हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 29 ☆ व्यंग्य – नहाने के बहाने ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं।  कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है. आज का व्यंग्य  है नहाने के बहाने।  नहाने के बहाने डॉ परिहार जी ने कई लोगों की पोल खोल दी  है । यह शोध कई लोगों की विशेष जानकारी कई लोगों  तक पहुंचा देगा ।  इस  रोग से ग्रस्त पतियों की पत्नियों  को इस  व्यंग्य से बहुत लाभ मिलेगा।  इस कड़कड़ाती सर्दी में हास्य का पुट लिए ऐसे  मनोरंजक व्यंग्य के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को नमन। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 29 ☆

☆ व्यंग्य – नहाने के बहाने ☆

कुछ दिन पहले एक पत्नी अपने पतिदेव के खिलाफ यह शिकायत लेकर परिवार परामर्श केन्द्र में पहुंच गयी कि पतिदेव नहाते नहीं थे। ज़ाहिर है कि इस मामले में पतिदेव की खासी किरकिरी हुई और पानी से परहेज़ की उनकी आदत जगजाहिर हो गयी। इस घटना ने हमारे देश में पतियों की पतली होती हालत को भी नुमायाँ किया। किसी समय ‘परमेश्वर’ माने जाने वाले पति की आज यह हैसियत हो गयी है कि नहाने के सवाल को लेकर तलाक की नौबत आने लगी है।

हमारे देश में स्नान की बड़ी महत्ता है। हर पवित्र और महत्वपूर्ण काम के पहले स्नान ज़रूरी होता है। दिवंगत को भी बिना स्नान दुनिया से विदा नहीं किया जाता। सबको पालने वाले भगवान को नहलाये बिना नैवेद्य नहीं चढ़ाया जाता। यह दीगर बात है कि हमारे समाज में बहुत सी जातियाँ नहाने के बाद भी पवित्र नहीं होतीं और बहुत सी बिना नहाये ही पवित्र बनी रहती हैं। कई लोग यही बता बता कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं कि वे बिला नागा रोज़ सबेरे चार बजे नहाते हैं या जाड़ों में भी ठंडे पानी से नहाते हैं।

लेकिन सब लोग नहाने के प्रति ऐसे उत्साही नहीं होते। बहुत से महानुभाव पेट-पूजा को छोड़कर दूसरी पूजा नहीं करते और परिणामतः स्नान को  ज़रूरी नहीं मानते। कुछ लोग बुड़की (संक्रांति) की बुड़की ही स्नान संपन्न करते हैं और फिर भी शिकायत करते हैं कि ‘यह बुड़की भी मरी रोज़ रोज़ आ जाती है।’  एक और महाशय का मासूम कथन है—-‘पता नहीं लोग महीनों बिना नहाये कैसे रह लेते हैं। हमें तो पंद्रह दिन में ही खुजली चलने लगती है।’ एक ऐसे सज्जन का किस्सा भी मशहूर है

जिनका स्वेटर दीवाली पर खो गया था और जब होली पर उन्होंने नहाने के लिए कपड़े उतारे तो पता चला कि स्वेटर पहने हुए थे।

बहुत से लोग घर के सदस्यों के डर से स्नान का ढोंग करते रहते हैं। वे खास तौर से घर की महिलाओं से ख़ौफ़ खाते हैं जो नहाने के मामले में निर्मम होती हैं। ऐसे लोग स्नानगृह में पानी गिराकर और हल्लागुल्ला मचाकर बाहर आ जाते हैं। एक ऐसे ही महापुरुष की पोल उस समय खुल गयी जब वे मोज़े पहने बाथरूम में गये और मोज़े पहने ही बाहर आ गये, यानी ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ वाला मामला हो गया।

एक गुरूजी के बारे में सुना था कि वे अपने पवित्र शरीर पर मैल का पर्याप्त संग्रह करते थे और मैल की बत्तियां उतार उतार कर भक्तों में प्रसाद रूप में वितरित करते रहते थे। यह पता नहीं चला कि भक्त इस प्रसाद का क्या उपयोग करते थे, लेकिन इसमें सन्देह नहीं कि प्रसाद के मामले में ऐसे आत्मनिर्भर गुरू विरले होते हैं।

इंग्लैंड के अपने पुराने प्रभुओं के गोरे रंग को देखकर हममें से बहुतों को रश्क होता है। हमारे देश में भी गोरे रंग के लिए ज़बरदस्त पागलपन है। हर लड़के को गोरी बीवी चाहिए। लेकिन इंग्लैंड के पुरुषों के बारे में पढ़ा कि उनमें से ज़्यादातर की अपनी साफ-सफाई में रुचि बहुत कम है। 57 फीसदी पुरूष स्नानघर में 15 मिनट से कम और 27 फीसदी 10 मिनट से कम वक्त बिताते हैं। अपने भीतरी वस्त्र बदलने में भी वे खासे लापरवाह हैं।

