☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ३ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
गुरूदेव टागोर गीतांजलीत अनेक ठिकाणी म्हणतात की काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आणि मत्सर या षड्रिपूंचा त्याग करून त्या विश्वनियंत्याला भक्तीभावाने शरण गेल्यावरच शाश्वत सुखाची चिरशांतीची प्राप्ती होते. ऐहिक गोष्टी, ऐहिक सुखं हा भक्तीमार्गतला अडसर आहे.
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गीत : ७
My song has put off her adornments.
She has no pride of dress and decoration. Ornaments would mar our union. They would come between thee and me; their jingling would drown thy whispers.
My poet’s vanity dies in shame before thy sight. O master poet, I have sat down at thy feet. Only let me make my life simple and straight, like a flute of reed for thee to fill with music.
The child who is decked with prince’s robes and who has jewelled chains round his neck loses all pleasure in his play; his dress hampers him at every step.
In fear that it may be frayed, or stained with dust he keeps himself from the world, and is afraid even to move.
Mother, it is no gain, thy bondage of finery, if it keep one shut off from the healthful dust of the earth, if it rob one of entrance to the great fair of common human life.
☆ “१९६५ भारत – पाकिस्तान युद्धकथा” – लेखिका: सुश्री रचना बिश्त रावत – मराठी अनुवाद: श्री भगवान दातार ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆
पुस्तक : १९६५ भारत पाकिस्तान युद्धकथा
लेखिका: रचना बिश्त रावत
अनुवाद : भगवान दातार
पृष्ठ : १६८
मूल्य: २९५₹
१ सप्टेंबर १९६५… पाकिस्तानने जम्मू-काश्मीरमधील चुंब जिल्ह्यामध्ये हल्ला चढवला. शांतताप्रिय भारत देश युद्ध छेडणार नाही, अशी पाकिस्तान्यांची समजूत होती. पण ती चुकीची ठरली. त्या आक्रमणामुळे रक्तपाती युद्धाला सुरुवात झाली. हे युद्ध दुसऱ्या महायुद्धानंतरचं सर्वांत मोठं रणगाडा-युद्ध म्हणून ओळखलं गेलं, ज्यात पाकिस्तानकडील अमेरिकी पॅटन रणगाड्यांना भारतीय सैनिकांनी नामोहरम केलं.
लष्करी नोंदी आणि युद्धात सर्व जागी झालेल्या सैनिकांच्या तसंच हुतात्म्यांच्या नातेवाइकांच्या मुलाखतींच्या आधारे लेखिका रचना बिश्त यांनी हाजी पीर, असल उत्तर, फिलोरा यांसारख्या लढायांची माहिती, त्यांमधले डावपेच, अचानक उभी ठाकलेली आव्हानं आणि त्यांवर केलेली मात यांबद्दलचं विश्वासार्ह कथन या पुस्तकात केलं आहे. तसंच वीरगती प्राप्त झालेल्या सैनिकांच्या हृद्य स्मृतींना उजाळाही दिला आहे.
पॅटनचं कब्रस्तान
१९६५च्या भारत-पाकिस्तान युद्धातील रणगाडा युद्ध हे दुसऱ्या महायुद्धानंतरच्या इतिहासातलं सर्वांत मोठं रणगाडा युद्ध मानलं जातं. या भीषण युद्धात दोन्ही बाजूंनी सुमारे एक हजार रणगाडे रणांगणावर उतरवण्यात आले होते
असल उत्तर याचाच अर्थ मुंहतोड जवाब. खेमकरण भागातल्या भिकिविंड गावाजवळ रणगाड्यांचं हे घनघोर युद्ध झालं. भारतीय जवानांनी मोठ्या संख्येने काबीज केलेले पाकिस्तानचे रणगाडे रांगेत उभे केलेले होते.
रणगाड्यांची ही रांग हीच या युद्धातली सर्वांत मोठी आणि अभिमानास्पद ट्रॉफी होती. ताब्यात घेतलेल्या रणगाड्यांची संख्या १०३ होती. एवढ्या मोठ्या संख्येने पाकिस्तानी रणगाडे इथे ठेवण्यात आल्यामुळे स्थानिक रहिवाशांनी लगेच या ठिकाणाला ‘पॅटन नगर’ म्हणावयास सुरुवात केली.
