( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कितनी देर अब…“.)
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता – बिन तेरे ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३०३ – साहित्य निकुंज ☆
☆ कविता – बिन तेरे ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
(पूज्य माँ स्मृति शेष डॉ गायत्री तिवारी जी का पुण्यस्मरण)
☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक लोकेश के विचार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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लोकेश की कलम उसके मन के भावों को पढ़ रही थीl लेकिन लोकेश का मन उथल-पुथल एवं बेचैनी से खुद को अलग ही नहीं कर पा रहा थाl नतीजा यह हुआ कि उसका आलेख उथल-पुथल और बेचैनी भरा ही उतराl लेख तो लेख था,लिखा गया तो उसे कहीं न कहीं उतरना ही थाl किताब के पन्नों में उतरकर लोगों के दिल में उतरना इन लेखों की फितरत होती हैl
लोकेश ने यह लेख कब लिखा और कब किताब के पन्नों में समाया, वह स्वयं ही भूल ही गया थाl धीरे धीरे काफी समय बीत गयाl
अब लोकेश एक बड़ा साहित्यकार और दर्शन शास्त्र का प्रवक्ता बन गया थाl उसके हर शब्द, हर वाक्य एक विचार बन गए थेl ऐसे विचार जो समाज को प्रेरणा देते थेl अब लोग लोकेश की लिखी हर पंक्तियों को लोकेश के विचार मानकर उसका आदर और अनुसरण करते थेl
सभागार में आज काफी भीड़ थीl लोकेश एक से एक सुंदर विचारों का प्रतिपादन कर रहे थेl दर्शक बड़ी ही शालीनता, धैर्य और गंभीरता के साथ लोकेश की हर बात को सुन रहे थे और अपने मन में उतार रहे थेl
अचानक सभागार में शोरगुल हुआl पीछे की पंक्तियों में बैठे हुए दो युवक समूहों के मध्य आपस में किसी मुद्दे पर गरमा गरम बहस होने लगी थीl युवकों का एक समूह बड़ी ही बेबाकी और दावे के साथ कह रहा था कि ये विचार लोकेश सर के हो ही नहीं सकतेl जबकि दूसरा समूह कह रहा था कि अरे भाई! आकर अपनी आंखों से देखा तो लो ये विचार लोकेश सर की ही एक पुस्तक में छपे हुए थेl मैं कहीं अन्यत्र से कोई विचार लाकर नही रख रहा हूँl युवक बार-बार लोकेश के उस पुस्तक का नाम भी ले रहे थे जिसमें ये विचार छपे थेl
मंच से संबोधन कर रहे लोकेश को अतीत में लिखी हुई अपनी उस पुस्तक का स्मरण हो रहा थाl यह विचार वास्तव में उसी के विचार थेl लेकिन मंच पर वक्ता के रूप सम्बोधन कर रहे लोकेश यह बताने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे कि यह विचार आज मंच से मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधन कर रहे लोकेश के ही हैl अचानक लोकेश के अंतर्मन के लेखक ने उसके कानों में आकर कुछ कहा और लोकेश मंच से कुछ इस प्रकार का संबोधन करना शुरू कर दिए –
“मेरे प्यारे श्रोतागण ! मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूंl यह जरुरी नही कि लेखक की लिखी हर बात सही ही होl लेखक के लेख तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर तो लिखे जाते ही जाते हैंl उससे भी बड़ी बात यह होती है कि लेख को लिखते समय लेखन की मन:स्थिति क्या है और उसका लेखकीय अनुभव कितना बड़ा हैl आज मैं इस बड़े मंच से हाथ जोड़कर आपसे अपील करना चाहता हूं कि मेरी ही पुस्तक में लिखे हुए मेरे ही इन विचारों को, मेरा विचार न मानते हुए, इसे अपने मन से निकाल देl आपको आज, वर्तमान के लोकेश की बात को माननी है न कि अतीत के उस लोकेश के विचारों का अनुसरण करना है, उसके वय उम्र में मानसिक उथल-पुथल के बीच लिखे गए थेl”
