हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१५ – हर कवि का कर्तव्य है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर कवि का कर्तव्य है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१५ ☆

☆ हर कवि का कर्तव्य है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

हर कवि का कर्तव्य है, कुछ न लिखें अनर्थ।

कविता न बदनाम हो, गूढ़ छिपा है अर्थ।।

*

कविता का जो धर्म है, पहले समझें आप।

मानव का यह ताप हर, दूर करे संताप।।

*

कविता मानव की सखा, जानें उसका मर्म।

कलम सिपाही है वही, समझे अपना कर्म।।

*

वेदशास्त्र इसमें लिखे, पद्य-गद्य अनमोल।

भारत के साहित्य में, मानव हित के बोल।।

*

विसंगतियों का दौर यह,स्वार्थ भाव है आज।

नैतिक मूल्यों को जगा, बदलें सकल समाज।।

*

परिहासों-चुटकुलों से, क्षण भर का आनंद।

कविता में संदेश हो, दूर करें छल-छन्द।।

*

कवियों का यह फर्ज है, कविता का यह धर्म।

गलत दिशा में जो चलें , दिखा राह सत्कर्म।।

*

कीचड़ में खुद न फँसें, सबका रखें खयाल।

मानव हित की सोच से,जग को करें निहाल।।

*

दरबारी खुद ना बने, उससे करें बचाव।

परहित में जो है लगा, उसका करें चुनाव।।

*

हर कवि को है चाहिये, करें फर्ज निर्वाह।

न्याय विवेकी ही रहें , यही कलम की चाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चीरहरण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चीरहरण ? ?

औरत की लाज-सी

खींचकर धरती की हरी चुनर

उतार दिया जाता है

उसकी कोख में पिघलता लोहा,

सरियों के दम पर खड़ी कर दी जाती हैं

विशाल अट्टालिकाएँ,

धरती के सीने पर बिछा दिया जाता है

काँक्रीट, सीमेंट, रेत ऐसे

किसी नराधम ने

मासूमों को चुनवा दिया हो जैसे,

विवश धरती अपनी कोख में

पथरीली आशंका के साथ

छिपा लेती है हरी संभावनाएं भी,

काल बीतता है

इमारत साल दर साल

थोड़ी-थोड़ी खंडहर होती है,

धरती की चुनर

शनैः-शनैः हरी होती है,

इमारत की बुनियाद झर जाती है

धरती की कोख भर आती है,

खंडहर ढक जाता है, उन्हीं

पेड़-पौधों, घास-फूल-पत्तियों से

जिनके बीज कभी पेट में छिपा लिये थे धरती ने!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Adorable Life… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Adorable Life ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Adorable Life… ~ ??

O my  dear  life! My  cherished  grace

I silently bow with my soul’s embrace

For all you’ve given in gentle streams

beyond my hopes, beyond my dreams

 *

I hold your gifts with  humbled heart

each broken whole, each tender part

If dawn ever fades from mortal sight

or it drifts away in the endless night

 *

O’ dear life, allow  these words to rise

accept my silent  ever grateful tribute

Thank you for every dream made true

 for all I have become because of you..!

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०६ ☆ कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०६ ☆

?  कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कुरुक्षेत्र,

अक्षौहिणी सेनाओं का टकराव

महान, गीता का ज्ञान

अधर्म पर धर्म की जय।

 

गागामेला,

सिकंदर की प्यास

विश्व विजय की आस

यूनान का उदय, फारस का त्रास।

 

कलिंग,

अशोक का शोक

शस्त्र से शास्त्र की ओर देश

हृदय परिवर्तन, शांति का संदेश।

 

तराईन, पानीपत, प्लासी,

वाटरलू, पहला, दूसरा विश्व युद्ध

कपट, गुप्तचर, ताकत

संघर्ष, झड़प, घात, प्रतिघात

अनवरत नई नई बिसात।

 

जिनके नाम पर है शांति पुरस्कार,

उन्हीं नोबल का था आविष्कार

डायनामाइट।

तोप, विस्फोट

शंखनाद, रणभेरी, दहाड़, टंकार, चीत्कार

अंततः वही सिसकी, दर्द, सीत्कार।

 

युद्ध थोपता है कोई और

जान से हाथ धोकर

कीमत चुकाता आया है कोई और

जलती मशालें, धूल के गुबार

कूच, अल्ग़ार, वार,

शौर्य, वीरता, गद्दार,

कूटनीति की जीत, हार।

 

रक्त सरिता, ध्वस्त मुकुट,

नियति विकट

हर युद्ध का अंत, परिवर्तन

एक नया राज्याभिषेक,

बनता है हल, युद्ध भी कभी।

 

लोग जो, मानते हैं

मानवता से ज्यादा,

धर्म या अपना बनाया कायदा

देखते हैं जो सिर्फ फायदा

 

मैं यह सब अनुभव कर,

पसीने से लतपथ छटपटाता हुआ हूं

बिस्तर पर,

सिर्फ अपने कलम कागज के साथ

उसी पक्षी सा आक्रांत,

जिसे देवदत्त ने

मार गिराया था

तीक्ष्ण बाणों से।

 

सिद्धार्थ हो कहां ?

