हिन्दी साहित्य – कविता ☆ थोथी उम्मीद लगाए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – थोथी उम्मीद लगाए…!

☆ ॥ कविता॥ थोथी उम्मीद लगाए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

तुम्हें बचाने के लिए

कोई मसीहा नहीं आएगा

और अगर आया भी,

तो जन-जागरण के जुर्म में

सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।

 

ज़िंदा रहने के लिए

प्राणी मात्र को अपनी लड़ाई

खुद लड़ना पड़ती है

यही बात तो गीता में

कृष्ण ने अर्जुन को कही है।

 

ऊपर आसमान में

सूरज, चाँद, तारों, ग्रह, नक्षत्रों

और सिवाय शून्य

नीलिमा के कुछ भी नहीं है।

 

फिर भी पागल मन है

कि अवतार की अवधारणा के

अश्व पर सवार होकर

अपने उद्धार की

थोथी उम्मीद लगाए बैठा है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कस्तूरी मृग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कस्तूरी मृग ? ?

अपने ही पसीने से

नम हुआ बिस्तर

ठंडा हो जाता है,

अनिद्रा का मारा

उफनते पारे में भी

गहरा सो जाता है,

चिंतन की भूमि पर

विवेचन उगता है

कानों में कहता है,

एक कस्तूरी मृग

हर आदमी के

भीतर रहता है।

 

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 5.20 बजे, 30.3.19)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९२ – नवगीत – जीवन में उद्धार है… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतजीवन में उद्धार है

? रचना संसार # ९२ – गीत – जीवन में उद्धार है…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मानव आप अहं को तजिए,

वह तो एक विकार है।

क्रोध मोह को तज दोगे तब,

जीवन में उद्धार है।।

*

रावण अत्य अंहकारी था ,

करता वो अभिमान था।

माँ सीता का हरण किया था,

बहुत बड़ा नादान था।।

तोड़ा दर्प राम ने उसका,

रख लो मानव ध्यान भी।

मारा प्रभु ने रण में उसको,

सकल जगत को ज्ञान भी।।

धूल अहंकारी हैं मिलते,

करिए आप विचार है।

*

मिट्टी की तो काया है यह,

दूर रहो तुम पाप से।

मानवता के सेवक बन जा,

नित्य डरो संताप से।।

अहंकार है दंश साँप का,

परम शत्रु है प्राण का।

जीवन में वह जहर घोलता ,

काल बने हैं त्राण का।।

करे खोखला दीमक जैसा,

अहंकार अंगार है।

*

मात-पिता का आदर कर लो,

उनका नित सम्मान हो।

प्रेम पंथ पर नित्य चलो तुम,

धर्म कर्म संज्ञान हो।।

अहम् भाव में मत खोओ तुम,

उन्नति में व्यवधान है।

गरल पियो मत इसका सुन लो,

खो जाता सब मान है।।

अहंकार का नाम बुरा है ,

जीवन होता भार है।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२० ☆ भावना के दोहे – अवसाद ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – अवसाद)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२० – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – अवसाद ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कठिन राह में आपको,आया सूरज  याद।

क्लेश मिटेंगे आपके, पूरी हर मुराद।।

 *

लगी  तपन तो धूप की, बरस रहे अंगार।

छाँव नहीं है तनिक भी, बढ़े ताप का ज्वार ।।

 *

बयार चले बैसाख की, झुलस रहे हरियाल।

तेज धूप के पाँव है,बुरा हो रहा हाल।।

 *

तेरे तेवर देखकर, कैसे करें संवाद।

मन की बातें रह गई,अधरों के अवसाद।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०२ ☆ गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०२ ☆

गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है☆ श्री संतोष नेमा ☆

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

द्वार   मृत्यु   के  ही  आना  है ||

साथ  सदा   यह  देह  न  देगी |

मिट्टी  में  सब   मिल  जाना है ||

*

चार   दिनों का जीवन फ़ानी |

करी   खूब   सबने   मनमानी ||

चला  जोर ना यहाँ किसी का |

द्वार   ईश   के   भरते   पानी ||

जीवन  मिथ्या  मृत्यु  सत्य  है |

गीत   सदा   ही  यह  गाना  है ||

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

*

सबने   स्वयं   अहम   हैं  पाले |

लालच   ईर्ष्या   के    रखवाले ||

रखें  होड़ बस  इक   दूजे   से |

भूल   गए  सच   ये   मतवाले ||

इन्हें    कौन   समझाए   भाई |

झूठा   सब   ताना – बाना   है  ||

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

*

ईश्वर      ने     इंसान    बनाया |

हमने    ईश्वर   को    बिसराया ||

भेदभाव    की  खोद   खाइयाँ|

मानवता   का   खून    बहाया||

जाति – धर्म  में  बँटकर  हमने |

नहीं  स्वयं   को   पहचाना   है ||

इक  दिन  सबको  ही  जाना है |

*

परमेश्वर    के   अंश    हमी  हैं |

दूर   दृष्टि   की   सिर्फ  कमी हैं ||

इष्ट  कृपा  को   कभी  न   भूलें |

जिसके कारण  साँस   थमी  हैं ||

शुभ  ‘संतोष’  यही  जीवन  का |

ध्येय    सुपावन   अपनाना    है |

इक  दिन  सबको  ही  जाना  है |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ज़िम्मेदारियाँ… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ ज़िम्मेदारियाँ… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