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – शंकरचार्य पहाड़ी – भाग-१८ ☆ श्री सुरेश पटवा
शंकरचार्य पहाड़ी
मुग़ल बाग़ घूमने के बाद होटल मुग़ल दरबार में लंच हेतु गये। कश्मीरी पुलाव ने कम लगी भूख को कुछ अधिक ही बुझाया। उसके बाद डल झील को निहारते हुए शंकरचार्य पहाड़ी पर गये। श्रीनगर में ही शंकराचार्य पर्वत है जहाँ विख्यात हिन्दू धर्मसुधारक और अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक आदि शंकराचार्य सर्वज्ञानपीठ के आसन पर विराजमान हुए थे। यह मंदिर शंकराचार्य पर्वत पर स्थित है। शंकराचार्य मंदिर समुद्र तल से 1100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसे तख्त-ए-सुलेमन के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कश्मीर स्थित सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण राजा गोपादित्य ने 371 ईसा पूर्व शिव मंदिर के रूप में करवाया था। डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने मंदिर तक पंहुचने के लिए सीढ़िया बनवाई थी। इसके अलावा मंदिर की वास्तुकला भी काफी खूबसूरत है। क़रीब पाँच किलोमीटर वाहन से चलने के पश्चात 270 सीढ़ियों को हाँफते हुए चढ़कर शिव लिंग के दर्शन करने के उपरांत वह गुफा देखी जिसमें कभी आदि शंकराचार्य ने डेरा डाला, शास्त्रार्थ किया और तपस्या की थी।
भारतीय सभ्यता की शुरुआत से कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग रहा है। नीलमत पुराण, शिव पुराण और अनेकों धार्मिक साहित्य में कश्मीर भारत का हिस्सा प्रतिपादित होता है। विभाजन के समय भारत ने धर्म के आधार पर कभी भी न तो लोगों का बँटवारा माना और न ही दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मान्यता दी इसलिए अलगाववादियों द्वारा “आज़ादी-आज़ादी” का राग अलापना तर्क सम्मत नहीं है। कश्मीर कभी भी भारत से पृथक नहीं रहा। उन्हें आज़ादी की घुटी शेख़ अब्दुल्ला ने आज़ाद मुस्लिम रियासत के नाम पर पिलाई थी। जिसे एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सही नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरू का उपयोग किया था जबकि असलियत यह है कि नेहरू ने मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर को भारत में मिलाने और बनाए रखने में शेख़ अब्दुल्ला का उपयोग किया और वक्त आने पर उन्हें जेल के सीखचों में भी रखा।
जब आदि शंकराचार्य काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ कर चुके तब उनको यह बात बताई गई कि कश्मीर के श्रीनगर में शारदा पीठ है वहाँ दर्शन शास्त्र के प्रकांड़ विद्वान हैं, जब तक उनसे शास्त्रार्थ न होगा उनकी विद्वाता सिद्ध न मानी जाएगी। वे श्रीनगर पहुँचे जिस स्थान पर शास्त्रार्थ किया वह पहाड़ी आज भी शंकराचार्य हिल के नाम से जानी जाती है।
