हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १२ ☆ जीवन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  जीवन।)

☆ मंजिरी साहित्य # १२ ☆

? कविता – जीवन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

शांति दूत नहीं दुनिया में,

बने हुए सब दानव आज l

पीड़ा बहती नयनों से अब,

इंसानियत का खत्म है काज ll

*

आशाओं के सर्व सपने अब,

नित चिताओं पर सोते l

देखें प्रतिपल लोचन जिनको,

सतत दिन रात रोते रोते ll

*

 नहीं सुनाई देता कलरव,

मन रूपी खग अब मौन हुआ l

हरियाली गुमसुम हो गई,

जीवन अब तो बना जुआ ll

*

हिंसक चील कौए अरु गिद्ध,

 खुले आकाश हैं मंडरातें l

वहीं शांतिदूत कबूतर,

छुपते होते डर जाते ll

*

सदा उदासी लिये पूर्ण मन,

दुःख का ओज भरा डेरा l

रात हो रही दैनिक लंबी,

कब होगा मन शांत सवेरा ll

*

आज बना ली हृद ने दूरी,

कैसे हम इसको पाटें l

आओ मिलकर बात करें सब,

इस जहर को मिल काटें ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २५ – कविता – नव निर्मिती… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता नव निर्मिती।)

☆ शशि साहित्य # २५ ☆

? कविता – नव निर्मिती…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

परिवर्तन का यह दौर चला है,

हेतु नव-निर्माण को…

 

भाग्य विधाता देता मौका,

किस्मत अपनी लिखने को…

 

धर्म, मेहनत, लगन अटूट,

चल दो इसी राह को…

 

है दुश्वार..मगर कठिन नहीं,

भेदना किसी चक्रव्यूह को,

 

हिम्मत करो निकल चलो,

संग ले उपलब्धि को…

 

प्रथम युद्ध है खुद से, खुद का,

पूर्ण समर्पित, निभाओ अपने किरदार को,

 

खुद का दिल भी सह सके,

व्यवहार वही दो अन्य को…

 

जब हो लेखा-जोखा  कर्मों का,

सहर्ष “स्वागतम्”  कह सको,

 

फहरा सको जीत का झंडा,

तैयार करो उस धरती को…

 

भाग्य अगर लिखना हो खुद का,

निर्मित करो उस स्याही को…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९६ – देवपुजा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९६ – विजय साहित्य ?