युद्धानंतर फिल्म्स डिव्हिजनने यावर एक माहितीपटही चित्रित केला. काही जण याला ‘पॅटन रणगाड्यांचं कब्रिस्तानहीं’ म्हणायला लागले.
पंतप्रधान लालबहादुर शास्त्री यांनीही या स्थळाला भेट दिली. मी तर माझ्या आयुष्यात तुटलेल्या बैलगाड्यासुद्धा एवढ्या मोठ्या संख्येने पाहिल्या नाहीत, असं ते गमतीने म्हणाले.
भारतीय सैनिकांच्या अतुल्य धैर्याच्या, वीरश्रीच्या आणि शौर्याच्या कथा म्हणजेच १९६५ भारत-पाकिस्तान युद्धकथा!
परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली
पालघर
मो.9619800030
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण रचना “खनके चिड़ियों के कंगन“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२९ – खनके चिड़ियों के कंगन ☆ आचार्य भगवत दुबे
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “2025 का वर्ष: उत्सव, पुरस्कार और विदाइयों के बीच साहित्य” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९१ ☆
आलेख – 2025 का वर्ष: उत्सव, पुरस्कार और विदाइयों के बीच साहित्य श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
2025 साहित्यिक हलचलों से भरापूरा रहा। एक ओर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और नोबेल सम्मान ने साहित्य को मानवीय अधिकारों, विस्थापन और स्मृति जैसे सवालों से जोड़ते हुए नए अर्थ दिए, तो दूसरी ओर भारत में साहित्य अकादेमी पुरस्कारों, बड़े साहित्यिक संस्कृतिक उत्सवों और प्रकाशन जगत ने हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के भविष्य की संभावना के सफर में कई सोपान पार किए ।
इसी वर्ष कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों के निधन ने भी यह एहसास दिलाया कि साहित्य केवल समकालीन विमर्श नहीं, बल्कि एक दीर्घकालीन सामूहिक स्मृति है, जिसमें हर विदा एक रिक्ति छोड़ जाती है।
साहित्य का नोबेल 2025 भी बीते कई वर्षों की तरह सौंदर्यबोध से आगे बढ़कर राजनीति और नैतिकता के सवालों के बीच अपनी जगह बनाता दिखाई दिया। यह पुरस्कार उस रचनाशील व्यक्तित्व को मिला जिसकी लेखनी ने अपने समय के हिंसा ग्रस्त, विस्थापित और पहचान के संकट से जूझते समुदायों को अपनी कलम से आवाज़ दी, और भाषा ,राजनीति, स्मृति तथा न्याय जैसे प्रश्नों को कथा कला के ज़रिये तीखी लेकिन करुण दृष्टि से समाज के सम्मुख रखा। इस चयन ने यह रेखांकित किया कि विश्व साहित्य के बड़े मंच अब तथाकथित ‘मुख्यधारा’ के बजाय हाशिए की दुनिया को केंद्र में लाने का साहस दिखा रहे हैं। 2025 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार हंगरी के लेखक लास्ज़लो क्रास्ज़नाहोरकाई (László Krasznahorkai) को उनकी प्रभावशाली और दूरदर्शी गद्य शैली के लिए दिया गया है, जो सर्वनाशकारी विषयों के बीच कला की शक्ति और मानवीय भावनाओं को दर्शाती है. स्वीडिश एकेडमी ने अक्टूबर 2025 में इस पुरस्कार की घोषणा की थी.