07 जुलाई 2022 को सुबह सोकर तो पाँच बजे उठ गए परंतु चाय के इंतज़ार में छै बजे तक आलस्य से पड़े रहे। सात बजे निकलना हुआ। अमरनाथ यात्रा के कारण तीन बजे के पूर्व सोनमर्ग पहुँच कर वापस निकलना होगा। इसलिए जल्दी निकले। सोनमर्ग का अर्थ सोने से बना घास का मैदान होता है। सोन का अर्थ सोना और मर्ग का मतलब वादी होता है। सुबह जब सूर्य की किरण हिमशिखरों पर पड़ती हैं तब एक सुनहरी रोशनी सम्पूर्ण वादी पर छा जाती है। इसलिए उसे सोनमर्ग कहते हैं। यह जगह श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 87 किलोमीटर दूर है। सोनमर्ग पर स्थित घाटी कश्मीर की सबसे बड़ी घाटी है। यह घाटी करीबन साठ मील लम्बी है। यहीं से कारगिल और द्रास होकर लेह की सड़क निकलती गई।
सोनमर्ग कश्मीर की एक निराली सैरगाह है। समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह एक रमणीक स्थल है। सिंध नदी के दोनों और फैले यहां के मर्ग सोने से सुंदर दिखाई देते हैं। इसीलिए इसे सोनमर्ग अर्थात सोने का मैदान कहा गया। सोनमर्ग से घुडसवारी करके थाजिवास ग्लेशियर भी देखने जा सकते हैं। वहां ग्लेशियर पर घूमने का आनंद भी लिया जा सकता है। अनंत हिमनदों के सामने खडे होकर प्रकृति की विशालता का एहसास मन में रोमांच उत्पन्न कर देता है। प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा का एक मार्ग सोनमर्ग से बालटाल होकर भी जाता है।
हमारी यात्रा के समय अमरनाथ यात्रा भी चालू है। पूरी कश्मीर घाटी के चप्पे-चप्पे पर सेना का क़ब्ज़ा है। हरेक गली, नुक्कड़, सड़क के किनारे हथियार बंद सैनिक मुस्तैद खड़े चौकसी कर रहे हैं। ज़रा सी हरकत पर सीटियों की आवाज़ें गूँजने लगती हैं। अमरनाथ यात्रा की गाड़ियाँ निकल रही हैं। गंदेरबल, लहार, कांगम पार करके मामर में आठ बजे एक पंजाब गार्डन होटल में नाश्ता करने रुके। सोनमर्ग से एक रास्ता बालटाल निकलता है जो कि सीधा अमरनाथ गुफा तक जाता है। अमरनाथ यात्रा के यात्री जम्मू तक ट्रेन या बस से पहुँचे हैं। वहाँ से कश्मीर के वाहनों में बैठकर सोनमर्ग होकर बालटाल जा रहे हैं। मामर से घाट शुरू हो गये है। पहाड़ों से बातें करते बादल मन मोह रहे हैं। हरीगलीवान, गुंड के बाद सोनमर्ग पहुँच गये। वहाँ से डोमरी और संगम होकर अमरनाथ गुफा पहुँचा जा सकता है। यह रास्ता जोजिला दर्रा से होकर गुजरता है। अमरनाथ यात्रियों ने बताया कि यह रास्ता खड़ा और थकाऊ है। इसलिए पहलगाम से गुफा पहुँचने और गुफा से बालटाल होकर श्रीनगर लौटने का रास्ता अपनाना श्रेयस्कर होता है।
टैक्सी ने हमें सोनमर्ग में छोड़ दिया। वहाँ से पहाड़ों पर चढ़ने वाली फ़ोर व्हील ड्राइव एक अन्य टैक्सी किराए पर ली। शौकत वालिद ज़लील गुंड वाले की गाड़ी JK 01L-6290 पर बैठ कर फ़िश पोईंट, बालटाल, हेलिपैड, सरबल, बालटाल घाटी, जोजिला दर्रा, इंडिया गेट, ज़ीरो पोईंट तक गये। ड्राइवर अच्छे स्वभाव का लड़का है। जोजिला दर्रा के ज़ीरो पोईंट पर बर्फ़ गिरने लगी। ठंड बहुत बढ़ गई इसलिए बर्फीले पहाड़ से तुरंत नीचे उतरना पड़ा। यहाँ से द्रास 35 किलोमीटर रह जाता है। हमने एक पिघलते ग्लेशियर पर जाकर फ़ोटो खींचे। वहीं पर अस्सी रुपयों में प्लेट गरम मैगी मिल रही थी। ठंड भी खूब लग रही थी। सुबह के नाश्ते से बचाकर रखे ठंडे पराँठे निकाले और गरमागर्म मैगी के साथ खाये।
