(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆
☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।
नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।
भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।
दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’
जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’
सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’
गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।
सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’
गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’
सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’
गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’
जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– असंभव तुलना …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य भँवर # १११ — असंभव तुलना —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
वह समंदर पार भ्रमणार्थ एक सुन्दर देश गया। विद्वान एवं अध्ययनशील होने से यहाँ उसने अपने देश को मिला कर एक तुलनात्मक दृष्टि रख ली। यहाँ उसे घरों के दर्शन तो हुए। उसने ध्यान से मानो एक खास बात का अध्ययन कर लिया। यहाँ के तमाम घर प्रायः एक रंग के थे। उसने सोच बना ली यहाँ की संस्कृति के तहत ऐसा हो। पर उसे याद तो आया अपने देश में इस रंग को अपशकुन माना जाता है। स्वयं यह रंग देखने पर उसके मन में आता है यह तो अपशकुन है। पर उसने इस देश में सुबह से शुरु हुए शाम तक अपने इस तुलनात्मक अध्ययन का एक तरह से मन ही मन प्रायश्चित कर लिया। वास्तव में दुनिया की विचित्रता यही है। एक ही भगवान ने पूरी दुनिया बनायी है, लेकिन देशों के हिसाब से भगवान के प्रति मान्यता और आस्था एकदम अलग — अलग है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४४ ☆ स्थितप्रज्ञ…
एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर हमारी सोसायटी के पास ही रहा करते थे। सज्जन व्यक्ति थे।अकस्मात मृत्यु हो गई। एक दिन लगभग उसी जगह एक रिक्शा खड़ा देखा तो वे सज्जन याद आए। विचार उठा कि आदमी के जाने के बाद कोई उसे कितने दिन याद रखता है? चिता को अग्नि देने के बाद परिजनों के पास थोड़ी देर रुकने का समय भी नहीं होता।
एक घटना स्मरण हो आई। एक करीबी परिचित परिवार में शोक प्रसंग था। अंतिम संस्कार के समय, मैं श्मशान में उपस्थित था। सारी प्रक्रिया चल रही थी। लकड़ियाँ लगाई जा रही थीं। साथ के दाहकुंड में कुछ युवा एक अधेड़ की देह लेकर आए थे। उन्होंने नाममात्र लकड़ियाँ लेकर अधिकांश उपलों का उपयोग किया। श्मशान का कर्मचारी समझाता रह गया, पर केवल उपलों के उपयोग से से देह के शीघ्र फुँक जाने का गणित समझा कर अग्नि देने के तुरंत बाद वे सब चलते बने।
हमें सारी तैयारी में समय लगा। दाह दिया गया। तभी साथ वाले कुंड पर दृष्टि गई तो जो दृश्य दिखा, उससे भीतर तक मन हिल गया। मानो वीभत्स और विदारक एक साथ सामने हों। उस देह का एक पाँव अधजली अवस्था में लगभग पचास अंश में ऊपर की ओर उठ गया था। अधिकांश उपलों के जल जाने के कारण देह के कुछ अन्य भाग भी दिखाई दे रहे थे।
श्मशान के कर्मचारी से सम्पर्क करने पर उसने बताया कि हर दिन ऐसे एक-दो मामले तो होते ही हैं, जिनमें परिजन तुरंत चले जाते हैं। बाद में फोन करने पर भी नहीं आते। अंतत: मृत देह का समुचित संस्कार श्मशान के कर्मचारी ही करते हैं।
लोकमान्यता है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। अपनी कविता ‘स्थितप्रज्ञ’ याद हो आई-
💥 स्थितप्रज्ञ 💥
शव को / जलाते हैं / दफनाते हैं,
शोक, विलाप / रुदन, प्रलाप,
अस्थियाँ, माँस, / लकड़ियाँ, बाँस,
बंद मुट्ठी लिए / आदमी का आना,
मुट्ठी भर होकर / आदमी का जाना,
सब देखते हैं /सब समझते हैं,
निष्ठा से / अपना काम करते हैं,
श्मशान के ये कर्मचारी
परायों की भीड़ में /अपनों से लगते हैं,
घर लौटकर /रोज़ाना की सारी भूमिकाएँ
आनंद से निभाते हैं / विवाह, उत्सव
पर्व, त्यौहार /सभी मनाते हैं
खाते हैं, पीते हैं / नाचते हैं, गाते हैं,
स्थितप्रज्ञता को भगवान,
मोक्षद्वार घोषित करते हैं,
संभवत: / ऐसे ही लोगों को,
स्थितप्रज्ञ कहते हैं..!
