हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७० ☆ आरावली: हरियाली भरा सौंदर्य… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आरावली: हरियाली भरा सौंदर्य। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७० ☆ आरावली: हरियाली भरा सौंदर्य

आरावली

जिसका अर्थ है पंक्तिबद्ध पहाड़ों की श्रृंखला। यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है। यह केवल पहाड़ों की कतार नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जीवन का सुरक्षा कवच है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला जलवायु संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता की अमूल्य धरोहर है।

आरावली वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर बनाए रखती है। यही कारण है कि इसके आसपास के क्षेत्रों में कभी हरियाली, वन्यजीव और नदियों की धाराएँ जीवित रहीं। यह थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भी रही है।

अवैध खनन, अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई और हाल की आग की घटनाओं ने इसकी आत्मा को छलनी कर दिया है। जो पहाड़ हजारों वर्षों से धरती की रक्षा करते आए, आज वही मानव लालच के शिकार हो रहे हैं।

आरावली का नष्ट होना केवल पर्यावरण की हानि नहीं है,नयी समस्या की शुरुआत भी है ।

 जब हरियाली से भरे पहाड़ मिटते हैं

तो सिर्फ जंगल नहीं जलते, भविष्य जलता है। हम भूल जाते हैं कि…

आरावली नहीं बचेगी तो पानी नहीं बचेगा, हवा नहीं बचेगी,और अंत में हम भी नहीं बचेंगे। अतः प्रकृति के साथ स्नेहिल जुड़ाव रखें ।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९२ ☆ ~ न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “विनोद कुमार शुक्ल : शब्द यात्री” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९२ ☆

?  आलेख – न्यूयॉर्क से  – विनोद कुमार शुक्ल : शब्द यात्री ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी के आधुनिक कथा‑साहित्य और कविता में विनोद कुमार शुक्ल उस विरल रचनाकार के रूप में जाने  जाते हैं, जिसने साधारण जीवन की निस्सार दिखाई देने वाली वस्तुओं और स्थितियों में भी अद्भुत काव्यात्मक चमक और जादुई यथार्थ की आभा दिखाई । 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग पाँच दशकों से अधिक समय तक लगातार लेखन करते हुए कविता, उपन्यास, कहानी और बच्चों के लिए साहित्य की ऐसी दुनिया रची, जो हिंदी के पारंपरिक ढाँचों से बाहर निकलकर एक बिल्कुल निजी, लेकिन गहरे मानवीय संसार का सृजन करती है।

वे शिक्षक के रूप में कृषि महाविद्यालय से जुड़े रहे इस संकोची, अल्पभाषी लेखक ने सार्वजनिक मंचों की चकाचौंध से दूर रहकर भी अपने शब्दों की शक्ति से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जगत में विशिष्ट प्रतिष्ठा अर्जित की।

उनकी रचना‑यात्रा का आरंभ कविता से हुआ। पहला कविता‑संग्रह “लगभग जय हिंद” 1971 में प्रकाशित हुआ, जिसने उनके भीतर बसे राजनीतिक‑सामाजिक बोध और देशज संवेदना की अनोखी मिश्रित ध्वनियों से हमारा परिचय कराया। इसके बाद “वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह” जैसे संग्रहों ने संकेत दिया कि वे शब्दों की चलन वाली सांकेतिकता से संतुष्ट नहीं, बल्कि भाषा को एकदम नए संयोजनों में बरतने वाले कवि हैं, जो वाक्य‑विन्यास और उपमा‑संरचना दोनों को उलट‑पलट कर देखने की हिम्मत रखते हैं।  बाद के वर्षों में उनकी कविताएँ “आकाश धरती को खटकता है”, “कविता से लंबी कविता” आदि संग्रहों के रूप में सामने आईं, जिनमें प्रकृति, घर‑परिवार, छोटे शहर और साधारण मनुष्यों के जीवन की सूक्ष्मतम हलचलें एक बेहद शांत, धीमी, किंतु भीतर तक उतर जाने वाली आवाज़ में दर्ज होती हैं।