☆ देवपुजा…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

पुजार्चन करताना

करू सोळा उपचार

आवाहन देवतांना 

घडे दर्शन त्रिवार….! १

देऊ आसन मंत्राने

लाभण्याला सुखासन

पाद्यपुजा करूनीया

यशप्राप्ती संकलन…! २

 *

अर्घ्य सुगंधी जलाने

लाभे मना  समाधान

आचमन गंगाजल

होई आनंद विधान…! ३

 *

स्नान घालता देवास

मिळे जिवनात सुख

पंचामृत देता देवा

स्नेह माधुर्य सन्मुख…! ४

 *

अभिषेक देवतांना

स्थैर्य‌ शांततेचा लाभ

वस्त्र अर्पिता प्रेमाने

लाज राखी पद्मनाभ…! ५

 *

यज्ञोपविताचा मान

मोक्षप्राप्ती लाभतसे

गंध लावता देवाला

ज्ञानप्राप्ती गेही वसे…! ६

 *

फुले अर्पिताच मिळे

सर्व सुख समाधान

कुंकू हळद पिंजर

लाभे सौभाग्याचे दान..! ७

 *

अलंकार देता‌ देवा

मनी श्रीमंतीचा वास

धूप प्रक्षालन करी

कीर्ती ऐश्वर्य प्रवास…! ८

 *

दीपदान सौख्य मोठे

ज्ञान वैराग्य लाभते

प्रासादिक नैवेद्याने

अन्नपुर्णा सुखावते…! ९

 *

आरतीच्या गजरात

प्रसन्नता नांदे धामी

प्रदक्षिणा घालताना

लाभ स्वामित्वाचा नामी…! १०

 *

श्रीफलाने पुजार्चना

दावी सौख्याचे शिखर

दुर्वा तुलसी बेलाने

कृपा हस्त शिरावर…! ११

 *

मंत्र पुष्पांजली देई

सुख समृद्धीचे देणे 

अक्षतांनी परिपुर्ण

सोळा उपचार लेणे…! १२

 *

नमस्कार स्विकारावा

विनयाने विनवणी

सह कुटुंब प्रार्थना 

नको दुर्भाग्य मन्मनी…! १३

 *

यथाशक्ती यथामती

करू पुजा मनोभावे

नाना लाभ फलदायी

अशा देव पुजनाने….! १४

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # चहाच्या कपातले वादळ… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # चहाच्या कपातले वादळ… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

अन चहाच्या कपात वादळ उठले… निमित्त तिचे माझे भांडणाचे झाले… शब्दाने शब्द वाढत गेला.. ना तिने खाली पडू दिला ना मी सोडून दिला… विषय तसा क्षुल्लक होता. नेहमी सारखा वादाला तोंड फोडणारा… तू तू त मैं मैं ने कागाळीला संथ सुरवात झाली… आणि हळूहळू ती तारसप्तका पर्यंत पोहचली… तुमचं हे नेहमीचंच असं असतं आपलं तेच खरं मानायचं… जरा म्हणून कुठे बायकोचं ऐकाल तर शपथ… आम्ही मेलं राब राब राबायचं नि वरती मनं मारायचं… तुम्हाला हवं ते करू द्यायचं आणि आम्ही ब्र सुद्धा काढायचा नाही… बायको म्हणून काही कदर राहिली नाही. मोलकरीण म्हणूनच किंमत दिली गेली… आता अडलयं माझं खेटर… तुम्ही आता खुशाल राहा तुमच्या घरी.. ही मी निघाले माझ्या माहेरी… मग लवकरच कळेल बायको म्हणजे काय चीज असते… तिच्या शिवाय घरी दारी दुसरं कोण झिजते… किती दिवस माझ्या विना इथं तोऱ्यात राहाल… दोन वेळेचे जेवणाचे नि तिनत्रिकाळ चहाचे मिळायचे झाले कि वांधे मग कोण पुसेल तुमचे हाल… फोनवर फोन निरोपावर निरोप धाडाल मला.. सुसरबाई तुझी पाठ बरं मऊ चल ना आता आपल्या घरला… समझोताचा आवाज नरम आला… जावा जावा माफ केले मी तुम्हांला चला आताच येते तुमच्या बरोबर आपल्या घरला… असा तर्हेने वादाचे काटे गळून गेलेल्या प्रीती च्या गुलाबाचा सुंगध पुन्हा दरवळला… अंदर कि बात सांगु का तुम्हाला..

खरं म्हणजे माहेरी जाण्याचा आततायी निर्णयाने माझाही जीव होता चुटपुटला… कसे राहतील घरी धनी माझ्यावाचुनी.. तनाने मी माहेरी नि सासरी मन तगमगुनी… वाट पाहत बसले कधी येतील मला न्यायला… कोणी काही म्हणोत भांड्याला भांड लागतचं कि संसारातल्या खऱ्या प्रेमाला तेव्हा तेव्हा अशी चहाच्या कपातली वादळं उठंत असतात… कुणीच हारत नसतात आणि जिंकत तर त्याहूनही नसतात…

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८८ ☆ अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८८ ☆

अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

अधिक मास भारतीय संस्कृति में केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का सुंदर समन्वय है। यह हमें स्मरण कराता है कि संसार को बदलने की अपेक्षा यदि हम स्वयं को बदलना प्रारंभ करें, तो हमारी दृष्टि बदलती है और उसी के साथ हमारी सृष्टि भी बदलने लगती है।

हम प्रायः जीवन में परिस्थितियों, लोगों अथवा भाग्य को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है। जब हम अपने विचारों, आदतों और कार्यशैली में सुधार लाते हैं, तब उसके सकारात्मक परिणाम हमारे संबंधों, कार्यों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देने लगते हैं।

