हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ६ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # ६ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ छः ≡

आशी को, पहले तो कोई साड़ी पसंद नहीं आ रही थी और अब एक घंटे से, ड्रेसिंग-टेबल के सामने डटी बैठी है!

पूछता हंू, ”आखि़र यह सब करने की ज़रूरत क्या है?”

वह केवल मुस्करा देती है।

“स्त्रियां अपने को कभी नहीं बदल सकतीं!” मैं खीज कर कहता हूं।

”और स्त्रियों के हर मामले में, पुरूषों की दख़ल देने की आदत कभी नहीं जा सकती!”

कहने के बाद, वह फिर मुस्करा पड़ती है।

“अर्चना कहां है?” पूछता हूं।

”लेटी है।”

“क्यों? वह नहीं चलेगी हमारे साथ?”

”कहती है, रेस्ट करना चाहती हूं।”

“कमाल है! कल रात उसने क्या कहा था, याद है?”

”कल रात, हम दो बजे तक जागती रहीं। बातें ही ख़त्म नहीं हो रही थीं और अब उसे नींद आ रही है।”

“जाओ, तुम भी सो जाओ जाकर!” चिड़ कर कहता हूं।

”ना… मुझे तो साथ ही चलना है… आप के साथ साथ क़दम से क़दम मिलाकर… ज़रा देखूं तो वहां जाकर, वह क्या चीज़ है, जिसकी बार बार सराहना करते, दोनों भाई बहन नहीं अघाते!”

“अब तो सुना है, वह पहचानी भी नहीं जाती।”

”तब भी, मिसमार खंडरात को देख कर भी, इमारत की बुलंदी और शानोशौक़त का अन्दाज़ा हो ही जाता है!”

“तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है! उस बेचारी से ज़रा भी सहानुभूती नहीं?”

”मुझे तो आप से भी काफ़ी सहानुभूति है!”

औरत हमेशा औरत ही रहेगी! लाख पढ़-लिख जाये। समझदार और योग्य भी कहलाने लगे, किंतु अपनी इन शंकाओं और ईष्र्या से वह कभी मुक्त नहीं हो सकती! इसे साथ ही न ले जाऊं, तो?

मगर साथ जाये बिना, क्या वह टल जायेगी?

ठीक है, चली चलने दो साथ। ज़रा इसे भी तो पता चले, सौंदर्य क्या होता है। अपने को बहुत समझती है न! बड़ा ही नाज़ है इसे अपनी खूबसूरती पर! यह चार बार साड़ी बदल ले। दिन भर डेªसिंग टेबल के सामने बैठ कर बनती संवरती रहे, मगर मीता के सामने टिक पाने में कहां समर्थ होगी?

मीता पर लाख मुसीबतें टूटें, तब भी उसका सौंदर्य नष्ट नहीं हो सकता। आशाी को उसके सामने ग़रदन झुकानी ही पड़ेगी।

 

अर्चना वाक़ई हमारे साथ नहीं चल रही है।”उसे हरारत सी लग रही है। थोड़ा चिंतित हो जाता हूं।”

”चलो, पहले तुम्हें डाक्टर को दिखा दें।” मैं कहता हूं, तो वह मुस्कराने लगती है।

“दवा ले लेनी चाहिये।” आशी भी अपनी राय ज़ाहिर करती है।

उसके ‘चाहिये’ का वही उच्चारण है, लेडी टीचरों वाला!

अर्चना निश्ंिचत सी कहती है, ”ऐसा कुछ भी तो नहीं। आप तो यों ही चिंतित हो रहे हैं। मामूली थकान है, एक-आध दिन में वैसे ही ठीक हो जायेगी।”

“तो फिर उधर?”

”आप दोनों वहां हो आइये। मैं फिर किसी दिन जाकर मिल लूंगी मीता से।”

 

मीता अब तक काफी बदल गई होगी। कैसी नज़र आती होगी अब?। मिलने पर बात क्या करूंगा उससे? क्या पूछूंगा?… मुझे देखते ही वह हड़बड़ा सी जायेगी। टकटकी लगा कर देखती रहेगी… आंखों में जल भर आयेगा… फिर अचानक मुस्कराने या हँसने का प्रयास करेगी।

कहेगी, ”सो यु हैव कम।”

”यह क्या हालत बना रखी है?” पूछूंगा।

वह फिर उदास हो जायेगी… मगर मेरे साथ आशाी भी तो होगी। इसे साथ देख, वह पहले तो चैंक जायेगी। फिर अनुमान लगाकर, उसे एक बार तो झटका सा लगेगा। वह ज़रा सम्भलेगी और पुनः मुस्कराने की चेष्ठा करेगी और पूछेगी, शादी कब हुई?”

”तीन साल हो गये।”

“मुझे क्यों नहीं इन्वाइट किया शादी पर?”

मैं चुप हो जाऊंगा। उसकी ओर टकटकी लगाये देखता रहूंगा।

मगर आशी, वह इतनी देर कैसे चुप रह सकेगी? वह ज़रूर पूछेगी, ”हमारे साथ चलोगी?”

उसकी आंखों में एकाएक चमक आ जायेगी। किंतु वह चमक, देखते ही देखते अदृश्य हो जायेगी। मैं प्रश्न करूंगा, ”तुम्हारे अंकल कैसे हैं?”

“ठीक ही हैं!”

चाहूंगा, आशाी थोड़ी देर के लिये इधर उधर हो जाये, ताकि एक बार पूछ सकंू, ”मीता एक बार इतना तो बता दो कि …“

 

अर्चना द्धारा बताये पते के अनुसार, थ्री व्हीलर से यहां तक आने में अनुमान से भी अधिक देर लग गई है। शहर के बिल्कुल आखिरी छोर पर बसी, यह नई काॅलोनी है।

आशी के चेहरे से लगता है, उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई है।

“क्या बात है, कुछ परेशान-सी लगती हो?” पूछता हूं।

”आप के वहम का इलाज, लुकमान हक़ीम भले न कर सके, मैं ज़रूर कर सकती हूं।”

“बेशक कर सकती हो!”