काव्य के साथ‑साथ विनोद कुमार शुक्ल का कथा‑संसार हिंदी उपन्यास और कहानी की परंपरा में एक बड़ी संरचनात्मक तब्दीली के रूप में देखा जाता है। 1979 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास “नौकर की कमीज़” हिंदी गद्य में एक मील का पत्थर माना जाता है, जिसे बाद में मणी कौल ने इसी नाम से फिल्म में रूपांतरित किया। एक साधारण सरकारी क्लर्क और “नौकर की कमीज़” के बहाने सत्ता, वर्ग, पहचान और आत्मसम्मान की जटिल परतें जिस शांत और लगभग सपाट लगने वाली भाषा में खुलती हैं, वह हिंदी उपन्यास की पारंपरिक कथावस्तु और शिल्प दोनों को तोड़ती दिखाई देती है। कई आलोचकों ने इसे हिंदी में उपन्यास की संरचना को बदल देने वाली कृति कहा।  “खिलेगा तो देखेंगे” और “दीवार में एक खिड़की रहती थी” उनके ऐसे उपन्यास हैं, जिनमें शहर, घर, दीवार, खिड़की, पेड़, कमरा जैसी चीज़ें स्वयं पात्रों की तरह व्यवहार करती हैं। “दीवार में एक खिड़की रहती थी” को 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और इस पर नाट्य रूपांतरण भी हुआ। हाल ही इस उपन्यास पर तीस लाख की रॉयल्टी ने उन्हें एक बार फिर से साहित्य जगत में चर्चित बना दिया था।

उनका कहानी‑संसार भी उतना ही विशिष्ट और प्रयोगधर्मी है। “पेड़ पर कमरा” और “महाविद्यालय” जैसी कहानी‑कृतियों में कॉलेजों, कमरों, पेड़ों, गलियारों और मामूली‑से संवादों के भीतर छुपा हुआ अकेलापन, असुरक्षा, प्रेम, स्मृति और प्रतिरोध एक धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई शैली में उजागर होता है। बाद के वर्षों में उन्होंने बच्चों के लिए भी लगातार लिखा । उनकी बाल‑कथाएँ और कविताएँ बचपन की कल्पना, खेल, चीज़ों से बातें करने की प्रवृत्ति और प्रकृति के साथ सरल, निर्भय संवाद को केंद्र में रखती हैं, जिनमें भाषा न तो बचकाना है, न उपदेशपूर्ण, बल्कि एक सहयात्री की तरह अभिव्यक्त  होती है।  उनकी कई रचनाएँ अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं। “ब्लू इज़ लाइक ब्लू” जैसे कहानी‑संग्रह और “Treasurer of Piggy Banks” जैसी कविताओं की अंग्रेज़ी पुस्तकों ने नए, युवा पाठकों की पीढ़ी तक उनकी पहुँच को बढ़ाया और उनके जादुई शब्द यथार्थ को वैश्विक पाठकीय संसार से जोड़ा।

उपलब्धियों की दृष्टि से विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिंदी के सम्मानित लेखकों में गिने जाते हैं। 1999 में उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, जिसे आधुनिक हिंदी कथा‑साहित्य की एक क्लासिक कृति के रूप में व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हुई।  2023 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके समग्र रचनात्मक अवदान को देखते हुए उन्हें PEN/Nabokov Award for Achievement in International Literature से सम्मानित किया गया, जिसने उनके काम को विश्व‑साहित्य के मानचित्र पर विशेष रूप से रेखांकित किया।  2024 के लिए घोषित 59वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें प्रदान किया गया। वे छत्तीसगढ़ से यह सर्वोच्च भारतीय साहित्यिक सम्मान पाने वाले पहले और हिंदी के बारहवें लेखक बने, जहाँ पुरस्कार‑निर्णायकों ने उनकी लेखनी की “सादगी, संवेदनशीलता और विशिष्ट शिल्प” को विशेष रूप से रेखांकित किया।

दिसंबर 2025 में 89 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ हिंदी जगत ने स्वीकार किया कि यह केवल एक लेखक का जाना नहीं, बल्कि “शुक्ल‑युग” के अंत जैसा है। यह भी विचारणीय है कि उनके जैसा विद्वान जो समाज की संपत्ति माना जाना चाहिए, अपने अंतिम समय में अस्पताल में कोई खास अलग सरकारी इंपॉर्टेंस प्राप्त नहीं कर सका । कई समकालीन लेखकों ने रेखांकित किया कि उन्होंने हिंदी कविता, कहानी और उपन्यास को नए सिरे से रचते हुए उन्हें हस्तक्षेपकारी, प्रयोगधर्मी और गहरे मानवीय स्वर दिया।  उनकी रचनाओं में साधारण आदमी के प्रति अटूट संवेदनशीलता, वस्तुओं और क्रियाओं को देखने का अनोखा नजरिया तथा वाक्य‑निर्माण की विशिष्ट स्थापत्य‑कला उन्हें ऐसा लेखक बनाती है, जिसकी पहचान केवल नाम से नहीं, भाषा  से हो जाती है।  इस अर्थ में उन्होंने हिंदी गद्य की संवेदना और शब्द‑संरचना दोनों को पुनर्निर्मित किया। इसी लिए विनोद कुमार शुक्ल भविष्य में भी इस रूप में याद किए जाएंगे कि उन्होंने हिंदी साहित्य को एक शांत, लगभग संकोची, लेकिन भीतर से बेहद तीखे और जागरूक जादुई यथार्थ की दुनिया दी, जहाँ आम आदमी की गरिमा, प्रकृति से उसका अंतरंग रिश्ता और भाषा की अनंत संभावनाएँ मिलकर शब्दों का एक नया घर बनाती हैं।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

