हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆ लघुकथा – संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा – “संस्कार प्रबल हैं…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆

✍ लघुकथा ☆ संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नरेश जी एक लेखक हैं। उम्र के लिहाज से यात्रा ज्यादा तो नहीं करते पर करनी तो पड़ती है । वे अपने बेटे के पास  पुणे आए। उनका बेटा आईटी सेक्टर में काम करता है।  पुणे बड़ा महानगर है। उसका क्षेत्रफल संभवतः अस्सी किलोमीटर है। देखने के लिए कई स्थान हैं और आसपास भी कई तीर्थ स्थल और पर्वतीय स्थल हैं।

राम नरेश जी के एक प्रकाशक मित्र भी पुणे आए हुए थे। उन्हें पता चल गया था कि राम नरेश जी भी पुणे पहुंच रहे हैं तो उनके काव्य संग्रह की पचास प्रतियाँ लेते आए थे और राम नरेश जी को सूचना भी दे दी।  दोनों शहर के उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर ठहरे थे और आसानी से एक दूसरे के पास आ जा नहीं सकते थे।  किसी बीच के स्थान पर मिलने पर मंथन हुआ। प्रकाशक महोदय की एसएनडीटी विश्व विद्यालय में मीटिंग थी और राम नरेश जी भी वहां आ सकते थे। इसलिए तय हुआ कि एसएनडीटी कॉलेज के गेट पर मिल लेंगे। वहाँ तक आने जाने के लिए बस मैट्रो की सुविधा भी है। टैक्सी ऑटो रिक्शा तो मिल ही जाते हैं।

दोनों के बीच तय हुआ कि बारह बजे के आसपास मिलेंगे। राम नरेश जी जब चलने को हुए तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं भी साथ चलती हूँ, यहां अकेले क्या करूंगी। बहू बेटे अपने अपने काम पर गए और बच्चे स्कूल में तो वे घर में अकेली ही हैं। वे टैक्सी से कॉलेज के गेट पर पहुंच गए और दस मिनट के अंदर प्रकाशक महोदय भी पहुंच गए और उन्होंने पुस्तकें दे दीं।    

महानगरों में ऐसे काम के लिए एक दूसरे के आवास पर जाना मुश्किल होता है क्योंकि समय, दूरी व  सुविधा सब देखनी पड़ती है। प्रकाशक महोदय ने कहा कि यहाँ मैट्रो रेल का स्टेशन है और यहाँ से बहुत जल्दी स्वारगेट पहुंच जाएंगे और मैट्रो का आनंद भी उठा लेंगे। वहाँ से तो वाघोली के लिए काफी सुविधाएँ हैं। राम नरेश जी फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे। कम पैसे खर्च होने के कारण उन्होंने मैट्रो से जाने का निर्णय ले लिया।

राम नरेश जी अपनी पत्नी के साथ मैट्रो रेल के स्टेशन पर लिफ्ट से चले गए । थैली में पचास पुस्तकें थीं। उनका वजन देख कर राम नरेश जी को अपनी आयु का आभास हुआ। थैली उठा कर चलने में दिक्कत तो हो रही थी। खैर टिकट लेकर प्लैटफॉर्म पर आए। गाड़ी आने में पांच मिनट थे। वे दोनों प्लैटफॉर्म पर पहुंचे तो एक बैंच पर दो लड़कियाँ बैठी थीं। एक लड़की उठ खड़ी हुई और राम नरेश जी की धर्पमत्नी से बोली, “बैठिए आंटी जी”। थोड़ा ना नुकुर के बाद वे बैठ गईं। फिर उस लड़की ने राम नरेश जी से भी बैठने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठने में कष्ट होता है इसलिए खड़े रहना ही अच्छा है और उस लड़की को धन्यवाद दिया। जब मैट्रो आ गई तो उस लड़की ने राम नरेश जी के हाथ से पुस्तकों का थैला ले लिया और उन्हें मैट्रो में चढ़ने दिया। ट्रेन में प्रवेश के बाद भी वह लड़की पुस्तकों के थैले को अपने पास ही रखे रही। राम नरेश जी ने मांगा तो बोली कि गाड़ी में झटके लगते हैं और संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, आप गिर सकते हैं और मुझे तो मैट्रो रेल में चलने का अभ्यास है। फिर उसने पूछा कि पुस्तकें कैसी हैं तो राम नरेश जी ने बताया कि उन्हींकी लिखी हुई पुस्तकें हैं पर वे बंधी हुई है इसलिए तुम्हें दे नहीं सकता। वे लेखक हैं यह जानकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने अपना नाम बताया वंशिका,, और बताया कि वह पुणे में ही रहती है। उसके पिता होटल चलाते हैं। एसएनडीटी में बारहवीं में पढती है, रोज स्वारगेट से मैट्रो से ही आती है। राम नरेश जी जीवन में पहली बार मिली उस अपरिचित बच्ची की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बात करते करते गंतव्य आ गया और उसने पुस्तकों का थैला राम नरेश जी को दे दिया और खुद उतर गई। उसकी मीठी वाणी, अनुशासन और शि‍ष्टाचार देखकर राम नरेश जी को अपनी पोती की याद आ गई। वह भी उन्हें वजन नहीं उठाने देती। राम नरेश मन ही मन बुदबुदाए, समाज में अभी संस्कार प्रबल हैं।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२८ – छत और छाता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – छत और छाता।)