अधिक मास हमें थोड़ी देर रुककर स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देता है—क्या मैं कल से आज बेहतर हूँ? क्या मेरे व्यवहार, धैर्य, संवेदनशीलता और कर्म में गुणवत्ता बढ़ी है? यदि प्रतिदिन केवल एक छोटा-सा सुधार भी हो, तो समय के साथ वही परिवर्तन जीवन को नई दिशा दे सकता है।

जैसे माली पौधे की जड़ों को सींचता है और फिर हरियाली स्वयं प्रकट होती है, वैसे ही आत्मविकास के बीज बोने पर सफलता, संतोष और प्रसन्नता स्वतः फलित होते हैं। अधिक मास का वास्तविक संदेश भी यही है कि बाहरी उपलब्धियों से पहले अपने भीतर के दीप को प्रज्वलित किया जाए।

जब स्वयं में परिवर्तन आता है, तब वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ भी नई प्रतीत होने लगती हैं। यही अधिक मास की साधना है और यही उसके आध्यात्मिक महत्व का सार।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१५ ☆ व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है!  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१५ ☆

? व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इन दिनों देश-विदेश के राजनीतिक मौसम की रंगत बड़ी अजब है। बाहर हवा ठंडी हो या गरम, लेकिन सत्ता के गलियारों में अंतरराष्ट्रीय दबाव का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है। कल तक जो विदेशी नुमाइंदे हमारे देश में  सिर्फ पर्यटन के खूबसूरत ठिकानों की बातें करते थे, व्यापारिक सौदों पर दस्तखत करते थे और हमारे विशाल बाजार को देखकर लार टपकाते थे, वे आज अचानक हाथ में माइक थामकर और चेहरे पर दुनिया भर की फिक्र ओढ़कर हमारे अभिभावक की भूमिका में नजर आने लगे हैं।

अभी हाल ही में, जब देश के सर्वोच्च ‘प्रधान’ सुदूर यूरोप के एक खूबसूरत, ट्यूलिप के फूलों और पवन चक्कियों वाले साइकिल-प्रिय मुल्क की यात्रा पर थे, तब वहां की एक तीखे तेवरों वाली विदेशी महिला पत्रकार साहिबा ने सात समंदर पार से लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों और प्रेस की आजादी के कुछ  सुलगते हुए सवाल दाग दिए कि दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में भी पूरे सचिवालय का एसी अचानक फेल होने लगा।

इस नजारे को देखकर पृष्ठभूमि में वही पुराना और घिसा-पिटा फिल्मी गाना बजने लगता है, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा!”

हमारे विदेश मंत्रालय को इन विदेशी पड़ोसियों का यह मुफ्त में बंटने वाला ज्ञान और अपनी धोती को छोड़कर पूरे जमाने की चिंता करने की आदत बड़ी नागवार और चिंतनीय लग रही है। उनका पत्रकारिता इंडेक्स नम्बर एक होगा , हम अपने 157 नम्बर में ही खुश बने रहना चाहते हैं।

पड़ोसियों का तो शाश्वत धर्म ही यही होता है कि वे अडोस-पड़ोस के हर फटे में टांग अड़ाएं। जब आपका घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा हो, रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही हो, तब वे अपनी खिड़की से झाँककर बड़े मासूम चेहरे से पूछते हैं कि, “अरे भाई, आपके घर में जो कड़ाही चढ़ी है, उसके तेल की बू कुछ तीखी सी आ रही है। सब खैरियत तो है?”

उस नीले-सफेद आसमान वाले ठंडे मुल्क की उन विदेशी पत्रकार महोदया को भी हमारे यहाँ की इस तपती हुई लोकतांत्रिक गर्मी की कुछ ज्यादा ही फिक्र हो रही थी। उनकी यह फिक्र बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती है जैसे किसी मोहल्ले की कोई  बुजुर्ग ‘ताई’ किसी नए-नवेले दूल्हे को घेरकर पूछने लगे कि, “सुना है तुम अपनी दुल्हन को बोलने ही नहीं देते, उसकी आवाज बाहर तक क्यों नहीं आती?”

