हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२६ ☆ व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२६ ☆

?  व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहावत पुरानी है, मगर शिक्षा की आवश्यकता की तरह सदा प्रासंगिक है, गुरु गुड़ रह गया, चेला शक्कर हो गया।

पहले गुरु के चरण छूकर ज्ञान मिलता था। अब गुरु के पास पहुंचने से पहले विद्यार्थी उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल छानता है। गुरु की योग्यता क्या है, यह बाद की बात है, फॉलोअर कितने हैं,रेटिंग क्या है यह पहले देखा जाता है।

कभी शिक्षक ज्ञान का स्रोत था। आज ज्ञान हर जेब में है,गूगल , ए आई और मोबाइल के रूप में।

आज का परिष्कृत मंत्र है,गूगल , मोबाइल दोनों खड़े काके लागूं पाँव, बलिहारी मोबाइल आपकी जिन गूगल दियो बताये ।

शिक्षक कहता है, “बच्चों, ध्यान से सुनो।” बच्चा मोबाइल खोलकर कहता है, “सर, यह तो गूगल पर कुछ और लिखा है।”इसी से परेशान एक

डाक्टर साहब ने क्लीनिक के बाहर बोर्ड लगवा रखा है, गूगल का ज्ञान और जूते बाहर ही रखें।

गुरु समझाने लगता है, चेला स्क्रीन पर अंगुली घुमाकर समझा देता है।

गुरु ने जीवन भर पढ़कर ज्ञान पाया, चेले ने पाँच मिनट में ज्ञान डाउनलोड कर लिया है।

शिक्षक दिवस पर अचानक गुरु का महत्व बढ़ जाता है। स्कूल में फूल आते हैं, कार्ड आते हैं, भाषण होते हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “सर, आप हमारे जीवन के आदर्श हैं।”गुरु भावुक हो जाता है।

अगले ही दिन वही आदर्श , ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर बच्चों के शोषण के रूप में दर्ज किया जाता है।

5 सितम्बर को गुरु भगवान होता है, 6 सितम्बर को ‘फीडबैक’ का विषय बन जाता है।

यूं यदि शिक्षक दिवस की परम्परा नई सरकार के समय शुरू होती तो डा सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की जगह उसके संदर्भ गुरु वशिष्ठ या गुरु सानदीपनि के समय से जोड़ निकाले जाते ।

हमारे जमाने में सोंटी वाले मास्साब होते थे , अद्धा , पौना का पहाड़ा होता था, अब तो बच्चों की शिक्षा को आसान बनाने के लिए इतने नियम बना दिए गए हैं, कि  शिक्षक को शाला जाने से पहले नियम पढ़ने पड़ते हैं।

कभी शिक्षक पूछता था, “होमवर्क क्यों नहीं किया?”

विद्यार्थी बहाना बनाता था।

आज विद्यार्थी कहता है, “सर, होमवर्क तो एआई ने किया है, बस कोई यह मत पूछिए कि मैंने समझा भी है या नहीं।”

अब कक्षा में गुरु और एआई आमने-सामने हैं। गुरु के पास अनुभव है, एआई के पास उत्तर।

गुरु कहता है, “मैंने तीस साल पढ़ाया है।”

एआई कहता है, “मैंने तीस करोड़ दस्तावेज पढ़े हैं।”

गुरु चुप है।

अनुभव का मुकाबला आँकड़ों से हो जाए तो गुरु भी अपडेट माँगता है।

पहले विद्यार्थी गुरु से पूछता था, “सर, यह कैसे होगा?”

अब गुरु विद्यार्थी से पूछता है, “बेटा, यह ऐप कैसे चलेगा?”

चेला मुस्कुराता है।

गुरु ने शिष्य को ज्ञान दिया था, शिष्य गुरु को पासवर्ड दे रहा  है।

शिक्षा का बाजार भी बदल गया है। कभी स्कूल में फीस देकर पढ़ाई होती थी। अब फीस देखकर लगता है कि बच्चा पढ़ने नहीं, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में निवेश करने जा रहा है। विदेशों में हालत ये देखने मिल रही है कि कई माता पिता बच्चे को घर में पढ़ाना पसंद करते हैं। दूसरा बच्चा इसलिए नहीं करते कि पढ़ाई का खर्च कैसे करेंगे।

स्कूल की इमारत चमक रही है, वेबसाइट चमक रही है, यूनिफॉर्म चमक रही है, विज्ञापन चमक रहा है।बस  शिक्षा गुमशुदा  है। परीक्षा , पेपर लीक चर्चा में हैं, वास्तविक ज्ञान , नैतिकता और व्यक्तित्व का विकास , लापता है।

शिक्षा मिशन नहीं व्यवसाय बन गई है। भव्य स्कूल बिल्डिंग , एसी क्लास रूम, सीसी टीवी , लक्जरी बस ने शिक्षा को ऊँचा किया है, इतना कि वह आम लोगों की पहुंच से ऊपर जा रही दिखती है। व्यवस्था ने स्कूल को धंधा बना कर रसीद धारी पूंजीपति को मोटा किया है।

और शिक्षक?

वह आज भी वही है। कक्षा में खड़ा है। हाथ में चॉक हो या स्मार्ट बोर्ड की पेन, चिंता वही है।

बच्चा पढ़ेगा या नहीं?

माता-पिता संतुष्ट होंगे या नहीं?

परिणाम अच्छा आएगा या नहीं?

और सबसे बड़ी चिंता, कहीं किसी ने उसकी कक्षा का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर तो नहीं डाल दिया?

शिक्षक अब केवल शिक्षक नहीं है। उसे काउंसलर होना है, प्रशासक होना है, तकनीकी विशेषज्ञ होना है, मोटिवेशनल स्पीकर होना है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उसे विद्यार्थी के माता-पिता की अपेक्षाओं का भी होमवर्क करना है।

 5 सितम्बर को मंच पर कहा जाएगा, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।”

शिक्षक मुस्कुराएगा।

राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी उसी की है।

इसलिए उसे जनगणना भी करना है, चुनाव भी करवाना है।

शिक्षक दिवस पर फूल दीजिए, भाषण दीजिए, सम्मान दीजिए, स्मृति-चिह्न दीजिए।

मगर सिर्फ एक दिन के लिए नहीं। वर्तमान स्थिति में गुरु गुड़ रह गया है, चेला शक्कर हो गया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७८ ⇒ वेदना निग्रह रस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वेदना निग्रह रस।)

?अभी अभी # १०७८ ⇒ आलेख – वेदना निग्रह रस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को। जहाँ महादेवी की वेदना पर प्रसाद के आँसू निकल आते हों, वहाँ बच्चन की मधुशाला किस काम की। जहाँ सूरज की रोशनी कम हो, और हरदम आसमान में काली घटा छाई रहे, ऐसे में शहनाई शोभा नहीं देती। कहीं किसी कोने में, कोई दिल का दीया अगर जला दे, तो मन को बड़ा सुकून मिलता है।

कहीं मीत ना मिला रे मन का, तो कहीं मिल के बिछड़ गई अंखियां, हाय रामा ! ऊपर वाले का खेल बड़ा निराला है। किसी की झोली में खुशियों की सौगात तो कहीं गम बेशुमार। मन करता है, अखबार में इश्तहार दे दिया जाए, गुमशुदा की तलाश ! हमारी खुशी कहीं खो गई है। उम्र नाजुक, हंसता हुआ नूरानी चेहरा, लाने वाले का शुक्रिया, मेहरबानी, मुंहमांगा इनाम।।

होठों पे आए खुशी, क्या मजाल है। दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं। छोटी सी गुड़िया हो तो उदासी ज़्यादा समय तक टिकती नहीं। बच्चों को बहलाना कितना आसान है। गुड़िया, हमसे रूठी रहोगी, कब तक ना हँसोगी, देखो जी, आई रे हँसी आई। देखो जी, आई रे हँसी आई। लेकिन बड़ों का मामला जरा टेढ़ा होता है।

गम की अंधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर, सुबह जरूर आएगी, सुबह का इंतजार कर। लेकिन जिसे सब्र नहीं, उसका क्या किया जाए। इंतजार और अभी, और अभी, और अभी। तुम्हारा इंतजार है।।

जब इंसान भीड़ में भी अकेला हो जाता है, किसी के साथ होता है, फिर भी कहीं खोया रहता है, तो वह दुनिया से नहीं, अपनों से नहीं, अपने आप से भी बहुत दूर चला जाता है। उसे न जाने क्यों ऐसा लगता है, ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं। सबमें शामिल हो मगर, सबसे जुदा लगती हो, सिर्फ हमसे ही नहीं, खुद से खफा लगती हो। शुभचिंतक कह उठते हैं, सीधा सादा, अवसाद का मामला है।

होठ पर लिए, दिल की बात हम। जागते रहेंगे और, कितनी रात हम। तुम्हारा इंतजार है। दिल बहल तो जाएगा, इस खयाल से। हाल मिल गया तुम्हारा, अपने हाल से।

रात ये करार की, बेकरार है।

तुम पुकार लो। तुम्हारा इंतजार है।।

क्या वेदना में भी रस होता है ! किसी दूसरे के दुख में दुखी होना अलग बात है और खुद को अंधेरे बंद कमरे में कैद करना अलग बात है। मुबारक और को खुशियाँ, मुझे गम से मोहब्बत है।

बहुत इच्छा होती है, ऐसे गमजदा लोगों को पकड़कर बाहर लाया जाए, उन्हें ऐसे लोगों से मिलाया जाए, जो वाकई दुःखी और लाचार हैं। कुएं में कूद जाने से बेहतर है उन लोगों को निकाला जाए जो कुएं में पड़े हुए हैं। दुख दर्द का कुआं, अवसाद का कुआं। जहाँ कोई झांकना पसंद नहीं करता ;

अंधेरे में जो बैठे हैं,

नज़र उन पर भी कुछ डालो

अरे ओ रोशनी वालों !

