग बनते हैं

दावानल में ढलते है

तो वन के वन

जलकर राख हो जाते है

अहंकार में डूबे हुए

सब ख़ाक हो जाते है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०४ – युद्ध और धुआं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता युद्ध और धुआं।)

☆ अभिव्यक्ति # १०४ ☆  

☆ युद्ध और धुआं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

क्यों की हमने, प्रकृति से होड़,

क्यों लगाई हमने, प्रगति से दौड़,

क्या मिला हमें, आ गए हम कहां,

क्या मिला हमें, बस धुआं ही धुआं,

युद्ध में, कौन, जीता है आज तक,

जो भी लड़ा है, हारा ही है, आज तक,

अपनो को खो कर, कौन खुश हुआ,

जो भी जीता, वही  हारा ही तो है,

शांति, कभी युद्ध का प्रति फल नहीं,

विध्वंस ही तो युद्ध का परिणाम है,

चारों तरफ बस गुबार ही गुबार,

शांति है कहां, बस धुआं ही धुआं,

ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार, का, द्योतक है, युद्ध,

विनाशकारी, प्रलयंकारी होता, है युद्ध,

युद्ध में, युद्ध से कौन जीत सका है

सबका अहितकारी, ही तो  है युद्ध,

क्या मिला, कब किसे, क्या कहां,

बस धुआं ही धुआं, बस धुआं ही धुआं.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३२ ☆ व्यंग्य – विष्णु भगवान को रिमाइंडर ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘विष्णु भगवान को रिमाइंडर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विष्णु भगवान को रिमाइंडर डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

 

प्रभु,

कई साल पहले मैंने आपको एक पत्र के द्वारा निवेदन किया था कि चूंकि अब मेरी उम्र आपके प्रत्यक्ष दर्शन के लायक हो गयी है, अतः मेरे सपने में किसी प्रतिनिधि को भेज कर जानकारी मुहैया करायें कि स्वर्ग और नरक में इंतज़ामात कैसे हैं। अभी कथावाचकों से जो जानकारी मिलती है उससे बहुत समाधान नहीं होता। अफसोस है कि मेरे निवेदन का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला। लगता है आपके दफ़्तरों में कामकाज ठीक नहीं है।

मुझे यह निवेदन इसलिए करना पड़ा क्योंकि यहां मृत्युलोक में हमारी लाइफ़-स्टाइल में बहुत तरक्की हो गयी है। हम बहुत आराम-पसन्द हो गये हैं। हमारे बाप-दादा ने टेबिल-फ़ैन भी नहीं देखा था, लेकिन हम ए.सी. की हवा ले रहे हैं, भले ही बार-बार ज़ुकाम से पीड़ित हो रहे हों। हमारे बहुत से काम अब ‘रोबो’ और ‘रिमोट’ कर रहे हैं। आदमी को हिलने-डुलने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन सीधा बिस्तर से ट्रांसफर होकर अर्थी पर चढ़ जाएगा।

प्रभु, यह ध्यान रहे कि अब हम रथ की सवारी के लायक नहीं रहे। हम में से ज़्यादातर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ और ‘आर्थ्राइटिस’ के मरीज़ हैं। ‘जंक फ़ूड’ खाते-खाते हमारी हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं। रथ पर बैठेंगे तो निश्चय ही दो-चार हड्डियां टूटेंगीं। यहां तो साधु-सन्यासी भी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इसलिए निवेदन है कि हमारी हालत के मद्देनज़र आरामदेह ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम हो। डायबिटीज़ और ब्लड-प्रेशर के मरीज़ों के लिए वहां क्या इंतज़ाम है, यह भी शंका बनी हुई है।

एक विशेष बात जिसके लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं यह है कि आपके चित्रों में आप अपनी ससुराल यानी समुद्र में शेषशैया पर लेटे हैं और आपकी पत्नी लक्ष्मी आपके चरण चांप रही हैं। देख कर कुछ अजीब लगता है। एक तो आपका इतने दिन तक ससुराल में रहना ठीक नहीं है। हमारे यहां कहावत है ‘ससुरार सुख की सार, रहै दिना दो चार।’ यानी ससुराल में सुख मिलता है, बशर्ते कि दो-चार दिन ही रहा जाए। इसलिए समझना मुश्किल है कि आप वहां कैसे हज़ारों साल से डेरा जमाये हैं। ससुर साहब आपके लिहाज में कुछ न बोलते होंगे, लेकिन आपका वहां इतने लंबे समय तक घरजमाई की तरह टिकना उचित नहीं लगता।

