हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 54 ☆ मोहे चिन्ता न होय ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय एवं प्रेरक आलेख मोहे चिन्ता न होय।  दुखों को सहर्ष स्वीकारना एवं  उस पर विजय पाना ही जीवन की सार्थकता है। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 54 ☆

☆ मोहे चिन्ता न होय ☆

 उम्र भर ग़ालिब, यही भूल करता रहा/ धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’– ‘इंसान घर बदलता है,  लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है– फिर भी परेशान रहता है, क्योंकि वह खुद को नहीं बदलता।’ यही है ज़िंदगी का सत्य व हमारे दु:खों का मूल कारण, जहां तक पहुंचने का इंसान प्रयास ही नहीं करता। वह सदैव इसी भ्रम में रहता है कि वह जो भी सोचता व करता है, केवल वही ठीक है और उसके अतिरिक्त सब गलत है और वे लोग भी दोषी हैं, अपराधी हैं, जो आत्मकेंद्रितता के कारण अपने से इतर कुछ देख ही नहीं पाते। वह चेहरे पर लगी धूल को तो साफ करना चाहता है, परंतु आईने पर दिखाई पड़ती धूल को साफ करने में व्यस्त रहता है… ग़ालिब का यह शेयर हमें हक़ीक़त से रूबरू कराता है। जब तक हम आत्मावलोकन कर, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते, हमारी भटकन पर विराम नहीं लगता। वास्तव में हम ऐसा करना ही नहीं चाहते। हमारा अहम् हम पर अंकुश लगाता है, जिसके कारण हमारी सोच पर ज़ंग लग जाता है। हम कूपमंडूक बनकर रह जाते हैं और अपने जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ति तो करना चाहते हैं, परंतु उचित राह का ज्ञान न होने के कारण अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाते। हम चेहरे की धूल को आईना साफ करके मिटाना चाहते हैं। सो! हम आजीवन आशंकाओं से घिरे रहते हैं और उसी चक्रव्यूह में फंसे, चीखते-चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि हममें आत्मविश्वास का अभाव होता है। सत्य ही है कि जिन्हें खुद पर भरोसा होता है, वे शांत रहते हैं तथा उनके हृदय में संदेह, शक़ व दुविधा का स्थान नहीं होता। वे अंतर्मन की शक्तियों को पहचान कर निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं, कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते। वास्तव में उनका व्यवहार युद्धक्षेत्र में तैनात सैनिक के समान होता है, जो सीने पर गोली खाकर शहीद होने में विश्वास रखता है और आधे रास्ते से लौट आने में भी उसकी आस्था नहीं होती।

परंतु संदेहग्रस्त इंसान सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है, सपनों के महल तोड़ता व बनाता रहता है। वह गलत दिशा में तीर चलाता रहता है। इसके निमित्त वह घर को वास्तु की दृष्टि से शुभ न मानकर, उस घर को बदलता है; नये-नये लोगों से संपर्क साधता है; रिश्तों व परिवारजनों को  नकार देता है,; मित्रों से दूरी बना लेता है… परंतु उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता। वास्तव में हमारी समस्याओं का समाधान दूसरों के पास नहीं, हमारे ही पास होता है। दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानियों को समझ तो सकता है; आपकी मन:स्थिति को अनुभव कर सकता है, परंतु उस द्वारा उचित व सही मार्गदर्शन करना कैसे करना व समस्याओं का समाधान करना कैसे संभव होगा?

रिश्ते, दोस्त, घर आदि बदलने से आपके व्यवहार व दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आता; न ही लिबास बदलने से आपकी चाल-ढाल व व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है। सो! आवश्यकता है, सोच बदलने की; नकारात्मकता को त्याग सकारात्मकता अपनाने की;  हक़ीक़त से रू-ब-रू होने की; सत्य को स्वीकारने की। जब तक हम इन्हें दिल से स्वीकार नहीं करते; हमारे कार्य-व्यवहार व जीवन-शैली में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता।