एक रोते बच्चे को हंसाना अधिक आसान है, क्योंकि वहाँ अभी सुख दुख के संस्कार संचित ही नहीं हुए हैं। हवा के झोंको की तरह खुशी आती जाती रहती है।

प्रकृति में इंसान ज्यादा उदास नहीं रह पाता। जब एक चिड़िया चहकती है, तो उदास मन में आशा की किरण चमकती है। बारिश की बूंदें कितने आंसुओं को धो डालती है। संगीत की स्वर लहरियां एक बार अंतस में प्रवेश कर जाएं, तो अनहद नाद गूंज उठता है।।

क्या है कोई ऐसा वेदना निग्रह रस, जो महादेवी की वेदना को कम कर सके। गीता का तो पहला अध्याय ही अर्जुन विषाद योग है। हम तो यही चाहते हैं ;

झूम झूम कर नाचो आज

गाओ खुशी के गीत,

हो …

आज किसी की हार हुई है

और किसी की जीत,

हो …

गाओ खुशी के गीत …

लगता है, गम हार गया

खुशी जीत गई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०७ ☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०७ ☆ 

☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सुखद मृत्यु ही गीत सुनाए,

शुभ कर्मों को कर लेना।

मत करना अपमान साधु का,

ईश्वर से कुछ डर लेना।

पैसा-पैसा खूब कमाया,

जोड़-जोड़ जीवन बीता।

नहीं किसी की करी भलाई,

जाता फिर रोता, रीता।

 *

मत घमंड पैसे का करना,

दान, पुण्य कर तर लेना।

 **

त्रुटियाँ तो सबसे हो जाएँ,

पर स्वीकार करो इनको।

क्षमा शक्ति है यहाँ अपरिमित,

कर लो तुम अच्छे कल को।

 *

हँसते और हँसाते रहना,

झरनों-सा तुम झर लेना।

 **

अंत समय में किए कर्म सब,

आ जाते मन, आँखों में।

दृश्य हजारों घूम-घूम कर,

दर्शाते हैं लाखों में।

 *

पश्चाताप न रहे किसी का,

हँसते-हँसते मर लेना।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२९ – अध्यक्ष पद का समोसा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा)  

☆  चुभते तीर # १२९ – व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शांति नगर वेलफेयर एसोसिएशन का चुनाव किसी राष्ट्रीय चुनाव से कम रोमांचक नहीं होता था। इस बार मुकाबला दो दिग्गजों के बीच था, पुराने अध्यक्ष कूपर साहब और मोहल्ले के नए-नवेले बिल्डर भल्ला जी। कूपर साहब का दांव अपनी पुरानी साख और ईमानदारी पर था, जबकि भल्ला जी का मुख्य हथियार था चुनाव की शाम को दी जाने वाली ‘शाही समोसा और जलेबी पार्टी’।

सोसायटी के ऑडिटोरियम में चुनावी बहस का आयोजन किया गया था। पूरा हॉल दो गुटों में बंटा हुआ था। एक तरफ वरिष्ठ नागरिकों की फ़ौज थी जो कूपर साहब के समर्थन में नारे लगा रही थी, तो दूसरी तरफ नौजवानों की टोली थी जो भल्ला जी के मुफ़्त वाई-फ़ाई और जिम के वादों पर फ़िदा थी।

बहस अपने चरम पर थी। भल्ला जी ने माइक हाथ में लिया और बुलंद आवाज़ में कहा, “भाइयों और बहनों, अगर मैं अध्यक्ष बना तो सोसायटी के पार्क में इटालियन मार्बल लगवाऊंगा और स्विमिंग पूल का पानी हर हफ्ते बदला जाएगा!”

भीड़ ने जमकर तालियां बजाईं। कूपर साहब की बारी आई। उन्होंने अपना पुराना चश्मा ठीक किया और धीमी आवाज़ में बोले, “मार्बल और स्विमिंग पूल तो ठीक है, लेकिन पिछले छह महीने से हमारे मेन गेट का ताला टूटा हुआ है और सिक्योरिटी गार्ड को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। पहले बुनियादी समस्याएं तो सुलझें।”

माहौल अचानक गंभीर हो गया। तभी भल्ला जी के समर्थकों ने ऑडिटोरियम के पीछे समोसे के पैकेट बांटना शुरू कर दिए। गरमा-गरम समोसे की महक हवा में तैरने लगी और लोगों का ध्यान भाषण से हटकर खाने की प्लेटों पर चला गया। ऐसा लग रहा था कि कूपर साहब की ईमानदारी पर भल्ला जी का समोसा भारी पड़ने वाला था।

वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। हर व्यक्ति अपनी पर्ची बक्से में डाल रहा था। कूपर साहब शांति से एक कोने में बैठे चाय पी रहे थे। उन्हें अपनी हार तय लग रही थी। शाम सात बजे मतों की गिनती शुरू हुई।

जब अंतिम नतीजे की घोषणा की गई, तो मंच पर मौजूद मुख्य अतिथि की आंखें भी फटी रह गईं। कूपर साहब को कुल नब्बे प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भल्ला जी को मात्र दस वोट मिले। भल्ला जी हैरान होकर खड़े हो गए और चिल्लाए, “यह बेईमानी है! जब सबने मेरे समोसे खाए, तो वोट कूपर साहब को कैसे दे दिए?”

तभी सोसायटी के सबसे वयोवृद्ध निवासी गुप्ता जी मंच पर आए, उन्होंने माइक संभाला और बोले, “भल्ला जी, आपकी जलेबी और समोसा बहुत स्वादिष्ट था, धन्यवाद! लेकिन हमारे शांति नगर की परंपरा रही है कि हम खाना अमीर प्रत्याशियों का खाते हैं और वोट उस ईमानदार इंसान को देते हैं जो रात को दो बजे भी गेट का ताला ठीक कराने खड़ा हो सके।”

पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट और ठहाकों से गूंज उठा। भल्ला जी ने भी हार मानते हुए कूपर साहब को गले लगा लिया और कहा, “अध्यक्ष महोदय, अगली बार समोसे के साथ चटनी भी मेरी तरफ से मुफ़्त रहेगी!”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ संदूक… ☆ सुरेखा चिखलकर ☆

सुरेखा चिखलकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ संदूक… ☆ सुरेखा चिखलकर ☆

सारीपाटाच्या खेळामध्ये

सोंगटीच्या चालीने ती

चालत राहिली शिणलेल्या

पावलांना घेऊन. ..

काळाच्या पदराखाली

मनातील भावनांना

साठवत राहिली आयुष्यभर,

वेदनांना आवरणं घालून

भळभळत राहिली अश्वत्थामाच्या

जखमेसारखी. ..

शब्दांना सादवत राहिली

मनाच्या संदुकीत स्वतःला

बंदिस्त करून,

डोळ्याच्या बांधावर रिचवत

राहिली हळूहळू स्वतःला

गुह्य अंतरात कायमचे…

 🙏 

© सुरेखा महिपती चिखलकर

गोटखिंडी, तालुका वाळवा

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ महावस्त्राचे पदर – भाग ८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? विविधा ?

महावस्त्राचे पदर – भाग ८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

‘आत्या’ (माहेरच्या मायेचा एक हळवा कोपरा)

​नात्यांना काही नावे असतात आणि काही नात्यांना सुगंध असतो. नाव उच्चारलं की नातं समोर येतं; पण काही नाती आठवली की मनात एखादा गंध दरवळतो… जुन्या घराचा, अंगणातल्या तुळशीचा, उन्हाळ्याच्या सुट्टीचा, चुलीवरच्या स्वयंपाकाचा आणि सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे मायेचा!

​‘नात्यांचं महावस्त्र’ विणताना आपण आतापर्यंत आईची ‘मायेची पैठणी’, बाबांची ‘सह्याद्रीची ढाल’, आजीची ‘संस्कारांची शिदोरी’, आजोबांचे ‘सुरकुत्यांमधील शहाणपण’, मामाचा ‘माहेरचा समृद्ध दुवा’ आणि मावशीची ‘आईची प्रतिछाया’ अनुभवली. या महावस्त्रात असाच एक अत्यंत हळवा, आपुलकीचा आणि माहेर-सासर या दोन घरांना जोडणारा रेशमी धागा म्हणजेच ‘आत्या’!