लक्ष्मी जी का लगातार आपके चरण चांपना आपके बहुत से भक्तों को अटपटा लग रहा है। यह नारी-अस्मिता और स्त्री-स्वातंत्र्य का ज़माना है। करवा चौथ और तीजा को छोड़ दें तो आज की नारियां पति के चरण छूते हुए फोटो खिंचाने से हिचकती हैं। एक पुरानी फिल्म में पत्नी को पति-भक्ति में गाते हुए सुना था— ‘कौन जाए मथुरा, कौन जाए काशी, इन तीर्थों से मुझे क्या काम है; मेरे घर में ही हैं भगवान मेरे, उनके चरनों में मेरे चारों धाम हैं।’ ऐसे गीत अब सुनायी नहीं पड़ते। पतिदेव का मर्तबा भी पहले जैसा नहीं रहा। इस बीच नारी-अस्मिता के बड़े-बड़े आंदोलन हो गये, जिनके मार्फत स्त्री को समझा दिया गया कि पति नाम का प्राणी ‘परमेश्वर’ नहीं, महज़ हाड़-मांस का मामूली पुतला है। परिणामत: कई घरों में पति की इज़्ज़त दो कौड़ी की हो गयी है।

एक और बात यह कि आप अपने चार हाथों में से एक में पद्म यानी कमल धारण किये हैं और आपका एक हाथ अभय मुद्रा में उठा है। मुश्किल यह है कि कमल और हाथ हमारे यहां पार्टियों के चुनाव-चिन्ह हैं, इसलिए यहां दो पार्टियों के बीच सिरफुटव्वल हो रही है। दोनों आपके चित्रों की दुहाई देकर कहती हैं कि आपका आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो रहा है। इस संबंध में आपकी तरफ से कुछ स्पष्टीकरण मिल सके तो यह खींचतान बंद हो। गनीमत है कि आपके शंख और चक्र किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह नहीं हैं, अन्यथा और बवाल मचता।

अन्त में मेरा आपसे पुनः निवेदन है कि  ‘वहां’ के इंतज़ामात के बारे में मेरे द्वारा चाही गयी जानकारी मुहैया करायें ताकि मेरे जैसे लोग निश्चिंत होकर स्वर्ग या नरक में प्रवेश कर सकें। दूसरे, आप जल्दी लक्ष्मी जी के साथ ससुराल छोड़कर अपने घर लौटें ताकि भक्तों का असमंजस दूर हो सके।

मेरी बातों को अन्यथा न लें। कृपा बनाये रखें।

आपका परम भक्त

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०३ – मौत की फकीरी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मौत की फकीरी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०३ — मौत की फकीरी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

गरीब और धनवान धरती पर जीवन से बने रहे। धनवान ने खूब पाया और गरीब ने खूब खोया। गरीब कपड़े के लिए तरसता था और धनवान कपड़ों में बादशाह था। पर दोनों दो गज के कफन में लिपट कर भगवान के घर जाते। जाने में गरीब अपने दायरे से होताऔर धनवान इस तरह से होता दो गज से अधिक कफन में जाने की व्यवस्था हो तो वह जाने का रास्ता भूल जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

14 — 04 — 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३२ – असार का सार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३२

☆ असार का सार… ? श्री संजय भारद्वाज ☆

मनुष्य के मानस में कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य उठता है कि उसका जन्म क्यों हुआ है? क्या केवल जन्म लेने, जन्म को भोगने और जन्म को मरण तक ले जाने का माध्यम भर है मनुष्य?

वस्तुत: जीवन समय का साक्षी बनने के लिए नहीं है अपितु समय के पार जाने की यात्रा है।   अपार सृष्टि के पार जाने का, मानव देह एकमात्र अवसर है, एक मात्र माध्यम है। यह सत्य है कि एक जीवन में कोई बिरला ही पार जा पाता है, तथापि एक जीवन में प्रयास कर अगले तिरासी लाख, निन्यानवे हजार, नौ सौ निन्यानवे जन्मों के फेरे से बचना संभव है। मानव देह में मिले समय का उपयोग न हुआ तो कितना लम्बा फेरा लगाकर लौटना पड़ेगा!

जीवन को क्षणभंगुर कहना सामान्य बात है। क्षणभंगुरता में जीवन निहारना, असामान्य दर्शन है। लघु से विराट की यात्रा, अपनी एक कविता के माध्यम से स्मरण हो आती है-

जीवन क्षणभंगुर है,

सिक्का बताता रहा,

समय का चलन बदल दिया,

उसने सिक्का उलट दिया,

क्षणभंगुरता में ही जीवन है,

अब सिक्के ने कहा,

शब्द और अर्थ के बीच,

अलख दृष्टि होती है,

लघु से विराट की यात्रा

ऐसे ही होती है.. !

