हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आज सूरज को मैंने… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ आज सूरज को मैंने… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

आज सूरज को मैंने मना कर दिया

और देखो अंधेरा घना कर दिया

 *

ठंड लगने लगी उनको बरसात से

मैंने बारिश को गुनगुना कर दिया…

 *

तेरी बाते जो दिल को जलाती रही

उन्ही बातों को ही अनसुना कर दिया

 *

प्यार के बदले में जो वफ़ा मांगली

ऐसा ना सोच हमने गुन्हा कर दिया

 *

तेरी ख़ामोशी ऐसी बला बन गयी

तुने दुश्वार मेरा जीना कर दिया

 *

कोई खंजर नहीं और तीर भी नहीं

अपने हातो से खुद को फ़ना कर दिया

 *

हरे पत्ते को पिसा ओ ज़ख़्मी हुए

उन्ही पत्तों को तुमने हिना कर दिया

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता.. ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता.. ? ?

कुछ अश्लील-सी

उपमाएँ चुनें

कामुकता का

प्रत्यक्ष या परोक्ष

उपयोग करें,

‘मादा’देह में

नग्नता का

बघार लगाकर

रचें एवरग्रीन कविता,

लंबे समय

चर्चा में रहेगी

ये कविता;

शोध का विषय

बनेगी ये कविता,

प्रगतिशील और

नवोन्मेषवादी

कहलायेगी

ये कविता,

हो सकता है

ऐसा होता हो,

कोई बता रहा था

ऐसा ही होता है,

पर ये सब लागू है

उन पर

जिनके लिए

कमॉडिटी है कविता,

खरीद-फरोख्त

चर्चित होने की

रेमेडी है कविता,

अलबत्ता-

मैं ऐसा हरगिज़

नहीं कर सकता

पयपान को विषाक्त

नहीं कर सकता,

मेरे लिए

निष्पाप, अबोध

अनुभूति है कविता,

पवित्र संवेदना की

अभिव्यक्ति है कविता,

मेरी आराधना है कविता

मेरी साधना है कविता,

मेरी आह है कविता

मेरी माँ है कविता!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

श्री सुदर्शन कुमार सोनी

☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – “व्यंग्य : कल आज और कल”

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पृष्ठ संख्या – १६६

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली 

मूल्य – २२४ रु 

☆ व्यंग्य: कल, आज और कल” का अवलोकन व समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

यह सारांश विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक “व्यंग्य: कल, आज और कल” का एक विस्तृत अवलोकन प्रदान करता है, जो हिंदी व्यंग्य के सैद्धांतिक आधार, ऐतिहासिक विकास और समकालीन प्रासंगिकता का एक बहुआयामी विश्लेषण है।

व्यंग्य की परिभाषा और ऐतिहासिक जड़ें

व्यंग्य की प्रकृति और उद्देश्य व्यंग्य को केवल हास्य नहीं, बल्कि साहित्य की एक सशक्त विधा के रूप में वर्णित किया गया है जो समाज के ताने-बाने में बुनी गई विसंगतियों, विडंबनाओं और कुरीतियों को उघाड़ने का साहस रखती है। यह मात्र हँसाने का साधन नहीं है, बल्कि हँसी के पीछे छिपे एक तीखे प्रहार की लेखकीय कला है, जो पाठक को झकझोरती है और उसे सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की ओर सोचने पर मजबूर करती है। स्रोतों के अनुसार, व्यंग्य समाज का दर्पण है जो व्यवस्था, परंपराओं और सामूहिक मूर्खताओं को उजागर करता है।

सैद्धांतिक आधार: हास्य बनाम व्यंग्य  पुस्तक शुद्ध हास्य (Humor और Farce) और व्यंग्य (Wit, Satire और Irony) के बीच सूक्ष्म अंतर स्पष्ट करती है। जहाँ हास्य विषय-वस्तु से संबंधित है, वहीं विट, सटायर और विडंबना (Irony) अभिव्यक्ति के कौशल और लेखक की बुद्धि से जुड़े हैं। हँसी की तीव्रता के आधार पर इसे छह प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: स्मित (मंद मुस्कान) से लेकर अतिहसित (अट्टहास) तक। एक सफल व्यंग्य वह है जो पाठक में ये बौद्धिक अनुभव उत्पन्न कर सके।