​तुम्ही म्हणाल, कशासाठी सांगत आहात ही नाती? तर नात्यांनीच कुटुंब आणि समाज जोडला जातो. आपलं जीवन समृद्ध होतं ते नात्यांमुळेच ना! आपल्याला एकट्याला काय महत्त्व आहे?

​जशी आईची बहीण म्हणजे मावशी, तशी वडिलांची बहीण म्हणजे आत्या. मावशी आणि आत्या… नावं वेगळी आहेत, नाती वेगळी आहेत; पण माया आणि प्रेम यात फरक नाही. कदाचित व्यक्तिपरत्वे थोडाफार फरक कोणाला जाणवू शकेल, पण त्याचा विचार इथे आपल्याला करायचा नाही.

​वडिलांच्या बहिणीला आपण ‘आत्या’ म्हणतो. नात्यांच्या व्याख्येत ही माहिती अगदी पुस्तकी आणि बरोबर आहे; पण भावनेच्या कोशात ‘आत्या’ या शब्दाचा अर्थ एवढाच नसतो. आत्या घरातील सगळ्या नात्यांना व्यापून उरते. आत्या म्हणजे बाबांच्या माहेरची जिवंत आठवण.

​‘बाबांचं माहेर?’ तुम्ही म्हणाल, “अहो, माहेर आईचं असतं, बहिणीचं असतं; बाबांचं कसं असेल?”

​पण मला वाटतं, बाबा लहान असताना ज्या गावी राहिले, ज्या घरात राहिले आणि आई-बाबा आदी ज्या व्यक्तींसोबत राहिले, ते ठिकाण म्हणजे त्यांचं माहेरच! एखाद्या स्त्रीला आपल्या माहेरची जेवढी ओढ असते, तेवढीच ओढ बाबांनाही त्यांनी बालपण जिथे घालवलं, ज्यांच्यासोबत घालवलं त्या नातेवाईकांची आणि मित्रांची असते. आणि आत्या म्हणजे बाबांच्या बालपणाची साक्षीदार! एकाच घरात वाढलेले, बरोबर जेवलेले, दंगामस्ती केलेले, छोट्या-मोठ्या कारणांवरून भांडलेले, रुसलेले आणि पुन्हा हसलेले. आपल्या बाबांना ‘अरे’ म्हणून हक्काने हाक मारणाऱ्या मोजक्या व्यक्तींमधली ती एक! आणि म्हणूनच कदाचित ‘आत्या’ या नात्यात आपल्या बाबांच्या बालपणाचा एक सुंदर तुकडा दडलेला असतो.

​आईच्या माहेरची माणसं आपल्याला ‘मामा’, ‘मावशी’, ‘आजोबा’, ‘आजी’ म्हणून लहानपणापासूनच जवळची वाटतात. पण बाबांच्या माहेरची माणसंही तितकीच आपली असतात, हे जाणवायला कधी कधी थोडा वेळ लागतो. कारण वडील स्वतःच्या भावना फारशा बोलून दाखवत नाहीत; त्यांच्या माहेरच्या आठवणींचा कप्पा ते सहज उघडत नाहीत. पण जेव्हा आत्या घरी येते, तेव्हा बाबांच्या चेहऱ्यावर अचानक एक वेगळंच निष्पाप बालपण उमलतं.

​”अरे, तू अजूनही तसाच आहेस!”

आत्याने बाबांना असं म्हटलं की आपण आश्चर्याने बाबांकडे पाहतो. कारण आपल्यासाठी ते शिस्तप्रिय बाबा असतात, पण आत्यासाठी तो अजूनही तिचा लहान भाऊ असतो! त्यांच्या बालपणीच्या खोड्या, भांडणं, रुसवे-फुगवे, शाळा, खेळ, आईचा धाक आणि वडिलांची शिस्त… सगळं काही तिच्या स्मरणात ताजंतवानं आणि जिवंत असतं. जसा अनेक वर्षांपूर्वीचा एखादा फोटोंचा अल्बम पाहताना आठवणी जाग्या होतात, तसाच बालपणीच्या आठवणींचा अल्बम आत्या आली की उघडला जातो. म्हणूनच आत्या म्हणजे केवळ एक नातं नाही; ती आपल्या वडिलांच्या हरवलेल्या बालपणाची खरीखुरी साक्षीदार असते.

​बालपणात आत्या म्हणजे एक वेगळीच लाडकी व्यक्ती असते. उन्हाळ्याच्या सुट्टीत आत्याच्या गावाला जाणं म्हणजे जणू एखादी आनंदी सहलच! तिच्या घरात गेल्यावर आईच्या घरापेक्षा थोडं अधिक स्वातंत्र्य मिळतं. खाण्यापिण्याच्या बाबतीतही तिचा हात थोडा सैलच असतो. “अरे, घे ना अजून एक!” आई समोर असताना ज्या गोष्टीसाठी दहा वेळा विचार करावा लागतो, ते आत्याकडे एकदाच मागितलं की मिळतं! आणि आईने जर आत्याकडे आपल्या मुलाच्या खोड्यांची तक्रार केली, तर आत्या बहुतेक वेळा मुलांचीच बाजू घेते.

​”असू दे गं… मुलंच आहेत. थोडं खेळणार, थोडा दंगा करणार!”

आत्याच्या या एका वाक्यात भाच्याला मिळालेला हक्काचा जामीन असतो! पण आत्या फक्त लाड करणारी नसते, वेळ आली तर ती प्रेमाने समजही देते. आई रागाने बोलते, बाबा शिस्तीने बोलतात आणि आत्या मायेने समजावते. तिच्या बोलण्यात अधिकार असतो, पण त्या अधिकाराला मायेची रेशमी किनार असते.

​माझ्या लहानपणाच्या अनेक आठवणी आत्याशी जोडल्या गेल्या आहेत. त्या आठवणी लिहायच्या म्हटलं, तर आत्याच्या उल्लेखाशिवाय त्या पूर्ण होणारच नाहीत. तसं तर मला दीर्घकाळ आत्याची माया लाभली. मी लहान असताना, नोकरीला लागल्यानंतर तसेच पुढे लग्न झाल्यावरही तिने माझं भरभरून कौतुक केलं आहे. माझी आत्या कल्याणला राहायची. आत्या आणि तिचे यजमान यांनी माझ्या मनावर उत्तम संस्कारांचं शिंपण केलं, त्यातून मी खूप काही शिकलो.

​माझं लहानपण एका अगदी छोट्या खेड्यात गेलं. पण आत्या कल्याणला राहत असल्याने मी दर सुट्टीत तिच्याकडे जायचो. ग्रामीण भागात राहत असलेल्या माझ्यासारख्या अजाण मुलाला शहरी संस्कृतीचा स्पर्श आणि ओळख तिच्यामुळे झाली. आत्याच्या यजमानांनी स्वतः माझ्यासोबत फिरून त्यावेळची मुंबई मला दाखवली आणि अनेक गोष्टींची माहिती दिली. त्यांनीच मला तेव्हा ‘मनाचे श्लोक’ हे पुस्तक भेट दिलं होतं. ते मला म्हणाले होते, “विश्वास, हे श्लोक पाठ कर. ते पाठ झाले की मला सांग.” त्याप्रमाणे मी तेव्हा सगळे श्लोक पाठांतर केले होते. त्यांनी त्यावेळी मला एक वही आणि पेन बक्षीस म्हणून दिले होते.

​आज इतकी वर्षं उलटून गेली, तरी ती वही, ते पेन आणि सर्वात महत्त्वाचं म्हणजे ते ‘मनाचे श्लोक’ अजूनही माझ्या हृदयात कोरलेले आहेत. पुढे याच ‘मनाचे श्लोकां’शी माझं नातं इतकं दृढ होईल आणि त्यावर माझ्याकडून एक विस्तृत लेखमाला लिहिली जाईल, याची त्या वेळी मला कल्पनाही नव्हती! माझे आतेभाऊही माझ्यापेक्षा मोठे होते, पण त्यांनीही मैत्रीच्या नात्याने माझ्याशी वागून मला खूप प्रेम दिलं आणि बऱ्याच गोष्टी शिकवल्या.

​काही नाती केवळ भेटीगाठींनी टिकत नाहीत; ती आठवणींच्या मुळांनी टिकतात. काळ जसजसा पुढे जातो, आपण मोठे होतो आणि मग शिक्षण, नोकरी, संसार, मुलं… प्रत्येक जण आपापल्या जगात रमतो. आत्याच्या घरच्या फेऱ्या कमी होतात, फोनवरच्या गप्पा कमी होतात. ‘नंतर बोलू’ म्हणता म्हणता असे अनेक ‘नंतर’ निघून जातात; पण नात्यातील ‘अंतर’ कधीच वाढत नाही.