 

काफी बड़ी काॅलोनी है। पूछतेे पूछते, यहां तक आ ही पहंुचे हैं। मकानों की संख्या पढ़ते पढ़ते, एक डबल स्टोरी मकान के आगे हम रूक जाते हैं। बड़ा उम्दा डिज़ाइन है मकान का! बहर लकड़ी के गेट पर जैसे नया पेंट हुआ है।

गेट के पार काफी खुला प्रांगन है, जिस का फर्श बहुत चिकना मालूम दे रहा है। मेरी नज़र शायद किसी गमले में खिले फूल या रात की रानी के पौधे को खोज रही है।

काॅलबेल का बटन दबाने के एक मिनट बाद दरवाज़ा खुलता है।

एक महिला दरवाज़े में खड़ी हैं।

”कहिये?”

“श्री एन0 मोहन यहीं रहते हैं?”

”वे लोग पिछले पोर्शन में रहते हैं। उस ओर से जाकर पीछे… मगर वे लोग तो आप को इस समय नहीं मिल सकेंगे।”

“कहीं बाहर गये हुए हैं?”

”कल दिन में वे काफी सीरियस हो गये थे। डाक्टर को घर बुला कर दिखाया। उसने इंजेक्शन दे दिया। साथ ही यह कहा, इन्हें फ़ौरन दिल्ली ले जाइये। बस कल ही रात की ट्रेन से, उनकी लड़की, उन्हें दिल्ली ले गई।”

मैं पूछता हूं, ”कुछ पता चला होगा, वहां कौन से अस्पताल में उन्हें ले जाने को डाक्टर ने कहा था?”

”यह तो हमें नहीं मालूम। वे लोग कभी किसी से बातचीत तो करते नहीं। कल दिन में डाक्टर आया, तो उनकी लड़की से बात हुई। शायद मीता नाम है उसका?”

“जी।”

अजीब स्थिति है!

आशी, जैसे उकता कर कहती है, ”चलिये अब, यहां कब तक खड़े रहेंगे!”

तभी महिला चैंक कर और लज्जित सी होकर कहती है, ”अरे अरे, मैं भी बस क्या हूं! आप तो काफी दूर से आये लगते हैं। भीतर आइये न।”

”बस, चलें।”

“ऐसी भी क्या बात है! पानी वानी पीकर जाइये।”

”थैंक यू।” कह कर आशी बाहर की ओर मुड़ती है।

मैं भी सिर झुकाये, पीछे हो लेता हूं।

आशी रूक जाती है। हम दोनों पीछे घूम कर देखते हैं।

महिला, अभी तक खुले दरवाज़े में मौजूद है।

“मीता जब लौटे, तो हमारे बारे में बता देंगी न?”

”आप?”

आशाी मेरा नाम बता देती है।

 

आशी चुपचाप मेरे साथ चल रही है। मैं भी चुप हूं। वह अचानक ही बोल उठती है, ”आप का यह शहर तो बहुत खूबसूरत मालूम पड़ता है। यहां से, इतने साल रहने के बाद जब गये होंगे, तो वाक़ई अफ़सोस हुआ होगा।”

मैं कुछ नहीं कहता। वही बोलती है, ”कल सुबह तो हम लोग, यहां से लौट जायेंगे। आप आज दिन दिन में ही शहर घुमा दीजिये। लोग तो न जाने कहां कहां से इधर पर्यटन के लिये आते हैं।”

उन्हीं रास्तों से एक बार फिर गुज़र रहा हूं। आज अकेला नहीं हूं, आशी साथ है। आशी के साथ साथ, जैसे एक परछाई सी भी हमारे साथ चल रही है…

यह परछाई, मेरी या आशी की नहीं, यह परछाई, उदासी की है।

आशी को शहर की ख़ास-ख़ास जगह दिखा दी है। उसे यहां बहुत ही अच्छा लगा है। वह प्रसन्न और आनन्दित सी लग रही है।

शाम घिर आई है। लोकल बस पकड़ कर, हम वापिस फैक्टरी एस्टेट पहुंच गये हैं।

स्ट्रीट लाइट, न जाने क्यों ग़ायब है। किंतु क्वार्टरों के भीतर, बत्तियां जल रही हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे क्वार्टर न होकर, ये किसी रेलगाड़ी के डिब्बे हों। दोनों ओर रेलगाड़ियां, जैसे रात के वक़्त, किसी स्टेशन पर रूकी खड़ी हों!

आसपास से गुज़रते चंद स्त्री-पुरूष, जैसे हमें पहचानने की कोशिश करते हैं।

“बाहर के लगते हैं।” एक कहता है।

बाहर के! मैं सोचने लगता हूं। ज़हन में ‘साहिर’ का एक शेर उभरने लगता हैः-

हम इन्हीं फ़िज़ाओं के पाले हुए तो हैं

गर यां नही ंतो यां से निकाले हुए तो हैं

शेर के साथ साथ उस्ताद सोहन लाल की याद भी आ जाती है। वे दिन भी, क्या दिन थे!

विचार भंग होता है। आशी कुछ कह रही है। उसकी ओर ध्यान देता हूं।

”बेचारी मीता!” वह जैसे अफ़सोस ज़ाहिर कर रही हो!

मैं उसकी ओर ग़ौर से देखने की कोशिश करता हूं। वह कह रही है, ”दिल्ली जैसे बड़े शहर में, न जाने वह उसे लेकर, कहां मारी मारी फिर रही होगी! वह अकेलीे कैसे इस तरह के मरीज़ का इलाज करा पायेगी और जब वह इतना सीरियस है, तब बचेगा, तो क्या ही! कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया, तो क्या करेगी? कैसे सम्भालेगी उसे?… और वह सब हो जाने के बाद, वह खुद कहां जायेगी? करेगी क्या वह?

मैं चुप हूं।

“आप क्यों इतना उदास हो रहे हैं? यह तो संसार है, इस जीवन में, न जाने सुबह शाम, क्या कुछ घटता बढ़ता रहता है। मगर… काश! मैं उसे एक बार देख पाती!”

मैं अब भी ख़ामोश हूं।

”इतना मत सोचिये। आप को मैं एक बात बताऊं?”

मेरे ‘बताओ’ कहे बिना ही, वह अपनी बात कहने लगती है… कल रात अर्चना से मेरी खूब बातें हुई, दो बज गये थे बातें करते हुए… आपने पूछा नहीं, कि तब क्या क्या बातें हुईं?”