ज्ञान मार्ग का जीव मनुष्येतर जन्मों को अपवाद कर देता है, एक छलांग में इन्हें पार कर लौट आता है फिर मनुज देह को धारण करने, फिर पार जाने के लिए।

मनुष्य जाति का आध्यात्मिक इतिहास बताता है कि ज्ञानशलाका के स्पर्श से शनै:-शनै: अंतस का ज्ञानचक्षु खुलने लगता हैं। अपने उत्कर्ष पर ज्ञानचक्षु समग्र दृष्टिवान हो जाता है महादेव-सा। यह दर्शन सम्यक होता है। सम्यक दृष्टि से जो दिखता है, अद्वैत होता है विष्णु-सा। अद्वैत में सृजन का एक चक्र अंतर्निहित होता है ब्रह्मा-सा। ज्ञान मनुष्य को ब्रह्मा, विष्णु, महेश-सा कर सकता है। सर्जक, सम्यक, जागृत होना, मनुष्य को त्रिदेव कर सकता है।

जिसकी कल्पना मात्र से शब्द रोमांचित हो जाते हैं, देह के रोम उठ खड़े होते हैं, वह ‘त्रिदेव अवस्था’ कैसी होगी! भीतर बसे त्रिदेव का साक्षात्कार, द्योतक है सृष्टि के पार का।

असार है संसार। असार का सार है मनुष्य होना। सार का स्वयं से साक्षात्कार कहलाता है चमत्कार। यह चमत्कार दही में अंतर्निहित माखन-सा है। माखन पाने के लिए बिलोना तो पड़ेगा। माँ यशोदा ने बिलोया तो साक्षात श्याम को पाया।

संभावनाओं की अवधि, हर साँस के साथ घट रही है। अपनी संभावनाओं पर काम आरंभ करो आज और अभी। असार से केवल ‘अ’ ही तो हटाना है। साधक जानता है कि से ‘आरंभ’ होता है। आरंभ करो, सार तुम्हारी प्रतीक्षा में है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७७ – आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका ज्ञानवर्धक आलेख – छंद शाला)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७७ ☆

☆ आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

छंद वाचिक होते हैं। वेदों की रचना कह-सुन-याद रखकर ही हुई। इसलिए वैदिक ज्ञान/ ऋचाएँ सदियों तक श्रुति-स्मृति पर आधारित रहीं।

कंठ से निकलनेवाली ध्वनि को उच्चार कहते हैं।

उच्चार दो तरह के होते हैं।

कम समय में बोले जानेवाले उच्चार को लघु तथा उससे दो गुने समय में बोले जानेवाले उच्चार को दीर्घ/गुरु कहते हैं। छंद रचना के लिए लघु उच्चार को इकाई या १ तथा गुरु उच्चार को २ गिना जाता है।

अपवाद स्वरूप कुछ ध्वनियाँ जैसे ॐ का उच्चार काल ३ होता है।

वैदिक ज्ञान बढ़ जाने पर उसे मौखिक रूप से याद रखना संभव न रहा। तब हर ध्वनि के लिए एक संकेत बनाया गया, इसे अक्षर (जिसका क्षरण न हो) कहा गया।

एकाधिक अक्षर मिलाकर विशिष्ट अर्थ अभिव्यक्त करनेवाले शब्द बने। अक्षर और शब्द आरंभ में वाचिक थे। शब्दों के सम्मिलन से वाक्य बने। अक्षरों व शब्दों के लयबद्ध वाचन से छंद और छंदों के प्रयोग से पद्य/काव्य (पहेली,छंद, गीत आदि) रचना हुई। वाक्यों के संयोजन से गद्य (कहावतों, मुहावरों,वार्ता, कथा, कहानी आदि) का सृजन हुआ। लोक गीत व लोक कथाओं का विकास इसी तरह हुआ। इस काल तक तुरंत रचना करनेवाले आशु कवि/आशु कथाकार ही भाषा और साहित्य का विकास कर रहे थे। लोक गायकों ने लोकगीत तथा लोक कथाकारों ने लोककथा विधाओं का विकास किया।

वनवासी/आदिवासी समूहों की भाषाएँ और साहित्य इसी काल में विकसित हुआ। लोक साहित्य के विकास में महिलाओं तथा पुरुषों की भागीदारी आरंभ से ही बराबर रही। इस दौर में घर, पनघट, खलिहान, चौपाल आदि तथा जन्म-मरण, दैनिक जीवन, ऋतु परिवर्तन। पर्व-त्योहार, मिलना-बिछुड़ना, सुख-दुख,  आदि ऐसे स्थल व कारण थे जहाँ स्वानुभूति सृजन का रूप धारण कर लेती थी।

