हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पाताल कोट – भाग – ५० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पाताल कोट – भाग- ५० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

गढ़चिरोली की वापसी यात्रा गोंदिया, बालाघाट, सिवनी और छिन्दवाड़ा के रास्ते से सम्पन्न की। यह इलाक़ा सतपुड़ा की दक्षिणी तलहटी और ऊपरी पठार पर आबाद गोंड देवगढ़ साम्राज्य द्वारा शासित रहा है जिसके प्रमाण स्वरुप गढ़ी प्राचीरों के खंडहर अकसर दिखते हैं। पातालकोट पिपरिया से पंचमढ़ी जाते हुए मटकुली से छिन्दवाड़ा जाने वाले मार्ग पर जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से 78 किमी पहले सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र  तल से जमीन के 1700 फीट नीचे बसा है। यह सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र तल से 2750-3250 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान 79 वर्ग किमी में फैला हुआ है। पातालकोट आदिवासियों की एक अलग दुनिया वाले 12 गांवों का समूह।

अपनी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक स्थिति से इसकी वैश्विक नक्शे में अलग पहचान है तो वहीं दिन में भी रात का एहसास कराने वाला यह क्षेत्र जग प्रसिद्ध है। पिपरिया और परासिया के बीच स्थित तामिया से पतालकोट जाया जाता है। तामिया तुलतुला पर्वत श्रेणियों के बीच आकर्षक प्राकृतिक छटा के साथ स्थित है। इसके चारों तरफ ऊंची पर्वत श्रेणियां तथा घने जंगल अद्भुत शान्ति का आभास कराते हैं। यहां डाक बंगले पर पहुंच कर चारों तरफ विहंगम दृश्य नज़र आता है, तो इसका आकार एक घोड़े की नाल जैसा नजर आता है। ऐसी जनश्रुति है कि यह पाताल लोक जाने का दरवाजा है। एक समय यहां के आदिवासी बाहरी दुनिया से दूर थे, लेकिन अब सरकारी प्रयासों से वे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं।

प्राकृतिक दृश्यावली के कारण यह बहुत मनमोहक है। पाताल से अर्थ इसका एक गहराई में बसा होना है। इसके मुहाने पर ब्रिटिश युग का बना हुआ सर्किट हाउस है, उससे जुड़ी अनेकों भूत-प्रेत कहानियाँ क्षेत्र में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस जनजाति के लोग इस स्थान पर पिछले 5000 वर्षों से निवास कर रहे है। यह स्थान प्राकृतिक रूप से एक गहरी गर्त का किला-सा बन गया है। इसकी तलहटी से आसपास की पर्वत श्रेणियां करीब 1200 फीट ऊंची हैं। इसके पाास से ही दूधी नदी नर्मदा में मिलने निकलती है। वर्तमान में नीचे जाने के मार्ग बना दिए गए हैं। इसके पूर्व यहां लोग लताओं, बेलाओं तथा पेड़ पौधों को पकड़ कर नीचे और ऊपर आया जाया करते थे। यह स्थान अपनी अमूल्य जड़ी-बूटियों के लिए विख्यात है। यहां रहने वाले आदिवासी इन्ही जड़ी बूटियों से अपने कष्टों का निवारण करते हैं। वर्तमान में शासन द्वारा भी इन्हे चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। पातालकोट की सबसे खास बात यह है कि जमीन से नीचे होने और सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरा होने से इसके काफी हिस्से में सूरज की रोशनी देर से पहुंचती है, वह भी इतनी कम कि दिन में भी रात नजर आती है। बारिश के समय बादल इस घाटी में ऐसे दिखाई देते हैं जैसे तैर रहे हो। यदि कोई व्यक्ति यहां पहुंच जाए तो उसे लगेगा कि वह धरती के भीतर बसी अलग दुनिया में आ गया है।