श्रीनगर लौटते समय खीर भवानी दर्शन हेतु रुके। खीर भवानी, क्षीर भवानी या राज्ञा देवी मंदिर भवानी देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। जम्मू और कश्मीर के गान्दरबल ज़िले में तुलमुल गाँव में एक पवित्र पानी के चश्मे के ऊपर स्थित है। यह श्रीनगर से 25 किलोमीटर दूर है। पारंपरिक रूप से वसंत ऋतु में मंदिर में खीर चढ़ाया जाता था इसलिए नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। उन्हें महारज्ञा देवी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले मंदिर के कुण्ड का पानी काला पड़ जाता है। जम्मू और कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह और महाराजा हरि सिंह ने मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार में योगदान दिया है।
यह मंदिर माता रंगने देवी को समर्पित है। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि अमरनाथ यात्रियों को रुकने की व्यवस्था में मंदिर तीन बजे बंद हो चुका है। इसलिए दर्शन नहीं हो सके। प्रत्येक वर्ष जेष्ठ अष्टमी (मई-जून) के अवसर पर मंदिर में वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर काफी संख्या में लोग देवी के दर्शन के लिए विशेष रूप से आते हैं।
चट्टी पदशाही कश्मीर के प्रमुख सिख गुरूद्वारों में से एक है। सिखों के छठें गुरू कश्मीर आए थे, उस समय वह यहां कुछ समय के लिए ठहरें थे। यह गुरूद्वारा हरी पर्वत किले से बस कुछ ही दूरी पर स्थित है। उसे आज देखा। उसके बाद हज़रतबल पहुँचे। चार दिन बाद ईद का त्योहार होने से दुकानें सज रही थीं। जूते वाहन में उतारकर कर पैदल अंदर गए। यहाँ भिखारियों की भीड़ ने घेरा। किसी तरह बचते-बचाते अंदर पहुँचे।
हजरतबल जिसे लोकप्रिय रूप से दरगाह शरीफ कहा जाता है, कश्मीर में श्रीनगर के हजरतबल इलाके में स्थित है। इसमें एक अवशेष, मोई-ए- मुक़द्दस शामिल है, जिसे व्यापक रूप से इस्लामी पैगंबर मुहम्मद का बाल माना जाता है। यह श्रीनगर में डल झील के उत्तरी तट पर स्थित है, और इसे कश्मीर का सबसे पवित्र मुस्लिम तीर्थ माना जाता है।
इस दरगाह में कई मुसलमानों द्वारा इस्लामिक पैगंबर मुहम्मद के बाल होने का विश्वास किया जाता है। अवशेष को पहली बार मुहम्मद के एक कथित वंशज सैयद अब्दुल्ला मदनी ने मदीना से 1635 में लाकर दक्षिण भारतीय शहर बीजापुर में बस गए। अब्दुल्ला की मृत्यु के बाद, उनके बेटे सैयद हमीद को वह अवशेष विरासत में मिला। कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र पर मुगलों ने कब्जा कर लिया और हमीद से उसकी पारिवारिक संपत्ति छीनी जाने लगी। खुद को अवशेष की देखभाल करने में असमर्थ पाते हुए, उन्होंने इसे एक अमीर कश्मीरी व्यापारी ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई को दे दिया।
हजरतबल तीर्थ की स्थापना शुरू में ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई की बेटी इनायत बेगम द्वारा की गई थी। इमारत का पहला निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल सूबेदार सादिक खान ने बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान किया था। इसे शुरू में इशरत जहां कहा जाता था। 1634 में शाहजहाँ ने इमारत को एक प्रार्थना कक्ष में बदलने का आदेश दिया था।