ताई रूपी इन जोशी पड़ोसियों के तीखे सवालों पर हमारे सिस्टम का बिल्कुल खामोश हो जाना और अपने फोन को साइलेंट मोड पर डाल लेना एक बेहद मजेदार और सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। यह एक ऐसी सधी हुई ‘कूटनीतिक चुप्पी’ थी जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती है। एक ऐसी चुप्पी जो सामने वाले के चेहरे पर देखकर मुस्कुराते हुए कहती है कि, “तुम ठहरे परदेसी, तुम्हें हमारे घर के अंदरूनी झगड़ों की कड़वाहट और हमारे आपसी प्यार की गहराई के बारे में भला क्या खाक पता होगा!”

जब उस अंतरराष्ट्रीय मंच से लोकतंत्र और जन अधिकारों जैसे भारी-भरकम शब्दों के गोले फेंके जा रहे थे, तब हमारा पूरा तंत्र मन ही मन सोच रहा था कि तुमने पूछा तो पूछा, पर हम तुम्हें जवाब देकर मुफ्त का फुटेज और टीआरपी क्यों दें? आखिर कैमरे के सामने ‘नो कॉमेंट्स’ कहकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरने की जो कला हमारे साहब को आती है, वह दुनिया की किस यूनिवर्सिटी में सिखाई जाती है?

 इस पूरे अंतरराष्ट्रीय नाटक का सबसे दिलचस्प और यू-टर्न वाला मोड़ तब आता है, जब यही सुलगता हुआ सवाल देश के भीतर का ही कोई विपक्षी या अपना स्वदेशी और घरेलू पत्रकार पूछ बैठता है। यहाँ आकर सत्ता का व्याकरण और नियम एकदम सीधे और स्पष्ट हो जाते हैं।

सात समंदर पार का  गोरी चमड़ी वाला विदेशी पत्रकार सवाल पूछे, तो हम होठों पर वैश्विक मुस्कान बिखेरकर और ‘जोशी पड़ोसी’ गाते हुए बगल से सुरक्षित निकल सकते हैं। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘अतिथि देवो भव’ का पालन करते हुए उन्हें चाय-समोसा खिलाना और हाथ मिलाकर विदा करना हमारी कूटनीति की महान कला है।

लेकिन जैसे ही वही सुलगता हुआ सवाल अपने ही घर का कोई पत्रकार पूछ लेता है, तो तंत्र की भौहें तन जाती हैं और आँखों में अंगारे उतर आते हैं कि,”अच्छा! तुम्हारी इतनी जुर्रत कि तुम सवाल करो? तुम देशद्रोही हो या किसी विदेशी टूलकिट का हिस्सा?”

विदेशी मेहमानों के सामने जिस खामोशी को कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक बताया जाता है, वही चुप्पी जब घर के अंदर देश के नागरिकों पर लागू होती है तो उसे ‘अनुशासन’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ से  जोड़ दिया जाता है। घरेलू पत्रकार अगर ज्यादा समझदार या सयाना बनने की कोशिश करे तो उसे बहुत सलीके से याद दिला दिया जाता है कि, “बेटा! इस मोहल्ले का राशन कार्ड, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारी फाइलें हमारे ई डी, आई  टी दफ्तर की दराजों में ही बंद हैं।

हमारे यहाँ अब सवालों की भी  ‘नागरिकता’ तय कर दी गई है। अगर सवाल विदेशी पासपोर्ट के साथ आए तो उसे ‘इंटरनेशनल प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज किया जाता है, और अगर सवाल देसी जुबान में निकले तो उसे ‘देश को बदनाम करने की साजिश’ मानकर सीधे कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है।

महामंत्र है , हे संजय !  “तू पूछता बहुत है, पूछ मत , सुन और ताली बजा!”

इसलिए अगली बार जब भी समाज, तंत्र या दफ्तर में कोई ऐसा तीखा सवाल पूछ ले जिसका सीधा जवाब  मौजूद न हो, या जिसे सुनते ही ब्लड प्रेशर बढ़ने लगे, तो बिल्कुल घबराने की जरूरत नहीं है।

बस एक गहरी सांस लीजिए, सामने लगे कैमरे की तरफ देखकर एक सम्मोहक, टेलीप्रॉम्प्टर वाली मुस्कान बिखेरिए और मन ही मन गुनगुनाना शुरू कर दीजिए, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा…”

सच तो यह है कि ट्यूलिप के फूल तो सिर्फ कुछ दिन महकते हैं, असली खुशबू तो अपनी कड़ाही के तीखे तेल में ही होती है!