विश्वास हो गया कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। इस स्थितप्रज्ञता को प्रणाम !
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – ग़ज़लिका – श्रमवीर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८५ ☆
☆ ग़ज़लिका – श्रमवीर☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆
दिन भर ईंटें-माटी-गारा बिन बोले जो ढोता है।
चुप रह श्रम-सीकर में भीगे नहीं भाग्य को रोता है।।
.
उससे कोई क्या छीनेगा, नहीं जोड़ पाता जो कुछ।
रोज उगाता फसल काट खा, बेफिक्री से सोता है।।
.
कर्मवीर गीता को जीता कभी न पूजे-पढ़ता है।
रोटी-चटनी भोग लगाता, शांति न मन की खोता है।।
.
है वह पत्थर लगा नींव में उस पर बनते देवालय।
पुजे दूसरा पत्थर विग्रह बन जो निष्क्रिय होता है।।
.
सार्थक किसका जन्म सोचिए, जो सक्रिय या जो निष्क्रिय?
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (13 जुलाई से 19 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। महर्षि वाल्मीकि को विश्व का पहला कवि माना जाता है और उनके द्वारा रचित रामायण विश्व का पहला महाकाव्य है। इस महाकाव्य में श्री रामचंद्र जी के पूरे जीवन चरित्र का वर्णन है और हमारे श्री हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के सबसे बड़े भक्त हैं। श्री हनुमान जी के अंदर हमारे सभी मनोरथ अर्थात मन की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने की क्षमता है। श्री हनुमान जी की भक्ति का सबसे बड़ा साधन श्री हनुमान चालीसा का पाठ है जिसकी आज की चौपाई है :-
और मनोरथ जो कोई लावै |
सोई अमित जीवन फल पावै ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से जातक के सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और उसकी कीर्ति हर तरफ फैलेगी।
नासे रोग हरे सब पीरा नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 13 जुलाई से 19 जुलाई 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।
इस सप्ताह मंगल वृष राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि मीन राशि में, बुध मिथुन राशि में बक्री, शुक्र सिंह राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।
प्रारंभ में सूर्य मिथुन राशि में रहेगा तथा 17 तारीख के 11:00 बजे दिन से कर्क राशि में प्रवेश करेगा।
आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों के साथ अच्छा संबंध रहेगा। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होने की पूरी संभावना है। इस सप्ताह आपको कचहरी के कार्यों में सावधान रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद प्राप्त हो सकती है। पैसे के मामले में सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख कार्यों के संपन्न करने के लिए शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। 15 और 16 तारीख को आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का सुंदर योग है भाई बहनों के साथ अच्छे संबंध रहेंगे आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए आपको अपने स्वास्थ्य के प्रति इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपको भाग्य से ज्यादा अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 जुलाई लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आपका दिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग है। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आप अपने दुश्मनों को आसानी से पराजित कर सकते हैं। भाग्य के स्थान पर कर्म पर आपको विश्वास करना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों को अपने कार्य के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपना आत्मविश्वास कायम रखने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 19 जुलाई शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कर्क राशि
जैसा कि मैं पहले से कहता आ रहा हूं यह वर्ष आपके लिए अच्छा रहेगा। आपका मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपको प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। धन आने की उम्मीद की जा सकती है परंतु बहुत कम मात्रा में धन आएगा। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 जुलाई विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। 13 और 14 जुलाई को आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपको कचहरी के कार्यों में विजय प्राप्त हो सकती है, परंतु आपको बड़े सावधानीपूर्वक कार्य करना होगा। इस सप्ताह आपके पास धन लाभ होगा। व्यापारियों का व्यापार उत्तम चलेगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह बहुत सावधान रहना चाहिए। आपको अपने संतान से उत्तम सहयोग प्राप्त होगा। परीक्षाओं में छात्रों को सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 तारीख विभिन्न प्रकार से सफलता दायक है। 