☆ लघुकथा # १२८ – छत और छाता ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

सुबह से लगातार बारिश हो रही थी। दोपहर तक सड़कें पानी से भर गईं। बाजार की अधिकांश दुकानें बंद थीं, फिर भी शांति सड़क किनारे सब्जियों की टोकरी लिए बैठी थी।

कमल जी ने उसे देखा तो रुक गए।

“शांति, तुम अभी तक यहीं बैठी हो?

इतनी तेज बारिश में भी?”

शांति मुस्कुराई, “क्या करूँ बाबूजी, बारिश देखकर पेट थोड़ी न रुकता है।”

“घर चली जाओ। आज कौन सब्जी खरीदने आएगा?”

“शायद कोई न आए।”

“फिर यहाँ बैठने का क्या फायदा?”

शांति ने कुछ क्षण उनकी ओर देखा, “फायदा नहीं है बाबूजी, जरूरत है।”

“ऐसी भी क्या जरूरत?”

“आज की कमाई नहीं हुई तो आज रात चूल्हा नहीं जलेगा।”

कमल जी चुप हो गए। फिर बोले, “तुम्हारे घर में और कोई कमाने वाला नहीं है?”

“पहले पति थे। अब बीमारी ने उन्हें बिस्तर दे दिया है। घर चलाने की जिम्मेदारी मेरे हिस्से में आ गई।”

“और बच्चे?”

“दो हैं। दोनों पढ़ते हैं।”

“इतनी मुश्किल में पढ़ा रही हो?”

शांति की आँखों में चमक आ गई।

“हाँ बाबूजी। मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे मेरी तरह बारिश देखकर अपना काम न रोकें। बड़ा कहता है—‘अम्मा, मैं बड़ा होकर ऐसा घर बनाऊँगा, जिसकी दीवारों से पानी नहीं टपकेगा।’”

कमल जी ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हारी अपनी इच्छा क्या है, शांति?”

वह हँसी, फिर बोली, “मेरी? बस इतनी कि एक दिन बच्चों के साथ बैठकर चैन से खाना खा सकूँ और ऊपर देखकर यह न सोचूँ कि अगली बूंद थाली में गिरेगी या सिर पर।”

कमल जी ने उसकी सारी सब्जियाँ खरीद लीं।

“अब घर जाओ।”

शांति ने पैसे सँभाले और चल पड़ी।

कुछ दूर जाकर कमल जी की नजर सरकारी होर्डिंग पर पड़ी -“हर बच्चे को शिक्षा, हर परिवार को सुरक्षित आवास।”

उसी क्षण शांति का बच्चा किताबें बचाते हुए दौड़ता दिखाई दिया।

कमल जी ने ऊपर देखा—होर्डिंग सुरक्षित थी, नीचे एक छात्र भीग रहा था।

शांति के हाथ में टूटा हुआ छाता था, उसके घर की छत फिर टपक रही थी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६१ – बुन्देली कविता – ”बे तौ बस हड़ताल करत हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे तौ बस हड़ताल करत हैं“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६१ ☆

☆  बुन्देली कविता – “बे तौ बस हड़ताल करत हैं“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

बे तौ बस हड़ताल करत हैं 

रोजइ  नये बवाल करत हैं 

* 

जब देखौ तब करत बखेड़ा 

हल नईं  कोउ सवाल करत हैं 

 *

आगी सुलगैबे को धंधौ 

जे अगिया बेताल करत हैं 

 *

लै  खें खून गरीबों कौ बे 

घर की रंगत लाल करत हैं 

 *

बे कब सें टरकाउत जा रय 

आज करत हैं, काल करत हैं 

 *

उतै न जइयो, हुरयारे हैं 

कीचड़ से बेहाल करत हैं 

 *

बे मसखरी, चुहुलबाजी सें 

‘भगवत’ दूर मलाल करत हैं

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५१ – तस्मै श्रीगुरवै नम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५१ ☆ तस्मै श्रीगुरवै नम:… ?