मैंने तब भी कुछ नहीं पूछा।

”चलो, ठीक है, मैं बिना पूछे ही बता देती हूं।”

वह ज़रा सा रूकने के बाद फिर शुरू हो गई है…

“मैंने अर्चना से पूछा, ”तुमने अरूणा को पढ़ा लिखा दिया उसकी शादी भी कर दी। अब अपने बारे में क्या सोचा है? बस, चुप! जैसे अकसर आप चुप रहा करते हैं, बिल्कुल वैसे ही! उसकी चुप्पी देख तो ऐसा ही लगता है, जैसे वह सचमुच ही आप की सगी बहन हो!… मैंने तो उस से कह दिया, तुम यह काम वाम छोड़ कर किसी आश्रम में जा बैठो। सुबह शाम कीर्तिन किया करना और खड़तालें बजाना। वहां पर, कम से कम, पांच-सात साथ देने वाले तो होंगे। आने जाने वालों से, दो बातें करोगी, तो थोड़ा दिल भी बहलेगा। यहां क्वार्टर में अकेली पड़ी, घुट घुट कर मर जाओगी। कोई पूछने वाला भी न होगा!… मगर वह अर्चना तो… उसी तरह गुम सुम। मैं हैरान परेशान, आखि़र इस लड़की के मन में क्या है? मैं स्कूल में पढ़ाती हूं। इतने-सारे लड़के-लड़कियों और उनके मात-पिता से वास्ता पड़ता है। सभी की बातें, मेरी समझ में आ जाती हैं। मगर यह लड़की तो, बस क्या कहूं! जब वह किसी भी तरह खुल कर बात करने के लिये तैयार ही नहीं हुई, तो मैंने एक अन्य बात भी पूछ ही ली। कहा, अर्चना, एक बात तो बताओ, आखि़र तुम किस के लिये इस तरह घुट घुट कर मर रही हो? तब जानते हैं उसने क्या कहा?”

मैं फिर उसकी ओर, अंधेरे में ही तकने लगा हूं। वह धीरे धीरे चलती और तेज़ तेज़ बोलती जा रही है…

कुछ लोग, क्वार्टरों से निकल कर सड़क पर आ गये हैं। उन्हांेने बग़ल में चादर या कम्बल दबा रखे हैं। लगता है, फैक्टरी में नाइट शिफ़्ट फिर से शुरू हो गई है।

आशी की वार्ता, बदस्तूर जारी है। मैं पुनः उसकी ओर ध्यान देने का प्रयास करता हूं। वह थोड़ा इधर उधर देख कहती है, ”कहीं हम, अर्चना का क्वार्टर पीछे तो नहीं छोड़ आये? स्ट्रीट लाइट के बिना तो कुछ भी पता नहीं चल रहा!”

किंतु शीघ्र ही वह आश्वस्त होकर कहती है, ”नहीं, हम ठीक ही चल रहे हैं। वह रही प्राइमरी स्कूल की इमारत और वह डिस्पैंसरी। उसके बाद जो ब्लाॅक शुरू होता है, उसी में तो है अर्चना वाला क्वार्टर… मैं कुछ कह रही थी। क्या कह रही थी?”

मैं कुछ नहीं कहता। वही बोलती है,

”हां, याद आया… वह बात तो बीच में ही रह गई! मैंने अर्चना से कहा, आज हम लोग तुम्हारे पास बैठे हैं। कल चले जायेंगे। फिर क्या जाने, कब आना हो! तब किस से कह पाओगी अपने मन की बात? अब तो अरूणा भी पास नहीं होगी, जो पूछ ले, क्यों उदास हो, या क्यांे रो रही हो। कोई नहीं होगा पास चुप कराने को…!

”मेरी यह बात सुन उसने चुप्पी तोड़ ही डाली। बोली, अरूणा की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी। मां को मैंने वचन दिया था। न भी दिया होता, तब भी मुझे यह ज़िम्मेदारी निभानी ही थी। सो, जितना कर सकती थी, मैंने जैसे-तैसे कर ही दिया। अब मेरी अपनी ज़िम्मेदारी, तो आप दोनों पर है… सुन कर मैं फूले नहीं समाई। सच मानो, बड़ा ही प्यार आया उस पर! बस, अब वहां पहुंच कर, कोई अच्छा सा लड़का तलाश कर लेंगे। हम जो भी करेंगे, उसे स्वीकार होगा। वह मुझे वचन दे चुकी है… अरे, आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे!”

 – समाप्त –

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “झोपड़ी निर्जीव न थी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – झोपड़ी निर्जीव न थी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

 

उस झोपड़ी में

सिर्फ़ घास फूस तिनके ही न थे

उसमें बसती थी

ज़िंदगी की जद्दोजहद

वह सिर्फ़ धूप से राहत नहीं

और बारिश से बचाती ही नहीं थी

एक सुरक्षित आसरा और पनाहगाह थी

टूटती सांसों को थामने के लिये

चूल्हे की आंच में तपते संघर्ष की

वह मूक साक्षी थी

टूटी चारपाई में वहां

कोई गुदड़ी का लाल पलता था

रात को टिमटिमाते दिये के उजाले से

कोई उम्मादें, आशाएं पलती थीं वहाँ

वो हारी नहीं, संसार के वैभव के आगे

हठ कर बैठी वह कुटिया

हारूंगी नहीं कभी

किसी आंधी, तूफ़ान के आगे

मेरे अंदर अभी

जीजीविषा की आधारशिला

बहुत मज़बूती से जड़वत् है

और रहेगी, तब तक

जब तक ” जीवन ” मेरे भरोसे

बसा रहेगा यहाँ…!!!!????

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३५ – हास्य-व्यंग्य – “परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३५

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं सुबह का अखबार पढ़ते हुए चाय का इंतजार कर रहा था, तभी डोर वेल बजी। दरवाजा खोला तो सामने मेरे पड़ोसी वर्मा जी खड़े थे। नमस्कार करते हुए वे अंदर आये और सोफे पर बैठते ही प्रश्न दाग दिया। भाई साहब यह पेपर लीक का क्या लफड़ा है, इस पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है ? पेपर लीक क्यों होते हैं ? इसे रोका क्यों नहीं जाता ?