‘कुछ हंसकर बोल दो/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो’ में सुंदर व उपयोगी संदेश निहित है। जीवन में सुख-दु:ख आते-जाते रहते हैं। सो! निराशा का दामन थाम कर बैठने से उनका समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार वे समय के अनुसार विलुप्त तो हो सकते हैं, परंतु समाप्त नहीं हो सकते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध के विचार बहुत सार्थक प्रतीत होते हैं। जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम सब से हंस कर बात करें और अपनी परेशानियों को हंस कर टाल दें, क्योंकि समय निरंतर परिवर्तन- शील है। समय आने पर दिन-रात व ऋतु- परिवर्तन अवश्यंभावी है। कबीरदास जी के अनुसार ‘ऋतु आय फल होय’ अर्थात् समय आने पर ही फल की प्राप्ति होती है। लगातार भूमि में सौ घड़े जल उंडेलने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि समय से पहले व भाग्य से अधिक किसी को संसार में कुछ नहीं प्राप्त होता। इसी संदरभ में मुझे याद आ रही हैं स्वरचित मुक्तक संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं।’ इसी के साथ मैं कहना चाहूंगी, ‘ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं।’ अर्थात् समय व स्थान परिवर्तन से मन:स्थिति व मनोभाव भी बदल जाते हैं; जीवन में नई उमंग-तरंग का पदार्पण हो जाता है और ज़िंदगी से उसी रफ़्तार से पुन: दौड़ने लगती है।

चेहरा मन का आईना है, दर्पण है। जब हमारा मन प्रसन्न होता है, तो ओस की बूंदे भी हमें मोतियों सम भासती हैं और मन रूपी अश्व तीव्र गति से भागने लगते हैं। वैसे भी चंचल मन तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। परंतु इससे विपरीत स्थिति में हमें प्रकृति आंसू बहाते प्रतीत होती है; समुद्र की लहरें चीत्कार करने लगती हैं और मंदिर की घंटियों के अनहद स्वर के स्थान पर चिंघाड़ें सुनाई पड़ती हैं। इतना ही नहीं, गुलाब की महक के स्थान पर कांटो का ख्याल मन में आता है और अंतर्मन में सदैव यही प्रश्न उठता है, ‘यह सब कुछ मेरे हिस्से में क्यों? क्या है मेरा कसूर और मैंने तो कभी बुरे कर्म किए ही नहीं।’ परंतु बावरा मन भूल जाता है  कि इंसान को पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है। आखिर कौन बच पाया है…कालचक्र की गति से? भगवान राम व कृष्ण को आजीवन आपदाओं का सामना करना पड़ा। कृष्ण का जन्म जेल में हुआ, पालन ब्रज में हुआ और वे बचपन से ही जीवन-भर मुसीबतों का सामना करते रहे। राम को देखिए, विवाह के पश्चात् चौदह वर्ष का वनवास; सीता-हरण; रावण को मारने के पश्चात् अयोध्या में राम का राजतिलक, धोबी के आक्षेप करने पर सीता का त्याग; विश्वामित्र के आश्रम में आश्रय ग्रहण,; अपने बेटों को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने पर सत्य से अवगत कराना; राम की सीता से मुलाकात; अग्नि-परीक्षा और अयोध्या में पुनरागमन। पुनः अग्नि परीक्षा हेतु अनुरोध करने पर सीता का धरती में समा जाना’ क्या उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा? क्या वे आजीवन आंसू बहाते रहे? नहीं, वे तो आपदाओं को खुशी से गले से लगाते रहे। यदि आप भी खुशी से कठिनाइयों का सामना करते हो, तो ज़िंदगी कैसे गुज़र जाती है, पता ही नहीं चलता, अन्यथा हर पल जानलेवा हो जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में दूसरों के दु:ख को सदैव महसूसना चाहिए, क्योंकि यह इंसान होने का प्रमाण है। अपने दर्द का अनुभव तो हर इंसान करता है और वह जीवित कहलाता है। आइए! समस्त ऊर्जा को दु:ख निवारण में लगाएं। खुद भी हंसें और संसार के प्राणी-मात्र के प्रति संवेदनशील बनें; आत्मावलोकन कर अपने दोषों को स्वीकारें। समस्याओं में उलझें नहीं, समाधान निकालें। अहम् का त्याग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने की चेष्टा करें। गलत लोगों की संगति से बचें। केवल दु:ख में ही सिमरन न करें, सुख में भी उस सृष्टि- नियंता को भूलें नहीं… यही है दु:खों से मुक्ति पाने का मार्ग, जहां मानव अनहद-नाद में अपनी सुधबुध खोकर, अलौकिक आनंद में अवगाहन कर राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में वह प्राणी-मात्र में परमात्मा-सत्ता की झलक पाता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत में परेशानियां उसका बाल भी बांका नहीं कर पातीं। अंत में कबीरदास जी की पंक्तियों को उद्धृत कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी, ‘कबिरा चिंता क्या करे, चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करे, मोहे चिंता ना होय।’ चिंता किसी रोग का निदान नहीं है। इसलिए चिंता करना व्यर्थ है। परमात्मा हमारे हित के बारे में हम से अधिक जानता है, तो हम चिंता क्यों करें? सो! हमें उस पर अटूट विश्वास करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित में हमसे बेहतर निर्णय लेगा।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 7 ☆ पर्यावरण और हमारे दायित्व ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

`डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक समसामयिक एवं सकारात्मक आलेख  पर्यावरण और हमारे दायित्व।)

☆ किसलय की कलम से # 7 ☆

☆ पर्यावरण और हमारे दायित्व ☆

(जैव विविधता के हानि-लाभ)

पर्यावरण अर्थात वह आवरण अथवा घेरा जो हमारे चारों ओर विद्यमान हो, जिसके आँचल में रहकर हम जीवन जी रहे हैं। इसके असंतुलन से जीवजगत संकटग्रस्त होता जा रहा है। मानव जीवन का पर्यावरण से सबसे निकट का संबंध है। इसके विकास, संवर्धन व संरक्षण की महती आवश्यकता है। पर्यावरण के प्रति जनजागृति व इसके क्षरण को रोकने संबंधी प्रयासों को मूर्तरूप देना पर्यावरण दिवस का प्रमुख उद्देश्य है। आज का जीवन पृथ्वी पर लगभग चार अरब साल के जैव विविधता का परिणाम है। लगभग दस करोड़ साल पूर्व से जीवन की विकास यात्रा कुछ तेज हुई लेकिन अब मनुष्यों के कारण पर्यावरण का इतना अधिक क्षरण हो रहा है कि अगले सौ वर्ष के भीतर इस पृथ्वी ग्रह की प्रजातियाँ सबसे अधिक संख्या में विलुप्त हो जाएँगी।

पर्यावरण के अंतर्गत जल, वायु, भूमि एवं इनसे संबंधित चीजें, जीव-जंतु, सूक्ष्म जीव व पेड़-पौधे आते हैं। मनुष्य एवं पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंधों के अध्ययन से जीव परस्पर तथा पर्यावरण के साथ किस तरह व्यवहार करते हैं। वह सब कुछ ज्ञात करने हेतु जीव विज्ञान की पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) शाखा का सहारा लिया जाता है।

पर्यावरण में असंतुलन का सीधा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है। इसमें प्रकृति तथा मानव दोनों ही उत्तरदायी होते हैं। मानव द्वारा धरा पर किए जा रहे सतत निर्माणों से वनस्पतियों पर प्रभाव पड़ रहा है, जिनसे लाभकारी वनस्पतियों की कमी हो रही है। वहीं हमने यह भी पाया है कि हम जिन वनस्पतियों को पूर्णरूपेण अनुपयोगी मानकर छोड़ देते हैं, वे वनस्पतियाँ या पौधे लगातार अपना फैलाव करते रहते हैं। यही बात जीव-जंतुओं के फैलाव अथवा कमी आने पर भी होती है। यह वृद्धि अथवा ह्रास मानव के हितकारी वह हानिकारक दोनों हो सकते हैं। मानव की अनेक गतिविधियों से विषाक्त औद्योगिक कचरा नदियों को प्रदूषित करता है। जंगलों के कटने से वन्य प्राणियों के रहने के स्थान कम हो रहे हैं। जल, हवा व अनेक खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी है। हम सभी जानते हैं कि हमें प्रकृति से भोजन, औद्योगिक कच्चा माल, औषधियाँ, प्रकाश संश्लेषण द्वारा उत्पन्न ऑक्सीजन, जल संरक्षण, मृदा संरक्षण आदि का लाभ पूर्व से ही मिल रहा है। प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने से पशु-पक्षी और जंगली जीवों का पलायन होता है अथवा वे मर जाते हैं। अनेक घातक जानवर आवासीय क्षेत्रों में जन-धन की हानि पहुँचाते हैं। गाजर घास की अधिकता फसलों को नुकसान पहुँचाती है। खरगोश, चूहे, टिड्डी, दीमक, मच्छर आदि की बेपनाह वृद्धि भी हमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुँचाती है।