नोबेल के साथ ही वर्ष 2025 में यूरोप, अमरीका और अन्य क्षेत्रों में आयोजित अनेक पुस्तक महोत्सवों और राइटर्स फेस्टिवलों ने भी साहित्य को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप के विरुद्ध संघर्ष से जोड़कर प्रस्तुत किया । न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वर्ल्ड वॉयसेज़ फ़ेस्टिवल 2025’ जैसे आयोजनों में कई देशों के लेखक जुटे, जहाँ कथा, कविता, संस्मरण और निबंध के माध्यम से यह बहस हुई कि डिजिटल पूँजीवाद, युद्ध, जलवायु संकट और माइग्रेशन के दौर में लेखन की ज़िम्मेदारी क्या होनी चाहिए। ऐसे आयोजनों ने यह संदेश दिया कि साहित्य आज भी सत्ता संरचनाओं के बरक्स एक आलोचनात्मक, मानवीय और विश्व नागरिक चेतना का माध्यम बन सकता है।
भारतीय संदर्भ: साहित्य अकादेमी और भाषाविविधता
भारतीय परिदृश्य में 2025 की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थागत घटना साहित्य अकादेमी द्वारा घोषित पुरस्कार रहे, जिनमें मुख्य अकादेमी पुरस्कार के साथ ‘युवा पुरस्कार’ और ‘बाल साहित्य पुरस्कार’ शामिल थे। अकादेमी ने 24 भारतीय भाषाओं में रचनाओं को सम्मानित करके यह दिखाया कि हिंदी, बंगाली, तमिल, मराठी, उर्दू जैसी बड़ी भाषाओं के साथ साथ कोंकणी, बोडो, संताली, डोगरी, राजस्थानी, मैथिली आदि भाषाओं में हो रहे सृजन को भी समान रूप से गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इससे ‘राष्ट्रीय साहित्य’ की अवधारणा, जो लंबे समय तक कुछ केंद्र भाषाओं तक सीमित मानी जाती थी, अब विविध क्षेत्रीय जातीय सांस्कृतिक परिदृश्य तक फैलती नज़र आई। जो देश की विविधता का साहित्यिक सम्मान नजर आ रहा है।
युवा पुरस्कारों के माध्यम से 23 नवोदित लेखकों को मान्यता मिली, जिनकी रचनाएँ शहर और गाँव के नए तनावों, पलायन, नौकरी ,संस्कृति, लैंगिक असमानता, पर्यावरण संकट, तकनीकी बदलाव और आध्यात्मिकता की नई खोज को केंद्र में रखती हैं। इन युवाओं की भाषा में एक तरफ़ लोक अनुभव की जड़ें हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक संदर्भों की खुली हवा भी अभिव्यक्त हो रही है। इसीलिए उनकी कविता और कथा में ‘स्थानीय’ और ‘वैश्विक’ अनुभव एक साथ संवाद करते दिखते हैं।
बाल साहित्य पुरस्कारों के ज़रिये 24 रचनाकारों को सम्मान मिला, जिन्होंने बच्चों के लिए ऐसी किताबें लिखीं जिनमें लोक कथा, विज्ञान, पर्यावरण, हास्य और मानवीय संवेदना को जोड़कर नई पीढ़ी के लिए एक जीवंत, कल्पनाशील और नैतिक रूप से संवेदनशील पाठ्य जगत तैयार किया गया।
निश्चित ही सम्मान, पुरस्कार लेखकीय ऊर्जा होते हैं। राज आश्रय से परे ढेरों संस्थान देश में कई साहित्यिक पुरस्कार आयोजन कर रहे हैं, जिनके चलते साहित्यिक समाचार सुर्खियां बनते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल की अब तक की सर्वाधिक रॉयल्टी हिंद युग्म प्रकाशन द्वारा दी गई । 2025 की हिंदी दुनिया में ये सबसे उत्साहजनक घटनाओं में से एक रही । वरिष्ठ कथाकार, कवि विनोद कुमार शुक्ल को एक ही पुस्तक पर मिली यह असाधारण रॉयल्टी, उनकी बहुचर्चित कृति ‘दीवार में खिड़की रहती थी’, जो मूलतः दशकों पहले प्रकाशित हुई थी, के नए संस्करणों की अप्रत्याशित बिक्री के परिणामस्वरूप (लगभग 30 लाख रुपये की रॉयल्टी ,करीब छह महीनों की अवधि के लिए) उन्हें प्राप्त हुई। इस घटना ने सोशल मीडिया से लेकर पत्र पत्रिकाओं तक व्यापक चर्चा छेड़ दी,क्योंकि आम धारणा यही रही है कि हिंदी में लेखक को आर्थिक रूप से सम्मानजनक प्रतिफल शायद ही कभी मिल पाता है। रॉयल्टी के विपरीत हिंदी लेखक अपने ही पैसे से किताबें प्रकाशित करवा रहे हैं।