पातालकोट की आदिवासी जीवन शैली से पुरातन युग का एहसास होता है। भारिया और गोंड परिवार रहन-सहन, खान-पान, दवा-दारू के लिए काफी हद तक जंगल के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। समाज की मुख्य धारा में शामिल होने के बावजूद उनका भोजन मक्का, बाजरा, कोदो-कुटकी है। जड़ी-बूटियां होने से ये तुरंत अपनी बीमारी का इलाज कर लेते हैं। अब इन जड़ी-बूटियों को देश-विदेश में भी पहचान मिलने लगी है। पहनावा भी पहले की अपेक्षा आधुनिक युग जैसा हो गया है। पातालकोट के गांव कुछ दशक पहले तक रहस्य समेटे हुए थे। वर्ष 2007 में यहां पहला आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया। प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित पातालकोट विकास प्राधिकरण के माध्यम से यहां स्कूली शिक्षा, आईसीडीएस, प्राथमिक स्वास्थ्य जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई गई है। पातालकोट के ऊपरी गांव रातेड़ में वर्ष 2009 में तत्कालीन कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने रोमांचकारी आदिवासी खेल उत्सव की शुरुआत की थी और पर्यटकों को यहां पर्यटन के लिए आकर्षित किया था। तब से ये उत्सव हर साल नवम्बर से जनवरी के बीच हो रहे हैं। इससे पर्यटन नक्शे में पातालकोट को महत्व मिलने लगा है।

पौराणिक मान्यता हैं कि इस स्थान से रावण का पुत्र मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना करने पाताललोक गया था। यह इलाका जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। पातालकोट के 12 गांव गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोडिय़ा, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी है, जहां एक समय जाना मुश्किल था। अब इसे पक्की सड़क से जोड़ दिया गया है। यहां की आबादी भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय की हैं, जो अभी भी काफी हद तक प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर आश्रित हैं। दृष्टि डालने से प्राकृतिक सौन्दर्य आपको अभिभूत कर देता है। इसके उत्तर दिशा में कुछ दूरी पर एक संकरे मार्ग से नीचे उतरने पर पर्वतीय गुफा में एक शिवलिंग स्थित है। इसके पास झरने के रूप में नीचे गिरने वाला पानी एक जल प्रपात सा प्रतीत होता है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४७ – कविता – मन की बात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मन की बात…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४७ ?

? कविता – मन की बात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

जन गण के लिए मन की बात  इक सौगात है

जन-जन की हुकूमत से होती सीधी बात है

=2=

नायक सभी चौकन्ने हैं,जन-हित के वास्ते

प्रतिनिधि लोक-सेवक,जनता के साथ है

=3=

खुशबू से महक उठा लोकतंत्र का चमन

विकास के आँगन में खिला पारिजात है

=4=

सरकारी योजनाओं से हर  रास्ते रोशन

कौन कह रहा है अब अंधेरी रात है

=5=

सड़कों का जाल बिछ चुका,अब गाँव-गाँव में

देहात ने मिलाया शहरों से हाथ है

=6=

भेदभाव के समस्त क्लेश मिट गये

इंसान हैं सभी,कहाँ अब जात-पाँत है ?

=7=

रहता डरा-डरा अब,ना-पाक पड़ोसी

हिन्द की सेना बनी,अब वज्रपात है

=8=

दुरुस्त-चुस्त शासन,मुस्तैद प्रशासन

विकसित भारत से तय,मुलाक़ात है

=9=

अच्छे दिनों का दौर अब,आया है दोस्तो

विकास की यही तो नई शुरुआत है

=10=

‘राजेश’ विश्व गुरु है,ये देश हमारा

बलाओं-संकटों से सबको,अब निज़ात है

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २२१ ☆ गीत – ।। जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २२१ ☆