बढ़ती जनसंख्या, ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि का भी वनस्पतियों और जीवों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। पशु-पक्षियों में रुचि रखने वाले लोग, जैव विविधता से प्रेरित गीत, संगीत, चित्रकारी, लेखन सांस्कृतिक दृश्य, बागवानी जैसे कार्य भी पर्यावरण संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। पिछली शताब्दी से हो रहे जैव विविधता के दुष्परिणामों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि मानव पर्यावरण क्षरण हेतु स्वयं उत्तरदायी है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बतलाई जा रहीं जानकारियाँ, लाभ-हानि व जागरूकता हेतु किए  जा रहे प्रयासों को अधिकांश लोग बिल्कुल भी अहमियत नहीं देते, न ही अपना उत्तरदायित्व समझते। हमें यह भी दिखाई दे रहा है कि हम उनसे उत्पन्न कठिनाईयों का सामना भी करने लगे हैं, परंतु अपेक्षानुरूप पर्यावरण संरक्षण के वे सारे कार्य अभी भी नजर नहीं आते जो वर्तमान में किये जाना चाहिए।

आज हमें आवश्यकता है वृक्षारोपण की। खास तौर पर शहरी क्षेत्रों में आवासीय मकानों के मध्य खाली स्थानों में वृक्षारोपण की। होना तो यह चाहिए कि दोनों आवासों के बीच कम से कम 10 से 20% स्थानों में वृक्षारोपण के शासकीय निर्देश हों। नदियों व जलाशयों में प्रदूषण फैलाना पूर्णतः वर्जित हो। औद्योगिक विषैले अपशिष्ट तथा जहरीले धुएँ से बचने के पुख्ता इंतजाम हों। प्रकृति की वनस्पतियों व जीवों में आदर्श संतुलन हेतु अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का अनुकरण किया जाए। मानव को प्रकृति के निकट रहने के बहुआयामी स्रोत ढूँढे व बनाये जाएँ। बिना रासायनिक व कृत्रिमता वाले खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाए।

यदि हम उपरोक्त कार्यों से स्वस्फूर्त भाव से आगे आएँगे तो निश्चित रूप से हम पारिस्थितिकी तथा पर्यावरण संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकेंगे। यही आज इक्कीसवीं सदी की चुनौती है, जो बिना संकल्प के संभव नहीं है। इसीलिए आईये, आज से ही हम संकल्पित होकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रयास करना शुरू कर दें।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 53 ☆ संकल्प ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक विचारणीय कविता  “संकल्प ”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 53 – साहित्य निकुंज ☆

☆ संकल्प  ☆

दोहा – 

कोरोना के काल में, बढ़ी पेट की आग।

कोई नहीं है सुन रहा, भूखों का यह राग।।

 

संकल्प –

 

करो दृढ़ संकल्प

नहीं दूसरा विकल्प

मिलजुलकर सब साथ रहो

एक दूसरे से कुछ न कहो।

कोरोना  का छाया आतंक

करना होगा मिलजुलकर अंत

जैसे

देश की रक्षा के लिए

वीरों ने उठाई तलवार

सहे अनेकों वार

राष्ट्र की अनेकता में एकता

रखी बरकरार।

देश पर आए अनेकों संकट

उखाड़ फेंके अनेकों कंटक

हमें अब नहीं है डरना

कोरोना को पड़ेगा हारना

मिलकर हम सबको उसे मारना।।

यह महामारी

नहीं होगी हम पर भारी।

इरादे रखो मजबूत

करते रहो

प्रभु का स्मरण

करो न उन्हें विस्मरण

हमें

घर से करना सामना

पैर घर में  ही थामना।।

करना है संकल्प

नहीं दूसरा कोई विकल्प।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 44 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है शब्द आधारित  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 44 ☆

☆ “संतोष के दोहे ☆

 

आँचल

माँ का आँचल जगत में,देता शीतल छाँव

माँ देवी अवतार हैं, जन्नत माँ के पाँव

 

अभिसार

ऋतु बसंत में गा रहे,भंवरे भी मल्हार

कलियों का रस पान कर,चाह रहे अभिसार

 

अनुप्रास

प्रेम जगत में भावना, हुई छंद अनुप्रास

ह्रदय हिलोरे ले रहा,लगा प्रेम की आस

 

अजेय

चीन अहम से समझता,खुद को बड़ा अजेय

आये ऊँट पहाड़ तल,भारत का यह ध्येय

 

अनिकेत

सुना राम का वन गमन,दशरथ हुए अचेत

व्याकुल नगरी चल पड़ी,बहुत हुए अनिकेत

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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हिन्दी/मराठी साहित्य – लघुकथा ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #4 ☆ मराठी लघुकथा ‘पुतळा’ – हिन्दी भावानुवाद ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  

आज प्रस्तुत है  श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  की मूल मराठी  लघुकथा  ‘पुतळा’ एवं  तत्पश्चात आपके ही द्वारा इस  लघुकथा का हिंदी अनुवाद  ।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #4 ☆ 

☆ पुतळा☆

 ‘साहेब…’

‘बोल….’