जब मुगल सम्राट औरंगजेब को पवित्र अवशेष के अस्तित्व और हस्तांतरण के बारे में सूचित किया गया था, तो उन्होंने इसे जब्त कर लिया और अजमेर में सूफी फकीर मुइन अल-दीन चिश्ती की दरगाह में भेज दिया, और ईशाई को दिल्ली में कैद कर लिया।
किंवदंती है कि नौ दिनों के बाद औरंगजेब ने चार खलीफाओं अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली के साथ मुहम्मद का सपना देखा। सपने में, मुहम्मद ने उसे अजमेर से मोई-ए-मुक़द्दस को कश्मीर भेजने का आदेश दिया। तब औरंगजेब ने पवित्र अवशेष ईशाई को लौटाने और उसे कश्मीर ले जाने की अनुमति दी। हालांकि, जेल में रहते हुए ईशाई की पहले ही मौत हो चुकी थी। 1700 में अवशेष को ईशाई की बेटी इनायत बेगम के साथ कश्मीर ले जाया गया था। उसने वहां अवशेष की रखवाली कर हजरतबल तीर्थ की स्थापना की। तब से, उसके पुरुष वंशज मस्जिद में अवशेष की रखवाली कर रहे हैं। बेगम के पुरुष वंशज बंदे परिवार के नाम से जाने जाते हैं। 2019 तक, तीन मुख्य सदस्य पवित्र अवशेष की देखभाल करते हैं: मंजूर अहमद बंदे, इशाक बंदे और मोहिउद्दीन बंदे। अवशेष केवल विशेष इस्लामी अवसरों जैसे मुहम्मद और उनके चार मुख्य साथियों के जन्मदिन, पर सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है,
मोई-ए-मुक़क़दस, मुसलमानों द्वारा व्यापक रूप से मुहम्मद के बाल माने जाने वाला एक अवशेष, 27 दिसंबर 1963 को दरगाह से गायब होने की सूचना मिली थी। इसके लापता होने के बाद, सैकड़ों लोगों के साथ पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। 31 दिसंबर को, भारतीय प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पवित्र मुस्लिम अवशेष के गायब होने पर राष्ट्र को सम्बोधित किया, और संदिग्ध चोरी की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो से एक टीम को जम्मू और कश्मीर भेजा।
इस घटना के कारण भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में सांप्रदायिक तनाव और दंगे हुए, जिसके कारण भारत ने दिसंबर 1963 और फरवरी 1964 के बीच लगभग 200,000 लोगों को शरणार्थी शरण दी। अवशेष 4 जनवरी 1964 को भारतीय अधिकारियों द्वारा बरामद किया गया था। मांग की गई थी कि इसे आधिकारिक तौर पर बड़ों द्वारा पहचाना जाए। यह आरोप लगाया गया था कि राजनीतिक आकाओं ने बाल चुराया था ताकि वे बाद में इसे बहाल करने का श्रेय लेकर सत्ता में आ सकें। वर्तमान संरचना 1968 में शुरू होकर 11 साल बाद यह 1979 में बनकर तैयार हुई। इस मस्जिद को कई अन्य नामों जैसे हजरतबल, अस्सार-ए-शरीफ, मादिनात-ऊस-सेनी, दरगाह शरीफ और दरगाह आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस मस्जिद के समीप ही एक खूबसूरत बगीचा और इश्रत महल है।
आज दोपहर सोनमर्ग से वापिस लौटते वक़्त जामा मस्जिद देखी, जो कश्मीर की सबसे पुरानी और बड़ी मस्जिदों में से है। मस्जिद की वास्तुकला काफी अद्भुत है। माना जाता है कि जामा मस्जिद की नींव सुल्तान सिकंदर ने 1398 ई. में रखी थी। इस मस्जिद की लंबाई 384 फीट और चौड़ाई 38 फीट है। इस मस्जिद में तीस हजार लोग एक-साथ नमाज अदा कर सकते हैं। पुराने शहर के मध्य नौहट्टा में स्थित, जामा मस्जिद को सुल्तान सिकंदर ने 1394 ई. में बनवाया था और 1402 ई. कश्मीर में सबसे महत्वपूर्ण मस्जिदों में से एक थी। श्रीनगर में धार्मिक-राजनीतिक जीवन का एक केंद्रीय क्षेत्र है। हर शुक्रवार को मुसलमानों की भीड़ उमड़ती है, यह श्रीनगर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है।