गुरु ऐसा शब्द जिसके उच्चारण और अनुभूति के साथ एक प्रकार की दिव्यता जुड़ी है, सम्मान की प्रतीति जुड़ी है। गुरु का शाब्दिक अर्थ है अंधकार को दूर करने वाला।

प्रायः हरेक के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या जीवन में एक ही गुरु हो सकता है? इसका उत्तर दैनिक जीवन के क्रियाकलापों और सांस्कृतिक परम्पराओं में अंतर्भूत है।

वैदिक संस्कृति में भिन्न-भिन्न गुरुकुलों में अध्ययन की परंपरा रही। गुरुकुल में शिक्षा और विचार की भिन्नता भी मिलती है। इन्हें विभिन्न- ‘स्कूल्स ऑफ थॉट’ कहा जा सकता है। वर्तमान में मुक्त शिक्षा का मॉडल काम कर रहा है। छात्र, विज्ञान के साथ कला और वाणिज्य का विषय भी पढ़ सकते हैं। शिक्षा ग्रहण करते हुए कभी भी अपना ‘स्कूल ऑफ थॉट’ बदल सकते हैं।

वर्णमाला का उच्चारण विद्यार्थी के.जी. में सीखता है। प्री-प्राइमरी में वर्ण लिखना सीखता है। शिक्षा के बढ़ते क्रम के साथ शब्द, तत्पश्चात  शब्द से वाक्य, फिर परिच्छेद जानता है, अंततोगत्वा धाराप्रवाह लिखने लगता है। के.जी. से पी.जी. तक के प्रवास में कितने गुरु हुए? जिनसे के.जी. में पढ़ा, उन्हीं से पी.जी. में क्यों नहीं पढ़ते? उलट कर भी देख सकते हैं। जिनसे पी.जी. में पढ़ा, उनसे ही के.जी. में पढ़ाने के लिए क्यों नहीं कहते? यही नहीं भाषा की शिक्षा के लिए अलग शिक्षक, चित्रकला के लिए अलग, शारीरिक शिक्षा, विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र हर एक के लिए अलग शिक्षक। उच्च शिक्षा में तो विषय के एक विशिष्ट भाग में स्पेशलाइजेशन किया हुआ शिक्षक होता है। कोई एम.डी.मेडिसिन, कोई स्त्रीरोग विशेषज्ञ,  कोई हृदयरोग विशेषज्ञ तो एम.एस. याने शल्य चिकित्सक।

काव्य में कोई गीत का विशेषज्ञ है,  कोई ग़ज़ल कहने का व्याकरण बताता है तो कोई मुक्त कविता में लयबद्ध होकर बहना सिखाता है। सभी विधाएँ एक ही से क्यों नहीं सिखी जा सकती? खननशास्त्र का ज्ञाता, गगनशास्त्र नहीं पढ़ा सकता, हवाई जहाज उड़ाने का प्रशिक्षण देनेवाला, पानी का जहाज चलाना नहीं सिखा सकता। भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, मणिपुरी की साधना एक ही नृत्यगुरु के पास नहीं साधी जा सकती।

गुरु और शिक्षक की भूमिका को लेकर भी अनेक के मन में ऊहापोह होता है। यह सच है कि एक समय गुरु और शिक्षक में अंतर था। शिक्षक अपना पारिश्रमिक स्वयं निर्धारित करता था जबकि गुरु को प्रतिदान शिष्य देता था। कालांतर में बदलती  परिस्थितियों ने इस अंतर-रेखा को धूसर कर दिया। वर्तमान में गुरु और शिक्षक न्यूनाधिक पर्यायवाची हैं। शिक्षक, जीवन को अक्षर और व्यवहार के ज्ञान का प्रकाश देनेवाला गुरु  है।