15 और 16 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन सफेद चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपका या आपके जीवन साथी में से किसी एक के गर्दन या कमर में दर्द हो सकता है। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। भाग्य के स्थान पर आपको कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 19 जुलाई फलदायक हैं। 17 और 18 तारीख को आप सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
तुला राशि
कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह उत्तम है। उनको अपने कार्यालय में सम्मान प्राप्त होगा। भाग्य से भी इस सप्ताह आपको मदद मिल सकती है। अल्प मात्रा में धन प्राप्त हो सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े अच्छे और थोड़े खराब हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मदद प्राप्त नहीं होगी। संतान को कष्ट भी हो सकता है। थोड़ा सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। 15 और 16 तारीख को ही अधिकारी और कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सम्मान प्राप्त हो सकता है। 19 तारीख को कोई भी कार्य करते समय आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
वृश्चिक राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका पूर्ण रूप से साथ देगा। भाग्य के कारण आपके कई कार्य आसानी से हो जाएंगे। आपको चाहिए कि आप अपने लंबित कार्यों को इस सप्ताह करने का प्रयास करें। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। जीवनसाथी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 तारीख है परिणाम मूलक है। 13 और 14 तारीख को आपको होशियार होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आपके कई कार्य अपने आत्मविश्वास के कारण ही संपन्न हो जाएंगे। लंबी यात्रा का योग भी बन सकता है। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से ज्यादा अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। भाग्य से आपको मामूली मदद ही मिल पाएगा। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए 13, 14 और 19 तारीख उपयुक्त हैं। आपको 15 और 16 तारीख को सजग रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए उत्तम रहेगा। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे, परंतु उनको समाप्त करने के लिए आपको बहुत ज्यादा प्रयास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए प्रभावशाली हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कुंभ राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। नए-नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान का सहयोग प्राप्त होगा। परीक्षाओं में छात्रों को सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। धन आने का मामूली योग है। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 जुलाई लाभदायक है। 15 और 16 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र की तीन माला का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों को परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। आपके शत्रु इस सप्ताह आपको थोड़ा परेशान कर सकते हैं। उनसे आपको सतर्क रहना चाहिए और उनको परास्त करने का प्रयास भी करना चाहिए। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक है। भाग्य से आपको मामूली मदद मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 19 तारीख कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। 17 और 18 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। 17 और 18 तारीख को विशेष रूप से आपको अपने शत्रुओं के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। पुलिस तैनात हो गयी और आम जनता का रास्ता बंद कर दिया गया। हर अधिकारी मुआयना करने आया। क्या सिविल, क्या पुलिस के अधिकारी ! सब आते रहे, मुआयना करते रहे।
आखिर सीआईडी विभाग के उच्चाधिकारी ने कहा कि जिस कुर्सी पर मुख्यमंत्री को बैठना है, वह कुर्सी ठीक नहीं। इसे तुरंत बदलो। यह हमारे उच्चाधिकारियों का आदेश है।
हम वहां सारी तैयारियां कर चुके थे। अब कुर्सी में क्या खोट निकल आया?
हमने मज़ाक मज़ाक में पूछा -फिर यह भी बता दीजिये कि कौन सी कुर्सी लायें? तीन महीने वाली या पांच साल चलने वाली?
