हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६३ ☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ।)

☆ शेष कुशल # ६३ ☆

☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? – शांतिलाल जैन 

आईपीएल खत्म हो गया है सो ठिया आबाद करके शाम का खालीपन भरने की कोशिश में यार-दोस्त यहाँ जुटने लगते हैं. ठिए का ओटला अपन की तशरीफ़ का रोज़ाना इंतज़ार करता है. मैं जाता हूँ. मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान फील करता हूँ.  कल तक अपन की मेधा रनों के चेज़, विकेटों के पतन, ओरेंज, पर्पल केपों, टूटते-बनते रिकार्डों जैसी जानकारियों पर सक्रिय नज़र आती थी. घर की बैठक से लेकर यार-दोस्तों के ठियों तक क्रिकेट ही टाकिंग पॉइंट हुआ करे था. आज नीट एग्जाम के पेपर लीक का मुद्दा सोच को बार-बार अपनी ओर खींच रहा है. दो महीने से चौकों-छक्कों की आतिशबाजी और विकेटों के गिरने के रोमांच में डूबी शाम का मजा सीबीएसई स्टूडेंट्स के साथ घट रही त्रासदियों के कड़वे घूँट ने किरकिरा कर रखा है. दोस्त चाहते हैं मैं इन गैर जरूरी मुद्दों को झटककर फिर से क्रिकेट के कार्निवाल में रम जाऊँ मगर नहीं हो पा रहा. बार-बार अपने नातियों का मासूम उदास चेहरा अपन के जेहन में घूम जाता है.

मैं यारों के बीच इन पर बहस उकेरना चाहता था मगर उस रोज़ ठिए पर दादू के अलावा कोई आया ही नहीं. बोले – “तुम्हारी सोच नकारात्मक हो गई है, सांतिभिया. दुश्वारियाँ आईपीएल से पहले कम थीं क्या?”

“नहीं दादू, दुश्वारियाँ तो आईपीएल के दरम्यान भी रहीं मगर निज़ाम ने हर शाम मस्ती में बिताने का फुल बंदोबस्त कर रखा था. उसने सस्ता डाटा भी मुहैया करा रखा था. नहीं करा पाया निज़ाम तो बस! आटा सस्ता नहीं करा पाया.”

दादू बोला – “हर समय महंगे आटे का रोना लेकर बैठ जाते हो तुम, सांतिभिया. आईपीएल ख़त्म हुआ तो क्या! रील एन्जॉय कीजिए. हर समय रोते मत रहिए. सीबीएसई की परीक्षा के आगे जहाँ और भी हैं. क्या हो जाएगा एक पीढी पूरी अनपढ़ भी रह ली तो!! जो पढ़े लिखे हैं वे कौनसे नैतिक काम कर रहे हैं?  पढ़ा-लिखा बिका हुआ जज, बिका हुआ अफसर, बिका हुआ चुनाव अधिकारी, बिके हुए हाकिम, मुलाज़िम, उतने ही बिके बिके से सम्पादक और पत्रकार पढ़े लिखे नहीं हैं क्या?  बिके हुए पढ़े लिखे समाज से बेहतर है एक पूरी पीढ़ी का अनपढ़ अनबिका रह जाना. करियर और रोज़गार के गम मत पालिए सांतिभिया क्रिकेट का अफगानिस्तान दौरा एन्जॉय कीजिए. महंगे पेट्रोल के गम को वैभव सूर्यवंशी के छक्कों, जोफ्रा आर्चर की यॉर्करों में भूल जाईए.”

मैंने कहा – “ऐसे कैसे हो सकता है दादू ? नाती ट्वेल्थ में नाईंटी एट परसेंट पर कॉंफिडेंट था. उसके रोल नंबर पर किसी और की कॉपी स्कैन हो गई है. दूसरावाला दो साल से नीट की तैयारी कर रहा था. कोचिंग क्लास की फीस ने पहले ही बजट घाटे में ला दिया है. आईपीएल में रन रेट के ऊपर-नीचे होने से जिंदगी हलाकान नहीं होती, घर के बजट का रन रेट गिरने से होती है. अपन के बजट का विकेट तो महीने के पहले ओवर में ही गिर जा रहा है. न पॉवर बचा है न प्ले. दो महीने तक टीवी का रिमोट जिस तरह का ‘स्ट्राइक रेट’ दिखाता था, अब वह थम गया है. उसकी जगह डॉलर के रेट ने ले ली है. सिक्स के काउंटर पर इन्क्रिजिंग नंबर देखने की लत लग गई थी, अब पेट्रोल डिस्पेंसर के घटते काउंटर ने टेंशन बढ़ा दी है. एक बात बताओ दादू मुद्दों के ये ‘बक’ कभी तो कहीं तो ‘स्टॉप’ करते होंगे?”