‘सरकारच्या प्रत्येक योजनेबद्दल, निर्णयाबद्दल टीका करणं, हीच आपली  पक्षीय नीति आहे. होय नं?’

‘बरं.. मग … ‘

‘मग त्या दिवशी आपण मुख्यमंत्रीजींच्या नव्या घोषणेचं स्वागत कसं केलत?

‘ मी? स्वागत केलं? कसली घोषणा ? कसलं स्वागत ?’

‘तीच घोषणा … नगराच्या मधोमध नेताजींचा पुतळा उभा करायची घोषणा … त्या दिवशी आपण म्हणाला होतात, सरकारच्या सगळ्या विधायक कार्यात आमचा पक्ष सहकार्य करेल. आपल्या दृष्टीने तर सरकारचं कुठलच कार्य विधायक नसतं. मग यावेळी सहकार्याची भाषा कशी काय?

‘अरे, मुर्खा, पुतळा उभा करायचा तर देणग्या गोळा करायला नकोत? ..’

‘हां… ते आहेच.’

‘त्या कामात आपण त्यांना मदत करू .’

‘पण का?’

‘तेव्हाच मग देणगीतील काही पैसा आपल्या तिजोरीत जमा होईल नं?

‘हूं … ‘

‘पुतळा उभा केल्यानंतर कधी-ना-कधी , कुणी-ना-कुणी त्या पुतळ्याची विटंबना करेल किंवा तिथे तोडफोड करेल…’

‘पण असं झालं नाही तर…’

‘ती व्यवस्थादेखील आपण करू. मग आंदोलन होईल. लूट –मार होईल. दंगे-धोपे होतील. तेव्हा मग आपली चांदीच चांदी॰…

 

©श्रीमति उज्ज्वला केळकर

❃❃❃❃❃❃

☆  प्रतिमा ☆

(मराठी कथा – पुतळा   मूळ लेखिका – उज्ज्वला केळकर)

‘साहबजी…’

‘बोल…’

‘सरकार की हर योजना, निर्णय की आलोचना करना , यही हमारी पक्षीय नीति है. है नं?’

‘हं.. तो फिर… ‘

‘तो उस दिन आपने मुख्यमंत्रीजी की घोषणा का स्वागत कैसे किया?’

‘मै ने किया ?  कैसी घोषणा ? कैसा स्वागत ?’

‘वही … नगर के बीचों बीच उस नेताजी की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा … उस दिन आप ने कहा  था, सरकार के सभी विधायक कार्यों में हमारा पक्ष अपना सहयोग देगा. अपनी दृष्टि से तो सरकार का कोई भी कार्य विधायक हो ही नहीं सकता. तो फिर इस बार सहयोग की भाषा कैसी?

‘अरे, मूरख प्रतिमा बनानी है, तो चंदा इकठ्ठा करना ही पड़ेगा ..’

‘हां! सो तो है !’

‘इस काम में हम उन की मदद करेंगे.’

‘क्यों?’

‘तभी तो चंदे का कुछ हिस्सा अपनी तिजोरी में भी आ जाएगा नं?

‘हूं … ‘

‘प्रतिमा की स्थापना करने के बाद कभी – न – कभी , कोई –न – कोई उस की विडम्बना करेगा. उसे तोड भी सकता है.’

‘मगर ऐसा नहीं हुआ तो…’

‘तो उस की व्यवस्था भी हम करेंगे . तब आंदोलन होगा. लूट-मार होगी. दंगा-फसाद  होगा. तब तो समझो अपनी चांदी – ही – चांदी…’

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – विडंबन रचना – वाट वाकडी ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  कामगारों के जीवन पर आधारित एक विडंबन रचना “वाट वाकडी” )

☆ विजय साहित्य – विडंबन रचना – वाट वाकडी ☆

☆मुळ  गीत☆

 

गर्द सभोती रान साजणी,  तू तर चाफेकळी

काय हरवले सांग, शोधिशी त्या यमुनेच्या जळी

 