एक अखबार में पढ़ा कि इंडियाना में सर्दियों में नहाना कानून के खिलाफ है और बोस्टन में उस समय तक नहाना ग़ैरकानूनी है जब तक डॉक्टर इसकी सलाह न दे। पढ़ कर ख़याल आया कि हमारे देश में भी ऐसे कानून बन जाएं तो स्नान-विमुख पतियों के घर टूटने से बच जाएं। वैसे इसी अखबार में यह भी छपा है कि इज़राइल में मुर्गियों के लिए शुक्रवार और शनिवार को अंडे देना ग़ैरकानूनी है।

एक लेख में बड़ा दिलचस्प तथ्य पढ़ने में आया कि सौन्दर्य और नफ़ासत के लिए विख्यात फ्रांस में मध्यकाल में महिलाएं जीवन भर अपनी कोमल काया को पानी का स्पर्श नहीं होने देती थीं। इसके बावजूद उनका रूप और सौन्दर्य जगमगाता रहता था। पुरुष भी पूरे जीवन में एकाध बार ही स्नान करते थे। इससे सिद्ध होता है कि सौन्दर्य की सुरक्षा और अभिवृद्धि के लिए स्नान क़तई ज़रूरी नहीं है।लोग व्यर्थ ही ड्रमों पानी शरीर को घिसने और चमकाने में खर्च करते हैं। समझदार लोग स्नान की कमी को ‘परफ्यूम’ और ‘डी ओ’ की मदद से सफलतापूर्वक ढंक लेते हैं।

अंत में ‘फ़ैज़’ साहब से मुआफ़ी मांगते हुए अर्ज़ है—-

‘और भी ग़म हैं ज़माने में नहाने के सिवा,

राहतें और भी हैं ग़ुस्ल की राहत के सिवा’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 3 ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

 

(आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेम चंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 3 – सुहागरात ☆

(आपने अब तक पढ़ा – पगली का बचपन बीता, विवाह हुआ, ससुराल आई पगली, सुहागरात के दिन मिली नशे की पीड़ा ने एक अनकही कहानी  को जन्म दिया जिसे पगली न तो मायके में किसी को सुना सकतीं थी न तो लज्जा के चलते ससुराल में—-अब आगे पढ़े—-)

पगली अपने पति के पांवो के पास बैठी अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रही थी। उसी समय पड़ोस में चल रहे किसी विवाह समारोह में नाट्यनर्तकी द्वारा गाया गया दर्द भरा गीत ढ़ोल नगाड़े की थाप पर फिजाओं में तैरता पगली के कान से टकराया था—

सुन ले पुकार सजना,
आइ तेरे द्वार सजना,
दिल में मिलन की लिए कामना।
दिल है बेकरार मेरा,
मैंने चाहा प्यार तेरा
तूं है किस जहाँ में मेरे साजना ।। 1।।

तूं है नशे में हाय,
घडी मिलन की बीती जाये,
दिल में बेकरार मेरे साजना।
ये दिल रोये जार जार,
मैं तो चाहूं तेरा प्यार,
पड़ा बेखबर है घर आंगन।। 2।।

कैसी घड़ी ये आयी,
मिल के भी मिल ना पायी,
उठ के तो देख मेरे साजना।
मैं तो हूँ कन्या कुंवारी,
तुझपे नशा है भारी,
दिल का मिलन हो कैसे साजना।। 3।।

छम छम बाजे चूड़ी पायल,
मोरा करेजवा घायल,
कैसे मिलन की करूं याचना।
सुनले पुकार  सजना,
आइ तेरे द्वार  सजना।। 4।।

इस प्रकार दर्द को लेकर फिजां में तैरती लोक नर्तकी के गीतों की आवाज़ उसके कानों मे पड़ी तो गीत का दर्द
और पगली की परिस्थितियों का सामंजस्य उसके दिल के जख्म को और गहरा कर गया। वह सिसक उठी पगली।  उसके कपोलों से बहते आंसुओं की धार मदहोश पति के पैरों पर गिर रही थी। इन परिस्थितियों में पगली को याद हो आई भैरव बाबा द्वारा सुनाई गई कृष्ण सुदामा की मित्रता की कथा। और हठात मुह से निकल पड़े ये शब्द—