कालांतर में मानव ने खेती करना सीखा और खेतों के निकट झोपड़ी बनाकर रहने पर ग्राम्य सभ्यता का विकास हुआ। खेतों में फसलों की रक्षा करने के लिए बनाए गए मचानों पर खड़े कृषक बहुधा सवेरे अथवा शाम को प्रकृति दर्शन करते हुए या अपने एकांत को मिटाने के लिए कुछ ध्वनियों का लयबद्ध उच्चारण कर जोर से गाते थे, कहीं दूर कोई दूसरा कृषक उस पंक्ति को सुनकर बार-बार दोहरा कर उसी लय में अपने शब्द रखकर दूसरी पंक्ति गा देता था, फिर कोई तीसरा और चौथा व्यक्ति अपनी पंक्ति जोड़ देता था। ऐसी पंक्तियों में उच्चार क्रम, उच्चार काल तथा पंक्ति के अंत में समान ध्वनियाँ हुआ करती थीं। ऐसी दो पंक्ति की रचना को दोपदी, तीन पंक्ति की रचना को त्रिपदी”, चार पंक्ति की रचना को *चौपदी इत्यादि नाम दिए गए। इस समय तक रचनाकार समझदार किंतु निरक्षर (अक्षर लिखने की कला से अपरिचित) थे, अशिक्षित नहीं। यह परंपरा कबीर, रैदास, घाघ, भड्डरी, मीराबाई आदि तक देखी जा सकती है। भाषा और साहित्य के विकास में योगदान करनेवाले अनेक रचनाकार सीखने-सिखाने में सक्षम अर्थात सुशिक्षित किंतु निरक्षर थे।

मानव द्वारा रेत पर अँगुलियों से बिंदु, रेखा, वृत्त आदि अंकित करने पर लिपि का विकास आरंभ हुआ। रेत पर बनाई आकृति मिटने का समाधान पेड़ों की पत्तियों के रह को टहनियों के माध्यम से पत्थरों पर अंकित करने की विधि से किया गया जिसका परिणाम शैल चित्रों/शिलालेखों के रूप में आज भी उपलब्ध है। अक्षरों तथा अक्षरों के अर्थ युक्त सम्मिलन से बने शब्दों को पत्थरों पर अंकित करना लिपि के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। कालांतर में शब्दों को लंबे समय तक न सड़नेवाले पत्तों पर भी लिखा गया। हमें प्राचीन ग्रंथ ताड़ पत्रों तथा भोज पत्रों पर लिखे हुए मिलते हैं।

स्मरण रहे कि लिपि के विकास के बहुत पहले वाचिक (बोल-चाल की) भाषा तथा छंद लोक में प्रचलित हो चुके थे।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

 जयश्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा जी की आज की चौपाई है:-

जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

 श्री हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के बार-बार संपुट पाठ करने से सूर्यकृपा विद्या, ज्ञान और प्रतिष्ठा मिलती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब हम आपको इस सप्ताह, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।

इस सप्ताह सूर्य मेष राशि में, मंगल, बुध और शनि मीन राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र वृष राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। मेष राशि में सूर्य उच्च के होते हैं अतः उनके असर के कारण परिणाम बेहद चौंकाने वाले होंगे।

आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। क्रोध की मात्रा में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। इस समय सूर्य उच्च का होकर आपके लग्न भाव में बैठा है जिससे आपके कई कष्ट कट सकते हैं। आपको उनके लिए केवल थोड़ा प्रयास करना है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतने पर सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष मदद प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल कार्यों की सफलता के लिए शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