यह रॉयल्टी हिंदी युग्म जैसे अपेक्षाकृत नए प्रकाशक द्वारा दी गई, जिसने आक्रामक मार्केटिंग, सुंदर कलेवर, उचित मूल्य निर्धारण और ऑनलाइन ,ऑफ़लाइन दोनों चैनलों का उपयोग करके एक लगभग ‘क्लासिक’ हो चुकी कृति को नए पाठक वर्ग तक पहुँचा दिया। रिपोर्टों में यह संकेत मिलता है कि कुछ ही महीनों में इस एक किताब की 80से 90 हज़ार के आसपास प्रतियाँ बिकीं, जो हिंदी के लिए इन दिनों असामान्य सा आँकड़ा है। इससे दो बातें स्पष्ट हुईं, पहली, कि यदि पारदर्शी रॉयल्टी प्रणाली और मज़बूत वितरण रणनीति अपनाई जाए तो हिंदी में भी लेखक आर्थिक रूप से सम्मानजनक स्थिति हासिल कर सकता है। दूसरी, कि पाठकों के बीच गंभीर, जटिल और कलात्मक साहित्य के लिए भी पर्याप्त जिज्ञासा और तैयार मनोवृत्ति नई पीढ़ी में भी मौजूद है।
पिछले वर्षों में विनोद शुक्ल की रॉयल्टी को लेकर पुराने प्रकाशकों से हुए विवादों और संघर्षों ने यह प्रश्न बार बार उठाया था कि हिंदी में कॉपीराइट और रॉयल्टी की व्यवस्था कितनी पारदर्शी और न्यायपूर्ण है। 2025 की यह घटना उस संघर्ष के एक सकारात्मक पड़ाव की तरह दिखी, जिसने हिंदी प्रकाशन जगत को अपने तौर तरीकों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया और युवा लेखकों को यह आश्वस्ति भी दी कि वे अपने श्रम के आर्थिक अधिकारों को लेकर मुखर हो सकते हैं।
आशा करना चाहिए कि इस घटना के दूरगामी साहित्यिक प्रभाव आगामी बरसों में देखने मिलेंगे ।
आजतक का साहित्य उत्सव: मीडिया और साहित्य का संगम
2025 में आजतक जैसे बड़े न्यूज़ चैनल द्वारा आयोजित साहित्य उत्सव ने यह दिखाया कि ‘न्यूज़ इंडस्ट्री’ और ‘लिटरेरी पब्लिक स्फ़ेयर’ के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है। इस मंच पर कथाकारों, कवियों और आलोचकों के साथ साथ टीवी एंकर, फ़िल्म निर्माता, स्टैंड अप कॉमेडियन और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर भी संवाद में शामिल हुए। इन सत्रों में राजनीति, धर्म, जाति, स्त्री विमर्श, दलित बहुजन चिंतन, पहचान की राजनीति और अभिव्यक्ति की सीमाओं पर खुलकर बातचीत हुई कभी बहस के रूप में, कभी सहज बातचीत के रूप में।
इस उत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि साहित्य को केवल ‘गंभीर’ और ‘संकुचित’ बौद्धिक दायरे से बाहर निकालकर उसे एक लोकप्रिय, टेलीविज़न फ्रेंडली रूप में देश भर के दर्शकों तक पहुँचाया गया। यहाँ राय निर्माण और ‘ट्रेंड’ बनने की प्रक्रिया लाइव टीवी और सोशल मीडिया के ज़रिये एक साथ चलती है; इसलिए यह उत्सव साहित्य के ‘माध्यमिकरण’ (mediatization) का भी उदाहरण बनता है, जहाँ रचनाकार को यह देखना पड़ता है कि उसकी बात किस तरह क्लिप, रील और वायरल अंशों में बदलेगी, और फिर भी वह अपने विचार की जटिलता और ईमानदारी को कैसे बचाए रखे।
‘विश्व रंग’ और अन्य बड़े महोत्सव: वैश्विक क्षितिज पर हिंदी
भोपाल से शुरू हुआ ‘विश्व रंग’ 2025 तक आते आते हिंदी और भारतीय भाषाओं के बड़े अंतरराष्ट्रीय साहित्य कला उत्सवों में शुमार हो चुका है। इस वर्ष के संस्करण में कविता, कहानी, नाटक, आलोचना, लोक कलाओं, चित्रकला, संगीत और सिनेमा को एक साझा मंच पर रखकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि भाषा कला और दृश्य कला के बीच की रेखाएँ कितनी तरल होती जा रही हैं। भारत के विभिन्न राज्यों के साथ साथ यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई रचनाकारों की भागीदारी ने इसे ‘वैश्विक दक्षिण’ के एक बड़े सांस्कृतिक संवाद स्थल में बदल दिया।