पानि परात को हाथ छु यो नहि,
नैनन के जल से पग धोयो।

कितना सामंजस्य था दोनो घटनाओं में एक तरफ भगवान अपने आंसुओं से भक्त के पांव पखार रहा था तो दूसरी तरफ एक पतिव्रता अपने आंसुओं, से कलयुगी पति भगवान के चरण धो रही थी।  दोनों में भावों का अंतर था जहां दोनों मित्र भावों के सागर में गोते लगा रहे थे। वही पगली के आंसुओं और पीड़ा का कोई मोल नही था।

सुहागरात बीत चली थी, सेज पर सजी बेला और गुलाब की लडियाँ और पंखुडियां अब भी दिल में हसरतें लिए उनके मिलन की साक्षी बनने की तमन्ना सहेजे हसरत भरी आखों से देख रही थी। रात बीत चली थी।  सुहाग सेज की यह अजीबोगरीब दास्ताँ न तो ससुराल में न तो मायके में पगली अपने माँ बाप को तथा सखियों को सुना सकती थी। ये कहानी एक मात्र पगली की ही हो ऐसा नही है हजारों पगलियां आज भी समाज में घुटन और पीड़ा ले जी रही हैं जिनके दुख और पीड़ा का कोई अंत नही है।

 

 – अगले अंक में पढ़ें  – पगली माई – दमयंती  – भाग -4 – खुशियों भरे दिन 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 14 – कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है उनकी एक  भावप्रवण रचना कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला हैअब आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़ सकेंगे. )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 14 – विशाखा की नज़र से

☆ कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है  ☆

 

बेरंग है सारे रंगों की अभिलाषा

हमनें गढ़ी सुविधा की परिभाषा

 

जिसनें सोखा नही हरा

हमनें कहाँ उसे हरा रंग

जिसनें जज़्ब किया नही पीला

हमनें कहाँ उसे पीला रंग

ख्वाहिशें, पर फैलाती जहाँ

उसे कहाँ आसमानी रंग

 

भगवा तो और भी कठिन है रंग

जो है लाल औ’ पीले के मध्य का परावर्तन

हरे, नीले, भगवे रंगों की

हमनें करी ख़ूब राजनीति

जबकि असल में नहीं है

यह उस व्यक्ति, वस्तु या धर्म का रंग

हमनें रंग दिया उसको वैसा

जो नहीं था उसका खुदका रंग

 

असल में होते हैं बस दो ही रंग

या तो सफ़ेद या फिर काला

दोनों में समाहित है सारे रंग

अब मत चलाना अपना कुटिल दिमाग

एक को कहना पाक, एक को नापाक

खेलना अब के ऐसी होली

रहना सफ़ेद या सोखना सब रंग

बस दिखे ना एक भी इंद्रधनुषी रंग

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – ☆ दीपिका साहित्य # 4 ☆ शायरी ☆ – सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

( हम आभारीसुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  के जिन्होंने ई- अभिव्यक्ति में अपना” साप्ताहिक स्तम्भ – दीपिका साहित्य” प्रारम्भ करने का हमारा आगरा स्वीकार किया।  आप मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है। आज प्रस्तुत है आपकी अतिसुन्दर शायरियां । आप प्रत्येक रविवार को सुश्री दीपिका जी का साहित्य पढ़ सकेंगे।

☆ दीपिका साहित्य #4 ☆ शायरी ☆ 

 

मेरे ख्वाबों ख्यालो में कोई साया लहराया है, न जाने ये कौनसा मौसम आया है,

न जाने कौनसी दिशा में बह रही है हवा, न जाने माझी कौनसी नाँव लाया है,

न जाने ले जाएगा किस किनारे, यही ख्याल जहन में बार बार आया है . . .

 

जाते जाते वो जर्रा दे गया, पिछली दिवार पे निशां दे गया,

हर पत्ता डाली से ले गया, मुझसे मेरा सुंकू ले गया,

बेज़ार सी हो चली है ज़िंदगी, जैसे बेदर्द ज़िंदगी से रंगो को ले गया . . .

 

फ़िज़ा महक रही है आज, हर चिड़िया चहक रही है आज,

तुझसे पहले तेरे आने की खबर जो आयी, हर धड़कन धड़क रही है आज . . .

 

सुबह की पहली-पहली किरण जब पड़ी मेरे आँगन में,

लगा जैसे उसके आने का आगाज हुआ है जीवन में,

लम्हा-लम्हा गिन रही हूँ उसके इंतज़ार में,

न जाने कब होगा उसका दीदार अब के बरस सावन में . .