अविवाहित जातकों के लिए अच्छी खबर है। उनके विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। पुराने प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। नए संबंध भी बन सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है परंतु उसके लिए विशेष और सावधानी पूर्वक प्रयास करने होंगे। धन आने का भी योग है, परंतु बुद्धिमानी पूर्वक धन का निवेश करना होगा। कर्मचारियों और अधिकारियों को अपने कार्यालय में तथा अपने अधिकारियों से शांत रहकर ही वार्तालाप करना होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल किसी भी कार्य मैं सफलता प्रदान करने वाली है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। परंतु इस सफलता के लिए आपको सावधानी से कार्य करना होगा। धन प्राप्त होने का बहुत अच्छा समय है। आपके थोड़े से प्रयास से अच्छे धन की प्राप्ति हो सकती है। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक रहेगी। आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। भाग्य से इस सप्ताह आप किसी तरह की उम्मीद ना करें बल्कि आपको अपने परिश्रम और अपने बुद्धि पर यकीन कर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल उपयोगी हैं। 20 और 21 अप्रैल को कार्यों को सचेत रहकर करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको बड़े-बड़े कार्यो से धन प्राप्त होने की उम्मीद है। कार्यालय में आपको सफलता मिलेगी। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से इस बार आपको कभी सहयोग मिलेगा और कभी नहीं मिल पाएगा। इसलिए आपको चाहिए कि आप अपने कर्म पर ज्यादा विश्वास करें। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। आपके माता जी को कष्ट हो सकता है। उनकी दवा में के प्रति आपको विशेष ध्यान देना चाहिए। परिवार के बाकी सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपको पेट में थोड़ी सी तकलीफ होने की संभावना है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल कार्यों को करने में मददगार हैं। 22 और 23 अप्रैल को आपको सावधानी पूर्वक कोई भी कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें तथा शनिवार में शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। कार्यालय में उनको अपने साथियों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको अच्छी मदद मिलने की उम्मीद है। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुक रहे हो उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। दुर्घटनाओं से थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। परंतु अगर कोई दुर्घटना होती है तो आपको ज्यादा चोट नहीं आएगी। आपको अपने और अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। 24 और 25 तारीख को आपको जागरूक रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपका भाग्य पूरी तरह से आपका साथ देगा। आपके कई कार्य अच्छे भाग्य के कारण आराम से हो जाएंगे। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा है। उनको व्यापार में अच्छा लाभ मिल सकता है। अधिकारीयों और कर्मचारियों को अपने सहयोगियों और अधिकारियों से सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके स्वास्थ्य में मामूली परेशानी आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल कार्यों को करने के लिए फलदायक है। 26 अप्रैल को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। 24 और 25 अप्रैल को आपके पास धन आने का योग है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिवपंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अति महत्वपूर्ण है। इस सप्ताह उनको अपने प्रत्येक प्रयास में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपके संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा या पहले जैसा ही रहेगा। शत्रुओं को आप इस सप्ताह बड़े आसानी से पराजित कर सकेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। अपने कर्म पर विश्वास करें। दुर्भाग्य और सौभाग्य पर बिल्कुल ही विश्वास ना करें। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल परिणाम दायक है। 20 और 21 अप्रैल को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह उत्साह भरा है। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों को भी गति मिलेगी। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग मिल सकता है। शत्रुओं को आप इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह कोई भी शत्रु आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है। पिताजी या माताजी के स्वास्थ्य पर थोड़ा आपको सतर्क रहना चाहिए। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। आपको पेट का कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 तारीख लाभप्रद हैं। 22 और 23 अप्रैल को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। आपके संतान के लिए सप्ताह सफलताओं से भरा हुआ है। वे जिस चीज में भी प्रयास करेंगे उनको सफलता प्राप्त होगी। छात्रों के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। उनको अपने परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंध में आपको तनाव हो सकता है। आपके जीवन साथी को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपको जन समुदाय के बीच में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस कारण से यह सप्ताह जनप्रतिनिधियों के लिए उत्तम है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। गलत रास्ते से धन आने का योग है। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। छात्र-छात्राओं को इस सप्ताह परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपके पेट में थोड़ी तकलीफ हो सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। भाग्य से इस सप्ताह आपको कभी लाभ होगा और कभी नहीं हो पाएगा। अतः आपको अपने कर्मों पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। 22, 23 और 26 तारीख को आपको सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। व्यापारी इस सप्ताह थोड़ा सतर्क रहें। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपके भाई बहनों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। ‌आपको विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जन समुदाय के बीच में आपकी इज्जत का इजाफा होगा। छात्र-छात्राओं के लिए यह सप्ताह थोड़ा परेशानी भरा हो सकता है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग नहीं मिल पाएगा। आपका या आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य छोड़ा थोड़ा कम ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। 24 और 25 अप्रैल को आपको अपने कार्यों के प्रति जागरूक रहना पड़ेगा, अन्यथा आपके कार्य सफल नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। माता जी को थोड़ी सी तकलीफ हो सकती है। इस सप्ताह जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। धन आने का उत्तम योग है परंतु इसके लिए आपको प्रयास भी करने पड़ेंगे। कचहरी के कार्यों में थोड़ा सतर्क रहें। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख लाभदायक है। 26 तारीख को आपको होशियार होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए की आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २९ आणि ३० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २९ आणि ३० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. २९ – – 