‘विश्व रंग’ के कई सत्र अनुवाद पर केंद्रित रहे क्योंकि हिंदी और भारतीय भाषाओं को विश्व पटल पर मज़बूत बनाने के लिए अनुवाद ही वह सेतु है, जो स्थानीय अनुभूतियों को अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचाता है। यहाँ यह चर्चा भी हुई कि अनुवाद केवल भाषा बदलाव नहीं, बल्कि सत्ता संबंधों, बाज़ार की रणनीतियों और वैचारिक चयन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। कौन सा लेखक अनूदित होगा, किस भाषा में, किस पाठक समूह के लिए, ये सब जटिल प्रश्न हैं। इसी के समानांतर देश भर में अलग अलग शहरों में होने वाले साहित्य उत्सवों और पुस्तक मेलों ने यह दिखाया कि अब साहित्यिक गतिविधियाँ केवल दिल्ली या कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि छोटे टे शहर भी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ इस परिदृश्य में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला हर वर्ष ढेरों नई किताबें और विमर्श के नए बौद्धिक आयाम लाता है। भोपाल से भी स्तरीय किताबें , तथा नियमित लेखन किया जा रहा है। और भोपाल साहित्य का मुखर स्वर बन रहा है।
लेखकों के निधन और साहित्यिक स्मृति
2025 के वर्ष में जहाँ एक ओर उत्सवों और पुरस्कारों से भरी हलचल रही, वहीं दूसरी ओर कुछ महत्त्वपूर्ण वैश्विक और भारतीय लेखकों के निधन ने साहित्य जगत को शोकाकुल भी किया। विश्व साहित्य में समलैंगिक जीवन, आधुनिकता, अकेलेपन और प्रेम के जटिल अनुभवों को सूक्ष्मता से दर्ज करने वाले अमेरिकी उपन्यासकार एडमंड व्हाइट का 85 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनकी रचनाएँ केवल व्यक्तिगत कामुकता की नहीं, बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक माहौल की गवाही भी हैं, जिसमें LGBTQ+ समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
इसी वर्ष अन्य अनेक देशों के लेखकों, समीक्षकों और अध्येताओं के निधन दर्ज हुए, जिनके नाम और कृतियाँ विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों पर ‘2025 में विदा हुए लेखक’ जैसी सूचियों के रूप में संकलित की गईं। ऐसी सूचियाँ यह याद दिलाती हैं कि समकालीन पाठक जिन किताबों को आज सामान्य मानकर पढ़ता है, उनके पीछे दशकों की साधना, संघर्ष, आर्थिक असुरक्षा और अक्सर सामाजिक अस्वीकार भी छिपा होता है। किसी लेखक का निधन केवल ‘एक व्यक्ति की मृत्यु’ नहीं, बल्कि एक विशिष्ट संवेदना जगत, एक विशिष्ट भाषा लहजे और अनुभव दृष्टि का अवसान भी होता है, जिसे केवल उसकी किताबें ही भविष्य के लिए बचाकर रख पाती हैं।
2025 में हिंदी के कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों का निधन हुआ, जिनमें भोपाल के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’जिन्होंने गीता, मेघदूत, रघुवंश जैसे ग्रंथों का हिंदी भाव अनुवाद किया, और उन्हें भारतीय भाषा परिषद के सम्मान से सम्मानित किया गया था, प्रो राम दरश मिश्र, कहानीकार राजी सेठ लखनऊ के वरिष्ठ व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्तव, गोपाल चतुर्वेदी आदि का जाना साहित्य जगत को रिक्तता का अहसास करा गया ।
2025: साहित्य की दिशा पर समेकित दृष्टि
इन सारी घटनाओं , नोबेल सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कारों, विनोद कुमार शुक्ल की रॉयल्टी, आजतक का साहित्य उत्सव, ‘विश्व रंग’ जैसे अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों और अनेक रचनाकारों के निधन को एक साथ समग्रता से देखें तो 2025 साहित्य के लिए एक द्वंद्वपूर्ण लेकिन आशाजनक वर्ष के रूप में सामने आता है। एक ओर पुरस्कार और उत्सव यह दिखाते हैं कि साहित्य अब भी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक संवाद का एक प्रमुख माध्यम है, दूसरी ओर रॉयल्टी, कॉपीराइट और मार्केटिंग से जुड़ी बहसें साफ़ करती हैं कि रचनाकार के श्रम का आर्थिक न्याय अभी अधूरा है, लेकिन उसकी दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठने लगे है।