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (27) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय)

 

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ।।27।।

इन दोनों के ज्ञान से योगी शांत अनन्त

तू भी अर्जुन योगी हो अंत से हो निश्चिंत।।27।।

 

भावार्थ : हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो।।27।।

 

Knowing these paths, O Arjuna, no Yogi is deluded! Therefore, at all times be steadfast in Yoga.।।27।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ फूल हंसी भीग गयी, धार धार पानी में ☆ श्री प्रभाशंकर उपाध्याय

श्री प्रभाशंकर उपाध्याय

(ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाशंकर उपाध्याय जी का हार्दिक स्वागत है। आप व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। हम श्री प्रभाशंकर उपाध्याय जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के साथ अपनी रचनाओं को साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार किया। आप कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी विशिष्ट साहित्यिक सेवाओं पर राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार घोषित।)

संक्षिप्त परिचय

जन्म 01.09.1954

जन्म स्थान – गंगापुर सिटी (राज0)

शिक्षा एम.ए. (हिन्दी), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि।

व्यवसाय – स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर से सेवानिवृत अधिकारी।

कृतियां/रचनाएं – चार कृतियां- ’नाश्ता मंत्री का, गरीब के घर’, ‘काग के भाग बड़े‘,  ‘बेहतरीन व्यंग्य’ तथा ’यादों के दरीचे’। साथ ही भारत की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पांच सौ रचनाएं प्रकाशित एवं प्रसारित। कुछेक रचनाओं का पंजाबी एवं कन्नड़ भाषा अनुवाद और प्रकाशन। व्यंग्य कथा- ‘कहां गया स्कूल?’ एवं हास्य कथा-‘भैंस साहब की‘ का बीसवीं सदी की चर्चित हास्य-व्यंग्य रचनाओं में चयन,  ‘आह! दराज, वाह! दराज’ का राजस्थान के उच्च माध्यमिक शिक्षा पाठ्यक्रम में शुमार। राजस्थान के लघु कथाकार में लघु व्यंग्य कथाओं का संकलन।

पुरस्कार/ सम्मान – कादम्बिनी व्यंग्य-कथा प्रतियोगिता, जवाहर कला केन्द्र, पर्यावरण विभाग राजस्थान सरकार, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर, अखिल भारतीय साहित्य परिषद तथा राजस्थान लोक कला मण्डल द्वारा पुरस्कृत/सम्मानित। राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार घोषित।