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९७ ☆ प्रेरक रचना – ज्ञान मय, आकाश हो… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९७ ☆ 

☆ गीत – पक्षी अपनी तान में ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

ना किसी से द्वेष रक्खूँ,

हे!प्रभु मुझको बचा दो।

दो सरलता आचरण में,

प्रेम की गंगा बहा दो।

क्रोध पर पालूँ विजय में,

छल, कपट का नाश हो।

जिंदगी निर्मल बनालूँ,

ज्ञान मय, आकाश हो।

 *

ना हटूँ कर्त्तव्य-पथ से ,

सत्य-पथ  मुझको दिखा दो।

 **

वेद के पथ पर चलें जन,

गुरुकुलों की शान हो।

हर मनुज गीता पढ़े नित,

सर्वजन विद्वान हों।

 *

युग पुनः चाणक्य का हो,

दीप अनगिन तुम जला दो।

 **

देश मेरा गगन चूमे।

देश भारतवर्ष हो।

एक शिक्षा-नीति होवे,

हर तरफ ही हर्ष हो।

 *

ना भिखारी कोई होवे,

हाथ सबके शिल्प ला दो।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग १०४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग १०४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- “बाबा तुम्ही सहन करू शकणार नाही अशी एक गोष्ट आहे. आता रात्र बरीच झालीय.. पण हे तुम्हाला आत्ताच सांगणं गरजेचं आहे. तुम्ही त्रास करून घेणार नसाल तरच सांगतो. ” सलिल म्हणाला.

“नाही त्रास करून घेणार. तू सांग.. काय झालंय?”

त्याने जे कांही सांगितलं ते ऐकून मी सून्न झालो. अक्षरशः गोठून गेल्यासारखा क्षणभर बसून राहिलो. तो म्हणाला होता तसं पैशाने ज्याची भरपाई होऊच शकणार नाही असं बरंच कांही मी गमावून बसलो होतो!!)

महापुरामुळे घरी झालेल्या संपूर्ण विध्वंसाचं शक्य तितक्या मोजक्या शब्दात वर्णन करून तो म्हणाला होता,.. “बाबा आपल्या बंगल्यात ८. ५० फूट उंचीपर्यंत पाणी आलेलं होतं. घरात आता फक्त ओल मुरलेल्या भिंती आणि दिवसभर राबून घरातला सगळा चिखल उचलून बाहेर बागेत रचल्या नंतरचे चिखलमाखलेले फ्लोअर अशी अवस्था आहे. ते सगळं पुन्हा मिळवता येईल बाबा पण तुमचं लेखन… ” तो बोलायचा थांबला. त्याने न सांगताही मला अंदाज आला होता… “लाॅफ्टवर ठेवलेल्या माझ्या बॅगा ना.. ?”मी शांतपणे विचारलं.

“हो. त्या तुमच्या सर्व बॅगांमधे तुम्ही जपून ठेवलेलं पूर्वीपासूनचं तुमचं सगळं लेखन भिजून, कुजून लगदा झाल्याने टाकून द्यावं लागलंय बाबा… “

ऐकून मी सून्न झालो. त्या सर्व बॅगांपैकी कुठल्या बॅगेत काय आहे हे मला फक्त माहित होतं असं नाही तर ते तोंडपाठ होतं. माझ्या आजवरच्या सर्व कथांची मासिके, माझी नाटके, एकांकिका, बालनाट्ये यांची हस्तलिखिते, सेन्साॅर सर्टिफिकेटस्, मला मिळालेले सगळे लेखन-पुरस्कार, ‘प्राजक्त’ या मासिक पत्रिकेत दरवर्षी वेगवेगळे विषय घेऊन गेली अकरा वर्षे मी लिहित असलेल्या सदरलेखनाच्या छापील प्रतींचे गठ्ठे ज्यात ‘प्राजक्त’चे तोवरच्या माझ्या लेखांच्या एकूण १३२ छापील प्रतींचे अंक होते… आणि असंच बरंच कांही! सगळं एका रात्रीत स्वाहा झालं होतं!त्या सदरलेखांमधील जवळजवळ सर्वच आशयांवरून एकेक कथा, एकांकिका, किंवा एखादं दोन अंकी नाटकही.. अशा अनेक नव्या साहित्यकृतींना आकार देण्याचा माझा मनोदय होता. त्याचं नियोजन सुरू होतं आणि अचानक माझं सगळं अक्षरधनच पाण्याच्या प्रचंड प्रवाहाने लुटून नेलं होतं!!