ती वनमाला ,म्हणे नृपाळा,हे तर माझे घर

पाहत बसते मी तर येथे, जललहरी सुंदर

 

रात्रीचे वनदेव पाहुनी,भुलतील रमणी तुला

तु वनराणी दिसे भुवन, या तुझिया रूपा तुला

 

अर्ध स्मित तव मंद मोहने, पसरे गालावरी

भुलले तुजला ह्रदय साजणी, ये चल माझ्या घरी

 

गीतकार  बालकवी

संगीत  जितेंद्र  अभिषेकी

नाटक संगीत मत्स्य गंधा

गायक आशालता वाफगावकर

 

☆ वाट वाकडी ☆

 

मर्द देखणे,तुझ्या सभोती, तू तर नवदेखणी

काय गवसले ,सांग षोडशे ,आवडला का कुणी ?

 

ती दचकोनी म्हणे तयाला ,अपुला रस्ता धर

करू नको तू वाट वाकडी,  वळणावर सुंदर.

 

खात्रीचे ना दिसे कुणी ग,फसवतील हे तुला

तू फुलराणी ,गंध भारली, प्राशून घेतो तुला .

 

कडाडली ती दुर्गा होऊन , प्रसाद गालावरी

पादत्राणे घेत गरजली,  जा पळ अपुल्या घरी.

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 36 ☆ लघुकथा – देवी नहीं, इंसान है वह ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक सामाजिक त्रासदी पर विमर्श करती लघुकथा  “देवी नहीं, इंसान है वह। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 36 ☆

☆  लघुकथा – देवी नहीं, इंसान है वह ☆

 

उसे देवी मत बनाओ, इंसान समझो- आजकल ये पंक्तियां  स्त्री के लिए कही जा रही हैं. हाँ खासतौर से भारतीय नारी के लिए जिसे आदर्श नारी के फ्रेम में जडकर  दीवार पर टाँग दिया जाता है, उसकी जिंदा मौत किसी को नजर नहीं आती, खुद उसे भी नहीं, क्योंकि ये तो घर – घर की बात है.

उसे भी मायके से विदा होते समय यही समझाया गया था कि पति परमेश्वर होता है, मायके की बातें ससुराल में नहीं कहना और ससुराल में तो जैसे रखा जाए, वैसे रहना.  वह भूलती नहीं थी अपने पिता की बात – डोली में जा रही हो ससुराल से अर्थी ही उठनी चाहिए. सुनने में ये बातें साठ के दशक की किसी पुरानी फिल्म के संवाद लगते हैं, पर नहीं, ये उसका  जीवन था जिसे उसने जिया. इतनी गहराई से जिया कि अपनी बीमारी में वह सब भूल गई लेकिन यह ना भूली कि पति परमेश्वर होता है. उसे ना अपने खाने – पीने की सुध थी, ना अपनी, बौराई- सी इधर – उधर घूमती  बोलती रहती – आपने खाना खाया कि नहीं ? बताओ किसी ने अभी तक इन्हें खाने के लिए नहीं पूछा, हम अभी बना देते हैं. वह सिर पीट रही थी –  हे भगवान बहुत पाप लगेगा हमें कि पति से पहले हमने खा लिया.  थोडी देर बाद वही बात दोहराती, फिर वही, वही —.

सिलसिला थमता कैसे ? वह अल्जाइमर की रोगी है.  इस रोग ने भी उसे ससुराल जाते समय दी गई सीख को भूलने नहीं दिया. शायद वह सीख नहीं, मंत्र होता था जिसे अनजाने ही स्त्रियां जीवन भर जपती रहतीं थीं.  धीरे – धीरे उसमें अपना अस्तित्व ही खत्म कर लेती थीं, अपना  खाना- पीना, सुख – दुख सब  होम . उससे मिलता क्या था उन्हें ? आईए यह भी देख लेते हैं –

वह अब घर की चहारदीवारी में कैद है, कहने को मुक्त, पर उसे कुछ पता नहीं . बूढे पति देव छुटकारा पाने के लिए निकल लेते हैं दोस्तों – यारों से मिलने.  उनके आने पर वह कोई शिकायत ना कर कभी उन्हें पुचकारती है, कभी सिर पर हाथ फेरती है, कहती है बहुत थक गए होंगे आओ पैर दबा दूँ, क्या खाओगे ? वे झिडक देते हैं – हटो, जाओ यहाँ से अपना काम करो —

अपना काम??? वह दोहराती है, इधर- उधर जाकर फिर लौटती है उसी प्यार और अपनेपन के साथ, पूछती है – थक गए होगे, पैर दबा दूँ, क्या खाओगे ——  फिर झिडकी —————-.

