हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३३ ☆ अहं या वहम… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं या वहम…। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३३ ☆

☆ अहं या वहम… अत्यंत घातक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जल्दी जागना हमेशा फ़ायदेमंद होता है, फिर चाहे वह अपनी नींद से हो; अहं से हो; वहम से हो या  सोए हुए ज़मीर से… इनसे जितनी शीघ्रता से मुक्ति पा ली जाए; शरीर व मन के लिए उपयोगी है।’ जितनी शीघ्रता से मानव भोर होते, सूर्योदय से पूर्व नींद से जाग जाए… स्वास्थ्य-प्रदायक है। ‘जो सोवत है, सो खोवत है’ अर्थात् जो जागता है, वही पाता है। सो! समय से पूर्व जागने वाला व्यक्ति सदैव लाभ प्राप्त करता है और देर तक सोने वाले की हानि होना निश्चित है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि कुछ पाने के लिए, कुछ खोना अवश्य पड़ता है। हम अगली सांस तब तक ग्रहण नहीं कर सकते, जब तक हम पहली श्वास का त्याग नहीं करते। प्रकृति की सब वस्तुएं हमें मुफ़्त में प्राप्त होती हैं, पर्याप्त हैं–परंतु संग्रहणीय नहीं हैं। यदि हम सीमा में रहते हुए उनका उपयोग करते हैं, तो उनका अभाव कभी नहीं खलता। परंतु जब हम आवश्यकता से अधिक उनका संग्रह करना प्रारंभ कर देते हैं, तो प्रकृति अपना विकराल रूप दिखा कर, मानव को सचेत करती है कि समय रहते चेत जाओ … अपनी बढ़ती लालसाओं पर अंकुश लगाओ … अपने संसाधनों का अतिरिक्त दोहन मत करो, अन्यथा तुम्हें इसका हर्ज़ाना अथवा दुष्परिणाम अवश्य भुगतना पड़ेगा। परंतु मदहोश मानव उसकी ग़ुहार की ओर ध्यान नहीं देता, बल्कि उपेक्षा भाव दर्शाता है–तो प्रकृति भीषण आपदाओं के रूप में अपना रोष प्रकट करती है।

हरी-भरी धरा को कंक्रीट के जंगल बनाने के कारण तापमान निरंतर बढ़ रहा है; ग्लेशियर पिघल रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहा है; ज्वालामुखी पर्वत फटने से भूकंप आ रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहे हैं; धरती फट रही है और मानव का सर्वस्व सैलाब में बह रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रकृति अपनी असीम वेदना व अथाह दु:ख प्रकट करते हुए आंसू बहा रही है। परंतु फिर भी मानव प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है; अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर प्रतिबंधित क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है और उसके आक्रोश को समझने की ज़ेहमत नहीं पा रहा, क्योंकि वह चिरनिद्रा में सो रहा है।

अहम् और वहम एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका चोली-दामन का साथ है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, जो इस वहम में जीता है कि उससे अधिक बुद्धिमान, समझदार व शक्तिशाली कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। सो! वह पूरी सृष्टि पर अधिपत्य स्थापित कर, अपने अहम् की पुष्टि करना चाहता है। वह अहंनिष्ठ प्राणी केवल अपने बारे में चिंतित रहता है; अपनी सुख-समृद्धि के निमित्त प्रयासरत रहता है तथा दूसरों पर विजय प्राप्त करने के बारे में सोच- विचार कर योजनाएं ही नहीं बनाता, बल्कि उसके कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की अनाधिकार चेष्टा भी करता है। सो! वह राह में आने वाले प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को मिटा डालना चाहता है; भले ही उसे कितने ही निम्नतम स्तर पर ही क्यों न उतरना पड़े? वह किसी अन्य को समान स्तर पर देख आत्म- नियंत्रण खो बैठता है; अपने आपे से बाहर हो जाता है… मानव-मूल्यों को तज, उचित-अनुचित को नकार सभी सीमाओं को लांघ जाता है। इस स्थिति में मर्यादा भी उसकी राह का रोड़ा नहीं बनती, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है … भले ही वह उसका वहम क्यों न हो? लाख प्रयास करने पर भी वह दम्भी मनुष्य उस स्वनिर्मित चक्रव्यूह से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। सो! ऐसे अहंनिष्ठ व्यक्ति का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कैसे सुन सकता है? उसके लिए अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य कोई मायने नहीं रखता। वह बॉस की भांति केवल स्वयं को सदैव ठीक मानता है… अपनी सोच को उचित ठहराता है,  क्योंकि ग़लती तो वह कभी कर ही नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति को यदि आप हिटलर की संज्ञा भी देंगे, तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