पदी राघवाचे सदा ब्रीद गाजे |

बळें भक्तरीपूशिरी कांबि वाजे |

पुरी वाहिली सर्व जेणें विमानीं|

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी|२९|

अर्थ : आपल्या भक्तांचे रक्षण करणारा हे त्या राघवाचे वचन पदोपदी गाजत आहे म्हणजेच त्याचा जयघोष सर्वत्र ऐकू येतो. त्याच्या भक्तांच्या शत्रूवर (त्यांच्या डोक्यावर) तो जोराने आपल्या धनुष्य दंडाचा प्रहार करतो. प्रभू रामचंद्रांनी (आणि श्रीकृष्णांनी सुद्धा) आपल्या नागरिकांना आपल्या सोबत (त्यांच्या रक्षणासाठी)विमानात बसवून नेले. असा हा परमेश्वर (राम) तुझी कधीही उपेक्षा करणार नाही.

(ब्रीद – प्रतिज्ञा, रिपु – शत्रू, कांबी – धनुष्याची कांबीट/कामठा, पुरी – नगरी)

विवेचन: मागील श्लोकात समर्थांनी धनुष्य धारण (कोदंडधारी) केलेला राम आपल्या भक्तांच्या रक्षणार्थ कसा सज्ज आहे हे सांगितले. या श्लोकामध्ये भक्तांचे रक्षण करणे हे परमेश्वराचे ब्रीदच आहे हे समर्थ परत ठामपणे आपल्या मनावर बिंबवतात.

सज्जनांच्या रक्षणासाठी आणि दुर्जनांच्या निर्दालनासाठी भगवंत अवतार धारण करतात. जगामध्ये सामान्य माणसे, संत महंत आणि परमेश्वराचे कार्य करण्यासाठी अवतार धारण केलेली अशी तीन प्रकारची माणसे असतात. सामान्य माणूस आपल्या चांगल्या कर्माच्या सहाय्याने स्वउद्धार करून घेऊ शकतो. संत महंत आपल्या आयुष्यामध्ये धर्माची प्रतिष्ठापना करणे आणि समाजातील भक्ती किंवा सात्विकता वाढवणे असे कार्य करीत असतात. ते लोकांना ईश्वर प्राप्तीच्या मार्गावर आणण्यासाठी मार्गदर्शन करतात. परंतु दृष्टांचे निर्दालन करणे त्यांना शक्य होत नाही. ज्ञानेश्वर माऊलींनी सुद्धा – – 

 जे खळांची व्यंकटी सांडो |

तया सत्कर्मी रती वाढो ||

– – असे म्हटले आहे. म्हणजे दुष्टांचे दुष्टत्व किंवा वाईट भावना नष्ट होवोत आणि सत्कर्म करण्याकडे त्यांची आवड वाढो.

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतम् |

धर्मसंस्थापनार्थामि युगे युगे || 

– – हे भगवंताने आपल्या भक्तांना गीतेत दिलेले वचन आहे. जे लोक परमेश्वराची भक्ती करीत नाहीत अशा लोकांना सुद्धा तो कधी शासन करत नाही. तो तर अजातशत्रू आहे. पण पण जर कोणी त्याच्या भक्ताला त्रास देत असेल तर ते मात्र तो सहन करू शकत नाही आणि त्याच्या रक्षणासाठी धावून येतो. परमेश्वर आपल्या भक्तांच्या रक्षणासाठी तो अवतार घेतो.

जेव्हा पृथ्वीवर अनाचार माजला होता आणि राक्षसांनी सदाचारी लोकांना आणि भगवंताची भक्ती करणाऱ्या लोकांना त्रास देणे सुरू केले, तेव्हा देवीने देखील अनेक अवतार घेऊन राक्षसांचा नाश केला. श्रीराम आणि श्रीकृष्णांनी देखील अशा अनेक दुराचारी लोकांचा नाश केला.

परमेश्वर आपल्या भक्ताचे रक्षण कसे करतो यासाठी समर्थ एक उदाहरण देतात. ते म्हणतात, ” आपल्या भक्तांच्या रक्षणासाठी म्हणजेच त्यांच्या उद्धारासाठी, मोक्षासाठी श्रीरामांनी अयोध्यानगरीतील नागरिकांना आपल्या सोबत विमानात बसवून नेले होते. श्रीकृष्णांनी देखील शत्रूपासून रक्षण करण्यासाठी आपल्या नगरीतील लोकांना नवीन द्वारकापूरीत नेले होते. असा हा भगवंत भक्तवत्सल आणि सज्जनांचे रक्षण करणारा आहे. एकदा का आपण त्याचे भक्त झालो की आपली सगळी काळजी तोच वाहतो आणि सर्व प्रकारच्या दुःखांमध्ये तोच आपला आधार होतो. आपले रक्षण करतो.