“ये नया निज़ाम है सांतिभिया, वज़ीर-ए-तालीम से लेकर वज़ीर-ए-आज़म तक, स्टॉप करने तो दूर बक अब किसी की टेबुल के आस पास फटकने भी नहीं पाते.  झेड-प्लस सिक्युरिटी लगी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार पाता, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? वैसे निज़ाम के कंसिडरेशन में है कि आईपीएल के टाईम स्लॉट में क्या नया लाए जाए कि जेन-जी जंतर मंतर पहुँचने की बनिस्बत स्टेडियम की दीर्घाओं में नज़र आए. वो चियर-लीडर्स के ठुमकों में गिरते सेंसेक्स को भूल जाए. अवाम को जीवन की आपाधापी से निजात दिलापाना शायद उसके वश में नहीं रहा तो क्यों न उसे रील के समंदर में स्कूबा डाइविंग का मज़ा लेने के लिए छोड़ दिया जाए. कोशिश में है निज़ाम कि साल में दो-चार आईपीएल आयोजित करवाए. जब तक स्क्रीन पर गेंद घूमती रहेगी, तब तक आप जैसे सिरफिरों का भेजा घूमेगा नहीं. वरना ये पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, स्कैम के बाउंसर आप को ज्यादा दिन सकारात्मक रहने नहीं देगे. जस्ट चिल माई डियर सांति, उबलने की जिम्मेदारी चाय पर छोड़ दीजिए. कड़क मीठी का कट एन्जॉय कीजिए और निकलिए.”

उस रोज़ ठिए पर बहस लम्बी नहीं चली.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१७ ☆ बाल कथा – समझ  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१७ ☆

?  बाल कथा – समझ ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(सच्ची घटना , राम मंदिर के वर्तमान घटना क्रम के परिदृश्य पर )

सूरज की सुनहरी किरणें मंदिर के शिखर को चूम रही थीं। वातावरण में शंख की ध्वनि और धूप-बत्ती की मंद सुगंध घुली हुई थी।

मैं  अपने सात वर्षीय बेटे अमित के साथ मंदिर गया था, जो अपनी मासूम आंखों से दुनिया  समझने की कोशिश कर रहा था । मेरे हाथ का स्पर्श थामे हुए , मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैने देखा कि वह पीछे मुड़कर कोने में भीख के लिए बैठी बूढ़ी अम्मा को देख रहा था।

दर्शन कर मैने उसके छोटे से हाथों में सौ का नोट देकर  उसे दान पेटी में डालने के लिए कहा। वह धीमे कदमों से आगे  दान पेटी के सामने झुका भी ।

फिर हम बाहर आ गए ।

बाहर निकल वह उसी बूढ़ी अम्मा के पास जा रुका । उसने अपनी जेब टटोली और वह सौ का नोट निकाल कर उस बूढ़ी अम्मा की हथेली पर रख दिया।

अम्मा की आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए और उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया।

मैं स्तब्ध खड़ा यह सब देख रहा था। और उसकी बाल बुद्धि पर मन ही मन प्रसन्न भी था ।

(अब, जब भी समाचारों में बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों के चंदे में हेराफेरी, भ्रष्टाचार या उन पेटियों के पैसों चोरी होने अथवा गलत हाथों में जाने की खबरें सुनता हूं, तो मुझे उस दिन सीढ़ियों पर बैठी उस बूढ़ी अम्मा के झुर्रीदार  चेहरे और अमित की समझ की बरबस याद आ जाती है। दान किसी बड़े ताले वाली पेटी के भीतर कैद नहीं, बल्कि उस साक्षात ईश्वर के हाथों में सौंपना अधिक उचित है जो दीन बंधु है।)

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२५ – सजल – नैन उनके झुके तो नमन हो गया… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२५ ☆

☆ सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

नैन उनके झुके तो नमन हो गया।

भावना का सहज, निर्गमन हो गया।।

*

राह में कल मिले, मुस्कराते हुए।

सामने आ गए, दिल चमन हो गया।।

*

प्रेम की राह कंटक भरी है प्रिये।

वासना में फँसे, तो पतन हो गया।।

*

द्वार में बैठकर, थी प्रतीक्षा हमें।

आँख पथरा गईं सच कथन हो गया।।

*

चाँदनी रात मिलने का वादा प्रिये।

तुम न आए मन में चुभन हो गया।।

*

देश की बात पर हम सभी एक हों।

सिर निछावर किया वह रतन हो गया।।

*

शूर होता वही जो मिटे देश पर।

वीर बलिदानियों का वतन हो गया।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