​आजच्या काळात कुटुंबाची व्याख्याही बदलली आहे. पूर्वी एकत्र कुटुंबात आत्याचं येणं-जाणं सहज असायचं. घर मोठं होतं, माणसं जास्त होती, अंगण मोठं होतं, माणसांची मनंही मोठी होती आणि वेळही भरपूर होता. पण आता काळानुसार सगळ्याच गोष्टींचा संकोच झाला आहे. माणसं जवळ असूनही वेळ दूर निघून गेला आहे. पूर्वी आत्या अचानक दारात उभी राहायची, “काय गं, आलीस?” असा प्रश्न विचारण्याआधीच घरात तिच्या स्वागताची तयारी व्हायची! आज कोणीच अचानक येत नाही. आधी फोन येतो—”वेळ आहे का? तुम्ही घरी आहात का?” सगळ्याच गोष्टी बदलल्या.

​आत्याच्या नात्यात आणखी एक सुंदर गोष्ट असते. ती आपल्या आईची नणंद असली, तरी अनेकदा आईची जिवाभावाची मैत्रीणही असते. दोघी एकत्र आल्या की जुन्या आठवणींची पेटी उघडते. बाबांच्या बालपणातील गमतीशीर किस्से बाहेर येतात आणि मग आपल्याला कळतं—आपले बाबा ज्या व्यक्तीला ‘माझी बहीण’ म्हणतात, तिच्यासाठी ते अजूनही ‘दादा’ किंवा ‘भाऊ’च आहेत. लग्नातील किंवा इतर कौटुंबिक कार्यक्रमांच्या आठवणी निघतात; घर काही क्षण का होईना, पुन्हा हसतं-खेळतं होतं.

​भावाबहिणीचं नातंही अतिशय विलक्षण असतं. लहानपणी एकमेकांशी क्षुल्लक गोष्टीवरून भांडणारे, मोठे झाल्यावर एकमेकांच्या संकटात धावून जाणारे! संसाराच्या वाटेवर दोघे वेगवेगळ्या घरात गेले, तरी मनाच्या एखाद्या कोपऱ्यात त्यांचं माहेरचं घर कायम राहतं; आणि त्या माहेरच्या घराची एक जिवंत खूण असते—‘आत्या’.

​म्हणूनच, दुर्दैवाने जेव्हा वडील जग सोडून जातात, तेव्हा आत्याला होणारं दुःख फक्त भावाच्या जाण्याचं नसतं; तिच्या आयुष्यातील एक संपूर्ण मोठा अध्याय बंद झाल्याचं असतं. ‘माझा भाऊ’ म्हणत ज्याच्याशी ती आयुष्यभर बोलली, भांडली, हसली, रुसली… त्याचा आवाज अचानक कायमचा शांत झालेला असतो. त्या वेळी आत्याच्या डोळ्यांतून वाहणारे अश्रू पाहताना आपणही अंतर्मुख होतो. तेव्हा जाणवतं की नाती केवळ रक्तावर आधारित नसतात, आठवणींची मुळे त्याहून खूप खोल गेलेली असतात!

​आत्या आणि भाचा-भाची यांचं नातंही तितकंच सुंदर. आई-वडिलांच्या शिस्तीच्या चौकटीबाहेर मायेची एक मोकळी खिडकी उघडी ठेवणारी व्यक्ती म्हणजे आत्या! भाच्यांच्या यशात मनापासून आनंद मानणारी आणि त्यांच्या अपयशातही त्यांना प्रेमाने धीर देणारी. आज भाचा मोठा झाला, त्याला स्वतःची मुलं झाली, तो स्वतः बाबा झाला; तरी आत्याच्या नजरेत तो अजूनही तोच छोटासा मुलगा असतो. “किती मोठा झालास रे!” हे वाक्य आत्या जितक्या वेळा म्हणते, तितक्या वेळा आपल्याला जाणवतं की तिच्या मनात आपण कधीच मोठे झालेले नसतो. आणि आजच्या कृत्रिम जगात ही गोष्ट किती दिलासा देणारी असते!

​आत्याला हिंदीत ‘बुआ’ म्हणतात. अनेक हिंदी चित्रपटांतून, मालिकांतून आणि कथांमधून हे नातं आपल्याला डोकावताना दिसतं. पण भाषा बदलली की नातं बदलत नाही. ‘आत्या’ म्हटलं की जशी आपल्या मनात मायेची एक ओळखीची प्रतिमा उभी राहते, तशीच ‘बुआ’ म्हटलं की हिंदी भाषिकांच्या मनातही! शब्द वेगळे, उच्चार वेगळे; पण नात्याची ऊब मात्र तीच! ‘बुआ’ या शब्दातही एक वेगळीच गोडी आहे. हिंदी घरात कदाचित “बुआ के घर चलो!” असं म्हटलं की बालपणाला आनंदाची चाहूल लागते, आणि मराठी घरात “आत्याकडे चल!” म्हटलं की बालपणाला पंख फुटतात! पण दोन्हीकडे स्वागत करणारा मायेचा हात मात्र अगदी सारखाच असतो. कारण नाती भाषेच्या सीमा मानत नाहीत—‘आत्या’ असो की ‘बुआ’!

​आजच्या डिजिटल युगात नाती एका क्लिकवर जोडली जातात आणि एका क्लिकवर दूरही जातात. व्हिडिओ कॉलवर चेहरे दिसतात, संदेशांमध्ये शुभेच्छा येतात. पण आत्याने हातावर ठेवलेला उबदार हात, डोक्यावरून फिरवलेली मायेची थाप आणि “काळजी घे रे!” म्हणताना तिच्या आवाजात उतरलेली खरीखुरी काळजी… याला जगात कोणत्याही डिजिटल तंत्रज्ञानाचा पर्याय नाही.

​वय वाढतं तसं माणसाला महागड्या भेटवस्तूंपेक्षा माणसं अधिक हवीहवीशी वाटतात—विशेषतः आपल्या माहेरच्या आठवणींशी जोडलेली माणसं. कारण ज्या घरातून ती कधीतरी सासरी गेली, त्या घरातील माणसं, आवाज, हसणं-रडणं, रुसवे-फुगवे, सण-उत्सवांची लगबग… सगळं तिच्या मनात कुठतरी जिवंत असतं. तिच्या माहेरच्या आठवणींचा शेवटचा धागा कधी कधी तिच्या भावाच्या मुलांशी जोडलेला असतो.

​म्हणूनच आत्याला भेटणं म्हणजे केवळ एका नातेवाईकाला भेटणं नव्हे! ते आपल्या वडिलांच्या बालपणाला भेटणं असतं. आपल्या कुटुंबाच्या जिवंत इतिहासाला भेटणं असतं. आणि आपल्या स्वतःच्या बालपणातील एका सुंदर पानाला पुन्हा अलगद स्पर्श करणं असतं.

​‘आत्या’ हे नातं माहेरच्या अंगणातल्या त्या जुन्या, समृद्ध झाडासारखं असतं… ज्याच्या सावलीत आपण कधीतरी खेळलो होतो, ज्याच्या फांद्यांवर कधी झोका घेतला होता; आणि आयुष्याच्या उन्हात खूप पुढे आलो, तरी ज्याची शीतल सावली मनातून कधीच जात नाही… आत्या म्हणजे त्या सावलीचं मायेचं नाव!

 

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ सेफ्टी डोअर… ☆ श्री संजय जोगळेकर ☆

श्री संजय जोगळेकर

? जीवनरंग ❤️

☆ सेफ्टी डोअर ☆ श्री संजय जोगळेकर 

आज वंदनाताई वेगळ्याच मूडमध्ये होत्या. सकाळचे आठही वाजले नव्हते पण आज अंघोळ, पूजा आवरून तयार होत्या. आज एक ठेवणीतली साडी नेसून तयार होऊन बसल्या होत्या.

खरं म्हणजे नेहमीच्या रूटीन प्रमाणे सकाळची आठची वेळ म्हणजे वंदनाताईंची बाहेरच्या टेरेसवरील झोपाळ्या वर बसून चहा आणि मोबाईलचा आस्वाद घेण्याची.

पाच एक मिनिटापूर्वीच त्यांची सून आणि मुलगा लगबगीने ऑफिसला निघाले.

जाता जाता त्यांनी विचारले सुद्धा

“आई आज एवढी नटून थटून बसलीस….. कुठे लग्नाला वगैरे जायचं आहे का तुला? खूप छानसा बुके ही मागवला आहेस म्हणून विचारतोय”.

“अरे लग्नाला वगैरे नाही. काम झालं की तुम्हाला सांगेन आधीच सांगितलं तर ते काम होत नाही असं म्हणतात. ”

“बरं बरं…. ऑल द बेस्ट. ”

खरंच वंदनाताईंच्या दृष्टीने ते एक वेगळं काम होतं. काम म्हणजे काय त्यांची आज एक लाडकी मैत्रीण येणार होती बऱ्याच महिन्यांनी…. काहीतरी नवीन स्कीम घेऊन.

तिचं नाव होतं तन्वी…. “भान” संस्थेची एक सेविका. वेळेची अगदी पक्की.

तन्वीला यायला अवघी पंधरा मिनिटे बाकी होती, तेवढ्यात वंदनाताईंनी जमेल तेवढं घर आवरून घेतले. घराबाहेर एक छान उदबत्ती लावली.

हॉल मध्ये एक रूम फ्रेशनर देखील मारला.