समर्थ म्हणतात भक्तांचे रक्षण करणे हे त्याचे ब्रीदच (कर्तव्य)आहे. आणि भक्तांचे रक्षण करण्याबद्दलचा त्याचा महिमा पदोपदी म्हणजे सर्वत्र गाजतो आहे. राम अत्यंत उदार आहे. आपले भक्त त्याला प्रिय आहेत. त्यांच्यात तो भेदभाव करत नाही. हा माझा तो तुझा असे त्याच्याजवळ नसते. तो कोणाचीच उपेक्षा करत नाही. आपल्या भक्तांना तो मोक्ष मार्गावर नेण्यासाठी सहाय्य करतो. तेव्हा आपल्या रक्षणासाठी आणि उद्धारासाठी अशा रामाला शरण जावे हेच खरे !

स्वसंवाद :: 

१) मी परमेश्वराची खरोखरच मनापासून भक्ती करतो का ?

२) संकटसमयी मला ‘तो माझ्या पाठीशी आहे’ ही भावना कितपत बळ देते? 

३) मी सज्जनांच्या बाजूने उभा राहतो का, की परिस्थितीनुसार भूमिका बदलतो? 

४ “भगवंत भक्तांची उपेक्षा करत नाही” या विचारावर माझा किती दृढ विश्वास आहे ? 

– – – 

श्लोक क्र. ३० – – – 

समर्थाचिया सेवका वक्र पाहे |

असा सर्व भूमंडळी कोण आहे

जयाची लीला वर्णिती लोक तिन्ही

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी |३०|

अर्थ :  एकदा का आपण भगवंताचे सेवक झालो की आपल्याकडे वक्रदृष्टीने पाहण्याची कोणाचीही हिंमत नाही, (अगदी कळीकाळाची देखील नाही.) अशा या समर्थाची म्हणजेच भगवंताची स्तुती तिन्ही लोक म्हणजे स्वर्ग, पृथ्वी आणि पाताळ करीत असतात. असा हा भगवंत आपल्या भक्तांची कधीच उपेक्षा करीत नाही.

विवेचन“नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी”या श्लोकांच्या मालिकेतील हा अतिशय सुंदर श्लोक आहे. या ठिकाणी समर्थ आपल्याला भगवंत आपल्या भक्ताची किती काळजी घेतात हे पुन्हा आपल्या मनावर ठसवतात. मात्र त्यासाठी समर्थाचा म्हणजे भगवंताचा सेवक आपण झाले पाहिजे.

सेवक म्हणजे नोकर असे समजायचे का ? या दोन शब्दातील अर्थांमध्ये फरक आहे. सेवक म्हणजे अशी व्यक्ती की जी निरपेक्ष भावाने सेवा करते आणि नोकर म्हणजे जो पगाराच्या अपेक्षेने काम करतो. भगवंताची अशी निरपेक्ष भावाने सेवा करणारा सेवक आपल्याला व्हायचे आहे. ही अपेक्षा या ठिकाणी आहे. यासाठी आपण श्रीरामांचा निस्सीम भक्त हनुमान याचे उदाहरण डोळ्यापुढे ठेवूया.

हनुमंत रामाचा सेवक आहे. कुठल्याही अपेक्षेशिवाय तो त्याच्या सेवेसाठी तत्पर आहे. आपल्या धन्यावर म्हणजे मालकावर ज्याची प्रचंड निष्ठा आहे. असा सेवक म्हणजे हनुमंतराय !मग साहजिकच अशा सेवकावर मालकाचे देखील प्रेम असणारच ! 

सीतेच्या शोधात महत्त्वाची भूमिका बजावल्यानंतर श्रीराम हनुमंताला विचारतात की बोल तुझी काय इच्छा आहे ? तेव्हा हनुमंत फक्त त्याची भक्ती मागतात. श्रीराम त्याला उराशी धरतात. आपला लहान बंधू म्हणून आलिंगन देतात केवढे हे प्रेम ! मारुतीरायांची केवढी ही निरपेक्ष सेवा !

समर्थांचा (भगवंताचा) जो भक्त असतो तो देखील त्यांच्या कृपेने समर्थच होतो. त्यामुळे त्याच्याकडे वाकड्या नजरेने पाहण्याची कोणाचीही हिंमत नसते. त्याच्यावर संकटे येत नाहीत असे नाही. पण जीवनातील दुःखांना, संकटांना तो धैर्याने सामोरा जातो. हा देह माझा नाहीच. तो भगवंताचा आहे अशी त्याची धारणा झालेली असते. त्याच्या सेवेसाठीच त्याचा उपयोग तो करत असतो. म्हणून देहाला दुःख झाले तरी तो विचलित होत नाही. देहे दुःख ते सुख मानित जावे… अशी त्याची वृत्ती होते.