काश! मानव सोच पाता कि संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। संसार रूपी रंगमंच पर सबको अपना क़िरदार अदा कर, ज़िदगी के सफ़र पर चल देना है। कोई भी व्यक्ति इस संसार में सदैव नहीं रहा तथा मृत्यु समय आने पर उसे लाख परदों के पीछे से भी ढूंढ लेती है। सो! मानव को अपना अहं त्याग कर, सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए; उनसे अच्छा व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि जैसा व्यवहार आप दूसरों के साथ करते हैं, वही प्रतिध्वनि के रूप में लौट कर आपके पास आता है।

‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ अथवा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ अर्थात् जैसे कर्म करोगे, वैसा ही फल आपको प्राप्त होगा। इसलिए जो व्यक्ति आप का अहित चाहता है; आपके पथ में कांटे बिछा कर अवरोध उत्पन्न करता है; उस स्थिति में आपके लिए वैसा ही प्रत्युत्तर न देना बेहतर है,

अर्थात् अपना रास्ता बदल लेना अधिक कारग़र है, क्योंकि मानव को अपने कृत-कर्मों के अनुसार फल अवश्य मिलता है। यदि कोई आपके साथ बुरा भी करता है, तो भी आपको उसके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए…यही जीने का सबसे सर्वश्रेष्ठ व उत्तमोत्तम मार्ग है। परंतु कुछ परिस्थितियां अपवाद भी हो सकती हैं।

वहम सब रोगों की जड़ है। वहम केवल एक आदत नहीं… स्वयं को, अपनी सोच को ठीक व उचित समझने का मात्र जज़्बा नहीं है। यह भ्रम की वह स्थिति है, जिसमें अवगाहन कर मानव अपने सम्मुख सबको हेय समझता है तथा उनके अस्तित्व को नकार देता है। वह लाज-मर्यादा तज, जीवन-मूल्यों का तिरस्कार कर, सब पर दोषारोपण कर सुक़ून पाता है तथा सबको एक ही लाठी से हांकने में विश्वास रखता है। उसका सुप्त अहं व मृत्त ज़मीर उसके सोचने-समझने की शक्ति का हरण कर लेता है। इस स्थिति में सब उससे घृणा करने लग जाते हैं; कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करना चाहता। परंतु एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब उसकी शारीरिक शक्तियां क्षीण हो जाती है; मनो- मस्तिष्क साथ नहीं देता… एकांत की त्रासदी झेलता वह अहंनिष्ठ शख़्स अपनों के बीच; अपनों के साथ जीवन का आखिरी समय व्यतीत करना चाहता है, परंतु उसके हाथ केवल निराशा ही लगती है। इन परिस्थितियों में वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है…पागलों जैसा असामान्य व्यवहार करने लगता है और प्रायश्चित-स्वरूप उन्हें जीवन के समस्त सुख प्रदान कर, अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहता है…अपने सुख-दु:ख साझे करना तथा अपनी विवशता व अप्रत्याशित परिस्थितियों से अवगत कराना; उसकी प्राथमिकता बन जाती है… परंतु सब निष्फल। उसके आत्मज उस स्थिति में उसे अतिव्यस्त, आत्मनिष्ठ, आत्ममुग्ध व आत्मलीन  भासते हैं… जिसका अंजाम उसे नियति के अनुसार अपने कर्मों के अनुरूप अवश्य भुगतना पड़ता है।

काश! मानव का ज़मीर ज़िंदा रहता… संवेदनाएं मृत्त नहीं होतीं… संबंधों की गरिमा बनी रहती… रिश्तों की अहमियत बरक़रार रहती..जीवन-मूल्य प्रासंगिक रहते, तो मानव संवेदनहीनता के दायरे में प्रवेश करके दुष्कर्म, फ़िरौती, कन्या भ्रूण-हत्या आदि के हादसों को अंजाम न देता; बालिकाओं की अस्मत सुरक्षित रहती; मां, बहन, बेटी को मात्र उपयोगिता की वस्तु न समझा-स्वीकारा जाता, लूट-खसोट, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या की घटनाएं आम नहीं होतीं और उन पर अंकुश लग पाता। परंतु यह तभी संभव हो सकता था; यदि हमारा ज़मीर ज़िंदा होता।

आइए! लौट चलें ,अपनी संस्कृति की ओर… जहां ज्ञान-रूपी सूर्योदय सबसे पहले होता था। जहां सांस्कृतिक एकता के रूप में, विविधता में एकता विद्यमान थी। सभी धर्म-जातियों के लोग मिल-जुल कर रहते थे। पारस्परिक स्नेह-सौहार्द व मर-मिटने का भाव था, सब मर्यादा की सीमा-रेखा का स्वेच्छा से पालन करते थे और अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यनिष्ठता व्याप्त थी। सब परमात्म-सत्ता के सम्मुख नत रहते थे…इसलिए असामान्य व अमानवीय हादसे घटित नहीं होते थे और समाज में समन्वय व सामंजस्यता व्याप्त रहती थी।

इए! हम लौट चलें! अपने स्वर्णिम अतीत की ओर.. जहां सुक़ून था, शांति थी, सुख का साम्राज्य था। मानव राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर था; वहां नकारात्मकता का लेशमात्र भी स्थान नहीं था तथा सर्वहिताय व सर्वमंगल की भावनाएं जन-मानस में निहित थीं। सो! हमें अहं का त्याग कर, वहम से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि प्राणी-मात्र में परमात्म-सत्ता उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे सूर्य आकाश में दिखाई पड़ता है और वह विभिन्न घड़ो के जल में भी समान रूप में प्रति- भासित होता है। इसलिए हमें सम्पूर्ण जीव-जगत् में उस ब्रह्म की सत्ता को अनुभव करना चाहिए, ताकि ऐसे सुदृढ़ समाज की संरचना हो सके; जहां सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का साम्राज्य हो।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६५ ☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ।)

☆ शेष कुशल # ६५ ☆.☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता – शांतिलाल जैन 

उधर सात समंदर पार निज़ाम-ए-अमेरिका अपनी कामकाज की मेज़ पर लिखवा कर रखते हैं – ‘बक स्टॉप्स हियर’.  इधर आर्यावर्त में ‘बक स्टॉप्स नो व्हेयर’. अंग्रेजी का बक श्रीमान्, आला हाकिम से लेकर अदने से मुलाज़िम तक कोई उसे अपनी डेस्क पर ठहरने नहीं देता. पास देने में सब प्रवीण. हॉकी फुटबाल में होते तो खूबसूरत पास दे रहे होते. बहरहाल, मैंने बक को जबरन रोककर पूछा – यार ये परीक्षाओं के पेपर बार बार लीक हो रहे हैं –  तुम किसी की डेस्क पर जाकर तो रुकोगे?

उसने कहा – ठहरेंगे तो मारे जाएँगे शांतिबाबू. हमें जहाँ ठहरना चाहिए वहाँ शिकारी बैठे होते हैं. समय आने पर जो आदमखोर हो जाने का भी दम रखते हैं. मुझ निरीह गरीब प्राणी को क्या ही छोड़ेंगे?  आदम जो कभी किसान के रूप में मरता है कभी छात्र के तौर पर,  कभी महिला पहलवानों के तौर पर तो कभी रिटायर्ड सैनिक के तौर पर. हमें ठहरना तो वहीं चाहिए जिनके कारण वे मरते हैं. मगर, क्या मजाल है कि हाकिम की नाक पर मक्खी और कामकाज की डेस्क पर कोई बक ठहर जाए. ठहरने का तो इन दिनों हमने सोचना ही बंद कर दिया है.

‘कभी, कहीं तो ठहरे होगे तुम?’  –  मैंने पूछा.

‘लाल बहादुर शास्त्री के समय ठहरे थे हम. ट्रेन अरियालुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई और हम  दिल्ली में रेलमंत्री की डेस्क पर जा कर ठहर गए. अब हम कहीं नहीं ठहरते. आर्यावर्त के  ओहदेदार ‘पास द बक’ में निपुण जो हो गए हैं. जो जितना बड़ा ओहदेदार पास देने की कला में वो उतना ही माहिर.’

आर्यावर्त का मामला श्रीमान्,  मैं भी क्या ही कहता उसे. उसी ने कहना जारी रखा – ‘यहाँ हर संकट के साथ तीन चीज़ें तत्काल पहुँचती हैं — कैमरा,  बयान और उच्च स्तरीय जांच समिति. समिति जवाबदेही तय करेगी. रियाया उम्मीदें पाल लेती है,  समिति के निष्कर्ष आएँगे,  जिम्मेदार लोग दोषी ठहराए जाएँगे, समिति कहेगी मुझसे बक, यू स्टॉप हियर.  मगर ऐसा होता नहीं. वो क्या है कि समिति उच्च स्तरीय होती है. रियाया निच्च. उच्च भी इतनी कि सीढ़ी आप चढ़ नहीं पाएँगे और लिफ्ट आपको कोई देगा नहीं.  गर्दन दुखने लगती है तो जनता उच्च स्तर पर देखना ही बंद कर देती है. समिति उच्च स्तर पर जाँच करती है, निष्कर्ष हैं कि नीचे तक आ नहीं पाते.’

पिछले दिनों एक पुल टूट गया, सैकड़ों की संख्या में लोग मर गए. मैंने बक से कहा – ‘सेतु निगम के अधकारियों से लेकर लोक निर्माण विभाग के वज़ीर तक किसी की डेस्क पर तो तुम्हें रुकना ही पड़ेगा?’

उसने कहा – ‘बहुत भोले हैं आप शांतिबाबू,  बल्कि बेवकूफ़ हैं. गिरनेवाला यह पहला पुल नहीं है. न ओहदेदार नए हैं, न मेरे जैसा बक ही नया है. कुछ क्लासिक पास देखिएगा – निर्माण एजेंसी दोषी है. एजेंसी कहेगी तकनीकी स्वीकृति प्रशासन ने दी थी. प्रशासन कहेगा बजट सीमित था. वित्त विभाग कहेगा वैश्विक परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं. पुल कमज़ोर था, चेतावनी लिखी थी फिर भी बड़ी संख्या में लोग पुल पर आ गए.’  कुछ हुआ कि मरहूम मासूमों को याद करते करते गला भर आया बक का. बोला – ‘कभी किसी रसूखदार को टूटते पुल पर मरते हुए देखा है ? वे पुलों को न पैदल पार करते हैं, न टूटने से मरते हैं.’

बोला – ‘इस तरह पास दिए जाने से बेहतर है हाराकिरी कर ली जाए. यूँ भी सफलता के सौ बाप होते हैं,  विफलता अनाथ. सड़क समय पर बन जाए तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. सड़क बरसात में बह जाए तो यह अप्रत्याशित वर्षा का परिणाम है. महँगाई घटे तो नीति सफल है,  बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय कारण हैं. परीक्षा अच्छे से हो जाए तो प्रशासन दक्ष है,  प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो कुछ शरारती तत्व सक्रिय थे. निज़ाम का फण्डा क्लियर है,  काम अच्छा हुआ तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. खराब हुआ तो यह मौसम के कारण हुआ. ईरान युद्ध के कारण हुआ. तकनीकी खामी के चलते हुआ. स्थानीय प्रशासन दोषी है. विपक्ष के समय भी हुआ. आला हाकिम का कोई कसूर नहीं.’

‘आपके आर्यावर्त की रियाया शांतिबाबू, एकदम उदारमना!! हर बार भरोसा कर लेती है बक कभी तो किसी विभाग में किसी की डेस्क पर जा कर ठहरेगा. उधर निज़ाम भी उतने ही मुतमइन हैं – अगली घटना घटने तक रियाया पिछली घटना भूल जाएगी. जब कोई नहीं मिलेगा तो नेहरू है ना! बक स्टॉप्स देयर.’ – उसने धीमे से कान में कहा –  ‘बौने कद के ओहदेदार और कामकाज की ऊँची मेज़ें,  तो कैसे लिखवाईएगा – ‘बक स्टॉप्स हियर’. फिर वह चला गया.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०६ – गीत – जहरीली हवाएँ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतजहरीली हवाएँ

? रचना संसार # १०६ ?

☆ गीत – जहरीली हवाएँ…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

पथ सभी अवरुद्ध होते,

नेत्र भी देते छलावे।

दोष अब किसका कहें हम,

झूठ निकले आज दावे।।

 

रक्त भी पानी हुआ है,

अस्थि- पंजर आज तन भी।

पाश यम का बाँधता है,

रूह काँपे और मन भी।।

 

हो रही चर्चा गली में,

कर चुके देखो दिखावे।

 

मौसमी बदलाव लाया,

साथ जहरीली हवाएँ।

नित नए चलचित्र चलते,

आसुरी ये आपदाएँ।।

 

सिर शनीचर है चढ़ा भी,

लोग देते हैं भुलावे।

 

मौत से परिणय हुआ है,

नृत्य तांडव हो रहा है।

ढेर लाशों के लगे हैं,

श्वान बैठा रो रहा है।।

 

सिर झुका झिंगुर चले अब,

दादुरों के हैं बुलावे।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३३ ☆ शब्द तुम मीत मेरे ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता  – शब्द तुम मीत मेरे)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – शब्द तुम मीत मेरे ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

शब्द तुम मीत मेरे

शब्द में  

छुपे अर्थ सारे

मैं कहती जाऊं

तुम सुनते जाना

शब्द मेरे तुम सो न जाना

नहीं कहूंगी कुछ भी व्यर्थ

तुम खोना न शब्द अपने अर्थ

शब्द बढ़ते ही जाएंगे

सागर नदिया पार लगाएंगे

आएंगे शब्द

इतिहास ग्रंथों से

वे आएंगे तरह तरह के रूप में

बदलेंगे अपना वेश

जाना चाहेंगे देश-देश

पहनेंगे अपनत्व का जामा

बढ़ाएंगे दोस्ती का हाथ

जब उन्हें मिल जाएंगे

अपने शब्दों के अर्थ

तब वे तुम्हें पहचानेंगे नहीं

रख देंगे कुचलकर

तुम्हें बता दिया जाएगा

देश और समाज का दुश्मन

होशियार हो जाओ

शब्द तुम …..

चारों ओर घेरा है गिद्ध का

उपदेश सही है बुद्ध का

शब्दों को सही चुनों

बोलने से पहले गुनों

शब्द तुम…

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१४ ☆ कविता – एक बुंदेली पूर्णिका –  सच्चाई… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक बुंदेली पूर्णिका –  सच्चाई आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१४ ☆

कविता – एक बुंदेली पूर्णिका –  सच्चाई☆ श्री संतोष नेमा ☆

बात जरा सी समझ ने पा रये का हुई है

सच्चाई  को  तुम  झुठला  रये का हुई है

*

आपहिं आप  खूब फेंक  रये  झूठी  सच्ची

झूठ  बोल  खें आँख  दिखा  रये का हुई है

*

कभू   कोउ   की  मदद  करी  ने तुमने भैया

बेमतलब   एहसान   जता   रये  का हुई है

*

कर्जा   बनिया  को   मूढ़े   धरत  फ़िरत  हो

कै  कै  थक  गए  कहां  पटा  रए  का  हुई है

*

सीधी गैल कभू  ने चल ख़ें तुम हो आए

अब  काहे  खो  तुम  चिल्ला  रए का हुई है

*

पी  लओ  खूब   घाट- घाट  को  तुमने पानी

खुद  को  घाट  खुदई  बिसरा  रए का हुई है

*

खुद  पै   कभू   लगाम  धरी   ने  तुमने बबुआ

देख  सूरतिया  जी  ललचा  रए  का हुई है

*

बात  सयानों  की  “संतोष” कभू ने तुमने मानी

हाथ  धर   खे  अब   पछता   रए  का हुई है

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३४ – कविता – राधा कृष्ण प्रीत… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मधुमास।)

☆ शशि साहित्य # ३४ ☆

? कविता – मधुमास…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

रूप सजा वसुधा का दुल्हन सा,

बलिहारी हो रहे ऋतुराज…

बदरा भी रिमझिम हुए,

हरियाली का है राज…

*

टिप टिप करती बूंदनियां,

ज्यों बजे कहीं पर साज…

भावुक मन में उठे हिलोरें,

बतलाओ क्या है राज…

*

प्रकृति खिलखिला उठी,

पहन लिया  सौंदर्य का ताज…

ना बोलो कुछ कठोर बोल,

दिल पर गिरे है गाज…

*

बूंदों संग खुशियां बरसें,

छाया मधुमास है आज…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – ३२ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – ३२ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

समर्पण (२)

पांडुरंगाची भक्ती करताना संत तुकाराम भगवंताच्या पायी लीन झाले आहेत, त्यांची देह बुद्धी नष्ट होऊन परमेश्वराशी त्यांनी स्वतःला कसे समर्पित केले आहे याविषयीचे काही अभंग मागील लेखात आपण पाहिले. आज आणखी काही अभंगांचा परामर्श घेऊ.

महाराजांना चोहीकडे एका परमेश्वराचेच रूप दिसत आहे, त्याचाच आवाज त्याला ऐकू येत आहे. ते देवाला म्हणतात…

ध्याईन तुझे रूप/ गाईन तुझे नाम/

आन न करी काम/ जिव्हा मुखे//

पाहिन तुझे पाय/ ठेवीन मी डोई/

पृथक ते काही/ न करी आन//

तुझेचि गुण नाद/ आईकेन कानी/

आणिकांची वाणी/ पुरे आता//

करीन मी सेवा करे/ चालेन मी पायी/

आणिक न वजे ठायी/ तुजविण//

तुका म्हणे जीव/ ठेवीन मी पायी/

आणिक ते काही/ देऊ कवणा//

हे देवा मी सदैव तुझेच रूप माझ्या डोळ्याने पाहत राहीन आणि तुझेच नाम सतत गात राहीन. माझ्या जिभेवर दुसरे काहीच येणार नाही. माझ्या डोळ्यांनी फक्त तुझे पाय मी पाहीन आणि त्यावरच माझे मस्तक ठेवीन.

त्याशिवाय दुसरे काही करणार नाही. तुझे गुणगान ऐकत राहीन, बाकी काही बडबड करणार नाही. तुझ्याकडे पायी चालत येईन आणि या माझ्या हाताने तुझी सेवा करीन. तुला सोडून दुसरीकडे कोठेही मी जाणार नाही. हा माझा जीव तुझ्या चरणी अर्पण करीन. आता दुसऱ्या कुणाला देण्यासाठी माझ्याकडे काही उरले नाही. हरीनामा- व्यतिरिक्त तुकारामांकडे काही नव्हते, ते हरिमय झाले होते.

एका विठू माऊलीला शरण गेल्याने भक्ताचा कसा फायदा होतो ते महाराज या अभंगात सांगत आहेत.

भावे ऐसा नाश/ अवघिया  दिला त्रास/

अविटाचा केला संग / सर्व भोगी पांडुरंग//

आइताच पाक/ संयोगाचा सकळीका/

तुका म्हणे धणी / सीमा राहिली होऊनी//

आज पर्यंत मी दुसऱ्यांना जो काही त्रास दिला असेल आणि त्यामुळे मला जे पाप लागले असेल, ते या पांडुरंगाला शरण गेल्यामुळे आता नष्ट होईल. कारण त्याच्या अवीट भक्तीमुळे मला त्याचा संग लागला आहे आणि माझी सर्व सुखदुःखे तो एक पांडुरंग आता भोगत आहे. तुकाराम महाराजांना हेच सांगायचे आहे की हरिभक्तीत लीन झाल्यामुळे भक्ताला सुखदुःखाची जाणीव राहत नाही. कोणत्याही परिस्थितीत, चांगली अथवा वाईट त्याचा समभाव राहतो.

तुकाराम सांगतात की अन्नाचा दुष्काळ पडला आहे किंवा त्यांना फार भूक लागली आहे म्हणून ते अन्न सेवन करत नाहीत, तर सर्वसाक्षी जनार्दनाचा मान राखण्यासाठी ते भोजन करतात. बालका बरोबर जर ते जेवावयास बसले तर त्यांना असे जाणवते की आमचा पिताच आम्हाला मोठ्या प्रेमाने भरवीत आहे.

चांगली आणि वाईट दोन्ही कर्मे जेथे जळून जातात ते आत्मपद महाराजांना प्राप्त झाले आहे. मी कोणी नसून कर्ता- करविता तोच एक नियंता आहे याची अनुभूती त्यांना आलेली आहे.

तुकारामांच्या मनाची ही अवस्था ते या अभंगातून कशी व्यक्त करत आहेत ते बघा.

जे जे काही करितो देवा/ ते ते सेवा समर्पे//

भेद नाही सर्वात्मना/ नारायणा तुज मज //

आम्ही दुजे नेणो कोणा/ हेचि मना मन साक्ष/

तुका म्हणे जगन्नाथा/ हे अन्यथा नव्हे की//

ते जे जे काही कर्म करतात ते ते सर्व एका नारायणाला समर्पित करायचे या एका मनोभूमीकेतून. सर्वात्मक सर्वेश्वर आणि तुकाराम महाराज स्वतः यात तो आणि मी असा जराही भेद आता राहिलेला नाही. त्यांचे मनच या स्थितीला साक्षी आहे. ते पुन्हा पुन्हा सांगतात, ” हे जगन्नाथा, मी हे जे सांगतो आहे ते पूर्ण सत्य आहे, यात जराही खोटेपणा नाही.”

लोहचुंबकाच्या बळे/ उभे राहिले निराळे/

तैसा तूचि आम्हा ठाई/ खेळतासी अंतर्बाही //

भक्ष अग्नीचा तो दोरा/ त्यासी वाचवी मोहरा/

तुका म्हणे अधीलपणे/ नेली लाकडे चंदने//

नारायणाच्या संगतीने भक्त कसा परमेश्वराशी एकरूप होतो हे तुकाराम महाराजांनी वरील अभंगात काही उदाहरणे देऊन स्पष्ट केले आहे.

चुंबकाच्या आकर्षणाने लोखंडाची सुई उभी राहते, तसा परमेश्वर भक्तांच्या अंतर्बाह्य उभा आहे. धाग्याचा धर्म आगीने जळण्याचा असतो, परंतु तोच धागा मोहरा नामक खड्याला गुंडाळून अग्नीत टाकला तर जळत नाही. चंदनाच्या संगतीने इतर वृक्षांचे गुणधर्म जाऊन त्यांना चंदनाचा सुगंधी गुण येतो. सत्संग किती महत्त्वाचा आहे ही गोष्ट या उदाहरणांवरून आपल्या लक्षात येते. तात्पर्य, देवाच्या संगतीने भक्त आमुलाग्र बदलतो.

समर्पणाविषयी अनेक अभंग आपल्याला गाथेत आढळतात. मला असे वाटते की या सर्व अभंगांचा आपण अभ्यास करावा. चांगल्या वाचनाने आपल्यावरही चांगले संस्कार होऊन उचित परिणाम होऊ शकतो. यास्तव पुढील लेखात समर्पणाविषयीचे आणखी काही अभंग आपण अवश्य विवेचनासाठी घेऊ.

क्रमशः… ३२

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “शहर कहाँ है?” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆

☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

तुम्हीं बताओ

शहर कहाँ है?

अभी यहीं था

गया कहाँ है ।

 

घर सारे बन गए दुकानें

विज्ञापन से ढके मोहल्ले

शहद घुली खो गईं बोलियाँ

पसर गए कर्कश हो-हल्ले

कुछ तो बोलो

आम आदमी

आख़िर क्यों

लाचार यहाँ है ।

 

तीरथ गुंडे घट-घट व्यापे

चौराहों पर रोज़ प्रदर्शन

मठाधीश के आदेशों पर

ठग मंडल के भजन कीर्तन

चौपट सारी

हुई व्यवस्था

मूक बधिर

कानून जहाँ है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६२ ☆ उसका ईमान मर गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “उसका ईमान मर गया“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६२ ☆

✍ उसका ईमान मर गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मन के भ्रम से उबर गया कब का

सच था मुझमें निखर गया कब का

 *

हार की फ़िक़्र,डर गया कब का

जीत का ज़ोम भर गया कब का

 *

राह की रौनकें जो रास आई

छोड़ वो हम सफ़र गया कब का

 *

सच का परचम उठा लिया जबसे

सबका ख़ौफ़ो-ख़तर गया कब का

 *

बात पर जिसकी हो फ़िदा इतने

उसका ईमान मर गया कब का

 *

छाँव हटते पिता की सिर से मेरे

दर्प सारा उतर गया कब का

 *

तोड़कर रब्त हाल वो पूछे

ख़्वाब हर इक बिखर गया कब का

 *

दौरे हाजिर का ये सितम है अरुण

आदमी मुझमें मर गया कब का

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६६ – मिल जाए गर कोई नाख़ुश… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – मिल जाए गर कोई नाख़ुश।)

☆ हेमंत साहित्य # ६६ ☆

✍ मिल जाए गर कोई नाख़ुश… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना,मनाना,मनाते रहना

 *

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

 *

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

 *

अपनी दौलत,शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना, फकीरों को खिलाते रहना

 *

मिल जाए गर कोई नाख़ुश,नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

 

तीरगी =  अंधकार, तनकीद = उपदेश देना

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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