☆ गीत ।। जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।

सोच बदलते ही किस्मत का सितारा ही बदल जाएगा।।

**

जैसी होती है हमारी दृष्टि वैसा ही हम देख भी पाते हैं।

जो रंग आंखों में समाया वही ही हर जगह हम पाते हैं।।

बदला दृष्टिकोण जीवन नैया का किनारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

**

यदि विचार और सोच उलटी तो देखते भी गलत हैं।

अहंकार राग-द्वेष से तो आदमी का तन-मन जलत है।।

लेकिन सहयोग सरोकार से हर सहारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

**

बिना स्नेह-प्रेम के हमारे हर रिश्ते की हार हो जाती है।

बिन मधुरता के हर एक  बोली भी बेकार हो जाती है।।

बिन धन -दौलत के भी आपका गुजारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १९ – पर्यावरण दिवस!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण दिवस!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १९ ☆

☆ पर्यावरण दिवस!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

वृक्ष काटते जाते मानव, होगा क्या परिणाम रे ।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी,जब आएगी घाम रे ।।

खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे ।

जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे ।।

*

निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे ।

धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे ।।

रौद्र रूप जब धारे माता,  होगा क्या परिणाम रे ।

हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बना अभिराम रे ।।

 *

पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।

वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।

दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।

भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३४० ☆ अनदेखे फलित सपने… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनदेखे फलित सपने। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मन को मंदिर बनाना / स्वर- अर्चना पांड्या, सौजन्य – स्वरांजलि चैनल – अर्चना पांड्या)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३४० ☆

☆ अनदेखे फलित सपने… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘कुछ लोग उन चीज़ों को देखते हैं; जिनका अस्तित्व है और पूछते हैं कि वे ऐसी क्यों हैं? मैं उन चीज़ों के स्वप्न देखता हूं; जो कभी नहीं थीं और कहता हूं–वे क्यों नहीं हो सकतीं?’ जार्ज बर्नार्ड शॉ का यह कथन उनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचायक है कि संसार में जिन वस्तुओं का अस्तित्व है; उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करना सामान्य सी बात है। वास्तव में जिनका अस्तित्व नहीं है,जो कल्पना व स्वप्न हैं; जिनका अस्तित्व कभी नहीं था; उनके बारे में भी अपनी धारणा बनानी चाहिए कि वे क्यों नहीं हो सकतीं? ऐसी कल्पना विलक्षण प्रतिभा का धनी व्यक्ति ही कर सकता है। इस कथन को सार्थक करती हैं दुष्यंत की पंक्तियां– ‘कौन कहता है/ आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ संसार में असंभव कुछ भी नहीं है। जो नहीं है,उसके बारे में चिंतन व शोध करना और उसे सबके के समक्ष प्रकट कर देना ही चमत्कार है। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण व एडिसन का बल्ब की खोज व अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उन वस्तुओं के अस्तित्व व रूपाकार को स्पष्ट करना किसी अजूबे से कम नहीं है। ऐसे कार्य प्रभु-प्रदत्त प्रतिभा,दृढ़ निश्चय व अथक परिश्रम द्वारा संभव हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक योगदान रहता है आत्मविश्वास का; जो हमें निरंतर कर्म करने की प्रेरणा देता है तथा बीच राह से लौटने नहीं देता; न ही थककर निराशा का दामन थामने देता है।

सपने में होते हैं, शजो हम खुली आंखों से देखते हैं,क्योंकि वे हमें सोने नहीं देते और बंद आंखों से देखे गए सपनों का कोई अस्तित्व नहीं होता। अब्दुल कलाम की यह सोच मानव मन को ऊर्जस्वित करती है और वह इंसान तब तक चैन से नहीं बैठता; जब तक उसके सपने साकार नहीं हो जाते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि ‘मनुष्य युद्ध में सहस्त्रों पर विजय प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब वह  स्वयं पर विजय पा लेता है; सबसे बड़ा विजयी होता है,क्योंकि उसे आत्मावलोकन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जीवन में कठिनाईयाँ तो हमसाये की भांति हमारे अंग-संग रहती हैं। यदि हम उन्हें कष्टकारी मानते रहेंगे,तो वे हमें असीम पीड़ा व दु:ख पहुंचाएंगी। यदि हम उन्हें परछाई के रूप में स्वीकार लेंगे तो वे हमारा पथ- प्रशस्त करेंगी और हम आत्मविश्वास के बल पर दाना मांझी की भांति पर्वत काटकर बीस किलोमीटर लंबी सड़क अकेले ही बना पाने का साहस जुटा पाएंगे। वास्तव में चुनौतियां हमें प्रेरणा देती हैं और जब हम उन्हें जीवन का हिस्सा स्वीकार लेते हैं; वे हमारी पथ-प्रदर्शक बन निरंतर कार्य-रत रहने को प्रेरित करती हैं। सो! उनसे मुक्ति पाने का उपाय,उनकी  सहज-स्वीकार्यता ही है।

बाबा आमटे बचपन में मन के अनुकूल न होने पर नाराज़ हो जाते थे,जो उनकी माता को बहुत अखरता था। एक बार वे पतझड़ के मौसम में उन्हें बगीचे में ले गयीं और दिखाया कि वृक्ष अपने पत्तों का त्याग कर रहे हैं और उनके स्थान पर नए पत्ते आकार ग्रहण कर रहे हैं। सो! मानव को भी सुखद जीवन जीने के लिए मन के दुराग्रह व धारणाओं का त्याग करके संबंधों को नवीन ढंग से सींचना चाहिए और अपने अप्रिय अनुभवों को पुराने पत्तों की भांति त्याग देना चाहिए। आमटे पर उक्त सीख का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे तुरंत अपने नाराज़ मित्र से मिलने पहुंच गए। वास्तव में यही जीवन है; सृष्टि का क्रम है। जीवन-मृत्यु का सिलसिला तो निरंतर चलता रहता है। संतोषानंद जी की यह पंक्तियां ‘जीवन का मतलब तो आना और जाना है/ परछाइयाँ रह जाती रह जातीं, रह जाती निशानी है।’ आज तक कोई भी इस रहस्य को नहीं जान पाया है कि इंसान कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है? धन-दौलत, महल-चौबारे व सगे-संबंधी सब यहीं धरे रह जाते हैं; केवल उसके कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है। इसलिए मानव को सत्कर्म व सबसे प्रेम-पूर्वक व्यवहार करने की सीख दी गई है।

मालवीय जी के मतानुसार ‘जो मनुष्य अपनी निंदा सुन लेता है; वह सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह सामर्थ्य केवल उसी व्यक्ति में होता है; जिसमें अहं भाव नहीं होता। टैगोर का ‘एकला चलो रे’ संदेश भी अनुकरणीय है कि ‘जो लोग बने-बनाए रास्ते पर न चलकर अपनी राह का निर्माण ख़ुद करते हैं; वे ही मील के पत्थर स्थापित करते हैं।’ टैगोर की भांति वे अपने सृजन अर्थात् कृत-कर्मों से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। जीवन के अंतकाल में जब टैगोर बीमार पड़ गए थे तो विनोबा भावे उन्हें देखने गए और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने पचपन हज़ार गीतों की रचना कर इतिहास रच दिया है तथा टेनिसन, शैले आदि गीतकारों को भी पीछे छोड़ दिया है। परंतु उन्होंने यह उत्तर दिया कि ‘वे संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि अभी वे उन गीतों का सृजन नहीं कर पाए हैं; जो वे करना चाहते थे। वास्तव में वे गीत, जो गाये नहीं गए; आज भी उनके ज़हन में हैं,अधूरे हैं।’