आओ बचाओ

इस तड़पते विश्व को

जो मिसाइलों

की नोक पर

लगे

परमाणु बमों से भयाक्रांत

है सहमा सा।

 

युद्धोन्मादियों को समझा पाने को,

छोटी है मेरी कविता!

तलाश है मुझे

प्यार की ऐसी पैट्रियाड मिसाइल की,

जो, ध्वस्त कर सकती,

नफरत की स्कड मिसाइलें,

लोगों के दिलों में बनने से पहले ही

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ ज़ुबान… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता जुबान

? कविता – ज़ुबान ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

किसी की जुबान होती है मीठी

किसी की होती कड़वी

किसी की मिश्री डली सी

किसी की होती जहरीली

*

किसी की जुबान मधुर घंटी सी

किसी की तूफान सी गरजती

किसी की शहद घोलती सी

किसी की आतंक पैदा करती

*

किसी की जुबान अमृत बरसाती

किसी की गालियों की बौछार

किसी की जुबान मन मोह लेती

किसी की दिल पर करती वार

*

किसी की जुबान कानों में रस घोलती

किसी की मन में घाव करती

किसी की जुबान स्वर लहरियां बिखेरती

किसी की कर्कश  दिलों को दुखाती

*

किसी की जुबान फूल बिखराती

किसी की कांटों में उलझाती

किसी से जुबान खुशियां बांटती

किसी की ईर्ष्या द्वेष झलकाती

*

किसी की जुबान आशीष बरसाती

किसी की कहलाती काली जुबान

किसी की बांटती आनंद सभी को

किसी की करती छलनी प्राण

*

किसी की जुबान उत्साह बढ़ाती

किसी की बांटती निराशा के बोल

किसी की अंधेरे में रोशनी भरती

किसी की बोले व्यर्थ नकारात्मक बोल

*

किसी की जुबान नाप तौलकर बोलती

किसी की कैंची सी चलती जाती

किसी की रहती सहयोग को तत्पर

किसी की बहाने बाजियां  बनाती

*

किसी की जुबान सत्य पर अडिग

किसी की होती झूठ का पुलिंदा 

किसी का मकसद होता मानव सेवा

किसी का केवल स्वार्थ दिखावा

*

सभी जुबानें समान दीं प्रकृति ने

फिर क्यों इतने भेद विसंगतियां हैं

सभी मीठी मधुर सकारात्मक हो जाएं

तो जहान का नक्शा ही बदल जाए

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० – कविता – अंबिके ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता  अंबिके”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० ☆

🌻कविता🌻 अंबिके 🌻

*

हे अंबिके माँ ज्ञान देना, कर सकूं आराधना।

नित ध्यान में बैठी रहूँ मैं, पूर्ण कर माँ साधना।।

*

मारे सभी दानव दलों को, शस्त्र तू ही धारती।

रण भेद करती अंबिका तू, निर्बलों को तारती।।

 काली बनी कल्याण करती, रक्त खप्पर साजती।

नारायणी तूअंबिके नित, क्रोध में ललकारती।।

*

दानव दलों के अंग सारे, धार लेती देह में।

दो नैन जलते राह में है, छल रहे सब नेह में।।

 आगे बढ़ी माँ छोड़ के सब, रौंदती अंगार है।

ममता जगी है भाव में माँ , प्रेम के भंडार है।।

*

शिव जानते हैं अंबिका को, क्रोध में जलती रही।

 चरणों पड़े फिर आपके ही, जीभ तो निकली रही।।

हर अंग में लाली जगी है, लाज भरते नैन है।

हे अंबिके जगदंबिके माँ, आप ही तो चैन है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “संविधान और समझ की आवश्यकता” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ आलेख ☆ “संविधान और समझ की आवश्यकता” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

“संविधान लिखने वाले के पास 32 डिग्रियां और 9 भाषाओं का ज्ञान था,

और आज अनपढ़ लोग संविधान में कमियां निकाल रहे हैं।”

यह वाक्य केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की एक विडंबना को उजागर करता है।

भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि विद्वता, संघर्ष और दूरदर्शिता का प्रतीक थे। उन्होंने Columbia University तथा London School of Economics जैसे विश्वविख्यात संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे विधि, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र और इतिहास के गहरे ज्ञाता थे। अनेक डिग्रियों और बहुभाषीय ज्ञान से सम्पन्न होकर उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश के लिए ऐसा संविधान रचा, जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।