न्यूयॉर्क से 

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७८ ☆ कविता – भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७८ ☆ 

☆ गीत – भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

होली और ईद सभी मिल के मनाइए।।

*

आप नहीं जागे तो देश टूट जाएगा।

भारत का प्यारा परिवेश छूट जाएगा।

कोई आ के फिर मेरा देश लूट जाएगा।

ज्ञान की किताब से भी प्रेम सिखलाइए।।

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

 *

हर धरम के भाई का खून एक होता है।

प्रेम शक्ति भाव का जुनून एक होता है।

भेदभाव रीति से समाज सून होता है।

वेद ने कहा जो , उसे दिल से लगाइए।।

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

 *

आप हैं भगत सिंह, आप ही अब्दुल हमीद।

आप ही सुभाष हैं, आप ही प्यारे फरीद।

आप में हैं बिस्मिल, आप में सारे शहीद।

शेखर, अशफाक की कुर्बानी न भुलाइए।।

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३३ – पुस्तक चर्चा ☆ हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास – लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंह ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंह जी द्वारा लिखित “हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकासकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३३ 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास – लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंह ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक : हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास 

लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंह 

प्रकाशक: जीएस पब्लिशर डिस्ट्रीब्यूटर्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली 

पृष्ठ संख्या:161  

मूल्य: 595/- रुपये

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

डॉ. श्रीमती युगल सिंह द्वारा रचित पुस्तक ‘हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास’ (2025) न केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, बल्कि राजस्थानी और हिंदी साहित्य के क्षेत्र में इसकी अत्यधिक उपादेयता (महत्व) भी है। यह कृति इस दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है कि यह एक उपेक्षित रहे क्षेत्र ‘हाड़ौती’ के बाल साहित्य को मुख्यधारा में लाने का गंभीर प्रयास करती है।

पाँच वर्षों के कठिन परिश्रम और शोध के बाद तैयार की गई यह पुस्तक भविष्य के शोधार्थियों के लिए एक आधार स्तंभ का कार्य करेगी, जिससे प्रेरित होकर इस अंचल पर और भी गंभीर शोध कार्य किए जा सकेंगे। इसकी सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि लेखिका ने बिखरे हुए साहित्य और साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर 45 रचनाकारों का एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ तैयार किया है, जो पहले कभी उपलब्ध नहीं था।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह पुस्तक हाड़ौती की भाषाई जड़ों को समझने के लिए अनिवार्य है। यह रेखांकित करती है कि हाड़ौती की प्रथम मुद्रित कृति बाइबिल का अनुवाद थी और सूर्यमल्ल मिश्रण की ‘राम रंजाट’ से इस अंचल के बाल साहित्य की नींव पड़ी। पुस्तक की संरचना विधा-वार (कविता, कहानी, नाटक, ज्ञान-विज्ञान, पहेलियाँ) होने के कारण यह पाठकों को साहित्य की विविध प्रवृत्तियों से परिचित कराती है। काव्य क्षेत्र में सुरेशचंद्र सर्वहारा, श्यामा शर्मा, जितेन्द्र निर्मोही, रामगोपाल राही, डॉ. कृष्णा कुमारी, महेश पंचोली, राधेश्याम मेहर, शशि सक्सेना, सुरेश चंद्र निगम, शिवराज श्रीवास्तव, अक्षयलता शर्मा, भगवती प्रसाद गौतम, डॉ. सुश्री लीला मोदी, ममता महक, प्रीतिमा पुलक, विष्णु शर्मा ‘हरिहर’, विश्वामित्र दाधीच, जयसिंह आशावत, देवकी दर्पण, शिवचरण सेन ‘शिवा’, डॉ. प्रेम जैन, डॉ. गिरि गिरिवर, उमानंदन चतुर्वेदी और योगीराज योगी जैसे कवियों के योगदान का विस्तार से वर्णन है। लेखिका ने कविताओं के माध्यम से यह भी दिखाया है कि कैसे मातृभाषा से जुड़ाव बच्चों में संस्कार और अनुशासन का बीजारोपण करता है।