मैंने कहा भाई जी पेपर लीक पर सड़कों से संसद तक बातें, हंगामें चल रहे हैं वह क्या कम हैं ? मुझे इसमें शामिल नहीं होना। तभी मेरी श्रीमती जी ने चाय लेकर कमरे में प्रवेश किया, वर्मा जी को चाय देते हुए उन्होंने कटाक्ष किया – वर्मा जी, घर के छत पर रखी पानी की टंकी का लीक तो श्रीमान जी अभी तक बंद नहीं करवा पाए और आप इनके सामने देश के प्रश्न पत्रों के लीक होने का मुद्दा उठा रहे हैं ! मैंने कहा प्रिये दो बार टंकी का लीकेज बंद करवा चुका हूं, हर 5/6 माह में किसी न किसी नल में लीकेज हो जाता है और मैं उसे सुधरवाता हूं। लीकेज का कोई स्थाई समाधान नहीं है। वह तो समय के साथ रास्ता और जगह बदल कर होता रहेगा। मेरी बात सुनकर मेरी श्रीमती जी ने वर्मा जी की ओर रुख किया और कहा वर्माजी आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया। कितना भी सुधार कर लो एक समय के बाद किसी न किसी नए रास्ते से लीकेज होने ही लगता है। लीकेज रोकना कभी भी स्थाई नहीं होता यह निरंतर होने और रोकते रहने वाली प्रक्रिया है। मेरी श्रीमती जी की बात सुनकर वर्मा जी ने खड़े हो कर उनके समाधान पर उन्हें धन्यवाद दिया। मैंने गर्व से पत्नी की ओर देखा, उन्होंने वर्मा जी के प्रश्न से मेरी जान छुड़ाई थी।.. लेकिन यह क्या वे रुकी नहीं., बोलीं, “वर्मा जी कभी गैस पाइप लीक होने लगता है, बरसात में छत से पानी लीक होने लगता है, नगर निगम की पानी की पाइप लाइनें भी जब – तब लीक हो जाती हैं, बिजली के तारों से करंट लीक होने लगता है। सरकार की/ विपक्ष की गुप्त योजनाएं लीक हो जाती हैं, दस्तावेज लीक हो जाते हैं, वैज्ञानिकों के शोध लीक हो जाते हैं, कहावत है कि”दीवारों के कान होते हैं” – हमारी बंद कमरों में की गई बातें/ मीटिंग में लिए गए निर्णय लीक हो जाते हैं। दुनिया में ऐसा क्या है जो लीक नहीं होता ? यहां  विचार, बातें, गैस, द्रव तो लीक होते ही हैं, ठोस तक लीक हो जाते हैं। लीकेज कोई नहीं रोक सकता, वह तो होगा ही। हां, लीकेज होने पर सुधार किया जा सकता है पर स्थाई नहीं। लीक होने वाली चीजें रुकती नहीं वे सुधार के कुछ समय बाद ही बाहर निकलने का नया रास्ता खोज लेती हैं।

पुरानी सरकार के समय भी पेपर लीक होते रहे हैं, वर्तमान सरकार के समय भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। भ्रष्ट लोग इसके नए – नए रास्ते बनाते रहेंगे। सफेदपोश भ्रष्टों की पहचान आसान नहीं है। वे या तो पकड़े ही नहीं जाते और पकड़े जाएं तो रुतबे और धन बल से छूट जाते हैं अथवा छुटभैया साथियों को फंसा कर स्वयं बेदाग बने रहते हैं।

     बोलते – बोलते पत्नी ने सांस ली तो मैंने कमान सम्हाल ली। मैंने कहा भाई जी, सामान्य मानव की प्रवृत्ति है कि उसके दिमाग और पेट में कोई बात नहीं पचती फिर जो जानकारी बताने में फायदा है उसे वह कैसे छुपा सकता है ? तमाम गोपनीय विभागों में भी तो आम आदमी हैं, गोपनीय बात पचाने में सक्षम लोग बिरले ही होते हैं। एक बात और है, सभी चाहते हैं कि उनकी कोई भी महत्वपूर्ण जानकारियां व दस्तावेज लीक न हों, सुरक्षित रहें किंतु दूसरों की गोपनीय जानकारियां लीक करने / कराने के लिए घात लगाए रखते हैं। दुनिया भर के देशों ने तो एक दूसरे की जानकारियों को लीक करने के लिए जासूसों का जाल फैला रखा है। इतनी देर से बातें सुन रहे वर्मा जी का धीरज टूट गया। वे उठ खड़े हुए बोले – आदरणीय भाई साहब और भाभी जी मैं पूरी बात समझ गया हूं कृपया अब मुझे जाने दें। मैंने कहा – भाई जी रुकिये, आप आंदोलन प्रिय हैं। पेपर लीक विरोध का एक जवाबी आंदोलन कराइये जिसमें ऐसा कानून बनाने की मांग हो कि भले ही परीक्षा फीस बढ़ा दी जाए किन्तु  सभी परीक्षाओं के एक दिन पूर्व परीक्षार्थियों के मोबाइल पर प्रश्न पत्र प्रेषित कर दिए जाएं। इस कानून के आने से पेपर लीक होना बंद हो जाएंगे, बिचौलियों का धंधा चौपट हो जाएगा, परीक्षार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। आत्म हत्याएं बंद होंगी। पेपर लीक हो जाने पर होने वाले आंदोलन और विपक्षी राजनीत के रास्ते बंद हो जाएंगे। सरकार सीना ठोक कर कह सकेगी कि हम पहले से प्रश्न बताकर परीक्षा लेते हैं। मेरी बात सुनकर वर्मा जी खुशी से उछल पड़े। बोले –  भाई साहब आपने तो मुझे राजनीति पकाने का नया मुद्दा दे दिया। बहुत बहुत धन्यवाद।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 99 – The Agony of Group Chats… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Agony of Group Chats 

☆ Witful Warmth# 99 ☆

☆ Satire ☆ The Agony of Group Chats… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Group chats are the digital equivalent of being trapped in a room with people you vaguely know, all talking at the same time. There is always the silent lurker who never contributes but reads every message like a spy. Then there is the overachiever who sends motivational quotes at five in the morning, making everyone else feel like garbage. The chat quickly devolves into a nightmare of endless planning for a dinner that will never happen because nobody can agree on a date or a restaurant. Leaving the group is a social death sentence, as the system brutally announces your departure to everyone. So, you remain trapped, muting the notification for one year, watching the unread message count rise into the thousands like a badge of social exhaustion.

