☆ “भारताची उज्ज्वल विज्ञान परंपरा” – लेखिक : श्री सुरेश सोनी – अनुवाद : डॉ. क. कृ. क्षीरसागर ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆
पुस्तक : भारताची उज्ज्वल विज्ञान – परंपरा
लेखक : सुरेश सोनी
अनुवाद : डॉ. क. कृ. क्षीरसागर
पृष्ठे : २०७
मूल्य: २००₹
विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाच्या क्षेत्रावर पाश्चिमात्त्यांची मक्तेदारी आहे असे चित्र निर्माण केले जाते. पाश्चात्त्य वैज्ञानिक स्वतःलाच विज्ञानाचे जनक म्हणवून घेतात, जणू विज्ञान क्षेत्रातील प्रकाशाचे पहिले किरण पाश्चात्त्य आकाशातच फाकले गेले आणि त्यामुळे अवघ्या विश्वाचे विकासचक्र गतिमान झाले आणि हे होत असताना पूर्वेकडील विज्ञानाचे आकाश मात्र अंधकारमय होते, अशीच भारतातील लोकांची मनोधारणा आहे. आणि या मनोधारणेला आपल्याच देशातील बुद्धिवादी व्यक्ती, संस्था आणि प्रसारमाध्यमे यांनी इतिहासाकडे दुर्लक्ष करत खतपाणी घातले. या गैरसमजामुळे आपल्या देशाला काही विज्ञानपरंपरा होती. वैज्ञानिक दृष्टी होती हेच नव्या पिढीला माहीत नाही. आणि त्यामुळेच आमचा वैज्ञानिक दृष्टि आणि वैज्ञानिक ज्ञान नाकारण्याचा प्रयत्न होतो आहे.
वास्तविक भारत फक्त धर्म आणि दर्शन क्षेत्रातच नाही, तर विज्ञान आणि तंत्रज्ञान क्षेत्रातही अग्रेसर होता. इतकेच नव्हे तर आमच्या पूर्वजांनी विज्ञान आणि अध्यात्म यांचा सुंदर समन्वयही साधला होता.
विसाव्या शतकाच्या प्रारंभी आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय, ब्रजेन्द्रनाथ सी जगदीश चंद्र बसू, रावसाहेब वझे आदी विद्वानांनी आपल्या गाढ्या अभ्यासाने सिद्ध केले होते की भारत फक्त धर्म, दर्शन क्षेत्रातच नाही तर विज्ञान व तंत्रज्ञान क्षेत्रात ही अग्रेसर होता इतकेच नाही तर आमच्या पूर्वजांनी विज्ञान व अध्यात्म यांचा समन्वय साधला होता. त्यातून निर्माण झालेल्या वैज्ञानिक दृष्टिकोनामुळे विज्ञानाचा विकास जीवसृष्टीला अनुकूल आणि मंगलदाय असावा अशी दृष्टीही प्राप्त झाली.
या आपल्या समृद्ध ठेव्याकडे लक्ष वेधले आहे सुरेश सोनी यांनी. ‘भारताची उज्ज्वल विज्ञान-परंपरा’ या पुस्तकातून भारताची ही गौरवशाली विज्ञानपरंपरा मराठी वाचकांसमोर आणण्याचे महत्त्वपूर्ण काम या ग्रंथाने होणार आहे. विद्युतशास्त्र, यंत्रविज्ञान, धातुविज्ञान, विमानविद्या, नौकाशास्त्र, वस्त्रोद्योग, गणितीशास्त्र, कालगणना, खगोलविज्ञान, स्थापत्यशास्त्र, रसायनशास्त्र, वनस्पती, कृषी, प्राणी, आरोग्य, ध्वनि इ. विषयीच्या विज्ञानात, भारतीयांनी केलेले संशोधन व मांडलेले सिद्धान्त आजही जगाला उपयुक्त आहेत. भारतीयांची विज्ञान क्षेत्रातील ही अजोड कामगिरी निश्चितच या ग्रंथातून वाचकांसमोर येईल. आणि भारतीयांना नकारात्मक भावनेतून मुक्त करण्यासाठीही या ग्रंथाचा उपयोग होईल.