गुरुदेव दत्त अर्थात भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव का अवतार माना जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समन्वित अवतार की यह आस्था अनन्य है। उन्होंने  चौबीस गुरु बनाये थे। राजा यदु को इन गुरुओं की जानकारी देते हुए भगवान दत्तात्रेय ने आत्मा को सर्वोच्च गुरु घोषित किया। साथ ही  बताया कि चौबीस चराचर को गुरु मानकर उनसे जीवनदर्शन की शिक्षा ग्रहण की है। भगवान के ये चौबीस गुरु हैं,  पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, समुद्र, अजगर, कपोत, पतंगा, मछली, हिरण, हाथी, मधुमक्खी, शहद निकालने वाला, कुरर पक्षी, कुमारी कन्या, सर्प, बालक, पिंगला नामक वैश्या, बाण बनाने वाला, मकड़ी, और भृंगी कीट।  प्रत्येक गुरु से उन्होंने जीवन का भिन्न आयाम सीखा।

बहुआयामी ज्ञानदाता माँ प्रथम गुरु होती हैं। माँ प्रथम होती हैं अर्थात द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम गुरु भी होते हैं। इनमें से कोई किसीका स्थान नहीं ले सकता वरन हरेक का अपना स्थान होता है।

शिक्षक दिवस के संदर्भ में विनम्रता से कहता हूँ कि प्रत्येक का मान करो। ज्ञान को धारण करो, जिज्ञासानुसार एक अथवा अनेक गुरु करो।

..तस्मै श्रीगुरवै नम:।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३३ – खिड़की से अब झाँकते ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “खिड़की से अब झाँकते”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३३ ☆

☆  खिड़की से अब झाँकते ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

खिड़की से अब झाँकते, हर बूढ़े माँ बाप ।

गुम सुम से हैं देखते, सूरज का संताप ।।

*

जीवन भर दौड़े बहुत, नहीं किया विश्राम ।

आया जब संकट समय, उन पर लगा विराम।। 

*

श्वासें अब हैं टूटतीं, रोते नेत्र निचोर ।

नील गगन में डूबती, आशाओं की भोर ।।

*

विश्वासों की पोटली, संजाये थे साथ।

काल परिंदा ले उड़ा, क्षण में किया अनाथ।।

*

जीवन की संध्या घड़ी, अंधकार गहराय ।

आशाओं के दीप को, उर में कौन जलाय।।

*

जिन गलियों में खेलकर, बड़े हुये युवराज ।

उन राहों को लाँघ कर, चले गये सरताज ।।

*

नये क्षितिज पर उड़ गये, बेटा भानु प्रताप।

काट डोर सम्बन्ध कीे, बिछुड़ गये माँ बाप ।।

*

अपेक्षायें न राखिये, अपनों से कुछ आप ।

मन दर्पण सा टूट कर, बन जाये अभिशाप।।8

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७६ – कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – बाल कन्हैया छबि अति प्यारी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता “कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – बाल कन्हैया छबि अति प्यारी ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७६ ☆

🙏🪷कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – बाल कन्हैया छबि अति प्यारी 🪷🙏

🪷

नयन खोल देखें नट नागर, घर-घर सुंदर साज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

कोई साजे मोतियन माला, चौंक पुराये द्वार।

स्वर्ण कलश ले दीया बाती, पुष्प माल ले हार।।

सांवरिया की सूरत प्यारी, चरण पखारे काज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

छेड़े गोपी रास रचायें, मथुरा नगरी धाम।

गिरधर माधव कान्हा छलिया, माखन चोरी काम।।

वेणु अधर बजाये गोविंद, मधुर- मधुर आवाज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

यमुना तट पर खेलें कान्हा, ग्वालन करती प्रीत।

मनमोहन की नटखट बातें, गाती सुंदर गीत।।

मटकी फोड़े माखन खायें, पिता नंद का राज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

धराधाम पर भगवन आये, लेकर प्रेम अपार।

बने द्वारिकाधीश यहीं पर, गीता मुख है सार।।

युगों-युगों से कान्हा आयें, सुंदर बना रिवाज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

हे गिरधारी कृष्ण मुरारी, नंद यशोदा लाल।

केशव माधव मोहन कान्हा, बनें कंस के काल।।

शीलू कहती हे नारायण, रखना मेरी लाज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

🪷

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९१ – देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९१ ☆ देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विगत सप्ताह यूनाइटेड नेशन्स जिसको हम यू एन के नाम से भी जानते हैं, ने एक प्रस्ताव के जरिए विश्व का नया मानचित्र जारी किया है। पूर्व में बनाया गया मानचित्र यूरोप के इटली देश द्वारा सन 1600 से पूर्व काल का है।

अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक क्षेत्रफल से कम अनुपात में दिखाया गया है, ऐसी शिकायत के कारण, नए मानचित्र की आवश्यकता आन पड़ी है।