गद्य और नवीन विधाओं के संकलन के कारण भी इस कृति की महत्ता बढ़ जाती है। इसमें डॉ. नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी, संतोष पारिक ‘निरव’, विजय जोशी, विजय शर्मा , टीकमचंद ढोडरिया, किशन रतनानी, डॉ. क्षमा चतुर्वेदी, कालीचरण राजपूत, रोचिका अरुण शर्मा और रेखा पंचोली की कहानियों और उपन्यासों का विवरण है, जो बाल-मनोविज्ञान पर आधारित हैं।

वैज्ञानिक चेतना के विकास में जितेन्द्र निर्मोही और प्रज्ञा गौतम का योगदान, तथा नाटक के क्षेत्र में योगेश ‘यथार्थ’ और राम शर्मा (कापरैन) के कार्यों की चर्चा इसकी बहुआयामी उपादेयता को सिद्ध करती है। झालावाड़ के अब्दुल मलिक खान के साहित्य को ‘रत्न’ मानकर उन्हें संरक्षित करना इस पुस्तक की एक बड़ी उपलब्धि है। साथ ही, अपर्णा पाण्डेय, श्वेता शर्मा, अरनी राबर्ट्स, सी.एल. साँखला और प्रभात सिंघल के योगदानों को शामिल कर यह पुस्तक हाड़ौती अंचल के बाल साहित्य की एक पूर्ण और जीवंत तस्वीर पेश करती है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनकी साहित्यिक विरासत से जोड़े रखेगी।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

19/12/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०७ – कविता – ☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय दोहे “धन जीवन की दौड़…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०७ 

☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

(दोहा संग्रह ‘शब्दों की चौपाल’ से उदधृत धन विषय के दोहे)

धन की भाषा विश्व में, जन-जन को  है ज्ञात।

वैश्विक भाषा सिर्फ धन, बस धन की ही बात।।

*

ज्ञानी ध्यानी संत सब, पढ़े-लिखे विद्वान।

धन के पीछे हैं पड़े, देव दनुज, शैतान।।

*

धन के रूप विचित्र है, भ्रमित सभी इंसान।

नजरबन्द धन ने किया, भूले निज पहचान।।

*

धन ही सादर दंडवत,  धन ही आशीर्वाद।

हर्षोत्सव त्योहार धन, धन ही शोक विषाद।।

*

धन सूरज धन चंद्रमाँ, धन धरती आकाश।

अंधकार धन में मिले, धन में छिपा विनाश।।

*

वर्तमान धन में बसा, धन ही भूत भविष्य।

धन सर्वोत्तम है गुरु, धन ही तो है शिष्य।।

*

धन चिंतन धन सृजन है, धन छपास की खान।

धन ही शब्द विलास है, धन ही विज्ञ सुजान।।

*

रंक बने राजा कभी,  राजा बनते रंक।

खुशियाँ दे मन को कभी, कभी मार दे डंक।।

*

धन-लछमी है चंचला, धूप कभी तो छाँव।

एक जगह टिकते नहीं, मायाविनि के पाँव।।

*

धन दुश्मन धन मित्र है, धन रिश्ते संबंध।

धन में ही दुर्गंध है, धन में बसी सुगंध।।

*

उलझन और निदान भी, धन के अद्भुत फेर।

धन विषधर धन नेवला, धन सियार धन शेर।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२८ ☆ नदी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नदी” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२८ ☆ नदी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

नदी सागर से नहीं मिलती

राह में दम तोड़ देती है ।

क्या यही इतिवृत्त मेरा

है पूछती सबसे

लिखा है बस भोगना

पैदा हुई जबसे

भोग कर भी कुछ नहीं कहती

धार अपनी मोड़ देती है।

ढो रहे ख़ामोशियाँ तट

चप्पुओं के गाँव

कहाँ जाकर के रुकेगी

छेदों वाली नाव

दर्द रेता होने का सहती

घाव सूखे छोड़ देती है।

समय कितना निर्दयी है

छीलता है खाल

बस गए हैं किनारों पर

बाढ़ के भूचाल

विकृति का रूप धर बहती

पत्थरों को फोड़ देती है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२६.१०.२५