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 60 ☆ व्यंग्य – बकवास काम की ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर व्यंग्य “बकवास काम की ”। श्री विवेक जी का यह व्यंग्य सोशल मीडिया  के सामाजिक विसंगतियों पर पड़ रहे  प्रभावों पर एक सार्थक विमर्श है। इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्या # 60 ☆

☆ व्यंग्य  – बकवास काम की  ☆

गूगल ने हम सबको ज्ञानी बना दिया है. हर कोई इतना तो जानने समझने ही लगा है कि गूगल की सर्च बार पर उसके बोलते ही संबंधित जानकारी मोबाईल स्क्रीन पर सुलभ है. हर किसी के पास मोबाईल है ही, मतलब सारी जानकारी सबकी जेब में है . इसके चलते भले ही लोगों के भेजे में कुछ न हो, भेजा खुद घुटने में हो, पर हर अदना आदमी भी महा ज्ञानी बन बैठा है. दूसरे की सलाह हर किसी को बकवास ही लगती है. इतनी बकवास कि यदि फोन रखते ही तुरंत कहे गये सद्वाक्य, सामने वाला वह व्यक्ति जिससे फोन पर महा ज्ञान की चर्चायें चल रही थीं,  सुन ले तो हमेशा के लिये रिश्ते ही समाप्त हो जावें.

व्यंग्य पढ़ना सबको पसंद है, ऐसा इसलिये लिख रहा हूं क्योकि हर अखबार व्यंग्य छाप रहा है. संपादकीय पन्नों पर प्रमुखता से छप रहा है. व्यंग्य पढ़ कर उसके कटाक्ष पर सब मुस्कराते भी हैं, पर वह विसंगति जिस पर व्यंग्य लिखा जा रहा है, कोई सुधारना नही चाहता. उसे हम सब हास्य में उड़ा देना चाहते हैं. सब शुतुरमुर्ग की तरह समाज के उस कमजोर पक्ष को महज व्यंग्य में मजे लेने का विषय बने रहने देना चाहते हैं. रिश्वत हो, भ्रष्टाचार हो, भाई भतीजावाद हो, हार्स ट्रेडिंग हो, व्यवहार का बनावटीपन हो, ऐसी सारी विसंगतियो के प्रति समाज निरपेक्ष भाव से चुप लगाकर बैठने में ही भला समझ रहा है. ऐसे माहौल में देशप्रेम, चरित्र, धर्म, नैसर्गिक मूल्य, सम्मान जैसे सारे आदर्श उपेक्षित हैं. ट्वीट की असंपादित त्वरित संक्षेपिकायें सारे बंधन तोड़ रही हैं. एक क्लिक पर वर्जनायें स्वतः निर्वसन हो रही हैं. इसे फैशन कहा जा रहा है. ऐसे दुष्कर समय में हमारे जैसे व्यंग्यकार बकवास किये जा रहे हैं.

हर वह रोक टोक, वह हिदायत जो कभी उम्र के बहाव में या कथित प्रगतिशीलता के प्रभाव में बकवास लगती रही हैं, परिपक्वता की उम्र में किसी न किसी पड़ाव पर समझ आती हैं, और तब वह बड़ों की सारी बकवास काम की समझ आने लगने लगती है.नई पीढ़ी को पुनः वही बकवास इस या उस तरीके से दोहराकर बतलाई जाती है. कोरोना काल में तो दादी नानी की साफ सफाई की सारी पुरातन बकवास, बड़े काम की सिद्ध हो रही दिखती हैं.

हर कबीर को कभी उसके समय में लोगों ने सही नही समझा. बाद में जब किसी ने उसकी काम की बकवास को पढ़ा, समझा, गुना तो ढ़ाई आखर पर पी एच डी की उपाधियां बंटी. कबीरों के नाम पर प्रशस्तियां बांटी गईं. आज कोई पढ़े न पढ़े, समझे न समझे, समाज के पहरुये व्यंग्य साधक, हर पीढ़ी के कबीर यह काम की बकवास लिख ही रहे हैं. समय कभी मूल्यांकन अवश्य करेगा. इस  प्रत्याशा में कि यह बकवास काम की है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 25 ☆ बैन बनाम चैन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “बैन बनाम चैन”।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। सोशल मीडिया में विदेशी एप्प्स को बैन करने के सकारात्मक परिणामों के कटु सत्य पर विमर्श करती यह सार्थक रचना हमें राष्ट्रहित में उठाये कदमों हेतु प्रेरित करती है, बस समय के साथ जीवन शैली परिवर्तित करने  की आवश्यकता है।  इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 25 ☆