दिन का अंतिम पड़ाव चश्मा शाही बगीचा था। चश्मे शाही या चश्मा शाही या (शाही वसंत), जिसे चश्मा शाही भी कहा जाता है, मुगल सम्राट शाहजहां के गवर्नर अली मर्दन खान द्वारा एक झरने के आसपास 1632 ईस्वी में निर्मित मुगल उद्यानों में से एक है। सम्राट के आदेशानुसार अपने ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार दारा शिकोह के लिए उपहार स्वरूप बनाया गया था। यह उद्यान भारत के श्रीनगर में डल झील के सामने राजभवन (गवर्नर हाउस) स्थित है।
चश्मे शाही मूल रूप से वसंत से अपना नाम प्राप्त करता है जिसे कश्मीर की महान महिला संत रूपा भवानी द्वारा खोजा गया था, जो कश्मीरी पंडितों के साहिब वंश से थी। रूपा भवानी का पारिवारिक नाम ‘साहिब’ था और वसंत को मूल रूप से ‘चश्मे साहिबी’ कहा जाता था। वर्षों से यह नाम भ्रष्ट हो गया और आज इस स्थान को चश्मे शाही (रॉयल स्प्रिंग) के नाम से जाना जाता है।
चश्मा शाही के पूर्व में परी महल (फेयरी पैलेस) स्थित है जहाँ दारा शिकोह ज्योतिष सीखते थे और जहाँ बाद में उनके भाई औरंगजेब ने उनकी हत्या कर दी थी। यह उद्यान 108 मीटर लंबा और 38 मीटर चौड़ा है और एक एकड़ भूमि में फैला हुआ है। यह श्रीनगर के तीन मुगल उद्यानों में सबसे छोटा उद्यान है; शालीमार उद्यान सबसे बड़ा और निशात उद्यान दूसरा सबसे बड़ा उद्यान है। तीनों उद्यान डल झील के दाहिने किनारे पर बनाए गए थे, जिसकी पृष्ठभूमि में ज़बरवान रेंज है।
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – हर खबर देता यही अख़बार है…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५२ ☆
☆ हर खबर देता यही अख़बार है… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆ “भारताची उज्ज्वल विज्ञान परंपरा” – लेखिक : श्री सुरेश सोनी – अनुवाद : डॉ. क. कृ. क्षीरसागर ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆
पुस्तक : भारताची उज्ज्वल विज्ञान – परंपरा
लेखक : सुरेश सोनी
अनुवाद : डॉ. क. कृ. क्षीरसागर
पृष्ठे : २०७
मूल्य: २००₹
विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाच्या क्षेत्रावर पाश्चिमात्त्यांची मक्तेदारी आहे असे चित्र निर्माण केले जाते. पाश्चात्त्य वैज्ञानिक स्वतःलाच विज्ञानाचे जनक म्हणवून घेतात, जणू विज्ञान क्षेत्रातील प्रकाशाचे पहिले किरण पाश्चात्त्य आकाशातच फाकले गेले आणि त्यामुळे अवघ्या विश्वाचे विकासचक्र गतिमान झाले आणि हे होत असताना पूर्वेकडील विज्ञानाचे आकाश मात्र अंधकारमय होते, अशीच भारतातील लोकांची मनोधारणा आहे. आणि या मनोधारणेला आपल्याच देशातील बुद्धिवादी व्यक्ती, संस्था आणि प्रसारमाध्यमे यांनी इतिहासाकडे दुर्लक्ष करत खतपाणी घातले. या गैरसमजामुळे आपल्या देशाला काही विज्ञानपरंपरा होती. वैज्ञानिक दृष्टी होती हेच नव्या पिढीला माहीत नाही. आणि त्यामुळेच आमचा वैज्ञानिक दृष्टि आणि वैज्ञानिक ज्ञान नाकारण्याचा प्रयत्न होतो आहे.