 ☆ व्यंग्य – फूल हंसी भीग गयी, धार धार पानी में ☆

किबला मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने अद्भुत बात लिखी है कि इंसान को हैवाने जरीफ़ याने प्रबुद्ध जानवर कहा गया है और यह हैवानों के साथ बहुत बड़ी ज्यादती है। ओशो ने कहा था कि जानवर इसलिए नहीं हंसते क्योंकि वे ऊबते नहीं हैं। मुश्ताक साहब का कथन है कि इंसान एक मात्र अकेला ऐसा जानवर है जो मुसीबत पड़ने से पहले ही मायूस हो जाता है। मगर हास्य उसका एक मात्र ऐसा आलम्बन है जो उसे किसी भी मुसीबत से पार कर देता लेता है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में बहुत पहले हास्य के आठ प्रकार बता दिए थे। उनमें मुक्त हास्य, मंद हास्य एवं मौन हास्य प्रमुख हैं। अट्टहास, ठिठोली, ठट्ठा तथा ठहाका को मुक्त हास्य, मुस्कान को मंद हास्य और अंतर्हास को मौन हास्य कहा गया है। हास्य-कला का एक और वर्गीकरण है, ’अपहास’। यह निकृष्ट श्रेणी का हास्य है। उपहास, खिल्ली, खीस तथा कटाक्ष आदि अपहसित हास्य हैं। घोड़े की माफिक हिनहिनाना और लकड़बग्घी हंसी इसी श्रेणी के हास्य हैं। मुक्त हास्य इंसान को ईश्वर की नेमत है। कवि लिखता है, ‘हंसना रवि की प्रथम किरण सा, कानन के नवजात हिरण सा‘। सच, शिशु की भोली किलकारी सभी को सम्मोहित करती है। इंद्रजीत कौशिक ने बालक की खिलखिलाहट को ईश्वरतुल्य बताते हुए लिखा है- ‘संग खुदा भी मुस्कराया, जब एक बच्चे को हंसाया।’ यह मालूम नहीं कि निर्मल हंसी और निश्छल मुस्कान ईश्वर तक पहुंचती है या नहीं किन्तु यह दिल तक जरूर पहुंचती है। मुस्कान के बारे में इतना तक कहा गया है कि यह आपके चेहरे का वह झरोखा है, जो कहता है कि आप अपने घर पर हैं। महबूबा की उन्मुक्त हंसी पर अग्निवेश शुक्ल लिखते हैं- ’’जब्ज है दीवारों में तेरी हंसी और खुशबू से भरा है मेरा घर।’’ इसी मिज़ाज पर वीरेंद्र्र मिश्र ने लिखा है- ‘‘फूल हंसी भीग गयी, धार धार पानी में।’’ आंग्ल भाषा में कथन है कि हैप्पीनेस इज नॉट ए डेस्टीनेशन। इट्स ए मैथड ऑॅफ लाइफ। यानी मस्त होकर हंसो, फिर मस्त रहो। ‘तमक-तमक हांसी मसक’ यानी मनभावक, मतवाली और मस्तानी हंसी एक चिकित्सा है। ‘लाफ्टथैरपी’ के कद्रदान कहते हैं कि हंसने से  ‘बक्सीनेटर‘, ‘आर्बीक्यूलेरिस,’ ’रायजोरिस’ तथा ’डिप्रेशरलेबी’ जैसी मुख्य मांस पेशियों समेत दो सौ चालीस मांसपेशियां सक्रिय होकर सकारात्मक प्रभाव पैदा करती हैं और जब, हंसी बुक्काफाड़ हो तो समझो कि मांसपेशियों की तो शामत आ जाती है। ऐसे ही हंसोड़ थे, रामरिख मनहर। मेरे महल्ले में भी उसी नस्ल के एक शायर रहते हैं। जनाब, गज़ब के ठहाकेबाज हैं। अस्सी पड़ाव लांघ चुके हैं लेकिन अब भी उनकी हंसी अनेक घरों को लांघती हुई मेरे घर में बेतकल्लुफ प्रवेश करती है। एक दिन मैंने उनसे दो सौ चालीस मांसपेशियों की सक्रियता का उल्लेख कर दिया। दूसरे दिन खां साहेब छड़ी ठकठकाते घर आ गए और बोले, ‘‘जिन दांतों से हंसते थे खिल खिल, अब वही रूलाते हैं हिलहिल।’’ बताओ कि वह कौन सी नामाकूल पेशी है?, जिसने हमारे दांतों में ऐसा भूचाल ला दिया कि कल हमने बुक्का क्या फाड़ा कि रात भर कराहते रहे और अभी अभी डॉक्टर को दिखाकर लौटे हैं। कमबख्त ने पर्चा भर कर दवाइयां लिख दी हैं।’’

मैंने कहा, ‘‘म्यां! यह मांसपेशी का कुसूर नहीं बल्कि आप बरसों से जर्दा-किवाम की गिलौरियों का जो जुर्म इन पर ढाते रहे हो, यह उसी का नतीजा है।’’ यह सुनकर बरखुदार लाहौलविलाकुव्वत बोलते हुए निकल लिए।

कुछ महानुभावों ने हास्य की इंद्रिय को इंसान की छठी इंद्रिय कहा है। कदाचित, इसी वजह से तमाम बदहालियों और बीमारियों के बावजूद देश की जनता हंसे-मुस्कराए जा रही है। भय, भूख, बेरोजगारी, अराजकता और अनाचार के बाद भी हम सदियों से हंस रहे हैं, खिलखिला रहे हैं। भ्रष्टाचार और कुव्यवस्थाओं के खिलाफ आक्रोश जताने की जगह खीसें निपोर रहे हैं। गाहे-बगाहे, क्रोध प्रदर्शन हो भी जाता है तो उनमें भी हंसते- मुस्कराते मुखड़े नजर आ जाते हैं। हैरत है कि दारूण प्रकरणों तथा अंतिम संस्कारों जैसे अवसरों पर भी लोग चहक लेते हैं। कवि रघुवीर सहाय भी कदाचित इस अवस्था को अनुभूत करते हुए लिख गए- ’’लोकतंत्र का अंतिम क्षण है, कहकर आप हंसे। निर्धन जनता का शोषण है, कहकर आप हंसे। चारों ओर है बड़ी लाचारी, कहकर आप हंसे। सबके सब हैं भ्रष्टाचारी, कहकर आप हंसे।‘‘ चुनंाचे, आलम यह है कि आवाम ही नहीं बल्कि देश के दिग्गज राजनीतिबाज भी बात-बेबात मुस्करा रहे हैं। ताज्जुब तो तब होता है जब चुनावों में मुंह की खाने के बाद भी शीर्ष नेता हंस-विहंस कर आत्मचिंतन की आवश्यकता जाहिर करते हैं। फिर नतीजा चाहे, ढाक के तीन पात निकले। गंभीर विषयों पर आयोजित नौकरशाहों की बैठकें अमूमन चाय-नाश्ते के चटखारे के साथ समाप्त हो जाती हैं। नतीजा वही ढाक के तीन…। टी.वी. स्क्रीन पर दिख रही चख..चख का नतीजा भी ढाक के तीन पात ही होता है। फिर वे चाहे लोकसभायी हों या न्यूज चैनल्स पर आमंत्रित माननीयों की। हम भी उस कुत्ता लड़ाई का पूर्णता से लुत्फ ले ही लेते हैं।

