हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – स्पंदन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – स्पंदन ? ?

उसने

अपने ह्रदय का स्पंदन

घोषित कर रखा है मुझे,

और

बावरी मुझसे ही कहती है,

जानते हो,

तुम्हारा ख़्याल आने भर से

मेरी धड़कनें बढ़ जाती हैं! 

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “”तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!!” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!! ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

(हिंदी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम पर एक कविता लिखने के मेरे प्रयास का पठन और समीक्षा कीजिये – मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग)

अकस्मात

आना उसका,

इतराते हुए

ईमान को झकझोरनते हुए

उसका वो

ऊंची आकांक्षाओं में खेलना

ऋषभ(श्रेष्ठ) का बिंब बनकर उभरना

एतबार को झुठलाते हुए

ऐसी विवशता में डालते हुए

ओस की शीतलता में सराबोर

औचित्य को चुनौती देती

अंक में भर के अनुराग लिये

अ: को विभेदन अत: से करती

कब अवतरित हुई

खनकती ध्वनि के संग

गरज के न बरसती

घटा बन के घिर आई

चपल हिरनी की तरह

छल से आग्रह करतीं

जब सामने हो साक्षात ही

झरती धारा के रूप में

टपकती बूंद बनकर

ठहर जाती हो हृदय की पाती पर

डालकर पहरा नज़रों का

ढाल दी है कोई मूरत साक्ष्य की

तब भी थकती न थी कोई प्रतीक्षा

दसों अरमान लिए

धड़कनों की ज़ुबाँ को झुठलाती

नूर बनके इस चांदनी में

प्रणय को स्वीकारना

फूलों के इस चमन में

बहार हो, ठहरो ज़रा

भंवरे को रिझाती

मुझे तरसाती

ये तुम ही थीं

रातों की स्याही में

लौ बनकर जुनून की

वन जैसी निस्तब्धता में

शीशे से मेरे दिल को

षोडश (सोलह) श्रृंगार से चूर करतीं

सदा देकर मुझे

हद से गुज़रने को  उकसाती

क्षितिज पर बना

त्रिकाल (भूत,वर्तमान, भविष्य) का

ज्ञानसागर की “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६४ ☆ # “सीने मे आग है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता सीने मे आग है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६४ ☆

☆ # “सीने मे आग है…” # ☆

सीने में आग है

आंखों में शोले है

कलम ने बगावत की

शब्द बारूद के गोले है

 

शब्द चुभो रहे हैं खंजर

जो बन गए हैं बंजर

उन मुर्दा इंसानों के

दिल के दरवाजे खोले हैं

 

जो गूंगे बहरे थे

जिस्म के जख्म गहरे थे

वह तड़प के जाग उठे

वह चिल्ला के धावा बोले है

 

जब हाथों में हाथ मिले

संघर्षों में साथ मिले

उनके हुंकारों को सुनकर

सिंहासन डोले है

 

वनों को काट दिया

सरमायेदारों में बांट दिया

निहत्थों ने कुल्हाड़ी उठाई तो

बोले यह कहां अब भोले हैं

 

शरीर पर लंगोटी है

कैसी किस्मत खोटी है

भूख के फाके हैं

अस्मत बाजार में तोले हैं

 

हर गरीब की यही कहानी है

आंखों से बहता पानी है

सैलाब ना आ जाए कहीं

टूट रहे बांधों के ताले हैं

 

झूठ की कश्ती पर

पाखंड की थामे पतवार

गंगा में डुबकी लगाकर

कहते हैं पाप धोले हैं/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०७ – तेरा बलिदान सरहद पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘तेरा बलिदान सरहद पर।)

☆ अभिव्यक्ति # १०७ ☆ तेरा बलिदान सरहद पर☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

सजा दो गांव की गलियां, वो मेरा लाल आया है,

लिपट कर वो तिरंगे से, तिरंगा साथ लाया है।

बता दो सबकी आंखों को, कोई नम आंख न होए,

रखी है लाज बेटे ने, मां का सर उठाया है।

*

चिता को अग्नि देने को, हजारों बेटे आए हैं,

गया था जब, अकेला था, हजारों साथ लाया है।

सजाई है चिता उसकी, बिखेरे पुष्प देवों ने,

किया स्वागत, है अभिनंदन, यही सौगात लाया है।

*

सदा कहता था, है कर्जा, मुझ पर मातृ भूमि का,

नहीं रखा, कोई कर्जा, चुका कर ही वो आया है।

सुनाता था, कई किस्से, वो जब भी गांव आता था,

सभी किस्से अधूरे हैं, अधूरापन वो लाया है।

*

सहारा था मुझे तेरा, सहारा ना रहा अब तू,

सितारों से भरे नभ ने, सितारा नव सजाया है।

तेरा बलिदान सरहद पर, ना भूलेंगी कई सदियां,

हमेशा याद सब करना, यही सपना सजाया है।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गूढ… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ गूढ… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