वास्तविक भारत फक्त धर्म आणि दर्शन क्षेत्रातच नाही, तर विज्ञान आणि तंत्रज्ञान क्षेत्रातही अग्रेसर होता. इतकेच नव्हे तर आमच्या पूर्वजांनी विज्ञान आणि अध्यात्म यांचा सुंदर समन्वयही साधला होता.
विसाव्या शतकाच्या प्रारंभी आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय, ब्रजेन्द्रनाथ सी जगदीश चंद्र बसू, रावसाहेब वझे आदी विद्वानांनी आपल्या गाढ्या अभ्यासाने सिद्ध केले होते की भारत फक्त धर्म, दर्शन क्षेत्रातच नाही तर विज्ञान व तंत्रज्ञान क्षेत्रात ही अग्रेसर होता इतकेच नाही तर आमच्या पूर्वजांनी विज्ञान व अध्यात्म यांचा समन्वय साधला होता. त्यातून निर्माण झालेल्या वैज्ञानिक दृष्टिकोनामुळे विज्ञानाचा विकास जीवसृष्टीला अनुकूल आणि मंगलदाय असावा अशी दृष्टीही प्राप्त झाली.
या आपल्या समृद्ध ठेव्याकडे लक्ष वेधले आहे सुरेश सोनी यांनी. ‘भारताची उज्ज्वल विज्ञान-परंपरा’ या पुस्तकातून भारताची ही गौरवशाली विज्ञानपरंपरा मराठी वाचकांसमोर आणण्याचे महत्त्वपूर्ण काम या ग्रंथाने होणार आहे. विद्युतशास्त्र, यंत्रविज्ञान, धातुविज्ञान, विमानविद्या, नौकाशास्त्र, वस्त्रोद्योग, गणितीशास्त्र, कालगणना, खगोलविज्ञान, स्थापत्यशास्त्र, रसायनशास्त्र, वनस्पती, कृषी, प्राणी, आरोग्य, ध्वनि इ. विषयीच्या विज्ञानात, भारतीयांनी केलेले संशोधन व मांडलेले सिद्धान्त आजही जगाला उपयुक्त आहेत. भारतीयांची विज्ञान क्षेत्रातील ही अजोड कामगिरी निश्चितच या ग्रंथातून वाचकांसमोर येईल. आणि भारतीयांना नकारात्मक भावनेतून मुक्त करण्यासाठीही या ग्रंथाचा उपयोग होईल.
विज्ञानाच्या विविध विषयांची सरळ, सोप्या भाषेतून मांडणी हे या ग्रंथाचे वैशिष्ट्य आहे.
हा ग्रंथ भारतीय ज्ञान-विज्ञानाची ओळख करून देणारा तर आहेच, शिवाय आपल्या देशाविषयीचा अभिमान जागृत करेल आणि उमलत्या नव्या पिढीला नवसंशोधनासाठी प्रेरणा देईल.
वैज्ञानिक अभ्यास व संशोधन करणारे भृगु, अत्री, भारद्वाज, नारद, वसिष्ट, गर्ग, शौनक, कणाद, शुक्र, चाक्रायण, धुंडीनाथ, नंदीश, अगस्त्य आदी ऋषी होऊन गेले त्यांनी केलेले संशोधन, विज्ञानपरंपरेची ओळख यातून करून दिली आहे. याचा मराठी अनुवाद क. कृ. क्षीरसागर यांनी केला आहे.
परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली
पालघर
मो.9619800030
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०३ ☆
☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆
‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/ ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/
ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।
रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।
‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।
भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’
सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।
दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।
महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों, नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।
संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।
काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।
वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।
तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – दहकता मन…।
रचना संसार # ७५ – गीत – दहकता मन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’