त्या पंधरा मिनिटात विचारांचे अगदी काहूर माजले होते त्यांच्या डोक्यात. कशासाठी येणार असेल तन्वी? काय स्कीम असेल?

“भान” संस्थेची तन्वी भेटल्यापासून वंदनाताईंची लाईफस्टाईल बरीचशी सिस्टिमॅटिक झाली होती. ठराविक वेळीच घरची पूजा करणे, सकाळ संध्याकाळ घराबाहेर उदबत्ती लावणे, आठवड्यातून ठराविक दिवशी देवळात जाणे, संध्याकाळची प्रार्थना वगैरे वगैरे बरेच काही. असो.

इतक्यात दारावरची बेल वाजली.

तन्वीच आली होती… आज एक वेगळाच पेहराव होता तिचा. डार्क ब्लू कलरची जीन्स अर्थात कुठेही न फाडलेली. पिवळसर रंगाचा एक छानसा कॉटनचा कुर्ता, एक ब्रँडेड पर्स, गळ्यामध्ये बारीक मोत्याची माळ आणि सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे जीन्स असून देखील तन्वीने लावलेली एक छानशी टिकली. ती टिकली लक्ष वेधून घेत होती. जरा एक special च होती ती.

अगदी मोहरून गेल्या वंदनाताई.

“अगं किती महिन्यांनी आलीस आणि किती सुंदर दिसतेस गं तू. घरी गेल्यावर आईला दृष्ट काढायला सांग”.

तन्वी फक्त गालातल्या गालात हसली.

तशी वंदनाताई म्हणाल्या, “ तन्वी…… वेळ न दवडता बोल बाई लवकर. नाहीतर तुमच्या संस्थेच्या नियमाप्रमाणे तीन मिनिटापेक्षा जास्ती बोलायचे नसते ना? तीन मिनिटे केव्हाच संपायची. हो….. आणि safety door च्या आतूनच बोलतेय मी…… तुमच्या नियमाप्रमाणे. ”

“ सांगते सांगते….. नीट ऐका. “भान” संस्थेतर्फे मी जेव्हा काही महिन्यांपूर्वी आपल्याकडे आले होते तेव्हा मी म्हटलं होतं की आमच्या संस्थेची कुठलीही स्कीम नाही, योजना नाही, आमची अपेक्षा नाही, पण “भान” ला नाईलाजाने बदलावे लागले. आता एक नवीन स्कीम आणली आहे…. फक्त तरुण मुलींसाठी. स्कीम म्हणजे काय फक्त आपली लाईफस्टाईल थोडीशी बदलायची.

आता स्कीम ऐका….

आपल्या देशाच्या सिंदूर मोहिमेला मे महिन्यात एक वर्ष झालं ना. वर्षपूर्तीचे औचित्य साधून ही स्कीम सुरू केलीय. आमची संस्था प्रत्येक Interested स्त्रीला एक “सिंदूर” चे म्हणजे टिकल्यांचे पाकीट विकत देते, ज्यात साधारणपणे 400 टिकल्या असतात. पारंपारिक, काळ्या, लाल, मरून, हिरव्या, पिवळ्या अशा गोल आकाराच्या आहेतच पण त्याशिवाय राफेल, ब्रह्मोस, S 400, sky striker suicide, drone, धनुष्यबाण, त्रिशूल अशीही चित्रे या टिकली वर print केल्येत. अर्थात टिकलीचा आकार गोलच आहे कारण तो आम्हाला शक्यतो बदलायचा नाहीये.

या चारशे टिकल्यांपैकी तुमच्या आवडीच्या हव्या त्या टिकल्या तुम्ही लावायच्या….. त्या देखील प्रत्येक महिन्याच्या 7, 8, 9 आणि 10 या तारखेला. ओळीने तीन महिने असे करायचे आणि त्याचा foto तुमच्या फेसबुक किंवा instagram वर टाकायचा आणि आमच्या संस्थेला पाठवायचा. फोटो टाकल्यानंतर ती स्त्री दिवसभर टिकली ठेवेलच असं नाही. हे आम्ही गृहीत धरलं आहे किंबहुना आमची तशी फारशी अपेक्षाही नाही. ”

मध्येच थांबून वंदनाताईने तिला विचारले,

” तरीच तू लावलेली टिकली मला काहीतरी special वाटली. “

तन्वी म्हणाली, “हो, यात S400 चे चित्र आहे”

“अय्या, सॉलिड…… काय छान आयडिया आहे. Great. किती कल्पकता….. पुढल्या महिन्यातच हळदी कुंकू आहे. हळदी कुंकवाला लुटायला खूप छान item आहे हा. अगदी एक पाकीट जरी घेतले तरी 4 बायका adjust होतील त्यात. आणि हो…… किती किंमत असेल गं एका पाकिटाची?

तन्वी थोडीशी गंभीर होऊन म्हणाली, “ अहो ताई पैशाचे जाऊ द्या…. जी गोष्ट आपल्या मुलींकडून सहजतेने घडायला हवी ती घडत नाही म्हणून अशी कल्पकता आणि अशा स्कीम आणाव्या लागतात. आपल्या धर्माचे दुर्दैव दुसरं काय. नाईलाज आहे आमच्या संस्थेचा. नुसती कल्पकता नाही तर काहीतरी आमिष दाखवावं लागलं. या चारही तारखांचे सलग 3 महिने टिकली लावलेले ज्यांचे फोटो आमच्याकडे येतील त्यांना आम्ही दुप्पट पैसे म्हणजे 500 रुपये परत करू. अहो 250 रुपये तर ही फक्त त्याची manufacturing cost आहे. तसंच आमचे जे मासिक निघते ना त्यात या सगळ्यांचे फोटो देखील छापणार आहोत. ”

“अय्या किती मस्त” वंदनाताई म्हणाल्या.

आता तर वंदना ताईंच्या डोळ्यातून फक्त अश्रू यायचे बाकी होते. त्यांनी स्वतःला सावरले आणि म्हणाल्या, “अग तन्वी आत ये ना गं…. आजच्या दिवस तुमचा नियम मोड ना गं…. मी सेफ्टी डोअर उघडते. बैस तरी पाच मिनिट, तोंड गोड करते तुझं…… बस ना…. नेहमीच तू घाईत असतेस. “

त्या आनंदाच्या भरात वंदनाताईंनी सेफ्टी डोअर हळूच उघडले.

तन्वी म्हणाली, “नाही हो काकू, मला खूप काम आहे आत्ताशी कुठे तुमचं पहिलंच घर झालं आहे आणि अशा गप्पा मारत बसले आणि तोंड गोड करत सुटले तर माझं टार्गेट नाही पूर्ण होणार”

“अगं पण मला एक सांग…. खरंच पैशाच्या आणि प्रसिद्धीच्या अपेक्षेने आम्हा बायकांनी तुमच्या टिकल्या विकत घेतल्या आणि लावल्या तर तुम्हाला किती भुर्दंड पडेल. पैसा तर किती खर्च होईल आणि असे तुझ्यासारखे कितीतरी कार्यकर्ते असतील ना मग किती संख्या होईल त्याची. कशाकरता हा आटापिटा? यातून फायदा तर नाही उलट संस्थेच्याच खिशातील पैसे जाणार. ”

तन्वी म्हणाली “अहो काकू हेच तर वाईट आहे ना. पैसे गेले तर गेले, पण या आपल्याच हिंदू मुली. आपलीच परंपरा जपताना लाज वाटते ना यांना. आमच्या संस्थेचे जाऊ द्या, पण युट्युब वर “भारतीय महिलांची टिकली” किंवा “कुंकू” असा तुम्ही टॉपिक टाकून बघा, कितीतरी शास्त्रोक्त आणि उपयुक्त माहिती मिळेल तुम्हाला. “

“आमच्या संस्थेवर तुम्ही नका अवलंबून राहू पण युट्युब युनिव्हर्सिटीचे तरी ऐका म्हणजे तरी तुमचा विश्वास बसेल. “

“आपल्या हिंदू मुलींना कितीतरी गोष्टी सांगाव्या लागतात, शिकवाव्या लागतात गळी उतरवाव्या लागतात आणि हे जर झाले नाही तर काहीतरी वेगवेगळ्या स्किम्स पैसा आणि प्रसिद्धीचे आमिष दाखवून आणाव्या लागतात. जाऊ द्या. ”

वंदनाताई ना काय बोलावे ते सुचेना. क्षणभर दोघीही शांत होत्या.

तन्वी ने विचारले “मग तुमच्या सुनेचे नाव Register करू ना? “

म्हणाल्या, “अगं विचारायचे काय? ”

“अहो, तसं नाही काकू, एकदा तिला फोन लावा…. तिला “हो” म्हणू द्या. ”

“अग ताई, माझी सून माझ्या शब्दा बाहेर नाही गं. आमच्या घरचे दोन मेंबर धर. ”

“दोन मेंबर कोण? ”

“अगं….. दुसरी मी. ”

“माफ करा वंदनाताई, तुम्ही मेंबर नाही होऊ शकणार. ”

“का बरं? ”

“मी पण आहे की इंस्टाग्राम वर फेसबुक वर व्हाट्सअप वर सगळीकडे आहे. अहो ताई एक सांगायचे राहिले. तुम्ही वयाच्या अटीत बसू शकत नाही, कारण ही योजना फक्त 20 ते 40 या वयोगटातल्या बायकांनाच लागू आहे. ”

इतका वेळ उत्साहाने बोलणाऱ्या वंदनाताई क्षणार्धात हिरमुसल्या….. रडवेल्या झाल्या.