मानवतेवर देवदयेची

अखंडअविरत पाखरं असते

भूतदयेच्या ओलाव्याने

खडतर जीवन हिरवळ बनते

*

देह मानवी भाड्याचे घर

परमात्म्याला कायम जपते

जन्ममरण हे कालचक्र पण

गरगर भरभर फिरत राहते

*

आळवावरचा थेंब दवाचा

होऊन होती खूप चमकते

रविकिरणांच्या सहवासाने

त्यांचे सुध्दा भाग्य उजळते

*

दिल्या घेतल्या शब्दांनी तर

चराचरांशी जुळते नाते

वचनपूर्तीच्या आत्मसुखाला

ऐश्वर्याचे कोंदण मिळते

*

काय कमावले काय हरवले

स्वार्थी मन हे गणित करते

मोक्षा दरी उभे राहुनी

परमेशाला दान मागते

*

अवकाशाचे गूढ कळेना

कुठली शक्ती इथे नांदते

येता जाता शोधा थोडे

हेच चिरंतन विश्व सांगते

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७९ – ममता के गाँव में… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका गीत – ममता के गाँव में…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७९ ☆

☆ गीत – ममता के गाँव में… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

नेह नर्मदा कलकल बहती

शीतल अस्थि हुई हर दहती

कलकल करती लहर-लहर हँस-

श्वेत-श्याम पत्थर से कहती

कंकर को शंकर कर दूँ मैं

मेरा रहना

अमरकंटकी ठाँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

सरला तरला मेरी धारा

पग-पग मठ मंदिर गुरुद्वारा

धुनी रमाए तीर कबीरा-

बंबुलिया दस दिश गुंजारा।

बहा पसीना

लक्ष्य मिलेगा पाँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

वन-वन में भटके रघुवीर

दीन-दुखी की हर ली पीर

कान्हा पांडव का वनवास-

कहता चुके न संयम-धीर।

द्रुपद-सुता हर रक्षित

स्नेहिल दाँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

धान-कटोरा भरे बिलासा

बैलाडीला रहे न प्यासा

बमलेश्वरि-दंतेश्वरि की जय-

राम ते अधिक राम का दासा

जन-मन रमता

गौ-गौरैया-काँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ झूठ के घर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – झूठ के घर…!

☆ ॥ कविता॥ झूठ के घर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

झूठ के साम्राज्य की हुई विदाई,

सच  की जन-जन करे अगुवाई।

झूठ  के  घर पर मातम पसरा है,

सच के आँगन बज रही शहनाई।

 *

कल तक हवा बुलंदी छू रही थी,

उसन अपने किए इज्जत गँवाई।

 *

सत्ता  कभी किसी की चेरी नहीं,

कुर्सी  कब किसकी हुई लुगाई।

 *

दिन  में चुभती रवि की रश्मियाँ,

रात  में चंद्र की भाती है जुन्हाई।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – वह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – वह ? ?

इसने कहा, नेह

उसने कहा, देह

फिर कहा नेह,

फिर कहा देह,

नेह, देह..,

देह, नेह..,

कालांतर में

नेह और देह

पर्यायवाची हो गए!

वह

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३० – आशनाई… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “आशनाई“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३० ?

? आशनाई… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

क्यों आप मेरी ओर कभी झाँकते नहीं

चाहत की कीमतों को कभी आँकते नहीं

=2=

है साथ निभाने का अटल वादा हमारा

हम इश्क़ में कभी भी डींग हाँकते नहीं

=3=

हम इश्क के धागे में पिरोते हैं मुहब्बत

पर आप कभी उसमें वफ़ा टाँकते नहीं

=4=

अपना पड़ाव दिलरुबा की रहगुजर में है

हम दूसरी गलियों की धूल फाँकते नहीं

=5=

अपनी खुली क़िताब है ‘राजेश’ ज़िन्दगी

हम अपनी आशनाई  कभी ढाँकते नहीं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में  स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मन और वाणी।)

☆ कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

हो कमान जब वाणी पर तो, दे अलग पहचान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

क्यों लड़ना है प्यारे तुझको, जीवन क्षणभंगुर।

पल का भी क्या तनिक भरोसा, किस नशे में चूर।।

प्रेमभाव की बोली से ही, तेरी बढ़े शान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

शब्द चीर देते हैं मन को, गहरा लगे घाव।

बरसों के संबंध मिटाता, कुछ पलों का ताव।।

करो मौन ये वाणी जब हो, मन में घमासान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

बातें सुन मिश्री सी मीठी, मन में जगे आस।

हो अवसाद दूर जीवन से, सारा मिटे त्रास।।

त्याग करें कटुता का हम भी, दो हमे वरदान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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