विज्ञानाच्या विविध विषयांची सरळ, सोप्या भाषेतून मांडणी हे या ग्रंथाचे वैशिष्ट्य आहे.
हा ग्रंथ भारतीय ज्ञान-विज्ञानाची ओळख करून देणारा तर आहेच, शिवाय आपल्या देशाविषयीचा अभिमान जागृत करेल आणि उमलत्या नव्या पिढीला नवसंशोधनासाठी प्रेरणा देईल.
वैज्ञानिक अभ्यास व संशोधन करणारे भृगु, अत्री, भारद्वाज, नारद, वसिष्ट, गर्ग, शौनक, कणाद, शुक्र, चाक्रायण, धुंडीनाथ, नंदीश, अगस्त्य आदी ऋषी होऊन गेले त्यांनी केलेले संशोधन, विज्ञानपरंपरेची ओळख यातून करून दिली आहे. याचा मराठी अनुवाद क. कृ. क्षीरसागर यांनी केला आहे.
परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली
पालघर
मो.9619800030
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०३ ☆
☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆
‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/ ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/
ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।
रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।
‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।
भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’
सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।
दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।
महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों, नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।
संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।
काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।
वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।
तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – दहकता मन…।
रचना संसार # ७५ – गीत – दहकता मन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी – एक बुन्देली गजल – लुके कहाँ लौ घर में बैठें… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८५ ☆
☆ एक बुन्देली गजल – लुके कहाँ लौ घर में बैठें… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा एहसास…‘।)
राष्ट्रसेविका समितीच्या शाखेत गेले होते. त्या दिवशी भक्ती म्हणाली,
“आज नवीन खेळ खेळू. “
आम्ही खुश.. ऊत्सुकता. काय असेल बरं…
भक्ती म्हणाली,
” खेळ सोपा आहे सगळ्यांनी गोल फिरायचं. जी खेळ घेत असेल तिनी.. गणितातले शब्द आहेत… अर्धा, एक, दीड दोन… ते म्हणायचे. अर्धा म्हटलं तर थोडा गुडघा वाकवायचा आणि उभं राहायचं. एक म्हटलं तर नुसतं उभं राहायचं. दीड म्हणलं तर दोघींनी जोडी करायची. एकीनी थोडं वाकून उभं राहायचं.. की झाला दीड..
” सोप्पच आहे की… चला खेळूया” आम्ही म्हटलं. भक्ती म्हणाली,
” पण एक लक्षात ठेवा कोणीही आऊट होणार नाही याची दक्षता घ्यायची. त्यासाठी कसही गणित करा. “
खेळायला सुरुवात झाली. अर्धा, एक खेळून झाले. नंतर आला दीड… एक आणि अर्धा…
दोघी दोघींनी जोड्या केल्या.
एक जण एकटीच राहिली. तिला जोडीच नव्हती. क्षणभर इकडे तिकडे बघत उभी राहिली.
आता काय…… तेवढ्यात पटकन दोघींनी तिला आपल्या गटात घेतलं आणि तिघीही गुडघ्यावर खाली वाकल्या.
दीड चा हिशोब पूर्ण झाला..
अरे खरंच की…
यातलं खरं मर्म असं होतं की…
सर्वांना सामावून घेऊनच उद्दिष्ट साध्य करायचं आहे… त्यासाठी आम्ही ऍडजेस्टमेंट करायला तयार आहोत.
म्हणूनच त्या वाकल्या… उद्देश सफल झाला.
असा नीट विचार करून खेळलं की की पाव, अर्धा, पाऊण यांचा मेळ घातला तर कोणीच आऊट होणार नाही. शेवटपर्यंत सर्वांना एकत्र खेळता येईल. मजा आली… खेळ संपला घरी आले.