सेवक व्हावे तर अशा व्यक्तीचे व्हावे जो आपली कधीही उपेक्षा करीत नाही. व्यवहारात चाकरी भलेही कोणाची करा. परंतु सेवक मात्र त्या भगवंताचे व्हा. कसा आहे हा भगवंत ? ज्याचा सेवक आपल्याला व्हायचे आहे ? हा भगवंत असा आहे की त्याच्या सामर्थ्याचे, पराक्रमाचे वर्णन तिन्ही लोक करतात. स्वर्ग, पृथ्वी आणि पाताळ. या तिन्ही लोकांत त्याच्या पराक्रमाचा डंका वाजतो आणि सगळेच त्याचे गुणगान गातात.

एकदा का आपण त्याचे सेवक झालो की तो आपली कधीही उपेक्षा करत नाही. सेवक म्हणजे भगवंताचा भक्त ! खरा भक्त भगवंताकडून काही हवे म्हणून भक्ती करीत नाही. तर मला भगवंत हवा आहे, त्याच्याशिवाय दुसरे काही नको अशा समर्पण भावनेने त्याची भक्ती असते. भगवंतापासून जो विभक्त नाही तो भक्त ! असा सेवक, असा भक्त जो असतो, त्याची सुखदुःखे, काळजी, चिंता आपोआप कमी होत जातात. म्हणजे त्याला त्याची पर्वा नसते. भगवंत त्याची काळजी वाहतो. भगवंताच्या नामात तो रंगून गेलेला असतो. अशा या भगवंताकडे भक्ताकडे भगवंत देखील लक्ष ठेवून असतो. तो त्याची उपेक्षा करीत नाही. त्याला मोक्षमार्गाकडे घेऊन जातो. भगवंत आपल्याला सांभाळतो अशी ज्याची खात्री असते तो निर्भयपणे जीवन जगू शकतो. लोकांनी स्तुती केली किंवा निंदा केली तरी त्याला काही फरक पडत नाही. काम, क्रोध, लोभ, मोह यासारख्या विकारांपासून असा भक्त कोसो दूर असतो. आपल्या कर्तव्यात रत असताना त्याची आठवण ठेवावी. कर्तेपण आपल्याकडे न घेता राम कर्ता आहे, तोच हे करून घेतो आहे ही भावना ठेवावी.

स्वसंवाद :: 

१) मी भगवंताचा “सेवक” आहे की केवळ “अपेक्षा करणारा भक्त”? 

२) माझ्या भक्तीत निरपेक्षता आहे का, की काहीतरी मिळवण्याची अपेक्षा आहे? 

३) मी माझ्या चिंता खरोखरच परमेश्वरावर सोपवतो का, की फक्त शब्दांत बोलतो? 

– क्रमशः श्लोक २९ आणि ३०. 

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सर…

-कहो। क्या बात है?

-सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।

-कोई जरूरत नहीं इसकी।

-फिर बिल पास नहीं होगा, सर !

-न हो। बोलो जो आब्जेक्शन‌ लगाना हो लगा दो !

वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर‌ चला गया ! कुछ पल बाद वापस आया।

-सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो !

-बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं !

वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया !

अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।

-क्यों?

-क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा ! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?

वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया !

वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका !

-हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं ! बोलो चाय मंगवा लूं?

राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!

-फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।

उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४९ – कविता – राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४९ ☆

☆ कविता ☆ ~ राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सीता  का  संताप  बड़ा  था,  बीता  जीवन  संघर्षो  में ।

राघव  का  दुःख  भी कम न था,  आया सुख के वर्षो में।।

*

पर अग्नि में तप कर कैसे से, सोना निज चमक दिखाता है।

सीता  का  तप  तपकर मानो, राघव को विजय दिलाता है।।

*

सीता  शब्द  राम  दोनों  मिल,  महामन्त्र  बन   जाते  है।

ध्वजा शिखर की आज  कह  रही,  राम अवध में  आतें  हैं।।

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सीताराम  शब्द  दोनों  मिल  मानवता  का  मान  बढ़ते हैं।

जीवन   जीने   के   कौशल   को  कौशलेंद्र  बतलाते  हैं।।

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कैसे   रिश्ते   जिए   जाते   किससे   कैसा   नाता  हो।

वह  भी  जीवन  जी  सकता है, जिसको कुछ न आता हो ।।

*

आदर्शो  को   मानदंड   पर   कैसे    नापा   जाता   है।

राम  तुला  हैं  मानवता  के,  रिश्तों  को तौला  जाता  है।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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