16/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ – पर्यावरण संरक्षण ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता  “पर्यावरण संरक्षण”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ ☆

🌻कविता 🌧️पर्यावरण संरक्षण 🌻

वृक्ष रहे गुणकारी जानों, देती शीतल छाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी ,लगते निर्मल गाँव।।

*

पुरवैया जो बहे सनातन, दीप जले है शाम।

राम – राम की जै जै कहते, करते अपने काम।।

बीच धार में मांझी गाता, तेरे भरोसे नाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बदले ऋतु है बदली शोभा, खिले नीम पलाश।

कोयल कूके बागों में जब, पिया मिलन की आस।।

महुआ महके डाली- डाली,बढा़ हुआ है भाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बौरें अमिया बेरी झूले, नीबू लटके डाल।

त्वचा निरोगी सुंदर काया, हरे नीम की छाल।।

पौधे जो मन को भाते हैं, बढे़ मनुज की चाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

 बाँस सागौन शीशम चंदन, कंचन सा है मोल।

वृक्ष हमारे संगी साथी, लगे बड़े अनमोल।।

घर मकान सब बनते इनसे, लगते इनमें दाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

कृष्ण कन्हैया यमुना तट पर, झूले कंदब  डाल।

सिया राम की जोड़ी सुंदर, जटा जूट से बाल।।

सजी आलता लाल महावर, बैदेही के पाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी,लगते निर्मल गाँव।।

*

तुलसी पीपल पूजे बरगद,धरे दीप घर द्वार।

कृष्णा कावेरी नित बहती, गंगा यमुना धार।।

झर – झर झरना बहते सुंदर, हरा भरा है ठाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८२ – देश-परदेश – ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८२ ☆ देश-परदेश – विश्व शरणार्थी दिवस : 20 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

करीब आठ दशक पूर्व,  अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर लकीर खींच कर देश को विभाजित कर दिया था। पारिवारिक बंटवारे होने पर घर और दुकान के बीच एक दीवार खड़े होते हुए तो बहुत बार देखा हैं। धर्म के नाम से बंटवारा होना एक अलग बात होती है।

“जिस तन लागे, सो तन जाने, कोई ना जाने पीर पराई” हमारे परिवार के बड़ों ने उस वेदना को झेला था, इसलिए आज तक गाजे बाजे उसकी चर्चा होती रहती है।

विभाजन का दर्द सबसे अधिक बंगाल, पंजाब और सिंध के लोगों ने झेला था। शरणार्थी बनकर आए अधिकतर लोग पुरुषार्थी बन गए, अल्प समय में अपनी मेहनत और लगन से समाज में ना अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस ली, वरन देश के विभिन्न भागों में बस कर आज दूसरों को भी रोज़गार दे रहें हैं।

अस्सी के दशक के बाद हमारे कश्मीरी भाइयों ने तो बिना विभाजन के अपना घर बार छोड़कर देश के दूसरे भागों में जा कर आपकी जान बचाई थी।

सत्तर के दशक में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को हमारे देश में पनाह लेनी पड़ी थी हम सब ने उनके नाम से अतिरिक्त टैक्स भरा और कई स्थानों पर तो ये बांग्लादेशी आज भी बसे हुए हैं। हमारे साधनों के उपयोग से फल फूल रहें हैं।

हमारे जैसे शरणार्थी परिवारों से लोग आज भी जब पूछते है, कि आपका गांव कौन सा है ? तब हमारी जुबां वेदना के दर्द का कड़वा घूंट पी कर रह जाती हैं। कुछ लोग तो ये भी पूछ लेते है, गाँव में खेती की कितनी जमीन है ? “सब भूमि गोपाल की” कहकर बात को टाल दिया जाता है।

हमारी आयु के लोग तो सिर्फ बातें सुनकर ही बड़े हुए हैं। धन्य थे हमारे पूर्वज जिन्होंने निजी तौर से उस दर्द से उबर कर हमारा पालन पोषण कर हमें बड़ा किया था।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३२ ☆ काळ सुखाचा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३२ ?