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४० ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
बेलखेड़ी से गंगई 07 नवम्बर.2019
सुबह एक-एक गिलास दूध पीकर आठ बजे बेलखेड़ी गाँव से नर्मदा की गोदी में उतर कर चल पड़े। रास्ता बड़ा कठिन था, किसानों ने खेतों को गोड़ दिया है या फ़सल बोकर स्प्रिंकलर चलने के कारण रास्ते पर कीचड़ हो जाने से जूतों में दो-दो किलो मिट्टी चिपकने से चलना दूभर था। बड़ी मुश्किल से रुक-रुक कर चलते रहे। नर्मदा के अति सुंदर नज़ारे आँखों और मोबाईल में क़ैद होने लगे। क़रीबन तीन बजे धुरन्धर बाबा के आश्रम में पहुँचे। धुरन्धर बाबा बिहार से आकर नर्मदा के किनारे एक पहाड़ी पर आश्रम बनाकर रहने लगे हैं। गाँजे की पत्ती और चाय उनका भोजन है। एक बार सरकारी आबकारी विभाग ने धुरन्धर बाबा को गाँजे के पौधे साक्ष्य स्वरुप लेकर नरसिंहपुर कलेक्टर के सामने पेश किया। धुरन्धर बाबा ने दलील दी कि गाँजे की पत्तियाँ मेरा भोजन है, नहीं खाऊँगा तो मर जाऊँगा और हत्या का आरोप आपके माथे पर आएगा। कलेक्टर साहब ने आबकारी अधिकारी को धुरन्धर बाबा की पेशकारी पर डाँट पिलाई। उस दिन के बाद धुरन्धर बाबा निर्विघ्न गाँजे की खेती करके पत्तियों के भोजन और चाय सेवन से ज़िंदा हैं। उनके बाल दस फ़ुट लम्बे हैं, बाबा का कहना है कि जिन लड़कियों या औरतों को केश की लम्बाई बढ़ानी है वे गाँजे की पत्तियों का नियमित सेवन करें। बाबा मज़बूत पाए के काऊच पर आसन जमाए गाँजा रगड़ते और बाँटते हैं उनके पास आठ-दस कुत्ते पले हैं जिनको भी गाँजे के धुएँ और पत्तियों के सेवन की आदत पड़ गई है। पहले हमारा साबका उनके एक धूर्त सेवक से हुआ, जो खींसे निपोरकर किसी भी बात का मुंडी हिलाकर जबाव देता था। पहले बोला आश्रम में दाल-चावल भर हैं। रात में केवल दाल-चावल खाने से रात में बार-बार पेशाब से नींद टूटती है और अच्छी नींद नहीं होने से शरीर टूटने लगता है जबकि हमें रोज़ दस किलोमीटर चलना होता है। हम अरुण भाई के साथ गाँव से आलू, भटे और टमाटर ख़रीद लाए तो वह बोला आपही बना लो, जब धुरन्धर बाबा को पता चला तो उन्होंने स्वयं सब्ज़ी और आठ चपाती के बराबर एक 10-12 मिलीमीटर मोटाई का एक-एक टिक्क बनाकर परसा जिसे मुश्किल से खपा पाए।
परिक्रमा के दौरान एक बात पता चली कि संगीन अपराधी बाबा का चोला रखकर परिक्रमा करते रहते हैं। कोई भी परिक्रमा वासी सात दिन एक आश्रम में खाने, पीने और रहने की सहूलियत पा सकता है। वह हर सात दिन में जगह बदलकर पुलिस को चकमा देते रह सकता है, वैसे भी एक थाना क्षेत्र की पुलिस दूसरे क्षेत्र में दख़लंदाज़ी नहीं करती है। एक अनुमान के अनुसार तीन-चार हज़ार से अधिक आश्रम नर्मदा किनारे हैं, जहाँ अपराधी शरण पाते रह सकते हैं। साधु सन्यास लेते समय नाम बदल लेते हैं, तो वे लोग भी नाम बदल लेते हैं। उनसे नाम पता पूछो तो घुमा फिराकर इधर उधर की बात से भरमा देते हैं जैसे :-
नाम न पूछो साधु का पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।
सुबह-शाम धुरन्धर बाबा के शिष्य नियम से गाँजे की चिलम खींचने आते हैं। दरबार में काऊच पर बाबा के आसन के सामने लम्बी चौड़ी दरी पर शिष्यों का चिलम का दौर रामचरितमानस के किष्किन्धा कांड और सुंदर काण्ड के प्रवचन की सी डी पर चलता रहता है।