तन्वीने देखील नाईलाजाने अगदी अलगदपणे सेफ्टी डोअर ओढून घेतले आणि म्हणाली, “वाट बघते तुमच्या सुनेच्या फोनची. “

– – वंदनाताई सेफ्टी डोअर मधून पाठमोऱ्या तन्वी कडे शांतपणे बघत होत्या

 

© संजय मुकुंद जोगळेकर

मो. 9867180426 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ प्राजक्त सडा… ☆ डॉ. नेहा भटकर ☆

डॉ. नेहा भटकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ प्राजक्त सडा… ☆ डॉ. नेहा भटकर

परवा पहाटे अंगणातील पारिजातकाच्या हसऱ्या नाजूक फुलांचा सडा अंगणभर पसरलेला बघितला अन् पाय आपोआपच तिकडे वळले. मन उगाचचं या फुलांची नी आपली पहिली भेट नेमकी कधी झाली हे आठवायला लागलं तशी एक नवीनच गोष्ट ध्यानी आली. ती अशी की या फुलापानांच्या झाड झाडोऱ्याच्या रंगीबिरंगी दुनियेशी माझा परिचयच मुळी पारिजातामार्फत झाला. माझ्या आठवणीतील फुलांच्या परिचयाचा विचार करता, मला जितकं आठवतं, त्यानुसार अगदी पहिल्याप्रथम फुल म्हणून जे माझ्या समोर आलं ते पारिजातकाचचं फुल होतं. त्याआधी भलेही कितीतरी फुलं आणि झाडं बघितली असतीलही पण जाणिवेच्या स्तरावर झालेली प्रथम अनुभूती ही प्राजक्ताचीच. सरकारी नोकरीमध्ये असलेल्या माझ्या वडिलांच्या क्वार्टरच्या भल्यामोठ्या आवारवजा अंगणात अगदी दारासमोरची भली थोरली दोन पारिजाताची झाडं, श्रावण भाद्रपदात बहरली की प्रत्येक पहाट दूर दूर पर्यंत सुगंधी सुबक गर्द केशरी दांड्यांच्या चांदणंफुलांची उधळण करायची. त्या बालवयात कधी भिजलेली तर कधी कोरडी प्राजक्त फुलं एक एक करून अलगदपणे फ्रॉकच्या ओच्यामध्ये वेचता वेचता पहाट अपुरी पडे. अंमळ जराशाने जरी दिवस वर आला की त्या दिवसातली कोवळी सूर्यकिरणे सुद्धा प्राजक्त फुलांना सोसवेनात. या सगळ्या उद्योगात आवारातील अनेक जण असायचे. आमच्या चिमुकल्या हातातील सुवासिक हसऱ्या फुलांच्या ओंजळींच्या आठवणीने परवाची पहाट अधिकच प्रसन्न करून टाकली. तेव्हापासून मधली काही थोडी वर्षे शिक्षणानिमित्त घराबाहेर राहण्याचा काळ वगळता अगदी आजतागायत घराच्या अंगणात पारिजात माझ्या सोबतीला आहे. पारिजात आपल्या अंगणात नसला तरीही श्रावण भाद्रपदात दरवळणारा तो, कुण्या घराच्या आवाराच्या भिंतीवरून डोकावणाऱ्या डहाळीवरील शुभ्र नाजूक पाकळ्या आणि केशरी दांड्यांच्या मोहक इवल्या फुलांचा सडा रस्त्यावर जाता येता दिसला की क्षणभर तरी तिथे घुटमळायला लावणारा वा तिथून जाताना पावलांची गती तरी मंदावणारा, नकळत सुवासाच्या लालसेने एक दिर्घ श्वास घ्यायला लावणारा. असं हे त्याचं बहरणं, दरवळण आणि लागोलाग तो सुंदर सुवासिक फुलांचा खजिना सर्वत्र उधळूण, त्याच्या अस्तित्वाची नोंद घ्यायला भाग पाडणारं त्याचं वागणं.

हा जादुई पारिजात वृक्ष पूढे पुराणकथांमधून भेटला. समुद्रमंथनातून उपजलेला एक अलौकिक असा स्वर्गलोकीचा वृक्ष म्हणून त्याची ओळख. सत्यभामेच्या हट्टाखातर श्रीकृष्णाने मोठ्या पराक्रमाने इंद्राला पराजित करून भूलोकी आणलेला. या कथेचा संदर्भ घेऊन बालकवी त्यांच्या सुप्रसिद्ध ‘श्रावणमास’ कवितेत लिहितात ‘पारिजातही बघता भामा रोष मनीचा मावळला’ आणि या कवितेच्या निमीत्त्याने पारिजात पुन्हा आम्हाला क्रमिक पुस्तकाच्या पानावर एका वेगळ्या छापील रूपात व गंधात भेटला. आमच्या इयत्ता चौथीच्या शाळकरी वयात मराठी बालभारतीमधील बालकवींचा हा बहरलेला पारिजात आणि हर्षोल्हासित भामा वाचून फार आनंद व्हायचा. पण पुढे असे कळले की कसलं काय, सत्यभामेचा रोष पुन्हा उफाळून आला. ‘पारिजात माझ्या दारी, फुले का पडती शेजारी’ हे ‘बहरला पारिजात’ या नाटकातील ग. दि माडगूळकर यांनी रचलेलं आणि माणिक वर्मा यांनी गायलेलं हे नाट्यपद जेव्हा ऐकलं, तेव्हा कुठे भामेच्या रोषाचा उलगडा झाला. त्यायोगे पुन्हा एक पारिजात, त्याची आणखी एक खासियत आणि त्यासंबंधीची एक वेगळी पुराणकथा कळली. पारिजात सत्यभामेच्या दारी पण फुलांचा सडा शेजारच्या अंगणात अर्थात रुक्मिणीच्या. त्यामुळे भामेने मनाचा त्रागा करून घेणे हे ओघाने आलेच.

पुराणकथा आणि कवितांमधून बाहेर पडलेला पारिजात महाविद्यालयीन अभ्यासक्रमात पुन्हा एकदा त्याच्या शास्त्रीय आणि सौंदर्यपूर्ण तपशिलासह डोकावला. जागतिक स्तरावर विचार करता पारिजाताच घराणं हे मूळचं भारतीय उपखंड आणि दक्षिणपूर्व आशिया या भागातलं. भारतामध्ये तर हा सर्वदूर आढळणारा, अत्यंत देखणेपणाने फुलणारा, एकूणच शुभंकर म्हणून सर्वज्ञात. पारिजाताच शास्त्रीय नाव निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस’ (Nyctanthes arbor-tristis) म्हणजेच रात्री फुलणारा आणि पहाटेच्या अंधुक प्रकाशात सूर्योदयापूर्वीच फुलोराचं जमिनीवर शिंपण करणारा. जो रात्रीला असंख्य सुगंधी फुलांनी दरवळतो जणू काही आकाशातल्या शुभ्र चांदण्या आपल्या अंगाखांद्यावर केशरी कुपीतील सुगंधाचे लेणे लेवून मिरवतोय आणि उजाडायला लागलं की एक एक करून सगळी फुलं अलगदपणे जमिनीवर झरायला लागतात व संपूर्ण झाड पुन्हा पुढल्या रात्री फुलायला मोकळं. रात्रीला बहरणाऱ्या या झाडाला इंग्लिशमध्ये नाईट ब्लूमिंग जास्मिन (Night blooming Jasmine आणि उजाडायच्या आधीच फुलांच्या होणाऱ्या गळतीमुळे त्याला ट्री ऑफ सारो (Tree of sarrow), सागरी प्रवाळासारख्या केशरी मोहक दांडीमुळे त्याला कोरल जास्मिन (Coral Jasmine) असेही म्हणतात. इथे शास्त्रीय दृष्ट्या जस्मिन या शब्दाचा इतर अनेक जस्मिन कुळातील सुगंधी फुलझाडांचा दुरान्वयानेही संबंध नाही. विविध भारतीय भाषांमध्ये त्याची अनेक नावं आहेत जसे हिंदी व गुजराती मध्ये हरसिंगार, तमिळ मध्ये पवळा मल्लिगाई, मराठी मध्ये पारिजातक वा पारिजात, मल्याळममध्ये पारिजातकम, बंगाली व संस्कृतमध्ये शेफालीका वा शिऊली, प्राजक्त… वगैरे. पौराणिक कथांमध्ये स्वर्गलोकीचा वृक्ष म्हणून ओळखला जाणारा प्राजक्त, गंध आणि सौंदर्यामध्ये ज्याचं नाव अग्रक्रमाने घेतले जातं, औषधी शास्त्रातील त्याची महत्ता आणि उपयुक्तता सुद्धा जगनमान्य आहे. फुलांच्या गंध आणि रूप सौंदर्याशिवाय पारिजातक अनेक औषधी गुणधर्म देखील बाळगून आहे. आसाम आणि बंगालमध्ये पारिजात फुलांनी अनेक पाककृतींमध्येही प्रवेश केलायं आणि त्यांच्या खाद्य संस्कृतीचा भाग झालीत. फुलांच्या केशरी दांड्या बऱ्याचदा पदार्थाला रंग येण्यासाठी महागड्या केशरला पर्याय म्हणूनही वापरतात असेही ऐकिवात आहे. दांड्यांचा गर्द केशरी नैसर्गीक रंग हा तर आपल्या रेशमी कापड उद्योगात अगदी अग्रक्रमाने वापरला जातो. झाडावरून जमिनीवर पडलेलं फुल देवपूजेत नको हा संस्कार पण त्याला अपवाद आहे तो केवळ पारिजात फुलांचा, ती वेचायची त्यावर पाणी शिंपावे व खुशाल देवाला वाहायची.