☆ काळ सुखाचा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

बालपणीचा काळ सुखाचा

आजोबांना असं वाटतंय

सेड्यूल माझं पाहिल्यावर

कुठं आहे मला पटतंय

झोप होतच नाही आमची

सात वाजता असते शाळा

शाळेमधल्या बाकावरती

अचानकच लागतो डोळा

 *

छडी वाजता बाकड्यावर

झोपच उडते खाडकण

कुठे आहोत आपण स्वतः

कळतच नाही काही क्षण

 *

जेवण होता थोड्या वेळात

क्लासकडे वळतात पाय

नाहीच चालत कंटाळून

तुम्हीच सांगा ना करू काय

 *

खरंच सांगा आता आजोबा

कुणाचं जीवन सुखी आहे

रिक्षामध्ये कोबलंय मला

ईश्वर तुमच्या मुखी आहे

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८९ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…१ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८८ ☆

☆ – सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 गुड़ियों से खेल रही है

भावना‘,

मिट्टी खा रही है

कामना

और

धनुष साध रहा है हर्ष’–

इन्हें क्या मालूम

कि आज

कम हो गये हैं

मेरे जीवन के कितने वर्ष।

हाय! जिन्दगी कट रही है

किराये की छत में,

क्या दे पाऊँगा विरासत में?

अखबारों की कतरनें

बासी चिट्ठियाँ

और लाटरी की निर्जीव टिकिटें

भला 

किस काम आयेंगीं?

संभावना की फसलकी

पुरानी प्रतियाँ

इन्हें क्या दे पायेंगी?

सच तो ये है-

दुहरी जिन्दगी जीने वाले

मास्टर का

जीना मरना बराबर है,

ये मँहगाई

जीवित शव पर लगा हुआ करहै।

 क्रमशः अगले अंक में

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८७ – “रोज यही दोहराती घडियाँ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत रोज यही दोहराती घडियाँ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “रोज यही दोहराती घडियाँ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटा पंखा लगवाये

उपहार नहीं लेंगे

बाहर खटिया पर सोये

बाबा सब सहलेंगे

 

“संस्कार के नाम, त्याग

क्या किया पिताजी ने

मुश्किलात अब क्या हैं

उनको यह जीवन जीने”

 

कहकर बेटा तुरत फुरत

बाहर का रुख लेकर

निकल चुका होता कहता

हम क्या क्या कर लेंगे ?

 

उधर पूज्य माता जी

बैठीं चढ़ा चढ़ा पारा

अपनी बहू पवित्रा का

कर शापित भिनसारा

 

नाती की पसलियाँ पकड़

बैठीं सूखी खांसी

रोग इसी गर्मी में क्या

सब इंतकाम लेंगे

 

छोटीबहिन बागवाले

मंदिर के कोने से

टपर टपर बतियाती

किससे कई महीने से

 

बेटा सोच नहीं पाता

इस विकट परिस्थिति में

और पिता का कहना कि-

ऐसा , तो मर लेंगे

 

एक अनौखी कथा चला

करती है इस घरकी

रोज यही दोहराती घडियाँ

टिक-टिक दिनभर की

 

और चल रहा ढर्रा इनका

स्वाभिमान ढोते

हम यों लिख सकते यह

किस्सा बस क्या  करलेंगे?

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-06-2023

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २९ – हास्य-व्यंग्य – “नायक नहीं खलनायक है तू” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  नायक नहीं खलनायक है तू

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २९

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “ट्रम्प, मेलोनी और ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

हाल ही में फ्रांस में संपन्न जी 7 शिखर सम्मेलन में इटली की लोकप्रिय, खूबसूरत प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ फोटो खिंचवाकर मुंह चलाने की बुरी आदत से लाचार अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मेलोनी को दुखी और नाराज कर दिया। ट्रंप के बयान ने मेलोनी सहित दुनियाभर की महिलाओं के स्वाभिमान पर चोट पहुंचाने का काम कर दिया कि “मेलोनी मेरे साथ फोटो खिंचवाने की भीख मांग रही थी। मैं समझता था कि ट्रंप भले ही राजनीतिक रूप से परिपक्व न हो किंतु वे राजनीति से पहले लम्बे समय तक ग्लैमर की दुनिया से जुड़े रहे हैं अतः महिलाओं की मानसिकता और प्रशंसा पसंद प्रकृति से अच्छी तरह परिचित होंगे, किंतु मेरी धारणा गलत निकली, उनकी समझ भी भारत के एक युवा नेता के जैसी ही है।