जबलपुर-इटारसी रेल खंड स्टेशनों की दूरी नर्मदा किनारों से दस से बीस किलोमीटर है। मुख्य सड़क भी कमोवेश उतनी ही दूरी पर है इसलिए वायु, जल प्रदूषण नहीं है, पेड़ों और गन्ने के खेतों की सघन हरियाली से सूर्य की किरणें ज़मीन में जज़्ब होने से वातावरण गर्म नहीं होता है। जबकि शहरों के कांकरीट जंगल भट्टी की तरह झुलसते हैं। अनाज सागभाजी और भरपूर दूध दही मक्खन सेवन से लोग मेहनतकश और स्वस्थ रहते हैं जबकि शहरों में विलासिता पूर्ण जीवन के आदी लोग दवाइयों के भरोसे ज़िंदा रहने के अभ्यासी हो गए हैं। गांधी जी का ग्रामीण परिवेश को स्वावलम्बी बनाने का उद्देश्य था कि स्थानीय कुशल कारीगर ज़रूरत की चीज़ें स्थानीय स्तर पर पैदा करें लेकिन निज़ाम ने उन्हे शहरी कारख़ानों का उपभोक्ता बना छोड़ा है। गांधी जी के सिद्धांत पर भूटान आर्थिक नीतियों को अमल में लाकर ख़ुशहाली इण्डेक्स में पहली पाँच श्रेणी में स्थान पाता है। भारत में शहर प्रदूषण के अड्डे बन गए हैं। गाँव के मेहनतकश लोग सुबह और शाम दो बार भोजन करते हैं जबकि उन्हें दिन भर ऊर्जा हेतु ग्लूकोज़ की दरकार होती है। नरसिंहपुर जिले में सर्वाधिक फ़सल गन्ने की होती है इसलिए चाय-दूध में बहुत अधिक शक्कर डालने का रिवाज बन गया है ताकि उनकी ग्लूकोज़ की भरपाई होती रहे। खेती में मशीनीकरण के कारण समृद्ध किसान डायबिटीज़ और हृदय रोग के शिकार होना शुरू हो गए हैं। धुरन्धर बाबा के आश्रम में तार पर सूखने डाले, चड्डी और बानियान छूट गए और बेलखेड़ी में चार्जर जल गया, जबलपुर से अविनाश दवे आगे साँकल घाट पर यात्रा में जुड़ने वाले थे अतः दोनों चीजें लाने हेतु उन्हें फ़ोन कर दिया।
गंगई से ब्रह्म कुण्ड 08 नवम्बर 2019
हमारी परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की लालसा से नहीं की जा रही है अपितु हिंदू जिज्ञासुओं की एक सांस्कृतिक परिक्रमा है जिसका उद्देश्य परिक्रमा की भावना, क्षेत्र, विस्तार और लक्ष्य की सीधी जानकारी लेना है ताकि उन्हें भावी पीढ़ी के लिए संजो कर रखा जा सके।
शाहपुरा-भिटौनी के मनकेडी गाँव से दो व्यक्तियों ने आज ब्रह्मकुण्ड घाट से विधिवत अखंड परिक्रमा ऊठाई है। उनका कहना था कि बेटी का हाथ बंदर ने चबा लिया था उसे डाक्टर ठीक न कर सके नर्मदा मैया ने दर्शन देकर उसे आशीर्वाद दिया और बेटी का हाथ ठीक हो गया। दूसरे ने घरेलू वाद-विवाद से मुक्ति हेतु परिक्रमा व्रत लिया है। वे भिक्षा में सीधा लेकर भोजन बनाते हैं और अतिरिक्त सामग्री दान कर देते हैं। प्रतिदिन पाँच घर भिक्षा माँगते हैं। समान्यत: लोग पाप मुक्ति, मान्यता या स्वर्ग कामना से परिक्रमा करते है। उन्हें आस्था का संबल खींचता है। हमारे जैसे बिना किसी कामना के अमृत लाल बेगड़ जैसे बहुत कम लोग इस अत्यंत दुरुह यात्रा पर निकलते है।
कुछ साम्यवादी हिंदू पौराणिक शास्त्रों को बकवास और धर्म को जनता की अफ़ीम बताते हैं लेकिन उनके रूसी आका येरूसलम, कन्नांन, हारान को पवित्र भूमि और पुराना नियम को इतिहास बताकर ख़ुश होते हैं। यहूदियों ने अपनी किताबों और सिद्धांतों व विचारधारा से 2500 सालों बाद इज़राइल पाकर उसे सशक्त आधुनिक राष्ट्र बनाया। हिंदुओं के पुराणों में नर्मदा के जिन घाटों, ऋषि-मुनियों और आध्यात्मिक सिद्धांतों का उल्लेख है, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं उन जगहों की जानकारी लिपिबद्ध करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। ज़रा सोचिए, लोगों से तथाकथित अफ़ीम छुड़ा ली जाए तो उनके पास जीवन की विद्रुपता से निपटने हेतु सिवाय शराब और सेक्स के क्या बचेगा।