साथ ही, वैश्विक और भारतीय मंचों पर हाशिए के समुदायों दलित, आदिवासी, स्त्री, प्रवासी, अल्पसंख्यक की आवाज़ों को बढ़ती प्रमुखता मिलना यह संकेत देता है कि भविष्य का साहित्य और अधिक बहुवचन, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक आत्म आलोचनात्मक होगा। साहित्यिक उत्सवों का ‘मीडियाकरण’ जहाँ एक जोखिम और चुनौती है, वहीं यह अवसर भी है कि लाखों लोग उन बहसों से परिचित हों, जो पहले केवल पत्रिकाओं के सीमित पाठक समूह तक पहुँचती थीं। इस अर्थ में 2025 को ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जा सकता है जिसमें साहित्य ने बाज़ार और मीडिया के दबावों के बीच भी अपने मानवीय, आलोचनात्मक और स्वप्नद्रष्टा रूप को बचाए रखने की ज़िद जारी रखी।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सदियों से हमने किया”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हथेली और तलवा…“।)
अभी अभी # ८६६ ⇒ आलेख – हथेली और तलवा श्री प्रदीप शर्मा
हाथ और पांव हमारे शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। किसी से दो दो हाथ करने के लिए अगर ईश्वर ने हमको दो हाथ दिए है, तो दो कदम चलने के लिए दो पांव भी दिए हैं।
हाथ की पांचों उंगलियों के बीच कोमल, नरम गद्दे सी हथेली स्थित है। जब भी हमारी मुट्ठी बंधती है, हमारी हथेली गर्म हो जाती है। कहा भी तो गया है, बंद मुट्ठी लाख की। वैसे भी मुट्ठी भर पैसे के लिए, जो हाथ का ही मैल है, किसी के आगे हाथ पसारना कहां की समझदारी है। ।
तलवा भी हथेली ही की तरह पांव के पंजों और एड़ियों के बीच सुरक्षित है। तलवा, पांव का सबसे कोमल स्थान है, हथेली की तरह नर्म, गर्म, और कोमल। पूरे शरीर का बोझ पांव के पंजे और एड़ियों पर ही होता है, तलवों को बड़े आराम से रखा जाता है। एड़ियां रगड़ी जाती हैं, तब जाकर काम चलता है। लोगों की एड़ियां ही फटती हैं, तलवे बड़े सुरक्षित रहते हैं।
हथेली और तलवे अपना अपना नसीब लिखाकर लाए हैं ! हथेलियां चूमी जाती हैं, और तलवे चाटे जाते हैं। हम जिसे हथेली पर रखते हैं, उसकी हथेली को प्यार से चूम भी सकते हैं। लेकिन जान हथेली पर कैसे रखी जाती है, यह एक अनबूझ पहेली है।
मैंने लोगों को हथेलियों को चूमते तो देखा है, लेकिन किसी को तलवे चाटते नहीं देखा। बच्चों की प्यारी प्यारी हथेली अक्सर मुट्ठी में बंद रहती है। कहते हैं, बच्चों की मुट्ठी में उनकी तकदीर लिखी होती है। हम जब किसी को अपना हाथ दिखाते हैं, तो वह हमारे हाथ की लकीरें पढ़कर हमारा भविष्य बताता है। ये सारी लकीरें हथेली में ही तो होती है। हथेली, हाथ ही का तो अंग है। ।
हथेली को पाम palm भी कहते हैं, और हस्त रेखा विज्ञान को पामिस्ट्री। हथेली पर पर्वत भी होते हैं, जी हां इन्हें मांउटस कहते हैं। मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और चन्द्र सब यहीं विराजमान होते हैं। हथेली और तलवों पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा भी की जाती है। विभिन्न प्रेशर पॉइंट्स को दबाकर रोगों की चिकित्सा ही एक्यूप्रेशर है।
हथेली पर सरसों नहीं जमता, यहां तक तो ठीक है। लेकिन ख़ोपरे का जमा हुआ तेल हथेली की नर्मी और गर्मी से पिघल अवश्य जाता है। इंसान कितना भी कठोर हो, पत्थर दिल हो, उसकी हथेली और तलवे कोमल ही होंगे। ।