यू एन जैसी संस्था की बात आज के समय कोई मानता ही नहीं है। उसका हाल घर के सबसे बड़े बुजर्ग के समान है, जिसने परिवार के लिए सब कुछ निछावर कर साम्राज्य स्थापित कर, बच्चों के नाम कर दिया था, अब घर के उसके अपने बच्चे ही उसको पूछते ही नहीं है। वो कुछ भी बोले, उसकी बात अनसुनी ही रहती है।

नए मानचित्र को लेकर हमारे एक मित्र जिनका स्टेशनरी सामान का व्यापार है, से लम्बी वार्तालाप हुई, उनको ये शंका हो रही है, इस नए मानचित्र के चक्कर में उनके एक खाली प्लॉट की जमीन कहीं कम ना हो जाय। हमने उनसे कहा ऐसा कैसे हो सकता है, उनका ये मानना है, कि शहर के नए मास्टर प्लान में उनके प्लॉट का साइज एक चौथाई कम हो गया था, अब तो पूरी दुनिया का ही नक्शा बदल रहा है, सरकार इस नाम से उनकी जमीन का कुछ भाग, डकार जाएगी।

हमने उनके दर्द को कम करते हुए कहा, अब सभी स्कूलों, सरकारी दफ्तरों आदि में दुनिया का नए मानचित्र लगाया जाएगा, बच्चे नए “ग्लोब”, गत्ते के स्टेंसिल आदि भी खरीदेंगे। आपकी तो दीवाली हो जाएगी।

इंतजार करें, हमें कब विस्तृत नया नक्शा देखने को मिलेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३९ ☆ झाडतो पायरी… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३९ ?

☆ झाडतो पायरी… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

नाही सोडून वागलो, माझी जाणतो पायरी

आधी खायचो हापूस, आता मागतो पायरी

*

पायरीच्या दगडामधे, होय भक्ती साठलेली

अनवाणी पायाने मी, पुढची चालतो पायरी

*

लाज वाटावी कशाला, मला देवाच्या दारात

जातो देवळात तेव्हा, तेथे झाडतो पायरी

*

छोट्या जागेत बंगला, झाल्या उंच या पायऱ्या,

मोठ्या कष्टाने तरिही, मी ही लांघतो पायरी

*

माणसाची जात आहे, राग येतो केव्हा तरी

तेव्हा काही काळ तरी, मीही सोडतो पायरी

*

आहे सत्तरी गाठली, थके पायाचा पाळणा

वाटे काळजी स्वतःची, तेव्हा टाळतो पायरी

*

पुढे जायची बाळाला, आता आगलेली ओढ

बाळराजाला उत्साह, तोही रांगतो पायरी

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६४ ☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘गणेश चौथ‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६४ ☆

☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘आज गणेश चौथ है आप भी व्रत होंगी?’ सासूजी खुद तो व्रत रखती ही थीं आस-पड़ोसवालों से भी पूछती रहतीं –‘ नहीं’ या ‘हाँ’ के उत्तर में सामने से एक प्रश्न दग जाता – ‘और आपकी बहू?’ ‘उसके लड़का नहीं है ना? हमारे यहाँ लड़के की माँ ही गणेशचौथ का व्रत रखती है। ‘

ना चाहते हुए भी मेरे कानों में आवाज पड़ ही जाती थी। तभी मैंने सुना आस्था दादी से उलझ रही है – ‘दादी। लड़के के लिए व्रत रखती हैं आप! लड़की के लिए कौन-सा व्रत होता है?’

‘ऐं — लड़कियों के लिए कोई व्रत रखता है क्या?’- दादी बोलीं

‘पर क्यों नहीं रखता’ – रुआँसी होती आस्था ने पूछा।

‘अरे, हमें का पता। जाकर अपनी मम्मी से पूछो, बहुत पढ़ी-लिखी हैं वही बताएंगी। ’

आस्था रोनी सूरत बनाकर मेरे सामने खड़ी थी। आस्था के गाल पर स्नेह भरी हल्की चपत मैं लगाकर बोली – ‘ये पूजा- पाठ संतान के लिए होती है। ’

‘संतान मतलब?’