सभी धर्मों के प्राचीन ग्रंथ बड़े बेतरतीबी से लिखे या संग्रहित किए गए हैं। जिस समय वे लिखे जा रहे थे उस समय पुस्तकें लिखने की कला विकसित नहीं हुई थी। सौ या दो सौ सालों तक उनका संकलन होता रहता था फिर एक, दो, तीन या चार संगिति में सम्बंधित धर्म के विद्वान उसे अंतिम स्वरुप देते थे। बाइबिल, क़ुरान, बुध्यचर्या और गुरुग्रंथ सहित समस्त पुराण इसी तरह संकलित हुए हैं। समय-समय पर उन्हें अद्यतन किया जाता रहा है, जैसे विकीपीडिया में जो जब चाहे कुछ भी जोड़ सकता है, अतः उनमें बुद्धिगम्य तार्किकता पूर्ण संदेश ढूंढ़ना मृग मरिचिका के सिवाय कुछ नहीं है लेकिन एक बात ज़रूर सही है कि सम्बंधित धर्मों के मूलभूत सिद्धांत उन बेतरतीब शास्त्रों में आस्था पूर्वक पिरोए गए हैं इसीलिए वे ग्रंथ उनके अनुयायियों के लिए पूजनीय हैं। उनमें से काम की चीज़ लेकर बाक़ी छोड़ दीजिए।
जड़ चेतन गुण दोष मय विश्व कीन्ह करतार
संत हंस गुण पय लहहीं छोड़ वारी विकार।
हिंदुओं के 4 वेद, 18 पुराण और 108 उपनिषद 1194 में मुहम्मद गौरी से लेकर 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने तक 600 साल इस्लामिक अत्याचार से बचते-बचाते उपेक्षित रहे हालाँकि वे शास्त्र आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं सदी में देश के चार धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों, बावन स्थापित शक्तिपीठों और नर्मदा किनारे भेड़ाघाट से भंडोंच तक अनेकों ऋषि आश्रमों में सुरक्षित रखे रहे। सोमनाथ, उज्जैन, मथुरा और काशी में मंदिर-मूर्तियाँ तोड़कर ग्रंथ जलाए गए लेकिन सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच वनाच्छादित घने बियाबांन जंगलों में 1300 से अधिक किलोमीटर लम्बी नर्मदा के घाटों में सुरक्षित रहे। ऋषि-मुनि उन्हें ढोकर परिक्रमा करते श्रुति और स्मृति में ज़िंदा रखे रहे। 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में एक व्यक्ति विलियम जोंस न्यायाधीश बनकर आए, उन्होंने देखा कि हिंदुओं का न्याय भी मुस्लिम शरीयत से होता है, जिसके कारण उनके साथ अन्याय बरता जाता है। उन्होंने संस्कृत पढ़कर हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से हिंदू न्याय सिद्धांतों को जानना चाहा तो कोई उन्हें संस्कृत पढ़ाने वाला न मिला। अंत में काशी का एक ब्राह्मण माँस-मदिरा त्याग कर हिंदू पद्धति से रहने की शर्त पर उन्हें हिंदू दर्शन व धार्मिक शास्त्रों के अध्ययन कराने को तैयार हुआ। उन्होंने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। तब पश्चिमी दुनिया उन्हें पढ़कर चौंक गई। विवेकानंद ने प्रेसीडेंसी कालेज में वेदान्त का अंग्रेज़ी भाष्य उनके अनुवाद से पढ़कर शिकागो का प्रसिद्ध वक्तव्य दिया था। तथाकथित खंडित बुद्धिजीवी इन्हें बकवास मानते हैं लेकिन घरों में उन्ही पौराणिक पात्रों को घंटी बजाकर पूजते हैं।