आजच्या खेळात भक्तीने सांगितले होते… कोणीही आऊट होणार नाही याची काळजी घ्या. याचाच अर्थ असा की एखादा मागे राहिला तर त्याला तुमच्यात सामाविष्ट करून घ्या..
त्याला बरोबर घेऊन पुढे चला…
नीट संयमानी सर्वांनी मिळून विचार केला की हे जमू शकते..
मार्ग निघू शकतो…
मग कोणी मागे राहणार नाही.
कितीही नाही म्हटले तरी साध्या खेळातही मागे राहणाऱ्याला थोडे दुःख होतेच. त्यालाही अजून खेळायचे असते. जीवनातही हे तत्वज्ञान उपयोगी आहे.
” एकमेका साह्य करू अवघे धरू सुपंथ ”
हेच तर या खेळाचे सूत्र असावे असे मला तरी वाटले.
आजच्या खेळाचा विचार करताना नातवाच्या पाचवीच्या स्कॉलरशिपच्या गणिताची आठवण झाली. लक्षात आलं परीक्षा झाली
.. रिझल्ट लागला.. संपलं असं नसतच.. परीक्षा ही आयुष्यभराचीच गोष्ट आहे. त्यातील एका गणिताचं साधं सोप्प उत्तर या खेळाने दिलेले आहे.
ते आपण प्रत्यक्ष आचरणात आणायचे आहे. त्यासाठी मला काय करता येईल.. याचा आपल्या मनाशी आढावा घेऊ या..
अजून थोडा विचार केला…
लक्षात आलं की समाजातही जे आर्थिक, सामाजिक कारणाने मागे आहेत त्यांच्यासाठी भारत सरकार अनेक योजना राबवत आहे.
” सबका साथ सबका विकास”
हे श्री मोदी साहेब सांगत आहेत. भारत प्रगतीपथावर चाललेला आहे.
आपण अर्धे कच्चे असलो तरी आपल्याला..
राष्ट्र सेविका समितीने तिच्यात सामावून घेतलेले आहे. शाखेत गेल्याने सकस विचार मनात रुजत आहेत. अशा नवीन नवीन गोष्टी शिकायला मिळत आहेत.
☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ३४ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले☆
।। श्री नारद उवाच ।।
तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः ॥ ३४॥
अर्थ : ही परा भक्ति साध्य होण्यासाठी आचार्य त्या भक्तीची अनेक साधने सांगतात.
विवेचन :
भक्ति करून मुक्ति मिळवावी असे मुमुक्षूच्या लक्षात आले की भक्तीचे नवनवीन मार्ग त्याला दिसू लागतात. व्यक्ती तितक्या प्रवृत्ती या न्यायाने जितक्या व्यक्ती, तितके भक्तीचे मार्ग असू शकतात.
अनेक आचार्यांनी सांगितलेले अनेक मार्ग आपल्याला माहित आहेत. त्यातला अमुक एक मार्ग तितका चांगला आणि बाकीचे गौण असे म्हणता येत नाही.
मागील सूत्रात भक्ती हेच साधन व भक्ती हेच फल असे सांगितल्यानंतर पुन्हा तिची साधने भक्त्याचार्य सांगतात – नव्हे गातात – असे म्हणण्याचे कारण काय अशी शंका येईल. भक्ती हेच साधन, भक्ती हेच फल जरी म्हटले आहे तरी साधनरूपा भक्ती अंतःकरणात प्रगट होण्याकरिता त्याच्या आड जे प्रतिबंध येतात ते दूर केलेच पाहिजेत. रोगनिवृत्तीकरिता योग्य औषध दिले तरी योग्य अनुपान व पथ्यकारक पदार्थांचे सेवन अवश्यच असते. वेदात, शास्त्रात मोक्षाचे साधन ज्ञान हे सांगितल्यावर त्या ज्ञानाकरिता श्रवण, श्रवणाधिकार प्राप्त होण्याकरिता विवेक-वैराग्यादी व इतर काही अंतरंग व बहिरंग साधने सांगितली आहेतच. फलस्वरूपा भक्तीचे पराभक्तीचे अपराभक्ती हे साधन मानले तरी ती भक्ती प्रत्येक मानवाच्या अंतःकरणात उत्पन्न होतेच असे नाही. ‘नराणां क्षीणपापाना कृष्णे भक्तिर्हि जायते ।’ ‘ज्याची पापवासना नष्ट झाली आहे त्यांच्याच ठिकाणी कृष्णभक्ती उत्पन्न होते. ‘ अशी अनेक वचने आहेत. तसे नसते तर मागील सूत्रात ‘मुमुक्षुभिः’ असे पद घालण्याचे कारण नव्हते. पामर विषयी पुरुष भक्तीकडे वळतच नाहीत. साधने दोन प्रकारची असतात. साध्यप्राप्तीत काही अडथळे आले तर ते दूर करणारी, आणि साध्याला पुष्टी देणारी. प्रतिबंध दूर करणारी दोन साधने पुढील पस्तिसाव्या सूत्रात सांगितली असून पुष्टी देणारी साधने छत्तीस व सदतिसाव्या सूत्रात दाखविली आहेत. तसेच आणखीही एका महत्त्वाच्या साधनाचा अडतीस ते चाळिसाव्या सूत्रात विचार केला आहे तो पुढे येईलच.
सूत्रात “गायन्ति” असे पद आहे ते महत्त्वाचे आहे. साधने सांगतात असे न म्हणता गातात असा शब्दप्रयोग केला आहे. त्यामुळे त्या साधनाचे श्रेष्ठत्व सिद्ध होते. साधनाची स्तुती केल्यासारखे होते. साधनात गोडी आहे हे सिद्ध होते. कारण जेथे गोडी, रुची निर्माण होते तेथेच गायन होते. तसेच साधनात उपदेश किंवा आज्ञा नसून सूचकता असावी असे वाटते. गायन हे श्रोत्यांच्या संतोषाप्रमाणे आत्मतुष्टीचेही साधन आहे असेही सूचित होते. म्हणून ‘गायन्ति’ या पदातून अनेक अभिप्राय प्रगट होतात. हृदयातील ज्या संवेदना असतात त्या जेव्हा प्रेमाचे स्वरूप धारण करून बाहेर पडतात तेव्हा त्यास गायन म्हटले जाते. प्रेमाची बोली संगीत म्हटली जाते व प्रेमाची चाल (गती) तिला नृत्य म्हणतात. हे भक्त्याचार्य भक्तीचे परमप्रेमी आहेत म्हणून भक्तिविषयक साधनाचे गायन करीत असतात.
ज्ञान, कर्म आणि योग याद्वारे भगवंताला कदाचित प्राप्त करता येईल की पण त्यामुळे
भक्तीचे प्रेम लाभलेच असे म्हणणे धाडसाचे ठरेल.
भक्तीचा प्रत्येकाच्या अंतरात असते असे म्हणता येईल का? यात थोडा गोंधळ होऊ शकतो, पण प्रत्येकाच्या अंतरी प्रेम आहे का? तर याचे उत्तर हो असेच असेल. प्रत्येकाच्या अंतरी प्रेम भावना आहे. प्रत्येकाला प्रेमाची भूक आहे. आपल्यावर कोणी प्रेम करावे अशी प्रत्येकाच्या सुप्त इच्छा असल्याचे आपल्याला जाणवेल.
कोणाचे आपल्या पतीवर जिवापाड प्रेम असेल तर कोणाचे पत्नीवर, कोणाचे आईवर, कोणाचे बाबावर, कोणाचे बहिणीवर, कोणाचे पाळलेल्या कुत्र्यावर, कोणाचे एखाद्या वस्तूवर, एखाद्या खाद्य पदार्थावर…..,
ही यादी कितीही लांब होऊ शकते….