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© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७५ ☆ # “नई रोशनी आई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नई रोशनी आई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७५

☆ # “नई रोशनी आई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

उदास आंखों में नई रोशनी आई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

अंधेरे के बादल

धीरे-धीरे छट रहे हैं

दुख भरे दिन

धीरे-धीरे कट रहे हैं

राह में तूफान

धीरे-धीरे घट रहे हैं

हर किरण ने मन में आस बधाई है

नई सुबह ने उम्मीद जगाई है

 

आसमान भी अब झुकने लगा है

तारों से उनका हाल पूछने लगा है

धरती का उन्माद देखकर छुपने लगा है

शायद उसे अपनी भूल समझ आई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

 

किसका यहां हमेशा

के लिए ठिकाना है

जो आया है

उसे एक दिन जाना है

क्या खोना और क्या पाना है

कुदरत ने अपनी बिसात बिछाई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

 

नए जोश ने

कई तख्त बदल डाले हैं

नसीहत है उनको

जो मुगालता पाले हैं

हर तानाशाह ने

आखिर में हथियार डालें है

याद रहते हैं वह जिन्होंने दिलों में

प्रीत की ज्योत जलाई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

उदास आंखों में नई रोशनी आई है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६२ ⇒ स्वर्ग नरक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्वर्ग नरक।)

?अभी अभी # १०६२ ⇒ आलेख – स्वर्ग नरक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है, जिसके बारे में हम सपने में भी नहीं सोचते, उसके सपने में दर्शन हो जाते हैं। मेरे साथ भी कल कुछ ऐसा ही हुआ। मेरे सपने में चार्वाक प्रकट हो गए। जीवन भर अपने पैसों से च्यवनप्राश खाया, लेकिन कभी च्यवन ऋषि ने स्वप्न में आने का कष्ट नहीं किया और जिनके दर्शन और सिद्धांत में मेरी रुचि नहीं, वे स्वप्न में दर्शन दे रहे हैं।

जिनका जीवन दर्शन ही –

यदा जीवेत, सुखं जीवेत्

ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्

यानी जब तक जीयो, सुख से जीयो, कर्जा करो और घी पीयो, हो उनके लिए कैसा पाप और कैसा पुण्य और कैसा स्वर्ग और नरक। जरूर किंगफिशर माल्या चार्वाक के वंश के ही होंगे। न आसमां में कोई खुदा है और न ही किसी का पुनर्जन्म। जो भी है, बस यही मानस जनम। खाओ, पीयो, कर्जा करो, और मौज करो।।

जो ईश्वर को नहीं मानते, वे ईश्वर से नहीं डरते। उनका ईमान तक कहीं गिरवी रखा होता है। जब मरने के बाद सब मिट्टी में मिल जाना है, नेकी बदी सब, अगर स्वर्ग कहीं है, तो केवल इस धरती पर ही है। ऑनली डिफॉल्टर्स भोग्या वसुन्धरा। इस धरा का पूरी तरह दोहन वही पुरुष कर सकता है जो पाप और पुण्य में भेद नहीं करता हो। जो कथित ईश्वरीय शक्ति के कोप से भयभीत नहीं होता हो। शायद यही चार्वाक दर्शन हो।

जो नास्तिक होते हैं, वे ईश्वर और स्वर्ग नरक को नहीं मानते। लेकिन पाताल के बारे में सब मौन हैं। मरने के बाद कोई पाताल नहीं जाता। इंदौर से कुछ किलोमीटर दूर एक प्राकृतिक झरना है, जिसे पाताल पानी कहते हैं। कहते हैं, उसकी गहराई पाताल तक है। जो उसकी गहराई नापने गए, वे वापस ही नहीं आए। पाताल लोक को सर्प लोक भी कहते हैं।

हमारा नश्वर शरीर का भी धार्मिक मान्यता अनुसार ही अंतिम कर्म किया जाता है। कहीं उसे दाह कर्म के जरिए पंच तत्वों में विलीन किया जाता है तो कहीं उसे दफना दिया जाता है। जिसे ऊपर जाना है, उसे दो गज जमीन के नीचे कयामत तक इंतजार करना पड़ता है। खुदा करे कि कयामत हो और तू आए।।

जो प्रकृति को जाने बिना, केवल अपने स्वार्थवश प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग एवं शोषण करते हैं, वे आस्तिक हों या नास्तिक, मानवता के बहुत बड़े शत्रु होते हैं। लेन – देन, give and take, ही जीवन का नियम है। आप अगर समाज से कुछ ले रहे हैं, तो बदले में क्या लौटा रहे हैं। मानव सभ्यता barter system यानी वस्तु विनिमय प्रणाली से ही शुरू हुई थी। तब भी हम इतने खुदगर्ज नहीं थे, जितने आज हैं।

आज जितने भी दर्शन हैं, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गए हैं। पोथी पढ़ना और ज्ञान बांटना ! जीवन में जो आत्मसात होता है, अमल में लाया जाता है, वही दर्शन होता है। बाहर से मंदिर प्रदर्शन और मन में चार्वाक दर्शन, अगर इसी तरह चलता रहा, तो स्वर्ग नरक तक कोई पहुंच ही नहीं पाएगा, और कोई नये किंगफिशर और सहाराश्री देश को रसातल की ओर ले जाएंगे। हमारी संस्कृति ने सभी मान्यताओं और दर्शन को सम्मान दिया है। सबकी अच्छाई बुराई सामने है। नीर क्षीर विवेक ही कर्ज़ वाले घी से बेहतर है। दत्तात्रेय समर्थ थे, फिर भी उन्होंने २४ गुरु किये। जिस प्राणी में भी अच्छाई दिखी, उसे अपना गुरु माना। आपका आत्म गुरु आपके अंदर ही है। हम विश्व गुरु की बात नहीं कर रहे। चार्वाक ने हमारी आंखें खोल दी हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११९ – पानी तेरी अजब कहानी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘पानी तेरी अजब कहानी।)

☆ अभिव्यक्ति # ११९ ☆

☆ पानी तेरी अजब कहानी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

पानी, तेरी अजब कहानी,

जैसा बर्तन, वैसा पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

बदली गगरी लेकर जाती,

सागर से भर लाती पानी,

धरती की वो प्यास बुझाने,

बनकर बूंद बरसता पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

सागर का खारा है पानी,

दरिया का मीठा है पानी,

संग्रह करता खारा होता,

जो दे उसका मीठा पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

मूरत पर भी, चढ़ता पानी,

अंत समय में लगता पानी,

संकल्प करो तो लगता पानी,

श्राप दिया तो लगता पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

बचपन में आँगन में पानी,

छमछम करती बिटिया रानी,

बिटिया की बिदाई ले आती,

माता पिता की आंख में पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ अंधार वाचणारे… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

 

? कवितेचा उत्सव ?