सनातन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अमरकण्टक से नेमावर के बहाव को देवी नर्मदा की देह का ऊपर का हिस्सा माना जाता है, तदानुसार नेमावर नाभिकुंड है। नेमावर को विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मस्थान माना जाता है। इसका मतलब हुआ कि ऋषि जमदग्नि और रेणुका का आश्रम नेमावर में रहा होगा। भृगु, मार्कंडे, वशिष्ठ, कौंडिल्य, पिप्पल, कर्दम, सनत्कुमार अत्रि नचिकेता, कश्यप, कपिल जैसे अनेकों सनातन ऋषियों के आश्रम भेड़ाघाट से नेमावर के बीच रहे हैं जहाँ वेदों का पठन-पाठन, उपनिषद, अरण्यकों, ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों के साथ स्मृतियों का लेखन कार्य उन ऋषि आश्रमों में हुआ है।
आर्य-अनार्य सिद्धांत को ठीक माने तो आर्यों के आगमन के बाद से अनार्य याने असुर विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के बीच सघन जंगलों में प्रवाहित सदानीरा नर्मदा के दोनों किनारों बस गए थे। उत्तर भारत का इलाक़ा उन्होंने आर्यों के लिए छोड़ दिया था। नरसिंहपुर के नृसिंह मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति प्रह्लाद ने स्थापित की होगी। इसी क्षेत्र में हिरण्यकश्यप का राज्य था, शोणितपुर अर्थात वर्तमान सोहागपुर में प्रह्लाद के पोते बाणासुर की राजधानी थी। प्रह्लाद की एक बहन के पुत्र असुरों के गुरु शुक्राचार्य का आश्रम विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के घने वन क्षेत्र में था यहाँ की जड़ीबूटियों के रसायन से उन्होंने अमृत संजीवनी तैयार की थी जिसे अर्जित करने हेतु देवताओं के राजा इंद्र ने गुरु पुत्र कछ को भेजा था। इसी क्षेत्र में उसका प्रेम प्रसंग शुक्राचार्य पुत्री देवयानी से हुआ था। देवासुर संग्राम के पूर्व देवताओं ने ब्रह्मकुण्ड में शिव आराधना की थी। गराडू घाट पर गरूँड़ ने युद्ध काल में तपस्या की थी। नर्मदा की परिक्रमा में इन सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा हो जाती है। जयचंद विद्यालंकार के कालबद्ध पौराणिक इतिहास लेखन के बाद से पौराणिक साहित्य को हिंदुओं का ऐतिहासिक साहित्य माना जाने लगा है। नर्मदा घाटी का भेड़ाघाट से नेमावर का क्षेत्र देव-असुर संग्राम का साक्षी रहा है। स्कन्द पुराण के रचयिता वेद व्यास ने कार्तिकेय अर्थात शिवपुत्र स्कन्द के नाम पर यह यह ग्रंथ संकलित किया था। स्कन्द द्वारा तारकासुर असुर का वध का साक्षी भी यही स्थल रहा है। भगवान शिव संहार के देवता हैं। उनका पुत्र कार्तिकेय संहारक शस्त्र अथवा शक्ति के रूप में जाना जाता है। तारकासुर का वध करने के लिए ही स्कन्द का जन्म हुआ था। कार्तिक माह की ग्यारस के चमकते चाँद की गवाही में इस पौराणिक स्थान का आनंद लिया। स्कंद का एक नाम कार्तिकेय है, कार्तिक मास की पूर्णिमा को नर्मदा के दोनों तटों के हज़ारों घाटों पर भरने वाले मेलों में करोड़ों लोग डुबकी लगाकर पुण्य सहेजते हैं।