सृजन एक साधना है और उत्तम साहित्यकार निरंतर साधना-रत रहता है और उसके हृदय में उत्कृष्ट सृजन का भाव सदैव विद्यमान रहता है। प्रत्येक साहित्यकार एक नयी कृति के सृजन को पाठकों तक पहुंचाने के मध्य प्रसव-पीड़ा से गुज़रता है। उस स्थिति में समाज के हर व्यक्ति की पीड़ा उसकी पीड़ा बन जाती है और वह उसे आत्मसात् कर जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर लेता; चैन से नहीं बैठ सकता। उसे उन पात्रों के दर्द को जीना पड़ता है और जब तक वह अनुभूत पीड़ा उसी रूप में पाठकों के हृदय को आंदोलित नहीं करती; उसका सृजन सार्थक नहीं होता। काव्य-शास्त्र में यह विधा साधारणीकरण कहलाती है और नाटक में त्रासदी को देखते हुए जब दर्शकों के नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है और वे उस क़िरदार की मनोदशा में पहुंच जाते हैं,तो वह सृजन सफल माना जाता है; जिसे पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में विरेचन की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। सोहनलाल द्विवेदी जी की ये पंक्तियां ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती/ लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ अर्थात् जो लहरों से डरकर किनारे पर बैठे रहते हैं; उनकी नौका कभी भी पार नहीं उतर सकती। सो! मानव को निरंतर प्रयासरत चाहिए।

किंग ब्रूसली ने एक मकड़ी को अपने जाले से बार-बार गिरते व चढ़ते देख उससे प्रेरणा प्राप्त की और पुन; युद्ध करने पर उन्हें विजय प्राप्त हुई। सो! जीवन में निरंतर संघर्ष-रत रहना चाहिए; कभी पराजय को स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ वैसे भी जो हम सोचते हैं और जैसा हमारा नज़रिया होता है; वही घटित हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि नज़रें बदलने से नज़ारे बदल जाएंगे और नज़रिया बदलने से ज़िंदगी बदल जाएगी; जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा। अंत में स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से मैं यह कहना चाहूंगी कि ‘मौसम भी बदलते हैं/ दिन रात बदलते हैं/ यह समां बदलता है/ जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं/ दिल को सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं,परंतु सृष्टि का क्रम अनवरत चलता रहता है। इसलिए ‘दु:खों से मत घबरा मानव/ यह समां भी गुज़र जाएगा।’ रात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर नयी आशा व नवीन स्वप्न लेकर दस्तक देती है और हमें ऊर्जस्वित करती है। इसलिए आशा का दामन थाम रखिए; जीवन में अप्रत्याशित करिश्में हो जाएंगे; जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

?‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव  ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’

विधा – शोध कार्य

मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे

संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव

प्रकाशक – क्षितिज प्रकाशन, पुणे

पृष्ठ संख्या – 308

मूल्य – रु. 500/-

? अपने-अपने पर सबके राम ☆ श्री संजय भारद्वाज ?

श्रीराम, भारतीय संस्कृति के शलाका पुरुष हैं। रामकथा कल-कल प्रवाहित होती धारा है। प्रवाह, धारा का प्राण है। श्रीराम का जीवनचरित अपने आप में कविता है। जिसने भी इस चरित को लिखा, उसकी लेखनी से कविता स्वयं प्रवाहित होने लगी। इस प्रवाह का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने शब्दों में कुछ यूँ वर्णन किया है,

राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,

कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।

इस सहज संभाव्यता ने महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य स्वयंभू और विभिन्न भाषाओं में अनेकानेक मूर्धन्य कवियों से रामकथा लिखवाई। यह सिलसिला अब तक चल रहा है।

प्रस्तुत पुस्तक ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे का महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध है। जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है, यह ग्रंथ जैन आचार्य स्वयंभू रचित ‘पउमचरिउ’और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का तुलनात्मक अध्ययन है।

वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि कृत ‘रामायण’, रामकथा का आदिग्रंथ है। भारत में विभिन्न भाषाओं में रामकथा पर आधारित लगभग 300 ग्रंथ हैैं। स्थूल रूप से ये सभी रामायण से अनुप्राणित हैं। बांग्ला में कृतिवास की ‘रामायण’, तमिल में ‘कंबन रामायण’, मराठी में संत एकनाथ की ‘भावार्थ रामायण’, गुरु गोविंद सिंह जी की ‘गोविंद रामायण’, माधव कंदली की ‘असमिया रामायण’, सारलादास की ‘उड़िया रामायण’, रंगनाथ की ‘तेलगु रामायण’, भानुभक्त की ‘नेपाली रामायण’, एषुतुच्छन की ‘मलयालम रामायण’,  कन्नड़ की ‘तोखे रामायण’, आदि कुछ नाम हैं। यही नहीं बल्कि विभिन्न अंचलों के साथ-साथ विभिन्न जनजातियों में भी लिखित या श्रुत रामायण मिलती हैं।

इनमें संबंधित भाषा-भाषियों की स्थानीय संस्कृति, परिवेश, भौगोलिक स्थितियों के अनुसार छोटे-बड़े परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं।

दो ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। इनमें देश, काल, स्थिति का अंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गोस्वामी जी के ‘रामचरितमानस’ की गणना विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्यों में होती है। यह महाकाव्य भारतीय लोक के लिए आदर्श आचार-संहिता है। आचार्य स्वयंभू का ‘पउमचरिउ’ जैन दर्शन को केंद्र में रखकर रचा गया है। इसके चलते इस ग्रंथ में वाल्मीकि कृत मूल रामकथा में कई बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं।

संभवत: ‘पउमचरिउ’ एकमात्र अपवाद है जिसमें रावण का वध श्रीराम के हाथों ना होकर लक्ष्मण के हाथों कराया गया है। प्रचलित रामकथा के कुछ पात्रों के नाम में परिवर्तन भी इसमें देखने को मिलते हैं। हनुमान जी के ब्रह्मचारी रूप की मान्यता के विपरीत उन्हें आठ सहस्त्र पत्नियों के पति के रूप में प्रस्तुत करना, शूर्पणखा को खर-दूषण की पत्नी बताना एवं अन्य अनेक परिवर्तन हैं। इसमें श्रीराम एवं रावण का धार्मिक, सांस्कृतिक परिवेश समान बताया गया है। रावण का चरित्र चित्रण श्रीराम की अपेक्षा विस्तृत है। ‘पउमचरिउ’ के रावण का खलनायकत्व भी उसके प्रति सहानुभूति जगाने में सहायक है।

राम, भारतीय आस्था का चैतन्य स्वरूप हैं। हमारे लोकजीवन के कण-कण और क्षण-क्षण में राम हैं। यही कारण है कि बच्चे के जन्म पर रामलला की बधाइयाँ गाई जाती हैं। संबोधन के लिए हम जीवन भर ‘राम-राम’ कहते हैं। अंतिम सत्य के रूप में काया से चेतन तत्व जब प्रस्थान कर जाता है तो ‘राम नाम सत्य है’ को स्मरण किया जाता है।  रामकथा, भारतीय लोकमानस में पैठी हुई है। पारंपरिक रामकथा में परिवर्तन की स्वीकार्यता भी श्रीराम के व्यक्तित्व में अंतर्निहित उदारता का ही प्रतीक है।

गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के देवत्व को रेखांकित किया। जबकि आचार्य स्वयंभू ने उनके मनुष्यत्व को लेखनीबद्ध किया। महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्यत्व हो या देवत्व, अंतर्निहित तो रामत्व ही है।

वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि, देवर्षि नारद से पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ पुरुष के बारे में अनेक प्रश्न करते हैं। देवर्षि हर एक का उत्तर देते हुए श्रीराम का नाम गिनाते हैं। इसी क्रम में देवर्षि का यह कथन महत्वपूर्ण है-

सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्र इव सिन्धुभि:।

आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:॥

जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सदा राम से साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सब में समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है।

प्रियदर्शन श्रीराम की कथा को भाषा की दृष्टि से देखें तो रामचरितमानस अवधी में रचा गया है जबकि पउमचरिउ की भाषा अपभ्रंश है। ऐसे में शोधकर्ता के लिए तुलनात्मक अध्ययन जटिल और अनेक प्रश्नों को हल कर आगे बढ़ने की प्रक्रिया हो जाता है। शोधकर्ता डॉ. साठे ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक सूक्ष्म से सूक्ष्म बिंदु का विस्तृत अध्ययन कर तटस्थ भाव से शोध करने का प्रयास किया है। यह श्लाघनीय है।

यह शोध साठ वर्ष पूर्व किया गया था। शोधकर्ता अब दिवंगत हो चुके हैं। देह की नश्वरता के संबंध में गोस्वामी जी रामचरितमानस में लिखते है,

बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥

अर्थात मनुष्य की देह सौभाग्य से प्राप्त होती है। विभिन्न ग्रंथ कहते हैं कि देवताओं के लिए भी इसकी प्राप्ति सहज नहीं होती। मनुष्य योनि, साधन योनि है। यह मोक्ष प्राप्ति का द्वार है। अतः देह नष्ट होने से पहले इसका सदुपयोग कर अपना परलोक सुधार लेना चाहिए।

आचार्य स्वयंभू ने इस विषय को पउमचरिउ में यूँ व्यक्त किया है,

जं देहु तं णासधम्मु।

णिच्चु ण होइ कइ वि कम्मु॥

जिसे देह कहते हैं, उसका मूल स्वभाव नश्वरता है। स्वाभाविक है कि कोई भी देह जगत में सदा बनी नहीं रह सकती।

छह दशक बाद इस शोध का प्रकाशित होना इस बात की पुष्टि करता है कि देह अनिवार्य रूप से नश्वर है पर विचार और चिंतन ईश्वर हैं। ईश्वर अर्थात समय की सीमा के परे शाश्वत अस्तित्व। अक्षर-अक्षर जोड़कर रचा जाता है साहित्य। यूँ ही ‘अक्षर’ नामकरण नहीं हुआ। जिसका क्षरण नहीं होता वही अक्षर है।

यही कारण है कि संपादक द्वय डॉ. मृणालिनी शहा और डॉ. लतिका जाधव को साठ वर्ष का अंतर प्रभावित नहीं कर पाया और उन्होंने शोध प्रबंध को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया। ज्ञान के नित्य भाव का यह प्रमाण है।

इस प्रबंध के प्रकाशन की व्यावहारिक कठिनाइयाँ रही होंगी। तत्कालीन भाषा, तब की टाइपिंग, अक्षर विन्यास, वर्तनी और व्याकरण में समय-समय पर हुए परिवर्तन इन सब पर संपादक द्वय ने परिश्रम किया है। जिन बातों को ज्यों का त्यों रखने की अपरिहार्यता रही होगी, उन्हें वैसे ही रहने दिया गया है।

स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे द्वारा किया यह महत्वपूर्ण काम है। वस्तुत: किसी भी शोध प्रबंध को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करते हुए अनेक बिंदु विधागत परिवर्तन की मांग करते हैं। शोधप्रबंध के प्रारूप में हर बिंदु के साथ आवश्यक लगने वाले संदर्भ, पुस्तक रूप में उतने प्रयोजनीय प्रतीत नहीं होते। इन सब पर काम करके शोधप्रबंध को शोधकर्ताओं और सामान्य पाठक के हाथ में एक सुपाठ्य पुस्तक के रूप में लाने का बीड़ा दोनों संपादकों ने पूरे सामर्थ्य से उठाया है।

दोनों संपादकों को हार्दिक बधाई। आशा है कि यह पुस्तक हर जिज्ञासु के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। शुभं भवतु।