चुनांचे, अब वक्त आ गया है, जब बचे-खुचे लोग भी हंसने-मुस्कराने की इस पुनीत राष्ट्रीय धारा में शरीक हों और अपना स्वास्थ्य दुरूस्त रखें। इसके लिए किसी लॉफिंग-क्लब से जुड़ने लॉफ्टर शो आदि देखने की जरूरत नहीं। सिर्फ, सतर्कता से अपने आवास, दफ्तर, प्रतिष्ठान के आसपास के मौजूं का अवलोकन करें, बस इसी ताका-झांकी में आपको अनेक भी हास्य प्रसंग मिल जाएगा। इस मामले में थोड़ा सा मार्गनिर्देशन हम किये देते हैं- जब लोग गुलाब जामुन को रसगुल्ला। बाघ, चीता, तेंदुआ को शेर। किसी कंपनी की कार को मारूति। किसी भी मोटर साइकिल को हीरो होंडा। वनस्पति घी को डालडा और  लेमीनेट को सनमाइका कह कर पुकारें; तो आप यकीनन खिलखिला सकते हैं। आपके उपालंभ पर दूधिया कहे कि सा‘ब! मेरा दूध तो एकदम शुद्ध और पेवर है। आपका पड़ौसी बोले कि मैं तो रोज सुबह उठकर, डेली घूमता हूं। अधिकारी पूछे कि इन आंकड़ों का कुल टोटल क्या है? चिकित्सक नसीहत दे कि रोजाना फल-फ्रूट खाया करो अथवा अतिथि आपके चाय के प्रस्ताव पर नाक-भौं सिकोड़े और कहे कि टी तो मैं सिर्फ बेड-टी पर ही लेता हूं। गर्ज यह कि आप ऐसे प्रसंगों पर अपनी एक अद्द मुस्कराहट न्यौछावर कर सकते हैं। एक महिला अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाते हुए बोली- डॉक्टर साहब! देखिए तो इसके बाथरूम में सूजन आ गई है। उसकी उस बाथरूमी-संज्ञा पर चिकित्सक की इच्छा लहालौंट होने को अवश्य हुई होगी? किसी कस्बाई नेता का अभिनंदन है और प्रशंसा के बड़े-बड़े पुल बांधे जा रहे हैं कि इनके नेतृत्व से देश ही नहीं वरन विश्व को बड़ी बड़ी आशाएं हैं। तबादलित, जिला स्तर के अधिकारी के विदाई समारोह में भाषण झाड़े जा रहे हों कि इनकी कार्यकुशलता का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है अथवा सूदखोर सेठ को दानवीर कर्ण या भामाशाह की उपाधि से विभूषित किया जा रहा हो या धुर देहात में ग्रामीणों के मध्य कृषि संबंधी जानकारी अंग्रेजी में दी जा रही हो, किसी स्थानीय समाचार-पत्र का लोकार्पण या संगठन का अभ्युदय हो और उसे राष्ट्रीय स्तर के संबोधन दिए जा रहे हों तो ऐसे मौकों पर सिवा ठहाका लगाने के आप कर ही क्या सकते हैं?

चलिए, चलते चलते दिविक रमेश की ये पंक्तियां स्मरण करके ही हंस लें-

‘‘कुछ नालायक विचार भी प्यारे तो बहुत होते हैं। आते ही उनके हंसने लगती हैं, हमारी उदासियां।’’

 

© प्रभाशंकर उपाध्याय

193, महाराणा प्रताप कॉलोनी, सवाईमाधोपुर (राज.) पिन- 322001

सम्पर्क-9414045857

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उत्क्राँति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – उत्क्राँति

कुआँ, पेड़,

गाय, साँप,
सब की रक्षा को
अड़ जाता था,
प्रकृति को माँ-जाई
और धरती को
माँ कहता था..,
अब कुआँ, पेड़,
सब रौंद दिए,
प्रकृति का चीर हरता है
धरती का सौदा करता है,
आदिमपन से आधुनिकता
उत्क्राँति कहलाती है,
जाने क्यों मुझे यह
उल्टे पैरों की यात्रा लगती है!