प्राचीन काल से भक्ति काल तक का विकास  : भारत में व्यंग्य की जड़ें बहुत पुरानी और गहरी हैं, जो संस्कृत साहित्य और कालिदास के प्रसंगों में भी दिखाई देती हैं। ऐतिहासिक रूप से कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों को जातिगत भेदभाव और धार्मिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करने का श्रेय दिया जाता है। विशेष रूप से कबीर को उनकी बेबाक और कठोर भाषा के लिए जाना जाता है, जिन्होंने बाहरी आडंबरों को त्यागकर आंतरिक पवित्रता पर जोर दिया। पत्थर पूजने या मस्जिदों में ऊँची अजान देने पर उनके प्रसिद्ध दोहे सामाजिक व्यंग्य के कालजयी उदाहरण हैं। यहाँ तक कि गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में भी नारद मोह और लक्ष्मण-परशुराम संवाद जैसे प्रसंगों में व्यंग्य और हास्य का अनूठा समावेश मिलता है।

हिंदी व्यंग्य के स्तंभ और अभिव्यक्ति की विविधता

आधुनिक हिंदी व्यंग्य के चार स्तंभ स्रोतों में उन व्यक्तित्वों का गहन विश्लेषण दिया गया है जिन्होंने हिंदी में व्यंग्य को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया:

  • हरिशंकर परसाई: इन्हें हिंदी व्यंग्य का पर्याय माना जाता है। परसाई ने सरल, बोलचाल की भाषा का उपयोग करके गहरे संदेश दिए। उनका व्यंग्य तर्क, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित था, जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार और पाखंड पर चोट करना था।
  • शरद जोशी: अपनी संक्षिप्तता और अनूठे रूपकों के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने लघुता में विशाल सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं को समेटने की कला में महारत हासिल की थी।उन्होने व्यंग्य पाठन को साहित्यिक कार्यक्रमों के मंचों जंहा पद्य का ही बोलबाला था वहां पर सफलतापूवर्क स्थापित किया
  • रवींद्रनाथ त्यागी: त्यागी का व्यंग्य मनोवैज्ञानिक गहराई और आत्म-व्यंग्य के लिए जाना जाता है। वे अक्सर स्वयं को भी अपने व्यंग्य के घेरे में रखते थे, यह दर्शाते हुए कि सुधार की शुरुआत स्वयं की पहचान से होती है।
  • श्रीलाल शुक्ल: उनका व्यंग्य गहरे सामाजिक यथार्थवाद में रचा-बसा है, जो विशेष रूप से ग्रामीण और शैक्षिक प्रणालियों के क्षरण पर केंद्रित है, जैसा कि उनके उपन्यास राग दरबारी में देखा जा सकता है।
  • विभिन्न विधाओं में व्यंग्य: नाटक, कविता और सिनेमा  व्यंग्य का प्रभाव निबंधों से आगे बढ़कर साहित्य और मीडिया के अन्य रूपों तक फैला है:
  • हिंदी नाटक: भारतेंदु हरिशचंद्र के अंधेर नगरी से शुरू होकर, आधुनिक नाटकों ने सत्ता प्रतिष्ठानों व प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए व्यंग्य का उपयोग किया है। हबीब तनवीर का चरणदास चोर लोक विधाओं के माध्यम से “सभ्य” समाज के पाखंड पर प्रहार करता है।
  • कविता: कविता की सघनता में व्यंग्य और भी पैना हो जाता है। हुल्लड़ मुरादाबादी, अल्हड़ बीकानेरी और काका हाथरसी जैसे कवियों ने अपनी लयबद्ध प्रस्तुतियों के माध्यम से व्यंग्य को मंचों पर लोकप्रिय बनाया।
  • फ़िल्मी गीत: बॉलीवुड में भी व्यंग्य एक शक्तिशाली माध्यम रहा है। “प्यासा” फ़िल्म का गीत ‘सर जो तेरा चकराए’ या ‘पैसा बोलता है’ जैसे गाने सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय कमजोरियों को बिना कड़वाहट के रेखांकित करते हैं।