आकोटजवळील सातपुड्याच्या पर्वतरांगांमध्ये वसलेल्या धारगडच्या निसर्गरम्य परिसरातील भटकंतीत असाच एकदा ध्यानीमनी नसताना, अगदी धारगडच्या महादेवाच्या गुंफेच्या खडकाळ डोंगर माथ्यावर उभा असलेला पारिजात, श्रावणात महादेवाला फुलांचा अभिषेक करीत असताना दिसला आणि कोण आनंद झाला हे शब्दात सांगणं कठीणच. हा वन्य परिसरात भेटलेला पारिजात न विसरणाजोगाच.

आज घडीचा हा अंगणात फुललेला पारिजात, काहीवर्षांपूर्वी मी नोकरीनिमित्ताने राहत असलेल्या माझ्या आकोटच्या घरातील पारिजाताच्या तिसऱ्या पिढीचा प्रतिनिधी. त्याचं झालं असं की आकोट येथील पारिजाताखाली उगवलेलं इवल्यासं रोपटं, आमच्या मित्र परिवारातील अमरावती निवासी कुटुंबाला भेटीदाखल दिलं. त्यांच्या अमरावतीच्या घरी त्याचा छान बहारदार वृक्ष झाला. पूढे जेव्हा आम्ही आमचं बिऱ्हाड आकोटहून अमरावती मुक्कामी हलवलं, तेव्हा त्यांनी त्याचं मैत्रीच्या नात्याने त्यांच्याकडील पुढल्या पिढीचा नवजात पारिजात आमच्या अंगणी लावायला आता पंधरा वर्षांहून जास्त काळ लोटला. कुठलेही फुलण्याचे निश्चित वेळापत्रक नसलेली, वर्षभरात केव्हाही ढगाळ दमट वातावरण जमून आले की लगेच पानोपानी पिवळसर पांढऱ्या हलक्या पोपटी छटेच्या असंख्य घमघमत्या सुगंधीत फुलांनी फुलून येणारी, स्वतःला डेरेदार करण्याच्या नादात चहुकडे विस्तारणारी कुंती वा कामिनी एकीकडे तर आकाशाशी स्पर्धा करणारा शेवगा दुसरीकडे, या दोघांच्या मध्ये माझ्या अंगणातील सध्याचा पारिजात, जमेल तसा अगदी निमूटपणे स्थिरावलाय. त्याची मुळी कुणाशीही स्पर्धा नाही.

जवळपास वर्षभर टपोऱ्या फुलांनी फुलणाऱ्या कोपऱ्यातील ऐटबाज चाफ्यासारखा तो डौलदारही नाही की कोवळ्या वा कडक उन्हाच्या तिरीपाचे कलाबूत लिलया अंगावर खेळवित चमचमणाऱ्या रुपेरी पानांनी भरारलेल्या समोरच्या सळसळत्या पिंपळासारखा देखणाही नाही. पारिजातकाकडे एरवी कुणाच्या कौतूकभरल्या नजरा वळणे तसे कठीणच. तो आपला वर्षभर निव्वळ खरखरीत पाने ओबडधोबड सालीच्या मातकट खोडानिशी ऊभा. जेव्हा दरवर्षी नित्यनेमाने श्रावण भाद्रपदातील दरेक रात्री त्याची फांदीनफांदी अगणित वेधक केशरी दांड्यांच्या नाजूक सुगंधित शुभ्र फुलांनी, जणू आकाशातील तारकाच, लगडून जाते तेव्हा हे स्वर्गीय सौंदर्य बघून अवघा भवताल नक्कीच चकित आणि पुलकित होत असणार यात शंका नाही. त्याला मात्र त्याच्या या अप्रतिम सौंदर्याचे काहीही नाही. ते विलक्षण सुवासिक, नाजूक आणि तितकंच रेखीव पांढऱ्या केशरी रंगाचं वैभव तो अंगावर मिरवीतही बसत नाही. अगदी पहिलं सूर्यकिरण अंगावर पडायच्या आत तो आपलं एक एक विलोभनिय सुगंधित आभूषण धरणीला अर्पण करायला लागतो, एक प्रकारचं अर्घ्य दानचं जणू. त्यासाठी तो वाऱ्याच्या हलक्याशा झुळकेची देखील वाट बघत नाही. फांदीवरून एकेक फुल गळताना बघणे, केवळ स्वर्गीय आनंद, त्यासाठी आपली पहाट मात्र मोकळी असायला हवी. बहुगुणी पारिजाताचं श्रावण भाद्रपदातील दरवळलेल दर्शन खरोखरीच विलोभनीय तर आहेच आणि आपसुकच त्याला बघून मनात दातृत्व, मांगल्य, शुचिता अशा भावनांचा उन्मेष उमटल्यास नवल ते काय. पारिजाताला मात्र सुंदर सुगंधी फुलांच्या ओंजळींची मुक्त्तहस्ते उधळण करणे एवढंच ठाऊक.

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©  डॉ. नेहा विनोद भटकर

अमरावती

मो ९९७५०३०६२७ 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ एक मस्त आगळावेगळा अनुभव ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ एक मस्त आगळावेगळा अनुभव ☆ श्री सुधीर करंदीकर

मी ड्रायव्हर सीटवर आणि शेजारी आरटीओ (पुण्याच्या रीजनल ट्रान्सपोर्ट ऑफिसचे मुख्य) असा प्रवास — सातारा ते पुणे”

शीर्षक जरा विश्वास न बसण्यासारखं नक्कीच वाटलं असेल. पण हा माझा एक खरा अनुभव आहे. त्याचं झालं असं —

साधारण 1990 ची घटना असेल. मी टेल्को कंपनी मध्ये (म्हणजे सध्याची टाटा मोटर्स) चिंचवडला फाउंड्री या विभागात सर्विस ला होतो.

मशीन ची दुरुस्ती हा विभाग माझ्याकडे होता. ट्रक ला लागणाऱ्या सगळ्या कास्टिंगचा पुरवठा आमच्या फाउंड्री मधून होत असे.

निरनिराळ्या कास्टिंगचे साचे तयार करण्याकरता परदेशातून आणलेली खूप मोठी मोल्डिंग मशीन होती. त्याच मशीन मध्ये एक अजस्त्र पार्ट होता त्याचे नाव होते Anvil.

काही वर्षांच्या वापरानंतर हा भाग वियर आऊट होतो आहे हे लक्षात आले. म्हणून जर्मनीहून नवीन पार्ट मागवण्यात आला. नवीन पार्ट मशीन मध्ये बसवला आणि जुना पार्ट रिपेयर होणार नाही या कल्पनेने स्क्रॅप यार्ड मध्ये नेऊन ठेवण्यात आला. याचे वजन साधारण चार टन होते, उंची साधारण आठ फूट आणि डायमीटर साधारण तीन फूट होता. अशा अजस्त्रेमुळे कोणी स्क्रॅप नेणारे पण त्याला नेत नव्हते.

साहेबांच्या असे लक्षात आले की हा पार्ट रिपेअर करून घ्यायला काय हरकत आहे. कारण आता पुन्हा नवीन पार्ट मागवायचा झाला तर त्याची किंमत साधारण 16 लाख रुपये आहे. जुना पार्ट रिपेअर करता आला तर बराच खर्च वाचू शकेल. साहेबांनी हे काम माझ्यावर सोपवले.

रिपेअर चे काम कसे करता येईल याचा मी आराखडा तयार केला. हे काम कुठे करून घेता येईल याची चौकशी सुरू केली. साताऱ्याजवळ सातारा रोड येथे भारत फोर्ज यांचे मोठे वर्कशॉप आहे, तिथे हे काम होऊ शकणार होते. तिथला सेटअप बघणे, त्यांना कामाची कल्पना देणे याकरता तिथे जाणे आवश्यक होते. मिटिंग मध्ये साहेबांनी लगेच याला ओके दिले. बाहेर गावी जायचे म्हणजे कंपनी टॅक्सी ची व्यवस्था करत असे. मटेरियल्स डिपार्टमेंटचे प्रमुख श्री के एस राव म्हणाले टॅक्सी च्या ऐवजी आपल्या ऑफिसची TATA 206 गाडी न्यायला हरकत नाही. साहेबांनी ओके दिला.