माझ्या खरंच ते जिव्हारीच लागलं. त्या रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली. आणि त्या अस्वस्थ मनःस्थितीत या विध्वंसात देवघरातील ती दत्ताची मूर्ती? ती.. तीही.. अशीच.. ? या विचाराचाच फटका बसावा तसा मी ताडकन् उठून बसलो. बाकी सर्वजण झोपले होते. सलिल/अनघा दोघांचं उद्याच्या घरस्वच्छतेच्या कामांच्या नियोजनाबद्दलचं बोलणं अस्पष्टसं कानावर आलं न् मी त्या दिशेला धाव घेतली. , !ती.. ती.. दत्तमूर्ती न् इतर सगळे देवही चिखलात वहात जाऊन रुतले गेले असतील तर? तेही चुकून त्या कचऱ्याच्या ढीगात टाकले गेले नसतील ना? नुसत्या कल्पनेनेच मी धास्तावलो.

“बाबा.. तुम्ही झोपला नाहीत अजून? असे घाबरलायत कां? काय झालंय?” मला पहाताच सलिलने विचारलं.

” मला सांग.. आपल्या देवघरातल्या देवांचं काय? ते पण वाहून गेलेत कां? ते.. ते.. चिखलाबरोबर त्या कचऱ्याच्या ढीगात तर टाकले गेले नसतील ना रे?” मी काकुळतीने विचारलं.

सलिलने अनघाकडे पाहिलं

“नाही बाबा… अहो, दिवसभराच्या गडबडीत तुम्हाला सांगायचं राहूनच गेलं. बाबा.. एक आश्चर्य वाटेल अशी आनंदाची बातमी आहे. “

इतक्या सगळ्या विध्वंसातही आनंदाची बातमी?… मला कांही समजेचना.

“बाबा, घरातला निम्मा शिम्मा चिखल बाहेर बागेत टाकून झालाय. राहिलेला उद्या दिवसभरात टाकून होईल. पण आश्चर्य म्हणजे आपण देव मांडतो ते ते छोटं देवघर तिथंच तिरकं होऊन चिखलात रुतून राहिल्याने त्यातले देव आणि ती दत्तमूर्तीही त्यावरच विखुरलेले दिसले. मी ते देवघर आणि ती मूर्ती स्वच्छ धुवून तिथे घरच्या किचन कट्ट्यावर ठेवलीय बाबा… ” हे ऐकताच माझ्या अंगावर शहाराच आला एकदम.. ! माझं सगळं अक्षरधन वाहून गेलं तरी ‘तो’ आहे! मग आणखी काय हवं? मनाला झालेल्या त्या अनपेक्षित आनंदाने मी भारावून गेलो होतो. सगळं ‘त्या’च्यावर सोपवून होईल ते पहात रहायचं असं मनोमन ठरवलं आणि निश्चिंत झालो.. !!

अंथरुणाला पाठ टेकली तेव्हा मध्यरात्र उलटून गेली होती. त्या निश्चिंत मनात आपल्याला या प्राप्त परिस्थितीत काय करता येईल याचे विचार सुरु झाले आणि झोप निघूनच गेली. मी झरकन् उठून शेजारच्या टीपाॅयवर ठेवलेला माझा मोबाईल उचलला. आजवर माझी नाटके आणि एकांकिका स्पर्धेत सादर केलेल्या मुंबई, पुणे, अहमदनगर, डोंबिवली, नाशिक, अमरावती, नागपूर, इंदौर अशा विविध ठिकाणच्या सर्व संस्थांची व्हाॅटस् अॅप काॅन्टॅक्स उपलब्ध होती. मी लगेचच सर्वांना सविस्तर मॅसेज पाठवून पुरामुळे निर्माण झालेल्या गंभीर परिस्थितीची कल्पना दिली आणि त्यांनी सादर केलेल्या माझ्या नाटक/एकांकिका यांच्या संहिता त्यांच्याकडे उपलब्ध असतील तर त्याची एक प्रत प्लीज मला पाठवावी अशी विनंती केली. मी यापेक्षा जास्त कांहीच करू शकत नव्हतो.