☆ बैन बनाम चैन ☆

चैन बना कर व्यापार को बढ़ाने की खूबी तो आजकल जोर -शोर से सिखायी जा रही है । इतनी लंबी चैन की सामने वाले का चैन ही छीन ले । बस प्रचार – प्रसार हेतु छोटे- छोटे वीडियो बना कर पोस्ट करना तो मानो परम्परा का रूप ही धारण करने लगा है। हर बात को मीडिया से जोड़कर रखने में ही लोग फैशन समझते हैं । शेयर, हैश टैग, कमेंट, मैसेज ये सब रुतबे के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म में घूमते नजर आते हैं ।

हर पीढ़ी के दिलोदिमाग पर इनकी गहरी छाप पड़ चुकी है । चार- चार लॉक डाउन बिना ऊफ किये यदि मजे से बीत गए हैं ; तो केवल डिजिटलाइजेशन की वजह से । इसकी खूबी है; कि जब मोबाइल हाथ में तो कैसे वक्त बीतता जाता है , कुछ पता ही नहीं चलता ।  जिस प्रश्न का उत्तर गूगल बाबा से पूछो तो उसके साथ – साथ बहुत से उत्तर अनोखे अंदाज में देने लगता है । यदि आप कच्चे मन के  स्वामी हुए तो बस वहीं अटक कर रह जायेंगे, यदि  छूटने हेतु थोड़ा और जोर लगाया तो यू ट्यूब के फंदे में अवश्य फसेंगे । बस यहाँ से आपको भगवान भी नहीं बचा सकते क्योंकि यहाँ आध्यात्म से  जुड़े हुए एक से एक रोचक प्रसंग भी उपलब्ध रहते हैं ।

अब कैसे बचें ? आखिर इस सब से पेट तो भरेगा नहीं । फिर भी मनोरंजन तो जरूरी है;  सो प्रयोग करते रहें । अब जबकि कुछ एप्स पर बैन लग चुका है तो इनके यूजर बेचारे रुआसे से हो रहे हैं । मजे की बात देखिए कि इस मुद्दे पर भी दो खेमे तैयार  हैं, एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में । क्या राष्ट्रीय हितों पर ही गुटबाजी अच्छी बात है ।  इन एप्स का इतना नशा कि आप राष्ट्र की अस्मिता को भी दाँव पर लगा कर इनके प्रयोग के समर्थन में जी- जान की बाजी लगा देंगे ।

अच्छा हुआ जो बैन लगा, पता तो चला कि इस विदेशी एप तकनीकी ने किस तरह से माइंड को  बड़ी सफाई के साथ  सेट कर मास्टरमाइंड बना दिया है। सही है ; जब मानसिक युद्ध मोबाइल के मार्फ़त हो रहा है, तो बचाव भी मोबाइल के माध्यम से ही होना चाहिए । समय रहते सचेत होने से स्वदेशी एप को बढ़ावा मिलेगा व भारतीय और तकनीकी रूप से उन्नत होने का प्रयास करेंगे जिससे सुखद परिणाम अवश्य आयेंगे अतः बेचैन होने से अच्छा है ; चैन के साथ बैन का स्वागत करें ।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 34 ☆ नवगीत – भीगिए, गाइए आज गाना ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक सकारात्मक एवं भावप्रवण नवगीत  “भीगिए, गाइए आज गाना”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 34 ☆

☆ नवगीत  – भीगिए, गाइए आज गाना ☆ 

 

फिर हुआ

आज मौसम सुहाना

आ गया बारिशों का जमाना

भीगिए

गाइए आज गाना

 

गा रही हैं फुहारें

छतों पर

दर्द लिख दीजिए

सब खतों पर

 

बचपने में चले जाइएगा

बूँदों से है

रिश्ता पुराना

 

युग-यगों से

प्रतीक्षा रही है

मीत!अब आस

पूरी हुई है

 

प्रेयसी आ गई

आज मिलने

बात मन की

उसे अब बताना

 

जागिए

अब निकलिए घरों से

उड़ चलें आज

मन के परों से

 

छेड़ दी रागिनी

पंछियों ने

देखिए

पंख का फड़फड़ाना

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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