यदि वे यह कहते कि मेलोनी के साथ फोटो खिंचवाकर उन्हें गर्व की अनुभूति हुई वे जितनी अच्छी राजनीतिज्ञ हैं उतनी ही सहृदय भी हैं, यदि वे कहते कि मेलोनी जी मैं आपकी फोटो देखकर तनाव मुक्त हो जाता हूं, तो शायद मेलोनी भी खुश होकर ट्रंप की प्रशंसक बन जातीं, लेकिन ट्रंप इस मामले में भी अनाड़ी साबित हुए।

भाइयों, मुझे तो ट्रंप के बयान से मेलोनी और भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मधुर संबंधों के प्रति जलन की बू आ रही है। वे शायद मोदी जी सहित सारी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि जिसको मोदी टॉफियां देकर खुश करते हैं और मुस्कुराते हुए क्लोजअप फोटो खिंचवाते हैं वह उनके साथ फोटो खिंचवाने की भीख मांगती है, लेकिन मोदी की बात निराली है। ट्रंप क्या दुनिया का कोई भी नेता किसी भी मामले में मोदी की बराबरी नहीं कर सकता। मोदी उस देश के हैं जहां मित्रों के लिए कहा जाता है “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे ” और महिला मित्रों की प्रशंसा में कहा जाता है “चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल। ” ट्रंप और मोदी में भला क्या मुकाबला ? दुनिया जानती है कि “मोदी है तो मुमकिन है”। उधर अमेरिका के 80 वर्षीय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान को मेलोनी ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और अप्रिय बयानबाजी का युद्ध छेड़ दिया है। लोग सच ही कहते हैं कि बढ़ती उम्र कई लोगों की बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। ट्रंप मेलोनी की नजरों में भी खलनायक बन गये। “नायक नहीं खलनायक है तू, जुल्मी बड़ा दुखदायक है तू”।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता बांझ…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆

☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

वह सुकुमार सी कली

जो नाजो से थी पली

जो चिड़ियों सी चहकती थी

जो मोगरे की खुशबू सी महकती थी

जिसके पायल की आवाज से

सुबह खिलखिलाती थी

जिसके आरती के बाद

रात जवान हो जाती थी

जिसकी सांसों को सुनकर

पुरवाई चलती थी

उसकी मुस्कान से

उसकी गृहस्थी की

ज्योत जलती थी

 

वह आज गुमसुम

चुपचाप शांत है

शायद कोई बात है

जिससे भयाक्रांत है

उसकी आंखों में वेदना

झलक रही थी

आंसू की धार

उसके पलकों से छलक रही थी

अपने हृदय में कोई पीड़ा

वह छुपाए जा रही थी

ससुराल में उसकी उपेक्षा

 उसे अंदर ही अंदर

खाए जा रही थी

घर का हर सदस्य उससे

 एक सवाल पूछ रहा था

जिसका जवाब

उसे नहीं सूझ रहा था

 

उसने कठोर नियम का पालन किया

हर विधि को पवित्रता से पूर्ण किया

हर पूजा स्थल के

चौखट पर माथा टेका

चमत्कार की आशा से

सब की तरफ देखा

हर बड़े चिकित्सक से मिली

पर उसके मन की कली नहीं खिली

उसने आधुनिक आईवीएफ का भी प्रयास किया

पर यहां पर उसने भी

उसे निराश किया

पति और घर वाले

 उसकी उपेक्षा करने लगे

वह तो एक बांझ है

सब तिरस्कार से कहने लगे

बांझ शब्द उसके कानों में

पिघले शीशे सा लगने लगा

उसके नारीत्व का अपमान

चोट खाए नागिन सा धीरे-धीरे जगने लगा

वह लोगों के तानों से टूट गई

उसकी खुशी उससे

 सदा के लिए रूठ गई

 

उसने आत्मबल से

एक कठोर निर्णय लिया

अपने पति को

उसमें सम्मिलित किया

वह एक बाल आश्रम में

अपने पति संग गई

वहां पर एक बच्ची को

गोद लेने की बात कही

सारी कागजी कार्रवाई के बाद

कुछ माह पश्चात

उन्हें किया गया याद

वह बच्ची उन्हें

गोद दी गई

उनकी कानूनी रजामंदी

अधिकारी के समक्ष ली गई

 

बच्ची को गोद लेकर

वह खुशी-खुशी घर आई

घर के हर कोने को सजाया

मिठाई लोगों में बटवाई

उसके जीवन में नई सुबह हुई

दूर हुई दुःख भरी सांझ

बच्ची को गोद में लेकर

वह नाच उठी

उसकी भावनाओं की

सभी सीमाएं टूटी

और पूछ बैठी

ऐ बेदर्द जमाने

बता-

अब मुझे कौन कहेगा बांझ ? /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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