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३९ – रब की ईबादत का सिला सबको मिला… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – रब की ईबादत का सिला सबको मिला।)

✍ रब की ईबादत का सिला सबको मिला… ☆ श्री हेमंत तारे  

जिसे चाहा उस फ़न का मैं माहिर बना

जुनूँ था कि,  क़ादिर बनू,  क़ादिर बना

चाहिता तो,  मुर्शिद भी बन सकता था 

ग़मज़दा बशर देखे तो मैं काफ़िर बना

 *

गाड़ी बंगला कोठी ये, सुकूं के सामां नही

सुकूं उसको मिला, जो कोई तारिक बना

 *

उस करिश्माई दरवेश के मैं सदके जाउं

जिस संग को छुआ उसने वो नादिर बना

 *

रब की ईबादत का सिला सबको मिला

कोई मुलाजिम बना तो कोई ताजिर बना

 *

वाइज़ की सोहबत, सबको कहां हांसिल

मुझ कमज़र्फ को मिली और मैं आरिफ़ बना

मुश्किल घडी में सब बचकर निकल गये

‘हेमंत’ वो तेरा दोस्त था जो जाँनिसार बना

क़ादिर = शक्तिमान, मुर्शिद = धर्मगुरु, ग़मज़दा बशर = दु:खी मनुष्य, काफ़िर = नास्तिक, तारिक = त्यागी, संग = पत्थर, नादिर = अमूल्य, ताजिर = सौदागर, वाइज़ = धर्मोपदेशक, आरिफ़ = ज्ञाता, जाँनिसार = प्राण रक्षक

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३३ ☆ मौत से मुमकिन नहीं है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मौत से मुमकिन नहीं है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३३ ☆

✍ मौत से मुमकिन नहीं है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मुझको आया ही नहीं है दिल किसी का जीतना

ज़िंदगी में सबसे मुश्किल है भरोसा जीतना

इसके फंदे में फसा जो हारता है ज़ीस्त को

मौत से मुमकिन नहीं है दाँव अपना जीतना

 *

हार में भी जीत से मिलती उसे बढ़कर ख़ुशी

एक बेटे से न कोई बाप चाहा जीतना

 *

हो मुखालिफ़ आपके कोई भी छोटा या बड़ा

उसको तदवीरों से मुमकिन हो सकेगा जीतना

 *

लोक हित में भस्म होना काम को मंजूर था

जानता था शिव से नामुमकिन है उसका जीतना

 *

हौसले को छोड़ उसने मान आधी हार ली

जंग से पहले ही जो मुश्किल है सोचा जीतना

 *

आदमी कठपुतलियों सा नाचता रहता है बस

वक़्त तय करता है जब क्या हार है क्या जीतना

 *

अय अरुण हर जीत तेरी कितनी आहों से भरी

बुद्ध जैसा खास होता अपने मन का जीतना

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४७ ☆ कविता – हस्ती नहीं मिटती… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  – “हस्ती नहीं मिटती“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४७ ☆

✍ कविता – हस्ती नहीं मिटती… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कुछ थीं ऐसी बातें

कुछ थीं ऐसी जरूरतें

कुछ थीं विवशताएँ

कुछ खुशियाँ भी थीं।

 

कुछ मनपसंद

कुछ नापसंद

कुछ किसी की पसंद

कुछ किसी को पसंद।

 

कुछ चहेते चेहरे

कुछ अनचहेते चेहरे

कुछ अपने

कुछ पराये

कुछ अपने साथ

कुछ सबके साथ।

 

कुछ जीते चले गए

कुछ जीकर चले गए

कुछ अकेले जिए

कुछ साथ-साथ जिए।

 

कुछ तो बात है जीने में

कि हस्ती नहीं मिटती।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९६ – नसीहत… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नसीहत।)

☆ लघुकथा # ९६ – नसीहत श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रोशनी ने गुस्से में कहा- “अरे! तुम लोगों के घर मैं इसीलिए नहीं आती। तुम्हारे घर में उठने बैठने की भी जगह नहीं है।”

“दीदी – हर किसी को अपने मायके आना अच्छा लगता है। आप चिंता मत करो, आप मेरे कमरे में जाकर सो जाओ आराम से। शादी ब्याह के काम में तो थोड़ी सी देर  हो ही जाती है।” रूबी ने अपनी ननद मीनाक्षी से कहा।

“बस बस मां को तो तुम अपने इशारे में नचाती रहती हो सारा दिन उनसे कुछ ना कुछ काम करवाती रहती हो और आप मुझे नसीहत दे रही हो।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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