अंधार वाचणारे… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

स्वातंत्र्य हरवलेले नाहीत शोधणारे

आता पुन्हा गुलामी आलेत मागणारे

 *

विपरीत चाल खोटी योजून खेळणारे

करतात सर्व धंदे हैदोस घालणारे

 *

प्रेमातली चलाखी कळणे कठीण आहे

सगळेच आंधळे ते असतात गुंतणारे

 *

आदर्श आज कोठे शोधून सापडेना

झालेत थोर नेते भोंदूस भाळणारे

 *

बदलून काळ गेला म्हणतात आज सारे

सत्तांध तेच झाले खैरात लाटणारे

 *

करतोय काय आम्ही आम्हास ही कळेन

झालोत दास वेडे लाचार वागणारे

 *

झालोय आज आम्ही मारेकरी स्वतःचे

डोळे मिटून काळा अंधार वाचणारे

गरजे नुसार प्रेमी करतात प्रेम थोडे

चवचाल लोक इथले आनंद वेचणारे

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ धुंद वाऱ्या… कवी : डॉ. निशिकांत श्रोत्री ☆ रसग्रहण – नीलिमा खरे ☆

नीलिमा खरे

? काव्यानंद ?

☆ धुंद वाऱ्या… कवी : डॉ. निशिकांत श्रोत्री ☆ रसग्रहण – नीलिमा खरे ☆

आयुष्य उत्फुल्ल पणे, आनंदाने जगणे ही एक कला आहे. त्यासाठी अंतरीच्या भाव भावना जागृत असणे नितांत गरजेचे आहे. प्रत्येक गोष्टीकडे, आजूबाजूच्या परिसराकडे जाणीव पूर्वक पाहणे हा अनुभव खूप काही शिकवणारा असतो. असे करताना निसर्गाशी एकरूप न होणारे मन अतिशय विरळाच.. त्यातून ते जर कवी मन असेल तर भावनांची प्रतिबिंबे त्यात शब्द बध्द करणे हे ओघानेच आले. कधी आनंद देणारा तर कधी दुःख देणारा अनुभव कवितेत शब्दांकित होतो. असाच अनुभव व्यक्त करणारी “धुंद वाऱ्या” ही डॉ निशिकांत श्रोत्री सरांची कविता मनाला भुरळ घालते.

वाऱ्यावर वाऱ्यासवे विहरताना मन वाऱ्याप्रमाणे तरल झालेले असते. त्यात हा वारा धुंद करणारा असेल तर प्रीतीचे विचार मनामध्ये येणे साहजिक आहे. आणि मग ते काव्य रुपात प्रकट होताना डॉ श्रोत्री सरांसारख्या प्रतिभावंत कवीला प्रतिभेचे वेगळेच धुमारे गवसललेले दिसतात.

☆ धुंद वाऱ्या… ☆ कवी : डॉ. निशिकांत श्रोत्री ☆

धुंद वाऱ्या थांब येथे दूर तू जाऊ नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||ध्रु||

*

गुपित जपले मन्मनी जे ते उगा पसरू नको

लाजरीचा रंग गाली तू नभा देऊ नको

*

दाटले माझ्या मनी साऱ्या जगा सांगू नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||१||

*

भाव माझे तूच नेता मी सख्या सांगू कशी

शीळ होता बोल माझे मी मुकी राहू कशी

*

भाववेडी स्वप्नगंधी छेड तू काढू नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||२||

*

अंतरी दाटून माझ्या तू तुला विसरून जा

विरून येथे तूच माझे स्वप्नही होऊन जा

*

आण माझ्या प्रीतीची रे अंतरी मोडू नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||३||

२५ फेब्रुवारी १९८६

धुंद वाऱ्या हे शीर्षक कवीची वाऱ्याशी असलेली सलगी जाणवून देते. त्या वाऱ्याने कवी मनाला आगळी धुंदी प्राप्त झालेली आहे हे समजते. तसेच हा वारा स्वतः ही धुंद झालेला आहे हे लक्षात येते.

धुंद वाऱ्यामुळे धुंद होणारे कवी मन खुलून आले नाही तरच नवल!! अशा वातावरणात अपुले मन, त्यात जपलेल्या गूजाला/गुपिताला प्रकर्षाने उधाण येते. पण त्याच वेळी ते गूज दडविण्यास मन आतुर असते. ते कुणाला ही कळू नये अशी मनाची भावावस्था असते. अगदी हीच भावना सखोलपणे, सहजपणे कवी डॉ निशिकांत श्रोत्री यांनी या कवितेत व्यक्त केली आहे.

या कवितेत व्यक्त केलेल्या भावना स्री च्या आहेत हे कळते. भिन्नलिंगी काव्य रचताना कवी डॉ निशिकांत श्रोत्री स्त्री भावनांशी एकरुप होऊन तशा तऱ्हेने व्यक्त झाले आहेत. हे आवर्जून उल्लेख करण्यासारखे व तितकेच कौतुकास्पद ही !!

धुंद वाऱ्या थांब येथे दूर तू जाऊ नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||ध्रु||

एखाद्या सख्याशी, मित्राशी बोलावे तसा संवाद वाऱ्याशी घडतो आहे. या धुंद करणाऱ्या वाऱ्याला ती विनंती करते की तू इथेच थांब. दूर कुठेही जाऊ नकोस. या धुंद वाऱ्यामुळे मनाला लाभलेली धुंदी तिला विसरायची नाहीये. कदाचित तिच्या मनातल्या गुपितामुळे ही वारा धुंद झाला असावा असे वाटत असावे.
लहरत, विहरत जाणाऱ्या वाऱ्यासवे मनातले गूज सर्व दूर पसरु नये अशी तिची इच्छा आहे. अतिशय सहजपणे सुलभ भाषेतून केलेले हे आर्जव आर्त भासते. व त्यातला खरेपणा अधोरेखित होवून तिची प्रांजळ भावना मनाला मोहविते. बोजड शब्दांना जाणीव पूर्वक दूर ठेवल्याने काव्य मनाला भावते. यथार्थ शब्दांनी गेयता लाभली आहे. वाऱ्याला थांबवताना लाभलेल्या धुंदीने ही थांबावे असा संकेत, संदेश जाणवतो.