बच्चों की नाज़ुक हथेली को अपने हाथ में ले, जब चट्टी, मट्टी खेली जाती है, तो बच्चों का खिलखिलाना शरीर और मन की पूरी थकान दूर कर देता है। उसके कोमल कोमल तलवों पर जब गुदगुदी की जाती है, घोड़ा आया, घोड़ा आया, सुनकर जब वह खुलकर हंसता है, तब एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति होती है, मानो हमारे साथ साक्षात बाल गोपाल क्रीड़ा कर रहे हों।
गुदगुदी हर उम्र में होती है, कभी मन में, कभी तन में। रात को सोते वक्त अपने तलवों की मालिश करके सोएं, नींद अच्छी आएगी। प्रातःकाल उठते ही अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ें, गर्म गर्म हाथों को आंखों पर रखें, बड़ा सुकून मिलेगा। ।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सरकारी रोटी ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५० ☆
🌻लघुकथा🌻 🫓 सरकारी रोटी 🫓
कड़कती ठंडक में कुछ भले नेताओं को आम जनता के लिए अलाव की सुविधा का ख्याल मन में आ ही जाता है। बड़े धर्मात्मा होते है। दो चार जगहों पर अलाव लगवा ही देते हैं।
नेता जी के घर के पास मैदान में अलाव लगाया गया। आते – जाते राहगीर थोड़ी देर हाथ- पैर सेकतें नजर आए।
अचानक व्हीलचेयर रिक्शा को धक्का लगाती, एक महिला जिसमें एक बुजुर्ग बैठे हुए थे, सामने बड़े कटोरे में गीला आटा मढ़ा हुआ रखा, जल्दी – जल्दी चली आ रही थीं।
बड़ी खुशी से थपोले मार चार छः रोटियाँ बनाई। हाथ पैर सेकें। शायद ठंड और भूख दोनों से राहत मिली।
सुबह-सुबह एक साथ वाला बोला – – हम तुम्हें सब कुछ बताते हैं। कल तुम्हें सरकारी रोटी मिली वो भी अलाव वाली। तुमनें बताया नहीं। घमासान लड़ाई। सरकारी अलाव वाली रोटियाँ का माजरा समझते फफक – फफक कर रो पड़े।
इससे तो अच्छा था हम पन्नी कागज जला कर ही रोटी बना लेती। कम से कम मार तो नही खाते।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५८ ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय गणित दिवस : 22 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆
प्रातः काल समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि आज देश में गणित दिवस मनाया जाता है। गणित जैसा विषय जिसको याद कर हमारे पसीने छूट जाते हैं। पाठशाला के दिनों में क्या ही हाल हुआ करता होगा?
हमारी गणित की कमजोरी का लाभ सब से अधिक हमारे करीबियों ने उठाया था। बाल्य काल में मोहल्ले के बच्चे “छुपन छुपाया” के खेल में अस्सी, नब्बे गिन कर हमेशा, हम से ही ढूंढने का कार्य करवाया करते थे। बाकी सभी बच्चे मस्ती कर कहीं छुप जाते थे।
घर में जब सर्दी के दिनों में देसी घी और मेवे से बने लड्डू (पिन्नी) बनती थी, तब हमारे बड़े भाई अपनी गणित विषय की प्रवीणता के कारण हेरा फेरी कर हमारे हिस्से से टी डी एस काट कर अपने हिस्से में रख लेते थे।
घर आए मेहमान जब भी दो रुपए देकर जाते थे, बड़े भैया तीन भाई बहन में पता नहीं कौन से फार्मूले से बांटते थे, हम सब से कम राशि प्राप्तकर्ता हुआ करते थे। हो सकता है, दो बिल्लियों में बंदरबांट वाली कहानी उन्होंने बहुत पहले पढ़ रखी होगी।
आज भी बाज़ार में 70% तक की सेल का ऑफर हो या 10%+10% की छूट के गणित को बिना समझे ठगे चले आ रहें हैं।
गणित की कमजोरी का लाभ हमारे जिगरी दोस्त भी खूब उठाते हैं। ठेले पर जब गोल गप्पे खाने जाते है, हमारे हिस्से के एक दो गोल गप्पे, मित्र डकार ही जाते हैं।
अब और अधिक नहीं बताऊंगा, लेकिन पिछले चार दशकों से धर्मपत्नी भी हमारे द्वारा उनको दी गई धन राशि को कभी जरूरत के समय मांगने पर मय सूद वसूल ही लेती हैं, वैसे इस गणित से तो हम सब ही पीड़ित हैं।