भक्ति करायची म्हणजे बाकींच्यावर असलेले प्रेम भगवतांकडे वळवायचे…! वाचायला एकदम सोपे पण आचरणात आणायला थोडे जड असे हे सूत्र आहे.
प्रेमाने जग जिंकता येतं असे सर्व संत सांगतात.
आदरणीय श्री. यशवंतराव केळकर यांच्यावर लिहिलेले एक पुस्तक आहे. *”माणूस नावाचे काम”* त्यात एक वचन आहे.
“मनुष्य असो अथवा धातू, दोघेही वितळू शकतात, पण आवश्यक तितकी स्नेहाची ऊर्जा आपल्याला देता आली पाहिजे…! “
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७६ – व्यंग्य – जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
बृजमोहन लाल की कुर्सी बहुत पुरानी थी। इतनी पुरानी कि उस पर बैठते ही आदमी इतिहास में चला जाता था। कुर्सी जानती थी कि उस पर कौन क्यों बैठा है। बृजमोहन लाल कहते थे—“मैं जनहित में बैठा हूँ।”
जनहित को कभी बैठने का मौका नहीं मिला।
वे जब भी उठते, कुर्सी को देखकर कहते—“बस पाँच मिनट।”
पाँच मिनट वर्षों में बदल जाते। कुर्सी उनके शरीर की तरह थी—अगर अलग कर दी जाए तो पहचान खत्म हो जाए। लोग उन्हें आदमी नहीं, पद के नाम से जानते थे।
एक दिन सरकार ने आदेश निकाला—
“अब कुर्सियाँ बदली जाएँगी।”
बृजमोहन लाल परेशान हो गए। उन्होंने जनहित का हवाला दिया। बोले—
“अचानक बदलाव से व्यवस्था चरमरा जाएगी।”
व्यवस्था ने सिर हिलाया—वह पहले से चरमराई हुई थी।
बृजमोहन लाल ने तुरंत एक जनहित याचिका दायर की—
“जनहित बनाम कुर्सी परिवर्तन”
अदालत गंभीर हो गई। मामला बड़ा था। कुर्सी बीच में थी।
सुनवाई के दौरान बृजमोहन लाल बोले—
“मैं इस कुर्सी पर नहीं, इस कुर्सी के लिए बैठा हूँ।”
कुर्सी भावुक हो गई।
जनता भ्रमित।
मीडिया ने हेडलाइन चलाई—
“ईमानदार अफ़सर का संघर्ष”
संघर्ष किससे था, यह स्पष्ट नहीं किया गया।
कुछ महीने बीत गए। आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।
बृजमोहन लाल की कुर्सी और चमकने लगी। अब उस पर गद्दी लग गई थी—जनहित की।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आरावली: हरियाली भरा सौंदर्य…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
जिसका अर्थ है पंक्तिबद्ध पहाड़ों की श्रृंखला। यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है। यह केवल पहाड़ों की कतार नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जीवन का सुरक्षा कवच है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला जलवायु संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता की अमूल्य धरोहर है।
आरावली वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर बनाए रखती है। यही कारण है कि इसके आसपास के क्षेत्रों में कभी हरियाली, वन्यजीव और नदियों की धाराएँ जीवित रहीं। यह थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भी रही है।
अवैध खनन, अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई और हाल की आग की घटनाओं ने इसकी आत्मा को छलनी कर दिया है। जो पहाड़ हजारों वर्षों से धरती की रक्षा करते आए, आज वही मानव लालच के शिकार हो रहे हैं।
आरावली का नष्ट होना केवल पर्यावरण की हानि नहीं है,नयी समस्या की शुरुआत भी है ।
जब हरियाली से भरे पहाड़ मिटते हैं
तो सिर्फ जंगल नहीं जलते, भविष्य जलता है। हम भूल जाते हैं कि…
आरावली नहीं बचेगी तो पानी नहीं बचेगा, हवा नहीं बचेगी,और अंत में हम भी नहीं बचेंगे। अतः प्रकृति के साथ स्नेहिल जुड़ाव रखें ।