गुपित जपले मन्मनी जे ते उगा पसरू नको

लाजरीचा रंग गाली तू नभा देऊ नको

दाटले माझ्या मनी साऱ्या जगा सांगू नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||१||

ती वाऱ्याला म्हणते की तिच्या स्वतःच्या मनात जपलेले प्रीतीचे गूज मात्र उगाचच दूरवर पसरू नको. प्रीत भावनेच्या जाणीवेने लज्जेने गालांवर आलेली लाल गुलाबी लाली नभास देवू नको. यातला गर्भितार्थ फार सुंदर. तो अतिशय सूचकपणे मांडला आहे.. लाजरी शब्दावरील श्लेष मोहक.. अर्थाला अर्थ देणारा.. लाजरी ती स्वतः व लज्जा..
स्वप्नवत वाटणारी भावना तशीच शिल्लक राहू दे. रात्र सरु नये. व प्रातः काळी नभास उषेची लाली लाभू नये. ती तिच्या गालांवर तशीच राहावी असा अर्थ. रात्रीस जागणारी ही प्रेम भावना रात्रीच्या कुशीत तशीच निरंतर राहू दे.

माझ्या मनात दाटून आलेल्या प्रीत भावना माझ्या पुरत्या मर्यादित राहोत. त्या तू साऱ्या जगाला सांगू नको असे आर्जव करुन पुन्हा एकदा ती वाऱ्याला तिचे ते गुपित गुप्त ठेवण्याविषयी सांगत आहे. नको या नकारात्मक क्रियापदाचा वापर कवी मनाची प्रगल्भता दर्शवितो.. त्यातून गूज इतरांना कळू नये यासाठीची धडपड प्रकर्षाने जाणवते.. दाटले या शब्दाची योजना ही लक्ष व लक्ष्यवेधी.. साधारणपणे दाटले हा शब्द नकारात्मक विचार, भावना सूचित करतात. पण इथे प्रीतीची भावना दाटून आली असे म्हणताना प्रेम भावनेची सखोलता कळते. भावनेची व्यापकता व संपृक्तता जाणवते..

भाव माझे तूच नेता मी सख्या सांगू कशी

शीळ होता बोल माझे मी मुकी राहू कशी

भाववेडी स्वप्नगंधी छेड तू काढू नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||२||

वाऱ्याला आहे तिथेच थांबण्याची आजर्वी विनंती ती अजूनही करतेच आहे.

पुढे ती म्हणते की माझ्या मनातले हे प्रीतीचे भाव जर तू वाऱ्यावरी वाहून नेले तर हे भाव, माझी ही प्रेम भावना मी माझ्या मुखाने माझ्या सखयाला कशी सांगणार? आणि ते तर मलाच त्याला सांगायचे आहे. तू विनाकारण लुडबूड करू नकोस अशी विनवणी करत थोडेसे दटावणी वजा सूचित करते.

ती पुढे वाऱ्याला जाणीव करून देते जर तिचे बोल त्याने (वाऱ्याने) व्यक्त केले तर ते बोल बोल ना राहता त्या बोलांची मधुर शीळ होईल व अशा वातावरणात ती तरी अबोल कशी राहू शकेल? तिची भावना व्यक्त न करता ती मूक कशी राहील? तिलाही काही बोलावे लागेल. बोलण्याने तिची ही स्वप्नवत धुंदी नाहीशी होईल याचे भय तिला वाटते.. पण मग अशी भावनेने वेडी झालेली व अश्या स्वप्नगंधात बुडालेली/डुबलेली छेड वाऱ्याने काढूच नये अशी विनंती ती करते.

व पुन्हा एकदा तिचे गूज त्याने पसरवू नये अशी आंतरीक भाक/ आण त्याला देते.

अंतरी दाटून माझ्या तू तुला विसरून जा

विरून येथे तूच माझे स्वप्नही होऊन जा

आण माझ्या प्रीतीची रे अंतरी मोडू नको

गूज माझ्या अंतरीचे तू कुणा सांगू नको ||३||

२५ फेब्रुवारी १९८६

या भाक देण्यापलीकडे जाऊन ती त्याला विनंती करते की या धुंद वाऱ्याने तिचे अंतर /हृदय दाटून यावे. अर्थात ही धुंद करणारी बेधुंद धुंदी तिच्या अंतःकरणात दाटून राहावी. वाऱ्याने स्वतःचे अस्तित्व विसरून जावे व तिच्या अंतरंगात विरून तिचे स्वप्न म्हणून सतत तिच्या डोळ्यांत/ हृदयात स्थान मांडून राहावे. अशा प्रकारे वागण्याची आण ती वाऱ्याला देत आहे. आणि विनवते आहे की ही तिची प्रीतीची आण त्याने त्याच्या हृदयातून त्याच्या अंतरातून मोडू नये. त्याने ही तिला तसाच प्रतिसाद द्यावा.
आण माझ्या प्रीतीची रे अंतरी मोडू नको या ओळीतील श्लेष कवीच्या साहित्यिक जाणीवांकडे निर्देश करणारा.. वाऱ्याने प्रीतीची आण त्याच्या अंतरातून तसेच तिच्या अंतरातली प्रीती ची आण मोडू नये असा अर्थ!!

या कवितेत धुंद वारा हा तिचा प्रियकरच असावा.. या वाऱ्याला चेतनागुणोत्तिचे रूप देऊन तसेच वाऱ्याचे रूपक योजून या कवितेच्या अर्थाला आगळा वेगळा आयाम दिला आहे..

सोपी परंतु तरीही कवितेतील भावनेला, आशयाला न्याय देणारी चपखल शब्दयोजना साधली आहे. त्याच वेळी माझ्या मनी, माझे मी मुके असे योजलेले अनुप्रास व त्या व्यतिरिक्त रुपक, श्लेष, चेतना गुणोक्ती, यमक इ. साहित्यिक अलंकारांनी ही कविता एक उत्तम भावगीत ठरते..
या कवितेला श्री विलास आडकर यांनी संगीतबद्ध केले आहे. व माधुरी सुतावणे यांनी नावाप्रमाणेच मधुर आवाजात गायले आहे.. हे गीत ऐकून रसिकजन मंत्रमुग्ध होतील यात शंका नाही..

धुंद वाऱ्यासवे पसरु नये अशी कामना करणारी कवितेतील धुंदी वाचकांच्या मनात घर करून राहते हे नक्की..

© नीलिमा खरे

६-५-२०२४

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सामाजिक माध्यमं: साद- प्रतिसाद! ☆ श्री नागेश शेवाळकर ☆

श्री नागेश शेवाळकर

? विविधा ?