 

दोस्त ने कहा

इक कविता सुनाओ

मैने कहा

याद नही

रुक जाओ

मोबाईल से पुछता हूँ

उसे सब याद रहता है

मैने मोबाईल निकालकर

मोबाईल के गाल पर

कुछ उंगलियां

आहिस्ता फेर दी

कुछ पल में

उसने मेरी पुरी कविता

मेरे सामने ला के रखी

मै समझ नहीं पाया

बुद्धिमान मै हूँ

या वो है

 

पहले मै

सबकुछ याद रखता था

जबसे वो 

मेरे साथ आया है

मै अपनी ज़िम्मेदारियाँ

भूलने लगा हूँ 

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सीता ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  सीता।)

? कविता – सीता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(कुंडलिया)

?

-1-

सीता की पाते कृपा, जो लेते श्री नाम l

राम प्रिया हैं जानकी, जपलो सीता राम ll

जपलो सीता राम, यही  त्रैलोक्य स्वामिनी l

करते अर्पण प्राण, कहे हैं जगत भामिनी ll

कहे मंजिरी आज, तरेगी भव से नैया l

दया सिंधु श्री राम, खिवैया सीता मैयाll

-2-

सीता मैया सह चली,मर्यादा श्री राम l

मर्यादाओं को निभा, बहुत कठिन था काम ll

बहुत कठिन था काम, पति के पीछे चलतीं l

सहती कंटक राह, घटाएँ घिरती रहतीं ll

कहे मंजिरी आज, बनी थीं वो खेवैया l

लक्ष्मी का अवतार, वही थीं सीता मैया ll

-3-

धरती से उत्पन्न थीं, जनक बनी अभिमान l

जीवन भर दुख ही सहा, अंत हुआ अपमान ll

अंत हुआ अपमान, अवध शर्मिंदा होगी l

सीता को कर याद, आज भी निंदा होगी ll

कहे मंजिरी आज, जोश सीता जी भरती l

अनुपम प्रेम मिसाल, मातु ये निकली धरती ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समय ? ?

जब तक तुम्हारा था,

तुमने अपना

जाना ही नहीं,

अब चाहते हो

वही सरस अभिव्यक्ति,

अतीत हो चुकी

उष्मा की पुनरानुभूति,

सुनो साथी !

यह मेरी

अहंमन्यता नहीं,

विवशता है,

मैं समय हूँ,

विस्मृत भर हो सकता हूँ,

लौट सकता नहीं..!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 1:55 बजे, 18 मार्च 2024)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९१ – नवगीत – मकड़ी का जाल… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मकड़ी का जाल

? रचना संसार # ९१ – गीत – मकड़ी का जाल…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

जाल मकड़ी का बुना है,

खो गयी संवेदनाएँ।

द्वेष के फूटे पटाखे,

जल रहीं हैं नित चिताएँ।।

*

कर रहे क्रंदन सितारे,

चाँद भी खामोश रहता।

हर तरफ छाया तिमिर की,

अब नहीं कुछ होश रहता।।

आपदा की बलि चढ़े सब,

चल रहीं पागल हवाएँ।

*

शोक घर -घर हो रहा है,

मौत की छाया पड़ी है।

आँधियाँ सुनती नहीं कुछ,

झोपड़ी सहमी खड़ी है।।

छा रही है बस  निराशा,

टूटती सारी लताएँ।

*

भूलती चिड़िया चहकना,

साँस बिखरी कह रहीं अब,

कौन सुरक्षित इस जग में,

पीर अँखियाँ सह रहीं सब

संत्रासों की माया है ,

छा गईं काली घटाएँ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१९ ☆ भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

संकट भारी आ पड़ा, धरा बचा लो आज।

मानव प्रकृति सहेजना, फिर शोभित सब काज।।

 *

बहुत बढ़ी अवहेलना, जगत हुआ है त्रस्त।

नर जीवन अनमोल है, इसे न करना पस्त।।

 *

होती फिर बंजर धरा, पर्वत जंगल नाश।

आने वाली पीढ़ियाँ, फिर ढोएँगी पाश।।

 *

नजर जहाँ भी जा रही, बहुधा प्लास्टिक ढेर।

रोक सको तो रोक लो, क्यों? करते हो देर।।

 

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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