हमारी पग-पग यात्रा नर्मदा की कल-कल संगीतमयी सरगम की धुनों पर परवान चढ़ रही थी, धुरन्धर बाबा के आश्रम से उसमें एक नया राग “फूफा-राग” जुड़ गया। यह जनमासा ठाट का दिन के चौथे-पाँचवें पहर में बजाया जाने वाला राग है, इसका आरोह-अवरोह अरुण भाई ने उस समय ईजाद किया था जब जगमोहन भाई ने धुरन्धर बाबा के एक अकड़ूँ चेले की ऐसी तेसी कर दी थी जैसा कि बारातों में दुल्हा के फूफा करते हैं। यह गंगई घराने का राग है जो शाम की उदासी या रात के पहले प्रहर के सन्नाटे और लस्तपस्त शरीरों में जान फूँकने के लिए अरुण भाई द्वारा छेड़ा जाता था, हम तबले पर तीन ताल मे संगत करते थे। फूफा पहले हल्के से गुर्रा कर ता.. थई… ताता… थई पर कत्थक के घुँघरू दार क़दम ताल चलते हुए हल्का चक्कर लेते-लेते तांडव पर उतर आते तब फूफा के रौद्र रूप से समूह को साँप सूंघ जाता। इस प्रकार नीरसता में रस तलाशती यात्रा हमारी यादों की तिजौरी में जमा होती मूल्यवान सम्पत्ति है।
गंगई से ब्रह्मकुंड तक की यात्रा अबतक की सबसे दुरुह पदयात्रा थी। रास्ता बहुत ख़राब कही कीचड़, कहीं नुकीले पत्थर, कहीं रेतीले और कहीं कटे किनारे जानलेवा हो सकते थे। सुबह आठ बजे आश्रम के स्वामी धुरंधर बाबा से विदा लेकर नर्मदा किनारे-किनारे चल पड़े। क़रीबन तीन किलोमीटर चलकर मुआर घाट पहुँचे, मान्यता है कि दुर्गा देवी ने भैंसासुर का वध इसी घाट पर किया था। इसकी प्रबल सम्भावना है कि आर्य-अनार्य संघर्ष सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच प्रवाहमान नर्मदा के दस से बीस किलोमीटर मैदान में हुआ हो वही घटना पुराणों में देवासुर संग्राम के रूप में वर्णित है क्योंकि आर्यों से अलग माने जाने वाली गौंड, भील, कोरकू प्रजातियां अभी भी वहाँ निवास करती हैं। उस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारस थी। घाट पर स्नान चल रहा था, हम सभी ने भी स्नान किए और कुछ चना-चबैना ग्रहण किया। घाट पर चार व्यक्ति अखंड परिक्रमा उठा रहे थे उनके परिजन उन्हें विदाई देने आए थे। आज कई लोग दोनों किनारे के घाटों से परिक्रमा उठा रहे थे। कुछ पंचकोशी परिक्रमा उठा रहे थे। शाम के चार बजे तक सफ़ेद कपड़ों में क़तारबद्ध होकर परिक्रमा वासी चल पड़े, नर्मदा के सौंदर्य में चार चाँद लग गए।
ब्रह्म कुण्ड में सीधी चढ़ाई चढ़कर धर्मशाला पहुँचे वहाँ एक 93 वर्षीय बुज़ुर्ग अपनी लक्वाग्रस्त पत्नी सहित मिले, वे बड़ी आत्मीयता से पत्नी सेवा में रत हैं। पहले हमने जहाँ ठिकाना बनाया वहाँ रोशनी की व्यवस्था नहीं होने से उनके दालान में ठिकाना जमाया, वे भोजन सामग्री देने को तत्पर थे बनाना हमें था परंतु थकान से शरीर टूट रहे थे। एक पंडित जी के घर से तीस रोटी और आलू की सब्ज़ी का ठेका तीन सौ रुपयों में तय हुआ और सुबह से पड़े ख़ाली पेट भर गए। एक असहाय बूढ़ी माँ विक्षिप्त अवस्था में आकाश के नीचे खुले में सो रही थी, आश्रम सेवक से पूछा तो पता चला वह बिस्तर में शरीर की सारी गंदगी फैलाकर बदबू फैलाती है इसलिए आग जलाकर बाहर सोती है। सुबह मुंशीलाल जी ने अपना शाल, इनर, चादर, दरी और मोज़े उस असहाय को दान कर दिए। मुंशीलाल एक-एक करके कपड़े देते जा रहे थे वह ख़ुश होकर आशीर्वाद बरसा रही थी, बड़ा मार्मिक दृश्य था।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! मानवता !!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० ☆
☆ !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
☆
मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
*
भरे हुए मन अँधियारों से, कर्म भाव की कलुषित समता।
बचा नहीं अब नर में पौरुष, नहीं रही नारी में ममता।।
व्यथित रुग्ण मन नर नारी के, इक दूजे पर घात लगाए।
घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “साजिश…“.)