भारतीय संविधान कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं है। यह सदियों के अनुभव, संघर्ष और चिंतन का परिणाम है। इसमें प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ कर्तव्यों का भी उल्लेख है। यह केवल शासन का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है।

परंतु आज सोशल मीडिया के युग में बिना अध्ययन और बिना गहराई के समझ के लोग संविधान की आलोचना करने लगते हैं। आलोचना करना गलत नहीं है—लोकतंत्र में यह अधिकार है। परंतु बिना जानकारी, बिना अध्ययन और बिना संदर्भ के आलोचना करना समाज को भ्रमित करता है।

संविधान में संशोधन की व्यवस्था स्वयं इसी दस्तावेज़ में दी गई है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, इसलिए संशोधन भी होते हैं। अब तक कई संशोधन हुए हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि संविधान लचीला भी है और जीवंत भी।

वास्तव में आवश्यकता संविधान की आलोचना करने की नहीं, बल्कि उसे पढ़ने और समझने की है। जब तक हम संविधान के मूल सिद्धांत—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को आत्मसात नहीं करेंगे, तब तक उसकी महत्ता को पूर्ण रूप से नहीं समझ पाएंगे।

डॉ. अम्बेडकर ने संविधान बनाते समय चेतावनी दी थी कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह प्रभावी नहीं रहेगा। इसका अर्थ स्पष्ट है—दस्तावेज़ से अधिक महत्वपूर्ण उसे लागू करने की निष्ठा और समझ है।

आज हमें आवश्यकता है अध्ययनशील नागरिक बनने की। केवल डिग्रियों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि समझ और विवेक आवश्यक है। संविधान पर प्रश्न उठाने से पहले हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए—क्या हमने उसे पढ़ा है? क्या हमने उसके मूल भाव को समझा है?

संविधान में कमियां खोजने से पहले हमें अपनी समझ को समृद्ध करना होगा। तभी हम सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के सजग और जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५२ ⇒ विचारक और प्रचारक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक।)

?अभी अभी # ९५२  ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।

पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।

चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।

एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।

आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।

हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।

आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७१ – देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७१ ☆ देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

जब निद्रा दिवस की जानकारी मिली तो आरंभ में लगा, ये अवश्य ही कुंभकरण का जन्मदिवस होगा। हमारे जैसे निद्रा प्रेमी उसकी याद में इसको मनाते होंगे।

आखिर, आज वो दिन आ ही गया, जिसका हम पूरे साल भर इंतजार करते करते, सोते ही रहते हैं। इस खुशी को मानने के लिए हमारी पूरी योजना रहती हैं।

सभी संबंधित आवश्यक सामग्री ऑनलाइन मंगवा कर रखी पड़ी रहती हैं। शयन कक्ष की खिड़कियों को मोटे पर्दे से ढकना हो, या आंख पर पहनने वाली पट्टी से लेकर कान में ठूसने वाली रुई, सब तैयार हैं।

घर के द्वार पर बाहर से ताला लगवा दिया जाता हैं। टीवी, मोबाइल, पेपर सब कोसों दूर रख कर सोने की शुरुआत होती हैं।

भरपेट गरिष्ठ भोजन के पश्चात मीठी लस्सी की ओवरडोज लेकर, वातानुकूल कमरे में नींद लेने में सहायक सभी उपकरणों का उपयोग कर, मखमली शैय्या पर शांत चित्त लेटते ही, दूसरी दुनिया में चल देते हैं।

कितना मज़ा आता है, इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं हैं। आप भी इसका आनंद लेवें।

अभी आंखें बंद ही हुई थी, हमारे कमरे के दरवाजे पर इतनी तेज आवाज़ आई, मानो पश्चिम एशिया की कोई मिसाइल हमारे कक्ष के दरवाजे के बाहर गिरी हैं। हड़बड़ाहट के मारे गिरते पड़ते दरवाजा खोला, बाहर श्रीमती जी खाली गैस के सिलेंडर के साथ खड़ी थी, और बोली गैस एजेंसी जाएं और सिलेंडर भरवा कर आए, ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम बंद पड़ा है, घर में गैस खत्म हो गई, अब खाना नहीं बन सकता हैं।

मरता क्या ना करता, खाली सिलेंडर लेकर डीलर के यहां कूच कर रहें हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२१ ☆ गुणगान माझे… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२१ ?

गुणगान माझे… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

(चाल : पुकारता चला हूँ)

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

*

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

*

मैत्रिणीच्या सोबती असायची

उठून त्यांत तीच तर दिसायची

मैत्रिणीकडे तिच्या मी पाहता

व्यर्थ का ती दात ओठ खायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

*

मीही चोरुनी तिला पाहातसे

अनंत काळजावरी तिचे ठसे

गप्प ती तरीही कान ऐकती

अखंड गुणगान माझे गायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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