हम सब यात्रा की दिशा पर चिंतन करें।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(दोपहर 1.55, 18.12.19)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य – # 22 – वरदान और अभिशाप ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “वरदान और अभिशाप।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 22 ☆

☆ वरदान और अभिशाप

भगवान राम भी कर्म के कानून से नहीं बच पाए। उन्होंने एक वृक्ष के पीछे से बाली को मार डाला था, न कि लड़ाई की खुली चुनौती से। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाली को वरदान था कि अगर कोई उससे लड़ने के लिए उसके सामने आ जाए तो बाली को उसकी आधी शक्ति मिल जाएगी।

इसलिए भगवान विष्णु के अगले अवतार, भगवान कृष्ण के रूप में इस कार्य के लिए, उन्हें जरा (अर्थ : माँ) नामक एक शिकारी के हाथों वृक्ष के पीछे से छिप कर चलाये गए तीर से मृत्यु मिली। जानते हैं वो जरा कौन था? वह बाली का अगला जीवन था, जिसने अपने पिछले जन्म में भगवान राम द्वारा छिप कर चलाये हुए तीर से मृत्यु प्राप्त की थी जिसका परिणाम स्वरूप भगवान कृष्ण की मृत्यु भी समान रूप से हुई वो भी उसी केहाथोंजिसे उन्होंने पिछले जन्म में मारा था। इसी को कर्मोंका क़ानून कहते हैं।

क्या आप जानते हैं कि कर्म का अभिशाप और कानून इतना प्रभावी है कि उसने भगवान कृष्ण के सभी राज्यों को बर्बाद कर दिया था । बेशक अगर भगवान कृष्ण चाहते, तो वे उनसे बच सकते थे, क्योंकि यह सब स्वयं उनकी अपनी माया के तहत ही रचा गया था, लेकिन यदि वह ऐसा करते, तो ऐसा लगता कि भगवान अपने द्वारा बनाये गए नियम स्वयं ही तोड़ रहे हैं, तो आम लोग उनका अनुसरण क्यों करेंगे?

भगवान कृष्ण से अधिक बुद्धिमान कौन है? कोई नहीं।

वह कुरुक्षेत्र की लड़ाई में पांडवों के साथ थे क्योंकि उन्हें पता था कि यदि पांडव उस युद्ध को हार जायँगे, तो धर्म का नुकसान होगा और कौरव कभी भी आदर्श राजा नहीं बन पायेंगे जिससे कि कौरवों के शासन में, सभी आम लोगों को भारी मुसीबतों और परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए धार्मिक कानून स्थापित करने के लिए, भगवान कृष्ण को पता था कि पांडवों की जीत आवश्यक है। सभी जानते हैं कि कौरव सेना के पास पांडव सेना से ज्यादा कई और शक्तिशाली योद्धा थे।

 

© आशीष कुमार  

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सूचनाएँ/Information ☆ हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा ☆ – प्रस्तुति – श्री संजय भारद्वाज

सूचनाएँ/Information

हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा

(हिंदी आंदोलन परिवार के रजतजयंती समारोह के अंतर्गत सम्पन्न हुआ आयोजन)

हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे, राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई और महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी पुणे में आयोजित की गई थी। इसका विषय था, *हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा*।

संगोष्ठी का उद्घाटन सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सदानंद भोसले ने किया। डॉ. भोसले ने कहा कि गाँव की मंडी से लेकर संसद तक की भाषा हिंदी है तो हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं हो सकती? हिंदी चारों भाषाकुलों के बीच सेतु का काम करती है। आज़ादी की लड़ाई में भी हिंदी ही सेतु बनी। उन्होंने लिपि के प्रचार और अधुनातन तकनीक को अपनाने पर बल दिया।

हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे के अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज ने कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज की तरह राष्ट्रभाषा भी एक ही हो सकती है।अपनी भाषा में शिक्षा न होने के कारण प्रतिभाओं के दमन और शोध के क्षेत्र में मौलिकता के अभाव की ओर उन्होंने ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि यही उपयुक्त समय है कि हम संकल्प को सिद्धि की ओर ले जाने की यात्रा आरम्भ करें।

हिंदी आंदोलन परिवार की  सहसंस्थापक सुधा भारद्वाज ने प्रस्तावना रखी। उन्होंने हिंदी की भाषागत वैज्ञानिकता और संवैधानिक स्थिति की चर्चा करते हुए विषय के विभिन्न पहलुओं पर मंथन का आह्वान किया।

महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे के संचालक श्री ज. गं. फगरे ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी उपेक्षित नहीं है। राजनीतिक विरोध का मुकाबला भाषा के प्रचार से करना चाहिए।

राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई की उपाध्यक्ष डॉ. सुशीला गुप्ता ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि भाषा अस्मिता से जुड़ी होती है। हिंदी की उपेक्षा अपनी पहचान को लुप्त करने जैसा है। इस सत्र का संचालन- स्वरांगी साने ने किया।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. दामोदर खडसे ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा थी, है और रहेगी। आम नागरिक अँग्रेज़ी के खौफ़ से दबा है। निष्ठा और समर्पण से हिंदी के पक्ष में वातावरण तैयार करना होगा।

आबासाहेब गरवारे महाविद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. नीला बोर्वणकर ने कहा कि हिंदी के कारण प्रांतीय भाषाओं की अस्मिता पर खतरे की आशंकाओं का निर्मूलन किया जाना चाहिए। स्वाधीनता के समय ही हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाता तो भाषा को लेकर होनेवाले विवाद खड़े नहीं होते। हिंदी विभाग, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शशिकला राय ने कहा कि यह मानना पड़ेगा कि भारतीय भाषाएँ दम तोड़ रही हैं। बड़े अख़बार समूह व्यापार के नाम पर भाषा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्होंने भाषा के क्रियोलीकरण पर  आपत्ति जताई। बैंक ऑफ महाराष्ट्र के सहायक महाप्रबंधक (हिंदी) डॉ. राजेन्द्र श्रीवास्तव ने राजभाषा और राष्ट्रभाषा के तकनीकी अंतर को परिभाषित किया। राजभाषा के क्षेत्र में हुए कार्यों से स्थितियों में आए सकारात्मक बदलाव की उन्होंने विशद जानकारी दी। राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई के ट्रस्टी एवं संरक्षक श्री महेश अग्रवाल ने कहा कि हिंदी के राजनीतिक विरोध पर हिंदी के हितैषियों का मौन पीड़ादायक है।इस सत्र का संचालन डॉ. अनंत श्रीमाली ने किया।

द्वितीय सत्र में ‘क्षितिज’ द्वारा भाषा पर आधारित साहित्यिक रचनाओं की प्रस्तुति की गई।  *मेरी भाषा के लोग* नामक इस सांस्कृतिक आयोजन के लेखक-निर्देशक संजय भारद्वाज थे। उनके अलावा विजया टेकसिंगानी, आशु गुप्ता, अपर्णा कडसकर, रेखा सिंह, अनिता दुबे और समीक्षा तैलंग ने भी रचनाओं को स्वर दिया।

समापन सत्र में प्रतिक्रियाएँ एवं प्रश्नोत्तर हुए। इस सत्र का संचालन डॉ. ओमप्रकाश शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन अरविंद तिवारी ने किया।

कार्यक्रम की सफलता के लिए सुशील तिवारी, डॉ. लतिका जाधव, डॉ. पुष्पा गुजराथी ने विशेष परिश्रम किया। बेहद कसे हुए इस विचारोत्तेजक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे। प्रमुख उपस्थितों में माया मीरपुरी, उषाराजे सक्सेना, सत्येंद्र सिंह, डॉ. अहिरे, राजीव नौटियाल, डॉ. मेघा श्रीमाली, मीरा गिडवानी, डॉ. लखनलाल आरोही, माधुरी वाजपेयी, संध्या यादव, नीलम छाबरिया, महेंद्र मिश्र, माधव नायडू, सतीश दुबे, महेश बजाज, बीरेंद्र साह, दिवाकर सिंह आदि सम्मिलित थे।

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 20 ☆ हाथों की गलियाँ ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

((सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित एक भावप्रवण कविता  “हाथों की गलियाँ”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 20 ☆

☆ हाथों की गलियाँ

अपना लेखा मेहनत है
भाग्य के भरोसे क्यों रहे?
हाथ कभी क्यों फैलाए?
हम हाथ कभी क्यों जोड़े?

हाथों की गलियाँ तंग रही
नसीब कहां हम ढूँढेंगे?
मिट्टी गारा उठाते सही,
हीरा कोयले से पाएँगे।

कल नसीब हम बदलेंगे ,
हाथों पर कालिख ही सही
हम मेहनत करने वाले हैं ,
आज भले ये तंग सही।

नई रोशनी यहां आएगी,
नया सवेरा वह लाएगी।
हज़ारों किरणों को लेकर,
हाथों की गलियाँ बनाएगी।

 

© सुजाता काळे,

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोब – 9975577684

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