‘हमारे बच्चे और क्या। ‘

आस्था के चेहरे पर भाव आँख – मिचौली खेल रहे थे। सासूजी पूजा करने बैठीं, तिल के लड्डूओं का भोग बना था। उन्होंने अपने बेटे रजत को टीका करने के लिए आरती का थाल उठाया ही था कि रजत ने अपनी बेटियों को आगे कर दिया – ‘पहले इन्हें माँ’। तिल की सौंधी महक घर भर में पसर गयी थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९९ ☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९९ ☆

☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

ग्वाल-बाल के संग नंदलाला,

मुरली मनोहर आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

*

भक्त तिहारी राह तके हैं,

यशोदा प्यारे आ जाओ।

माखन-मिश्री के मतवाले,

माधव न्यारे आ जाओ।।

*

कुंज-गलिन में राधा रानी

के मतवाले आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

☆

जब भाद्रपद की अँधेरी रात आस्था के दीपों से जगमगाने लगती है, तब मन के आकाश पर एक अनुपम छवि आकार लेती है—मोरपंख मुकुट धारण किए नटखट नंदलाल, अधरों पर सजी बाँसुरी और चारों ओर पसरा हुआ हरा-भरा वृंदावन। यह वही वृंदावन है, जहाँ प्रकृति केवल कृष्ण की लीलाओं की साक्षी नहीं थी, बल्कि स्वयं उनकी लीला का अभिन्न अंग थी।

कदंब की डालियाँ उनके झूलों की सखी थीं, यमुना उनकी चिर-सहचरी और गौवंश उनके वात्सल्य का विस्तार। वन-पथों पर बिखरी दूब, कुंजों की छाया, फूलों की सुगंध और पक्षियों का कलरव—इन सबके बीच कृष्ण का बालपन जैसे प्रकृति के हृदय पर लिखी कोई मधुर कविता था।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें उस आत्मीय संबंध की स्मृति कराता है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं। उनकी बाल लीलाओं में मिट्टी की सोंधी गंध है, यमुना की कल-कल है, वृक्षों की शीतल छाया है और जीव-जंतुओं के प्रति सहज करुणा है। इसलिए कृष्ण को जानना केवल उनके दर्शन को जानना नहीं, उस प्रकृति को भी समझना है, जिसमें उनकी चेतना ने आकार पाया।

आज हमारे चारों ओर कंक्रीट के जंगल फैलते जा रहे हैं और वास्तविक वन सिमट रहे हैं। नदियाँ अपना निर्मल स्वर खो रही हैं और पक्षियों का कलरव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ऐसे समय में यह पर्व हमारे भीतर एक सहज प्रश्न जगाता है—क्या हमारी भक्ति केवल मंदिरों और झाँकियों तक सीमित रहेगी, या हम कृष्ण के उस वृंदावन को भी अपने जीवन में स्थान देंगे, जहाँ हरियाली स्वयं उत्सव थी?

उत्सव की सजावट में यदि जीवित पौधों, पत्तियों, फूलों, मिट्टी के दीपों और प्राकृतिक सामग्री को स्थान दिया जाए, तो सौंदर्य के साथ संवेदना भी जुड़ती है। लड्डू गोपाल के समीप रखा गया एक छोटा-सा पौधा केवल सजावट नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए जीवन का संकल्प बन सकता है।

क्यों न इस अवसर पर ‘एक पौधा कान्हा के नाम’ का संकल्प लिया जाए? पौधा लगाएँ, उसे सींचें, उसकी छाया बढ़ते देखें और उसके साथ अपने भीतर प्रकृति के प्रति प्रेम को भी अंकुरित होने दें।

कृष्ण ने हमें प्रेम का विस्तार सिखाया—मनुष्य से प्रेम, जीव-जंतुओं से करुणा और धरती से आत्मीयता। उनकी बाँसुरी की मधुर तान तभी सार्थक होगी, जब यमुना निर्मल बहे, वृक्षों पर फिर पक्षियों के बसेरे हों और हमारी धरती हरियाली की साँस लेती रहे।

कान्हा को केवल झूले में न झुलाएँ,

उनके वृंदावन को भी अपने जीवन में उतारें।

ऐसी भक्ति हो, जिसमें दीप भी जले और कोई पौधा भी रोपा जाए; ऐसी आराधना हो, जिसमें घंटियाँ भी गूँजें और पक्षियों का कलरव भी सुनाई दे; ऐसा उत्सव हो, जिसमें मंदिर ही नहीं, हमारी धरती भी मुस्कुराए।

☆

राह तके हैं गोपी सारी,

रास-रचैया आ जाओ।

संकट की घड़ियों में कृष्णा,

लाज-बचैया आ जाओ।।

*

भक्तों के हिय आन समाने,

मीरा-मोहन आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

☆

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares