(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘ आधार प्रकाशन से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक ।प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।
साहित्य विशेषकर काव्य में अंतर्निहित श्रेष्ठ भाव, विचार एवं कल्पना रूपी आत्मा की संप्रेषणीयता पाठक को ज्ञात-आज्ञात रस और लय से भिगोकर बाँधती है। वे शाब्दिक अभिव्यक्तियाँ रस, छंद व अलंकार के आभूषण धारण कर लें तो सोने में सुहागा हो जाता है। रचनाकार की भावभूमि की उदात्तता उसके द्वारा किए गए शब्द-चयन और भाषा शैली से काफी हद तक जानी-समझी जा सकती है। यह रचनाकार की मन: स्थिति का भी संकेत करती है। एक ओर जहाँ किशोरावस्था एवं युवावस्था में लिखी गई प्रेम और सौन्दर्य संबंधी कविताओं की भाव-भूमि, प्रेम के सतत अभिलाषी मन की वासंती, फागुनी एवं सावनी अविकल चाह, कल्पना लोक का इंद्रधनुषी सप्तवर्णी वैभव, प्रतीकों, उपमानों एवं बिंबों का चित्रण, एक अलग ही वायवीय, एंद्रियतारहित भव्य-दिव्य-नव्य लोक की रचना करती अभिव्यक्त होती है जिनमें बौद्धिकता एवं दैहिक अनुभव से रहित इंद्रियातीत प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को भाव्यभिव्यक्ति में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर प्रौढ़ अवस्था में सृजित होनेवाली रचनाओं में प्रेम का आलंबन व उद्दीपन बौद्धिक एवं अनुभवज्ञ होने के कारण इनमें प्रयुक्त होनेवाले प्रतीक, बिंब एवं उपमान यथार्थ जगत से ग्रहीत होकर तदनुरूप शब्दावली एवं भाषा का आकार लेकर अभिव्यक्त होती-ढलती है। इन दोनों प्रकार की रचनाओं को सामान्यत: एक सजग-सुधि पाठक पढ़कर सहज ही समझ सकता है।
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का गीत-नवगीत संग्रह ‘ओ मेरी तुम’ भी इसका अपवाद नहीं है। उन्होंने अपने पुरोवाक् में स्वयं ही लिखा है- ”ओ मेरी तुम के गीत-नवगीत गत सुधियों में विचरण करते समय मन की अनुभूतियों का शब्दांकन हैं।” उनके मन में विचरण करनेवाली प्रियतम और कोई नहीं उनके जीवन को पूर्णता प्रदान करनेवाली जीवन संगिनी एवं सहचरी ‘धर्मपत्नी’ ही हैं जी कवि के मन को आह्लादित करती, अविस्मरणीय अनुभूतियों के साथ रची-बसी हैं। इसी भावातिरेक से जन्म होता है ‘ओ मेरी तुम’ के गीतों-नवगीतों का। अनुभूत प्रेम और सौंदर्य के भाव बोध को नए तरीके से कहने का आग्रह एवं चाह अमिधा, व्यंजनतथ्य लक्षणा के चमत्कार का आश्रय लेती शब्दावली, वृहद शब्द-भंडार उनके गहन अध्ययन एवं बौद्धिकता को संवेदनाओं में आरोपित करती, अनुभूत प्रेम को पाठकों के मन में पुनर्जाग्रत करती ये गीति रचनाएँ उनके अभिव्ययक्ति कौशल का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। अपने गीतों में छंदबद्धता एवं लयता लाने के लिए उन्हें अन्य भाषाओं के शब्दों को मुक्त हस्त प्रयोग करने में कोई आपत्ति नहीं है।
सलिल जी अपने नवगीतों में दैनंदिन जीवन में उपयोग आनेवाली वस्तुओं का सहज प्रयोग करने में सिद्धहस्त हैं जो उनकी उपलब्धि कही जा सकती है। चूँकि इन रचनाओं का मूल स्वर उनकी धर्मपत्नी के आसपास चहुँ ओर पल्लवित होता है, इसलिए इनमें विषय विविधता के स्थान पर धर्मपत्नी साधना जी के विभिन्न रूपों यथा ग्रहिणी प्रेयसी, प्रियतम, अभिसारिका आदि की आकर्षक छवियों का वर्णन ही विविधता है जो दैनिक जीवन से ग्रहीत प्रतीकों, उपमानों तथा बिंबों से सजकर तदनुरूप शब्दों व भाषा में आकार लेती अभिव्यक्त हुई है। यह कवि की काव्य-कर्म-कुशलता को दर्शाती है।
अपने व्यक्तिगत जीवनानुभवों से व्युत्पन्न इन प्रणय रचनाओं की नायिका काल्पनिक न होकर उनकी धर्मपत्नी ‘साधना जी’ हैं जो सहचरी बनकर उनके जीवन में आईं या वे लेकर आए। ‘सरहद’ शीर्षक रचना में इसका विस्तार से यथार्थपरक वर्णन है। वे सद्गुणों और संस्कारों का दहेज सहेजकर, अपनेपन की पतवारों से ग्रहस्थी की नैयय खेतीं, मतभेदों व अंतरों की खाई पाटतीं-पर्वत लाँघतीं प्रशस्त होती हैं। एक-दूसरे में खोकर, धैर्य से बाधाओं को पारकर, जीवन को मिलन और समर्पण से मधुर बनाती, सपनों को पूरा करतीं, कवि के जीवन को सार्थक करतीं हैं-
”भव सागर की बाधाओं को
मिल-जुलकर था हमने झेला
धैर्य धरकर, धरा नापने
नभ को छूने बढ़ीं कदम बन
तुम स्वीकार सकीं मुझको जब
अँगना खेले मूर्त खिलौने।”
कवि अपने भाव-सुमन इस स्नेह-सिक्त शब्दावली में अभिव्यक्त कर अपने को धन्य अनुभव करता है। वे कवि के जीवन में ‘अकथ प्यार’ लेकर कवि के मधुर स्वपनों को सकार करती, मूर्त रूप देती हैं-
”तुम लाए अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार….
…. सहवासों की ध्रुपद चाल
गाएँ ठुमरी-मल्हार”
ऐसे प्रसंगों में सलिल जी सर्वथा नूतन व मौलिक बिंबों के साथ पाठक के मन में भी खनक उत्पन्न कर उसे रसानन्द में निमग्न कर सके हैं।
प्रेयसी का मनोवांछित संसर्ग से आनंदित कवि अपने भाग्य को सराहते हुए बरबस ही कह उठता है-
”भाग्य निज पल-पल सराहूँ
जीत तुमसे मीत हारूँ
अंक में सर धर तुम्हारे
एकटक तुमको निहारूँ।।”
प्रेम पाने का हर्ष अपने साथ उसे खो देने की आशंका भी लाता है। कवि अपने अंतर्मन की आकुलता की अभिव्यक्ति करने में नहीं हिचकता-
”प्रणय का प्रण तोड़ मत देना
चाहता मन आपका होना”
‘सुवासिनी, सुहासिनी, उपासिनी, नित लुभावनी सद्यस्नाता प्रेसऊ का रूप कवि को ”सावन सा भावन’ प्रतीत होता है। रूपसी की अनिंद्य रूप-राशि पर रीझकर कवि कह उठता है ”मिलन की नव भोर का स्वागत करो रे!”। ”मन-प्राणों के सेतु-बंध का महाकुंभ है” में कवि नवाशाओं की वल्लरियों पर सुरभित स्नेह-सुमन खिलाता है।
प्रियतमा कवि-मन पर पूर्णाधिकार कर ले, यह स्वाभाविक ही है। प्रियतमा पर पूरी तरह विश्वास करता कवि कह उठता है-
”तुम पर
खुद से अधिक भरोसा
मुझे रहा है”
इस गीत-वगीत संग्रह के शीर्षक गीत ‘ओ मेरी तुम’ में कवि का भ्रमर-मन अपने बाहुपाश में बँधी प्रियतम को मृगनयनी, पिकबयनी आदि विशेषणों से संबोधित करते हुए प्रणय राग छेड़ मकरंद का रसपान करता है-
”बुझी पिपासा तनिक
देह भई कुसुमित टहनी ”
इस गीत की आगामी पंक्तियों में पारिवारिक नातों के प्रतीकों का चित्रण विस्मयकारी है। यहाँ कवि गीत के मूल भावों से भटकता-बिखरता प्रतीत होता है। ‘ओ मेरी तुम’ के अधिकांश गीतों में कवि ने जीवन-संगिनी के मनोहारी रूप-सौंदर्य की सटीक उपमानों, प्रतीकों तथा बिंबों से सुसज्जित छवि प्रस्तुत की है। ‘तुम रूठीं’ शीर्षक से दो गीत संकलन में हैं, दोनों की पृष्ठभूमि और भावभूमि पृथक है। ”तुम रूठीं तो / मन-मंदिर में / घंटी नहीं बजी / रहीं वंदना / भजन प्रार्थना / सारी बिना सुनी” कहकर कवि अपने जीवन में प्रेयसी के महत्व को रेखांकित करता है। इसी शीर्षक से दूसरे गीत के चार अंतरों में कवि ने ‘कलश’ चित्र अलंकार का अनूठा प्रयोग किया है।
कवि प्रेयसी के प्रेम में इस कदर डूब है कि उसे वह हर बार मिलने पर निपट नवेली ही प्रतीत होती है। प्रेयसी जीवन-बगिया में मोगरा की तरह प्रवेश कर उसे महका देती है। प्रियतम की आह्लादकारी स्मृतियाँ ‘याद पुरानी’ तथा ‘खिला मोगरा’ शीर्षक गीतों में कवि-mन को महकातीं, श्वास-श्वास में शहनाई जैसी गूँजती लगती हैं। कवि का मरुस्थली मन प्रेयसी को देखते ही हरा-भरा हो जाता है (तुमको देखा)। ”हो अभिन्न तुम” मानते हुए भी कवि ‘तुम बिन’ शीर्षक गीत में नायिका बिन जीवन को सूना पाता है- ”तुम बिन जीवन/ सूना लगता / बिन तुम्हारे / सूर्य उगता / पर नहीं होता सवेरा । चहचहाते / पखेरू पर/ डालता कोई न डेरा” कहकर कवि बीते पलों की सुधियों में खोकर विरह-व्यथा जानी सूनेपन की अभिव्यक्ति करता है।
जीवन संगिनी की मोहक मुस्कान पर कवि आसक्त है। जहाँ ‘तुम मुस्काईं १’ गीत में कवि प्रेयसी के मुस्कुराने पर ऊषा के गाल गुलाबी होते हुए अनुभव करता है, वहीं ‘तुम मुस्काईं २’ शीर्षक गीत में ‘सजन बावरा / फिसल हुआ बवाल’ कहकर प्रेमाकुल मन की अधीरता प्रगट करता है। ‘हरसिंगार मुस्काए’ शीर्षक नवगीत में कवि ने हरसिंगार के विविध समानार्थी शब्दों (विविध क्षेत्रों में प्रचलितनामों) का सहारा लेकर, नारी-देह के विविध अंगों की कांति के उपमान गढ़े हैं। ऐसा अभिनव प्रयोग अन्यत्र देखने में नहीं आया।
इसी तरह ”फागुन की / फगुनौटी के रंग / अधिक चटख हैं / तुम्हें देखकर” में प्रकृति भी नायिका को देख, उससे स्पर्धा कर और अधिकहरित, हर्षित, मुखरित व उल्लसित होने लगती है। ‘आ गईं तुम’ शीर्षक गीत में नायिका अपने साथ ही ऊषा की शत किरणें लेकर आती है तो परिंदे आगत के स्वागत में स्वयमेव ही चहकने लगते हैं।
”तुम सोईं तो / मुंदे नयन कोटर में / सपने लगे विहँसने” में नायिका अपने अंदर भाव, छंद, रस और बिंब समेटे, महुआ जैसी पुष्पित होती- गमकती अपने सपने सजाकर ‘मकान’ को ‘घर’ बनाती है। यह सुंदर भावपूर्ण अच्छी रचना है जो मनोहर है, कवि शब्दों के विभिन्न प्रकार के संयोजन-नियोजन से भाषा में शब्दों में चमत्कार पैदा करने में निष्णात है। ‘नील परी’ में प्रयुक्त शब्दों में नैन-बैन, बाँह-चाह, रात-बात आदि का बहुवर्ती प्रयोग बहु अर्थीय प्रयोग चमत्कारी और मनोहारी है। कवि ”जब से / तू सपनों में आई / बनकर नील परी / तब से सपने / रहे न अपने / कैसी विपत परी” कहकर भाव प्रकट करता है परंतु वास्तव में नील परी का सपने में जाकर आना तो उसके लिए सुखद घड़ी है या होना चाहिए। इन गीतों-नवगीतों में प्रयुक्त किए गए प्रतीक उपमान और बिंब परंपरागत न होकर यथार्थ जगत से लिए गए हैं। इनमें पारिवारिक रिश्तों से लेकर रसोई की सामग्रियों, तीज-त्योहार, प्रकृति और राजनीतिक शब्दावली जैसे सांसद, जुमला, आदि का सटीक-सारगर्भित प्रयोग कथ्य के अनुरूप भाव संप्रेषित करता है।
कवि सौंदर्य के प्रतीकों, उपमानों तथा बिंबों को प्रेयसी और प्रकृति के अन्योन्याश्रित स्वरूप में रचता है, कहीं प्रकृति उपमा बन जाती है तो कहीं उपमान। यही हाल नायिका का भी है। प्रकृति कवि के मन में रची-बसी है। इन गीतों में में ‘ऊषा’ विभिन्न कुसूमों, वल्लरियों, फलों, पक्षियों, वृक्षों आदि के नामों का प्रचुर प्रयोग किया गया है। कवि को ‘हरसिंगार’, मोगरा, महुआ तथा ‘टेसू’ के फूल तथा गौरैया पक्षी विशेष प्रिय हैं। जिनका सटीक-सार्थक प्रयोग कवि ने इन गीतों में प्रचुरता से किया है। प्राकृतिक सौंदर्य और नायिका के रूप को विभिन्न स्तरों पर अलंकृत करती यह रचनाएँ पाठकों को सुखद अनुभूति देने में सफल हैं। वर्तमान समय में समाज के हर क्षेत्र में बिना गहन अध्ययन-चिंतन एवं मनन-मंथन के विचारों और भावों को अनर्गल रूप में बोलने कहने या लिखने का चलन बढ़ रहा है। साहित्य का क्षेत्र भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। आज चारों ओर साहित्यकारों-कवियों के समूह गिरोह बन गए हैं जो आपस में ही एक दूसरे को श्रेष्ठ घोषित कर प्रतिष्ठित हो रहे हैं, साथ ही नए के नाम पर असंगत, असंबद्ध, प्रतीकों एवं उपमानों के मनमाने प्रयोग कर, स्वयं के कार्यों को आरोपित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है जो चिंतनीय हैं क्योंकि लिखे हुए शब्दों का असर दूरगामी होता है। सलिल जी इस कुप्रवृत्ति से बचे हुए हैं।
इस संग्रह की अधिकांश रचनाएँ दैनिक-सांसारिक अनुभूति के आस-पास केंद्रित हैं परंतु कहीं-कहीं इनमें द्वैत से अद्वैत की यात्रा का आध्यात्मिक फुट भी सांकेतिक रूप में विद्यमान है। इनमें मिलन की सुखद झलकियां हैं तो विरह की तीस भी ध्वनित हुई है। स्नेह-सिधयोन से आप्लावित कवि-मन नायिका के प्रति अपने प्रेम को निरंतर प्रकट करता, सौंदर्य के मादक समुद्र में गोते लगाता दिखता है। प्रस्तुत संग्रह के गीत-नवगीत दोहा, सोरठा आदि छंदों में लिखी गई हैं। कवि इन सभी विधाओं में निष्णात है। कवि का भाषा की शुद्धता के प्रति कोई आग्रह नहीं है। गीतों में रचनाओं में तुक, मात्रा-भार, गति-यति, लय, खनक और चमत्कार के प्रयोजन को साकार करने के लिए अन्य भाषाओं अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी तथा क्षेत्रीय आंचलिक बोलियों बुंदेलखंडी, भोजपुरी आदि का प्रयोग कवि बेहिचक करता है। इसे हिंदी का समावेशी उदारवादी स्वरूप माना जाए या भाषाई अपमिश्रण? इसका निश्चय तो विद्वत साहित्यकार ही कर सकते हैं।
संग्रह की कुछ रचनाएँ अधि प्रभावश्यकी है जबकि कुछ अन्य कम सशक्त एवं प्रभावशाली प्रतीत हों, यह स्वाभाविक भी है और पाठक की अपनी पसंद पर भी निर्भर है। ऐहिकजीवन की अनुभूतियों से उपजी के रचनाएँ सुधियों में गुदगुदाती, यादों में गुनगुनाती, प्रेम के द्वार की कुंडी खटकाती, चाँदनी में नहलाती, मन्मथ के मादक स्पर्श से सहलाती, कंगन खनखनाती, नूपुर छमछमाती, गौरैया सी चहचहाती, महुआ सी मदमाती, सपनों में थपथपाती, हरसिंगार सी मुस्काती प्रेयसी को शब्दों के भुज-हार पहनाती, कोमल भाव जगाती, तोता-मैना का किस्सा सुनाती, शब्दों और भावों में भटकती उलझाती-सुलझाती यह रचनाएँ अपनी नई अभिव्यक्ति शैली तथा चमत्कारिक कौंध के कारण पाठकों को सहज ही आकर्षित करती, पठनीय-स्मरणीय बनाती हैं। ‘बाँह में है और कोई, चाह में है और कोई’ तथा ‘लिव-इन’ के वर्तमान दौर में जीवन संगिनी की मधुर सुधियों में वर्षों बाद विचरते, बौद्धिक भूमि पर अवस्थित संवेदनाओं से ओत-प्रोत, संपृक्त शब्दों का स्वरूप लेती, अनायास और सायास रूप से नि:सृत-सृजित ये गीत-नवगीत पाठकों को उनकी अपने प्रेमानुभूतियों को पुनरजागृत कर, रास रचाते रहने को प्रेरित करते हैं। निश्चय ही यह प्रेमपरक रचनाएँ पाठकों को सहज स्वीकार्य होंगी।
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समीक्षा – आचार्य प्रताप
संपर्क- आर १९ शिवनगर, दमोह नाका, संकारधानी गैस अजेंसी के सामने, जबलपुर, चलभाष: ७३८९०८८५५५, ९४२५३८४३८४
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ लघुकथा ☆ ~ निक्षय मित्र एवं क्षय मुक्त ग्राम पंचायत (क्षय मुक्त भारत की संकल्पना) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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आज सुबह-सुबह सेतु पटमंगरा के ग्राम प्रधान श्री दिनेश लाल के घर पहुंच गया था।
कहो सेतु कैसे आना हुआ ?
अरे प्रधान जी.. आपसे एक बात करनी थी। … सेतु ने कहा।
क्या है, ? बताओ क्या कहना चाहते हैं ? प्रधान जी ने पूछा।
प्रधान जी… आप तो जानत हैं कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है। इससे मुक्ति का बड़ा अभियान चला है।
अरे सेतु..हमने तो सुना है कि यह दवाई से बिल्कुल ठीक हो जाती है… इसके अलावा भी कोई दुसरा उपाय है क्या, ? दिनेश लाल प्रधान ने पूछा।
प्रधान जी… यह बीमारी ठीक तो होगी इलाज से ही लेकिन एक बात आप पहले बताइये कि ये बीमारी किसको पहले होती है? सेतु ने पूछा।
प्रधान जी ने अपना दिमाग दिमाग दूर तक दौडाया। उन्हें अपने गांव के टीबी रोगी मंगरु, बसंती, ननकू की याद आई।
सेतु अभी भी प्रधान जी के घर पर ही बैठा था।
किस सोच में डूब गये प्रधान जी ?
सेतु..बाबू तू ऐसा सवाल हमारे सामने रख दिए हो कि हमारे दिमाग़ में बहुत बड़ा टेंशन पैदा हो गया है।
हम सोचत है किये टीबी की बीमारी, कुलेश्वर भैया, रघुनंदन काका, और दूधनाथ मास्टर के घर के लोगो को क्यों नहीं होता है। आखिर ये बीमारी मंगरु, बसंती, ननकू जैसे लोगो के घर में क्यों आता है?
सेतु ने प्रधान जी के मन की बात समझ ली थी। अब सही वक्त आ गया था जब सेतु को हथौड़े की चोट गरम लोहे पर करना था।
क्षय मुक्त भारत अभियान से भी वह जुड़ चुका था। टीबी के विषय में एक-एक जानकारी उसके दिमाग में रटी पड़ी थी।
क्षय उन्मूलक अभियान के हर -एक हिस्से का वह साथी बन चुका था।
अब सेतु ने जो बात दिनेश लाल प्रधान से कहीं वह बात प्रधान के दिमाग में जम गई।
प्रधान जी.. पहली बात की है बीमारी किसी को भी हो सकती है। चाहे वह किसी भी तरह का व्यक्ति हो अमीर हो या गरीब हो। बीमारी ऐसी है कि जहां भी खान-पान में कमी होती है, जहां पौष्टिक आहार नहीं मिलता है, ऐसे लोगों में रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और उसे टीबी की बीमारी पकड़ने का भय पहले होता है।
अरे सेतु.. सही बताएं हो, यही कारण है कि पश्चिम टोला के मंगरु बसंती ननकू को टीबी की बीमारी पकड़ी है।
इन तीनों जने की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक नही है।
काम धाम की कमी, ऊपर से बीमारी। और बीमारी में कोई काम धाम कैसे कर सकता है। इन सारी समस्यायों के जड़ में खान पान की कमी भी एक है। ऐसे बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनको कई अन्य जटिल बीमारियां है, जैसे शुगर, बीपी, कैंसर, एच आई वी आदि उनके भीतर भी रोग लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। उनके भी भीतर भी रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है, और टीबी की बीमारी हो जाती है।
सेतु यह बताते बताते रुक गया। और दुबारा कुछ बात ऐसा बोला कि वहां बैठे कई लोग उसे घूर के देखने लगे।
सेतु ने कहा प्रधान जी, जो लोग नसे का सेवन करते है, बीड़ी, गांजा, शराब आदि नसे की चीज खाते पीते हैं ऐसे लोगों में भी टीबी की बीमारी होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
अरे प्रधान जी… आप गांव के मुखिया हौ। आपका एक नई बात बताना चाहता हूँ.. सुनिए .सेतु ने कहा।
अब सेतु ने दिनेश लाल प्रधान से विस्तार में बताना शुरू किया।
सरकार ने एक अभियान छेड़ रखा है। जिसको क्षय मुक्त भारत अभियान कहते हैं। इसमें जांच इलाज के अलावा हर एक क्षय रोगी को इलाज के दौरान ₹1000 की सहायता राशि मिलती है।
अरे सेतु यह तो ₹500 मिलता था कब से यह ₹1000 हो गया। … दिनेश लाल प्रधान ने पूछा।
आप का जान पाएंगे …प्रधान जी ! नन्हकऊ से पूछिएगा न। सेतु ने बड़े ही दम के साथ कहा।
अच्छा तो सरकार ने 500 से ₹1000 कर दिया। बहुत बड़ी बात है भाई..यह तो बहुत बड़ी बात है। दिनेश लाल प्रधान के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि और सरकार के प्रति कृतज्ञता का भाव झलक रहा था।
सेतु अपनी बात को यहीं समाप्त करने वाला नहीं था। उसे तो अभी बहुत कुछ और बताना था।
प्रधान जी.. इतनी ही बात नहीं है। जिसके घर में टीबी के मरीज है उनके संपर्क में रहने वालों को एक्स रे जांच के बाद टीपीटी भी दवाई दी जा रही है, ताकि टीबी की बीमारी उनके घर वालों में न जाए।
अब आपको, आपके काम की बात बताना चाहता हूँ..प्रधान जी ! सेतु ने कहा। ।
जो लोग टीबी के रोगियों को गोद लेंगे और उनको इलाज तक खाने के लिए पौष्टिक आहार की टोकरी देंगे। उनको सरकार सम्मानित करेंगी।
प्रधान भैया !! जिसके पास पैसा रूपया है। धन दौलत भरा पड़ा है। साथ ही साथ गरीब मजबूर लोगों को कुछ करने की इच्छा रखते है। ऐसे लोगों को आगे बढ़कर हमारे गरीब टीबी रोगियों को गोद लेना चाहिए
गोद लेने का का मतलब हुआ.. सेतु?… प्रधान जी ने पूछा
अरे प्रधान जी ! दुनिया भर को आप बताते हैं और आप ये बात पूछ रहे हैं?
गोद लेने का मतलब हुआ कि उस मरीज को प्रति माह पौष्टिक आहार की किट ( टोकरी ) देना और तब तक देना जब तक की उसका इलाज पूरा न हो जाए।
जानते हैं प्रधान जी जब टीबी रोगी को पौष्टिक आहर की किट मिलेगी तो, रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ जायेगी और उसका रोग जल्दी से भागेगा।
सेतु ने एक नई बात बात प्रधान जी को बता दी।
अरे सेतु..तो हमारे गांव के जो तीन रोगी मगरु, नन्हकउ और बसंती रहे, उनको भी किसी ने पौष्टिक किट दिया था क्या, ?
सेतु जोर से हंस पड़ा…
अरे प्रधान जी.. आप को पता नहीं है क्या . इन लोगों को भी किट दिया गया है।
देवनाथ सिंह मास्टर साहब, .. जो मिडिल स्कूल के हेडमास्टर जी है, उन्होंने इन तीनों को गोद लिया था। पूरे इलाज तक वे बसंती और मंगरु को पौष्टिक पोषण किट देते रहे हैं अब तक भी ननकू को देरहे थे।
दिनेश लाल प्रधान, कुछ देर के लिए मन ही मन सोचते रहे …
भाई.. ई सेतु भी गजब का इंसान है ..
खुद का खुद टीबी से बीमार रहा। इसकी बहुरिया सुघरी टीबी के मरीज थी, फिर भी उससे शादी किया।
ठीक होने के बाद लगा पड़ा है, टीबी रोगी की सेवा में। यह हमरे गांव के मणि है। किसी देवदूत से कम नही है। जो काम हम लोगो को करना चाहिए, यह वह सब कर रहा है।
हम इसके लिए जरूर कुछ ना कुछ जरूर करेंगे … दिनेश लाल प्रधान ने मन ही मन ठान लिया।
उन्होंने अपने गांव के ही नहीं, बल्कि अपने आस पास के गांव के भी गरीब मरीज को गोद लेने का मन बना लिया। सेतु के कहने पर उन्होंने दूसरे गांव के करीब 35 क्षय रोगियों को गोद ले लिया था।
समय बीतते देर नहीं लगी। गांव के तीनों रोगी ठीक हो चुके थे। मंगरु और बसंती तो पहले ही ठीक हो गए।
नन्हकू की रिपोर्ट लेकर आज सेतु आया था। रिपोर्ट के साथ ही प्रधान जी के घर पहुंचा था। प्रधान जी के दरवाजे पहुंचते ही बोला… प्रधान जी ! आज आपको मिठाई खिलाना पड़ेगा।
किस बात की मिठाई.. सेतु ? प्रधान जी ने पूछा।
अरेे आपका नन्हकू की भी रिपोर्ट आ गई है। वह भी ठीक हो गया है।
अब क्या..एक जश्न जैसा माहौल प्रधान जी के दरवाजे पर बन गया।
प्रधान जी के दरवाजे पर बैठे लोगों के बीच खुशी की लहर दौड़ गयी।
घर के आगे दुवारे तीन चार खटिया, दो लकड़ी का बेंच, दो चौकी – तखत पड़ी थी
प्रधान जी कोई अलग नही बैठे थे। वे भी एक चारपाई के गोड़ तारी की ओर बैठे थे।
कवलेसर ने कहा .. अरे प्रधान जी, गांव के मुखिया है, सिरहाने बैठिये, ..सिरहाने।
दिनेश बोले.. अरे कौलेसर भईया, .. प्रधान होने से क्या हुआ। हम अपनी मर्यादा भूल के बड़कउ के सिरहाने बैठेंगे क्या। हमारा यह संस्कार नही है।
सामने चारपाई पर बैठे जितने भी लोग थे, वे सभी प्रधान जी की मानहि मन भूरी भूरी प्रशंसा कर रहे थे।
अचानक दूर से एक सरकारी गाडी आती हुई दिखाई दी
गाड़ी रुकी तो उसमें ड्राइवर के अलावा दो लोग उतरे।
अरे प्रधान जी… भावेश भैया आ गये.. सेतु ने कहा
देखो आज कौन नई खबर लेकर आए हैं? भावेश क्षय उन्मूलन कार्यकर्ता था। उससे दिनेश लाल प्रधान और सेतु दोनों परिचित थे। लेकिन दूसरे व्यक्ति को दिनेश लाल प्रधान नही पहचाते थे
सेतु ने उनका परिचय कराते हुए कहा ..
प्रधान जी ये श्री आनन्द कृष्ण जी है, स्टेट से हमारे जनपद में विजिट पर आये थे। ये आपके लिए कोई खास खबर लेकर आए हैं।
श्री आनन्द कृष्ण जी के बैठने के लिए प्रधान जी खुद कुर्सी लेकर आए।
आईये बैठिये..साहब। हमारा सौभाग्य है आप हमारे दरवाजे पर आए है।
प्रधान जी ने बबलू से चाय पानी बनाने के लिए बोला, तो बबलू चाय पानी लाने घर में चला गया।
और बताइए सर, क्या नई बात है… दिनेश लाल जी ने श्री आनन्द कृष्ण जी से पूछा
जी प्रधान जी….आपको भावेश ही पूरी बात बताएंगे।
अरे प्रधान जी आपको क्या बताना है आप तो इस इलाके के प्रतिष्ठित लोगों में है।
हमें आपको दो नई खबरें देनी है शायद आप इन दोनों खबरों के विषय में आप नहीं जान रहे होंगे।
दिनेश लाल प्रधान, हक्का-बक्का थे, आखिर कौन सी दो खास खबरें है जो उन्हें पता नहीं था।
लेकिन भावेश ने सिर्फ एक एक बात बतायी, वह यह कि जो हमारे जो तीन क्षय रोगी थे, वे अब सभी तीनों ठीक हो गये है। दो की तो रिपोर्ट पहले ही आ गई थी। आज सेतु नन्हकू की भी रिपोर्ट लेकर आए हैं। वह भी ठीक हो गए हैं।
अब अपने गांव में कोई भी टीबी का रोगी नहीं है
अब इस खुशी में आप सबका मुंह मीठा कराइये।
इसी बीच स्टेट से आए हुए श्री आनन्द कृष्ण जी बोल पड़े। इतने से काम नहीं चलेगा..प्रधान जी सब लोग आपसे बड़ी पार्टी लेंगे। अब आप दूसरी खुशी की बात तो सुनिए।
सब लोग श्री आनन्द कृष्ण जी की बात को ध्यान से सुन रहे थे
प्रधान जी आपने दूसरे गांव के 35 मरीजों को गोद लिया है.. याद है ना.., इनमे से भी 10-12 मरीज ठीक हो गये हैं। आपने इतने सारे मरीजों को गोद लिया है, इस संदर्भ में आपको इसी महीने 24 मार्च को लखनऊ आना है। विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री जी आप सहित कुल पच्चास निक्षय मित्रों को सम्मान्नित करेंगे।
इस खबर को सुनकर प्रधान जी की आंखें भर आयीं। आठ बरस के अपने प्रधानी के कार्यकाल में प्रधान जी को ऐसी खुशखबरी इसके पहले सुनने को नही मिलीं थी। दिनेश लाल प्रधान स्वयं को भाग्यशाली महसूस कर रहे थे कि उन्हें माननीय मुख्यमंत्री जी के हाथो से सम्मान मिलना है।
खुशी से उनकी आंखें गीली हुई तो सेतु ने गमछे से उनकी आँखे पोछ दी। दिनेश लाल… स्वयं को आदर्श गांव पटमंगरा के प्रधान के रूप में गौरवान्वित पा रहे थे।
झउआ भर तुरई की सब्जी, और नारी के भाजी लेकर नन्हकू घर सुबह-सुबह प्रधान जी के घर पहुंचे थे। जबसे उन्होंने अपनी रिपोर्ट निगेटिव आने की खबर सुनी तो उनका मन खुशी से भर गया। ये खबर उनको सेतु से मिली थी। उनको उनकी मेंहरिया ने कहा था कि इस खुशी के मौक़े पर प्रधान जी के घर कुछ साग भाजी पहुंचा आओ।
ननकू भी प्रधान जी के दरवाजे पर मौजूद थे सभी लोग नन्हकू की तरफ ध्यान से देखने लगे।
नन्हकू ने कहा कि भावेस भईया, टीबी अस्पताल वाले डॉक्टर साहब और अपने प्रधान जी इन तीनों का एहसान हम नहीं चुकता सकते। इस खुशी में हम प्रधान जी के लिए थोड़ी बहुत साग भाजी लाए हैं।
इस अद्भुत उपहार को परिभाषित करने के लिए अब कोई शब्द नहीं बचा था।
इधर कई महीनों से स्वास्थ्य विभाग की टीम पटमंगरा गाँव में लगातार आ रही थी। संभावित लक्षण वाले लोगों के सैंपल लिए जा रहे थे। लेकिन आगे क्या होने वाला है यह कोई नहीं जान नही पा रहा था।
भावेश, सेतु और श्री आनन्द कृष्ण जी सभी लोग दरवाजे पर पड़ी बेंत से बुनी लकड़ी की कुर्सियों पर बैठे हुए थे।
श्री आनन्द कृष्ण जी ने जब एक और बात की घोषणा की कि –
भाई लोग एक खुशखबरी और सुनिए –
माननीय प्रधानमंत्री जी ने भारत को क्षय मुक्त करने का संकल्प लिया है।
भीड़ में ही बैठे एक नौजवान ने बीच में टोकते हुए कहा कि –
हमें पता है, जब हमारे गांव क्षय मुक्त होंगे तो जिले क्षय मुक्त होंगे और जब जिले क्षय मुक्त होंगे तो प्रदेश क्षय मुक्त होगा और प्रदेश क्षय मुक्त होगा तो हमारा देश क्षय मुक्त हो जाएगा।
अपने गाँव के नौजवानो के भीतर का यह ज्ञान प्रधान जी सहित पूरी भीड़ को उत्साहित कर रहा था।
आखिरकार श्री आनन्द कृष्ण जी ने दूसरे राज को भी खोलते हुए कहा –
भाई लोग..आप लोगों को जानकर ख़ुशी होंगी कि आप का गांव पटमंगरा क्षय मुक्त गांव घोषित हो चुका है।
प्रधान जी के द्वार पर बैठे लोंगो में खुशी की लहर दौड़ गई सब ने तालियां बजायीं।
सबकी बधाई ग्राम पंचायत पटमंगरा के प्रधान श्री दिनेश लाल जी के लिए थी।
आगे श्री आनन्द कृष्ण जी जी ने बताया कि अगले 2 अक्टूबर को आपके गांव के प्रधान जी को माननीय जिलाधिकारी महोदय के हाथों गांधी जी की कास्य प्रतिमा देखकर सम्मानित किया जाएगा तालिया के गड़गड़ाहट से पूरा माहौल दुबारा खुशियों से भर उठा।
पटमंगरा क्षय मुक्त गांव घोषित हो चुका था। प्रधान जी अपने स्थान पर खड़े हुए। घर के भीतर से उन्होंने एक उनी शॉल मंगवायी। सब मिलकर सेतु का सम्मान कर रहे थे। सेतु को प्रधान जी ने जब गले लगाया तो इस दृश्य को देखकर सुघरी की आंखें खुली की खुली रह गयी। जिस सेतु को वह भला बुरा कह रही थी, आज उसे अपने सेतु पर गर्व हो रहा था।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “नवजात…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # १२
लघुकथा – नवजात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
कन्या नवजात को कूड़े के ढेर पर या सड़क किनारे की झाड़ियों में फेक देने या छोड़ देने की बढ़ती घटना से द्रवित हो, एक अनाथालय-प्रबंधन ने एक नव प्रयोग कियाl
अनाथ आश्रम के मुख्य द्वार पर एक झूला बाँध दिया गया, वहाँ एक सूचना लगा दी गई कि, “यदि किसी ने बच्चा त्यागने का अमानवीय निर्णय लिया ले ही लिया है, तो उस त्याज्य नवजात को इस झूले पर डाल जाए l”
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एक अत्यंत ग़रीब व्यक्ति, जिसकी पहले से ही दो बेटियाँ थीं, अब उसके घर तीसरी बच्ची ने जन्म लियाl इस तृतीय बच्ची के जन्मते ही घर में मातम-सा छा गयाl सास-श्वसुर के तानों और कड़वी बोली से बहू तंग आ चुकी थी —
“कलमुँही! वंश डुबाने आई यहाँ! जब से तुझे ब्याहकर लाये हैं, तब से किस्मत में अपशगुन ही देखना-सुनना बदा है! “
अब तो मानो कोई आसमानी आफ़त टूट पड़ी..l इस कोहराम ने तमिया को अंदर से झिझोड़ कर रख दियाl
वह अपने पति फग्गू से बोली –“ज़िंदगी की मार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा…! भगवान हमें दौड़ा-दौड़ाकर मार रहा! “
फग्गू फूट पड़ा –“अब तीन-तीन बच्ची को पालना मेरे वश में नहीं, तम्मी! “
बहुत सोच-विचार के बाद दम्पति ने नवजात को तज देने का कठोर निर्णय लियाl पत्नी की सहमति से फग्गू ने नवजात को गोद में लिया और बड़ी तथा मँझली बेटी को बे-मन से साथ ले, आँसू बहाता हुआ अनाथालय की ओर चल पड़ा।
साथ चलती बड़ी बेटी, रास्ते में बार-बार पूछ रही थी — “बाबजी, हम कहाँ जा रहे हैं?”
पिता का हाथ थामे साथ-साथ चल रही मँझली बिटिया की बाल जिज्ञासा चिहुँक उठी — ” बाबजी! अपन नई गुड़िया के लिये खिलौने लेने जा रहे हैं?”
पिता ने नज़रें चुरा लीं। जवाब देना मुश्किल था।
अनाथालय के फाटक तक पहुँचकर उसने धीरे से नवजात बच्ची को गोद से उतारकर वहाँ के झूले में डालना चाहाl इस हेतु उसने अपनी मँझली बेटी का हाथ छोड़ दियाl
मँझली बेटी सहमकर बोली —
“बाबजी! … मैंने ऐसा क्या किया, जो मेरा हाथ छोड़ दिया?”
उस प्रश्न ने उसके भीतर की दीवारें तोड़ दीं।
उसे लगा, जैसे वह आवाज़ मँझली बेटी की नहीं, अपितु उस नवजात के होंठों से निकली हो —
“बाबजी! मैंने ऐसा क्या किया…?” ….. उसका अन्तः करण दहल गयाl मानो पलभर को समय ठहर गया। उसकी आँखें डबडबा आईं, हाथ काँपने लगे।
उसने बच्ची को फिर से गोद में उठाया, दोनों बेटियों को बाँहों में समेटा रूँधे गले से कहा, “चलो-चलोl घर चलो मम्मी के पासl ”
मन-ही-मन वह फ़िर बुदबुदाया —“बेटा-बेटी में फर्क करने वाला मैं होता कौन हूँ?…मेरा घर तो इनसे ही घर है।”
वह वापस लौट पड़ा।
अनाथालय के फाटक के बाहर ज़िंदगी पहली बार उसके साथ चल रही थी, तीन छोटी हथेलियों का हाथ थामे हुए…. l
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१४ ☆ श्री सुरेश पटवा
गुरुद्वारा पत्थर साहिब
श्री गुरु नानक देव जी भूटान, नेपाल, तिब्बत से होते हुए लद्दाख पहुंचे थे। लेह में लोगों से मिलते हुए वह कश्मीर के मट्टन पहुँचे थे। लेह और मट्टन में स्थित गुरुद्वारे श्री गुरु नानक देव जी की याद दिलाते हैं। अगर हम बात लेह की करें तो वहां पत्थर साहिब गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा लेह से पहले 25 किमी दूर श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है। श्री गुरु नानक देव जी 1517 ई में सुमेर पर्वत पर अपना उपदेश देने के बाद लेह पहुंचे थे। गुरुद्वारे का इतिहास काफी अहम है किंवदंती है कि गुरु जी ने एक राक्षस को सही रास्ते पर लाकर लोगों के दिल से उसका भय दूर किया था। वहां एक पहाड़ पर रहने वाला एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। लोगों ने अपने दुख को गुरु जी के सामने बयां किया। गुरु नानक देव जी ने नदी किनारे अपना आसन लगा लिया।
एक दिन की बात है कि जब श्री गुरु नानक देव जी प्रभु की भक्ति में लीन थे, तब राक्षस ने गुरु जी को मारने के लिए पहाड़ से बड़ा पत्थर फेंका। गुरु जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम जैसा मुलायम हो गया। इससे गुरु जी के शरीर का पिछला हिस्सा मोम बने पत्थर में धंस गया। गुरुद्वारे में पत्थर में धंसा श्री गुरु नानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरु जी को ज़िंदा देखर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर मोम बने पत्थर में धंस गया। तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई है। राक्षस गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर देखा जा सकता है। गुरु जी ने राक्षस को उपदेश दिया कि बुरे काम मत करो, लोगों को तंग न करो, मानव के कल्याण के लिए काम करो। इस समय गुरुद्वारा पत्थर साहिब की संभाल का जिम्मा भारतीय सेना के पास है।
हमने वाहन से उतर कर देखा तो गुरुद्वारा के सामने से एक रास्ता बग़ल में गया था। लोग वहाँ गरम चाय का सेवन कर रहे थे। वहाँ पर एक नल में बर्फ़ का पानी ठंडा पानी आ रहा था। उसके पीछे देखा तो पाया कि एक बड़ा लम्बा पतला पाइप नल से जुड़ा था और वह पतला पाइप मोटे पाइप से जुड़ा था। जिनमे से होकर बर्फ़ का पानी पिघल कर नल तक आ रहा था। शुद्ध कंचन पानी देख मुँह हाथ धोए और ठंडा पानी पीकर दिन भर से थकी देह से थकान और गर्मी को राहत देकर चाय सेवन के स्थान पर पहुँच चाय ग्रहण करने लगे। तेज हवा चल रही थी। चाय अधिक गरम होने से फूँक-फूँक कर सिप कर रहे थे। तभी हमारे पीछे किसी सज्जन ने चाय ठंडी करने के लिए चाय को दो गिलासों में ऊपर से एक दूसरे में उँडेल कर ठंडी करने की कोशिश की तो हवा के तेज झौंके से हमारी बायीं बाँह कंधे से लेकर कोहनी तक गरम चाय से तरबतर हो गई। हमने मुड़कर उन सज्जन को देखा तो वे मुँह फेरकर दूसरी तरफ़ देखने लगे। अब उनसे क्या बोलते, जिन्हें अपनी गलती का अहसास ही नहीं था। हमने अपनी चाय मेज़ पर रख कर नल से पानी ले बाँह से कंधे तक को धो लिया। ताकि दाग पक्के न हो जायें। ज़रूरी नहीं है कि आपको खुद की ग़लतियों से दाग लगें। कभी-कभी दूसरों की ग़लतियों से भी दाग लग सकते हैं। उन परिस्थितियों में किसी से उलझने की बजाय दाग साफ़ कर लेना ठीक रहता है अन्यथा कपड़ों पर लगे दाग मन मस्तिष्क में पक्के होने की सम्भावना रहती है।
मेगनेटिक हिल
लद्दाख क्षेत्र के लेह के नज़दीक एक ऐसी पहाड़ी है जिसे मैग्नेटिक हिल के नाम से जाना जाता है। सामान्यतौर पर पहाड़ी के ढलान पर वाहन को गियर में डाल और हैंडब्रेक लगा खड़ा किया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो वाहन नीचे की ओर लुढ़ककर खाई में गिर सकता है लेकिन इस मैग्नेटिक हिल पर वाहन को न्यूट्रल करने खड़ा कर दिया जाए तब भी वाहन ढलान की तरफ़ नहीं जाता। ऊपर की तरफ़ जाने लगता है। यह श्रीनगर-लद्दाख रोड पर लेह से 26.5 किमी पश्चिम में है। आश्चर्य तो तब होता है जबकि वाहन एंजिन बंद होने पर नीचे की ओर नहीं जाकर खुद ब खुद उपर की ओर जाने लगता है। यही तो इस पहाड़ी का चमत्कार है कि वाहन लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। दूसरा चमत्कार यह कि न सिर्फ गाड़ियां बल्कि आसमान से उड़ने वाले जहाज भी इस पहाड़ी के गुरुत्वाकर्षण से बच नहीं सकते। कोई इसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं तो कुछ इसे सिर्फ एक भ्रम मानते हैं लेकिन अब तक इस पहाड़ी का रहस्य सुलझाया नहीं जा सका है।
वैज्ञानिक कहते हैं…मैग्नेट हिल या निमू-लेह मैग्नेट हिल भारत के लद्दाख में लेह के पास स्थित एक गुरुत्वाकर्षण पहाड़ी है। आसपास की भौगोलिक विशेषताओं के कारण, इसमें एक ऑप्टिकल भ्रम है जहां वाहन गुरुत्वाकर्षण की अवहेलना में ऊपर की ओर लुढ़कते हुए प्रतीत होते हैं, जबकि वे वास्तव में पृथ्वी के ढलान पर लुढ़क रहे होते हैं।
विमान चालकों के अनुसार गुरुद्वारा पत्थर साहिब के निकट स्थित इस हिल में गजब की चुंबकीय ताकत है। यही नहीं इसका मैग्नेटिक फील्ड भी काफी बड़े क्षेत्र तक प्रभावित करता है। यदि इस हिल की चुंबकीय ताकत का परीक्षण करना हो तो किसी वाहन के इंजन को बंद करके वहां खड़ा कर दें, वह बंद वाहन धीरे-धीरे पहाड़ी की चोटी की ओर स्वत: ही खिसकना शुरू कर देता है। इस मैग्नेटिक हिल से होकर विमान उड़ा चुके कई पायलटों का दावा है कि इस हिल के ऊपर से विमान के गुजरते वक्त उसमें हल्के झटके महसूस किए जा सकते हैं, इसीलिए जानकार पायलट इस क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही विमान की गति बढ़ा लेते हैं ताकि विमान को हिल के चुंबकीय प्रभाव से बचाया जा सके।
जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ थोड़ा ऊपर पहाड़ी पर जाने के लिए मोटरबाईक किराए पर मिल रही थीं। जहाँ पहुँच कर पर्यटक मैग्नेटिक हिल का करिश्मा देख रहे थे। मुख्य सड़क पर हमने अपना वहाँ खड़ा करके देखा तो कोई वैसा चमत्कार नहीं हुआ जिसका दावा किया जाता है। हमारे पास इतना समय भी नहीं था कि एक हज़ार रुपए देकर चमत्कारी भ्रम का सत्यापन करने मोटरबाईक से ऊपर जाया जाये। पर्यटन उद्योग के नुमाइंदे कुछ पर्यटक पोईंट भ्रम फैलाकर बनाए रखते हैं। हम मैग्नेटिक हिल को दूर से सलाम करके आगे बढ़ गये।
स्पितुक गोंपा
स्पितुक मठ, जिसे स्पितुक गोम्पा या पेथुप गोम्पा भी कहा जाता है, स्पितुक, लेह से 8 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक बौद्ध मठ है। इसकी स्थापना 11 वीं शताब्दी में मरियम में आने पर लामा चांगचब ओड के बड़े भाई ओड-डी ने की थी। जब लोत्सेवा रिनचेन ज़ंगपो (अनुवादक) उस स्थान पर आए तो उन्होंने कहा कि एक अनुकरणीय धार्मिक समुदाय वहां विकसित होगा, इसलिए मठ को स्पितुक (अनुकरणीय) कहा जाता था। धर्म राज ग्रगस्पा बम-आइड के समय मठ को लामा लवांग लोदोस द्वारा बहाल किया गया था और टोंसखापा का स्टेनलेस ऑर्डर पेश किया गया था और यह आज तक बरकरार है। रेड हैट संस्था के रूप में स्थापित, मठ को 15 वीं शताब्दी में पीली टोपी संप्रदाय द्वारा ले लिया गया था। वह एक छोटा मठ था। वहाँ थोड़ी देर रुककर अगले पड़ाव की तरफ़ चल दिये।
हाल ओफ़ फ़ेम
कारगिल युद्ध में भारतीय सूरमाओं की गाथा बताने वाला हाल आफ फेम पर्यटकों का सिर गर्व से ऊंचा करने में सक्षम है। टूरिस्ट सर्किट पर महत्वपूर्ण पड़ाव यह हॉल आफ फेम देशभक्ति को प्रदर्शित करता है। भारतीय सैनिकों की बहादुरी और उनकी साहसिक उपलब्धियों का बखान करता है। जैसे ही आप विजय गैलरी से गुजरेंगे तो वहां आपको कारगिल युद्ध में इस्तेमाल किए गए हथियार दिख जाएंगे। सियाचिन ग्लेशियर और अन्य स्थानों पर पहने जाने वाली युद्ध की ड्रेस देखते हैं तो आप उन मुश्किलों का अन्दाज़ लगा सकते हैं, जिनसे हमारे सैनिकों को गुजरना पड़ता है। सैनिकों द्वारा उनके परिवारों को लिखे गए पत्र इस क्षेत्र में लड़े गए युद्धों के दौरान ली गई तस्वीरें और कारगिल युद्ध पर 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री कुछ ऐसे आकर्षण हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर खींच ही लेते हैं। इस भवन की दूसरी मंजिल पर भारतीय सेना द्वारा जप्त पाकिस्तानी बंदूकों और अन्य युद्धक शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। हॉल को भारतीय सेना द्वारा उन सैनिकों के सम्मान में बनाया गया था जो इस क्षेत्र में लड़े गए विभिन्न युद्धों के दौरान शहीद हुए थे।
शांति स्तूप
शांति स्तूप लद्दाख के लेह जिले के चांसपा क्षेत्र में एक पहाड़ी की चोटी पर सफेद गुंबद वाला एक बौद्ध स्तूप (चोर्टेन) है। इसे 1991 में जापानी बौद्ध भिक्षु , ग्योमोयो नाकामुरा और पीस पैगोडा मिशन द्वारा बनाया गया था। स्तूप न केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण बल्कि अपने अवस्थिति के कारण भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है जो आसपास के समूचे क्षेत्र का मनोरम दृश्य नज़रों की परिधि में समेटे है। शांति स्तूप से लेह शहर दिखाई देता है, दालान में खड़े होने पर नज़दीक में चांगस्पा गांव, दूर क्षितिज पर नामग्याल त्सेमो पैलेस और आसपास के पहाड़ों के मनोरम दृश्य प्रदान करता है। शांति स्तूप से सूर्योदय और सूर्यास्त को सबसे आकर्षक तरीक़े से देखा जा सकता है। स्तूप रात में रोशनी से जगमगाता है। जिसे लेह शहर से देखा जा सकता है और स्तूप से लेह शहर की रोशनी देखी जा सकती है।
शांति स्तूप का निर्माण अप्रैल 1983 में भिक्षु ग्योम्यो नाकामुरा और भारत सरकार के अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य, पूर्व राजनेता और भारत गणराज्य के पूर्व अंतरराष्ट्रीय राजनयिक लद्दाख के लामा कुशोक बकुला की देखरेख में हुआ था। यह परियोजना लद्दाखी बौद्धों और जापानी बौद्ध, जो भारत को बुद्ध का “पवित्र” जन्मस्थान मानते हैं, की मदद से पूरी की गई थी। भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री, इंदिरा गांधी ने 1984 में स्तूप के लिए एक सड़क के निर्माण को मंजूरी दी थी। राज्य सरकार ने शांति स्तूप के निर्माण के लिए कुछ वित्तीय सहायता भी प्रदान की। वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अगस्त 1991 में शांति स्तूप का उद्घाटन किया।
शांति स्तूप में वर्तमान दलाई लामा की तस्वीर है जिसके आधार पर बुद्ध के अवशेष बताए जाते हैं। स्तूप दो-स्तरीय संरचना के रूप में बनाया गया है। पहले स्तर में प्रत्येक तरफ हिरण के साथ धर्मचक्र है। एक स्वर्ण बुद्ध की छवि “धर्म के टर्निंग व्हील” (धर्मचक्र) को दर्शाते हुए एक मंच पर बैठी है। दूसरे स्तर में बुद्ध के “जन्म”, बुद्ध की मृत्यु (महाननिर्वाण) और बुद्ध को “शैतानों को हराने” को ध्यान में रखते हुए दर्शाया गया है।
शांति स्तूप का निर्माण विश्व शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने और बौद्ध धर्म के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया था। इसे जापान और लद्दाख के लोगों के बीच संबंधों का प्रतीक माना जाता है। अपने उद्घाटन के बाद से, शांति स्तूप एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण बन गया है। द हिंदू के अनुसार यह लेह के आसपास “सबसे प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षण” है। इसकी स्थापत्य शैली लद्दाखी शैली से अलग है।
खारदुंग ला की ओर
लद्दाख भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है, जो हरियाली विहीन ऊंचे पहाड़ों, झीलों, नदियों, ग्लेशियरों, बौद्ध मठों और धार्मिक स्थलों से परिपूर्ण है। अगर देखा जाए तो लद्दाख में ऐसी एक भी जगह नहीं है, जहां जाने के बाद आपको लगेगा कि मुझे यहां नहीं आना चाहिए था, क्योंकि लद्दाख में स्थित हर एक जगह का अपना अलग ही महत्त्व है, जो पहाड़ों के बीच अपने अलग-अलग रंग-रूप, प्राकृतिक सौन्दर्य और अपने आस-पास के सुन्दर नजारों से भरे पड़े हैं, जिसे देखने के बाद आपको ऐसा लगेगा कि आप एक अलग ही दुनिया में आ गए हैं। आप सिर्फ़ पहाड़ों पर हरियाली की तलाश करने की कोशिश न करें। लद्दाखी पहाड़ों की बारिश से दुश्मनी है। ला याने दर्रे और दाख शब्द दस का अपभ्रंश, याने दसों दर्रों की जगह लद्दाख़ हुआ।
03 जुलाई 2022 को खारदुंग ला (दर्रा) पार करके नुब्रा घाटी पहुँचना है। खारदुंग ला लेह से लगभग 40 किमी. की दूरी पर स्थित है, जिसे विश्व में सबसे ऊंची जगह से गाड़ियों के गुजरने वाली सड़क का दर्जा मिला है। खारदुंग ला की ऊंचाई 5,359 मीटर (17,582 फीट) है। लेह में गरम कपड़े और आक्सीजन सिलेंडर बेचने वाले दर्जनों स्टोर गलत तरीके से इसकी ऊंचाई 5,602 मीटर (18,379 फीट) के आसपास होने का दावा करते हैं। ताकि समुद्र सतह से अधिक ऊँचाई पर होने वाली सम्भावित दिक्कतों के मद्देनज़र पर्यटकों को सामान बेचा जा सके। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस रास्ते से युद्ध के सामानों को भी चीन तक पहुँचाया गया था। अभी भी इस सड़क पर भारतीय सेना के वाहनों को जाते हुए देखा जा सकता है। यहां पर जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट की जरूरत पड़ती है, जिसे आप लेह के डीसी ऑफिस या वहां किसी भी ट्रैवल एजेंट के मार्फ़त बनवा सकते हैं।
खारदुंग ला लद्दाख के सबसे ऊंचे स्थानों की सूची में शामिल होने की वजह से वहां ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम रहती है, जिसकी वजह से वहां जाने पर एल्टीट्यूड सिकनेस होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आप खारदुंग ला जा रहे हैं, तो एल्टीट्यूड सिकनेस से बचने के लिए मेडिसिन वगैरह अपने साथ लेकर जरूर जाएं, वरना चिड़चिड़े होकर आप एटीट्यूड सिकनेस का शिकार भी हो सकते हैं। एटीट्यूड सिकनेस से आप सिर्फ़ धैर्य पूर्वक निकल सकते हैं। लद्दाख़ के दर्रों की जानकारी इसे समझने में सहायक रहेगी।
पर्वतों के आर-पार विस्तृत सँकरे और प्राकृतिक मार्ग, जिससे होकर पर्वतों को पार किया जाता है, दर्रा कहलाते हैं| ‘ला’ शब्द तिब्बती भाषा में ‘दर्रे’ का अर्थ रखता है। परिवहन, व्यापार, युद्ध अभियानों और मानवीय आवागमन में इन दर्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिमालय पर काराकोरम दर्रा, रोहतांग दर्रा, खारदुंग दर्रा, बुर्जिला, जोजिला, पीर पंजाल दर्रा, बनिहाल दर्रा, नाथूला दर्रा प्रमुख दर्रे हैं।
रोहतांग दर्रा (Rohtang Pass) भारत के हिमाचल प्रदेश में कुल्लू घाटी और लाहौल और स्पीति घाटियों के बीच 3,980 मीटर (13,058 फुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह हिमालय की पीर पंजाल श्रेणी के पूर्वी भाग में मनाली से 51 किमी दूर है। यह पूरे वर्ष हिमग्रस्त रहता है। हिमाचल को लद्दाख़ से जोड़ने वाला मनाली लेह राजमार्ग इस दर्रे से गुज़रता है। अब वहाँ अटल सुरंग बन जाने से चार घंटो का सफ़र चौबीस मिनट में पूरा किया जा सकता है। एल्टीट्यूड सिकनेस से बच जाते हैं।
क़ाराक़ोरम दर्रा भारत और चीन द्वारा नियंत्रित शिंजियांग प्रदेश के बीच 4,693 मीटर (15,397 फ़ुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह लद्दाख़ के लेह शहर और तारिम द्रोणी के यारकन्द क्षेत्र के बीच प्राचीन व्यापारिक मार्ग का सबसे ऊँचा स्थान है।
ज़ोजिला या ज़ोजि दर्रा भारतीय लद्दाख क्षेत्र के कारगिल जिले में स्थित कश्मीर घाटी को पश्चिम में द्रास और सुरू घाटियों से जोड़ता है और इसके सुदूर पूर्व में सिंधु घाटी को जोड़ता है। ज़ोजिला दर्रा को अक्सर कश्मीर से लद्दाख के प्रवेश द्वार के रूप में नामित किया जाता है। यहाँ भी सुरंग बनने का काम जोरशोर से जारी है।
पीर पंजाल दर्रा भारत के जम्मू और कश्मीर की पीर पंजाल पर्वतमाला में 3,490 मी॰ (11,450 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह कश्मीर घाटी को जम्मू क्षेत्र के राजौरी ज़िले और पुंछ ज़िले से जोड़ता है। इस दर्रे से मुगल काल में बनाई गई सड़क गुज़रती है। कल्हण के अनुसार इसका प्राचीन नाम “पञ्चालधारा” है। “दर्रा” को संस्कृत में “धारा” कहते हैं। इस दर्रे से उत्तर में श्रीनगर और दक्षिण में जम्मू स्थित है।
बनिहाल दर्रा हिमालय का एक प्रमुख दर्रा हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-1 ए इस दर्रे से होकर निकलता है। यही दर्रा कश्मीर घाटी को जवाहर सुरंग के माध्यम से जम्मू से जोड़ता है।
नाथूला दर्रा सिक्किम राज्य को दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी से जोड़ता है। यह 14,200 फुट की ऊंचाई पर है। भारत और चीन के बीच 1962 युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। इसे 05 जुलाई 2006 को व्यापार के लिए खोल दिया गया है। बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत और चीन के होने वाले व्यापार का 80 प्रतिशत हिस्सा नाथू ला दर्रे के ज़रिए ही होता था। यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा का भी हिस्सा रहा है।
खारदुंग ला लेह के उत्तर में सिंधु नदी घाटी और श्योक नदी घाटी को जोड़ता है। उत्तर-पूर्व तरफ़ मुड़ जाओ तो यह नुब्रा घाटी का प्रवेश द्वार भी बनाता है, जिसके आगे सियाचिन ग्लेशियर है। दर्रे के ऊपर से 1976 में एक मोटर चलने योग्य सड़क सैनिक उपयोग हेतु बनाई गई थी, जो 1988 में सार्वजनिक मोटर वाहनों के लिए खोल दी गई। सीमा सड़क संगठन द्वारा रखरखाव वाला यह दर्रा भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उपयोग सियाचिन ग्लेशियर में आपूर्ति करने के लिए भी किया जाता है। यह सड़क दुनिया की सबसे ऊंची मोटर चलने योग्य सड़कों में से एक है।
1950 के दशक की शुरुआत में, विलियम ओ. डगलस ने वर्णन किया है कि “सिंधु पार करने के बाद पगडंडी का एक रास्ता नदी के किनारे दक्षिण-पर्व की ओर स्पितोक, खलत्से और खारगिल तक जाता है, दूसरा उत्तर की ओर लेह, खरडोंग दर्रा (… ), और सिंकियांग के एक प्राचीन व्यापारिक केंद्र “यारकंद” की तरफ़ जाता है। उन्होंने आगे कहा, “लेह एक ऐतिहासिक कारवां मार्ग पर है जो न केवल सिंकियांग में यारकंद की ओर जाता है बल्कि तिब्बत में ल्हासा तक जाता है। (…) ऊन, चांदी, चाय, कैंडी, खाल, मखमल, रेशम, सोना, कालीन, कस्तूरी, मूंगा, बोरेक्स, जेड कप, नमक उत्तर से नीचे लेह आता था। कपास के सामान, शॉल, ब्रोकेड, अफीम, नील, आलूबुखारा, जूते, मोती, अदरक, लौंग, काली मिर्च, शहद, तंबाकू, गन्ना, जौ चावल, गेहूं नीचे से ऊपर की तरफ़ रेशम मार्ग जाता था।” द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस मार्ग से चीन को युद्ध सामग्री पहुँचाने करने का प्रयास किया गया था।
हम अब लद्दाख़ में सबसे कठिन यात्रा की शुरुआत करने वाले हैं। दिमाग़ में कौतुहल मिश्रित भय है। थोड़ी असुरक्षा भी लग रही है। दो दिनों के लेह प्रवास में दर्रों पर साँस उखड़ने की कठिनाइयाँ सुनने-सुनाने को मिलती रही है। जो खारदुंग ला होकर आते हैं, वे बहादुरी के क़िस्से सुनाते हैं और जो जाने वाले हैं, वे सहमे-सहमे से सुनते रहते हैं।
खारदुंग ला ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्य एशिया के लेह से काशगर तक जाने वाले प्रमुख कारवां मार्ग पर स्थित है। इतिहास में इसे सालाना लगभग 10,000 घोड़ों और ऊंटों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। बैक्ट्रियन ऊंटों की एक छोटी आबादी अभी भी पास के उत्तर क्षेत्र हुंडर में देखी जा सकती है। खारदुंग ला लेह सड़क मार्ग से 39 किमी. की दूरी पर है। दक्षिण पुल्लू चेक प्वाइंट से उत्तर पुल्लू चेक प्वाइंट तक के लगभग 15 किमी की दूरी तक के भाग में मुख्य रूप से ढीली चट्टान, गंदगी और यदाकदा पिघली बर्फ के नाले हैं। नुब्रा घाटी की निकटवर्ती सड़क (कुछ स्थानों को छोड़कर जहां शिला स्खलन होता है) बहुत अच्छी तरह से बनी हुई है। दो और चार-पहिया वाहन, भारी ट्रक और मोटरसाइकिल विशेष अनुमति से नियमित रूप से नुब्रा घाटी में यात्रा के लिए जाते हैं।
हम सुबह दस बजे चल दिए। टैक्सी JK 10 9335 चालक तंडुप सहित चल पड़ी। लेह से एक आक्सीजन यूनिट 3,000/- रुपए में किराए पर ली, जिसका उपयोग ज़रूरत पड़ने पर करना था। यात्रा की शुरुआत 12,000 फुट से होना था और उच्चतम बिंदु 17,582 फुट पर था। उसके बाद फिर नीचे उतरना था। पहले साउथ पुल्लु गाँव आया वहाँ से खारदुंग ला 14 किलोमीटर बचा था। खड़ी चढ़ाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। ऊपर से सर्पाकार सड़क की कई रेखाएँ नीचे देखने में डर लगता है। साँस में भारीपन महसूस होने लगा। टिस्सु पेपर में लपेट कर कपूर की दो टिकियाँ शर्ट के ऊपरी ज़ेब में रखी हैं। जिनको आक्सीजन की कमी दूर करने के लिए बीच-बीच में निकाल कर सूंघते रहते हैं। चढ़ाई पर आक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए पानी सहित तरल पदार्थ पीना होता है। ऊपर पहुँच कर लोग पेशाबघर ढूँढते रहे। एक जगह दो बाथरूम बने थे लेकिन उनमें ताले डले थे। एक-दो पर्यटक बाथरूम के बाहर ही निस्तार करने लगे तो आर्मी सेनानियों ने उन्हें डाँट पिलाई। डाँट खाने के बाद बाथरूम की अनिवार्यता और बढ़ गई। खारदुंग ला पर गाड़ियों की भारी भीड़ थी। लोग गाड़ियाँ उठाकर आगे बढ़ गए। जहां बर्फ़ जमी थी। पर्यटकों ने बर्फ़ पर खेलना, बर्फ़ उछालना और पेशाब करना आरम्भ कर दिया। अब हम लेह घाटी से निकल कर स्योक घाटी में प्रवेश कर रहे थे।
पर्वतों से पिघलते ग्लेशियर से श्योक नदी की धाराएँ मिलकर एक घाटी का निर्माण कर रही थीं। घाटी में सबसे पहले उत्तर पुल्लू नाम का गाँव आया। फिर खारदुंग नामक गाँव पहुँचे। वहाँ से एक सड़क सियाचीन ग्लेशियर और दूसरी सड़क स्कर्दु की ओर जाती है। आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ़ स्कर्दु घाटी आरम्भ हो गई। खालसार और प्रतापपुर पार करने के बाद स्कर्दू पहुँचे। एक ठीकठाक से दिखते रेस्टौरेंट पर पेशाब की थैली ख़ाली करने का अनुपूरक कार्य निपटाया। कुछ अनुपूरक के साथ मूल निस्तार कार्य से भी निवृत्त होकर फ़्रेश हो प्रसन्नचित्त हुए। फिर नाश्ता और चाय निपटाई।
हिमाच्छादित हिमालय पर्वतमाला से घिरी नुब्रा घाटी तिब्बत और कश्मीर के बीच स्थित है। घाटी का दृश्य मनोरम और मनमोहक है। सर्दियों के दौरान, पूरी घाटी दिन रात चंद्रमा के परिदृश्य से भरी रहती है। दिन में उत्तरायण सूर्य की तेज किरण बर्फ़ पर पड़ने से सफ़ेदी लिए होती हैं और रात में चाँदनी का बर्फ़ के साथ अलहदा करिश्मा दिखटा है।
अलेक्जेंडर कनिंघम ने नुब्रा को लद्दाख के पांच प्राकृतिक और ऐतिहासिक डिवीजनों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया था। नुब्रा लद्दाख के उत्तरपूर्वी हिस्से पर है, उत्तर में बाल्टिस्तान और चीनी तुर्किस्तान की सीमा और पूर्व में अक्साई चिन पठार और तिब्बत पर चीन का कब्जा है। सियाचिन ग्लेशियर घाटी के उत्तर में स्थित है। सैसर दर्रा और प्रसिद्ध काराकोरम दर्रा घाटी के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और नुब्रा को उइघुर (मंदारिन: झिंजियांग) से जोड़ता है। पहले पश्चिमी चीन के झिंजियांग और मध्य एशिया के साथ इस क्षेत्र से बहुत अधिक व्यापार होता था। बाल्टिस्तान के लोगों ने भी तिब्बत जाने के लिए नुब्रा घाटी का इस्तेमाल किया था।
तिब्बती पठार की तरह, नुब्रा नदी के किनारे को छोड़कर दुर्लभ वर्षा और दुर्लभ वनस्पति के साथ एक उच्च ऊंचाई वाला ठंडा रेगिस्तान है। गांव सिंचित और उपजाऊ हैं, गेहूं, जौ, मटर, सरसों और विभिन्न प्रकार के फल और मेवे पैदा करते हैं, जिनमें सेब, अखरोट, खुबानी और यहां तक कि कुछ बादाम के पेड़ भी शामिल हैं। अधिकांश नुब्रा में नुब्रा बोली या नुब्रा स्काट वक्ताओं का निवास है। बहुसंख्यक बौद्ध हैं। नियंत्रण रेखा के पास नुब्रा के पश्चिमी या सबसे कम ऊंचाई वाले छोर पर यानी भारत-पाक सीमा पर श्योक नदी किनारे के गांव तुरतुक के निवासी गिलगित-बाल्टिस्तान के बाल्टी हैं, जो बलती बोलते हैं, और शिया और सूफिया नूरबख्शिया मुसलमान हैं।
नुब्रा घाटी एक तीन भुजाओं वाली घाटी है जो लद्दाख घाटी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह श्योक और नुब्रा नदियों के संगम से बनी है। श्योक नदी उत्तर पश्चिम की ओर बहती है और नुब्रा नदी एक न्यूनकोण बनाते हुए इसमें उत्तर-उत्तर पश्चिम से आ कर मिलती है। श्योक नदी आगे जाकर सिन्धु नदी में मिलती है। नुब्रा की केन्द्रीय बस्ती दिस्कित की दूरी लेह से 150 कि॰मी॰ है। दिस्कित अपने बागों, दर्शनीय स्थलों, बैक्ट्रियन ऊंटों और मठों के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी जम्मू और कश्मीर का सबसे उत्तरी भाग है। नुब्रा घाटी को लद्दाख के बाग के रूप में जाना जाता है और इसे मूल रूप से लदुमरा कहा जाता है जिसका अर्थ है फूलों की घाटी।
नुब्रा घाटी दूर से देखने पर घाटी सूखी लगती है। हालांकि, घाटी में मुख्य रूप से प्रमुख कृषि भूमि शामिल है। तब कोई आश्चर्य नहीं कि घाटी ने लद्दाख का प्रतिष्ठित बाग का सम्मान अर्जित किया है। यह सिर्फ नुब्रा की प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। घाटी मुख्य रूप से बौद्ध है और बौद्ध शिक्षा के कई केंद्रों को बसाए है। एन्सा, समस्टेमलिंग, दिस्कित और हुंदर प्रसिद्ध बौद्ध मठ हैं। हम सुमूर, हुंदर और दिस्कित की तरफ़ बढ़ रहे हैं। सबसे पहले सुमूर पहुँचे। श्योक नदी के बहुत चौड़े पाठ के किनारे पर स्थित मठ पर चढ़े तो दोनों तरफ़ नदी का आठ-दस किलोमीटर भाग दिखने लगा। बर्फ़ पिघल कर आते पानी से नदी एक किनारा पकड़ कर बह रही है। नीचे से एक सड़क चीन के खसगर की तरफ़ जा रही है।
नुब्रा घाटी समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। पर्यटक वर्ष के किसी भी समय यात्राओं की योजना बना सकते हैं। जुलाई और सितंबर में, जब यहाँ पतझड़ का मौसम होता है, नुब्रा घाटी की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय है। यहाँ पेड़ नहीं होते इसलिए पतझड़ में पत्ते नहीं झड़ते अपितु बर्फ़ पिघलती है। उसे बर्फ़झड़ कहा जा सकता है। नुब्रा घाटी की जलवायु साल भर अनुकूल रहती है। यहां तक कि गर्मी के मौसम के दौरान न्यूनतम और अधिकतम तापमान क्रमशः 4 डिग्री सेल्सियस और 30 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। हालाँकि मौसम साल भर शीतल और सुखद रहता है, सर्दियों के मौसम के दौरान तापमान न्यूनतम -40 डिग्री तक गिर सकता है। दिसंबर और जनवरी के महीने आम तौर पर सबसे ठंडे होते हैं, जब पूरी घाटियाँ और दर्रे बर्फ़ से ढँककर समतल हो जाते हैं।
हम सुमूर पहुँच रहे हैं। लद्दाखी में ‘सुम’ का अर्थ तीन है और ‘यूर’ का अर्थ है धारा या चैनल। कहा जाता है कि इस गांव में तीन प्रमुख धाराएं बहती हैं और इसी से यह नाम सुमूर पड़ा है। कुछ लोग यह भी अनुमान लगाते हैं कि यह Sum_Yul है, जिसका अर्थ है तीन गाँव। Sum_Yul ही सुमूर है। ऐतिहासिक रूप से यह गांव चीन के खसगर को लद्दाख से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग पर है। मठ के ठीक ऊपर पहाड़ी की चोटी पर एक प्राचीन किला है। मठ नुब्रा घाटी में सबसे बड़ा है, जिसे लामा त्सुल्टिम नीमा ने 1830 के आसपास स्थापित किया था। 8-9वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व की विशाल चट्टान की लालसा है। पूरे साइचेन बेल्ट में जनसंख्या के मामले में सबसे बड़ा गांव है। लंबी सर्दियों के दौरान गांव के लोग विभिन्न पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं का पालन करते हैं।
सुमूर से श्योक नदी पार करके पर्वत को काट कर बनाए मार्ग पर चलने लगे हैं। रास्ता कभी नदी के बीच से होता है और कभी किनारे से पहाड़ पर चढ़ जाता है। नुब्रा घाटी में ठहरने के लिए दिस्कित के पास बजट रेंज में गेस्टहाउस हैं। कैंपिंग के लिए टेंट भी उपलब्ध कराते हैं। सुमुर में सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ डीलक्स कैंप हैं। हंडर में अच्छे होटल भी हैं। नुब्रा घाटी में खाने के लिए सबसे अच्छी जगह होटल और गेस्ट हाउस भारतीय, चीनी, महाद्वीपीय और यूरोपीय भोजन परोसते हैं। हमारा एक रात का डेरा हुंदर के सैंडलवुड कैम्प में अर्थात् पर्यटक टेंट में था। पंद्रह टेंट के गोलाकार घेरा के बीच एक पार्क में चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरे बैठकर भोजन का आनंद लिया। फिर हुंदर पहुँचे।
हुंदर लद्दाख के लेह जिले का एक गाँव है जो रेत के टीलों, बैक्ट्रियन ऊंटों के लिए प्रसिद्ध है। यह नुब्रा तहसील में श्योक नदी के तट पर स्थित है। हुंदर कभी पूर्व नुब्रा साम्राज्य की राजधानी थी। कई बर्बाद इमारतें हैं, जिनमें राजा के महल के खंडहर, लंगचेन खार (“हाथी महल”) शामिल हैं। पहाड़ी की चोटी पर एक किला है, जिसे गुला कहा जाता है। हुंदर में दो बौद्ध मंदिर भी हैं: सफेद मंदिर (लखांग कार्पो) और लाल मंदिर (लखांग मारपो)। हुंदर और दिस्कित के बीच रेत के टीले हैं।
दिस्कित और हुंदर के बीच का ठंडा रेगिस्तान पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। पर्यटक रेत के टीलों को देखने और बैक्ट्रियन ऊंटों की सवारी करने के लिए ठंडे रेगिस्तान में आते हैं। राजस्थान और भारत के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले एकल-कूबड़ वाले ऊंटों के विपरीत, मध्य एशिया के स्टेपीज़ मूल के बैक्ट्रियन ऊंट के दो कूबड़ होते हैं। बैक्ट्रियन ऊंट, केवल हुंदर में पाए जाते थे। जब लद्दाख मध्य एशिया के साथ प्राचीन व्यापार मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, तब बैक्ट्रियन ऊंट परिवहन का मुख्य साधन थे। प्राचीन रेशम मार्ग पर एक प्रमुख पड़ाव, नुब्रा अभी भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पश्मीना ऊनी वस्त्रों और बागवानी फसलों का एक प्रमुख व्यापार केंद्र है। स्थानीय लोग सेब, अखरोट, खुबानी, बादाम और मुख्य फसलों जैसे गेहूं, जौ आदि का उत्पादन करते हैं।
दिस्कित मठ
नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ न केवल अपने अविश्वसनीय स्थान के लिए, बल्कि मठ के ठीक नीचे स्थित 106 फीट मैत्रेय बुद्ध प्रतिमा के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ खालसर-पनाकिल मार्ग से 15 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में 10,308 फीट की ऊंचाई पर ठंडे रेगिस्तान के किनारे स्थित है। यह पार्थपुर और उन को जोड़ती सड़क के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर खड़ा है।
दिस्कित मठ के अंदरूनी भाग इसके बाहरी हिस्से की तरह ही सुंदर हैं, क्योंकि वे जटिल थंक़ा भित्तिचित्रों से सजाए गए हैं। प्रार्थना कक्ष, जिसे दुखंग कहा जाता है, बौद्ध संरक्षक देवताओं के विशाल ड्रम और सुंदर छवियों का घर है। मठ का भंडार कई मंगोलियाई और तिब्बती धार्मिक ग्रंथों को संरक्षित करता है। मठ के ठीक ऊपर लाचुंग मंदिर है, जो बौद्ध धर्म के गेलुगपा संप्रदाय के संस्थापक सोंग खापा की बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। इसे नुब्रा घाटी के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। दिस्कित मठ का प्रांगण दिस्कित गांव और आसपास के परिदृश्य के सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है।
नुब्रा घाटी में एक प्रमुख आकर्षण मैत्रेय बुद्ध की 108 फीट की मूर्ति है, जो को आश्चर्यचकित करती है। सोने और लाल रंग की मूर्ति पाकिस्तान की ओर श्योक नदी का सामना करती एक पहाड़ी के ऊपर दिस्कित मठ के ठीक नीचे स्थित है। पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर के गाँव सामने की दिखती पहाड़ी के पार स्थित हैं। श्योक नदी उसी तरफ़ जा रही है। काराकोरम पहाड़ पर सिंधु से मिलेगी। माना जाता है कि मूर्ति के सौंदर्य और आध्यात्मिक महत्व के अलावा, तीन विचारों को शामिल किया गया है: दिस्कित गांव की सुरक्षा, विश्व शांति को बढ़ावा देना और पाकिस्तान के साथ युद्ध की रोकथाम करना।
दिस्कित मठ में मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार दोस्मोचे, या देस्मोचे है, जिसका अर्थ है, “बलि का बकरा का त्योहार।” यह नुब्रा घाटी के गांवों के लोगों की बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। त्योहार का मुख्य आकर्षण छम नृत्य है, जो पर्यटकों के बीच मुखौटा नृत्य के रूप में अधिक प्रसिद्ध है। ये नृत्य मठ के लामाओं द्वारा किए जाते हैं। किसी भी आपदा की घटना को रोकने के लिए आटे से बने चित्र भी फेंके जाते हैं, और हर जगह शांति और समृद्धि का स्वागत करते हैं।
इस मठ का निर्माण त्सोंग खपा के एक शिष्य चंग्ज़ेम त्सेराब जंगपो ने 14 वीं शताब्दी में करवाया था, जिसके अंदर अलग-अलग तरीके से तिब्बती चित्रकारियाँ की हुई हैं, जो देखने में काफी खूबसूरत लगती है। इस मठ में प्रवेश करने के लिए ₹ 30 देना पड़ता है और अगर कोई व्यक्ति यहां ड्रोन उड़ाना चाहता है, तो उसे अलग से ₹.500 देना पड़ेगा। एक घंटा मठ का अवलोकन करके रुकने के स्थान हुंदर तरफ़ कूच किया। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। नदी एक कोने से बह रही है। नदी की किनारे घने घुमावदार कूचों में एक घंटा भटकने के बाद तय स्थान मिला।
हमारे रुकने का इंतज़ाम टेंट हाऊस में था। चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरे छोटे से मैदान में 14 टेंट हाऊस बने थे। बीच में एक बगीचा में बीस-पच्चीस कुर्सियाँ डली थीं। उन पर चाँदनी छनकर आ रही थी। रात को आठ बजे के लगभग तीस दक्षिण भारतीय पर्यटक और आ गए। उनकी धमाचौकड़ी देर रात तक चलती रही। रात बारह बजे तक बर्फीले पहाड़ों से उतरती चाँदनी का आनंद लेकर शयन को चले गये।
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २४९ ☆
☆ आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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हे भारत की जीवन धारा कलकल निनादिनी माँ गंगे
हिमगिरी से चलकर सागर तक निर्बाध वाहिनी माँ गंगे
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देती अमृत सम जल अपना वन उपवन जन जन कण कण को
मिलती है अनुपम शांति तुम्हारे तीर दुखी आहत मन को
भारत जन मन की परम पूज्य प्रिय पतित पावनी माँ गंगे
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उत्तर दक्षिण प्रांतो पंथो का भेद मिटाने वाली तुम
भावुक भक्तों पर माँ सी ममता प्यार लुटाने वाली तुम
भारत वसुन्धरा को वैभव कल्याण दायिनी माँ गंगे
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तव निर्मल उज्जवल धारा ने कवि कण्ठों को कलगान दिये
कृषि को नित वरदान दिये सन्तो को गरिमा ज्ञान दिये
भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे
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तुम भारत की पहचान तुम्हारे दर्शन को हर मन प्यासा
जीते हैं लाखों लोग लिये तुममे डुबकी की एक आशा
भारत के जनजीवन के मन में नित निवासिनी माँ गंगे
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जग से विक्षुब्ध असांत हृदय को शान्ति प्राप्ति की अभिलाषा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘माँ- सी‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५७ ☆
☆ लघुकथा – माँ- सी☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
दो लड़के बड़ी देर से कमला बाई के घर के बाहर चक्कर लगा रहे थे। मीना बाई बहुत देर से उन्हें देख रही थी। कमला जब भी घर से बाहर जाती मीना दूर बैठी तन -मन से कमला के घर की चौकसी करती। कमला की लड़की अकेली है घर में। पंद्रह- सोलह साल की ही होगी पर अभी से बहुत सुंदर दिखती है, नजर हटती ही नहीं चेहरे से। वह मन ही मन सोच रही थी कि माँएं अपनी बेटियों की सुंदरता से कितनी खुश होती हैं लेकिन हमारे जैसी औरतें बेटी की सुंदरता से सहम जाती हैं।
बाईक पर आए उन दो लड़कों को ताँक –झाँक करते देख उसने पास जाकर पूछा —
“ऐ – ऐ कहाँ जा रहे हो?”
“तेरा घर है यह? अपने काम से मतलब रख।”
“वह तेजी से बोली – “हाँ मेरा ही घर है, अब बोल।”
“कमला बाई की लड़की से काम है।”
“क्या काम है? वही तो पूछ रही हूँ मैं।”
“उसी को बताना है। तू क्यों बीच में टांग अड़ा रही है?”
“वह कमला के घर का रास्ता रोक, कमर पर हाथ रखकर खड़ी हो गई। तू पहले मुझे काम बता फिर आगे बढ़ना।”
“जबर्दस्ती है क्या? क्यों बताएं तुझे? साली धंधेवाली होकर बहुत नाटक कर रही है। चल यार! फिर कभी आएंगे हम।”
भीड़ जमा होने लगी थी। बात बढ़ती देख दोनों लड़के तेजी से बाईक घुमाकर उसे गाली देते हुए वहाँ से चले गए।
“अरे! जब भी आएगा ना तू, मीना बाई ऐसे ही दरवाजे पर खड़ी मिलेगी। तू छू भी नहीं सकता मेरी बच्ची को।” मीना जोर – जोर से चिल्लाकर बाईक पर पत्थर मारती जा रही थी। आस- पड़ोसवालों की भीड़ लग गई थी। वे हतप्रभ थे। मीना बाई की लड़की को तो बहुत पहले गुंडे उठा ले गए थे।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७३ – व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
पवित्रता और श्रद्धा का वह युग, जब भक्त मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपनी धूल-धूसरित चप्पलों के साथ अहंकार को भी बाहर छोड़ आते थे, अब समाप्त हो चुका है। अब तो भक्त नहीं, बल्कि ‘ग्राहक-उपभोक्ता’ आते हैं, जिनके हाथों में धूप-दीप की जगह चमचमाता स्मार्टफोन होता है और मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रश्न गूँजता है: “मैंने समय दिया, पैसा चढ़ाया, अब रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) क्या है?” यह युग ‘त्वरित मोक्ष’ (Instant Salvation) का है, जहाँ आस्था भी एक ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म बन गई है। मंदिर, जो कभी आत्मा की शांति का आश्रय थे, आज गूगल मैप्स पर तीन-सितारा रेटिंग वाले एक पर्यटन स्थल से ज़्यादा कुछ नहीं। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब उत्पन्न होता है जब कोई भक्त बाहर आकर अपनी निराशा को व्यक्त करता है: ‘भगवान को चार बार आवाज़ दी, कोई जवाब नहीं आया, प्रसादी भी ठंडी थी, इसलिए एक स्टार!’ यह समीक्षा केवल एक ऐप पर दर्ज की गई टिप्पणी नहीं है; यह उस उपभोक्तावादी संस्कृति का महाकाव्य है, जिसने ईश्वर को भी एक विफल सर्विस प्रोवाइडर बना दिया है, और यह मन को झकझोरने वाला सत्य है कि हम अपनी समस्याओं के तत्काल समाधान की चाह में, धैर्य और विश्वास की अपनी सदियों पुरानी पूंजी को नष्ट कर चुके हैं।
यह ‘वन स्टार’ की विडंबना ही हमारे समय का सार है। भक्त की अपेक्षाएँ किसी प्रीमियम मेंबरशिप वाले ग्राहक से कम नहीं होतीं। उन्होंने लाइन में खड़े होकर ‘वीआईपी दर्शन’ के लिए अतिरिक्त शुल्क दिया है, उन्होंने अपनी अर्जी (चिट्ठी) बाकायदा ड्रॉप-बॉक्स में डाली है, तो अब उनके ‘ईष्ट देव’ को तत्काल प्रकट होकर, कम से कम, उनकी नौकरी की तरक्की या बेटी के विवाह की गारंटी तो देनी ही चाहिए थी। भक्त यह भूल गया है कि यह मंदिर किसी ’24×7 कॉल सेंटर’ का ब्रांच ऑफिस नहीं है, जहाँ शिकायत दर्ज होते ही ‘अगले तीन मिनट’ में समस्या का निवारण हो जाएगा। वे भूल गए हैं कि आध्यात्मिक यात्रा एक ‘स्लो बफरिंग’ वाली लंबी फ़िल्म है, जिसे देखने के लिए धैर्य का डेटा पैक चाहिए, न कि ‘फास्ट-फॉरवर्ड’ बटन। यह त्रासदी केवल भगवान की अनुपस्थिति की नहीं है, बल्कि भक्त के भीतर से उस ‘अदृश्य विश्वास’ की अनुपस्थिति की है, जो बिना किसी सबूत या गारंटी के भी, अपनी यात्रा को जारी रखता था। हम प्रमाणिकता और दृश्यता के इतने आदी हो चुके हैं कि जो चीज़ आँखों से ओझल है, उसे हम स्वचालित रूप से ‘फ़र्जी’ मान लेते हैं।
आस्था का यह बाजारीकरण दरअसल हमारी आत्मिक दरिद्रता का प्रमाण है। जब जीवन की जटिल समस्याएँ (जैसे कि ईएमआई का बोझ, या बॉस का अत्याचार) हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो हम त्वरित समाधान के लिए दौड़ते हैं, और मंदिर हमें एक ‘मैजिक पिल’ बेचने वाली दुकान लगने लगती है। भक्त यह उम्मीद करता है कि अगर वह एक ‘मेगा डोनेशन’ देता है, तो उसकी फाइल भगवान के इनबॉक्स में सबसे ऊपर चली जाएगी, क्योंकि वह ‘प्रीमियम ग्राहक’ है। वह नहीं समझता कि ब्रह्मांड की व्यवस्था किसी ‘फ़र्स्ट कम, फ़र्स्ट सर्व’ की नीति पर नहीं चलती, और वहाँ कोई ‘सुपर एडमिन’ विशेष लाभ नहीं देता। इस हृदयविदारक नाटक में, भक्त की आँख में एक आँसू भी है—वह आँसू जो उसकी गहरी असुरक्षा और खालीपन को दर्शाता है। वह सचमुच डरा हुआ है और उसे किसी सहारे की ज़रूरत है, लेकिन सहारा ढूँढने के लिए उसने जिस आधुनिक ‘समीक्षा-आधारित’ प्रणाली को चुना है, वह उसकी आस्था को और खोखला कर रही है, क्योंकि जब वह ‘एक स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में भगवान को नहीं, बल्कि अपने ही टूटे हुए विश्वास को रेटिंग दे रहा होता है।
इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की बीमारी ने भगवान के अस्तित्व के पूरे सिद्धांत को ही विकृत कर दिया है। ज़रा सोचिए, अगर यह रेटिंग प्रणाली व्यापक हो जाए तो क्या होगा: किसी गरीब ने मन्नत माँगी और लॉटरी नहीं लगी, वह तुरंत आकर लिखेगा: ‘गॉड ऑफ़ लक, फ़ेल! 0/100, विल नॉट रेकमेंड।’ किसी धनी व्यापारी को थोड़ी सी हानि हुई, वह लिखेगा: ‘पोर्टफोलियो मैनेजमेंट बहुत ख़राब है, एआई (AI) आधारित आशीर्वाद की ज़रूरत है।’ मंदिरों को शायद अब एक ‘फ़ॉलोअप टीम’ रखनी पड़ेगी जो भक्तों को फ़ोन करके पूछे: ‘सर, क्या आपको हमारी कृपा प्राप्त हुई? क्या आप हमारे ‘दिव्य समाधान’ से संतुष्ट हैं?’ यह सब इतना मन को झकझोर देने वाला है, इतना तर्कहीन है कि दिमाग चकरा जाता है। हमने ‘कर्म’ को ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ में बदल दिया है और ‘मोक्ष’ को ‘इंस्टॉलेशन प्रोसेस’ मान लिया है। हमारी समस्या यह नहीं है कि हमें भगवान नहीं मिले, हमारी समस्या यह है कि हमने भगवान को ढूँढने का सही पता ही भुला दिया है।
इस पूरे तंत्र में सबसे दयनीय प्राणी है पुजारी। वह बेचारा अब ‘कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजर’ बन गया है। उसकी धोती भले ही पवित्र हो, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारियाँ कॉर्पोरेट हैं। वह सुबह उठकर भगवान का अभिषेक करता है या भक्तों की शिकायतों का निवारण? भक्त आकर उस पर चिल्लाता है: ‘महाराज, मेरे बेटे को विदेश की वीज़ा फाइल को पास क्यों नहीं कराया? पिछली बार मैंने आपको अच्छा दक्षिणा दिया था!’ पुजारी, जो कभी आत्मज्ञान का वाहक था, अब ‘फ़्रंटलाइन एग्जीक्यूटिव’ है, जिसे ‘फ़ॉल्टी ग्रेस’ या ‘अन-डिलीवर्ड मिरेकल’ की शिकायतें संभालनी हैं। मंदिर प्रबंधन (जो शायद एक ट्रस्ट का ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ है) उस पर ‘ग्रोथ’ और ‘ईश्वर के विज़िबिलिटी स्कोर’ बढ़ाने का दबाव डाल रहा है। पुजारी अपनी माला जपता है और मन ही मन सोचता है: ‘हे प्रभु, या तो इन्हें असली ज्ञान दो, या मुझे इस रिव्यू सिस्टम से मुक्ति दो।’ यह तनावपूर्ण स्थिति इतनी हृदयविदारक है कि हम इसमें छिपे हुए सच्चे आध्यात्मिक सेवक के दुख को अनदेखा कर देते हैं।
यह व्यवहार, दरअसल, एक ‘आस्था का फ़ास्ट फ़ैशन’ है, जिसमें सब कुछ क्षणिक और खर्च करने योग्य है। आज का भक्त ‘ईश्वर के साथ संबंध’ नहीं चाहता, वह ‘ईश्वर से सौदा’ चाहता है। वह अपने जीवन को एक ‘टू-डू लिस्ट’ के रूप में देखता है, जहाँ भगवान की ज़िम्मेदारी है कि वह सबसे मुश्किल ‘टास्क’ को पूरा करें। वे भूल गए हैं कि ‘आस्था’ एक लंबी अवधि का निवेश है, जिसके लाभ तुरंत नहीं दिखते, बल्कि जीवन के अंतिम खाते में जुड़ते हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ तथ्य है कि हम, जो अपनी मर्ज़ी से मंदिर आते हैं, जब अपनी इच्छा पूरी नहीं होती, तो सार्वजनिक रूप से ‘ईश्वर की गुणवत्ता’ पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। क्या किसी भक्त ने कभी अपनी ‘बुरी आदतों’ को ‘वन स्टार’ दिया है? क्या किसी ने अपने ‘क्रोध’ या ‘लालच’ के लिए ‘रिफंड’ माँगा है? नहीं। हम अपनी विफलताओं का दोष एक अदृश्य शक्ति पर मढ़ने में अत्यधिक कुशल हो चुके हैं, क्योंकि ऐसा करना हमारी ज़िम्मेदारी को आसान बना देता है।
विडंबना यहीं खत्म नहीं होती। कुछ भक्त ‘अच्छी’ समीक्षाएँ भी लिखते हैं, लेकिन उनका आधार भी उतना ही खोखला होता है। ‘मैंने 100 रुपए चढ़ाए थे, और रास्ते में 1000 रुपए का नोट मिल गया। 5 स्टार! बेहतरीन सेवा!’ इस तरह की समीक्षाएँ साबित करती हैं कि ईश्वर को भी अब ‘चमत्कार-वितरण’ (Miracle-Delivery) के आधार पर मापा जा रहा है। वे यह नहीं समझते कि शायद उस दिन उन्हें 1000 रुपए का नोट इसलिए मिला होगा ताकि वे यह जानें कि लालच और कृतज्ञता में क्या अंतर है। लेकिन नहीं, उनके लिए तो भगवान एक उच्च-रिटर्न वाली ‘म्यूचुअल फंड स्कीम’ हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ है कि हमने अपनी आध्यात्मिकता को पूरी तरह से भौतिक लाभ और लेन-देन तक सीमित कर दिया है, और इस प्रक्रिया में हमने उस ‘निःस्वार्थ प्रेम’ को खो दिया है जो बिना किसी अपेक्षा के भक्ति की नींव रखता था। यह प्रेम, यह निःस्वार्थता ही वह चीज़ है जिसे हमने सबसे सस्ता समझा और जिसे सबसे पहले ऑनलाइन बाज़ार में बेच डाला।
अंत में, यह कथा भगवान की विफलता की नहीं, बल्कि हमारी मानव जाति की आधुनिक विफलता की है। हमने एक ऐसी दुनिया बना ली है जहाँ हर अनुभव को रेटिंग दी जाती है, जहाँ हर भावना को इमोजी में समेटा जाता है, और जहाँ ‘विश्वास’ का अर्थ ‘गारंटी’ बन गया है। जब भक्त बाहर आकर ‘वन स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में चिल्लाकर कह रहा होता है: “मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए तुम्हारा अस्तित्व व्यर्थ है!” यह हमारी ‘उपभोक्ता-केंद्रित’ मानसिकता का अंतिम चरण है, जहाँ हम भगवान को भी अपनी नौकरशाही और उपभोक्ता अधिकारों के अधीन देखना चाहते हैं। हरिशंकर परसाई जी शायद आज यह देखकर आहें भरते कि जिस समाज की उन्होंने आलोचना की थी, वह समाज अब अपनी आलोचना को भी ‘वन स्टार’ देकर आगे बढ़ जाएगा। हमें याद रखना चाहिए: ईश्वर ने हमें आज़ादी दी है, लेकिन हम उस आज़ादी का प्रयोग उन्हें ‘रेटिंग’ देने में कर रहे हैं। काश, हम अपनी आत्मा की गहराई में झाँककर, अपने जीवन को ‘पांच स्टार’ देने लायक बना पाते, न कि अपने मनचाहे परिणाम न मिलने पर उस अदृश्य शक्ति को दोष देते।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है सुश्री संध्या जी द्वारा लिखित पुस्तक ““समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९० ☆
☆ ~ न्यूयार्क से ~ “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
समय के आईने में
रचनाकार ..संध्या अग्रवाल
चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
इस आलेख संग्रह में लेखिका ने जीवन के रोजमर्रा के क्षणों को न केवल दर्ज किया है बल्कि उन्हें एक ऐसे चश्मे से परखा है जो हमें बेहतर तरीके से बताता है कि हम कौन थे, कौन हैं और किन भूलभुलैयों में फँसते जा रहे हैं। पुस्तक का अंदाज़ सीधे-साधे संवाद से दूर है, वह दर्पण की तरह मिलता-जुलता, कभी क्रूर और कभी नम्र, पर हमेशा सच के निकट रहने की जिद पर टिका रहता है। लेखिका ने अपनी दीर्घदृष्टि में छोटे-छोटे अनुभवों को ऐसा पिरोया है कि पाठक को बार-बार वही पुराना सवाल सालता है, क्या हमने समय को समझा, या समय ने हमें समझाने की अपनी कला में हमारी असफलता की लंबीं सूची बना दी।
रचनाकार का शिल्प सूक्ष्म अवलोकन और सटीक भाषा का मेल है। वर्णन में रफ्तार ऐसी है कि वह हमें बीच-बीच में पढ़ना रोककर सोचने पर मजबूर कर देती है। किसी पात्र की एक अदायगी, किसी घटना का एक मामूली संवाद, हर छोटी चीज़ एक बड़े प्रश्न की तरफ संकेत करती है। अभिव्यक्ति के ताने-बाने में जो अर्थ छिपे हैं, उन्हें समझने के लिए पाठक को वही ध्यान देना पड़ता है जो लेखक ने पाठ में दिखाया है। यही वजह है कि पढ़ते समय बार-बार ऐसा लगता है कि लेखक केवल कोई घटना सुनाकर नहीं रह गया, वह हमें स्वयं का पुनर्मूल्यांकन करने का निमंत्रण दे गया है।
पुस्तक का एक प्रमुख गुण इसकी समयबद्धता है। समय यहाँ चलता-फिरता पात्र है जो अपने साथ समाज के मानक, परंपराएँ, और रोज़मर्रा की मोह भंग स्थिति लाता है। लेखिका ने पुराने और नए दोनों समय के चेहरों को एक मंच पर खड़ा कर के उनकी बातचीत करवाई है। यह बातचीत कभी तीखी व्यंग्य बनकर उठती है, तो कभी मद्धम, पर हमेशा चिंतन का आव्हान देती जाती है। समय के साथ टकराव में पैदा होने वाले अभाव और आश्चर्य दोनों का ही लेखिका ने समुचित रूप से विवेचन किया है। पाठक के लिए यह केवल कथा का आनंद नहीं रह जाता, बल्कि वह समय के प्रति अपने स्वभाव का निरीक्षण भी करने लगता है।
रचना में पात्रों का जीवंत उल्लेख है। वे किसी नाटक का बाहरी सेट नहीं, बल्कि हमारी कहानियों के भीतर जीते हुए लोग हैं। उनकी छोटी-छोटी आदतें, उनके शब्द, उनकी असफल प्रेमकथाएँ और नौकरी, त्यौहार, सब कुछ मानो हमारे आसपास की सड़कों, चाय की ठेलियों और सरकारी दफ्तरों की कतारों से उठाकर लाया हुआ है। इस वास्तविकता ने पाठक को किताब के पन्नों से फिर फिरवजुड़े रहने पर विवश किया है। लेखिका की संवेदना पात्रों के भीतर झांकते हुए समाज की विसंगतियों को भी उजागर कर देती है। कहीं पर यह व्यंग्य बनकर निकलता है, कहीं पर यह करुणा का रूप धारण कर लेता है, पर अंततः यह मानवता के प्रति सजगता ही साबित होता है।
भाषा कभी-कभी लोकोक्ति की मिठास के संग है, दार्शनिक विचलन कम है पर वैचारिकता लगातार बनी रहती है। लेखिका कहीं भव्य शब्दों में भटकती नही, वह सीधे उस मसले की गांठ खोलकर रख देती है जिसे हम अनदेखा करते आए हैं।
कथ्य संरचना में पहली दृष्टि में अलग दिखने वाले किस्से धीरे-धीरे एक दूसरे से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं और अंततः एक व्यापक सामाजिक चित्र बनाते हैं। यह ब्रह्माण्डीकरण पाठक को थका कर नहीं छोड़ता, इसके विपरीत, यह तार्किक है। हर छोटा उपकथ्य अंततः मुख्य विषय की परिभाषा में योगदान देता है। इस तरह की रचना में लेखिका का नियंत्रण स्पष्ट है। वह जानती है कब अभिव्यक्ति की रफ़्तार बढ़ानी है और कब ठहरकर तत्कालीन भावना का स्वाद चखाना है।
पुस्तक की गंभीरता के बीच भी हास्य भी है। यह हास्य न केवल पाठक को हंसाता है, बल्कि उसे किसी कटु सत्य से अवगत कराता है जिसे स्वीकार करना हम टालते हैं। व्यंग्य कहे तो उसे साहित्य के भीतर एक सक्षम हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो सामाजिक बेरुखी और मानवीय दोहरावों पर वार करता है, पर कभी अपमानजनक नहीं होता। यह संतुलन ही लेखक की पकड़ की असली कसौटी है।
पठन के बाद मन में एक शेष भाव रहता है, समय के आईने में जो प्रतिबिंब उभरता है, वह स्थिर नहीं होता। वह बदलता रहता है और बदलते रहने की अपनी मजबूरी में हमें भी लगातार बदलने का आह्वान करता है। लेखिका ने यह नहीं कहा कि परिवर्तन आसान है, पर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि बदलाव से इन्कार करना स्वयं को धोखा देना है। पुस्तक का अंतिम भाव पाठक को एक तरह की जागरूकता और जिम्मेदारी देता है, समय की धारा के साथ समझदारी से तैरने का, और अपनी छोटी-छोटी असमानताओं को पहचानने का आग्रह।
कुल मिलाकर यह कृति सोचने-समझने वालों के लिए एक समृद्ध बौद्धिक उपहार है। यह केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, एक संग्रह योग्य संवाद है। समय से, समाज से और अंततः स्वयं से बातें हैं।