सामाजिक प्रभाव, महिला हस्तक्षेप और भविष्य की राह

व्यंग्य में महिलाओं की भूमिका : पुस्तक “व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप” पर विशेष प्रकाश डालती है, जो अक्सर साहित्यिक इतिहास में उपेक्षित रहा है। यह नोट किया गया है कि जहाँ लंबे समय तक इस विधा पर पितृसत्ता का प्रभाव रहा, वहीं सूर्यबाला, शांति मेहरोत्रा और स्नेहलता पाठक जैसी लेखिकाओं ने अपने विशिष्ट अनुभवों से व्यंग्य को नई पहचान दी। ये लेखिकाएं घरेलू विसंगतियों, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक पहचान की राजनीति को अपनी पैनी दृष्टि से संबोधित करती हैं।

व्यंग्य एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र के रूप में : व्यंग्य को समाज के लिए एक महत्वपूर्ण “रक्षा तंत्र” (Defense Mechanism) के रूप में वर्णित किया गया है, जो इसकी बीमारियों की पहचान करता है और उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद करता है। यह सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने का एक जोखिम भरा लेकिन प्रभावी तरीका प्रदान करता है। शक्तिशाली लोगों के पाखंड का मजाक उड़ाकर, व्यंग्य जनता को याद दिलाता है कि कोई भी सत्ता मानवीय दोषों से ऊपर नहीं है।

डिजिटल युग की चुनौतियाँ  : समकालीन समय में, व्यंग्य के सामने नई चुनौतियाँ हैं। हालाँकि सोशल मीडिया मीम्स और वायरल वीडियो के माध्यम से व्यापक पहुँच प्रदान करता है, लेकिन यह सेंसरशिप और कानूनी खतरों के जोखिम भी पैदा करता है। एक चिंता यह भी है कि यदि व्यंग्य का उपयोग जिम्मेदारी से नहीं किया गया, तो यह केवल नकारात्मकता या हताशा पैदा कर सकता है। इसके अलावा, डिजिटल युग के “फिल्टर बबल्स” और गहरी बौद्धिक समझ की कमी के कारण व्यंग्य के सूक्ष्म संकेतों को अनदेखा किया जा सकता है।

लेखक का व्यक्तिगत दर्शन : लेखक, विवेक रंजन श्रीवास्तव, साझा करते हैं कि उनका व्यंग्य लेखन सामाजिक पाखंड और कथनी-करनी के अंतर से पैदा हुई आंतरिक बेचैनी का परिणाम है। वे व्यंग्य को एक “सामाजिक सफाईकर्मी” के रूप में देखते हैं जो वैचारिक कूड़े-कचरे को साफ करता है। उनका मानना है कि व्यंग्य का अंतिम उद्देश्य हमेशा सकारात्मक होना चाहिए—सामाजिक विसंगतियों का निदान करना और एक अधिक न्यायपूर्ण समाज को प्रेरित करना। उनका निष्कर्ष है कि जब तक मानव समाज में विसंगतियां रहेंगी, व्यंग्यकार की पैनी कलम की आवश्यकता बनी रहेगी।

कुल मिलाकर विवेक की यह पुस्तक ज्ञानवर्धक होकर संगहणीय व पठनीय है।

चर्चाकार… श्री सुदर्शन कुमार सोनी

संपर्क – 141 रोहित नगर फेज-2 भोपाल, मो  9425638352

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में सम्मान की। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆

जीवन में सम्मान की, सबको रहती चाह।

अगर दाम है जेब में, आसाँ है तब राह।।

*

सम्मानों का है सजा, मनचाहा बाजार।

छोटा बड़ा मझोल है, बोली लगें हजार।।

*

हर आयोजक चाहता, लक्ष्मी का वरदान।

सरस्वती को तब मिले, मन चाहा सम्मान।।

*

संयोजक की चाहना, श्रोता दर्शक मंच।

संसाधन बिन शून्य है, कैसे होगा लंच।।

*

अतिथि मंच पर बैठते, पहले तो नाराज।

करतल ध्वनि जब गूँजती, मन में बजते साज।।

*

मंचों पर जो बैठते, संस्थाओं में ज्येष्ठ।

या वरिष्ठ हों आयु में, तो ही होते श्रेष्ठ।।

*

वक्ता अपने ज्ञान की, घुटी पिलाता घोल।

श्रोता सारे मौन हो, शब्द सुने अनमोल।।

*

ज्ञानवान होते वही, बोलें मधुमय बोल।

श्रोताओं की दाद से, प्रवचन दें दिल खोल।।

*

दर्शक श्रोता सामने, लेते हैं आनंद।

आपस में वे तौकबलते, खट्टा मीठा कंद।।

*

कुछ तो केवल चाहते, अच्छा खासा लंच।

तृप्ति भाव पर ही कहें, अति उत्तम है मंच।।

*

हम तो बस यह चाहते, ऐसा हो सम्मान।

स्वाभिमान सबका बचे, नैतिकता का मान।।

*

गुणवानों की कद्र हो, उनका हो गुणगान।

हम तो नहीं है चाहते, बंद करें सम्मान।।

*

लक्ष्मी माँ कुछ कृपा कर, दे ऐसा वरदान।

राह सुगमता से मिले, सबका हो कल्यान।।

*

ज्ञानी का सम्मान हो, यही रचें संसार।

स्वागत हो जयकार हो, है उत्तम सुविचार।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब नई पीढ़ी आगे बढ़ती है, तो दिल मुस्कुरा उठता है ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱जब नई पीढ़ी आगे बढ़ती हैतो दिल मुस्कुरा उठता है 🥰

जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब हमारी अपनी उपलब्धियाँ धीरे-धीरे स्मृतियों में धुंधली पड़ने लगती हैं। जिन सफलताओं पर कभी हमें गर्व हुआ करता था, वे अब यादों की अलमारी में सलीके से रखी रहती हैं।

परन्तु जीवन की यही तो सुंदरता है कि उस खाली जगह को हमारे अपने बच्चों और युवाओं की उपलब्धियाँ भर देती हैं। सच कहें तो उनकी सफलता हमें अपनी सफलता से भी अधिक आनंद और गर्व का अनुभव कराती है। ऐसा लगता है मानो हमारी अधूरी आशाएँ और सपने उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ रहे हों।

🌱हमारे परिवार का एक गौरवपूर्ण क्षण🌷

आज मैं आप सबके साथ हमारे परिवार का एक अत्यंत हर्ष और गर्व का क्षण साझा करना चाहता हूँ। मेरे भतीजे विशाल को 2026 के गणतंत्र दिवस समारोह में नई दिल्ली के भव्य कर्तव्य पथ पर सीनियर डिवीजन आर्मी का सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुना गया।

वह क्षण मेरे लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला था। जब मंच से घोषणा हुई:

“सीनियर अंडर ऑफिसर विशाल सिंह, सर्वश्रेष्ठ कैडेट, सीनियर डिवीजन आर्मी, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ निदेशालय”

तो मेरी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विशाल को पदक से अलंकृत किया गया और उन्हें ट्रॉफी, बैटन तथा चेक प्रदान किया गया।

हमारे पूरे परिवार के लिए यह क्षण अविस्मरणीय बन गया—गर्व और आनंद से भरा हुआ।

🌱भोपाल में सम्मान🌷

इस उपलब्धि के उपलक्ष्य में भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया।

नई दिल्ली में आयोजित एक महीने के प्रशिक्षण शिविर के अपने अनुभव साझा करते हुए विशाल ने बहुत सुंदर बात कही। उसके शब्द थे—

“एनसीसी केवल वर्दी तक सीमित नहीं है। यह अनुशासन, धैर्य और देश के सम्मान के प्रति समर्पण की जीवनशैली है। दिल्ली का यह शिविर एक बहुत बड़ा सीखने का अवसर था, जहाँ देश के विभिन्न भागों से आए कैडेटों के साथ मिलकर वास्तविकता को समझने का मौका मिला।”

उसकी यह बात सुनकर लगा कि वह केवल पुरस्कार ही नहीं जीतकर आया, बल्कि जीवन के मूल्य भी सीखकर लौटा है।

🌱उज्ज्वल भविष्य की कामना🌷

परिवार के एक बुज़ुर्ग के रूप में मुझे यह देखकर अत्यंत संतोष और गर्व होता है कि हमारे घर का एक युवा अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।

ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि विशाल का भविष्य उज्ज्वल हो और वह देश की सेवा करते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहे।

हम जैसे लोगों के लिए ऐसे क्षण यह एहसास दिलाते हैं कि समय भले ही हमें धीरे-धीरे मंच से पीछे ले आए, पर उत्कृष्टता की मशाल अब सक्षम और समर्पित हाथों में सुरक्षित है।

विशाल को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ और आशीर्वाद – उसका जीवन देश की सेवा में गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी बने।

 

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३९ ⇒ चाय, चखना – चबैना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाय, चखना – चबैना।)

?अभी अभी # ९३९ ⇒ आलेख – चाय, चखना – चबैना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चखना और चबैना में वही अंतर है, जो सिर्फ चाय और चाय पानी में है। हम जब सिर्फ चाय की बात करते हैं, तो साथ में पानी मुफ्त होता है। लेकिन बात जब चाय पानी की होती है तो उसका मतलब सिर्फ चाय और पानी नहीं होता।

प्यास लगने पर जब किसी से एक ग्लास ठंडा पानी मांगा जाता है, तो केवल जल ही पेश किया जाता है, गुलाब जल नहीं, लेकिन जब किसी मेहमान को एक कप चाय की प्याली पेश की जाती है, तो एक ग्लास पानी सहज रूप से साथ चला आता है।।

लेकिन चाय पानी की तो बात ही निराली है। बेटा, बहुत दिनों बाद अंकल आए हैं, कुछ चाय पानी का इंतजाम करो। अब मामला सिर्फ चाय और पानी का नहीं, कुछ और का भी है बिस्किट, नमकीन, गर्मागर्म पकौड़े अथवा फल फ्रूट, सभी चाय पानी में परिभाषित हो जाते हैं। यानी अच्छा भला चाय नाश्ता हो जाता है।

यह तो हुआ चाय पानी का शाब्दिक और सात्विक अर्थ ! कलयुग में चाय पानी का एक अर्थ और होता है, जहां सेवा मुफ्त उपलब्ध नहीं होती, वहां चाय पानी का अर्थ साधारण नहीं रह जाता।

वहां चाय पानी का अर्थ मुट्ठी गर्म करना भी हो सकता है। हप्पू सिंह की भाषा में आप इसे न्यौछावर भी कह सकते हैं। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। यहां सभी काम हो सकता है, बशर्ते, हो जाए चाय पानी।।

लेकिन बात तो चखना और चबैना की हो रही थी चाय और चाय पानी की नहीं ! हम भी अजीब हैं।

आप अंगूर चखकर खरीद सकते हो, लेकिन चना तो चखकर नहीं लिया जा सकता। चखने से भी कहीं पेट भरा है। भूख लगने पर तो चना चबैना भी छप्पन भोग का ही काम करता है।

चखने का काम अमीरों का है, शौकीनों का है। एक बेचारा गरीब मेहनतकश इंसान क्या खाएगा और क्या चखेगा। वह तो रूखी सूखी खाकर, ठंडा पानी पीकर संतुष्ट हो जाता है लेकिन अमीर तो खरीदने के पहले हर चीज चखेंगे, नाक भौं सिकोड़ेंगे,

बहुत मीठा है, no no, it’s too oily and spicy.केवल चखने से ही उनकी हेल्थ और हाइजीन पर असर पड़ता है, खाने की तो बात ही छोड़िए।।

हम चबैने का और अन्न, रोटी का तो ख़ैर, सम्मान करते हैं, लेकिन चखने के तौर तरीकों के बारे में जरूर दो चार बातें करना पसंद करेंगे, क्योंकि दो शब्द चखने के लिए काफी नहीं होते।

जो मजा चखने में है, उससे अधिक मजा किसी को मज़ा चखाने में है। दुनिया में ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें अगर सिर्फ मुंह लगाओ, तो गले ही पड़ जाती हैं, फिर चाहे वह गुटखा ही क्यों न हो।।

खुशी के मौके पर किसी का मुंह मीठा कराना हमारी संस्कृति है, परंपरा है ! क्या किसी का स्वागत मुंह कड़वा करके किया जा सकता है। लेकिन गालिब ने जिसे शराब कहा है, वह तो कड़वी है, और देखो तो किस किसके मुंह लगी है।

यह एक ऐसी कड़वी दवा है जिसके पीने के बाद, मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए कुछ चखना पड़ता है। नमकीन मूंगफली से काजू बादाम तक यह चखने की रेंज होती है।

पहले पीने का मज़ा और बाद में चखने का मज़ा। लिपटन और ब्रुक बॉन्ड चाय को टाटा और चाय पानी की नानी, पहले पीना और फिर चखना, कल की किंगफिशर, तेरी यही कहानी।।

कोशिश करें, चाय पानी और चबैने से ही काम चलाएं, क्यों कुछ कड़वी चखने के चक्कर में, लोहे के चने चबाएं। अगर कुछ चखना ही हो, पूरे परिवार और बाल बच्चों को सराफा या छप्पन ले जाएं। क्यों न कुछ मीठा चखें, कुछ नमकीन खाएं। हमें भी साथ ले जाएं, जब कभी इंदौर आएं ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६९ – देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।

पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।

 स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।

 हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।

 हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ – आलेख – संस्कारधानी मेरा अपना शहर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆

🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️

आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश  आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।

यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।

इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।

मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख  स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।

जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।

पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।

यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।

चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।

यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक,  गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब  सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।

मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है।  गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।

रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।

यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।

दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।

जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।

जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।

विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।

जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।

वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही  सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।

जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर  भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।

सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।

जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।

भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।

नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।

यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।

हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।

और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।

दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।

यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।

यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।

पहाड़ी पर मां शारदा मैहर

त्रिपुर सुंदरी बसी तेवर

नारी को भाये है जेवर

भाभी का लाडला देवर

गुड़ की चाशनी सेवर

सेवा भाव संस्कारी मेयर

मिलता है घी प्योवर

जबलपुर महिमा लिखते मिलूँ

आप सभी को प्रणाम करते

सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जीवन भर, माँ नर्मदे हर

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ ढगांनी जसे ग्रासिले… + संपादकीय निवेदन – श्री राजकुमार कवठेकर – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

श्री राजकुमार कवठेकर

💐 अ भि नं द न 💐

आपल्या समुहातील ज्येष्ठ गझलकार श्री राजकुमार कवठेकर यांचा क्लेशवृक्षाच्या छायेतहा दुसरा कवितासंग्रह आज १०मार्च २०२६ रोजी प्रकाशित होत आहे. हा संग्रह कोल्हापूरच्या अक्षरदीप प्रकाशनने प्रकाशित केला आहे.

ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे श्री. कवठेकर यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐

  संपादक मंडळ

 ई अभिव्यक्ती मराठी

आज प्रकाशित होत असलेल्या संग्रहातील एक कविता –

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “ढगांनी जसे ग्रासिले” ☆ श्री राजकुमार कवठेकर ☆

ढगांनी जसे ग्रासिले सुर्यबिंबा

 क्षणार्धात सर्वत्र सांजावले

चकाकून जाती विजांच्या शलाका

 थवे पाखरांचे घरी पातले

 *

धुळीचे कुठे लोळ गेले नभाला

 पुन्हा शांतले वृक्ष.. वेली.. पिले

भुईचे तसे तापलेल्या छतांचे

 उदासीन जे चित्त, आनंदले

 *

उभारून बाहो जणू वृक्ष वेली

 वरूणास व्याकूळ हाकारती

” पुन्हा यौवनाची अम्हा दे उभारी.. “

 तृणांकूर माळासवे प्रार्थती

 *

लडीवाळ बाळापरी पावसाच्या

 नभाच्या कुशीतून आल्या सरी

झळांचा बने थंडसा मंद वारा

 घुमे रानझाडीतुनी बासरी

 *

मघा साठले.. दाटले मोकळे हो

 पुन्हा ऊन हे कोवळे सांडले

तुझ्या आठवांचे ऋतू जीववेडे

 मलाही दिसांनी किती भेटले

© श्री राजकुमार कवठेकर

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ वसंत बहार… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ वसंत बहार… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

प्रथमस्पर्श वसंत हृदयी

प्रेमभाव समजले सखया

तोच वारा, तोच गंध फुलोरा

रहस्य एक कळले सखया.

तुज पहाता ऋतूस भाळले

तुझ्यात मन गुंतले सखया

अन् मी राधा तु कृष्ण गोकुळी

जीवन नवे हसले सखया.

स्वप्नांच्या मैफली नित्य नभात

निद्रानाशी मी फसले सखया

कधी पालवीस, पक्षी बोलांना

प्रश्न मनाशी डसले सखया.

कोण बरे तु राजपुत्र असा

स्पंदन माझे हवसले सखया

याच वसंती हरवून स्वतःला

प्रेमाचे सत्य गवसले सखया.

अजून नजर भिरभिरते हे

श्वास भेटीस असुसले सखया

विरहालाही शपथ विश्वासाची

प्रेम अमर प्रसवले सखया.

तुझे अल्लड अजाण जे छेडणे

दोष मनाचे लहरले सखया

बदनामी होई, ओळख प्रीयाची

तुझ्या वसंती बहरले सखया.

 

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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