सामाजिक माध्यमं: साद- प्रतिसाद! ☆ श्री नागेश शेवाळकर

सामाजिक माध्यमातील फेसबुक नंतर व्हाट्सअप समूह हा सर्वांचाच आवडता प्रकार आहे. व्हाट्सअपचा वापर करणारे, त्यावर व्यक्त होणारे लाखो रसिक असतील परंतु प्रकाशित होणाऱ्या पोस्टवर प्रतिसाद देणारे वाचक फार कमी आहेत.

व्हाट्सअप समूहाचे काही प्रकार अस्तित्वात आहेत. त्यापैकी पहिला म्हणजे सर्व सदस्यांना स्वतःचे मत व्यक्त करता येणारा समूह. यात काही उपप्रकार आहेत. अनेक समूहावर सुप्रभात ते शुभरात्री असे अभिवादनाचे प्रकार, विशेष दिनी किंवा विशिष्ट कामगिरीसाठी अभिनंदन, शुभेच्छा तर दुःखदायक घटनांसाठी त्या प्रकारचे संदेश पाठविण्याची मोकळीक या समूहात असते. तसेच काही समूहांवर लेख, प्रतिसाद यांची मांदियाळी असते. काही समूहांमध्ये कुठल्याही प्रकारच्या शुभेच्छा, संवेदना यांना बंदी असते. अशा समूहांवर फक्त लेख, पुस्तक परिचय अशा गोष्टींना परवानगी असते परंतु अनेकदा नियमावलीत नसणाऱ्या गोष्टींचाही भडिमार होत असतो. समूह प्रमुखांनी वेळोवेळी केलेल्या सूचना, प्रसंगी दिलेली ताकीद याकडे कानाडोळा करून समूहाच्या नियमावलीत नसणाऱ्या गोष्टी सररास पोस्ट केल्या जातात त्यामुळे समूह प्रमुख काही सदस्यांना समूहाच्या बाहेर करतात. शेवटचा उपाय म्हणून समूह ‘ओन्ली फॉर ॲडमीन’ केल्या जातो. त्यामुळे सर्व सदस्यांच्या साद-प्रतिसादाला वाव नसतो.

अनेक समूह यापेक्षा स्वतःचे वेगळेपण राखून असतात. अशा ठिकाणी कादंबरी, कथा, पुस्तक परिचय, कविता, चारोळ्या असे साहित्य पोस्ट केल्या जाते. काही समूहांवर केवळ पुस्तक परिचय करून देण्याची संधी असते. यामुळे नवीन, जुन्या पुस्तकांचा परिचय होतो. गाजलेल्या पुस्तकांची माहिती मिळते.

अशा विशिष्ट समूहांवर इतर गोष्टी कटाक्षाने टाळल्या जातात. विविध साहित्य प्रकाराचे लेखन वाचायला मिळते, त्या लेखनास प्रतिसाद देण्याची संधी असते. अनेक लेखक -वाचक प्रकाशित साहित्यावर साधकबाधक चर्चा करतात, त्या मंथनातून अक्षर-अमृताचे घट समोर येतात. ज्यातून उपयुक्त माहिती मिळते, ज्ञानात भर पडते. विविध समूहांवर सातत्याने लेखन करणारे अनेक लेखक आहेत. त्यांच्या लेखनावर मिळणारा प्रतिसाद कुठे नगण्य असतो तर कुठे भरभरून मिळतो. जे लेखक इतर लेखकांच्या पोस्टवर स्वतःचं मत, अभिप्राय देतात त्यांना त्यांच्या लेखनावर चांगला प्रतिसाद मिळतो. जे लेखक स्वतः भरपूर पोस्ट टाकतात परंतु इतरांच्या लेखनावर व्यक्त होत नाहीत त्यांना अल्प प्रतिसाद मिळतो. असा अल्प प्रतिसाद मिळणाऱ्या लेखकांचे असे मत होते की, त्यांच्या लेखनावर जाणूनबुजून अल्प प्रतिसाद मिळतो तर इतर लेखकांना त्यांच्या लेखनावर उदंड प्रतिसाद मिळतो. हा प्रकार म्हणजे ‘पेराल तसे उगवेल’ असा असतो. टाळी एका हाताने वाजत नाही किंवा ‘एक हात से दीजिए, दूसरे हाथ से लीजिए।’ असा प्रकार असतो. त्यामुळे मला भरभरून प्रतिसाद मिळावा असे वाटत असेल तर मीही इतरांना तसाच प्रतिसाद दिला पाहिजे. काही लेखक-वाचक यांना जो लेखन प्रकार आवडतो त्यावर ते निश्चितपणे व्यक्त होतात. जसे ज्यांना विनोद आवडतो, जे स्वतः विनोदी लेखन करतात ते विनोदी लेखनावर व्यक्त होतात. कुणाला कविता, कुणाला चारोळ्या आवडतात ते त्या प्रकारच्या साहित्यावर व्यक्त होतात.

व्यक्त होण्याचे प्रकार म्हणजे अंगठा दाखवणे, विविध प्रकारच्या इमोजी पाठवणे ह्या गोष्टी खूप जण वापरतात. आजकाल रेडिमेड संदेश टाकण्याचे छंदही वाढताहेत. परंतु स्वतःच्या शब्दांमध्ये दिलेल्या प्रतिसादामध्ये एकप्रकारची आपुलकी असते, जवळीक निर्माण होते. त्यामुळे शाब्दिक प्रतिसाद देणे महत्त्वाचे असते. अनेक सदस्य असतात, जे स्वतः काही पोस्ट टाकत नाहीत इतरांच्या पोस्टवर कधीच व्यक्त होत नाहीत. काही सदस्य आले, वाचले, पुढे ढकलले अर्थात इतरांच्या पोस्ट फॉरवर्ड करण्याचे काम इमानेइतबारे करतात.

बहुतांश व्हाट्सअप समूहांवर साधकबाधक चर्चा होतात, विनोदाच्या फुलझडी उडतात, समोरासमोर कधीही न भेटता ही मैत्रीचे बंध निर्माण होतात, काही समूह दरवर्षी समूहातील लेखकांसाठी दिवाळी अंक, ‌ई दिवाळी अंक प्रकाशित करतात. काही समूह दरवर्षी गेट टुगेदरचे आयोजन करतात इत्यादी चांगल्या बाबीही व्हॉट्सअपच्या माध्यमातून होतात. ही बाब महत्वाची आहे…

‘लिहा, वाचा, भरभरून प्रतिसाद द्या. साधकबाधक चर्चा करा. ‘ हा मुख्य मंत्र असायला हवा.

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© श्री नागेश शेवाळकर

पुणे

मोबा. ९४२३१३९०७१

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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