माझ्या या नाट्यसंहितांपेक्षाही माझ्यासाठी कणभर जास्तच महत्वाचं होते ते ‘प्राजक्त’ मधल्या जाने. २०१० ते जुलै २०१९ या जवळजवळ साडेनऊ वर्षातल्या माझ्या सदर लेखनाचे १३२ अंक पुन्हा मिळवणे. पण तो प्रश्न अजून अधांतरीच होता.

दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी ‘प्राजक्त’ च्या ऑफिसमधे फोन करून विचारणा केली. पुरापूर्वी कांही दिवस आधीच साफसफाई करताना कपाटांमधे जागा करण्यासाठी तिथे साठलेले सगळे जुने अंक त्यांनी रद्दीत विकून टाकले होते!

अखेर एक शेवटचा उपाय म्हणून त्या महिन्याच्या सदरासाठी लिहिलेल्या लेखाबरोबर मी एक जाहीर निवेदन पुढच्या अंकात प्रसिद्ध करण्यासाठी लिहून दिलं. त्यात माझी नेमकी अडचण विशद करून प्राजक्तचे सुरूवातीपासूनचे अंक कुणाकडे उपलब्ध असतील तर मला कळवावे असं वाचकांना आवाहन केलं आणि मी त्याच्या झेरॉक्स कॉपीज् स्वखर्चाने काढून घेईन हेही लिहिलं. या सगळ्या सदरलेखनाला आजपर्यंत कितीतरी वाचकांनी कौतुक करणाऱ्या प्रतिक्रिया वेळोवेळी आवर्जून पाठवल्या होत्या. त्यांच्यापैकी अगदी एकाने जरी ते अंक जपून ठेवले असतील तर त्या अंकांची मला गरज आहे हे निवेदन दिल्याशिवाय त्याच्यापर्यंत पोचणार कसं? हाच विचार ते निवेदन दिलं तेव्हा माझ्या मनात आलं. आणि ध्यानीमनी नसताना खरंच चमत्कार घडला! जादूची कांडी फिरावी तशी सगळी सूत्रं वेगाने हलत गेली आणि… !

दुसऱ्याच दिवशी सर्व नाट्यसंस्थांकडून मी पाठवलेल्या मेसेजेस् ना सकारात्मक उत्तरे आली आणि पुढे दोन-तीन दिवसात त्यापैकी काहींनी पीडीएफ् रुपात तर बाकीच्यांनी त्या संहितेची झेराॅक्स काॅपी मला पाठवून माझ्या हरवलेल्या अक्षरधनाची कांही प्रमाणात कां होईना भरपाई केली. हा एक सुखद धक्काच होता माझ्यासाठी! नंतर मधे आठदहा दिवसही उलटले नसतील आणि अचानक एक फोन आला.

“आपण अरविंद लिमये बोलताय ना?” आवाज अपरिचित. कांहीसा थकलेला. माधवनगरचे कुणी सुधाकर फाटक आजोबा बोलत होते.

“मी प्राजक्तमधलं तुमचं निवेदन वाचलं. त्यातले तुमचे लेख मला आवडतात. त्यामुळेच मी सभासद झाल्यापासूनचे म्हणजे साधारण २०१५पासूनचे सगळे अंक क्रमवार अॅरेंज करून ते जपून ठेवलेत. पण अट एकच. तुम्ही स्वतः येऊन ते घेऊन जायचे. त्यामुळे निदान आपली भेट तरी होईल. आणि हो.. त्याच्या झेराॅक्स काढायची तसदी नका घेऊ. आज माझे वय आहे ८५. मी प्राणपणाने जपलेले ते अंक योग्य माणसाच्या हाती गेल्याचं समाधान मला मिळतंय याचा मला आनंदच आहे… !” ते बोलत होते. मी थक्क होऊन ऐकत होतो. हे एवढंच नव्हतं. दुसऱ्याच दिवशी ‘प्राजक्त’चं मुद्रण कोल्हापूरला ज्या प्रेसमधे होत असे त्या प्रेसचे श्री. डबीर यांचाही निरोप आला. त्यांच्याकडून २०१० च्या आधीचेही सगळे अंक सेव्ह असल्याने त्यांनी ते पेनड्राईवमधे डाऊनलोड करून देण्याचे आश्वासन दिले.. !

जे मला कधीच परत मिळू शकणार नाही असं मला वाटलं होतं ते माझं सगळं अक्षरशः मला अचानक परत मिळणं हा चमत्कारच होता माझ्यासाठी !!

हे सगळं इतकं अनपेक्षित, इतकं सहज, आणि इतकं अल्पावधीत घडलं की हे एखादं सुखद स्वप्नच आहे असंच वाटत राहिलं! प्रतिकूल परिस्थितीत हे असं हवं ते हवं तसं मला बहाल करण्याची ‘त्या’ची किमया म्हणजे अंधारून आलेल्या मनात भरून राहिलेला मिट्ट काळोख क्षणार्धात उजळून टाकणाऱ्या लख्ख प्रकाशासारखी ‘त्या’च्या अलौकिक स्पर्शाची अनुभूती वाटली मला!

नुकतेच घडून गेल्यासारखे मला इतक्या वर्षांनंतरही स्वच्छ आठवणाऱ्या स्वेच्छानिवृत्ती नंतरच्या काळातले हे दोन प्रातिनिधिक प्रसंग.. ! खरंतर तो आणि मी या विषयाशी संबंधित मनात घर करून राहिलेल्या अशा असंख्य आठवणींचा या प्रदीर्घ अशा सदरलेखनाच्या निमित्ताने मी घेतलेला वेध म्हणजे एकापरीने ‘त्या’चा स्पर्श जाणवलेल्या आजवरच्या आठवणीत साठलेल्या अनेक अनुभवांकडे माझे मागे वळून पहाणेच होते! यातून माझ्या नकळत्या वयापासून मी मनात जपलेला ‘तो’ आज वानप्रस्थात प्रवेश केलेल्या माझ्या आयुष्याच्या उतरत्या वळणावर उभ्या मला कसा दिसतो ते आता या सदराच्या पुढच्या समारोपाच्या भागात.. !

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४६ ☆ कागज की पतंग ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कागज की पतंग”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४६ ☆

☆ कागज की पतंग ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पेड़ पर लटकी हुई है

एक काग़ज़ की पतंग।

 

डोर कच्ची थी

समय ने तोड़ दी

हवाओं ने दिशा

उसकी मोड़ दी

राह से भटकी हुई है

एक उच्छल सी उमंग।

 

उछलता बचपन

बजाता तालियाँ

हँसी फूलों सी

विचरती तितलियाँ

आस में अटकी हुई है

साँस भर उठती तरंग।

 

हौसले सबके

नचें इक डोर पर

होड़ बादल से

रुके सब छोर पर

जिंदगी बहकी हुई है

उम्र के उड़ते विहंग। 

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२८.१.२६

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५३ ☆ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गिला शिकवा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५३ ☆

✍ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अभी हिम्मत नहीं हारी हमारी

फ़तह की अब रही बारी हमारी

 *

न होना रार है माशूक़ से फिर

ख़ता बतलाइये सारी हमारी

 *

मुसीबत कोई आये बे-असर है

अगर रहती है तैयारी हमारी

 *

तू नामुमकिन तभी बतला रहा है

अभी देखी न दमदारी हमारी

 *

अमानत दोसतों की जान बोला

परखने आ गए यारी हमारी

 *

गिला शिकवा नहीं करते वो हरगिज़

समझते है जो लाचारी हमारी

 *

तुम्हारी हरकतों को रोक तो दूँ

खड़ी है बीच बेज़ारी हमारी

 *

सिखाया इल्म है उस्ताद का ये

ग़ज़ल में कब कलाकारी हमारी

 *

न रंभा मेनका के है ये वश का

अरुण जो तोड़ दें तारी हमारी

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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