टेल्को नी 206 ही नवी गाडी नुकतीच लॉन्च केली होती. आणि एक नवी कोरी गाडी आमच्या डिव्हिजन ला मिळाली होती.

संध्याकाळी ऑफिस सुटल्यानंतर मी गाडीची किल्ली ताब्यात घेतली. आणि गाडी घेऊन घरी गेलो. दुसऱ्या दिवशी सकाळी साडेआठला घरून सातारा रोड कडे निघालो. कारच्या मानाने या गाडीची लांबी रुंदी बरीच जास्त आहे. गाडीचं समोरचं बोनेट खूपच लांब आहे, आणि ड्रायव्हर सीटवरून बोनेट चा काहीच भाग दिसत नाही. त्यामुळे समोरचा बंपर पण दिसत नाही. त्यामुळे गर्दीच्या रस्त्यावर गाडी चालवताना जरा मुश्किल होत होती.

भारत फोर्ज कंपनीत पोहोचलो. तिथे श्रीयुत रेड्डी प्रमुख होते. त्यांना भेटून कामाची कल्पना दिली. त्यांनी रिपेअर करण्याची एक वेगळी कल्पना समोर मांडली. ती मला जास्त आवडली म्हणून मी लगेच त्यांना त्याचे कोटेशन तयार करायला सांगितले. तिथला सेटअप बघितला आणि काम व्यवस्थित होऊ शकेल याची खात्री पटली. साधारण दोन लाखाचे कोटेशन होते. दुपारी जेवायला सातारा येथे गेलो होतो.

दुपारी चार वाजता साहेबांना बाय करून पुण्याकडे निघालो. काम छान होऊ शकते म्हणून खुशीत होतो. थोडे पुढे गेलो आणि सातारा-पुणे रोडला लागलो. काही अंतरावर डावीकडे ट्रॅफिक पोलीस च्या दोन गाड्या उभ्या होत्या. एक ऑफिसर उभे होते आणि दोन ट्राफिक पोलीस गाडी थांबवा असा हाताने इशारा करत होते.

मनात विचार आला — की माझ्याकडे ड्रायव्हिंग लायसन्स आहे पण बरोबर गाडी चे कुठलेही कागदपत्र नाहीत आणि माझे ऑफिसचे आय कार्ड पण नव्हते. मी मनातून देवाला नमस्कार केला आणि गाडी तिथे थांबवली. काच खाली केली आणि नमस्कार म्हणालो.

ट्रॅफिक पोलीस : साहेब गाडी कुठे चालली आहे

मी : पुण्याला

ट्रॅफिक पोलीस : आरटीओ साहेबांना बरोबर नेणार का. साहेबांची गाडी बंद पडली आहे.

मी : नक्कीच घेऊन जाईन.

लगेचच बाजुच्या दारातून साहेब आत आले. पोलिसांनी दार बंद केले आणि साहेबांना जोरदार सॅल्यूट ठोकला. आणि आमची गाडी पुण्याकडे निघाली. गाडीत साहेबांबरोबर छान गप्पा झाल्या. आपल्या गाडीत बाजूला खुद्द आरटीओ बसले आहेत आणि आपण गाडी चालवत आहोत याची मला मजा वाटत होती.

पुण्यात शिरल्यानंतर लागणाऱ्या चौकांमध्ये आमची गाडी बघून पोलीस सॅल्यूट करत होते. साहेब म्हणाले निलायम टॉकीज पाशी गाडी थांबवा तिथे मला नेण्याकरता गाडी आली आहे. मी गाडी साईडला उभी केली. तिथे पोलिस उभे होतेच. त्यांनी साहेबांना सॅल्यूट केला आणि दार उघडले. साहेबांनी उतरतांना मला थँक्स दिले आणि मी गाडी छान चालवतो याबद्दल कॉम्प्लिमेंटस् पण दिले.

मी गाडी सुरु केली आणि घराकडे निघालो.

माझे साताऱ्याचे कामं छान झाले होते, आणि ते काम व्यवस्थित पूर्ण होणार अशी खात्री पण मनात तयार झाली होती. आणि येताना आरटीओ बरोबर प्रवास करण्याची अशक्यप्राय म्हणा किंवा दुर्मिळ म्हणा, अशी संधी पण मिळाली होती. एकंदरीत मजा आली.

– – life is to enjoy.

 © श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ अग्नी किंवा तेज ऊर्जा ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

🌈 इंद्रधनुष्य 🌈

☆ अग्नी किंवा तेज ऊर्जा ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

अग्नी किंवा तेज तत्त्व हे पंचमहाभूतांपैकी एक अत्यंत प्रभावशाली तत्त्व आहे. मानवी जीवनात शारीरिक, मानसिक आणि आध्यात्मिक स्तरावर त्याचे अनेक फायदे होतात.

शारीरिक फायदे

पचनशक्ती (जठराग्नी) आयुर्वेदानुसार शरीरातील अग्नी अन्नाचे पचन करतो. हा अग्नी संतुलित असल्यास पचनक्रिया सुधारते आणि शरीराला ऊर्जा मिळते.

रोगप्रतिकारशक्ती सूर्यप्रकाशाच्या माध्यमातून मिळणारे ‘तेज’ शरीरातील जंतूंचा नाश करण्यास आणि हाडे मजबूत करण्यास मदत करते.

चयापचय 

शरीरातील उष्णता रक्ताभिसरण सुरळीत ठेवते आणि शरीराचे तापमान नियंत्रित राखते.

मानसिक आणि बौद्धिक फायदे

स्पष्टता आणि निर्णयक्षमता प्राप्त होते.

‘तेज’ म्हणजे प्रकाश. ज्याप्रमाणे अंधारात प्रकाश दिशा दाखवतो, त्याचप्रमाणे तेज तत्त्वाच्या प्रभावामुळे बुद्धी तल्लख होते आणि संभ्रम दूर होऊन विचारांमध्ये स्पष्टता येते.

आत्मविश्वास आणि उत्साह मिळतो

तेज ऊर्जेमुळे माणसामध्ये आत्मविश्वास निर्माण होतो. नैराश्य किंवा आळस दूर करून कार्य करण्याची जिद्द निर्माण करण्यासाठी ही ऊर्जा आवश्यक असते.

अध्यात्मिक फायदे

नकारात्मकतेचा नाश ज्याप्रमाणे अग्नी अशुद्ध गोष्टी जाळून शुद्ध करतो, त्याचप्रमाणे तेज ऊर्जा मनातील नकारात्मक विचार आणि विकार भस्म करण्यास मदत करते.

तेजस्वी व्यक्तिमत्व उपासनेतून किंवा ध्यानधारणेतून तेज तत्त्व आत्मसात केल्यास व्यक्तीच्या चेहऱ्यावर आणि स्वभावात एक प्रकारचे ‘ओज’ किंवा तेज जाणवते, ज्यामुळे समाजात त्याचा प्रभाव पडतो.

तेज ऊर्जा मिळवण्याचे काही मार्ग

१ सूर्योपासना: सकाळी लवकर कोवळ्या सूर्यप्रकाशात बसणे किंवा सूर्यनमस्कार घालणे.

२ दीप दर्शन: शुद्ध तुपाचा दिवा लावून त्याकडे त्राटक (एकाग्रतेने पाहणे) करणे. या मुळे एकाग्रता वाढते. मनातील नकारात्मकता भस्म होऊन मानसिक शक्ती मिळते.

३ सात्त्विक आहार: शरीरातील जठराग्नी प्रदीप्त ठेवणारा ताजा आणि संतुलित आहार योग्य वेळी घेतल्यास शरीरातील अग्नी, अन्नाचे रूपांतर ऊर्जेत करतो. जास्त मसालेदार व जास्त तिखट अन्न, जास्त उष्ण पदार्थ यामुळे पित्त वाढते. ते तेज किंवा अग्नीचे असंतुलित स्वरूप आहे. ते टाळण्यासाठी शीत व पाचक पदार्थांचा समावेश करावा.

जर हा अग्नी मंद झाला तर शरीरात आळस व रोग निर्माण होतात.

४ प्राणायाम व योग : भस्त्रिका व कपालभाती या सारख्या प्राणायामा मुळे शरीरातील उष्णता वाढते. व रक्ताभिसरण सुधारून मानसिक जडत्व दूर होते.

५ उष्ण पाण्याचे सेवन : कोमट पाण्याचे सेवन केल्याने शरीरातील विषारी घटक बाहेर पडतात. आणि चयापचय क्रिया सुधारते.

थोडक्यात सांगायचे तर, अग्नी किंवा तेज ऊर्जा ही माणसाला केवळ जिवंत ठेवत नाही, तर त्याला प्रगतीसाठी आवश्यक असलेले चैतन्य आणि दीप्ती प्रदान करते.

समाप्त — 

©  विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन व हिलिंग मास्टर,  समुपदेशक,  सांगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

मोबाईल नंबर – ८०८७८१०१९७

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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