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३४० ☆ भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३४०– साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

मिले बुजुर्गों का हमें, छतरी रूपी हाथ।

हरदम ऐसी कामना, रहें हमेशा साथ।।

* 

श्राद्ध पक्ष में हम करें, करें  पिंड का दान।

पितरों का तर्पण करें, करते वो कल्याण।।

 *

करकशता है काग की, बनी यही पहचान।

फिर भी मिलता है उसे, श्राद्धपक्ष सम्मान।।

 *

गौ का  ग्रास निकालते, काग श्वान का भाग।

आस लगाए बैठते, गौ माता अरु काग।।

 *

श्रद्धा प्रादुर्भाव से, श्राद्ध पक्ष में आज।

पुरखों के आशीष से, बनते बिगड़े काज।।।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३२१ ☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  – संतोष के दोहे – पितृ पक्ष…। आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२१ ☆

☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

पितरों को सादर नमन, वंदन शत शत बार

सदा आप ही हमारे, जीवन का आधार

*

तुम बिन सूना सा लगे, यह अपना घर द्वार

कोई देता है कहाँ, तुम सा लाड़ प्यार

तर्पण पितरों का करें, सदा प्रेम से आप

श्रद्धा से ही श्राद्ध है, हरती भव के ताप

जिनके पुण्य प्रताप से, जीवन में उल्लास

उनके ही आशीष से, रिद्धि सिद्धि का वास

पुण्य कर्म से सुधरता, अपना ही परलोक

करनी ऐसी कर चलो, घर में हो आलोक

आना जाना है लगा,यह जीवन का सार

अपने कर्मों से मिले,जीवन में सत्कार

पितृ भक्ति से सदा ही,जीवन सफल महान

पित्र चरण की धूल को,पूजे सकल जहान

ईश्वर के अस्तित्व का,हो जिनसे अहसास

धन्य धन्य वो लोग हैं, रहें पिता के पास

पितरों के आशीष से,जीवन में “संतोष”

सांची सेवा से बढ़े, सुखद शांति का कोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११३ – गीत – टेढ़ी चाल… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – टेढ़ी चाल…।

? रचना संसार # ११३ ?

☆ गीत – टेढ़ी चाल…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

जब पसीना श्रम बहा है,

लक्ष्य रक्षित कर दिया।

काल की हर ठोकरों ने,

खूब शिक्षित कर दिया।।

**

विधि लिखा माथे हमारे,

सूद साहूकार का।

थी लगोटीं तन अकेली,

मोह बस सरकार का।।

*

टीस सावन दे गया था,

तन असिंचित कर दिया।

**

भ्रष्ट नेता चाल टेढ़ी,

नित्य कर लगते नए।

आग लगती है घरों में,

सब कुएँ भी ढह गए।।

*

आँख पर पट्टी बँधीं है,

रक्त रंजित कर दिया।।

**

देख आशाएँ भटकती,

मात्र गक्कड़ हाथ है।

प्याज के लाले पड़े हैं,

बस गरीबी साथ है।।

*

खाट टूटी भाग्य फूटे,

गात खंडित कर दिया।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४१ – कविता – प्रत्याशा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रत्याशा…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४१ ☆

? कविता – प्रत्याशा… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

चाहे हों बोझिल नींद से पलकें,

सपनों को तुम ना सोने देना…

*

लंबी दूरी तय करना है,

कदमों को ना थकने देना…

*

श्रम को अपना हथियार बना लो,

सफलता… सन्मुख शीश नवाने देना…

*

कल उसको पुनः उदय होना है,

तो सूरज को ढल जाने देना…

*

नयी है आभा, नई बहारें,

राह के कांटे, बिसरा देना…

*

चाहे तूफानों से हो जाए सामना,

 डोर आशा की थामें रहना…

*

विपरीत हो जाए सब राहें,

दीपक लगन का, जलाए रखना…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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